Category: दैविक साधना

दैविक साधना davik-sadhna हम इस श्रेणी में देवी देवताओं की रहस्मय साधना पर चर्चा करेंगे ! जिस साधना को आप अपने घर पर सिद्ध करके लाभ प्रपात कर सकते है ! gurumantrasadhna.com

प्राचीन रहस्यमयी सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana PH.85280 57364

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प्राचीन रहस्यमयी सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana PH.85280 57364

प्राचीन रहस्यमयी सौभाग्यप्रद Ganapati Sadhana

 

प्राचीन रहस्यमयी सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana
प्राचीन रहस्यमयी सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana

 

प्राचीन रहस्यमयी सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana भगवान गणपति Ganapati की जिस साधक पर कृपा हो जाती है उस पर कभी कोई अभाव अथवा समस्या नहीं आती है । सामान्य पूजा और सच्ची श्रद्धा से वे बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं।

हमारे यहां विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा, साधना अथवा अनुष्ठान आदि किसी विशेष प्रयोजन आदि के लिये किये जाते हैं जैसे कि किसी को आर्थिक समस्या है, किसी के विवाह में विलम्ब हो रहा है, किसी के विवाह आदि में बाधायें आ रही हैं अथवा अन्य किसी प्रकार की कामना पूर्ति हो ।

इसी अनुरूप यह प्रयोग भी उन लोगों के लिये विशेष लाभदायक है जो विभिन्न प्रकार की आर्थिक समस्याओं से ग्रस्त हैं । यह प्रयोग करने के कुछ समय बाद ही समस्याओं में कमी आने लगती है। यह प्रयोग एक बहुत विख्यात बाबा के माध्यम से प्राप्त हुआ है ।

इन बाबा के अनेक भक्त हुआ करते ।। उन्हीं में से एक भक्त जब भी उनसे मिलता, तभी चेहरा उदास और परेशान सा लगता । बाबा ने उसे कभी मुस्कुराते हुये भी नहीं देखा था । एक दिन बाबा ने उससे उसकी समस्या के बारे में पूछा । तब उसने बताया कि उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है ।

वह कपड़े की एक मिल में प्रबंधन कार्य देख रहा है । जितना पैसा वेतन के रूप में मिलता है, उससे उसका निर्वाह ठीक से नहीं होता है । उसने बाबा को एक बहुत गंभीर बात बताई कि वर्तमान की उसे चिंता नहीं है, जैसे भी कठिन दिन हैं, वह उन्हें भोग लेगा, चिंता केवल भविष्य को लेकर है।

बच्चे अभी छोटे हैं, आने वाले समय में उनकी शिक्षा आदि पर खर्च करना पड़ेगा, घर के अन्य खर्च भी बढ़ेंगे, उनकी व्यवस्था कैसे होगी ? यही चिंता की बात है । उसकी बात में इतनी करुणा थी कि बाबा का दिल पसीस गया।

उन्होंने उसे शाम के समय बुलाया और सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana  के बारे में बताया और इस प्रयोग की विधि भी बताई। उस भक्त ने बाबा के निर्देशानुसार इस प्रयोग को किया । इसके दो महीने बाद ही परिस्थितियों में परिवर्तन आने लगा था।

एक अन्य बड़ी मिल ने इसकी कार्य कुशलता से प्रभावित होकर पहले वाले वेतन से तीन गुना अधिक पर अपने यहां नौकरी पर रख लिया । इसके दो साल बाद एक व्यक्ति ने इस साधक के साथ साझीदारी से मिल खोल ली । चार साल के भीतर ही इस साधक की सभी प्रकार की समस्यायें समाप्त होकर धन की वर्षा होने लगी ।

वास्तव में यह सौभाग्य गणपति साधना Ganapati Sadhana का फल इसके नाम के अनुरूप ही प्राप्त हुआ था। बाद इस साधक का मेरे साथ परिचय हुआ । इन्होंने मुझे इस साधना के बारे में बताया और आग्रह किया कि जो व्यक्ति आर्थिक समस्याओं से परेशान है और जो इस उपाय को कर सकता है, उसे मैं अवश्य इसके बारे में बताऊं ।

फिर मैंने अनेक लोगों से यह उपाय सम्पन्न कराया। सभी ने इस उपाय को चमत्कारिक प्रभाव के बारे मुझे बताया। इस उपाय को मैं अपने असंख्य पाठकों के लिये यहां बता रहा हूं। जो व्यक्ति आर्थिक समस्याओं से परेशान है, अत्यधिक श्रम करने के पश्चात् भी पैसों की परेशानी रहती है, उन सभी के लिये यह प्रयोग अत्यन्त प्रभावी एवं लाभ देने वाला है।

प्राचीन रहस्यमयी सौभाग्यप्रद गणपति साधना  विधि  Ganapati Sadhana

 

प्राचीन रहस्यमयी सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana विधि  Ganapati Sadhana विधि इस उपाय में सबसे पहले चांदी के पत्र पर अग्रांकित गणेश यंत्र उत्कीर्ण करवा कर उसे चेतना सम्पन्न कर लें । फिर उसे शुभ मुहूर्त में अपने उपासना कक्ष में स्थापित करके उसकी विधिवत उपासना करें।

अगर चांदी के पत्र पर यंत्र उत्कीर्ण करना सम्भव नहीं हो तो इसी गणेश यंत्र को भोजपत्र के ऊपर पंचगंध की स्याही एवं चमेली की कलम से लिखकर उसकी भी विधिवत् पूजा-अर्चना कर लें, ताकि यंत्र चेतना सम्पन्न बन जाये ।

प्राचीन रहस्यमयी सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana

इसके पश्चात् इस यंत्र को त्रिधातु निर्मित ताबीज में भर कर अपने कंठ अथवा बाहूमूल में लाल धागे से बांध लें । इस साधना में निर्मित किया जाने वाला गणेश यंत्र इस प्रकार है- यंत्र निर्माण के लिये पंचगंध की स्याही का प्रयोग किया जाता है। पंचगंध स्याही बनाने के लिये गोरोचन, श्वेत चंदन, केसर, ब्रह्म कमल पंखुड़ियां, अगर अथवा सुगन्धबाला की आवश्यकता होती है ।

सबसे पहले उपरोक्त गंधों को एकत्रित करके अच्छी तरह से घिस कर अथवा बारीक पीस कर परस्पर मिलाकर चंदन जैसा लेप बना लें । फिर किसी शुभ मुहूर्त, जैसे रवि पुष्प नक्षत्र या अमृत सिद्धि योग अथवा सर्वार्थ सिद्धि योग के अवसर पर चमेली की कलम द्वारा इस पंचगंध स्याही द्वारा विधिवत भोजपत्र के ऊपर लिख कर यंत्र तैयार कर लें ।

जब गणपति यंत्र तैयार हो जाये तो इनकी उपासना के लिये अगले शुभ मुहूर्त का चुनाव करें। इस Ganapati Sadhana गणपित अनुष्ठान को गणेश चतुर्थदशी के दिन से अथवा किसी भी शुक्ल पक्ष की चतुर्थ तिथि के दिन भी शुरू किया जा सकता है ।

अतः जिस दिन इस अनुष्ठान को शुरू करने का निश्चय करें, उस दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर एवं नित्यकर्म से निवृत्त होकर तैयार हो जायें । एक स्वच्छ वस्त्र पहन कर अपने पूजाकक्ष में उत्तराभिमुख होकर आराम से बैठ जायें। बैठने के लिये कम्बल आसन अथवा कुशा आसन का प्रयोग करें ।

आसन पर बैठकर अपने सामने लकड़ी की एक चौकी बिछाकर उसके ऊपर एक श्वेत रंग का वस्त्र बिछा लें। चौकी पर गंगाजल छिड़क कर शुद्ध करके चांदी पर उत्कीर्ण किये गये सौभाग्यप्रद गणपति यंत्र को प्रतिष्ठित करें । इसके पश्चात् यंत्र पर पंचगंध युक्त स्याही से ग्यारह बार गंध अर्पित करते हुये ॐ गं गणपति नमः नामक मंत्र का उच्चारण करते रहें।

चांदी के यंत्र के साथ ही भोजपत्र पर बनाये यंत्र को भी प्रतिष्ठित कर लें । रजत पत्र पर उत्कीर्ण गणपति यंत्र को गंध लेपन के पश्चात् धूप, दीप अर्पित करें। घी का एक दीपक जलाकर चौकी पर रख दें और स्वयं गणपति को यंत्र में प्रतिष्ठित होने के लिये उनका आह्वान करें ।

धूप, दीप, पुष्प, गंध आदि चढ़ाने के पश्चात् चौकी के ऊपर गणपति के लिये पंचमेवा और लड्डूओं का भोग लगाकर रखें। अंत में गणपति के सामने अपनी प्रार्थना करें। उनसे जो मांगना चाहे मांगें तथा उनकी आज्ञा प्राप्त करके अग्रांकित मंत्र की कम से कम तीन मालाओं का जाप करें। अगर अधिक संख्या में मंत्रजाप संभव हो तो वैसा कर लें ।

गणपति साधना मंत्र Ganapati Sadhana MANTRA

प्राचीन रहस्यमयी सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana

गणपति साधना मंत्र Ganapati Sadhana MANTRA गणपति मंत्र इस प्रकार है

ॐ श्रीं गं सौम्यास गणपतये वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा

प्राचीन रहस्यमयी  सौभाग्यप्रद गणपति साधना Ganapati Sadhana

इस मंत्र का जाप स्फटिक माला अथवा मूंगा माला के ऊपर किया जाये, यह सर्वश्रेष्ठ रहता है । यद्यपि मंत्रजाप के लिये हकीक की माला का भी उपयोग किया जा सकता है। जब आपका मंत्रजाप पूर्ण हो जाये तो उसके उपरांत गणपति से एक बार पुनः अपनी प्रार्थना कर लें तथा उनकी आज्ञा लेकर आसन से उठ जायें।

गणपति Ganapati को जो नैवेद्य अर्पित किया गया है, उसमें से थोड़ा सा प्रसाद स्वयं ग्रहण कर लें, शेष प्रसाद को घर के अन्य सदस्यों में बांट दें । इस तरह निरन्तर 21 दिन तक इस अनुष्ठान को जारी रखें। प्रत्येक दिन प्रातः काल स्वच्छ होकर अपने पूजाकक्ष में बैठकर सौभाग्यप्रद गणपति यंत्र की पूर्जा – अर्चना करें ।

प्रतिदिन यंत्र को गंगाजल अथवा शुद्ध जल से धोकर पंचगंध लेपन करें। गंध लेपन के समय ग्यारह बार ॐ गं गणपति नमः मंत्र का जाप करते रहें । इसके पश्चात् यंत्र की धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि से विधिवत पूजा-अर्चना करें । गणपति Ganapati Sadhana का आह्वान करें और उनसे प्रार्थना करके एवं उनकी आज्ञा प्राप्त करके गणपति के उपरोक्त मंत्र की कम से कम तीन माला मंत्रजाप करते रहें । जाप के पश्चात् गणपति Ganapati से प्रार्थना करना एवं आसन से उठने की आज्ञा लेना नहीं भूले । यह गणपति की नियमित पूजा का क्रम है ।

इस पूजा में एक बात का ध्यान रखा जा सकता है कि प्रतिदिन गणपति  Ganapati को पंचमेवा का नैवेद्य लगाना ही पर्याप्त रहता है। लड्डूओं का नैवेद्य प्रथम दिन और अनुष्ठान के आखिर दिन अर्थात् 21वें दिन ही लगाना होता है। 21वें दिन, जिस दिन आपका अनुष्ठान सम्पन्न होता है, उस दिन एक माला अतिरिक्त मंत्रजाप करें तथा गणपति यंत्र के आगे रखे हुये नैवेद्य को घर-परिवार के अलावा आस- पड़ौस में भी बंटवा दें। विशेषकर बच्चों में प्रसाद बंटवाना अति शुभ रहता है। इस तरह 21वें दिन यह अनुष्ठान सम्पन्न हो जाता है।

 

अनुष्ठान समाप्ति के पश्चात् चांदी पर निर्मित गणेश यंत्र को पूजास्थल पर ही बने रहने दें तथा नियमित रूप से उसके सामने धूप, दीप आदि अर्पित करते रहें।

इसके साथ ही अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ संख्या में मंत्रजाप भी नियमित रूप से जारी रखें, जबकि दूसरा गणपति Ganapati Sadhana यंत्र, जो भोजपत्र पर निर्मित किया गया है और जिसे त्रिधातु से बने ताबीज के अन्दर रखा जाता है, उसे लाल रेशमी धागे से अपने गले अथवा बायें हाथ की बाजू पर बांध लें।

21 दिन के दौरान जो पूजा सामग्री चौकी के ऊपर व इसके इर्द-गिर्द इकट्ठी हो जाती है, उसको एक जगह एकत्र करके किसी जल स्रोत में अथवा किसी नदी आदि में प्रवाहित करवा दें। इस प्रकार 21 दिन का गणपति Ganapati Sadhana का यह अनुष्ठान पूर्णता के साथ सम्पन्न हो जाता है।

गणपति का यह 21 दिन का अनुष्ठान बहुत ही प्रभावशाली है । इसको सफलतापूर्वक सम्पन्न करने से सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है । अनेक तरह की बाधायें एवं आपदायें स्वतः ही शांत हो जाती हैं ।

गणपति Ganapati Sadhana यंत्र को प्रतिष्ठित करने एवं इस अनुष्ठान को सम्पन्न करने से धन आगमन के स्रोत खुलते हैं, व्यापार वृद्धि होती है, मित्र एवं पारिवारिक सदस्यों से भरपूर सहयोग प्राप्त होता है तथा आर्थिक स्थिति दिनोंदिन सुदृढ़ होती जाती है।

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1 भगवन गणपति की साधना किस माला से होती है ?

मूंगे की माला से गणपति जी की साधना की जाती है इस साधना को हाथी के दांतो वाली माला से भी किया जा सकता है

2 भगवान गणपति की आराधना के लिए कौन-सा गायत्री मंत्र है?

1- एकदंताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।
2- महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।
3- गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।

3 गणपति जी की कृपा के लिए कोनसा पाठ करना चाहिए ?

गणपति के १२ नमो का जाप करना चाहिए गणेशजी के अनेक नाम हैं लेकिन ये 12 नाम प्रमुख हैं- सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्न-नाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र, गजानन।

विवाह बाधा निवारण शिव-पार्वती अनुष्ठान Vivah Badha Nivaran

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विवाह बाधा निवारण शिव-पार्वती अनुष्ठान Vivah Badha Nivaran

विवाह बाधा निवारण शिव-पार्वती अनुष्ठान Vivah Badha Nivaran
विवाह बाधा निवारण शिव-पार्वती अनुष्ठान Vivah Badha Nivaran

 

विवाह बाधा निवारण शिव-पार्वती अनुष्ठान Vivah Badha Nivaran वर्तमान में एक विशेष स्थिति देखने में आ रही है । जैसे-जैसे समाज का भौतिक आधार बढ़ता जा रहा है और लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरती जा रही है, वैसे-वैसे सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य के साधन बढ़ते जा रहे हैं ।

इसके साथ यह स्थिति भी देखने में आ रही है कि जैसे-जैसे लोगों का बौद्धिक स्तर बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे ही अनेक प्रकार की सामाजिक समस्यायें सामने आती जा रही हैं ।

शिक्षा के प्रसार, आर्थिक स्थिति के सुधार और सुख-सम्पन्नता के साधन जुटाने के साथ-साथ परस्पर विश्वास एवं निर्भरता की कड़ी कमजोर पड़ती जा रही है । इसलिये विवाह के साथ-साथ गृहस्थ जीवन, पारिस्परिक सम्बन्धों, प्रेम, अपनत्व एवं विश्वास की भावना में भी निरन्तर गिरावट आने लगी है।

शिक्षा के प्रसार और आर्थिक स्थिति सुधरने का सबसे अधिक प्रभाव वैवाहिक संबंधों में देखा जाने लगा है। अधिकतर सम्पन्न और पढ़े-लिखे परिवारों को अब अपने बेटों या बेटियों के लिये सुयोग्य वर या वधू के लिये लम्बे समय तक प्रयास व इंतजार करना पड़ता है।

उनके भावी संबंध स्थायी बने रह पायेंगे अथवा नहीं, इसका भी हमेशा संशय बना रहता है। युवाओं में स्वतंत्रता एवं निर्णय लेने की भावना के बढ़ते जाने और समाज में प्रेम विवाह का प्रचलन शुरू हो जाने के उपरांत बच्चों का विवाह कार्य सम्पन्न करना एक जटिल समस्या बनता जा रहा है ।

चाहे वैवाहिक कार्य के समय पर सम्पन्न न हो पाने, रिश्तों का बनते-बनते रह जाना अथवा अकारण ही बीच में रिश्ता टूट जाने के पीछे अनेक कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, पर एक बात सर्वमान्य है कि वैवाहिक विलम्ब एक सामान्य समस्या बन गयी है ।

विवाह बाधा अथवा विवाह विलम्ब के पीछे कोई भी कारण क्यों न हो, तंत्र के पास उसका समाधान है । तंत्र आधारित ऐसे अनुष्ठानों को सम्पन्न करते ही अनेक बार वैवाहिक कार्य तत्काल सम्पन्न होने की स्थितियां बनने लगती हैं । इस अध्याय में शिव-पार्वती की तांत्रोक्त उपासना पर आधारित एक अनुभूत अनुष्ठान दिया जा रहा है।

यह तांत्रिक अनुष्ठान अनेक लोगों द्वारा प्रयोग किया गया है। अधिकांश अवसरों पर इस अनुष्ठान को सम्पन्न करने से वांछित कामनाओं की पूर्ति अतिशीघ्र होने लगती है। जिस समस्या को दूर करने की कामना से यह अनुष्ठान किया जाता है, वह समस्या दूर होने लगती है ।

अगर इस तांत्रोक्त अनुष्ठान को पूर्ण भक्तिभाव एवं श्रद्धायुक्त होकर सम्पन्न किया जाये तो तीन महीनों के भीतर ही वैवाहिक कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है। इस अनुष्ठान की सबस बड़ी विशेषता यह है कि इसे सम्पन्न करने के पश्चात् विवाह में आने वाली बाधायें तो दूर होती ही है, साथ ही मनवांछित जीवनसाथी भी मिलता है ।

विवाह में यह बात बहुत महत्त्व रखती है कि विवाह में उत्पन्न होने वाली बाधायें दूर होने के बाद जीवनसाथी कैसा मिलता है। अगर किसी अनुष्ठान को करने से एक पच्चीस- छब्बीस वर्ष की आयु वाली युवती का विवाह किसी प्रौढ़ व्यक्ति अथवा किसी विदुर से होता है तो इसका क्या औचित्य है ?

विवाह हमेशा ही सात जन्मों का सम्बन्ध माना गया है, अगर किसी व्यक्ति अथवा युवती के विवाह के बाद एक जन्म का साथ भी ठीक से न चल पाये, विवाह सुख की प्राप्ति के स्थान पर जीवन अनेक प्रकार की समस्याओं से भर जाये तो इसे किस प्रकार का विवाह माना जाये, इस पर विचार किया जाना आवश्यक है । अगर जीवनसाथी मन अनुरूप मिलता है तो जीवन सुख से व्यतीत होने लगता है।

जीवन में कभी किसी प्रकार की समस्या अथवा परेशानियां आती हैं तो उसका मिलजुल कर सामना करके उन पर विजय प्राप्त की जाती है । इस दृष्टि से शिव-पार्वती के इस अनुष्ठान का महत्त्व बढ़ जाता है । यह अनुष्ठान करते समय कन्या किस प्रकार का वर चाहती है, इसकी कल्पना मन ही मन करे ।

इसी प्रकार किसी युवक को यह अनुष्ठान करना है तो उसे भी मानसिक रूप में उस कन्या का स्मरण करना होगा जिसे वह पत्नी के रूप में प्राप्त करना चाहता है ।

इसमें यह विशेष ध्यान रखना आवश्यक है कि अपनी स्थिति के अनुसार ही पति अथवा पत्नी की कल्पना करें। अगर एक युवक कल्पना में किसी अभिनेत्री से विवाह की कल्पना करता है तो ऐसी कामना पूर्ण नहीं होती है । यही स्थिति कन्या के साथ भी लागू होती है । ऐसी स्थिति में कामना पूर्ण न होने का दोष अनुष्ठान के परिणामों को न दें ।

हनुमान जी की तंत्र साधना Hanuman Tantra Sadhana PH. 85280 57364

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हनुमान जी की तंत्र साधना Hanuman Tantra Sadhana

हनुमान जी की तंत्र साधना Hanuman Tantra Sadhana
हनुमान जी की तंत्र साधना Hanuman Tantra Sadhana

हनुमान जी की तंत्र साधना Hanuman Tantra Sadhana हनुमान जी की तंत्र साधना रामभक्त हनुमान Hanuman के पराक्रम से भला कौन परिचित नहीं है । अंजनी नंदन भगवान हनुमान जी सर्वमान्य देव हैं । उन्हें अतुलित बल के धाम, बल – बुद्धि निधान, ज्ञानियों में अग्रमान्य, ध्यानियों में ध्यानी, योगियों में योगी और अनन्त नामों से विभूषित किया गया है ।

पवन पुत्र हनुमान Hanuman को शिव का अवतार माना गया है । तंत्र में उन्हें एकादश रुद्र माना गया है । पवन पुत्र इतने बलशाली हैं कि बाल्यकाल में ही उन्होंने सूर्य को अपने मुंह में रख लिया था । हनुमान Hanuman जी के विषय में सब जगह कई अन्य बातें प्रचलित हैं।

एक बात यह है कि कलियुग में जहां भी रामकथा का गुणगान किया जाता है, वहां पूरे समय कथास्थल पर भगवान श्री हनुमान Hanuman जी उपस्थित रहते हैं । यह विश्वास एक अन्य तथ्य से भी सिद्ध होता है । संसार में सात चिरंजीवी माने गये हैं । इन सात चिरंजीवियों में अश्वत्थामा, परशुराम और हनुमान तो सर्वविख्यात हैं । चिरंजीवी का अर्थ है जो मृत्यु के रूप में शरीर का परित्याग नहीं करते, बल्कि स्वेच्छा से दृश्य-अदृश्य होने की शक्ति का उपयोग करते हैं।

 

Veer Bulaki Sadhna – प्राचीन रहस्यमय वीर बुलाकी साधना PH.85280 57364

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Veer Bulaki Sadhna - प्राचीन रहस्यमय वीर बुलाकी साधना PH.85280 57364

Veer Bulaki Sadhna – प्राचीन रहस्यमय वीर बुलाकी साधना PH.85280 57364

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    • बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki  का स्वरूप
    • बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki का  सात्विक भोग
    • वीर बुलाकी Veer Bulakiतामसिक भोग
    • बाबा वीर बुलाकी  Veer Bulaki जी का स्थान
    • बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki किस रूप में आते है
    • बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki जी  इस भोग पर चलते है
    • वीर बुलाकी Veer Bulaki साधना विधि
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Veer Bulaki Sadhna – प्राचीन रहस्यमय वीर बुलाकी साधना PH.85280 57364 गुरु मंत्र साधना में आप का स्वागत है दोस्तों बाबा वीर बुलाकी कोण है कैसे इनका जन्म हुआ कैसी या कितनी बड़ी शक्ति  है इन सब के बारे में बहुत सारी कथाएं बहुत सारे लोगों को जो आपने सुना होगा यूट्यूब पर भी बहुत सारे देखा और सुना होगा

 

गोगा जाहरवीर के पुत्र के जाते हैं यमुना में बहा दिए गए थे उनके बरून और कई लोग धोने से यह जन्मे है  कई कहानियां कहानियां  है।  मैं  एन के बारे में बताने जा रहा हु  और शायद आपने यह जानकारी कहीं थोड़ी बहुत सुनी होगी और पूरी जानकारी कहीं नहीं सुनी होगी।

तो आज जो मैं आपको बताने जा रहा हूं बाबा वीर बुलाकी के बारे में जो कि आगरा की सच्ची सरकार कहीं जाते हैं। इन का जो स्थान है वह आगरा में है उससे पहले मैं आपको बता दूं कि अगर आपने हमारे वेबसाइट  को सब्सक्राइब नहीं किया। तो सीधे हाथ पर जो बटन उसे दबा दो ताकि हमारी आने वाली जो और जानकारियां है वह भी आपको मिल जाए गा। 

बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki  का स्वरूप

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बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki  का स्वरूप तो मैं आपको बता दूं जो बाबा वीर बुलाकी हैं इनके जन्म की तो जो कथाएं हैं वह एक अलग नहीं आए जिसे प्राचीन हम लोग कह सकते हैं।  जो अभी तक किसी के सामने नहीं आई है वही सुनी सुनाई बात है वह चल रही है।  बाबा वीर बुलाकी वह बहुत शक्तिशाली देवता है,बालक का जो स्वरूप है बाबा वीर बुलाकी का पूजा जाता है, उनके एक हाथ में सोटा और एक हाथ में मदिरा है। 

बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki का  सात्विक भोग

बूंदी के लड्डू

 लोंग

बतासे

 

  इनके भाव के लिए बूंदी के लड्डू लोंग बतासे का जो भोग है यह दिया जाता है इस का तामसिक भोग अलग है जिस की जानकारी आगे प्राप्त होगी !

बाबा वीर बुलाकी  Veer Bulaki जी का स्थान

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बाबा वीर बुलाकी  Veer Bulaki जी का स्थान  बाबा वीर बुलाकी  जी सबसे ज्यादा जमुना माता को  मानते हैं जमुना को अपनी माता मानते हैं।  जमुना जी आगरा तक जाती है और इनके मंदिर  और मठ  जमुना किनारे बनाए जाते है ! इनका सबसे बड़ा स्थान आगरा में ही है !

यह जमुना माता को इतना मानते अगर इनको जमुना माता की आन दी  जाए तो यह वही रुक जाते है। और कमाल खा सयद  इन के मिन्दर के पास कमाल खा सयद की मजार है.  यह उनको अपना गुरु मानते थे ! कमाल खा मसानी माता काली और  श्मशान आग वाणी शक्ति इनके साथ चलती है।

बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki किस रूप में आते है

बाबा वीर बुलाकीVeer Bulaki किस रूप में आते है- वह बाबा वीर बुलाकी के साथ बाबा वीर बुलाकी बहुत उग्र देवता है जब इनकी सवारी आती है।    तो यह जोर जोर से हाथ हलाते  है। भगत के दिल की धड़कन बहुत बढ़ जाती है जैसे कितने किलोमीटर से दौड़ लगा कर आया हो बाबा वीर बुलाकी जो है वह  उग्र देवता है जब  आते है।

तो हाथ जो है यह हाथ जोर जोर से हलती हुए आते है। जब इनकी की सवारी आती है तो अलग ही रूप इनका देखने को मिलता है जो इनकी जो साधना है इनकी जो सेवा है वह 99 परसेंट फलदाई होती है।  अगर आप इसे करते हैं जमुना घाट पर घर के मुकाबले में जायदा  प्रभावशाली है। 

आप अगर इसे जमुना घाट की सेवा करते इनका भोग देते हैं तो अति शीघ्र फलदाई होती है। जमुना घाट पर  किया जाता है जमुना जी किनारे इनकी जब पूजा भोग दिया जाता है। 

बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki   जी  इस भोग पर चलते है

बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki   जी  इस भोग पर चलते है बाबा वीर बुलाकी जो है  वाल्मीकि  समाज में के कुल देवता माने जाते हैं देव तो है वह पर वाल्मीकि समाज में यह बहुत सारे लोगों की जो है वह कुल देवता है यह जो है यह  सूर का बच्चा बकरा मुर्गा और दारू इस पर चलते हैं . शक्तियां जो हैं वह कोई बुरी नहीं होती पर जो लोग हैं जो भगत हैं वो उन्हें बुरा बना देते हैं वंदन करके करके उनको कुछ शक्तियां है जो कार्य करने के लिए तत्पर हो जाती हैं पूजा लेकर काम  करते है

 

तो पहले तो मैं आपको एक बात बता दूं बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो बाबा वीर बुलाकी को गालियां उल्टी-सीधी बोलते हैं और भी देवी देवता एक चीज नहीं है दिमाग में रख लेना हम हैं इंसान हम जो हैं वह कर्म बंद है पर शक्तियां कर्म बंद नहीं होती कोई भी कार्य करेंगे तो पाप पूण्य  नहीं लगता !किसी की बात ओ में आकर इनके बारे में कुछ उल्टा मत बोल देना अगर यह बिगड़ जाते  है तो घर को श्मशान बना देते है

गुरमुख होकर जब किसी गुरु के द्वारा पूरे परंपरागत चलते हैं पूरे कुल में चलते रहते तो पीड़ी दर पीड़ी चलते है अगर कुल में कोई भोग नहीं देता तो यह कोई संकेत नहीं देते है भवाल मचाना शुरू कर देते है अगर आपने इनकी पूजा भोग दिया है जाता है तो यह आपकी पीढ़ी को भी पूजे जाते है  

वाल्मीकि समाज में सबको पता होता है इसलिए वह सब पूजा करते है   अगर कुल कोई और समाज का व्यक्ति बाबा वीर बुलाकी को लेना चाहता है  तो बहुत सोच समझ कर ले क्योंकि बहुत उग्र शक्ति है बहुत शक्तिशाली शक्ति है उनकी पूजा सेवा टाइम पर नियम जो इनके वह बहुत कड़े होते हैं वह कर करते है तो बाबा वीर बुलाकी जो है वह अति शीघ्र प्रसन्न होने वाले है  

 वीर बुलाकी Veer Bulaki साधना विधि

 वीर बुलाकी Veer Bulaki साधना विधि जैसे मैंने आपको बता दिया उनका स्वरूप जो है वह काला  है शनिवार के दिन माना जाता है। शनिवार के दिन की पूजा की जाए बहुत ज्यादा बहुत जल्दी प्रसन्न  होते मैंने आपको बता दिया कि बाबा बुलाकी कमाल का सैयद और जमुना माता इन तीनों का भोग ज्यादा जमीन की पूजा की जाती है।

इनकी जो साधना है वह वैसे 41 दिन की साधना इनकी जब की जाती है।  अगर आप घर पर साधना कर रहे हैं जमुना किनारे भोग देकर आना होता है शनिवार की घर पर आपको जो भी आप ध्यान लगाना है।  फिर मंत्र जाप करना होता है इनकी पूजा में जो चीजें इस्तेमाल होती हैं वह बूंदी का लड्डू बर्फी है दूध है। 

अगरबत्ती लोग कपूर सिगरेट शराब की बोतल और छुआरा सामग्री जो है इन के भोग के लिए प्रयुक्त की जाती है यह प्रयोग किया जाती और एक इनका जो है वह दीपक जलाया जाता है। 

इनकी जो सेवा है कि जो पूजा है जो इनकी सेवा पूजा करते हैं वह जल्दी कह सकते हैं।  अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं जो है और जिन कामो  को करने  के लिए उनकी शक्ति बिल्कुल चुटकी भर से काम करती है।   इनकी साधना में जो है वह लाल और काले कपड़े का प्रयोग किया जाता है और साथ-साथ माला होनी है। वह हकीक की माला जो है वह प्रयोग की जाती है।

 

वीर बुलाकी Veer Bulaki  की सिद्धि के लाभ

वीर बुलाकी Veer Bulaki  की सिद्धि के लाभ  इनका जो भगत है अगर इनका भगत जो है वह किसी के घर में पैर रख देता तो सारी चीजों का अनुभव हो जाता है। और बहुत सारी सारी चीजें जो है वह अपने आप ही घर छोड़कर भाग जाती हैं किसी के घर घर की देवताओं को मानते हैं उस घर की जो देवता है वह पहले खुद ही साइड हो जाते हैं , हर जगह पर ही चले जाते हैं किसी चीज का परहेज नहीं है।  गंदी अच्छी हर जगह पर चले जाते हैं कार्य करते है आप के बड़े से बड़े कम इन की साधना चुटकी में हो जाते है यह बहुत ही तीव्र गति से काम करते है। 

कभी भी अगर कोई करने के लिए सोच मेरा वैसे तो वाल्मीकि समाज में बहुत आसानी से इनकी सेवा पूजा मिल जाती है जैसे यह हुक्का लगाया जाता और जब इनकी सवारी आ जाती है का प्रसाद दिया जाता है यह साधना बिल्कुल किसी को नहीं करनी चाहिए क्योंकि बिना गुरु के बहुत हानिकारक हो सकती है साथ यह साधना साधना ऐसी होती जो बिना गुरु ले  कर सकते बस कुछ साधना ऐसी होती है जो बिना गुरु की करनी ही नहीं चाहिए साधना है

बिना गुरु के इस साधना को भी मत करना बहुत अचूक साधना है बहुत कहते हैं कि उग्र साधना है। अगर आप वाल्मीकि समाज से तो आपके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। साधना को करना साधना आपको पीढ़ी दर पीढ़ी मिलती है अपने गुरु से मिलती और बात करें।

अगर मंत्र की बात करें तो देखो मंत्र जो मैं आपको बताने जा रहा हूं। इनका बहुत ही शक्तिशाली शाबर मंत्र है और देखो बात होती कि कोई भी देवता है ना उसके मंत्र तो सही होते हैं गुरु से के द्वारा जो मिले होते हैं। सिद्ध मंत्र होते वह जो किसी ने नेट पर बात होती है परंतु जो मंत्र होते हैं. वह सही में  नहीं चलते हैं और मंत्र जब जागृत होते हैं। जब आपकी सेवा आपके भक्ति मंत्रों को जागृत करते है.

बोलना चाहूंगा कि बहुत उग्र साधना है बहुत सोच समझकर साधना को करिएगा अगर करना चाहते हैं ,तो और मैं तो आपसे पर यह बोलूंगा कि देखो जानकारी के लिए यह सारी चीजें आपको उपलब्ध होती हैं।

आप जानकारी बहुत से लोगों को होती है। जानकारी के किस तरीके कौन देवता क्या है कैसा है। कहां क्या कैसे काम करता है कैसे साधना करना जानकारी लेने में फर्क होता है मैंने बाबा वीर बुलाकी के बारे में थोड़ा सा आपको बता दिया बाकी मेरी कोशिश है कि आपको ज्यादा ज्यादा जानकारी बता सकूं बाकी जैसे मैंने आपको बताया है कि 

 

    • 1 बाबा वीर बुलाकी का सात्विक भोग क्या है ?

      बूंदी का लड्डू बर्फी है दूध है अगरबत्ती लोग कपूर सिगरेट शराब की बोतल और छुआरा  बतासे

      २ बाबा वीर बुलाकी  साधना किस रूप में आते है ?

      वह बाबा वीर बुलाकी के साथ बाबा वीर बुलाकी बहुत उग्र देवता है जब इनकी सवारी आती है    तो यह जोर जोर से हाथ हलाते  है भगत के दिल की धड़कन बहुत बढ़ जाती है जैसे कितने किलोमीटर से दौड़ लगा कर आया हो बाबा वीर बुलाकी जो है वह  उग्र देवता है जब  आते है तो हाथ जो है यह हाथ जोर जोर से हलती हुए आते है जब इनकी की सवारी आती है तो अलग ही रूप इनका देखने को मिलता है

      ३ बाबा वीर बुलाकी   के साधना में शीघ्र सिद्धि प्राप्त करने के लिए क्या करना होगा ?

      बाबा वीर बुलाकी  जी की साधना अगर जमुना दे  किनारे पर की जाए तो जल्दी सिद्धि प्राप्त हो सकती है

      4 बाबा वीर बुलाकी   की पूजा किस दिन होती है ?

      बाबा वीर बुलाकी की पूजा शनिवार से होती है इस का भोग शुभ महूरत में होता है जैसे के दीवाली होली पर

      5 वीर बुलाकी Veer Bulaki तामसिक भोग

      बाबा वीर बुलाकी जो है  वाल्मीकि  समाज में के कुल देवता माने जाते हैं देव तो है वह पर वाल्मीकि समाज में यह बहुत सारे लोगों की जो है वह कुल देवता है यह जो है यह  सूर का बच्चा बकरा मुर्गा और दारू इस पर चलते हैं . शक्तियां जो हैं वह कोई बुरी नहीं होती पर जो लोग हैं जो भगत हैं वो उन्हें बुरा बना देते हैं

चमत्कारी प्राचीन लोना चमारी साधना शाबर मंत्र lona chamari ph.85280 57364

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चमत्कारी प्राचीन लोना चमारी lona chamari साधना शाबर मंत्र lona chamari ph.85280 57364

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मत्कारी प्राचीन लोना चमारी lona chamari साधना शाबर मंत्र lona chamari – पलभर में सिद्ध करे सभी काम, कामरु देश लूना चमारी साधना  गुरु मंत्र साधना .कॉम  में आपका हार्दिक स्वागत है ।  दोस्तों तंत्र मंत्र में जहां 52वीर  56 कलवा चौसठ योगिनी का बहुत बड़ा स्थान है साथ में लोक देवताओं का स्थान है ।  जिसमें गोगा जाहरवीर मीरा  पहलवान और भी हमारे बहुत सारे लोक देवता  का स्थान है ! lona chamari

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 और भी हमारे देवता हो  बाबा नागार सेन हो  चाहे   ग्राम खेड़े  हो चौक चौराहे वाली माता हो उसी प्रकार एक ऐसी तंत्र की देवी हैं जिनको लूना चमारी के नाम से जाना जाता है ।   लूना जोगन  के नाम से जाना जाता है जो कामरु देश कामाख्या की हैं अपने आप में असीम शक्तियों को समाहित करने वाली यह देवी एक बहुत बड़ी जादूगरनी के नाम पर बहुत बड़ी जादूगरनी के रूप में पूजी जाती हैं ।   जिसमें बहुत सारे लोगों के घर की कुलदेवी के रूप में पूजते हैं ,तो कुछ लोगों की देवी कहीं जाती है ।  

 

लूना जोगन को लूणा जोगन इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इनके जो गुरु थे ।  इस्माइल जोगी थे तो जिस तरीके से नाथ परंपरा चली गुरु गोरखनाथ के बाद उनके शिष्य थे ।  वह नाथ कहलाए चौरंगीनाथ भरतरी नाथ उसी प्रकार से इस्माइल जोगी की जो  शिष्या थी ।  वह लूना चमारी और लूना जोगन के नाम से प्रसिद्ध हुई ।   जिनका नाम आज तंत्र की दुनिया में बड़े सम्मान से  लिया जाता है ,और साथ-साथ जितने भी शाबर मंत्र हैं उन शाबर मंत्रों में लूना चमारी का एक विशेष स्थान है । 

 

अगर लूना चमारी की आन किसी मंत्र में दे दी जाए शाबर मंत्र में तो निश्चित रूप से उस देवता को वह कार्य करना पड़ता है ।   या फिर उस देवता को अपनी शक्ति का अंश प्रदान करना पड़ता है, यह बहुत बढ़िया जादूगरनी थी इनाम तांत्रिक कह सकते हैं ।  जिन्होंने बहुत सारी साधना की थी और साथ साथ में गुरु गोरखनाथ जी को  खुश किया था ।  गुरु गोरखनाथ जी से 56 कलवो  का वरदान प्राप्त किया था ।   मां भगवती मां दुर्गा की साधना करके इन्होंने असीम शक्तियां हासिल की थी और गुरु इस्माइल जोगी  उनसे इन्होंने बहुत सारी कलाएं बहुत सारी तंत्र मंत्र की दीक्षा जो है वह ग्रहण की थी । 

 

जब इन के पास ५६ कालवे आ गए थे तो बहुत काम करने के लाइक हो गई  थी ।  बहुत सारे कार्य को करने में सक्षम हो गई मैं आपको बता दूं जब 56 कलवे जैसे हम बोलते हैं गोगा जाहरवीर के पास में गोगा जाहरवीर जी महाराज से पांच बावरियों को 56 कलवे मिले उन पांच बावरियों का 56  कलवे प्रदान किए गए, तो अगर आपने उनकी कहानी पढ़ी हो तो जब उनके सर कट गए थे ।

तब भी वह युद्ध में लड़ते रहे थे और सा साथ में वह जैसे पीर अस्तबली उनके स्थान पर जाकर अमर हो गए और पांच बावरियों की कई स्थान है ।  जहां पर उनकी पूजा होती है चाहे सफीदों धाम मुरथल खेड़ा हो इसी प्रकार जब 56 कल्वो की जो शक्ति होती है  । 

 

वह असीम होती है जिस जिस ने 56 कल्वो को प्राप्त किया है ।  उसका नाम इस जग में अमर हो गया है और यहां तक कि वह पूजनीय हो गया है अगर 56 कलवे  कर लेते है ।  यह बहुत अद्भुत कार्य करते हैं जैसे कि किसी की खबर मंगवानी हो उनकी शक्ति के द्वारा किसी को पीड़ा  देनी हो शमशान की शक्ति का काट करना हो वह बांधनी  कोख  खोलनी हो  । 

हाजिरी मंगवानी हो मारण करना हो आकर्षण करना हो वशीकरण करना हो उच्चाटन करना हो ।   इस सभी क्रियाएं 56 कलुआ के द्वारा की जा सकती है और साथ ही किसी की भी पूछा देना किसी भगत के द्वारा वह भी 56 कलवे करते हैं उस कार्य को भी 56 कलवे सिद्ध करते हैं ।   56 कलवे के द्वारा किसी भी व्यक्ति की सालों पुरानी बातें वह भगत खोल के रख सकता है

Masani Meldi माता मेलडी मसानी प्रत्यक्ष दर्शन साधना और रहस्य ph. 85280 57364

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Masani Meldi माता मेलडी मसानी प्रत्यक्ष दर्शन साधना और रहस्य ph. 85280 57364

 

guru mantra sadhna .com me आप का स्वागत है  माता मेलडी के परिचय के बारे में परिचय देंगे  दोस्तों माडी  गुजराती का शब्द है ,माडी का हिंदी में अर्थ होता है माता माता को ही माडी कहते हैं। जो मसानी श्रेणी की शक्ति होती है , यह मिसाइल की तरह होती है यह शक्तिया साधक के सब काम करती है। कोई भी कार्य हो उचित अनउचित सब काम करती है और वो कार्य भी कम समय में करती है।   मिसाइल का उद्धरण देने का कारन यह शक्ति कम समय में काम करती है , शक्ति यह नहीं देखती के सामने वाला कोण है कैसा  बिलकुल मिसाइल की तरह काम करती है।  अगर आप शक्ति से गलत काम भी करवाओ गए कर देंगी  पर इस का फल आप को भोगना होगा कुछ समय के पश्चात् कर्मो से आज तक कोई  नहीं बच पाया है।  Masani Meldi माता मेलडी मसानी   मैली  शकितया की सवारी करती है इन्होंने  भूत प्रेत मसान मंत्रिका  तंत्रिका सब मैली  शकितो को बकरा बना कर उस पर सवार हो गई  थी  Masani Meldi माता मेलडी मसानी सभी मैली  शक्तिओ के स्वामी है  । आगे की कथा में आप को इस बारे में विस्तार सहित जानकारी मिलेगी। 

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Masani Meldi मेलडी माता का इतिहास – माता मेलडी मसानी उत्पति की  कथा 

Masani Meldi माता मेलडी मसानी प्रत्यक्ष दर्शन साधना और रहस्य ph. 85280 57364

मेलडी माता का इतिहास –  सत्ययुग  की समाप्ति के समय बहुत प्रतापी मायावी और मर्दानी था असुर था जिसका नाम अमरूवा था  उसके अत्याचारों से कुहराम  मच  गया था और देवताओं का महासंग्राम हुआ था। और उसमें देवता पराजित हो गए थे। उन्होंने महाशक्ति की स्तुति की और वहां आदि शक्ति जगदंबा सिंह वाहिनी दुर्गा प्रकट हुए और उन्होंने नौ रूप धारण किए उनके साथ दसमहाविद्या और अन्य सभी शक्तियां प्रकट हुई। महा भयंकर युद्ध चला  और 5000 वर्षों तक लगातार युद्ध हुआ।  अपने प्राणों को संकट में देखकर भागा वह रहा में देखता है कि किसी मृत गां के देह का पिंजरा पड़ा है। 

उसे लगा कि इस पिंजरे में शरण लू  तो  के देव देवी नजदीक नहीं आएंगे और असुर  पिंजरे में समा गया देवी शक्तियां पीछा करते हुए वहां पर आए तो शत्रु के पिंजरे में जा घुसा है। सभी देव या वहीं पर ठिठक कर खड़ी हो गई मृत गां का पिंजरा अशुभ माना जाता है तब देविया   सोच में पड़ गई कि इस आशुद्ध पिंजरे से दैत्य  को निकालना वह भी पिंजरे में घुसकर यह तो असंभव है, और पिंजरे से बाहर निकाले बिना वध भी नहीं किया जा सकता है।  ऐसी अजीब स्थिति में देवी शक्तियां मजबूरी में अपने हाथ मलने लगी हथेली पर हथेली की रगड़ से उर्जा उत्पन्न हुई।  और मैल  के रूप में बाहर आई श्री उमा देवी ने युक्ति लगाई और सारे मेल को एकत्र करें

मूर्ती  का रूप दिया सभी देवी और देव मिलकर आदिशक्ति की स्तुति करने लगे तत्काल उस मूर्ति से आदिशक्ति वह हाथ में खंजर ले 5 वर्ष की कन्या के रूप में प्रकट हो गए। और पूछा है माताओं मुझे बताओ क्यों मेरा आव्हान किया देवियों ने सारी व्यथा कह सुनाई और सारा माजरा समझ गई। 

देवियों के कहे  अनुसार गाउ  के पिंजरे में प्रवेश कर गई।  जब उस असुर   ने  यह सब देखकर आश्चर्यचकित हो गया , और वहां से बाहर भागा और स्याल  सरोवर में जाकर कीड़े   के रूप में छिप गया कन्या स्याल सरोवर में प्रवेश करके असुर  का वध  किया और सब देवताओ ने जयजयकार किया और  अपने धाम को लोट  गए। अगर कन्या खुद  उत्पन होती तो कार्य पूरा करने के पश्चात् खुद चली जाती।  यहाँ पर तो उस कन्या  की रचना  कर आवाहन किया गया था । 

उस कन्या ने  उमिया माता को पकड़ा और अपना नाम धाम और काम पूछा उमिया माता ने उन्हें चामुंडा के पास भेज दिया। सत्य हमेशा कसौटी पर कसा जाता है। और सत्य की परीक्षा होती है चामुंडा नाम कन्या को कामरूप कामाख्या विजय हेतु भेजा चामुंडा जानती थी ,कि कामाख्या तंत्र मंत्र जादू टोना और आसुरी शक्तियों की सिद्धि स्थली है।  यदि यह वहां से विजय होकर लौटती है , तो अभी इनकी वास्तविक शक्ति का अंदाजा होगा फिर उसी के अनुसार नाम और काम सौंपा जा सकेगा। 

 कन्या काम रूप में लगे पहरे को ध्वस्त कर दिया, मुख्य पहरेदार नोरिया मसान  को पराजित कर दिया। कामाख्या नगरी में प्रवेश के साथ उन्होंने देखा कि तंत्र मंत्र जादू टोना काली विद्या माया के ढेर इन सब को समझने में ही अमूल्य समय जाया हो जाएगा। उन्होंने सब को घोल  बनाकर बोतल में भर लिया भूत प्रेत मंत्रीका  का तंत्रिका सभी दोस्तों को बकरा बनाकर उस पर बैठकर  बोतल लेकर बाहर आ गई  और माँ चामुंडा  पास पहुंची। 

देवता दानव सब  उनका जयघोष किया, चामुंडा ने कहा जिस विद्या का प्रयोग दूसरों को दुख देने के लिए होता है उसे मैली  विद्या कहते हैं ,तुमने उसी मैली विद्या पर विजय पाई है।  एवं समस्त शक्तियों के हस्त रगड़ से तुम्हारी उत्पति  हुई है।  इसलिए तुम्हारा नाम मेलडी माता होगा तुम्हारा स्वरूप कलयुग की महाशक्ति रूप के लिए हुआ है तुम कलयुग के विकार अर्थात में काम क्रोध मद लोभ मोह  का नाश करने वाली शक्ति हो। 

सारा संसार तुम्हें श्री मेलडी  के रूप में पूजा अर्चना करेगा  तुमने समस्त दुष्टो  को बकरा बना दिया है अब यही तुम्हारा वाहन होगा संस्कृत में बकरे को अज कहां जाता है अज का अर्थ ब्रह्मांड होता है। बकरे के ऊपर या ब्रह्मांड के भी ऊपर विराज ने वाली आदिशक्ति हो  रूप में  गुजरात की भूमि तुम्हारा वा स्थान होगा। परंतु तात्विक रुप से  देह  धारियों की जीवनी शक्ति के रूप सारी सृष्टि में तुम्हारा बात स्थान  होगा कलयुग में तुम बकरे वाली मेलडी मां घर-घर पूजी जाओगी।    

 

    Masani Meldi माता मेलडी मसानी प्रत्यक्ष दर्शन साधना और रहस्य ph. 85280 57364

शिव तंत्र रहस्य – Shiv Tantra Rahasyamaya Ph. 85280 57364

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शिव तंत्र रहस्य – Shiv Tantra Rahasyamaya Ph. 85280 57364 तंत्र क्रियामक पद्धति साधना जगत में एक की अपेक्षा किसी हैं। इस बहुता व्यवस्था की ही दूसरी संज्ञा है बात की पुष्टि होती है कि प्रत्येक सम्प्रदाय का अपना विशिष्ट के इस तथ्य से, है। तंत्र रहा है, चाहे वह वैष्णव सम्प्रदाय चाह हो

अथवा अन्यान्य कोई भी सम्पदा निय ज्यो और प्रत्येक तंत्र का आधार रही है शिवोपासना ! तं शब्द से आज का समाज सन्तुष्ट नहीं है। तंत्र के प्रति समवेत् विरोध का स्वर सुनाई देता है दूसरी ओर समाज का महत्वाकाक्षी वर्ग तांत्रिक साहित्य की ओर आकर्षित हो रहा है।

प्रायः जादुई क्रियाकलाप की सीमा में ही मि अनैतिक या और सृजित विद्या में शिव रूप में मान्यता प्राप्त है समय के परिवर्त्तमान चक्र से तंत्र शब्द की सामाजिक क्रिया-पक्ष को समाज के साथ अविरत सुनियोजित नहीं किया जा सकता है।

 

 

आत्मा के परिज्ञान के परिवेश को जब जगत से उठाकर बाह्य मंडल में आरोपित करने की स्थिति की अवस्थिति को इसमें प्रत्यभिज्ञान कहा गया है. | लेकिन गर्हित कार्य की सर्वदा निन्दा की गई है। साधना के क्षेत्र में भौतिक सुखों की उपेक्षा ही नहीं इनकी अप्रस्तुति भी की गई है।

तंत्र में कुल कुण्डलिनी को जगाकर मणिपुर निवासी आनन्दमयी शक्ति के साथ जीव के विलीनीकरण का आयकरण किया गया है। इस | ब्रह्ममयी शक्ति के सम्पर्क से जीव शिव स्वरूप को प्राप्त करता है तंत्र निश्चित से वह दिया है, जिसमें जीव | की माया का साक्षात्कार योगमाया से होता है।

योग समत्व की अमिधा शक्ति है। समय की इसी शक्ति की पाविद्या है। माया अहेतुक और हेतुक ज्ञान से सम्बन्धित है। तांत्रिकगण माया को ज्ञान का भी प्रतीक मानते हैं। आत्मचेतना के उन्नयन की विद्या के रूप में तंत्र का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। तंत्र प्रकाशमार्ग का सोपान है।

मानव अपने जीवन के अंधकार को निर्वासित करने के लिए मंत्र की प्रत्यभिज्ञा की ज्योति को प्राप्त करना चाहता है। तंत्र का मूल उद्देश्य भौतिक अंधकार से निवृत्ति प्राप्त करना है।

वस्तुतः तंत्र सनातन सात्विक ज्योतिर्मयी शक्ति की उपासना है तमोगुण और रजोगुण के भयावह चक्र से दूर रहकर सहस्र सूर्य के आलोक में प्राप्त और प्राप्ति के नियम के विनियमन की व्यवस्था ही तंत्र है।

तंत्र कभी भी निकृष्ट कर्म का परिचायक नहीं है। आत्मशक्ति की चेतना से मानव पूर्णत्व की ओर अग्रसर होता है और इसके विपरीत की अवस्था में मानव निर्बल होकर सत्यज्ञान से दंचित हो जाता है। तंत्र साधना का सम्बन्ध आत्म प्रत्यक्षीकरण से है स्वयं के प्रति बोध को उद्बोधित करना ही तंत्र का कार्य है। तंत्र इससे समता की भावना उत्पन्न होती है।

समता से सत् असत्, त्याज्य और अत्याज्य का भेद समाप्त होता है। आत्मज्ञान की ज्योति इससे प्रज्ज्वलित होती है इसलिए यह कहा जा सकता है, कि आत्मज्ञान की प्रत्यभिज्ञावेजा में शंकर शिष्यों की अपने अनुभूति-जन्य सादृश्यता की वाचितानुवृत्ति में नहीं उलझते हैं. अपितु सहज दर्शन की अनुभूति होती है। तंत्र चेतना की की अवस्था को वहां तक पहुंचा देता है जहां चित की चिन्ता चिन्मयी में सिमट जाती है।

समदर्शीत्य के ना मौलिक आयाम को तंत्र की भित्ती पर ही चित्रित किया की जा सकता है। को व हरु प्त गम्भीर, गूड़, चिन्तनयुक्त, विद्वतपूर्ण लेखनी से युक्त ‘डॉ० मोहनावन्द मिश्र का लेख प्रामाणिक ज्ञान का ही परिचायक है।

नीव नत्व की तात्रिक साधना के साथ में अनेक सम्प्रदायों का रूप स्थिर हुआ चाहे शैव, शाकत, वैष्णव और बौद्ध हो सबने तंत्र की वीणा के तारों पर अपने विचारों को राग और तान दिया तंत्र के विचारों की प्रक्रिया को विशेषता यह है कि जीवन और शक्ति के उभय सिद्धान्त पर यह अवलम्बित है।

शक्ति के अभाव में शिव तो शव ही हो जाते है अतः प्रधानता शक्ति की है। वैष्णवगण इसे राधाकृष्ण तथा सीताराम की संज्ञा के नाम से सम्बोधित करते हैं बौद्ध उपासक इसे शून्यता तथा प्रशोन्याय के रूप में परिभाषित करते हैं। अनादिकाल से ही तंत्र साधना की परम्परा इस देश में वर्तनान है। योगी इस रहस्यमयी साधना में शिव | और शक्ति की उपासना करते आ रहे है। इस रहस्यमय |

साधना को तंत्र साधना के नाम से जाना जाता है। इस | साधना का प्रभाव सभी सम्प्रदायों पर पड़ा है। यह एक उदात साधना है, लेकिन नौतिकवादी साधकों ने इसे गति रूप में जीवित रखने का प्रयास किया।

वैद्यनाथ धाम एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यहां तंत्र साधना की परम्पर प्राचीनकाल से ही वर्तमान है। वैद्यनाथ धान एक प्रसिद्ध तीर्थ भी है। यहां द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से नवम् वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मंदिर है।

उत्तर गुप्त युग में आदित्यसेन गुप्त इस भूभाग का शासक था। पाल काल में बंगाल के शासकों ने इस पीठ को शिव की प्रशस्ति में अंकित किया 9 वीं सदी के बटेश्वर लेख से भी वैद्यनाथधाम के शिवमंदिर की महत्ता का प्रतिपादन होता है।

सेन वंशीय राजाओं ने भी वैद्यनाथ की प्रशस्ति का गायन किया है। मुस्लिम शासकों के युग में भी इस तीर्थ की लोकप्रियता थी। प्राचीनकाल में वैद्यनाथधाम में कामालिक और नाथसिद्धों की अधिकता थी पूर्व मध्यकाल में यहां शिव की उपासना पद्धति में तात्रिक विधि का ही वर्चस्व था।

मुस्लिम शासन के कुछ पूर्व ही यहां की तांत्रिक उपासना की परम्परा में कुछ ढीलापन आया। डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर में लिखा है कि आदिशंकर यहां आये थे। उनके दिग्विजय की गाथा में भी कापालिकों के साथ उनके विवाद की चर्चा है। उत्त समय यहाँ नाथ मत प्रचलित था। नाथ मत भी शैव परम्परा से सम्बन्धित है, जो शव-पाशुपत कापालिक और योगिनी कौल मतों की परम्परा से विकसित है। मत्स्यन्द्रनाथ योगिनी कॉलमत के प्रवर्तक थे गोरखनाथ का संबंध पाशुपत-व से था।

इन्होंने अपनी साधना की दुरुहता और विभिन्नता के कारण इस मार्ग को कष्टकर और भयावह बना दिया वैद्यनाथ स्थित नाथबाडी नाथों और रिद्धों की परम्परा का साक्षी है। यहां आज भी नाथों की अनेक समाधियां है। स्थानीय तीर्थपुरोहितों के बीच इनकी अनेक गधा प्रचलित है नाथों का यह सम्मम स्थल महाराजा गिद्धौर के अधिकार में है। वैद्यनाथयम एक शैवपी के रूप में ही नहीं शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। सती का हृदय यहां अवस्थित है शिव और शक्ति का प्रबल समर्थन इससे होता है। धर्म के सदृश्यात्मक धरतल पर मातृशक्ति की पूजा की परम्परा यहां प्राचीनकाल से ही प्रचलित है।

नौवी सदी से ही तांत्रिक उपासना की मध्यकालीन यहां प्रचलित है। मध्यकालीन भारत में शून्यता की उनला की प्रबलता बढ़ी और व्यापक रूप में पूर्वाचल में इसकी साधना को साधकों और आराधकों ने अपनाया 12 वी सदी के बाद मिथिला के उपासकों को सामाजिक परम्परा यहां स्थापित होने लगी।

मिथिला में “भैरवो यत्र लिगम के उपासकों की संख्या अधिक है। यहां भी मैथिल तीर्थों का हुआ और तांत्रिक विधि की साधना का प्रचलन हुआ पौराणिक साहित्य में भी इस शक्तिपीठ का वर्णन है। तंत्र में भी प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में इस क्षेत्र का उल्लेख है। इस पीठ की अधिष्ठात्री देवी के रूप में गला महाविद्या का महत्व है। किसी-किसी पुराण में जयदुर्गा का यह की पीठाविष्ठात्री देवी के रूप में उल्लेख है। यहां चौबीत नेतृकाओं की भी पूजा होती है।

पशुबलि की प्रथा भी यह प्रचलित है. यहां शक्ति की उपासना के अनेक विग्रह है जैसे सध्या काली, मनसा बंगला, अन्नपूर्णा जयदुर्गा त्रिपुरसुन्दरी जगज्जननी संकष्टा सीता राधा तारा और महागौरी भीतर खण्ड के प्राचीन कुण्ड में महाप्रसाद से हवन की प्रथा आज भी प्रचलित है की भी नित्य पूजा होती है।

श्रीविद्या आदि विद्या है इसकी उपासना से पराशकिका अगहन किया जाता है। यहां गायत्री की उपासना भी व्यापक स्तर पर होती है। शक्ति की उपासना का आदिरूप ही है। गायत्री शक्ति भी श्री विद्या की उपासना से सम्बन्धित है। आज भी शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों में श्रीविद्या की उपासना की परम्परा विद्यमान है। वैद्यनाधाम में हमशान साधना होती है।

बंगाल के अनेक साधक यहां आकर राधना करते थे. वैद्यनाध्यान के रक्षक वैद्यनाथ ही भैरव के रूप में विराज है। समस्त वैद्यनाथधाम के भौगोलिक स्वरूप को शिवपुराण में चिताभूमि के नाम से जाना जाता है। यह आज भी शक्ति साधना की भूमि है।

 

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सम्पूर्ण सरस्वती साधना – saraswati sadhna ph. 85280 57364

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सरस्वती  साधना  saraswati sadhna : भारतीय विद्या देवी की शक्ति   परिचय   – भारतीय संस्कृति में विद्या की देवी सरस्वती Saraswat saraswati को एक महान देवी माना जाता है। उनकी साधना करने से विद्या, बुद्धि, शक्ति और ज्ञान की प्राप्ति होती है। यहाँ हम जानेंगे कि सरस्वती Saraswat साधना क्या है, क्यों जरुरी है और कैसे इसे किया जाता है।

सरस्वती Saraswat saraswati  देवी कौन है 

सरस्वती Saraswat भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण देवी है। वह ज्ञान, कला, संगीत, वाणी, शिक्षा, बुद्धि और विद्या की देवी है। सरस्वती Saraswat को ध्यान करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है और सभी कलाओं में उन्नति होती है।

सरस्वती Saraswat को एक सफेद हंस द्वारा वाहित दिखाया जाता है जो समुद्र में उतरता है। वह त्रिशूल और वीणा धारण करती हैं। उनकी पूजा भारत के विभिन्न हिस्सों में बहुत ही  की जाती है।

 

या माया मधु-कैटभ प्रमथनी, या महिषोन्माथिनी,
या धूम्रचण्ड-मुण्डदलनी, या रक्तबीजाशनी ।
शक्तिः शुम्भनिशुम्भ-दैत्य मथनी, या सिद्धलक्ष्मी परा;
या देवी नवकोटि मूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी ।।

अर्थात्- “मधु और कैटभ नामक राक्षसों को मथने वाली, महिषासुर को मारने वाली, धूम्र, चण्ड, मुण्ड, रक्तबीज, शुम्भ तथा निशुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली, लक्ष्मी स्वरूपा नवकोटि देवताओं की शक्ति से समन्वित भगवती महासरस्वती Saraswat मेरी रक्षा करें ।” महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती Saraswat – इन तीनों स्वरूपों द्वारा सम्पूर्ण चराचर जगत की कारणभूत आद्याशक्ति परमेश्वरी की अभिव्यक्ति होती है।

इन त्रिशक्तियों की मूल प्रकृति महालक्ष्मी ही हैं, जो विशुद्ध सत्व गुण के अंश से महासरस्वती Saraswat के रूप में प्रकट होती हैं, जिनका वर्ण चन्द्रमा के समान गौर है, उन्होंने अपने हाथों में अक्षमाला, अंकुश, वीणा तथा पुस्तक धारण कर रखा है। महासरस्वती Saraswat के अन्य प्रसिद्ध नाम हैं महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती Saraswat, आर्या, ब्राह्मी, कामधेनु, वेदगर्भा, धीश्वरी (बुद्धि की स्वामिनी), तारा.ऋग्वेद में वाग्देवी का नाम सरस्वती Saraswat है।

ये वाणी और विद्या को प्रदान करने वाली देवी हैं। ये स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष तीनों स्थानों पर निवास करने के कारण भारती, इला और सरस्वती Saraswat नाम से सम्बोधित की जाती हैं। तंत्र शास्त्र में वर्णित है, कि दस महाविद्याओं में दूसरी महाविद्या तारा देवी का एक स्वरूप ‘सरस्वती Saraswat’ भी है । सरस्वती Saraswat संगीत विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं, ताल, स्वर, लय, राग-रागिनी आदि का प्रादुर्भाव इनके द्वारा ही हुआ है।

 

इनकी आराधना सात स्वरों- “सा, रे, ग, म, प, ध, नी” द्वारा होने के कारण ये ‘स्वरात्मिका’ कहलाती हैं, और सप्तविध स्त्रों का ज्ञान प्रदान करने के कारण भी इन्हें ‘सरस्वती Saraswat’ कहते हैं। देवी सरस्वती Saraswat की साधना से समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं, ये अपने साधक के हृदय में व्याप्त समस्त संशयों का उच्छेद कर उसे बोध प्रदान करती हैं।

महासरस्वती Saraswat saraswati  उत्पत्ति 

महासरस्वती Saraswat saraswati  उत्पत्ति  सरस्वती Saraswat की उत्पत्ति ‘देवी भागवत्’ में वर्णन आता है, कि सरस्वती Saraswat देवी का प्राकट्य भगवान श्रीकृष्ण की जिह्वा के अग्रभाग से हुआ है। सरस्वती Saraswat के प्रकट होने पर श्रीकृष्ण ने उन्हें नारायण को समर्पित कर दिया। विश्व में सरस्वती Saraswat पूजा का प्रचलन श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया ।

देवी भागवत् के अनुसार ही भगवान नारायण की तीन पत्नियां – लक्ष्मी, गंगा और सरस्वती Saraswat थीं। ये तीनों अत्यन्त प्रेम से रहती हुई पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान का पूजन करती थीं। किसी कार्यवश इन तीनों से उनको दूर जाना पड़ा। कार्य सम्पादित करके जब वे अंतःपुर में पधारे, उस समय तीनों देवियां एक ही स्थान पर बैठी हुई परस्पर अत्यन्त प्रेम से वार्तालाप कर रही थीं।

भगवान को अंतःपुर में आया देख तीनों देवियां उनके सम्मान में खड़ी हो गयीं। गंगा ने अत्यन्त प्रेमपूर्ण दृष्टि से भगवान की ओर देखा, उन्होंने भी गंगा की दृष्टि का अत्यधिक स्नेह युक्त मुस्करा कर उत्तर दिया, तत्पश्चात् वे आवश्यकता वश कक्ष से बाहर चले गये । उसी क्षण सरस्वती Saraswat ने गंगा के व्यवहार को अनुचित बता कर आक्षेप किया, गंगा ने भी कठोर शब्दों में प्रतिवाद किया… और दोनों में विवाद बढ़ता गया ।

लक्ष्मी ने दोनों को शान्त करना चाहा, किन्तु सरस्वती Saraswat ने अत्यधिक क्रोधित हो जाने, के कारण गंगा को नदी बन जाने का श्राप दे दिया, इस बात को सुन गंगा ने भी क्रोधावेश में सरस्वती Saraswat को नदी रूप में परिणित हो जाने का श्राप दे दिया, इपने में ही भगवान पुनः अंतःपुर में लौट आये, तब तक देवियां प्रकृतिस्थ हो चुकी थीं, तदुपरान्त उन्हें अपनी भूल का आभास हुआ और भगवान के चरणों से होने के भय से रोने लगीं।

दूर पूरा वृत्तांत सुनकर भगवान को अत्यधिक कष्ट हुआ, किन्तु गंगा व सरस्वती Saraswat की आकुलता को देखकर उन्होंने करुणार्द्र हो उन्हें आश्वासन दिया- – “गंगा! तुम एक अंश से नदी हो जाओगी, किन्तु अन्य अंशों से मेरे पास ही रहोगी।

सरस्वती Saraswat ! तुम को एक अंश से नदी बनकर रहना होगा, दूसरे अंश से ब्रह्मा जी की सेवा करनी होगी तथा शेष अंश से मेरे पास ही रहोगी। कलियुग के पांच हजार वर्ष बीतने के बाद तुम दोनों का शापोद्धार हो जायेगा ।”

तदनन्तर सरस्वती Saraswat अपने अंश रूप में भारत भूमि पर अवतीर्ण हो कर ‘भारती’ कहलायीं और अपने अंश रूप से ही ब्रह्मा जी की प्रिय पत्नी बनकर ‘ब्राह्मी’ नाम से भी प्रसिद्ध हुईं। किसी-किसी कल्प में सरस्वती Saraswat ब्रह्मा की कन्या के रूप में भी अवतीर्ण होती हैं और आजीवन कौमार्य व्रत का पालन करती हुई ब्रह्मा की सेवा करती हैं ।

ब्रह्मा ॐ ब्रह्मा के मन में एक बार विचार आया कि भूलोक पर सभी देवताओं के तीर्थ हैं, केवल मात्र मेरा ही कोई तीर्थ नहीं है। ऐसा सोचकर उन्होंने अपने नाम से एक तीर्थ स्थापित करने का निश्चय किया और एक रत्नखचित शिला को पृथ्वी पर गिराया | यह शिला अजमेर जिला में चमत्कारपुर स्थान के निकट गिरी, जी ने उसे ही अपना तीर्थ स्थल बनाया, जो ‘पुष्कर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

तीर्थ स्थापन के पश्चात् ब्रह्मा ने वहां पवित्र जल से युक्त एक सरोवर बनाने से का निश्चय किया, अतः उन्होंने सरस्वती Saraswat को आवाहित किया। इसके पूर्व सरस्वती Saraswat नदी के रूप में परिणित हो कर, पापात्माओं के स्पर्श से बचने के लिए छिप कर पाताल में बहती थीं।

ब्रह्मा द्वारा आवाहन करने पर भूतल और पूर्वोक्त शिलाओं को भेदकर वे प्रकट हुईं। –  उन्हें उपस्थित देख ब्रह्मा ने कहा- “मैं इस पुष्कर तीर्थ में निवास करूंगा, अतः तुम यहीं मेरे समीप रहो, जिससे मैं तुम्हारे जल में तर्पण कर सकूं।” ब्रह्मा के आदेश को सुनकर सरस्वती Saraswat ने अत्यन्त विनयवत् उत्तर दिया- “भगवन्!

मैं लोगों के स्पर्श-भय से ही पाताल में निवास करती हूं, किन्तु आपकी में आज्ञा का उल्लंघन भी नहीं कर सकती, अतः आप जो उचित समझें वैसी व्यवस्था करें।”सरस्वती Saraswat के विनम्र वचनों को सुनकर ब्रह्मा जी ने उनके निवास के लिए एक विशाल सरोवर निर्मित करवाया, तब सरस्वती Saraswat ने उसी सरोवर में आश्रय लिया ।

तत्पश्चात् ब्रह्मा ने बड़े-बड़े भयंकर सर्पों को बुलाकर, उन्हें सरस्वती Saraswat की रक्षा करने की आज्ञा दी । एक बार भगवान विष्णु ने देवी सरस्वती Saraswat को आज्ञा दी, कि वे “बड़वानल” को अपने प्रवाह में बहाकर समुद्र में छोड़ दें। सरस्वती Saraswat ने इसके लिए ब्रह्मा से भी आज्ञा प्राप्त कर, इस कार्य को सम्पादित करने के विचार किया।

लोकहित के कारण ब्रह्मा ने भी इस कार्य के लिए अनुमति प्रदान कर दी। सरस्वती Saraswat ने कहा – “भगवन्! यदि मैं पृथ्वी पर नदी रूप में प्रकट होकर इस अग्नि को ले जाऊंगी तो मुझे भय है, कि पापी जनों के सम्पर्क से मेरा स्वयं का शरीर दग्ध हो जायेगा, अतः पाताल मार्ग से ही इसे समुद्र तक ले जाऊंगी ।”

से ब्रह्मा ने कहा- “तुम्हें इस कार्य को करने में जिस तरह से सुगमता हो, उसी प्रकार इसे सम्पन्न करो। पाताल मार्ग से जाने पर यदि कहीं बड़वानल के ताप तुम अत्यधिक पीड़ित हो जाओ, तो वहां पृथ्वी पर नदी रूप में प्रकट हो जाना। इस प्रकार प्रकट होने पर तुम्हारे शरीर पर किसी प्रकार का दोष व्याप्त नहीं होगा।” ब्रह्मा जी से यह उत्तर पाकर देवी सरस्वती Saraswat, गायत्री, सावित्री और यमुना आदि अपनी प्रिय सखियों के साथ हिमालय पर्वत पर चली गईं और वहां से नदी रूप धारण कर भूतल पर प्रवाहमान हुईं। बड़वानल को लेकर वे सागर की ओर प्रस्थित हुईं।

इस प्रकार पाताल लोक से गमन करते तथा भूतल पर प्रकट होते हुए वे प्रभास क्षेत्र में पहुंची। वहां चार तपस्वी कठोर साधना में रत थे, उन्होंने सरस्वती Saraswat को पृथक-पृथक अपने आश्रम के पास बुलाया और तभी समुद्र ने भी वहां प्रकट ने होकर सरस्वती Saraswat को आवाहित किया।

सरस्वती Saraswat को समुद्र तक जाना था और मुनियों की आज्ञा का भी उल्लंघन करने से श्राप मिलने का भय था, अतः उन्होंने पांच धाराओं का रूप धारण कर लिया। इस प्रकार का रूप धारण करने के कारण ‘पंचश्रोता सरस्वती Saraswat’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।

अपनी एक धारा से वे मार्ग के अन्य विघ्नों को दूर करते हुए समुद्र से जा मिलीं तथा चार धाराओं से चारों ऋषियों को स्नान की सुविधा प्रदान कर गईं। पुराण में कथन है, एक बार ब्रह्मा जी ने सरस्वती Saraswat से कहा- “तुम किसी के मुख में कवित्व शक्ति के रूप में निवास करो।”

योग्य पुरुष ब्रह्मा जी की आज्ञा को पूरा करने हेतु सरस्वती Saraswat योग्य पात्र की खोज में विचरण करने लगीं। विभिन्न सत्यादि लोकों में भ्रमण करके तथा सातों पातालों में घूम कर ऐसे अलौकिक पुरुष की खोज करने लगीं;

किन्तु उन्हें सुयोग्य पात्र नहीं मिल सका । इस खोज में पूरा सतयुग बीत गया, तदुपरान्त त्रेतायुग के आरम्भ में अपने अनुसन्धान को पूर्णता देने के लिए भ्रमण करती हुई, वे भारत भूमि पर पहुंची और तमसा नदी के किनारे विचरण करने लगीं। तमसा नदी के तट पर महर्षि वाल्मिकी अपने शिष्यों के साथ रहते थे ।

प्रातःकाल वे स्नान के लिए नदी की ओर जा रहे थे, तभी उनकी दृष्टि एक व्याध के बाण से घायल क्रोंच पक्षी पर पड़ी, उसका सारा शरीर लहूलुहान था और वह मृत्यु से जूझ रहा था ।

मादा क्रोंची उसके पास ही गिर कर तड़पती हुई करुण स्वर में चीख रही थी । पक्षी के उस जोड़े की व्यथा महर्षि से देखी नहीं गई और वे उसकी व्यथा से द्रविभूत हो उठे । अकस्मात् ही उनके मुख से चार चरणों का श्लोक निकल पड़ा – मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शास्वतीः समाः । यत् क्रौंच मिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ।।

saraswati sadhna  महर्षि वाल्मिकी के मुख से उच्चरित यह श्लोक सरस्वती Saraswat की कृपा का फल था, क्योंकि महर्षि को देखते ही उन्होंने उनके अन्दर छिपी असाधारण प्रतिभा को पहिचान लिया था, अस्तु; उन्होंने सर्वप्रथम वाल्मिकी के मुख में ही प्रवेश किया। सरस्वती Saraswat के कृपापात्र होकर ही महर्षि वाल्मिकी ‘आदि कवि, के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुए।

मार्कण्डेय विरचित दुर्गा सप्तशती में भी सरस्वती Saraswat के प्रकट होने की कथा. है; जिसमें उन्होंने बताया है, कि गौरी के शरीर से ये प्रकट हुईं हैं, और शरीर कोश से प्रकट होने के कारण ये ‘कौशिकी’ नाम से प्रसिद्ध हुईं।

अपने कौशिकी स्वरूप से देवी सरस्वती Saraswat ने शुम्भ-निशुम्भ जैसे महान दैत्यों का वध कर पृथ्वी पर सुख-शांति की स्थापना की और देवताओं तथा ऋषियों को निर्भयता प्रदान की। तंत्र और पुराणों में इनकी महिमा का विस्तृत वर्णन पढ़ने को मिलता है । बिजी देवी महासरस्वती Saraswat अनेक प्रकार से विश्व के लोगों का कल्याण करती हैं; बुद्धि, ज्ञान एवं विद्या के रूप में सारा जगत इनकी कृपा को प्राप्त कर अविभूत हो उठता है।


महासरस्वती Saraswat साधना saraswati sadhna  विधि

महासरस्वती Saraswat साधना saraswati sadhna  विधि – भगवती सरस्वती Saraswat की सौम्य और उग्र दोनों रूपों में साधना मिलती है, सौम्य साधना से प्रायः सभी परिचित हैं, जो वाग्देवी भी कही जाती हैं। उनके उग्ररूप नील सरस्वती Saraswat, विद्याराज्ञी के नाम से प्रसिद्ध हैं। शुंभ और निशुंभ का वध करते समय उन्होंने अपना उग्र स्वरूप प्रकट किया था, जिसकी साधना से साधक को अभ्युदय और निःश्रेयता की प्राप्ति होती ही है। साधक को रात्रि के अन्तिम भाग जिसे ब्रह्म मुहूर्त कहा जाता है, जाग जाना चाहिए

ब्राह्म मुहूर्ते बुद्धयेत धर्मार्थमनु चिन्तयेत् । कायक्लेशांश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च ।।

ब्रह्म मुहूर्त में जगने के बाद शय्या पर बैठकर धर्म एवं अर्थ का चिन्तन करना चाहिए तथा दैनिक जीवन निर्वाह करने में शरीर तथा इन्द्रियों को प्राप्त होने वाले क्लेश आदि के शमन का भी चिन्तन करें। इस प्रकार वेद प्रतिपादित परम तत्त्वार्थ का चिन्तन करते हुए शय्या त्याग करें। स्नान आदि नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर साधना कक्ष में (जिसमें साधनानुकूल सभी सामग्री सुसज्जित हों) पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हो सुखद श्वेत तथा पवित्र आसन पर बैठें। पहले पवित्रीकरण एवं आचमन करें, आचमन के बाद प्राणायाम करें। अपने सामने चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती महासरस्वती Saraswat का चित्र तथा यंत्र (जो प्राण प्रतिष्ठित हो) स्थापित कर लें। पहले गणपति स्मरण एवं विधिपूर्वक गुरु पूजन करने के बाद ही मूल पूजन आरम्भ करें-

ध्यान  महासरस्वती Saraswat साधना saraswati sadhna  

:दोनों हाथ जोड़कर ध्यान करें शुक्लां ब्रह्म विचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं । वीणा पुस्तक धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् ।। हस्ते स्फाटिक मालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां । वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ।। श्री सरस्वत्यै नमः ध्यानं समर्पयामि । 

विशेष – “शुक्लवर्णा, ब्रह्मस्वरूपा, आद्याशक्तिरूपा, समस्त संसार में शक्तिरूप से व्याप्त, अपने दोनों हाथों में वीणा और पुस्तक धारण की हुई, जड़ता एवं अज्ञान को नाश करने वाली स्फटिक माला धारण करके पद्मासन में विराजमान, बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी भगवती सरस्वती Saraswat को मैं शुद्ध भाव से नमन करता हूं।”

saraswati आवाहन

: भव पुष्प स्वतन लेकर आवाहन करें- चतुर्भुजां चन्द्रवर्णां चतुरानन वल्लभाम् । आवाहयामि वाग्देवीं वीणा पुस्तक धारिणीम् ।। fre श्री सरस्वत्यै नमः आवाहनं समर्पयामि ।

saraswati गन्ध

 चन्दन या कुंकुम लगावें- एक कर्पूरायैश्च कुंकुमागरू कस्तूरी गन्धं गृहाण शारदे विधिपत्नि! संयुक्तम् । नमोऽस्तुते ।। श्री सरस्वत्यै नमः गन्धं समर्पयामि। विदियो सुगन्धित धूप लगा लें फिलफरक ऊँच गुग्गुल्वगरू संयुक्तं भक्त्या दत्तं विधिप्रिये । धूप : १५ कर

saraswati  दीप

: धूपं गृहाण देवेशि ! मातृमण्डल पूजिते ।। श्री सरस्वत्यै नमः थूपम् आघ्रापयामि। दीपक दिखाय – に難 घृताक्तवर्ति संयुक्तं वाणि चैतन्य दीपितम् । दीपं गृहाण वरदे कमलासन वल्लभे ।। श्री सरस्वत्यै नमः दीपं दर्शयामि । मिष्ठान्न का भोग लगावें- शर्कराघृत संयुक्तं मधुरं स्वादु चोत्तमं । उपहार समायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृहयताम् ।। श्री सरस्वत्यै नमः नैवेद्यं निवेदयामि, ऋतुफलानि समर्पयामि नमः । :

saraswati आरती करें-

नीराजनं नीरजाक्षि नीरजासन वल्लभे कर्पूरखण्ड कलितं गृहाण करुणार्णवे ।। श्री सरस्वत्यै नमः नीराजनं समर्पयामि। दोनों हाथों में खुले पुष्प ले लें – पुष्पांजलि र्मया दत्ता गृहाण शारदे लोकमातस्त्वं आश्रितेष्ट प्रदायिनि ।। वर्णमालिनि । श्री सरस्वत्यै नमः पुष्पांजलिं समर्पयामि । नैवेद्य : नीराजन पुष्पांजलि : नमस्कार : विशेषार्घ्य : दोनों हाथ जोड़ें – या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणा वरदण्डमण्डितकरा या श्वेत पद्मासना । या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता, सा मां पातु सरस्वती Saraswat भगवती निःशेषजाड्यापहा ।। हरील – दाहिने हाथ में जल लें, उसमें अक्षत, पुष्प मिला कर लें- अधहीने गृहाणेदम् अर्ध्यमष्टांग संयुक्तं । अम्बाखिलानां जगतामम्बुजासन सुन्दरि ।।  श्री सरस्वत्यै नमः विशेषार्घ्यं समर्पयामि । अनया पूजया श्री सरस्वती Saraswat देवता प्रीयन्ताम् सत् ब्रह्मार्पणमस्तु । तत् तत्पश्चात् मूल पूजन प्रारम्भ करें,

“महासरस्वती Saraswat यंत्र” को अपने सामने किसी प्लेट में कुंकुम से स्वस्तिक अंकित कर, स्थापित कर दें। विनियोग । दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न संदर्भ का उच्चारण करें- ॐ ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप् छन्दसे मुखे । देवतायै नमः हृदि । सरस्वती Saraswat विनियोगाय नमः सर्वांगे । ल ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः अंगुष्ठाभ्यां नमः । कर न्यास : नमः क्लीं ह्रीं ऐं ब्लू स्त्रीं तर्जनीभ्यां नमः । मध्यमाभ्यां नीलसरस्वती Saraswat नमः । दीद्रां द्रीं क्लीं ब्लूं सः अनामिकाभ्यां नमः । ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः कनिष्ठिकाभ्यां नमः । सौः हीं स्वाहा करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः ।

saraswati  हृदयादिन्यास :

जेवेश ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः क्लीं ह्रीं ऐं ब्लू स्त्रीं नीलतारे सरस्वति हृदयाय नमः । शिरसे स्वाहा । शिखायै वषट् । द्रां द्रीं क्लीं ब्लू सः कवचाय हुम् । ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः नेत्रत्रयाय वौषट् । सौः हीं स्वाहा अस्त्राय फट् । दोनों हाथ जोड़कर

saraswati भगवती सरस्वती Saraswat का ध्यान करें

– घण्टाशूल हलानि शंखमुसले चक्रं धनुः सायक,  हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशु तुल्यप्रभा । गौरीदेह समुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा पूर्वामत्र सरस्वती Saraswatमनुभजे शुम्भादि दैत्यार्दिनीम् ।। “घण्टा, त्रिशूल, हल, शंख, मूसल, चक्रं, धनुष एवं बाण आदि आयुधों को अपने दिव्य हाथों में धारण की हुई, अत्यधिक शोभायुक्त, चन्द्रमा के समान सुशीतल, पार्वती की देह से समुत्पन्न, तीनों लोकों की आधारभूता, शुम्भ-निशुम्भ आदि दानवों का संहार करने वाली भगवती सरस्वती Saraswat का मैं भावपूर्ण हृदय से ध्यान करता हूं।” नि ।

saraswati आवरण पूजा :

क 208 ध्यान के पश्चात् आवरण पूजन प्रारम्भ करें। आवरण पूजन में यंत्र के प्रत्येक घेरे का क्रमवार पूजन किया जाता है, जो अत्यधिक सूक्ष्म एवं दुरूह पद्धति है, जिसे प्रत्येक साधक के द्वारा सम्पन्न करना सम्भव नहीं है; अतः सभी साधकों तथा सामान्य पाठकों के लाभार्थ आवरण पूजा की सहज व लघु पद्धति प्रस्तुत की जा रही। इस पद्धति के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति पूजन सम्पन्न कर सकता है तथा इस पद्धति द्वारा पूजन करने से भी पूजन का पूर्ण लाभ प्राप्त होता है ।

saraswati प्रथमावरण पूजा

अपने बायें हाथ में कुंकुम से रंगे अक्षत (चावल) ले लें और निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए, अक्षत को यंत्र पर चढ़ाते रहें-  – ॐ मेघायै नमः । ॐ प्रज्ञायै नमः । ॐ प्रभायै नमः । ॐ विद्यायै नमः ।गामी ॐ धियै नमः । ॐ धृत्यै नमः।  ॐ बुद्ध्यै नमः । ॐ स्मृत्यै नमः । ॐ विश्वेश्वर्यै नमः ।

प्रथमावरण पूजन के बाद यंत्र को किसी ताम्र पात्र में रखकर दूध, दही, घी, शहद एवं शक्कर से स्नान करावें, फिर शुद्ध वस्त्र से पोंछ दें- हौं सरस्वती Saraswat योग पीठात्मने नमः इस मंत्र से पुष्पादि आसन देकर पुनः प्लेट में यंत्र को स्थापित करें तथा “ॐ श्रीं ह्रीं हसौः महा सरस्वत्यै नमः “

मंत्र से मूर्ति की कल्पना करके, विनयवत् आवरण पूजा के लिए आज्ञा मांगें के तर्प  संविन्मये परे देवि परामृतरस प्रिये ।। सअनुज्ञां देहि मे मातः परिवारार्चनाय मे।। तदुपरान्त एक अन्य प्लेट में मौली सूत्र लपेट कर पांच सुपारी स्थापित करें, जो गणपति, क्षेत्रपाल, बटुक भैरव व गुरु की प्रतीक हैं तथा निम्न मंत्रोच्चारण के साथ इन पर पुष्प अर्पित करें-

ॐ विघ्नेशाय नमः विघ्नेश श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः क्षेत्रपाल श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऊं बं बटुकाय नमः  बटुक भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ यं योगिन्यै नमः  योगिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ श्री गुरवे नमः श्री गुरु पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ अणिमायै नमः अणिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ लघिमायै नमः लघिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ महिमायै नमः महिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐॐॐ असितायै नमः  असिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वशितायै नमः वशिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।  ॐ कामपूरिण्यै नमः साभार कामपूरिणी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ गरिमायै नमः गरिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।

  ॐ प्राप्त्यै नमः : प्राप्ति श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ ॐ असितांग भैरवाय नमः असितांग भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ रुरु भैरवाय नमः  रुरु भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ चण्ड भैरवाय नमः चण्ड भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ भैरवाय नमः भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ क्रोध भैरवाय नमः क्रोध भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ उन्मत्त भैरवाय नमः उन्मत्त भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ कपाल भैरवाय नमः कपाल भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।

ॐ भीषण भैरवाय नमः  भीषण भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ संहार भैरवाय नमः  संहार भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । किल ॐ ब्राह्मयै भैरवाय नमःकर  ब्राह्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ माहेश्वर्ये भैरवाय नमः ॐ कौमार्यै भैरवाय नमः मि के काही माहेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ  गर कौमारी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।

ॐ वैष्णव्यै भैरवाय नमः वैष्णवी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वाराह्यै भैरवाय नमः वाराही श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ इन्द्राण्यै भैरवाय नमः ह है इन्द्राणी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ चामुण्डायै भैरवाय नमः चामुण्डा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ महालक्ष्म्यै भैरवाय नमः अतिर ॐ महालक्ष्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । इसके बाद पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें तथा पुष्पाञ्जलि समर्पित कर दें- – अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । समर्पये तुभ्यं कारल भक्त्या प्रथमावरणार्चनम् ।।

saraswati द्वितीयावरण पूजा 

करागीर द्वितीयावरण पूजन के लिए बायें हाथ में हल्दी से रंगे अक्षत ले लें तथा दाहिने हाथ से यंत्र पर चढ़ाते हुए चौसठ शक्तियों का पूजन व करें- ॐ कुलेश्वर्यै नमः कुलेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । श ॐ कुलनन्दायै नमः कुलनन्दा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वागीश्वर्यै नमः  चागीश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ भैरव्यै नमः ॐ उमायै नमः ॐ श्रियै नमः ॐ शान्त्यै नमः ॐ चण्डायै नमः ॐ धूम्रायै नमः ॐ काल्यै नमः ॐ करालिन्यै नमः ॐ महालक्ष्म्यै नमः ॐ कंकाल्यै नमः ॐ रुद्रकाल्यै नमः ॐ सरस्वत्यै नमः २३ भैरवी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । कर लि उमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । श्री श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । शान्ति श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चण्डा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । धूम्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । काली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । करालिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नजर ॐ महालक्ष्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ਕਿਸ कंकाली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । मित्र रुद्रकाली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सरस्वती Saraswat श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।  सके ॐ वाग्वादिन्यै नमः ॐ नकुल्यै नमः ॐ भद्रकाल्यै नमः ॐ शशिप्रभायै नमः ॐ प्रत्यंगिरायै नमः ॐ सिद्धलक्ष्म्यै नमः ॐ अमृतेश्वर्यै नमः ॐ चण्डिकायै नमः ॐ खेचर्यै नमः ॐ भूचर्यै नमः ॐ सिद्धायै नमः ॐ कामाक्ष्यै नमः वाग्वादिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नकुली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । भद्रकाली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । शशिप्रभा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । प्रत्यंगिरा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सिद्ध लक्ष्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अमृता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चण्डिका श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । खेचरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । भूचरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सिद्धा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । कामाक्षा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ बलायै नमः ॐ जयायै नमः ॐ विजयायै नमः ॐ अजितायै नमः ॐ नित्यायै नमः ॐ अपराजितायै नमः ॐ विलासिन्यै नमः ॐ अघोरायै नमः ॐ चित्रायै नमः ॐ मुग्धायै नमः ॐ धनेश्वर्यै नमः ॐ सोमेश्वर्यै नमः बला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । जया श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विजया श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अजिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नित्या श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अपराजिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विलासिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अघोरा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चित्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । मुग्धा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । धनेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सोमेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ महाचण्ड्यै नमः ॐ विद्यायै नमः ॐ हंस्यै नमः ॐ विनायकायै नमः ॐ वेदगर्भायै नमः ॐ भीमायै नमः ॐ उग्रायै नमः ॐ वेद्यायै नमः ॐ सद्गत्यै नमः ॐ उग्रेश्वर्यै नमः ॐ चन्द्रगर्भायै नमः ॐ ज्योत्स्नायै नमः महाचण्डी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विद्या श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हंसी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विनायका श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वेदगर्भा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । भीमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । उग्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वेद्या श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सद्गति श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । उग्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चन्द्रगर्भा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ज्योत्स्ना श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ मोहिन्यै नमः ॐ वंशवर्द्धिन्यै नमः ॐ ललितायै नमः ॐ दूत्यै नमः ॐ मनोजायै नमः ॐ पद्मिन्यै नमः ॐ धरायै नमः ॐ वर्वर्यै नमः ॐ क्षत्रहस्तायै नमः ॐ रक्तायै नमः ॐ नेत्रायै नमः ॐ विचर्चिकायै नमः मोहिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वंशवर्द्धिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ललिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । दूती श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । मनोजा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पद्मिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । धरा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वर्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । क्षत्रहस्ता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । रक्ता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नेत्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विचर्चिका श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ श्यामलायै नमः श्यामला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ बलायै नमः बला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ पिशाच्यै नमः पिशाची श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ विदार्यै नमः विदारी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ शीतलायै नमः शीतला श्री पादुकां पूंजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वज्रयोगिन्यै नमः वज्रयोगिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ सर्वेश्वर्यै नमः सर्वेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुन: पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प यंत्र पर अर्पित कर दें- अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ||

saraswati  पंचमावरण पूजा : करें-

बायें हाथ में आठ कमल बीज ले लें। मंत्रोच्चारण करते हुए, दाहिने हाथ से एक-एक कमल बीज यंत्र पर अर्पित करते हुए आठ सरस्वतियों का पूजन ॐ नमः पद्मासने शब्दरूपे ऐं ह्रीं क्लीं वद वद वाग्वादिनी स्वाहा । वाग्वादिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हू स् क् ल् हीं वद वद चित्रेश्वरी ऐं स्वाहा । चित्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं कुलजे ऐं सरस्वती Saraswat स्वाहा । कलुजा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं ह्रीं श्रीं वद वद कीर्तीश्वरी स्वाहा । कीर्तीश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं ह्रीं अन्तरिक्ष सरस्वती Saraswat स्वाहा । अन्तरिक्ष सरस्वती Saraswat श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हू स् ष्फ्रे हू सौः ष्फ्रीं ऐं ह्रीं श्रीं द्रां ह्रीं क्लीं ब्लूं सः हनीं घट सरस्वती Saraswat घटे वद वद तर तर रुद्राज्ञया ममाभिलाषं कुरु कुरु स्वाहा । घट सरस्वती Saraswat श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । · ब्लू वें वद वद त्रीं हूं फट् । नीला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं हैं ह्रीं किणि किणि विच्चे । किणि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुनः पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प को यंत्र पर अर्पित कर दें। अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । भक्त्या समर्पये तुभ्यं पंचमावरणार्चनम् ।।

saraswati षष्ठावरण पूजन :

बायें हाथ में काली सरसों ले लें और दाहिने हाथ से यंत्र पर अर्पित करते हुए छः योगिनियों की पूजा करें— ॐ डाकिन्यै नमः । डाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ शाकिन्यै नमः । शाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ लाकिन्यै नमः । लाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ काकिन्यै नमः । काकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ राकिन्यै नमः । राकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ हाकिन्यै नमः । हाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प यंत्र पर अर्पित करें- अभीष्ट सिद्धिं मे देहि भक्त्या समर्पये तुभ्यं शरणागत वत्सले । षष्ठावरणार्चनम् ।।

saraswati सप्तमावरण पूजा :

बायें हाथ में तीन पुष्प ले लें और यंत्र पर दाहिने हाथ से अर्पित करते – हुए तीन भैरवियों का पूजन करें- हीं परायै नमः । परा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं क्लीं सौः बलायै नमः । बला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हू स्मैं हू क्लीं हू सौः भैरव्यै नमः । भैरवी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुनः पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प यंत्र पर ३५ -अर्पित कर दें– अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । भक्त्या समर्पये तुभ्यं सप्तमावरणार्चनम् ।।

मंत्र जप 41 आवरण पूजन करने के पश्चात् “सफेद हकीक माला” अथवा “स्फटिक माला” से निम्न मंत्र का एक माला मंत्र जप करें- मंत्र “ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौं क्लीं ह्रीं ऐं ब्लू स्त्रीं नीलतारे सरस्वती Saraswat द्रां द्रीं क्लीं ब्लू सः ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः सौः हीं स्वाहा” इस मंत्र का जप करने से भगवती सरस्वती Saraswat प्रसन्न होकर अभीष्ट वर प्रदान करती हैं। मंत्र जप समाप्ति के बाद आरर्ती करें, बाद में

saraswati  भगवती सरस्वती Saraswat का निम्न स्तुति पाठ करें

स्तुति पाठ मातनील सरस्वति प्रणमतां सौभाग्य सम्पत्प्रदे । प्रत्यालीढपदस्थिते शव हृदि स्मेराननाम्भोरुहे ।। फुल्लेन्दीवर लोचनत्रय युते कर्तृकपालोत्पले । खड्गञ्चादधतीं त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये । बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देहि मे। कुबुद्धिं हर मे देवि! त्राहि मां शरणागतम् ।। सभायां शास्त्रवादे तु रिपुसंघसमाकुले । मुष्टियन्त्रित हस्ता मां पातु नील सरस्वती Saraswat ।। नीला सरस्वती Saraswat पातु हृदय मे समन्ततः । मूलाधारं सदा पातु फट् शक्तिर्नीिल सरस्वती Saraswat ।। विद्यादानरता देवी वक्त्रे नील सरस्वती Saraswat । शास्त्रे वादे च संग्रामे जले च विषमे गिरौ । नित्या नित्यमयी नन्दा भद्रा नील सरस्वती Saraswat । गायत्री सुचरित्रा च कौलव्रत परायणा ।। निषूदिनी । महाव्याधि हरा देवी शुम्भासुर महापुण्य प्रदा भीमा मधु कैटभ नाशिनी ।। पूर्ण श्रद्धा भावना से युक्त हो सरस्वती Saraswat देवी को प्रणाम करें तथा पूरे परिवार में प्रसाद वितरित करें। सम्पूर्ण विधि-विधान द्वारा सम्पन्न पूजन से निश्चित रूप से विद्या, धन, सुख, पुष्टि, आयु, कीर्ति, बल, स्त्री, सौन्दर्य तथा साधक की जो भी मनोकामना होती है, वह पूर्ण होती ही है। ।। इति सिद्धिम् ।।

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ज्ञान की देवी सरस्वती की सबसे मधुर वंदना कौन सी है?

वैसे तो सभी सरस्वती वंदना मुझे मधुर लगती हैं।लेकिन ये वंदना मुझे सबसे मधुर लगती है।
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ ,
अज्ञानता से हमें तार दे माँ
तू स्वर की देवी ये संगीत तुझ से,
हर शब्द तेरा है हर गीत तुझ से,
हम है अकेले, हम है अधूरे
तेरी शरण हम हमें प्यार दे माँ
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ…
मुनियों ने समझी, गुनियों ने जानी,
वेदों की भाषा, पुराणों की बानी,
हम भी तो समझे, हम भी तो जाने,
विद्या का हमको अधिकार दे माँ
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ…
तू श्वेत वर्णी कमल पे विराजे,
हाथों में वीणा, मुकुट सर पे साझे,
मन से हमारे मिटाके अंधेरे,
हमको उजालों का संसार दे माँ
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ…
चित्र स्त्रोत- गूगल।

ब्रह्मा ने अपनी ही पुत्री सरस्वती से शादी क्यों की

सरस्वती केवल स्त्री वाचक नहीं है ज्ञान वाचक भी है ज्ञान की देवी से शादी की ब्रह्मा जी ने अर्थात समस्त ज्ञान को स्वीकार किया क्योंकि उन्होंने ही उत्पन्न किया सरस्वती रूपी ज्ञान को भागवत पुराण में वर्णन है मरीचि के 6 पुत्र ब्रह्मा जी की इस स्थिति पर हंसे थे जिसके कारण उन्हें राक्षस बनना पड़ा क्योंकि वह ठीक से समझे नहीं थे

मां सरस्वती को कैसे प्रसन्न करें?

वसंत पंचमी के आगमन पर, सही समय पर उठें, अपने घर, पूजा क्षेत्र को साफ करें, और सरस्वती पूजा के रीति-रिवाजों को निभाने के लिए स्क्रब करें। चूंकि पीला सरस्वती देवी की सबसे प्रिय छाया है, इसलिए स्क्रब करने से पहले अपने शरीर पर हर जगह नीम और हल्दी का गोंद लगाएं।
स्नान के बाद पीले रंग के वस्त्र धारण करें। निम्नलिखित चरण में पूजा चरण / क्षेत्र में सरस्वती प्रतीक स्थापित करना है। एक बेदाग सफेद/पीली सामग्री लें और इसे टेबल/स्टूल जैसी उठी हुई अवस्था पर रखें।
इसके बाद से बीच में मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करें। देवी सरस्वती के साथ, आपको भगवान गणेश का प्रतीक भी पास में रखना होगा। आप इसी तरह अपनी किताबें/स्क्रैच पैड/संगीत वाद्ययंत्र/या कुछ अन्य कल्पनाशील शिल्प कौशल घटक को आइकन के करीब रख सकते हैं।
उस समय, एक थाली लें और उसमें हल्दी, कुमकुम, चावल, फूल के साथ सुधार करें और सरस्वती और गणेश को उनके दान की तलाश के लिए अर्पित करें। चिह्नों के सामने थोड़ी सी रोशनी/अगरबत्ती जलाएं, अपनी आंखें बंद करें, अपने हाथ की हथेलियों को मिलाएं और सरस्वती पूजा मंत्र और आरती पर चर्चा करें। पूजा के रीति-रिवाज समाप्त होने के बाद, प्रसाद को प्रियजनों के बीच साझा करें।

देवी सरस्वती किसकी पुत्री है ?

हमारे सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मदेव माता सरस्वती के पिता थे। सरस्वती पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मदेव ने सृष्टि का निर्माण करने के बाद अपने वीर्य से सरस्वती जी को जन्म दिया था। इनकी कोई माता नहीं है इसलिए यह ब्रह्मा जी की पुत्री के रूप में जानी जाती थी।
वहीं मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा के पांच सिर थे। जब उन्होंने सृष्टि की रचना की तो वह इस समस्त ब्रह्मांड में बिलकुल अकेले थे। ऐसे में उन्होंने अपने मुख से सरस्वती, सान्ध्य, ब्राह्मी को उत्पन्न किया

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प्रचंड काल भैरव Kaal Bhairav साधना - kaal bhairav sadhna ph

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प्रचंड काल भैरव Kaal Bhairav साधना – kaal bhairav sadhna  – धन धान्य, ऐश्वर्य, सुख सौरभ प्रदायक काल भैरव Kaal Bhairav साधना | जीवन में अभाव भी शत्रुवत् ही होते हैं, जो स्तम्भित कर देते हैं व्यक्ति के जीवन की सहज गति और प्रायः उसकी मति भी.. . आश्चर्य है। ऐसे ‘शत्रुओं को समाप्त करने के लिए साधक क्यों नहीं सहायता लेते भगवान श्री भैरव की, जो अपने स्वरूप में प्रबल शत्रुहंता ही स्वीकृत किए गए हैं।

 

प्रस्तुत है काल भैरव Kaal Bhairav अष्टमी के पर्व पर भगवान भैरव की साधना से सम्बन्धित एक नवीन आयाम- त्येक साधना एवं साधना पद्धति की अपनी एक पृथक विशिष्टता होती है और उस विशिष्टता के साथ साधना स्वयं में सम्पूर्ण भी होती है, यह साधना जगत का एक महत्वपूर्ण तथ्य है। आज इस बात को उल्लिखित करना इस कारण प्र इस बात पर केंद्रित रहता है. कि कैसे उसके जीवन की किसी समस्या विशेष का समाधान शीघ्रातिशीघ्र हो सके।

आवश्यक हो गया है. क्योंकि न केवल साधना के मार्ग में प्रविष्ठ हुए साधकों के मन में वरन् इस मार्ग पर कई कई वर्ष तक चल चुके साधकों के मन में यह धारणा घर बन गई है, कि विशिष्ट साधनाएं केवल विशिष्ट लक्ष्यों की पूर्ति तक ही सीमित होती है। यद्यपि ऐसा करने में कोई दोष नहीं है।

 

प्रत्येक साधक से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वह पहले किसी साधना अथवा देवी-देवता के स्वरूप का तात्विक विवेचन कर ले तब साधना में प्रवृत्त हो किन्तु एक सम्पूर्ण दृष्टि की अपेक्षा तो की ही जा सकती है और इसका सर्वाधिक लाभ भी अन्ततोगत्वा किसी साधक को ही तो मिलता है।

इस विचार-विमर्श के क्रम में यदि भगवती बगलामुखी संहार की देवी (या साधना) है, लक्ष्मी केवल धन सम्पत्ति देने की एक हेतु हैं, दुर्गा दुष्टों का संहार करने का एक उपाय भर हैं इसी प्रकार से अन्य देवी-देवताओं अथवा साधनाओं के भी निश्चित अर्थ सुस्थापित हो चुके हैं।

साधना एक व्यवसायिक विषय वस्तु नहीं होती है कि मुंह मांगा दाम देकर अपनी मनोवांछित वस्तु को प्राप्त कर लिया जाए। किसी भी साधना को पहले अपने रोम-रोम में समाहित करना होता है तभी उस साधना से सम्बन्धित मंत्र जप को सम्पन्न करने का कोई अर्थ होता है और यह क्रिया किसी अन्य युक्ति से नहीं वरन् सम्भव होती है तो केवल ज्ञान के माध्यम से, तात्विक विवेचन के माध्यम से।

यह सत्य है, कि विशिष्ट साधनाएं विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक होती हैं किन्तु है अन्ततोगत्वा एक अर्चसत्य ही | और अर्धसत्य सदैव किसी झूठ से भी अधिक भ्रमित करने वाला होता है। पत्रिका में कोई साधना विधि प्रस्तुत करने से पूर्व उसकी संक्षिप्त व्याख्या करने के पीछे यही मंतव्य होता है।

साधनाओं अथवा देवी-देवताओं को उनके विशिष्ट स्वरूप से कुछ अलग हटकर एक सम्पूर्ण दृष्टि से देखने की शैली या तो विकसित नहीं हुई अथवा साधकों के पास जीवन की व्यस्तता में इतना अवकाश नहीं रहा, कि वे इस विषय पर चिंतन कर सके क्योंकि इस तीव्र युग में साधक का ध्यान साधना से भी अधिक जैसा कि प्रारम्भ में कहा कि प्रत्येक साधना यद्यपि स्वयं में किसी एक विषय तक ही केंद्रित प्रतीत होती है

किन्तु वही साधना स्वयं में एक सम्पूर्ण साधना भी होती है, इसका भी अर्थ केवल इतना ही है कि साधना कोई भी क्यों न हो, यदि साधक की अन्तर्भावना उसमें रच पच जाती है तो न केवल उसके तात्कालिक उद्देश्यों की पूर्ति सम्भव होती है वरन वह उसी साधना के माध्यम से विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभूतियों एवं चैतन्यता को प्राप्त करने में भी समम होने लग जाता है।

यह कदापि महत्वपूर्ण नहीं है कि किस साधक के इष्ट कौन है, क्योंकि कोई भी देवी या देव न तो छोटे होते हैं न बड़े न कोई देवी या देवता) न्यून होते हैं और न कोई उच्च, यदि साधक के पास एक सम्पूर्ण दृष्टि हो। अंतर तो केवल साधक के लक्ष्यों से पड़ता है, जिस प्रकार से आज भैरव को केवल एक भीषण देव मानने से उनको छविजनमानस में प्रायः एक विकृत देव के रूप में स्थिर हो गई है,

किन्तु भगवान भैरव का परिचय इस रूप में प्रस्तुत होना एक प्रकार की अपूर्णता ही है। यह सत्य है, कि जीवन की भीषणताओं को समाप्त करने में भगवान भैरव की साधना के समकक्ष कोई साधना नहीं प्रतीत होती. शत्रुहंता स्वरूप में उनकी सिद्धि प्राप्त करना वास्तव में जीवन का सौभाग्य ही होता है. श्मशान साधनाओं एवं उग्र साधनाओं में पूर्णता उनकी प्रसन्नता के बिना मिलना कठिन ही नहीं असम्भव भी होता है किन्तु इसके पश्चात् भी मानों भगवान भैरव का चित्र पूर्ण नहीं होता है।

भैरव साधना का एक गोपनीय पक्ष यह भी है, कि जहां वे एक उग्र देव हैं वहीं अन्तर्मन से पूर्ण शांत व चैतन्य देव भी हैं जिनकी यथेष्ट रूप में उचित साधना विधि से उपासना करने पर यह सम्भव ही नहीं है कि उनके साधक के जीवन में किसी प्रकार का भौतिक अभाव रह जाए।

इसी तथ्य का और अधिक गूढ़ विवेचन यह है कि जहां जीवन में सुख समृद्धि का आगमन किसी तेजस्वी साधना के माध्यम से सम्भव होता है वहां, वह अन्य साधनाओं की अपेक्षा कहीं अधिक स्थायी, आभायुक्त एवं जीवन में निश्चित रूप से सुखद परिवर्तनकारी होती है।

इतिभैरवः’ (अर्थात् जो शत्रुओं को भयभीत करने वाले हैं वे भैरव है) ही नहीं वरन् बिभर्ति जगदिति भैरवः’ (अर्थात् जो समस्त जगत का भरण पोषण करने वाले हैं. वे भैरव है) भी है। यह बात और है कि उनको १ जनसमान्य में छवि एक गोषण देव के रूप में ही सुस्थापित हुई। जब समाज किसी तेजस्विता को सहन नहीं कर पाता है तो यही क्रिया होती है।

जब विवेचन का क्रम स्तम्भित हो जाता है तो एक प्रकार का भोंडापन उपन आता ही है और इन सभी बातों के मूल में जो त्रुटि होती है, वह अपना ध्यान केवल लक्ष्य की पूर्ति तक केंद्रित रखने के कारण ही होती है। इसके उपरांत भी इस सत्य से तो कोई इन्कार नहीं।

कर सकता, कि जीवन में भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति करना, भौतिक बाधाओं को दूर करना जीवन का प्रथम एवं अत्यावश्यक सोपान होता है जिसके अभाव में चित्त स्थिर हो ही नहीं सकता। साधक का चित्त नहां विभिन्न भौतिक बाधाओं की समाप्ति से सुस्थिर हो सके वहीं उसके जीवन में एक तेजस्विता का भी समावेश हो सके और वही बात पूर्णतया सत्य है भगवान भैरव के किसी भी स्वरूप से सम्बन्धित साधना में भी।

भगवान श्री भैरव की व्याख्या केवल ‘बिभेति शत्रून साधक अथवा गृहस्थ साधक द्वारा अवश्यमेव प्रयोग में लाने योग्य है। इस विधि की विशिष्टता है, कि जहां एक ओर से यह दुर्बलता, हीनता आदि की स्थितियों को समाप्त करने की साधना है वहीं दूसरी ओर से पूर्ण मौतिक समृद्धिदायक साधना भी है।

प्रचंड काल भैरव Kaal Bhairav साधना  विधि – kaal bhairav sadhna

प्रचंड काल भैरव साधना - kaal bhairav sadhna
प्रचंड काल भैरव Kaal Bhairav साधना – kaal bhairav sadhna

इसे सम्पन्न करने के इच्छुक साधक को चाहिए कि वह समय रहते ‘भैरव यंत्र’ व ‘भैरव माला’ को प्राप्त कर  ( या किसी भी रविवार की रात्रि में दस बजे के आसपास काले वस्त्र पहन साधना में प्रवृत्त हो। दक्षिण दिशा की ओर मुख कर बैठना आवश्यक है। यंत्र व माला का सामान्य पूजन कर एक तेल का बड़ा सा दीपक जलाएं और उसकी निम्न मंत्र से अभ्यर्थना करें

ॐ ह्रीं ऐं श्रीं क्लीं ऐं ह्रीं श्रीं सर्वज्ञान प्रचण्ड पराक्रमाव बटुकाब इमं दीपं ग्रहाण सर्वकार्याणि साध्य साधव, कुष्टान नाशव नाराय, त्रासव आा सर्वतोम रक्षां कुरु कुरु हुं फट् स्वाहा ।

इसके पश्चात् अक्षत, कुंकुम, पुष्प व जल हाथ में लेकर दीपक का समक्ष छोड़ निम्न मंत्र उच्चरित करें – गृहाण दीपं देवेश, बटुकेश महाप्रभो, ममाभीष्टं कुरु विप्रमापदभ्यो समुदर फिर निम्न मंत्रोच्चारण के साथ दीपक को प्रणाम करें- भो बटुक / मम् सम्मुखोभव, मम कार्य करु करु इच्छितं देहि देहि मम सर्व विध्नान् नाशय नाशय स्वाहा । अपने मन की इच्छाओं व उनमें आ रही बाधाओं का उच्चारण कर (अथवा मन ही मन उनका स्मरण कर साथ ही भगवान भैरव से उनकी पूर्ति की प्रार्थना कर भैरव माला से निम्न मंत्र की २१ माला मंत्र जप को सम्पन्न करें। यदि सम्भव हो तो यह मंत्र जप दीपक की लौ पर ध्यान केंद्रित करते हुए ही करें मंत्र ॥

काल भैरव Kaal Bhairav सिद्धि मंत्र 

ॐ ह्री काल भैरव Kaal Bhairavाय ही नमः ॥ Om Hreem Kaul Bheiravany Freem Namah

मंत्र जप के पश्चात् पुनः दीपक के सम्मुख निम्न मंत्र का उच्चारण करें श्री भैरव नमस्तुभ्यं सत्वरं कार्य साधक उत्सर्जयामि ते दीप जायस्व मबसाजरात मंत्राणाक्षर होनेन पुष्पेण विकले नवर पूजितोऽसि मवावेद / तत्क्षमस्व मम प्रमो ध्यान रखें कि दीपक को बुझाना नहीं है अपितु वह जब तक जले उसे जलने देता है।

दूसरे दिन सभी साधना सामग्रियों को नदी में विसर्जित कर दें। जीविकोपार्जन के क्षेत्र में आ रही बाधाओं को समाप्त करने के लिए यह एक अनुभव सिद्ध साधना है।

आवश्यकता होती है, तो केवल एक सम्पूर्ण दृष्टि की और यही बात कही जा सकती है भगवान भैरव के प्रति प्रचलित मान्यताओं के प्रति भी… भगवान शिव की ही भांति मगवान भैरव का स्वरूप भी शता से प्रसन्न होने वाला माना गया है। आवश्यकता है इस बात की कि साधक को भैरव साधना में आने वाले चरणों का विशेष रूप से ज्ञान हो ।

प्रत्येक साधना का एक गुन सूत्र होता है या यूं कह सकते हैं कि key point होता है जिसके अभाव में भले ही कितने खमंत्र जप क्यों न सम्पन्न कर लिए जाएं, सफलता पूर्णरूपेण मिल पाती है।

यह key point प्रत्येक साधना की अन्तर्भावना परिवर्तित होने वाला तत्व होता है अर्थात यह आवश्यक कि जो बात एक साधना के विषय में सत्य हो वहीं प्रत्येक के लिए अंतिम रूप से सत्य हो तथा इसका निर्धारण तर्क के आधीन न होकर भाव के हो आधीन होता है।

काल भैरव Kaal Bhairav का स्वरूप भी किसी तर्क का आधीन होकर के आधीन आने वाला विषय होता है। साधक सामान्यतः काल भैरव Kaal Bhairav संज्ञा से किसी भीषण आकृति की कल्पना कर लेते और यदि तत्सम्बन्धित साधना में प्रवृत्त होते भी हैं, तो एक मिश्रित जुगुप्सा के साथ उनका ऐसा भाव रखना ही साधक के लिए सर्वाधिक न्यून हो जाता है।

वस्तुतः काल भैरव Kaal Bhairav का अर्थ है, जो काल चक्र में पड़े हुए (साधक) को अपनी चेतन्यता से मुक्त कर श्रेयस्कर मार्ग की ओर प्रवर्तित कर दें और निश्चय ही ऐसे देव का पूजन, साधना अत्यन्त आह्नाव के साथ सम्पन्न की जानी चाहिए।

यूं इन पंक्तियों में भले ही कितना कुछ क्यों न वर्णित कर दिया जाए, कि काल भैरव Kaal Bhairav की साधना से जीवन में क्या क्या होते हैं, वह तब तक फलप्रद हो ही नहीं सकेगा जब तक मक काल भैरव Kaal Bhairav के प्रति एक सश्रद्धाभाव को अपने मन में स्थान नहीं देगा. उनसे सम्बन्धित साधना विधि को प्रयोग में पूर्ण एकाग्रता से नहीं लाएगा |

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Bajrang Baan बजरंग बाण पाठ की साधना ph.85280 57364

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Bajrang Baan बजरंग बाण पाठ की साधना

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Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना
Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना

 

Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना बजरंग बली श्री हनुमान की कृपा से सभी जन कभी न कभी परेशान  होते ही हैं। श्री हनुमान अपने भक्तपर,अपने साधक पर जितनी सरलता से कृपा दृष्टि करते हैं, उतनी ही सरल है उनकी साधना विधि भी कोई भी साधक सिर्फ हनुमान पाठ कर ले अथवा यर्दि थोड़ा ज्यादा कठिनाई का समय आए, तो बजरंगबाण का नियमानुसार पाठ करे, तो शीघ्र ही समस्या का समाधान प्राप्त होने लगता है।

यादि बजरंग बाण Bajrang Baan Bajrang Baan  का नियमानुसार जप किया जाए और प्रद्धापूर्वक बजरंग बली की उपासना की जाए, तो मन को शांति तो प्राप्त होती बा है, इन्द्र इच्छा शक्ति भी अप्रत्याशित गति से बढ़ती है, और दृढ़ इच्छा शक्ति से कठिनतम् कार्य भी आसान हो जाते हैं, यह मेरा अटल विश्वास है, क्योंकि इससे मैंने अनेक लोगों को लाभ प्राप्त करते देखा है। सर्व प्रथम बजरंगबाण Bajrang Baan की विधि व सम्बन्धित जप प्रस्तुत है तथा इसके बाद बजरंग बाण Bajrang Baan दिया जा रहा है। –

 

Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan  साधना विधि

Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना
Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना

 

Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan  साधना विधि  – अपने पूजा कक्ष में हनुमानजी की मूर्ति अथवा चित्ररखें फिर स्नान के बाद चंदन, पुश्य, धूप अगरबती, नैवेद्य आदि से मेरा अनुभव तो या कहता है, कि तीन दिनों पश्चात् टी पूजन करें, इसके बाद श्री हनुमानजी को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते ऐसा लगने लगता है, मानों अन्तर्मन में अद्भुत शक्ति का सञ्चार हुए

निम्न स्तुति करें- होने लगा है। द इच्छा शक्ति बढ़ने लगती है। अतुलित बलधामं हेम शेलार दे। दसवें न्यारहवें दिन से भय, शोक जैसी मन: स्थितियां बबुजवन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।। समान होने लगती है, गन सेवा भाव और आनन्नातिरेक से सकल गुण निधानं वानराणामधीशं। उल्लसित रहने लगता है रघुपति प्रिय मतं वात पार नमामि ।।

अद्धापूर्वक विश्वास के साथ कोई भी व्यक्ति इसे अपने इसके बाद उपर्युक बजरंग बाण Bajrang Baan का प्रेम पूर्वक पाठ करें उपयोग में ला सकता है। अन्त में एक बात और स्पष्ट कर देना प्रतिदिन एक ही बार पाठ करना पर्याप्त है, आप मै जितनी अधिक चाहता, स्त्रियां भी इसका प्रयोग कर सकती हैं, केवलरजस्वला प्रजा होगी, उतनी ही जल्दी लाभ भी नजर आयेगा। काल में और सनक काल में उनके लिश्यह वर्जित है। बजरंग बाण Bajrang Baan पीडीएफ

हनुमान की भांति सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला हनुमत प्रयोग हनुमान का एक बंदर की तरह मुंह है, एक पूंछ है, यह मात्र एक कल्पना है। ‘वानर एक जाति थी उस समय, जिस प्रकार से हमारी जाह्मण जाति है, क्षत्रिय जाति है. वैश्य जाति है, इसी प्रकार से बानर जाति थी | यह तो हमने बानर का तात्पर्य बंदर समझ लिया और पूंछ पीछे लगा दी. जबकि न तो उनके पूंछ थी और न ही कोई पूंछ की भावना बी |

महाभारत युद्ध में अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा- मैं विजयी होना चाहता हूं, मैं क्या का? श्रीकृष्ण ने कहा-ध्वजा पर हनुमान का स्थापन कर दो। उस समय कृष्ण एक ही लाइन बोलते हैं, कि अगर तुम्हें विजय प्राप्त करनी है. तो ध्वजा पर हनुमान का स्थापन कर दो, जिससे कि प्रत्येक क्षण मान तुम्हारी आँखों के सामने रहें। और शास्त्र साक्षी है, कि हनुमान को कभी असफलता का मुंह नहीं देखना पड़ा।

सौ योजन के समुद्र को छलांग लगाते समय यह नहीं सोचा, कि समुद्र में जब जाउंगा या बगा। माता सीना को खोजने लंका अकेले पहुंच गए, और पूंछ में आग लगाकर लंका दान की, नब भी उन्हें अपनी जान का खतरा नहीं लगा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि प्रत्येक क्षण उनके हृदय में अपने गुरु की छवि, ग़म की छवि बनी ही रहती थी, एक भीक्षण के लिए अपने प्रभु की छवि उनके हृदय से अलग होती ही नहीं थी और यही उनकी बिजय का रहस्य भी था |

हनुमान की भांति ही जीका में सर्वत्र विजय प्राप्ति के लिए, चाहे बहशत्रुओ पर हो या रोगों परया अभावों पर, निम्न मंत्र का एक महीने तक ‘बजरंगयंत्र के समक्ष लाल हकीक माला से नित्यएकमाला सम्पन्न करने सेइच्छा की पूर्ति होती है ॥ नमो हनुमते रुद्रावताराब सर्वशत्रुसंडारणाय सर्वरोषहराव सर्ववशीकरणाय समवृतरथ स्वाहा ।।  प्राचीन बजरंग बाण Bajrang Baan link

बजरंग बाण Bajrang Baan के चमत्कार  और बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ के लाभ

 

बजरंग बाण Bajrang Baan के चमत्कार   यह एक बहुत ही सुंदर पृष्ठ है। संत शिरोमणि तुलसीदास जी द्वारा रचित बजरंग बाण Bajrang Baan बहुत शक्तिशाली, दिव्य और अदम्य है। महात्मा तुलसीदास जी ने अपने जीवन में मंगलमूर्ति हनुमान जी का कई बार साक्षात्कार करने वाले पवन सुत के गुणों का वर्णन करते हुए इस प्रभावशाली बजरंग बाण Bajrang Baan की अद्भुत चमत्कारी रचना की है।यह एक ऐसा दिव्य मंत्र है जिसमें महाबली शक्ति हनुमान जी की सिद्धि संकटों पर सटीक लक्ष्य लेती है, संकट दूर होते हैं।

इस बजरंग बाण Bajrang Baan के हर शब्द में अद्वितीय शक्ति निहित है। मनोविज्ञान के सिद्धांत के अनुसार मनुष्य जिन विचारों को बार-बार पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ दोहराता है, वह उसकी आदत और स्वभाव हमेशा के लिए बन जाता है। बजरंग बाण Bajrang Baan में पूर्ण श्रद्धा रखने और श्रद्धापूर्वक उसे बार-बार दोहराने से हनुमान जी की शक्तियां हमारे मन में जमा होने लगती हैं। इससे कम समय में ही सारे संकट दूर हो जाते हैं। बजरंग बाण Bajrang Baan हिंदी में विस्तार से अर्थ सहित     

बजरंग बाण Bajrang Baan मंत्र

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीसा।। सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दुत धरू मारू धाई कै।।

 

हनुमान चालीसा बजरंग बाण Bajrang Baan हनुमान अष्टक

 

हनुमान चालीसा

 

 

बजरंग बाण Bajrang Baan
 
 
हनुमान बजरंग बाण Bajrang Baan (Hanuman Bajrang Baan)

दोहा

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।

तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।

चौपाई

जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।

जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।

जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।

आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।

जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा।।

बाग उजारि सिन्धु मंह बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा।।

अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा।।

लाह समान लंक जरि गई। जै जै धुनि सुर पुर में भई।।

अब विलंब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी।।

जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होई दुख करहु निपाता।।

जै गिरधर जै जै सुख सागर। सुर समूह समरथ भट नागर।।

ॐ हनु-हनु-हनु हनुमंत हठीले। वैरहिं मारू बज्र सम कीलै।।

गदा बज्र तै बैरिहीं मारौ। महाराज निज दास उबारों।।

सुनि हंकार हुंकार दै धावो। बज्र गदा हनि विलम्ब न लावो।।

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीसा।।

सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दुत धरू मारू धाई कै।।

जै हनुमन्त अनन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।

पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत है दास तुम्हारा।।

वन उपवन जल-थल गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।

पाँय परौं कर जोरि मनावौं। अपने काज लागि गुण गावौं।।

जै अंजनी कुमार बलवन्ता। शंकर स्वयं वीर हनुमंता।।

बदन कराल दनुज कुल घालक। भूत पिशाच प्रेत उर शालक।।

भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल वीर मारी मर।।

इन्हहिं मारू, तोंहि शमथ रामकी। राखु नाथ मर्याद नाम की।।

जनक सुता पति दास कहाओ। ताकी शपथ विलम्ब न लाओ।।

जय जय जय ध्वनि होत अकाशा। सुमिरत होत सुसह दुःख नाशा।।

उठु-उठु चल तोहि राम दुहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई।।

ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।

ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।।

अपने जन को कस न उबारौ। सुमिरत होत आनन्द हमारौ।।

ताते विनती करौं पुकारी। हरहु सकल दुःख विपति हमारी।।

ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा। कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।

हे बजरंग, बाण सम धावौ। मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ।।

हे कपिराज काज कब ऐहौ। अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।।

जन की लाज जात ऐहि बारा। धावहु हे कपि पवन कुमारा।।

जयति जयति जै जै हनुमाना। जयति जयति गुण ज्ञान निधाना।।

जयति जयति जै जै कपिराई। जयति जयति जै जै सुखदाई।।

जयति जयति जै राम पियारे। जयति जयति जै सिया दुलारे।।

जयति जयति मुद मंगलदाता। जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।।

ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा। पावत पार नहीं लवलेषा।।

राम रूप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना।।

विधि शारदा सहित दिनराती। गावत कपि के गुन बहु भाँति।।

तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखउं विधि नाना।।

यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई।।

सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे।।

एहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करै लहै सुख ढेरी।।

याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत बाण तुल्य बनवाना।।

मेटत आए दुःख क्षण माहिं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं।।

पाठ करै बजरंग बाण Bajrang Baan की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।

डीठ, मूठ, टोनादिक नासै। परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासे।।

भैरवादि सुर करै मिताई। आयुस मानि करै सेवकाई।।

प्रण कर पाठ करें मन लाई। अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई।।

आवृत ग्यारह प्रतिदिन जापै। ताकी छाँह काल नहिं चापै।।

दै गूगुल की धूप हमेशा। करै पाठ तन मिटै कलेषा।।

यह बजरंग बाण Bajrang Baan जेहि मारे। ताहि कहौ फिर कौन उबारे।।

शत्रु समूह मिटै सब आपै। देखत ताहि सुरासुर काँपै।।

तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई। रहै सदा कपिराज सहाई।।

दोहा

प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरैं उर ध्यान।।

तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।

 
 
हनुमान अष्टक
 
 

॥ हनुमानाष्टक ॥
बाल समय रवि भक्षी लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो ।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥

बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो ।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥

अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।
हेरी थके तट सिन्धु सबे तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥

रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कही सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मरो ।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥

बान लाग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सूत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।
आनि सजीवन हाथ दिए तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥

रावन जुध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो I
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥

बंधू समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिन्हीं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।
जाये सहाए भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥

काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो ।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होए हमारो ॥ ८ ॥

॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे,
अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन,
जय जय जय कपि सूर ॥

 
 
प्रश्न  बजरंग बाण Bajrang Baan क्यों नहीं पढ़ना चाहिए?
 
 
बजरंग बाण Bajrang Baan क्यों नहीं पढ़ना चाहिए उन लोगो को नहीं पढ़ना चाहिए जो मास मछली खाते है या पर स्त्री के साथ भोग करते है!
 
 
प्रश्न  बजरंग बाण Bajrang Baan कब पढ़ना चाहिए?
 
१२से २.३० बजे के बीच में  बजरंग बाण Bajrang Baan कब पढ़ना चाहिए
 
 
प्रश्न  बजरंग बाण Bajrang Baan का पाठ कौन सा है?
 

जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।

जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।

जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।

 
प्रश्न  बजरंग बाण Bajrang Baan का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
 

कोई गिनती नहीं कितनी बार भी

 
प्रश्न  बजरंग बाण Bajrang Baan का पाठ करने से क्या फल मिलता है?