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तंत्र के दशकर्मो सम्बन्धी समान्य जानकारी  tantra ki

dashkarmo sambandi Samany tantra dashkarm

tantra dashkarm
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तंत्र के दशकर्मो सम्बन्धी समान्य जानकारी  tantra ki dashkarmo sambandi Samany 

tantra dashkarm तंत्र की असंख्य चमत्कारी साधनाओ का जिक्र मिलता है । अनेको पद्धतियों से य्ह प्रयोग किया जाता है।कार्य की विशिष्टता के अनुसार इनके मन्त्र तंत्र पद्धतियाँ का प्रयोग प्रचलित है । जिन पद्धतियों का संसार में सब से ज्यादा प्रयोग किया जाने लगा । तंत्र की कुछ विशेष पद्धतियों को 6 भागो मे बांटा गया है शान्तिं वश्यं स्तम्भनं च द्वेषं उच्चाटने-मारणे। उक्तानि इमानि कर्माणि शान्तिरोगादि नाशनम् ॥ अर्थात-(१) शान्ति कर्म, (२) वशीकरण, (३) स्तम्भन, (४) विदेषण (५) उच्चाटन एवं (६) मारण-कार्यों, रोग-शत्रु आदि कष्टों के निवारण हे प्रकार के प्रयोगों को षट्कर्म कहते हैं। tantra dashkarm

 

 

मंत्र प्रयोगो का जैसे समय अनुसार समस्याओ और मनोकामनाओ की पूर्ती के लिए विस्तार बढ़ना लगा कालान्तर में षटकर्मों के वर्गीकरण के अन्तर्गत ही चार प्रयोग और भी जोड़ दिए गए यह कुल दस हो गए जिन को दशकरम बोला जाता है जो निम्नलिखित है ।

(१) शान्तिकर्म, (२) स्तम्भन, (३) मोहन, (४) उच्चाटन, (५) वशीकरण (६) आकर्षण, (७) जृम्भण, (८) विद्वेषण, (९) मारण एवं (१०) पौष्टिक कर्म।

दशकर्म सम्बन्धी लक्षण तथा उनकी अधिष्ठात्री देवी ।। tantra dashkarm

(1) शान्ति कर्म : किसी भी कल्याणकारी कामना से की गई साधना शान्ति कर्म कहलाती है। इस कर्म के अन्तर्गत साधना का मुख्य उद्देश्य परिवारिक एवं सामाजिक क्षेत्र में कल्याणकारी एवं लोकहित की दृष्टि से कर्म किए जाते हैं। इसमें ग्रहों के अनिष्टकारी प्रभाव, रोगादि, दुर्भिक्ष एवं प्राकृतिक उपद्रवों के निवारण हेतु मंत्र प्रयोग किए जाएं तो वह शान्ति प्रयोग कहे जाते हैं। इसकी अधिष्ठात्री देवी रति है। मतान्तर से शान्ति कर्मों के देवता गणेश व अम्बिका देवी हैं।  tantra dashkarm

(2) स्तम्भुन : जिस मंत्र, यन्त्र, तन्त्रादि क्रिया से शत्रु, चोर, डाकू, सर्प, वाघ आदि के आक्रमण, अग्नि, जल, वायु, वाहन एवं शस्त्र को निष्क्रिय करने के लिएअर्थात् वह जहां का तहां अटक जाए या स्थगित एवं स्तम्भित हो जाए उसे स्तम्भन प्रयोग कहते हैं। इसकी अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी (रमा) है।  tantra dashkarm

(3) मोहन कुर्म : मोहन अथवा सम्मोहन दोनों लगभग एक हैं। इस प्रयोग के अन्तर्गत किसी भी लौकिक प्राणी, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि को सम्मोहित एवं वशीभूत किया जा सकता है। राज-मोहन, सभा-मोहन और स्त्री-पुरुष मोहन तीन प्रकार के हैं। इन तीनों की साधनाएं भी पृथक-पृथक हैं। भारतीय अध्यात्म एवं

मंत्रशास्त्र की यह अति प्राचीन एवं विस्तृत प्रभाव वाली अद्भुत विद्या है।

(4) उच्चाटन कर्म : जिस प्रयोग के करने से विद्वेषी की तन्मयता भङ्ग हो, मन उचाट एवं अस्थिर हो, भ्रम की मनोस्थिति, स्थान एवं पद से भ्रष्ट हो जाता है,  tantra dashkarm

उच्चाटन कर्म कहते हैं। जब कोई मान्त्रिक उच्चाटन मंत्र द्वारा किसी व्यक्ति विशेष को उचाटता एवं वितृष्णा की स्थिति में पहुंचा देता है, तो भी यह उच्चाटन कर्म

419 | कहलाता है। इसकी अधिष्ठात्री देवी दुर्गा देवी हैं।

(5) वशीकरण कुर्म : जिस प्रयोग के करने से किसी भी स्त्री या पुरुष की इच्छाशक्ति को निस्तेज करके साधक अपनी इच्छानुसार कार्य लेता है, उसको वशीकरण कहते हैं। इसके प्रभाव से प्रतिकूल मन वाला व्यक्ति भी साधक की शरण में आ जाता है। इसकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती है। |

(6) आकर्षण कुर्म : आकर्षण कर्म भी मोहन और वशीकरण का प्रकारान्तर है। इनमें नाम मात्र भेद हैं। मोहन में जहां अनुकूल बनाने का भाव मुख्य है, वहीं वशीकरण में जीव को अनुकूल एवं अपने अधीनस्थ करने का भाव होता है। आकर्षण में किसी भी दूसरे व्यक्ति को आत्मविस्मृतं करवाकर उसके ध्यान या प्रवृत्ति को अपनी

ओर आकर्षित करने का भाव रहता है। आकर्षण मानसिक रूप से किसी व्यक्ति विशेष को खींचने का भाव ही आकर्षण कर्म होता है। आकर्षण कर्म के प्रभाव से सम्बन्धित प्राणी साधक की इच्छानुसार उसके आकर्षण पाश के बन्धन में रहता है।  tantra dashkarm

(7) जुम्भुण कर्म : जब किन्हीं दो अथवा अधिक व्यक्तियों के मध्य पारस्परिक प्रेमभाव एवं मित्रता समाप्त करके उनमें वैर-विरोध, भय, अविश्वास और अलगाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से किये कर्म को जृम्भण कर्म कहते हैं।

(8) विद्वेषण : विद्वेषण कर्म का प्रभाव भी प्राय: जम्भण जैसा होता है। इस कर्म के प्रयोग से परिवारों में या जाति, समाज या देश में सद्भावना समाप्त करवाकर परस्पर वैमनस्य, फूट या वैर-विरोध पैदा हो जाए, उसे विद्वेषण कहते हैं। इसकी अधिष्ठात्री ज्येष्ठा देवी है।

(9) मारण कुर्म : जिस मंत्र प्रयोग से किसी की जीवन शक्ति का नाश करके असामयिक उसके प्राणों का हरण कर लिया जाए उसे मारण कर्म कहते हैं। मारण, उच्चाटन, जृम्भण, विद्वेषण आदि तामसी प्रयोग हैं। इनके प्रयोग वर्जित एवं निन्दनीय हैं। इनकी अधिष्ठात्री देवी भद्रकाली देवी है। |

(10) पौष्टिक कुर्म : जब कोई साधक अपने अथवा किसी अन्य के कल्याण

या हित के लिए जैसे सुख-समृद्धि, रोग-मुक्ति या परिवारिक एवं राष्ट्रीय एकता या । प्रभु की कृपा प्राप्ति के लिए मंत्र साधना करता है, तो उसे पौष्टिक कर्म कहते हैं। tantra dashkarm

यह कर्म श्रेष्ठ माना गया है। पौष्टिक कर्मों के अधिष्ठाता भगवान शिव हैं। साधक को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से मुक्त होकर आध्यात्मिक सिद्धि की प्राप्ति के लिए। कर्म करना और सभी के लिए मन्त्र साधना के शुभ लाभ को प्राप्त करना ही सर्वश्रेष्ठ कर्म है।

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