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vashikaran uchatan akarshan mantra paryogo savdhani

वशीकरण, उच्चाटन,आकर्षणादि मन्त्र प्रयोगों में सावधानी ।

vashikaran uchatan akarshan mantra
vashikaran uchatan akarshan mantra

vashikaran uchatan akarshan mantra कोई वस्तु या शक्ति न तो अच्छी होती है और न ही बुरी होती है। उसका प्रयोग | भी उसको अच्छा या बुरा बना देता है। कोई भी शक्ति ऐसी नहीं जिसका अच्छा या बुरा योग न हो सके। शक्ति या कोई उच्च पदवी जब किसी सद्चरित्र भले मनुष्य के पास होती है, तो वह उसके द्वारा सबका भला करता है और दूसरों को सुख पहुंचाता है। उनके कष्ट निवारण करने का प्रयत्न करता है। यदि वही शक्ति या उच्च पदवी किसी दष्ट एवं नीच मनुष्य के पास होती है, तो वह उसके द्वारा संसार में अनाचार उत्पन्न करने का प्रयत्न करता है, दूसरों को दु:ख देता है और अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए अपने आप को गिरावट में ले आता है।vashikaran uchatan akarshan mantra

जिस वशीकरण से संसार में बुरे मनुष्यों का सुधार किया जाता था  vashikaran uchatan akarshan mantra

वहां उसका प्रयोग काम और क्रोध की वासनाओं को पूरा करने के लिये होने लगा है। उच्चाटन से समाज और देश के शत्रुओं का नाश किया जाता है। आकर्षण से जो शत्रु थे उनको बुला कर मित्रता की जाती थी, परन्तु अब कुत्सित कामना पूर्ति के लिए इसका प्रयोग किया जाने लगा है। इस प्रकार मन्त्रों के प्रयोगों का विपरीत प्रयोग करके मन्त्र शास्त्र के उन प्रयोगों में विष उत्पन्न किया जाने लगा है। मन्त्रों में बड़ी शक्ति है। उनका आश्रय लेकर मनुष्य दु:खों से निवृत्ति प्राप्त करके ईश्वर के चरणों में पहुंच जाता है। साधारण कामनाओं को पूरा करने के लिये, छोटे-छोटे शारीरिक दु:खों से निवृत्ति प्राप्त करने के लिये उस बड़ी शक्ति का प्रयोग वैसे ही है जैसे किसी राजा को प्रसन्न करके उससे बहुमूल्य पदार्थों के बदले तुच्छ वस्तु । vashikaran uchatan akarshan mantra

मांगना अथवा जवाहरात के बदले कांच मांगना। चाहे हमारी कामना ठीक ही हो परन्तु । इतनी बड़ी शक्ति से साधारण वस्तु के लिये प्रार्थना करना एक भूल है। उसके द्वारा तो । नित्य रहने वाला आनन्द, चित्त की शांति और अमृत जीवन पाना चाहिए। मन्त्र का सबसे अधिक दुरुपयोग दसरों का अनिष्ट चिन्तन है, अथवा दुष्ट वासनाओं को पूरा करने का लोभ है। vashikaran uchatan akarshan mantra
मन्त्र में शक्ति है, इस कारण साधक जो इच्छा करेगा वह अवश्य उस 3 द्वारा पूर्ण होगी। जब साधक इच्छा को पूरा करने के लिए अथवा दूसरों को कष्टपहुंचाने के लिए करता है तो उसमें काम, क्रोध आदि उत्पन्न होता है। | भोग से कभी वासनाओं की तृप्ति तो होती ही नहीं है, वह और भी तेज हो जाती

शिव हैं। मैं सामर्थ हूं’ यह अहंकार उसको अन्धा बना देता है। वह वासनाओं में और
है। अधिक फंस जाता है और शक्ति के अधार से पाप में प्रवीण हो जाता है। मन की सात्विक शक्तियां नष्ट हो जाती है, रज और तम उस पर अधिकार कर लेते हैं। वह मनुष्य से दूर हो जाता है। स्वार्थ उसके शुभ विचारों को नष्ट कर देता है। जिस मनुष्य जीवन को पाकर मनुष्य जन्म मरण से छूट जाता था। इसके द्वारा वह अपने लिए घोर नरक। बनाता है। vashikaran uchatan akarshan mantra

संसार में जितनी भी शक्तियां हैं उनमें मानसिक शक्ति सब से प्रधान है। जिस मनुष्य में जितनी भी मानसिक शक्ति अधिक है वह उतना ही बड़ा बन सकता है। तेज, बल, प्रभाव सब मानसिक शक्ति के धर्म हैं परन्तु जब मन्त्र का प्रयोग कुटिल वासनाओं के लिए होता है तब उसका बहुत सा बल नष्ट भी हो जाता है। मन्त्रों को उपयोग वासनात्मक कामनाओं की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि ईश्वर की कृपा पाने के लिए होना चाहिए। vashikaran uchatan akarshan mantra

 

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