25 / 100

 

साधना में जल्दी सिद्धि कैसे प्रपात करे How to get siddhi fast in sadhna

साधना में जल्दी सिद्धि कैसे प्रपात करे How to get siddhi fast in sadhna

साधना में जल्दी सिद्धि कैसे प्रपात करे How to get siddhi fast in sadhna सिद्धि मिले तो कैसे ? आज जन साधारण में यह चर्चा सुनने में आती है कि सिद्धियां प्राप्त नहीं होती और यह बहुत हद तक सही भी है. इसका मुख्य कारण हम लोगों के संस्कार, शिक्षा, आचार-व्यवहार, ब्रह्मचर्य, रहन सहन इत्यादि है।

सबसे पहले प्रथम संस्कारों को ही लीजिये कि माता-पिता जन्मजात कुमारों के जिनके कि हर प्रकार से सभी संस्कार होने की आवश्यकता है. वर्तमान समय की नई हवा से प्रभावित होने के कारण तथा अधार्मिक शिक्षा के प्रभाव में बड़े होने के कारण किसी भी प्रकार के संस्कार करने में उन्हें कोई सांधे नहीं है। इससे वे जन्मजात ब्राह्मण कुमार भी असंस्कारी शूद्रवत् रह जाते हैं। जैसा स्तुतियों में स्पष्ट लिखा है- जन्मना जायते शूदी. संस्कारात् द्विज् उच्यते ।”

जब वे असंस्कृत रह गये तो फिर मंत्र दीक्षा के वे अधिकारी तो हो ही नहीं सकते. परन्तु फिर भी आचार्य लोग स्वदक्षिणा के लोभ में या धन से प्रभावित होकर ब्राह्मणतत्व का दोष परिहार किये बिना ही कालातिक्रमण हो जाने पर भी जैसे-तैसे उन्हें उपवीती बना ही देते हैं. और बात ही बात में दीक्षित भी कर देते हैं. फलतः ब्राह्मण कुमार उपवीत को गले में इसलिए रख लेते हैं, कि वह ब्राह्मण का प्रतीक चिह्न है. परन्तु मैला हो जाने पर उसे गले से निकालकर साबुन से धोकर सुखा देते हैं। इतना ही नहीं सर्दी के दिनों में तो कई लोग ब्रह्मगांठ को सुखाने में खूंटी पर लटका लेते हैं। भूले भटके जब याद आ जाए तो गले में डाल लेते हैं। स्पष्ट है कि इस प्रकार उस ब्रह्मसूत्र का क्या महत्त्व रह जायेगा?

केवल दिखाऊ यज्ञोपवीत उन द्विज पुत्रों के गले में यदाकदा पड़ा रहता है। इसके बाद ही विवाह संस्कार भी जैसे-तैसे सम्पन्न हो ही जाते हैं। इसके अतिरिक्त जितने भी संस्कार है उनसे पलायन और कहीं-कहीं मौजूद है भी. इसे नकारा नहीं जा सकता। तो विधि-विधान में और बिना विधि में क्या फर्क रहा ? यह तो हुई संस्कारों की वस्तुस्थिति।

आज के युग में स्कूलों व कॉलेजों का अधिकांश भाग दुर्गुणों से पीड़ित है। उनमें अधिकांश जूते पहने खाना, पेन्ट इत्यादि पहिने खड़े-खड़े लघुशंका आदि करना आरम्भ में ही बालक सीख लेते हैं। जहां तक गुरु के सम्मान का प्रश्न है उसकी कल्पना भी व्यर्थ है। गुरु वर्ग को मारना पीटना एक फैशन-सा हो गया है इससे बढ़कर शिक्षा का और क्या हास हो सकता है?

फिर गुरुमुख उच्चारित हो भी तो कहां से? अब आचार-व्यवहार का भी भाव यह है कि जहां भारत वर्ष में “अचारो प्रथमो धर्मः!” माना जाता था वहां स्नान आचमनादि का यह हाल है कि समय पर भूलकर भी कोई शय्या त्याग करता. उठते ही आजकल के लोगों को चाय और नाश्ता चाहिए जिसके धूमावती एवं बगलामुखी तांत्रिक साधनाएं बिना यह कहते सुना गया है. कि चाय बिना स्फूर्ति उपलब्ध नहीं होती यानी कि स्फूर्ति का टॉनिक चाय है।

अब उनके कथनानुसार दूध के गुण तो मारे ही जाते हैं। चाय पीते ही यह सिद्ध होता है, कि चाय इत्यादि पीकर ही शौचादि से निवृत्त होने के लिए कदम उठ है. तथा निवृत होकर समाचार-पत्र पढ़ने के लिए बैठ जाते हैं। स्मृति, वेद, पुराणों का पठन-पाठन इसके आगे समाप्तप्राय हो गया है। समय मिलते ही गर्मी में तो स्नान इत्यादि करेंगे, परन्तु सर्दी हुई तो मुंह हाथ तथा सिर पर जो लम्बी जटा रूपी बाल है, धो लेंगे। मेरा एक मित्र इसी को ड्राइक्लीनिंग होना कहता है उसके बाद भीजन इस प्रकार नित्य कृत्य में अन्याय कर्म रह जाते हैं। संध्यावन्दन तो कल्पना की बात हो गई है।

इसी प्रकार अन्य कुकृत्यों के कारण आचार समाप्त हो गये हैं। झूठ सत्य का नाम-निशान नहीं रहा। हम हर पल में छोटी-छोटी बातों में भी: बोलने से नहीं कतराते । असत्य भाषण, कटु भाषण, निन्दित भाषण, परनिन्दा, छिद्रान्वेषण आदि कर्म करने में नहीं चूकते हैं। फिर धर्म शास्त्रानुसार सिद्धि हो तो कैसे ? ब्रह्मचर्य की तो पराकाष्ठा विपरीत रूप में दिखाई देती है । आज का बालक कल का युवा सभी सिगरेट पीना, पान खाना. तड़कीले भड़कीले वस्त्र पहनना आदि दुर्गुणों से व्याप्त हैं। कुसंगति में पड़कर भावी जीवन पर कत्तई ध्यान न देकर अपरिपक्व अवस्था में नाना प्रकार की बीमारियों के शिकार होकर असमय ही काल के ग्रास हो जाते हैं। रहन-सहन भी आजकल अपरिग्रही के बजाय परिग्रही बनता जा रहा है ।

जिधर देखिये छात्र के आस-पास बनावटीपन दिखेगा। पतलून पाजामा, कमीज, कोट, कुर्ता, बुशर्ट आदि दिखेगा। सत्य तो यह है कि लड़के और लड़की में भेद करना असंभव है। दूसरी और असहनशीलता छात्रों में घर कर गई है। इसका असर कुटुम्ब और परिवार पर भी दिखाई देता है ।

पाठक ही बताये ऐसी विपन्न अवस्था में सिद्धि हो तो कैसे हो ? इसके लिए हमें अपने धर्मशास्त्रों के अनुसार जन्मजात बच्चों के संस्कार तो तत् साक्षीय गृह सुविधानुसार करने चाहिए और प्राचीन परिपाटी के अनुसार गुरुकुलों का संचालन हो जिनमें सांस्कारिक शिक्षा की हो ताकि धर्म क्या है? इसका भली प्रकार भान हो सके और नित्य नियमपूर्वक संस्कारिक शिक्षा-दीक्षा दी जाय ताकि वे गुरुकुल से निवृत्त होकर घर जाने पर नियमों का उल्लंघन न कर सकें । जब वे धर्माचरण में निवृत्त होकर संध्या इत्यादि कर्म करते रहेंगे तो उन्हें सिद्धियां अवश्यमेव प्राप्त होंगी, और उन्हें गुरु-दीक्षा से मंत्र रहस्य इत्यादि भी ज्ञात हो सकेंगे।

तलाक की समस्या का निराकरण करने वाला एक तांत्रोक्त प्रयोग

प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364

गरुड़ पुराण की इन 7 बातों में छिपा है, सफलता का राज। 7 truth according to Garud Puran

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.