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what is yakshini यक्षिणी क्या है ?
 
yakshini sadhna
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   what is yakshini यक्षिणी क्या है ? yakshini sadhnaआज हम यक्षिणी साधना के उपर चर्चा करेंगे कौन सी यक्षिणी की साधना आप के लिए उपयोग रहेंगी। पहले हम यक्षिणी साधना के विषय मे समाज में बहुत सी गलत धारणाएँ हैं । कुछ लोगों का मानना है कि यक्षिणी खून मनुष्य का खून चूसती हैं। yakshini sadhna

हिन्दू धर्मशास्त्रों में मनुष्येतर जिन प्राणि-जातियों का उल्लेख हुआ है, उनमें देव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस, पिशाच प्रादि प्रमुख हैं। इन जातियों के स्थान जिन्हें ‘लोक’ कहा जाता है-भो मनुष्यजाति के प्राणियों से भिन्न पृथ्वी से कहीं अन्यत्र अवस्थित हैं। इनमें से कुछ जातियों का निवास प्रकाश में और कुछ का पाताल में माना जाता है। | इन जातियों का मुख्य गुण इन को सार्वभौमिक सम्पन्नता है, अर्थात् इनके लिए किसी वस्तु को प्राप्त कर लेना अथवा प्रदान कर देना सामान्य बात है। ये जातियाँ स्वयं विविध सम्पत्तियों को स्वःमिनी हैं। मनुष्य जाति का जो प्राणी इनमें से किसी भी जाति के | किसी प्राणी की साधना करता है अर्थात् उसे जप, होम, पूजन आदि | द्वारा अपने ऊपर अनुरक्त कर लेता है, उसे ये मनुष्येतर जाति के
प्राणी उसकी अभिलाषित वस्तु प्रदान करने में समर्थ होते हैं। इन्हें | अपने ऊपर प्रसन्न करने एवं उस प्रसन्नता द्वारा अभिलषित वस्तू प्राप्त करने की दृष्टि से हो इनका विविध मन्त्रोपचार आदि के द्वारा साधन किया जाता है जिसे प्रचलित भाषा में ‘सिद्धि’ कह कर पुकारा जाता है।

 

यक्षिणियाँ भी मनुष्येतर जाति की प्राणी हैं। ये यक्ष जाति के पुरुषों की पत्नियां हैं और इनमें विविध प्रकार की शक्तियाँ सन्निहित | मानी जाती हैं। विभिन्न नामवारिणी यक्षिणियाँ विभिन्न शक्तियों | से सम्पन्न हैं-ऐसी तान्त्रिकों को मान्यता है । अतः विभिन्न कार्यों | की सिद्धि एवं विभिन्न अभिलाषाप्नों को पूति के लिए तंत्रशास्त्रियों

 

द्वारा विभिन्न यक्षिणियों के साधन की क्रियाओं का आविष्कार किया गया है। यक्ष जाति चूकि चिरंजीवी होती है, अतः यक्षिणियाँ भी प्रारम्भिक काल से अब तक विद्यमान हैं और वे जिस साधक पर प्रसन्न हो जाती हैं, उसे अभिलषित वर अथवा वस्तु प्रदान करती हैं।
अब से कुछ सौ वर्ष भारतवर्ष में यक्ष-पूजा का अत्यधिक प्रचलन था । अब भो उत्तर भारत के कुछ भागों में ‘जखैया’ के नाम से यक्षपूजा प्रचलित है। पुरातत्त्व विभाग द्वारा प्राचीन काल में निर्मित यक्षों की अनेक प्रस्तर मूर्तियों की खोज की जा चुकी है। देश के विभिन्न पुरातत्त्व संग्रहालयों में यक्ष तथा यक्षिणियों की विभिन्न प्राचीन मूर्तियाँ भी देखने को मिल सकती हैं।

 

कुछ लोग यक्ष तथा यक्षिणियों को देवता तथा देवियों की ही एक उपजाति के रूप में मानते हैं और उसी प्रकार उनका पूजन तथा आराधनादि भी करते हैं। इनकी संख्या सहस्रों में हैं

प्रत्येक व्यक्ति के मन यक्षिणी साधना के सम्बन्ध में कई प्रकार की धारणा है कुछ साधक इस विषय अंजान है ज्ञानता के कारण इस साधना के बारे में गलत सोचते है इस साधना तामसिक साधना समझते हैं बहुत से लोग यक्षिणी का नाम सुनते ही डर जाते हैं कि ये बहुत भयानक होती हैं, किसी चुडैल कि तरह, किसी प्रेतानी कि तरह, मगर ये सब सब आज्ञानता पूरन बाते है । यक्षिणी साधना के विषय मे समाज जो असत्य मिथ्या धारणाओं को दूर करने का प्रयत्न करूंगा अस्ल में यक्षिणी साधना क्या इस के विषय बताने का प्रयत्न करूंगा है । कोई भी साधना करने से पहले उस साधना की प्रारम्भिक जानकारी होने जरूरी है हम भटक न सकें । yakshini sadhna

 

यक्षिणी साधना परिचय yakshni sadhna related introduction

यक्षिणी एक सौम्य और दैविक शक्ति होती है देवताओं के बाद देवीय शक्तियों के मामले में यक्ष का ही नंबर आता है हमारे भारतीय पौराणिक ग्रंथो में बहुत सारी प्रमुख रहस्यमयी जातियां का वर्णन मिलता है । जैसे कि देव गंधर्व ,यक्ष, अप्सराएं, पिशाच, किन्नर, वानर, रीझ, ,भल्ल, किरात, नाग आदि यक्षिणी भी इन रहस्यमय शक्तियो के अंतर्गत आती है । देवताओं के कोषाध्यक्ष महर्षि पुलस्त्य पौत्र विश्रवा पुत्र कुबेर भी यक्ष जाती के हैं । जैसे कि देवताओं के राजा इंद्र है वैसे ही यक्ष यक्षिणी काराजा कुबेर है कुबेर को यक्षराज बोला जाता है यक्ष यक्षिणीया कुबेर के आधीन होती है।
https://www.youtube.com/watch?v=1Pe7EGmcHtA&t=7s

यक्षिणी साधना को किसी रूप में सिद्ध किया जाता है yakshni sadhna ko kis roop me siddh kiya jata hai

कुछ साधको के मन शंकाआऐं होता है कि यह किसी रूप मे सिद्ध होती है कुछ लोगों की धारणा यह सिर्फ प्रेमिका रूप में सिद्ध की जा सकती है जो कि बिलकुल गलत है साधक इच्छा अनुसार किसी भी रूप सिद्ध कर सकता है । इच्छा अनुसार, माता , पुत्रीव स्त्री ( पत्नी ) के रूप में सिद्ध कर सकते है यक्षिणियों की साधना अनेक रूपों में की जाती है, जैसे माँ, बहन, पत्नी अथवा प्रेमिका के रूप में इनकी साधना की जाती है, ओर साधक जिस रूप में इनको साधता है ये उसी प्रकारका व्यवहार व परिणाम भी साधक को प्रदान करती हैं, माँ के रूप में साधने पर वह ममतामयी होकर साधक का सभी प्रकार से पुत्रवत पालन करती हैं तो बहन के रूप में साधने पर वह भावनामय होकर सहयोगात्मक होती हैं, ओर पत्नी या प्रेमिकाके रूप में साधने पर उस साधक को उनसे अनेक सुख तो प्राप्त हो सकते हैं किन्तु उसे अपनी पत्नी व संतान से दूर हो जाना पड़ता है ।उड्डीश तंत्र में जिक्र मिलता है कि इस को किसी भी रूप मे सिद्ध किया जा सकता है । yakshini sadhna

सर्वासां यक्षिणीना तु ध्यानं कुर्यात् समाहितः ।

भविनो मातृ पुत्री स्त्री रुपन्तुल्यं यथेप्सितम् ॥

तन्त्र साधक को अपनी इच्छा के अनुसार बहिन , माता , पुत्रीव स्त्री ( पत्नी ) के समान मानकर यक्षिणियों के स्वरुप में साधना अत्यन्त सावधानीपूर्वक करना चाहिए । कार्य में तनिक – सी भी असावधानी हो जाने से सिद्धि की प्राप्ति नहीं होती ।

इस श्लोक से उपरोक्त बात स्पष्ट होती है कि आप इच्छा अनुसार, माता , पुत्रीव स्त्री ( पत्नी ) के रूप में सिद्ध कर सकते है ।

 

 

 

अष्टम यक्षिणी प्रमुख आठ यक्षिणीया ashat yakshni parmukh aath yakshniya

जैसे कि मनुष्यो कुछ विशेष मनुष्य होते है उसी तरह यक्षिणी में भी कुछ विशेष यक्षिणीया होती है । सभी योनियों में इस तरह से होता है । इनमे से निम्न 8 यक्षिणियां प्रमुख मानी जाती है

1.सुर सुन्दरी यक्षिणी yakshini sadhna

2.मनोहारिणी यक्षिणी yakshini sadhna

3.कनकावती यक्षिणी yakshini sadhna

4.कामेश्वरी यक्षिणी yakshini sadhna

5.रतिप्रिया यक्षिणी yakshini sadhna

6.पद्मिनी यक्षिणी yakshini sadhna

7.नटी यक्षिणी yakshini sadhna

8.अनुरागिणी यक्षिणी yakshini sadhna

किस यक्षिणी की साधना से क्या फल मिल सकता kiss yakhni ke sadhna se kya phal milta hai

सुर सुन्दरी यक्षिणी – यह यक्षिणी सिद्ध होने के बाद साधक को ऐश्वर्य, धन, संपत्ति आदि प्रदान करती है।

मनोहारिणी यक्षिणी ये यक्षिणी सिद्ध होने पर साधक के व्यक्तित्व को ऐसा सम्मोहक बना देती है, कि हर व्यक्ति उसके सम्मोहन पाश में बंध जाता है।

कनकावती यक्षिणी कनकावती यक्षिणी को सिद्ध करने पर साधक में तेजस्विता आ जाती है। यह साधक की हर मनोकामना को पूरा करने मे सहायक होती है।

कामेश्वरी यक्षिणी यह साधक को पौरुष प्रदान करती है और सभी मनोकामनाओं को पूरा करती है।रति प्रिया यक्षिणीसाधक और साधिका यदि संयमित होकर इस साधना को संपन्न कर लें तो निश्चय ही उन्हें कामदेव और रति के समान सौन्दर्य मिलता है। yakshini sadhna

रति प्रिया यक्षिणी साधक और साधिका यदि संयमित होकर इस साधना को संपन्न कर लें तो निश्चय ही उन्हें कामदेव और रति के समान सौन्दर्य मिलता है।

पद्मिनी यक्षिणी यह अपने साधक को आत्मविश्वास व स्थिरता प्रदान करती है और हमेशा उसे मानसिक बल प्रदान करती

नटी यक्षिणी को विश्वामित्र ने भी सिद्ध किया था।यह अपने साधक कि पूर्ण रूप से सुरक्षा करती है।

अनुरागिणी यक्षिणी साधक पर प्रसन्न होने पर उसे नित्य धन, मान, यश आदि प्रदान करती है और साधक की इच्छा होने पर सहायता करती है

विशेष कामना पूर्ति के हिसाब से अलग अलग साधनाओ को किया जाता है

यक्षिणी अन्य साधना से जल्दी सिद्ध होती है yakshni any sadhna se jaldhi siddhi hote hai

हमारे प्राचीन भारतीय ग्रंथो में बहुत सारे लोको का वर्णन मिलता है इस ब्रह्मांड में कई लोक हैं। सभी लोकों के अलग-अलग देवी देवता हैं जो इन लोकों में रहते हैं । पृथ्वी से इन सभी लोकों की दूरी अलग-अलग है। मान्यता है नजदीकि लोक में रहने वाले देवी-देवता जल्दी प्रसन्न होते हैं, क्योंकि लगातार ठीक दिशा और समय पर किसी मंत्र विशेष की साधना करने पर उन तक तरंगे जल्दी पहुंचती हैं। यही कारण कि यक्ष, अप्सरा, किन्नरी आदि की साधना जल्दी पूरी होती है, क्योंकि इनके लोक पृथ्वी से पास हैं।

तंत्र ग्रंथो के अनुसार यक्षिणी साधना को संपन्न करने के लिए विशेष नियम tantra gratho ki anusaar yakshni sadhna ko sampan kani ki lea vishesh niyam

भोज्यं निरामिष चान्नं वर्ज्य ताम्बूल भक्षणम् ॥

उपविश्य जपादौ च प्रातः स्नात्वा न संस्पृशेत् ॥

यक्षिणी साधन में निरामिष अर्थात् मांस तथा पान का भोजन सर्वथा निषेध है अर्थात् वर्जित है । अपने नित्य कर्म में , प्रातः काल स्नान आदि करके मृगचर्म ( के आसन ) पर बैठकर फिर किसी को स्पर्श न करें । न ही जप और पूजन के बीचमें किसी से बात करें ।

नित्यकृत्यं च कृत्वा तु स्थाने निर्जनिके जपेत् ।यावत् प्रत्यक्षतां यान्ति यक्षिण्यो वाञ्छितप्रदाः ॥

अपना नित्यकर्म करने के पश्चात् निर्जन स्थान में इसका जप करना चाहिए । तब तक जप करें , जब तक मनवांछित फल देने वाली ( यक्षिणी ) प्रत्यक्ष न हो । क्रम टूटने पर सिद्धि में बाधा पड़ती है । अतः इसे पूर्ण सावधानी तथा बिना किसी को बताए करें

 

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