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kritya sadhana -प्राचीन तीक्ष्ण कृत्या साधना ph. 85280 57364 कितना अद्भुत था कामाक्षा का तांत्रिक सम्मेलन इस सम्मेलन में मां कृपाली भैरवी, पिशाच सिद्धियों की स्वामिनी देवुल भैरवी, त्रिजटा अघोरी, बाया भैरवनाथ, पगला बाबा आदि विश्व विख्यात तांत्रिक आये हुए थे। सभापति कौन बनेगा, इस बात पर सभी एकमत नहीं हो पा रहे थे, कि तभी त्रिजटा अघोरी ने अत्यन्त मेघ गर्जना के साथ परम पूज्य गुरुदेव का नाम प्रस्तावित किया और घोषणा की- “यही एक मात्र ऐसे व्यक्तित्व है, जो साधना के प्रत्येक क्षेत्र, चाहे यह तंत्र का हो या मंत्र का हो, कृत्या साधना हो चाहे भैरव साधना हो या किसी भी तरह की कोई भी साधना हो, पूर्णतः सिद्धहस्त है।” भुर्भुआ बाबा ने भी इस बात का अनुमोदन किया।

जब सबने पूज्य गुरुदेव को देखा, तो उन्हें सहज में विश्वास नहीं हुआ, कि धोती-कुर्ता पहना हुआ यह व्यक्ति क्या वास्तव में इतने अधिक शक्तियों का स्वामी है। इसी भ्रमवश कपाली बाबा ने गुरुदेव को चुनौती दे दी। कपाली बाबा ने कहा- “तुम्हारा अस्तित्व मेरे एक छोटे से प्रयोग से ही समाप्त हो जायेगा।

अतः पहले तुम ही मेरे ऊपर प्रयोग करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करो।” गुरुदेव ने अत्यन्त विनम्र भाव से उनकी चुनौती को स्वीकार करते हुए कहा- “आपको अपनी कृत्याओं पर भरोसा करना चाहिए, किन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए, कि दूसरा व्यक्ति भी कृत्याओं से सम्पन्न हो सकता है।” “मैं आपका सम्मान करते हुए आपको सावधान करता हूं कि आपके प्रयोग से मेरा कुछ मुस्कराते हुए गुरुदेव ने फिर कहा नहीं बिगड़ेगा। यदि आप को अहं है, कि आप मुझे समाप्त कर देंगे, तो पहले आप ही अपने सबसे शक्तिशाली व संहारक अस्त्र का प्रयोग कर सकते हैं।”

इतना सुनते ही कपाली बाबा ने अत्यन्त तीक्ष्ण संहारिणी कृत्या’ का आवाहन करके सरसों के दानों को गुरुदेव की तरफ फेंकते हुए कहा- ‘ले अपनी करनी का फल भुगत।” संहारिणी कृत्या का प्रहार यदि विशाल पर्वत पर भी कर दिया जाय, तो उस पर्वत का नामो-निशान समाप्त हो जाए। अत्यन्त उत्सुक और भयभीत नजरों से अन्य साधक मंच की ओर देख रहे थे, किन्तु आश्चर्य कि पूज्य गुरुदेव अपने स्थान से दो चार कदम पीछे हट कर वापिस उसी स्थान पर आकर खड़े हो गए। कपाली बाबा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।

 

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उन्हें तो उम्मीद ही नहीं थी कि यह साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति संहारिणी कृत्वा का सामना कर सकेगा। इसके बाद कणली बाबा ने ‘बावन भैरवों’ का एक साथ प्रहार किया, लेकिन उनका यह प्रहार भी पूज्य गुरुदेव का बाल बांका न कर सका। कृपाली भैरवी तथा अन्य तांत्रिकों ने गुरुदेव को प्रयोग करने के लिए कहा।

गुरुदेव ने कपालो बाबा से कहा- “मैं एक ही प्रयोग करूंगा। यदि तुम इस प्रयोग से बच गए, तो मैं तुम्हारा शिष्यत्व स्वीकार कर लूंगा।” गुरुदेव ने दो क्षण के बाद ही अपनी मुट्ठी कपाली बाला की तरफ करके खोली दी और उसी समय कपाली बाबा लड़खड़ा कर गिर पड़े. उनके मुंह से खून की धारा यह निकली।

 गुरुदेव ने कहा- “यदि कपाली बाबा क्षमा मांग लें, तो मैं उन्हें दया करके जीवनदान दे सकता हूं।” कपाली बाबा के मुंह से खून निकल रहा था, फिर भी उनमें चेतना बाकी थी। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। गुरुदेव ने अत्यन्त कृपा करके अपना प्रयोग वापिस लिया और वहां उपस्थित साधकों के अनुग्रह पर कपाली बाबा के सिर से दो-चार बाल उखाड़ कर उनको अपना शिष्यत्व प्रदान किया और तांत्रिक सम्मेलन के सभापति बने। उपरोक्त घटनाक्रम गुरुदेव द्वारा लिखित ‘तांत्रिक सिद्धियां नामक पुस्तक में उद्धृत है।

इस घटनाक्रम से स्पष्ट हो गया है, कि कृत्या अपने आपमें पूर्णतः मारण प्रयोग है। एक बार यदि इसका प्रयोग कर दिया जाय, तो सामने वाले व्यक्ति के साथ ही साथ उसके आस-पास के व्यक्ति भी घायल हो जाते हैं, चाहे वह कितना ही बड़ा सिद्ध योगी या तांत्रिक हो। कृत्या चौंसठ प्रकार की होती है। इसमें संहारिणी कृत्या सर्वाधिक उम्र और विनाशकारी होती है।

यदि कोई साधक इसका प्रयोग कर दे, तो सामने वाले का बचना तभी सम्भव है, जब वह भी संहारिणी कृत्या का प्रयोग जानता हो। संहारिणी कृत्या को खेचरी कृत्या द्वारा ही नष्ट किया जा सकता है। कृत्या : पग-पग पर सहायक इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है, कि गृहस्थ साधक इसकी साधना नहीं कर सकता है। मारण प्रभाव से युक्त होने बाद भी कृत्या गृहस्थ साधक के लिए कई सृजनात्मक प्रभावों से भी युक्त है-

* कृत्या साधना को सम्पन्न करने के बाद साधक में आशीर्वाद व श्राप देने की अद्भुत क्षमता प्राप्त हो जाती है। कृत्या साधना के द्वारा मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण सिद्ध हो जाता है।

* कृत्या सिद्ध होने पर साधक आत्मिक रूप से बलशाली व शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला बन जाता है। कृत्या सिद्ध किया हुआ साधक किसी असाध्य रोग से ग्रसित व्यक्ति को यदि कृत्या मंत्र से अभिमंत्रित जल पिला दे, तो वह रोगी पूर्णतः रोग मुक्त हो जाता है।

★ कृत्या सिद्ध करने के बाद साधक पर मारण, वशीकरण या अन्य किसी भी कृत्या के तांत्रिक प्रयोग का असर नहीं होता। प्रयोग विधान कृत्या साधना सिद्ध करने के लिए अमावस्या की रात्रि को सर्वश्रेष्ठ व सिद्ध समय कहा गया है।

जिन्होंने इसे सिद्ध करने की गुरु आज्ञा प्राप्त की है या इससे सम्बन्धित विशेष दीक्षा प्राप्त की है, क्योंकि इस तीक्ष्ण साधना में जरा सी भी गलती साधक के लिए हानिप्रद सिद्ध होगी।

यह साधना 11 दिन में सम्पन्न होती है। इस साधना में साधक काली धोती पहनें व काले रंग के आसन का प्रयोग करें। यह रात्रिकालीन साधना है।

इस साधना को करने में निम्न सामग्री आवश्यक है- पंचमहामंत्रों से अनुप्राणित शिव शक्ति साधना से सिद्ध और ब्रह्मप्राणश्चेतनायुक्त कृत्या तेजक’ तथा ‘कृत्या माला’।  को या किसी भी अमावस्या की रात्रि को दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके आसन पर बैठें और संकल्प करें, कि मैं अपने जीवन में आने वाली प्रत्येक समस्या में सहायता प्राप्त करने के लिए 11 दिन का अनुष्ठान करने का संकल्प लेता हूं।

इसके बाद बाएं हाथ में जल लेकर शरीर पर दस बार देह रक्षा मंत्र बोल कर जल छिड़कें- देह रक्षा मंत्र ॐ रं क्षं देहत्व रक्षायै फट् इसके बाद दशों दिशाओं में बाएं हाथ से अश्वन फेंकते हुए दिशा बन्धन करें, जिससे साधना काल में कोई व्यवधान न आए- दिशा बन्धन मंत्र ॐ ऐं क्लीं ह्रीं क्रीं ॐ फट् फिर पूज्य गुरुदेव के चित्र का और कृत्या तेजक का पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें तथा मूल मंत्र की 11 माला जप करें-

 

कृत्या मूल मंत्र ॐ क्लीं क्लीं कृत्यायै क्रीं क्रीं फट्

★ आसन पर बैठने के बाद बीच में उठें नहीं। साधना काल मैं यदि कोई आवाज सुनाई दे, तो उसकी ओर ध्यान न दें। मंत्र जप का क्रम किसी भी परिस्थिति में बीच में न तोड़ें। इस प्रकार 17 दिन तक प्रयोग करें। ग्यारहवें दिन तेजक को अपने गले में पहनें या बांह पर बांध लें। साधक इसे तीस दिन तक अवश्य पहनें, जिससे कृत्या का तेज साधक के शरीर में रम सके और साधक सफलता पूर्वक इसका प्रयोग कर सके। 30 दिनों के बाद साधक तेजक और माला को नदी वा तालाब में विसर्जित कर दें। इस साधना में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन व एक समय भोजन करना आवश्यक है।

 

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