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प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना दुर्भाग्य की गूढ़ रेखाओं को मिटाकर सौभाग्य में बदलने की दिव्य क्रिया – फ़ोन 85280 57364

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana Ph. 8528057364

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana  जो साधक के शत्रुओं का नाश करती है साधक के ऊपर किसी भी प्रकार का तंत्र दोष समाप्त करती है महाविद्याओं में धूमावती महाविद्या साधना अपने आप में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस साधना के बारे में दो बातें विशेष रूप से हैं, प्रथम तो यह दुर्गा की विशेष कलह निवारणी शक्ति है, दूसरी यह कि यह पार्वती का विशाल एवं रक्ष स्वरूप है। जो क्षुधा (भूख) के विकलित कृष्ण वर्णीय रूप हैं, जो अपने भक्तों को अभय देने वाली तथा उनके शत्रुओं के लिए साक्षात् काल स्वरूप हैं । इस साधना के सिद्ध होने पर भूत-प्रेत, पिशाच व अन्य तंत्र बाधा का साध उसके परिवार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ।

जब कोई साधक भगवती धूमावती की साधना सम्पन्न करता है, तो वे प्रसन्न होकर साधक के शत्रुओं का भक्षण कर लेती हैं और साधक को अभय प्रदान करती हैं ।धूमावती’ दस महाविद्याओं में से एक हैं। जिस प्रकार ‘तारा’ बुद्धि और समृद्धि की, ‘त्रिपुर सुन्दरी’ पराक्रम एवं सौभाग्य की सूचक मानी जाती हैं, इसी प्रकार ‘धूमावती’ शत्रुओं पर प्रचण्ड वज्र की तरह प्रहार करने वाली मानी जाती हैं। यह अपने आराधक को अप्रतिम बल प्रदान करने वाली देवी हैं जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में सहायक सिद्ध होती ही हैं, यदि पूर्ण निष्ठा व विश्वास के साथ ‘धूमावती साधना’ को सम्पन्न कर लिया जाय तो ।

दस महाविद्याओं के क्रम में ‘धूमावती’ सप्तम् महाविद्या हैं। ये शुत्र का भक्षण करने वाली महाशक्ति और दुःखों की निवृत्ति करने वाली हैं। बुरी शक्तियों से पराजित न होना और विपरीत स्थितियों को अपने अनुकूल बना देने की शक्ति साधक को इनकी साधना से प्राप्त होती है।कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है, और उसके आगे सबको हार माननी पड़ती है, किन्तु जो समय पर हावी हो जाता है, वह उससे भी ज्यादा बलशाली कहलाता है।

शक्ति सम्बलित होना और शक्तिशाली होना तो केवल शक्ति-साधना के माध्यम से ही संभव है, जिसके माध्यम से दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित किया जा सकता है। जो भयग्रस्त, दीन-हीन और अभावग्रस्त जीवन जीते हैं, वे कायर और बुजदिल कहलाते हैं, किन्तु जो बहादुर होते हैं, वे सब कुछ अर्जित कर, जो कुछ उनके भाग्य में नहीं है, उसे भी साधना के बल पर प्राप्त करने की सामर्थ्य रखते हैं… और यदि साधना हो किसी महाविद्या की, तो उसके भाग्य के क्या कहने, क्योंकि दस महाविद्याओं में से किसी एक महाविद्या को सिद्ध कर लेना भी जीवन का अप्रतिम सौभाग्य कहलाता हैं।

आज समाज में जरूरत से ज्यादा द्वेष, ईर्ष्या, छल, कपट, हिंसा और शत्रुता का वातावरण बन गया है, फलस्वरूप यदि। व्यक्ति शांतिपूर्वक रहना चाहे, तो भी वह नहीं रह सकता। अतः जीवन की असुरक्षा समाप्त करने की दृष्टि से यह साधना विशेष महत्वपूर्ण एवं अद्वितीय है। धूमावती ‘दारुण विद्या’ हैं। सृष्टि में जितने भी दुःख हैं, व्याधियां हैं, बाधायें हैं. इनके शमन हेतु उनकी साधना श्रेष्ठतम मानी जाती है। जो व्यक्ति या साधक इस महाशक्ति की आराधना-उपासना करता है, ये उस साधक पर अति प्रसन्न हो, उसके शत्रुओं का भक्षण तो करती ही हैं, साथ ही उसके जीवन में धन-धान्य, समृद्धि की कमी नहीं होने देतीं, क्योंकि यह लक्ष्मी प्राप्ति में आने वाली बाधाओं का पूर्ण भक्षण कर देती हैं।

अतः लक्ष्मी प्राप्ति के लिए भी साधक को इस शक्ति की आराधना करते रहना चाहिए। महाविद्याओं में धूमावती की साधना बहुत ही क्लिष्ट मानी जाती है। इसके लिए साधक को बहुत ही पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। इस साधना से पूर्व तत्सम्बन्धित दीक्षा लेने का प्रयास करना चाहिए, इससे साधना काल में किसी प्रकार के भय आदि होने की संभावना नहीं रहती।

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना  विधि  Dhumavati mahavidya sadhana 

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना विधि Dhumavati mahavidya sadhana साधना विधान इस प्रयोग में निम्न सामग्री अपेक्षित है- ‘प्राणश्चेतना युक्त धूमावती यंत्र’, ‘दीर्घा माला’ तथा ‘अघोरा गुटिका’ । इसे किसी भी माह की अष्टमी, अमावस्या अथवा रविवार के दिन सम्पन्न करें। यह रात्रिकालीन साधना है, इसे रात्रि 9 बजे से 12 बजे के मध्य सम्पन्न करें। I साधक को स्नान आदि से पवित्र होकर, साधना-कक्ष में पश्चिम दिशा की ओर मुख कर ऊनी आसन पर बैठकर साधना करनी चाहिए। लाल वस्त्र, लाल धोती और गुरु चादर का प्रयोग करें। यह साधना सुनसान स्थान में, श्मशान में, जंगल में, गुफा में या किसी भी एकांत स्थल पर, जहां कोई विघ्न उपस्थित न हो, करना श्रेयस्कर रहता है। अपने सामने चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर धूमावती का चित्र स्थापित करें, फिर किसी प्लेट में ‘यंत्र’ को स्थापित करें।यंत्र को जल से धोकर उस पर कुकुम से तीन बिन्दु लाइन से लगा लें, जो सत्व, रज एवं तम गुणों के प्रतीक स्वरूप हैं। धूप व दीप जला दें तथा पूजन प्रारम्भ करें 

विनियोगः

दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लें, निम्न संदर्भ को पढ़े- अस्य धूमावती मंत्रस्य पिप्पलाद ऋषि, र्निवृच्छन्दः, ज्येष्ठा देवता, ‘धूं’ बीजं, स्वाहा शक्ति:, धूमावती कीलकं ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः । हाथ में लिए हुए जल को भूमि पर या किसी पात्र में छोड़ दें।

ऋष्यादि न्यासः ॐ पिप्पलाद ऋषये नमः शिरसि (सिर को स्पर्श करें) ॐ निवृच्छन्द से नमः मुखे (मुख को स्पर्श करें) ॐ ज्येष्ठा देवतायै नमः हृद्धि

(हृदय को स्पर्श करें) ॐ धूं बीजाय नमः गुझे (गुह्य स्थान को स्पर्श करें) ॐ स्वाहा शक्तये नमः पादयो (पैरों को स्पर्श करें) ॐ धूमावती कीलकाय नमः नाभौ (नाभि को स्पर्श करें) ॐ विनियोगाय नमः सर्वांगे

(सभी अंगों को स्पर्श करें)कर न्यासः ॐ धूं धूं अंगुष्ठाभ्यां नमः (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अंगूठों को स्पर्श करें।) ॐ हूं तर्जनीभ्यां नमः (दोनों अंगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ मां मध्यमाभ्यां नमः

(दोनों अंगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ वं अनामिकाभ्यां नमः (दोनों अंगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ तीं कनिष्ठिाभ्यां नमः

(दोनों अंगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः (परस्पर दोनों धूम हाथों को स्पर्श करें)

. यंत्र गुटिका और माला को दोनों हाथ की अंजलि में ले 14 लें, एकाग्रचित होकर दीपक की लौ पर मंत्र ॐ धूं धूं धूमावती) का 51 बार जप करते हुए ‘त्राटक’ करें। 11. इसके बाद सामग्री को दोनों नेत्रों से स्पर्श कराये, सामग्रियों को यथासंभव चौकी पर रख दें, ‘गुटिका’ को यंत्र के सामने रखें।

   संकल्प

– दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें, कि अमुक मासे महीने का नाम बोलें) अमुक दिने (दिन का नाम बोलें) अमुक गोत्रोत्पन्नो अपने गोत्र का नाम बोलें) अमुक (अपना नाम बोलें) समस्त शत्रु भय व्याधि निवारणार्याच दुःख दारिद्र्य  | विनाशाय श्री धूमावती साधना करिष्ये। हाथ में लिए जल को भूमि पर छोड़ दें। 

 ध्यान

 ध्यान दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवती सु धूमावती का ध्यान करें- अत्युच्चा मलिनाम्बरालिन गाया दुर्मना रुक्षामित्रितया विशालदशना सूर्योदरी पंचला । प्रस्वेदाम्बुचिता बुवाकु सतः कृष्णातिरुक्षाप्रभाः देवा मुक्तकत्वा सदाशिव कलिर्भूमावती मन्त्रिणा ।

अर्थात् ‘मलिन वस्त्र पहने हुए सबको भयभीत करने वाली, मन में विकार को उत्पन्न करने वाली, रूखे बाल वाली, मूख और प्यास से व्याकुल, बड़े-बड़े दांतों वाली, बड़े पेट वाली, | पसीने से भरी हुई, बड़ी-बड़ी आंखों वाली कांतिहीन खुले बालों वाली, सदा अप्रिय व्यवहार को चाहने वाली भगवती स प्रकार भगवती धूमावती के स्वरूप का चिन्तन करते हुए बायें हाथ में गुटिका को लेकर मुट्ठी बांध लें तथा ‘दीर्घा माला’ से निम्न मंत्र का 5 माला नित्य तीन दिन तक जप करें-

विश्वास, विश्वास, अपने आप में विश्वास, ईश्वर में विश्वास यही महानता का रहस्य है। यदि तुम पुराण के तैंतीस करोड़ देवताओं और विदेशियों द्वारा बतलाए हुए सब देवताओं में विश्वास करते हो, पर यदि अपने आप में विश्वास नहीं करते, तो तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती। अपने आप में विश्वास करो, उस पर स्थिर रहो और शक्तिशाली बनी । धूमावती का में ध्यान करता हूं कि वे मेरे जीवन की समस्त विघ्न बाधाओं का नाश करें।’ .

मंत्र ।। ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा।।

जप समाप्ति के बाद सभी सामग्रियों को चौकी पर बिछे कपड़े में ही लपेट कर चौथे दिन शाम को किसी जन शून्य स्थान में जाकर गड्ढा खोदकर दबा दें और पीछे मुड़कर न देखें। . घर आकर हाथ-पैर धो लें। यह साधना दुर्भाग्य की गूढ़ रेखाओं को मिटाकर सौभाग्य में बदलने की दिव्य क्रिया है। इस साधना के बाद निश्चय ही जीवन में सौभाग्य का सूर्योदय होगा और सम्पन्नतायुक्त एवं श्री सुखी जीवन का प्रादुर्भाव सम्पन्न होगा।

 

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