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शरीर के सात चक्र की जानकारी Information about the

seven chakras of the body

शरीर के सात चक्र की जानकारी Information about the seven chakras of the body चक्रा का परिचय जैसा कि पाठकगण प्रस्तुत चित्र में चक्रों का स्थान, नाम व संख्या जान चुके हैं-मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र-ये सात चक्र हैं। जिस प्रकार स्थूल दृष्टि से नाड़ी नसों के सर्वाधिक जमावड़ा होने के कारण (जंक्शन होने के कारण) नाभि, हृदय व मस्तिष्क महत्त्वपूर्ण हैं उसी प्रकार सूक्ष्म दृष्टि से ये चक्र भी महत्त्वपूर्ण हैं। क्योंकि ये शक्ति, ऊर्जा व प्राण के सूक्ष्म किन्तु अत्यंत महत्त्वपूर्ण जंक्शन ही नहीं बल्कि शरीर के विभिन्न ‘पॉवर स्टेशन’ हैं। इनमें से प्रत्येक की अपनी निश्चित शक्तियां, अपने निश्चित प्रभाव और अपने निश्चित अधिकार हैं। किन्तु ये ‘पॉवर स्टेशन’ सोए हुए या निष्क्रिय रहते हैं।

शरीर के सात चक्र की जानकारी Information about the seven chakras of the body
शरीर के सात चक्र की जानकारी Information about the seven chakras of the body

बिल्कुल उसी प्रकार मानो समस्त यन्त्रों, साधनों, उपकरणों तथा संचालन व्यवस्था आदि से सम्पन्न और हर दृष्टि से समर्थ किसी बिजलीघर या पॉवर स्टेशन की बिजली चली जाए और उसकी समस्त शक्तियां व संचालन बिजली के आने तक निष्प्राण रह जाए।’ ये जो बिजली/करंट/ऊर्जा या शक्ति है-जिसके अभाव में हर दृष्टि से सम्पन्न व समृद्ध होते हुए भी हमारे शरीर के सातों चक्र/पॉवर स्टेशन मृतप्राय रहते हैं, यही कुण्डलिनी शक्ति है। बिजली की सप्लाई जिस-जिस उपकरण में हो जाती है, वही उपकरण क्रियाशील हो जाता है। ठीक इसी प्रकार जिस-जिस चक्र या ‘पॉवर स्टेशन’ पर यह कुण्डलिनी शक्ति पहुंच जाती है, वही सक्रिय हो जाता है।

शरीर के सात चक्र की जानकारी Information about the seven chakras of the body
शरीर के सात चक्र की जानकारी Information about the seven chakras of the body

किसी विशिष्ट चक्र में कुण्डलिनी शक्ति का प्रवेश और वहां से आगे/ऊपर बढ़कर क्रमशः अगले चक्र में प्रवेश ‘चक्र भेदन’ कहा जाता है। (इस विषय में हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे)। इस प्रकार ‘षट्चक्र भेदन’ (छह चक्रों को भेद कर) कुण्डलिनी को सातवें चक्र में स्थित किया जाता है। सातवें चक्र का भेदन कर कुण्डलिनी शक्ति मोक्ष के समय परमात्मा में विलीन होकर स्वयं परमात्म स्वरूप हो जाती है। यह भी एक विलक्षण तथ्य है कि सप्त चक्रों ही की भांति कुण्डलिनी शक्ति भी मनुष्यों में सुप्त/निष्क्रिय अवस्था में ही रहती है। योग द्वारा उसे साधक को जगाना पड़ता है। योग के अतिरिक्त कुण्डलिनी जागरण के मन्त्रादि अन्य विधान भी कहे गए हैं। हम आगे यथासम्भव प्रकाश सभी विधानों पर डालेंगे, कुण्डलिनी एवं सप्तचक्र मूल रूप से योगपद्धति/योगविधान की ही चर्चा करेंगे। क्योंकि यही सर्वमान्य, विवाद रहित, पूर्ण प्रामाणिक तथा अपेक्षाकृत सहज प्रणाली है। और इन सबसे बड़ी बात यह कि यही प्रणाली बोधगम्य भी है तथा मेरी वर्णन सामर्थ्य के भीतर भी तो सबसे पहले सप्त चक्रों के विषय में जानते हैं

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