Day: January 27, 2022

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां – Main Nadis of Kundalini

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां - Main Nadis of Kundalini

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां – Main Nadis of Kundalini

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां - Main Nadis of Kundalini
कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां – Main Nadis of Kundalini

 

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां – Main Nadis of Kundalini  नाड़ियां एवं कुण्डलिनी प्राणवाहक प्रमुख नाड़ियां मनुष्य के शरीर में 72000 नाड़ियों का होना माना गया है। बहुत से ग्रन्थों में असंख्य नाड़ियों का भी जिक्र आता है। (जब संख्या बहुत अधिक हो, तो उसकी महत्ता को दर्शाने के लिए भी असंख्य कह दिया जाता है।

अत: यह कोई ऐसा विरोधाभास नहीं है)। इन नाड़ियों में 15 प्राणवाहक नाड़ियों को प्रमुख माना गया है। इन पन्द्रह नाड़ियों को क्रमशः सुषुम्ना, इड़ा, पिंगला, गांधारी, हस्तजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, शूरा, कुहू, सरस्वती, वारुणी, अलम्बुषा, विश्वोदरी, चित्रा और शंखिनी नाम से जाना जाता है। इन पन्द्रह में से भी पहली तीन-सुषम्ना इड़ा व पिंगला का विशेष महत्त्व है।

योग विद्या तथा कुण्डलिनी जागरण के सम्बन्ध में भी यही तीन नाड़ियां विशेष महत्त्व की हैं। इन्हीं तीन नाड़ियों के लिए ‘त्रिवेणी’ शब्द का प्रयोग ग्रन्थों में हुआ है। मूलाधार से अलग होकर चलती ये तीनों नाड़ियां आज्ञा चक्र में मिलती हैं।

अत: मूलाधार को ‘मुक्त त्रिवेणी’ और आज्ञाचक्र को ‘युक्तत्रिवेणी’ कहा गया है। जैसा कि चक्र प्रकरण में बता आए हैं, ‘संगम’, ‘तीर्थराज’, ‘त्रिवेणी’ आदि शब्दों का मर्म वास्तव में क्या है। इसी ‘युक्तत्रिवेणी’ (आज्ञाचक्र ) को ‘त्रिकूट’ भी कहते हैं।

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां - Main Nadis of Kundalini
कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां – Main Nadis of Kundalini

कुछ विद्वान इसी को ‘चित्रकूट’ भी कहते हैं जहां राम सीता सहित वास करते हैं। यानि ब्रह्म और माया या प्रकृति व पुरुष साथ-साथ रहते हैं। बहरहाल…उपर्युक्त तथ्यों को इन तीनों नाड़ियों का महत्त्व सिद्ध करने के लिए पुनः दोहराया गया है।

इन तीन प्रमुख नाड़ियों में भी सुषुम्ना अति अधिक महत्त्व वाली है, क्योंकि कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर इसी नाड़ी में गति करती है। यह नाड़ी अति सूक्ष्म नली के समान गुदा के निकट से मेरुदण्ड से होती हुई ऊपर सहस्रार तक चली गई है।

इसके प्रारम्भ स्थान से ही इसकी बाएं ओर से इड़ा तथा दाईं ओर से पिंगला नाड़ी भी ऊपर गई है किन्तु ये दोनों नाड़ियां नथुनों पर आकर समाप्त हो जाती हैं।

(स्वर विज्ञान की दृष्टि से ये दोनों नाड़ियां महत्त्वपूर्ण हैं। प्राणायाम प्रकरण में स्वर विज्ञान’ की चर्चा करेंगे)। किन्तु सुषम्ना ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है। ये तीनों नाड़ियां आज्ञाचक्र पर मिलती हैं, अतः आज्ञाचक्र को ‘तीसरा नेत्र’ भी कहा गया है। सुषुम्ना नाड़ी स्वयं में एक अति सूक्ष्म नली के समान है। इस नली (सुषुम्ना) के भीतर एक और अत्यंत सूक्ष्म नली के समान नाड़ी है जो ‘वज्र नाड़ी’ कही गई है।

‘वज्र’ नाड़ी में भी एक और नाड़ी जो ‘वज्रनाड़ी’ से भी सूक्ष्मतर है, गुजरती है जो ‘चित्रणी’ नाड़ी के नाम से जानी जाती है। ‘चित्रणी’ नाड़ी के भीतर से भी मकड़ी के जाले से भी सूक्ष्म ‘ब्रह्मनाड़ी’ गुजरती है। यही कुण्डलिनी शक्ति का वास्तविक मार्ग है। इन अति सूक्ष्म माड़ियों का ज्ञान योगियों को ही सम्भव है। आधुनिक विज्ञान इस विषय में पंगु व दीन है।

ये नाड़ियां सत्त्व प्रधान, प्रकाशमय व अद्भुत शक्तियों वाली हैं तथा सूक्ष्म शरीर व सूक्ष्म प्राण का स्थान है। . PRIL CID इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना नाड़ियों की स्थिति ये सभी नाड़ियां मेरुदण्ड से सम्बन्धित हैं।

जिन विशेष स्थानों पर अन्य नाड़ियां इनसे मिलती हैं वे ‘जंक्शन’ ही चक्र कहे जाते हैं जो कि शरीरस्थ ‘पॉवर स्टेशन’ हैं, जैसा कि पहले बता आए हैं क्योंकि सबका सम्बन्ध मेरुदण्ड से है और सुषुम्ना नाड़ी मेरुदंड के भीतर से गुजरती है। सुषुम्ना के भीतर से वज्र, वज्र के भीतर से चित्रणी और चित्रणी के भीतर से ब्रह्मनाड़ी गुज़रती है।

यह ब्रह्मनाड़ी कुण्डलिनी शक्ति के प्रवाह का मार्ग है इस तथ्य से पाठक सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि कुण्डलिनी के जागरण व संचालन में मेरुदण्ड का सीधा रखना कितना अधिक आवश्यक है।

सीधे मेरुदण्ड में ही इन समस्त नाड़ियों के सीधे व तने रहने से कुण्डलिनी शक्ति का प्रवाह सरलता, सुगमता व सहजता से निरावरोध हो सकता है। मेरुदण्ड का झुके रहना प्रवाह मार्ग की सरलता में अवरोधक सिद्ध होता है। पाठक जानते हैं कि दो बिन्दुओं को मिलाने वाली सबसे कम दूरी सरल रेखा होती है।

अत: मेरुदण्ड सीधा रखकर विधिवत् आसन पर बैठने से कुण्डलिनी अपेक्षाकृत सरलता से ही नहीं, बल्कि तीव्रता और शीघ्रता से अपनी यात्रा कर पाती है। इसके अलावा मूलबन्ध आदिबन्धों का लगा होना भी इस काल में आवश्यक होता है (इस विषय में हम कुण्डलिनी जागरण काल में रखी जाने वाली सावधानियों के अर्न्तगत आगे चर्चा करेंगे)

अन्यथा बहुत-सी हानियां सम्भावित होती हैं। अत: जैसा कि कुछ अल्पज्ञों का मत है कि जैसे मर्जी, जब मर्जी, जहां मर्जी बैठकर, लेटकर, खड़े होकर, अधलेटे होकर ध्यान करें और कुण्डलिनी को जागृत करें- यह ‘सहज योग’ है, यह सरासर भ्रामक, मिथ्या व अज्ञानपूर्ण है। अनुशासन, विधान तथा नियमों का बंधन न रहने से यह भले ही औसत बुद्धि वाले लोगों को सरल, सहज व सुखद मालूम पड़े किन्तु कल्याणकारक व सफलदायक नहीं हो सकता, यह निश्चित है। प्रबुद्ध पाठक समझ सकते हैं कि मालूम पड़ने और वास्तव में होने में बहुत अंतर होता है।

जिस समय श्मशान में लकड़ियां या धर्मकांटे पर ट्रकों में लदा माल तोला जाता है, तब एक-दो किलो इधर-उधर हो जाना कोई मायने नहीं रखता। किन्तु जब पंसारी की दुकान पर चीनी, दाल, चावल आदि तोला जाता है तब एक-दो किलो का अंतर बहुत मायने रखता है। अलबत्ता 5-10 ग्राम का अंतर तब कोई मायने नहीं रखता। लेकिन जब सुनार के पास सोना या जवाहरात तुलवाया जाता है, तब 5-10 ग्राम का अन्तर बहुत मायने रखता है। उस समय तो माशे, तोले, रत्ती का भी अन्तर मायने रखता है।

इसलिए उनकी तराजू बिल्कुल ‘एक्यूरेट’ व शीशे के बॉक्स में रहती है, ताकि हवा से भी ज़रा-सी न हिल जाए। दाल सब्जी बनाते समय, बर्तन में डाला गया पानी दो चार चम्मच कम ज्यादा हो जाए तो अन्तर नहीं पड़ता, किन्तु दवाई बनाते समय पानी उचित अनुपात से कम ज्यादा हो तो दिक्कत हो सकती है। इसके विपरीत प्रयोगशाला में परीक्षण के समय किसी रसायन या विलयन में कोई खतरनाक, घातक या अतिसंवेदनशील अम्ल मिलाते समय नियत अनुपात से बूंद भर भी इधर-उधर हो जाना किसी अप्रिय घटना को जन्म दे सकता है।

इसी प्रकार अन्य बहुत से उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनसे यह तथ्य साफ-साफ समझा जा सके कि जितनी माईन्यूट (सूक्ष्म) कैलकुलेशन (गणना) में हम जाएंगे, उतनी ही हमें एक्यूरेसी (प्रतिपन्नता)की आवश्यकता होती है। जैसे मर्जी, जब मर्जी, जहां मर्जी, जितना मर्जी का सिद्धांत वहां लागू नहीं हो सकता क्योंकि वह न सिर्फ हमें सही परिणाम पर नहीं पहुंचने देगा बल्कि हमारे व औरों के लिए घातक भी सिद्ध हो सकता है। रस्सी को लापरवाही से छुआ जा सकता है, बिजली के तार को नहीं और नंगे बिजली के तार को (जिस पर रबर का सुरक्षा खोल न चढ़ा हुआ हो) छूने के लिए तो और भी सावधानी दरकार होती है।

अतः सूक्ष्म किन्तु शक्तिशाली व चमत्कारी प्रभाव वाली उपलब्धियों को पाने के लिए वैसी ही सधी हुई, सही दिशा में, नियमपूर्वक, निरंतर मेहनत की ज़रूरत होती है। बिना निरंतर अभ्यास के, बिना सावधानी रखे, बिना नियमों का बंधन स्वीकार किए हम सुरक्षित रूप से साईकिल तक चलाना नहीं सीख सकते, कुण्डलिनी शक्ति चालन की बात तो बहुत दूर की बात है। जब ऊपर चढ़ना होता है, जब पतली रस्सी पर चलना होता है, तब आंखें खोलकर, पूरी सावधानी बरत कर और एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना होता है।

अभ्यास द्वारा दक्षता प्राप्त हो जाने के बाद फिर भले ही आंखें बंद भी रखें तो अन्तर नहीं पड़ता। हां, अगर नीचे गिरना चाहें और छत की मुंडेर ऊंची न हो, फिर भले ही आंखें बंद कर, जब मर्जी, जहां मर्जी, जैसे मर्जी व जितना मर्जी चलें बड़ी सहजता से नीचे आ गिरेंगे। अत: योग के नाम पर ‘सहजता’ का दुमछल्ला लगाने वाले ठगों से तो पाठकों को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए।

यद्यपि हम इस चर्चा में मूल विषय से भटक रहे हैं, तथापि पाठकों के मार्गदर्शन के लिए यह ज़रूरी समझ रहा हूं ताकि पाठक भ्रमित न हों, ठगें न जाएं और अन्त में असफलता हाथ आने पर योग विद्या को ही अनास्था की दृष्टि से न देखने लगें। गुरु बनने की योग्यता वाला योगी कभी दुकान खोलकर नहीं बैठता। जो दुकान खोलकर बैठा है वह तो व्यापारी है।

वह भला ज्ञान को, योग को क्या जाने? जो सामूहिक रूप से आए हुए दर्शनार्थियों पर एक साथ कुण्डलिनी जागरण कराने का सब्जबाग दिखाते हैं, जो सामूहिक ‘शक्तिपात की बात करते हैं, उनके बारे में संदेह होता है कि वे कुण्डलिनी जागरण या शक्तिपात का अर्थ भी समझते हैं या नहीं। कुण्डलिनी जागरण न हुआ, गोया मूंगफली बांटना हो गया। उससे भी अधिक अफसोस उन दर्शनार्थियों की बुद्धि व आस्था पर होता है, जो ऐसे धर्मगुरुओं के चक्कर में फंसकर वहां पहुंच जाते हैं, और उन लम्पटों के पैरों में नाक रगड़ना अपना सौभाग्य मानते हैं।

इसका एकमात्र कारण अज्ञान है। अत: सावधान । । मंजिल पे पहुंचना है तो मंजिल शनास बन। वरना ये रहनुमा तुझे दरदर फिराएंगे।

सुषुम्ना नाड़ी के चमत्कार ,सुषुम्ना नाड़ी जाग्रत कैसे करे ,14 नाड़ियाँ ,चंद्र नाड़ी क्या है ,सुषुम्ना नाड़ी कहां होती है,
नाड़ी योग,इड़ा नाड़ी क्या है,नाड़ी कितनी होती है,

आज्ञा चक्र सम्पूर्ण प्राचीन रहस्य agya chakra

आज्ञा चक्र सम्पूर्ण प्राचीन रहस्य agya chakra

 

आज्ञा चक्र सम्पूर्ण प्राचीन रहस्य agya chakra

आज्ञा चक्र सम्पूर्ण प्राचीन रहस्य agya chakra आज्ञा चक्र कुछ विद्वान इसे ‘अंजना चक्र’ भी कह देते हैं। इसका स्थान दोनों भृकुटियों के मध्य-नासिका की संधि के ऐन ऊपर है। यह योग विद्या में साधना की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण चक्र है। निराकार ब्रह्म का ध्यान व अन्तर्नाटक आदि इसी चक्र पर योगीजन किया करते हैं। शरीर के समस्त अवयवों तथा संस्थानों को आज्ञा गति नाद की भांति (सब ओर) आज्ञा चक्र का प्रसारण यहीं से होता है। इस चक्र तक पहुंचा हुआ योगी अधोगति को पुनः प्राप्त नहीं होता। इस चक्र का महत्त्व सिद्ध करने के लिए यही तथ्य काफी है कि इस चक्र का तत्त्वबीज मंत्र ॐ है, जो परमात्मा या ब्रह्म का प्रणव मंत्र है। क्योंकि यह अकार, उकार और मकार (अ+उ+म ) तीनों की शक्तियों का सम्मिलन है।

इन्हें ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश अथवा ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और संकल्प/इच्छा शक्ति कहा गया है। किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए इन्हीं तीन शक्तियों की अनिवार्यता होती है। हमें उस कर्म विशेष के विषय में ज्ञान हो, उस कर्म विशेष को करने/संपादन की सामर्थ्य हो और उस कर्म विशेष को करने की हमारी इच्छा/संकल्प हो तभी हम उस कर्म विशेष को कर सकते हैं।

क्योंकि यदि हममें करने की सामर्थ्य होगी पर ज्ञान नहीं तो भी हम उस कार्य विशेष को कर नहीं पाएंगे। यदि हमें उस कार्य विशेष का ज्ञान होगा किन्तु क्रिया की सामर्थ्य नहीं, तो भी हम उसे कर नहीं पाएंगे, किन्तु यदि हममें क्रिया और ज्ञान दोनों की सामर्थ्य, किसी कार्य विशेष के सम्बन्ध में हो तो भी हम उस कार्य को तब तक नहीं करेंगे जब तक हमें उस कार्य को करने की इच्छा न हो। कोई कार्य बिना संकल्प के सम्पन्न नहीं हो सकता। इस प्रकार ये तीन मूलशक्तियां किसी कार्य के सम्पादन में अथवा व्यवहार में अनिवार्य होती हैं।

अपने-अपने स्थान पर तीनों ही शक्तियों का महत्त्व है, तो भी संकल्पशक्ति शेष दोनों शक्तियों के एकत्रित होने के बावजूद संकल्प या इच्छा के अभाव में कार्य का सम्पादन नहीं होता। दोनों ही शक्तियां (ज्ञान व कर्म/क्रिया) अकेली होने पर तो व्यवहार में आती ही नहीं, मिलकर भी व्यवहार में तब तक नहीं आती जब तक उनमें संकल्प शक्ति न आ जुड़े। जबकि संकल्प शक्ति अकेली ही यदि बलवती और प्रचण्ड हो तो ज्ञान और क्रिया शक्ति को जुटा लेती है और कार्य सम्पन्न कर लेती है।

इसी संकल्पशक्ति के अधिष्ठाता भगवान शिव हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन शक्तियों के अभौतिक देवता हैं। क्योंकि सृष्टि के निर्माण कार्य में मूलत: ज्ञान की आवश्यकता होती है, जिसके अधिष्ठाता देव ब्रह्मा हैं। सृष्टि के संचालन, पोषण व विकास में मूलतः क्रिया आवश्यक होती है, जिसके अधिष्ठाता देव विष्णु हैं, और संहार या विध्वंस के लिए संकल्प की मूल आवश्यकता होती है, जिसके अधिष्ठाता देव शिव हैं।

अतः सृष्टि ब्रह्मा के, संचालन/पालन विष्णु के और संहार/लय शिव के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जहां, ज्ञान, क्रिया व संकल्प शक्ति के अभौतिक देव हैं, वहीं सूर्य, अग्नि और चन्द्र इन्हीं शक्तियों के भौतिक देव हैं जिन्हें हम इन्द्रियों द्वारा अनुभव कर सकते हैं। यहां यह भी ध्यान देना चाहिए कि संहार के देवता होने के कारण श्मशान में शिव प्रतिमा अवश्य स्थापित की जाती है। किन्तु यह ‘इकार’ की शक्ति (इच्छा शक्ति ) का ही प्रताप है जो ‘शव’ को भी कल्याणकारी ‘शिव’ में बदल देता है। सूर्य प्रकाश का स्रोत है। प्रकाश के अभाव में ज्ञान सम्भव नहीं है। अतः सूर्य को जगत् गुरु माना जाता है। अग्नि-ऊर्जा व ऊष्मा का स्रोत है। बिना ऊर्जा के कोई भी क्रिया नहीं हो सकती। क्रिया के लिए शक्ति, शक्ति के लिए ईंधन या ऊर्जा और कुण्डलिनी शक्ति कैसे जागृत करें-3 48ईंधन या ऊर्जा के लिए अग्नि आवश्यक होती है।

 

इसी प्रकार मन के अधिकारी देवता चन्द्रमा हैं। मन ही इच्छा या संकल्प कर सकता है। अत: संकल्पशक्ति के देवता चन्द्रमा ही माने गए हैं । समुद्रों का ज्वार-भाटा चन्द्रमा से नियन्त्रित है। स्त्रियों में रज की मासिक प्रवृत्ति चन्द्रमा से सम्बन्धित है। मानव के भावावेश तथा मन को चन्द्रमा प्रभावित व प्रवृत्त करता है। पूर्णिमा की रात और आमवस की रात में मनुष्य की मनोदशा में विशेष अन्तर पाया जाता है। अपराध शास्त्र के आंकड़ों के अनुसार के पूर्णिमा की रात में यौन सम्बन्ध अपराध विशेष रूप से अधिक घटित होते हैं। काव्य व साहित्य में चन्द्रमा, चांदनी, पूनम आदि का विशेष वर्णन चन्द्रमा से पड़ने वाले मानसिक प्रभाव को स्पष्ट रूप से परिलक्षित करते हैं। यहां तक कि चन्द्रमा की घटने बढ़ने की कला का सम्बन्ध भी बहुत से विद्वान इच्छा शक्ति से जोड़ते हैं।

शिव के मस्तक पर चन्द्रमा को सुशोभित दिखाने का एक प्रतीकात्म्क कारण यह भी है। बहरहाल। ॐ प्रणव मंत्र है जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश की एकता यानि परमब्रह्म/परमेश्वर का द्योतक है। (ENGLISH में परमात्मा के लिए प्रयुक्त शब्द GOD भी वास्तव में इन्हीं तीन शक्तियों का परिचायक है। GENERATOR, OPERATOR और DESTRUCTER यानि उत्पन्न करने वाला, संचालित करने वाला और विनष्ट करने वाला, और यही ॐ आज्ञा चक्र का बीज मंत्र है, इससे आज्ञा चक्र का महत्त्व स्पष्ट होता है। आज्ञाचक्र का यन्त्राकार लिंग के समान है, क्योंकि स्वयं इस चक्र को लिंगाकार माना गया है।

यह सफेद रंग से प्रकाशित दो दलों/पंखुड़ियों के कमल के समान है। (विज्ञान के अनुसार पिट्युटरि ग्लैण्ड और पायनियल ग्लैण्ड को इन दलों का संकेतक माना जा सकता है।) इन दलों पर हं और क्षं अक्षर/वर्ण हैं जो इस चक्र की कमलदल ध्वनि को प्रकट करते हैं। इस चक्र का तत्त्वबीज ॐ है। अतः ॐकार इसकी बीज ध्वनि है। पंच महाभूतों से परे और सूक्ष्म ‘मह’ तत्त्व का यह मुख्य स्थान है। इसका लोक ‘तपः’ है। इसके तत्त्व बीज़ की गति नाद के समान है अतः इस चक्र का बीज वाहन नाद है, जिस पर लिंगदेवता विराजते हैं। इस चक्र के अधिपति देवता ज्ञान दाता शिव अपनी षडानन और चतुर्हस्ता शक्ति ‘हाकिनी’ के साथ है। अतः इस चक्र की शक्ति देवी ‘हाकिनी’ हैं। विभिन्न चक्रों पर ध्यान करने से जो फल साधक को प्राप्त होते हैं, वे सभी दिव्य फल अकेले आज्ञा चक्र पर ही ध्यान करने से प्राप्त होते हैं। त्रिकालदर्शन, दिव्यदर्शन, दूरदर्शन तथा मन्त्र, शक्ति व ईश साक्षात्कार का स्थान भी यही है अतः इसे शिव का तीसरा नेत्र भी कहा गया है।

इसी स्थान पर मन व प्राण के स्थिर हो जाने पर सम्प्रज्ञात समाधि की योग्यता होती है। ‘दिव्यचक्षु’ यही आज्ञा चक्र है। इसका तेज सूर्य तथा चन्द्र के सम्मिलित तेज से भी प्रबल कहा गया है। इसी चक्र के दाएं व बाएं से क्रमश: गान्धारी व हस्तिनी नाड़ियां नेत्रों तक जाती हैं, जिनका कार्य नेत्रों को प्रकाश देना है। प्रकृति व पुरुष का, जड़ व चेतन का अथवा माया व ब्रह्म का यही संयोग स्थल है। इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना तीनों नाड़ियां यहां मिलती हैं अतः इसे ‘युक्तत्रिवेणी’ भी कहा जाता है।

 

यहीं से नेत्रों का प्रकाश बाहर भीतर के अंगों को देख सकता है। अतः इस चक्र पर ध्यान करने से वृत्तियां अन्तर्मुखी होती हैं । मन की चंचलता नष्ट होती है और भ्रान्ति दूर होकर आत्म तत्त्व में स्थिरता आती है। आज्ञा चक्र में ही गुरु की आज्ञा से शुद्ध ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है। रामायण आदि धर्म ग्रन्थों में वर्णित तीर्थराज’ (प्रयाग )जहां-गंगा, यमुना व सरस्वती का संगम होता है और जिसमें स्नान करके सारे पाप धुल जाते हैं, वह तीर्थराज वास्तव में यह आज्ञाचक्र ही है। क्योंकि यहीं इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना तीनों नाड़ियों का संगम होता है। इसी में स्नान करने (तन्मय होने) से मुक्ति होती है। जैसा कि ‘ज्ञान संकलिनि तंत्र’ में कहा भी गया है- इड़ा भागीरिथी गंगा पिंगला यमुना नदी। तयोर्मध्यगता नाड़ी सुषम्णाख्या सरस्वती॥ -(ज्ञान संकलिनि तंत्र) अर्थात् इड़ा गंगा और पिंगला यमुना नदी है। इन दोनों के मध्य से जाने वाली नाड़ी सुषम्ना को ही सरस्वती कहते हैं। (और आज्ञाचक्र पर ये तीनों नाड़ियां मिलती हैं)।

आज्ञा चक्र कमल की कर्णिका में ही मन का निवास कहा गया है। स्थूल बुद्धि वाले मनुष्य स्थूल हृदय को ही मन समझ लेते हैं। वास्तव में मन तो अतिसूक्ष्म है और एक अणुमात्र है। जैसा कि ‘चरक संहिता’ में मन को परिभाषित करते हुए महर्षि चरक ने कहा भी है-‘अणुत्वं चैकत्वं मनः’ (जो अणु है और एक है, वही मन है)। अकार, उकार व मकार की संयुक्तावस्था में ब्रह्मा, विष्णु व महेश की संयुक्तावस्था का प्रतीक आज्ञाचक्र का बीज मंत्र ॐ बिन्दु, शक्ति व नाद से युक्त है। इन्हीं से तीन शक्तियों-रौडी, ज्येष्ठा और वामा का उत्पन्न होना माना गया है।

इस प्रकार नाद शिव और शक्ति के संयोगावस्था का भी प्रतीक सिद्ध होता है। आज्ञा चक्र में ध्यान से-सर्वज्ञता, सर्वदर्शिता, परकाया प्रवेश, त्रिकालज्ञता तथा स्थिरप्रज्ञता की प्राप्ति समस्त सिद्धियों सहित होती है। साधक मन, कर्म व वचन से मन सहित समस्त इंद्रियां उसके वश में रहती हैं। सर्वज्ञ और तत्त्वदर्शी होने से उत्पादन, पालन व संहार में समर्थ हो जाता है। उसमें आनन्द, विकारहीनता तथा साक्षी भाव का उदय होता है तथा जन्मान्तरों के संस्कारों के समस्त मल व पाप कट कर शुद्धावस्था को प्राप्त होता है।

अतः इस रहस्यपूर्ण आज्ञाचक्र को भली भांति समझ लेना चाहिए। यह कुण्डलिनी यात्रा का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण व निर्णायक पड़ाव है। यद्यपि इसके आगे एक प्रमुख चक्र का भेद शेष रह जाता है, तथापि उस चक्र का भेदन करने में फिर विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं रह जाती, वहां स्वतः प्रवेश हो जाता है। इसीलिए आज्ञा चक्र तक पहुंचा हुआ योगी पुनः अधोगति को प्राप्त नहीं होता। उसकी इच्छा के विरुद्ध कुण्डलिनी वहां से वापस नहीं लौट पाती। इसके अलावा मनश्चक्र और बुद्धिचक्र इसी आज्ञाचक्र के दोनों दलों के संधि स्थल पर रहते हैं। षड्दलात्मक मनश्चक्र को ‘मनोनय कोष’ भी कहा जाता है।

इस संदर्भ में आगे मन सम्बन्धी प्रकरण में विस्तार से पढ़ेंगे। इसी आज्ञा चक्र में प्राण व मन को स्थिर करने से प्राप्त होने वाले दिव्यफल के विषय में कबीरदास जी ने ‘कबीर वाणी’ में अपने रहस्योत्पादक विशिष्ट अंदाज में कहा है कि- देह रूपी मकान के द्वार पर झरोखे बन्द करके मैंने प्राण रूपी चोर को पकड़ उसके भागने के समस्त मार्ग बन्द कर दिए। फिर हृदय की कुटिया में उसे बांधकर ॐ के कोड़े से उसे खूब पीटा-जिससे सहज नाद गूंज उठा। यह आज्ञा चक्र भेदना अत्यंत कठिन है इसलिए कबीर ने इसे ‘दसवें द्वारे ताला लागी’ कहा है।

यहीं आकर गुरु का महत्त्व पूर्णतः सिद्ध होता है, क्योंकि बिना गुरु की कृपा/आज्ञा से इस चक्र का ताला नहीं खुलता (इसमें प्रवेश नहीं होता)। तभी तो कबीरदास को कहना पड़ा- गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागू पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोबिंद दियो मिलाय।। यह आज्ञाचक्र प्रभु का साक्षात्कार स्थल है। गुरु की कृपा व अनुमति से इस चक्र में प्रवेश होता है, तभी ईश्वर साक्षात्कार होता है। इसलिए गुरु द्वारा गोबिन्द मिलने की बात कही है। इस संदर्भ में यदि आज्ञा चक्र को बैकुण्ठ का द्वार मान लें तो उचित ही होगा। ऐसा मानते ही पुराणों में वर्णित कथाओं का मर्म स्पष्ट हो जाएगा। बैकुण्ठ के द्वार पर वज्रकपाट लगे हैं। दो द्वारपाल वहां सतत पहरा देते हैं। बैकुण्ठ की सात ड्योढ़ियां हैं।

ब्रह्मा जी के सनकादि मानस पुत्र भागवत पुराण के अनुसार जब विष्णु दर्शन की इच्छा से बैकुण्ठ गए तो छ: ड्योढ़ी चढ़ जाने के बाद सातवीं पर चढ़ने से जय-विजय दोनों द्वारपालों ने उन्हें रोक लिया। यहां सातों ड्योढ़ियों, सात चक्रों की तथा बैकुण्ठद्वार आज्ञाचक्र का प्रतीक है और बैकुण्ठ के दोनों द्वारपाल इस चक्र के दो दलों के वर्ण ‘हं’ वर्ण के प्रतीक हैं। अभिप्राय यही है कि इस चक्र का भेदन ब्रह्माजी के मानस पुत्रों, योग विद्या में प्रवीण सनकादि ऋषियों के लिए भी कठिन है। फिर साधारण योगियों की तो बात ही क्या। इस प्रकार विभिन्न धर्मग्रन्थों में अन्यत्र भी इस प्रकार के कूट संकेत कथाओं के माध्यम से बिखेरे गए हैं।

जैसे वाल्मीकिय रामायण में नौ द्वारों व सात प्रकोष्ठों वाली अयोध्या नगरी का वर्णन जहां राजा दशरथ अपनी तीन रानियों के साथ रहते हैं-वास्तव में शरीर (नौ छिद्र और सात चक्र) में रहने वाले दसों इंद्रियों के राजा मन (दशरथ से सिद्ध होता है-दस घोड़ों का रथी या दसों दिशाओं में जाने वाला रथ-दोनों ही प्रकार से इसका आशय ‘मन’ ही सिद्ध होता है) का यह कूट संकेत है जिसकी तीन रानियां सात्त्विक, राजसिक व तामसिक बुद्धि ही हैं। मन और बुद्धि के संयोग से उत्पन्न होने वाली चेतना ही राम हैं। चेतना के अभाव में बुद्धि तो जड़ होकर रह सकती है। शरीर भी निष्क्रिय (कोमा में) होकर रह सकता है किन्तु मन नहीं । अतः राम के बनवास पर केवल दशरथ के ही प्राण छूटते हैं, अन्य किसी के नहीं। इसी प्रकार के बीसियों उदाहरण हैं जो रामायण या पुराणों में कथाओं के माध्यम से गुप्त संकेतों में पूरा योग-रहस्य समझाते हैं। सभी को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर पुस्तक के पृष्ठों का अतिक्रमण मूल विषय के साथ अन्याय होगा।

पाठकों को प्रेरित करने के लिए इतना दिशा-निर्देशन भी बहुत है कि वे धर्मग्रन्थों को मात्र कथाओं के रूप में न लें-उसमें छिपे मर्म को खोजें। योग या अध्यात्म जैसा गूढ, रहस्यपूर्ण व शुष्क विषय जन सामान्य या औसत बुद्धि के लोगों का भी कल्याण कर सके अत: उसे कथानक के रूप में जहां तहां पर प्रस्तुत किया गया है और यह निर्देश भी दिए गए हैं कि रामायण बराबर पढ़ें। पुराण बार-बार पढ़ें। बार-बार पढ़ने से ग्रन्थ समझ में आएगा। बार-बार का अभिप्राय यही है कि धीरे-धीरे अभ्यास व बुद्धि की रगड़ संस्कार भी दृढ़ करेगी और प्रकाश भी उत्पन्न करेगी। जब प्रकाश उत्पन्न होगा तो पाठक कथाओं में छिपे मर्म को शनैः शनैः पहचानने लगेगा। अस्तु ।

आज्ञा चक्र में आगरा आप को प्रकाश जैसा दिखाई  देता है।  यह ध्यान के समय दिखाई  देता है तो यह समझ लेना चाहिए के आप के चक्र को ऊर्जा प्रपात हो रही है आप का अभ्यास सही चल रहा  है ऐसा समझ सकते है।
 इस चक्र को जागृत करने के लेया आप को गुरु की आवश्यकता होगी जो आप का उचित मार्ग दर्शन करें।  इस के साथ ही आप को प्रणायाम  करनी की आवश्यकता होगी।
आज्ञा चक्र से वशीकरण भी संभव इस के लिए  आप को त्राटक साधना कर सकते है आज्ञा चक्र  को त्राटक खोलोता  साधक  को सम्मोहन  शक्ति प्रपात होती है
आज्ञा चक्र का बीज मंत्र ॐ है इस बीज मंत्र  से आज्ञा चक्र खुलता है
आज्ञा चक्र के अभ्यास के दिनों में चक्र में वेब्रेशन महसूस होती है और इस के इलावा और भी बहुत सारे  अनुभव होते  है।
आज्ञा चक्र के बहुत सारे  फायदा जैसे के साधक को अच्छे बुरे पता चल जाता है और साधक को भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी प्रपात हो जाती है साधक तिरकाल दर्शी बन जाता है
आज्ञा चक्र के  जागृत होने पर साधक को भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी प्रपात हो जाती है।  साधक किसी के भी मन की बात जान जाता है।

CATEGORIES

यह साधना भी पढ़े नीचे  दिए  गए लिंक से

प्राचीन चमत्कारी उच्छिष्ट गणपति शाबर साधना Uchchhishta Ganapati  Sadhna  PH. 85280 57364

रत्नमाला अप्सरा साधना – एक दिवसीय अप्सरा साधना ek divaseey apsara saadhana ph.85280 57364

नाथ पंथ की महागणपति प्रत्यक्षीकरण साधना भगवान गणेश के दर्शन के लिए ph.85280 57364

Pataal Bhairavi – पाताल भैरवी बंगाल का जादू की मंत्र साधना Pataal Bhairavi bangal ka jadu mantra

प्राचीन प्रत्यंगिरा साधना Pratyangira Sadhana Ph.85280 57364

kritya sadhana -प्राचीन तीक्ष्ण कृत्या साधना ph. 85280 57364

Hanuman Sadhana प्राचीन रहस्यमय हनुमान साधना विधि विधान सहित ph. 85280 57364

Sapneshwari sadhna – स्वप्नेश्वरी त्रिकाल दर्शन साधना Ph.85280 57364

Lakshmi Sadhna आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना Ph.8528057364

Narsingh Sadhna – भगवान प्राचीन नृसिंह साधना PH.8528057364

चमत्कारी वीर बेताल साधना – Veer Betal sadhna ph .8528057364

Panchanguli – काल ज्ञान देवी पंचांगुली रहस्य विस्तार सहित Ph. 85280 57364

Veer Bulaki Sadhna – प्राचीन रहस्यमय वीर बुलाकी साधना PH.85280 57364

चमत्कारी प्राचीन लोना चमारी साधना शाबर मंत्र lona chamari ph.85280 57364

sham Kaur Mohini माता श्याम कौर मोहिनी की साधना और इतिहास -ph.85280 57364

Masani Meldi माता मेलडी मसानी प्रत्यक्ष दर्शन साधना और रहस्य ph. 85280 57364

Lama Tibet Tantra लामा तिब्बत तंत्र का वशीकरण साधना

नाहर सिंह वीर परतक्षीकरण साधना nahar singh veer sadhana ph.85280 – 57364

पुलदनी देवी त्रिकाल ज्ञान साधना भूत भविष्य वर्तमान जानने की साधना bhoot bhavishya vartman janne ki

भुवनेश्वरी साधना महाविद्या साधना रहस्य (Bhuvaneshvari Mahavidya MANTRA TANTRA SADHBNA)

काले इल्म की काल भैरव साधना kala ilm aur kala jadu sadhna ph. 85280 57364

काला कलुआ प्रत्यक्षीकरण साधना ( काले इल्म की शक्तियां पाने की साधना) Ph. – 85280 57364

Kachha Kalua – कच्चा कलुआ साधना – सम्पूर्ण रहस्य के साथ ph.8528057364

कमला महाविद्या साधना ( करोड़पति बनने की साधना ) साधना अनुभव के साथ kamala mahavidya mantra

baglamukhi sadhna प्राचीन शक्तिशाली मां बगलामुखी साधना ph.85280 57364

प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364

रंभा अप्सरा साधना और अनुभव rambha apsara sadhna ph.8528057364

urvashi apsara sadhna उर्वशी अप्सरा साधना एक चनौती PH. 85280 57364

अप्सरा साधना और तंत्र apsara sadhna aur tantra

रत्नमाला अप्सरा साधना – एक दिवसीय अप्सरा साधना ek divaseey apsara saadhana ph.85280 57364

(अप्सरा साधना के लाभ ) अप्सरा साधना का हमारे जीवन मे महत्व (Benefits of Apsara ) Our life of Apsara is

अप्सरा साधना में आहार कैसा होना चाहिए   apsara mantra sadhna

उर्वशी अप्सरा साधना प्रत्यक्षीकरण urvashi apsara pratyaksh sadhana mantra vidhi ph.85280

 yakshini sadhana

rakta chamunda रक्तचामुण्डा यक्षिणी सब से तीव्र वशीकरण साधना Ph.85280 57364

तुलसी यक्षिणी साधना tulsi yakshini sadhana

कनक यक्षिणी साधना प्रत्यक्षीकरण kanak yakshini sadhna ph. 85280 57364

पीपल यक्षिणी वशीकरण साधना pipal yakshini sadhana ph. 85280 57364

 त्रिकाल ज्ञान साधना

Sapneshwari sadhna – स्वप्नेश्वरी त्रिकाल दर्शन साधना Ph.85280 57364

Panchanguli sadhana – चमत्कारी प्राचीन त्रिकाल ज्ञान पंचांगुली साधना रहस्य ph.85280 57364

vartali devi sadhana वार्ताली देवी साधना भूत भविष्य वर्तमान जानने की साधना ph. 85280 -57364

पुलदनी देवी त्रिकाल ज्ञान साधना भूत भविष्य वर्तमान जानने की साधना bhoot bhavishya vartman janne ki

सात्विक सौम्य करन पिशाचिनी साधना भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी के लिए karna pishachini sadhana

hanumat Margdarshan sadhna हनुमत मार्गदर्शन साधना

maa durga Trikal gyan sadhna माँ दुर्गा त्रिकाल ज्ञान सध्ना

काला इल्म इल्म और काला जादू

Kachha Kalua – कच्चा कलुआ साधना – सम्पूर्ण रहस्य के साथ ph.8528057364

काला जादू black magic क्या है? और इस के क्या रहस्य है PH.8528057364

काले इल्म की काल भैरव साधना kala ilm aur kala jadu sadhna ph. 85280 57364

काला कलुआ प्रत्यक्षीकरण साधना ( काले इल्म की शक्तियां पाने की साधना) Ph. – 85280 57364

यंत्र मंत्र तंत्र ज्ञान

गायत्री मंत्र के लाभ The Benefits Of Chanting Gayatri Mantra

Kachha Kalua – कच्चा कलुआ साधना – सम्पूर्ण रहस्य के साथ ph.8528057364

kritya sadhana -प्राचीन तीक्ष्ण कृत्या साधना ph. 85280 57364

Khetarpal Sadhna खेत्रपाल साधना और खेत्रपाल रहस्य कौन है

यह तंत्र साधना कभी न करे एक शादीशुदा साधक tantra sadhana

मायावी विद्या और कृष्ण के पौत्र के माया से अपहरण mayavi vidya ph.85280

इस्‍माइल जोगी का परिचय Introduction to Ismail Jogi

maran aadi mantra Prayogo me savdhaniya मारणादि मंत्र प्रयोगों में सावधानियां

vashikaran uchatan akarshan mantra paryogo savdhani वशीकरण, उच्चाटन,आकर्षणादि मन्त्र

Trikal gyan varahi sadhna त्रिकाल ज्ञान वाराही

Taratak Meditation kundalini jagarn karni ke pahile seedhee त्राटक ध्यानकुण्डलिनी जागरण करने 

mantra Tantra khatkarm मंत्र तंत्र षट्कर्म Ph 85280 57364

Tantra wikipedia

MUSLIM sadhna

प्राचीन चमत्कारी मुवक्किल muwakkil साधना रहस्यph.85280 57364

Muslim sadhna मनवांछित इस्लामिक शक्ति को सिद्ध करने की साधना ph.85280 57364

sulemani panch peer sadhna सुलेमानी पाँच पीर साधना

Khabees – खबीस शैतान का सम्पूर्ण जानकारी- कैसा होता है

ख्वाजा पीर जी की साधना Khawaja Peer Sadhana

Sifli ilm सिफली इलम रहस्य हिंदी में विस्तार सहित ph.85280 57364

Tilasmi paryog ख़्वाजा तिलस्मी प्रयोग से त्रिकाल ज्ञान ph. 8528057364

Tantra English

Kamakhya Sindoor: History, Benefits, and Uses

Kamakhya Devi – A Journey Through the Mystical Temple of the Mother Goddess

What is Tantra?

Significance of wealth in life Maha lakshmi Sadhana ph.8528057364

mantra tantra education and guru knowledge

Is Tantra a Rapid Path to Self-Realization

what is Mantra Tantra Shastra?

Milarepa- The Great Tibetan Tantric & His Enlightenment

A Man Who Learnt a Magical Secret Mantra Secret Mantra

Relationship between Kundalini Tantra Yantra,Mantra

How is Aghori Tantra Mantra Sadhana?

Tantra Mantra education is not pornography and sexy science

Difference between Beej mantras and Tantric mantras and how to use them

Social media link

 guru  mantra  sadhna  Facebook  page 

 guru  mantra  sadhna  facebook  group

 guru  mantra  sadhna  youtube

 guru  mantra  sadhna   WordPress  

 guru  mantra  sadhna  LinkedIn

 guru  mantra  sadhna   email

 guru  mantra  sadhna  qoura

other links

best web hosting 

best domain  company 

best translate  tool

best news  website  

best singer

best mobile phone company

best  bank

best  shopping website 

best  laptop  company 

the best place in India

my  WordPress  use plugin

Ad Invalid Click Protector (AICP)

Rank Math SEO

Ad Invalid Click Protector

Advanced Editor Tools

Classic Editor

Clear Sucuri Cache

Easy Table of Contents

Featured Image from URL (FIFU)

Jetpack

Rank Math SEO

Webpushr Push Notifications

WordPress Automatic Plugin

WP Permalink Translator


guru mantra sadhna pages

 guru  mantra  sadhna Disclaimer

 guru  mantra  sadhna  Privacy Policy

 guru  mantra  sadhna  Terms and Conditions

 guru  mantra  sadhna  Contact

अनाहत चक्र सम्पूर्ण रहस्य anahata-chakra ph .85280 57364

अनाहत चक्र सम्पूर्ण रहस्य Anahata-Chakra ph .85280 57364

अनाहत चक्र सम्पूर्ण रहस्य Anahata-Chakra ph .85280 57364

अनाहत चक्र सम्पूर्ण रहस्य Anahata-Chakra ph .85280 57364
अनाहत चक्र सम्पूर्ण रहस्य Anahata-Chakra ph .85280 57364

 

अनाहत चक्र सम्पूर्ण रहस्य Anahata-Chakra ph .85280 57364 अनाहत चक्र इस चक्र का स्थान हृदय है। इसीलिए इसे ‘हृदय कमल’ या ‘हृदचक्र’ भी कह देते हैं। यहां अनाहत ध्वनि (बिना प्रयास या थाप के, बिना आघात के स्वतः ही उत्पन्न होने वाली ध्वनि) स्वतः ही होती रहती है। इस लिए इस चक्र को अनाहत कहा गया है। क्योंकि ध्वनियों के दो ही मूल प्रकार हैं-आहत व अनाहत। आहत ध्वनि किसी प्रकार की छेड़छाड़ या आघात से उत्पन्न होती है और अनाहत ध्वनि अज्ञात कारण से स्वतः ही उत्पन्न होती है।

  • अनाहत चक्र  के लाभ
  • अनाहत चक्र जागरण लक्षण
  • अनाहत चक्र रंग 

 

अनाहत चक्र अनाहत चक्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि नीचे के तीन और ऊपर के तीन चक्रों में यह संतुलनात्मक सेतु बनाता है। इसके अलावा इसी चक्र में हृत्पुण्डरीक कमल भी है, जिसमें कि योगीजन अपने आराध्य या इष्ट देव का ध्यान करते हैं। तांत्रिक ग्रन्थों के अनुसार भी (जैसा कि शिव सार तन्त्र में कहा गया है) ‘शब्द ब्रह्म कहलाने वाले सदाशिव इसी अनाहत चक्र में हैं। क्योंकि इस स्थान से उत्पन्न होने वाली ध्वनि है त्रिगुणमय ॐ एवं सदाशिव।’ यह चक्र विशेष महत्त्ववान है। पंचमहाभूतों में यह चक्र ‘वायु’ तत्त्व का मुख्य स्थान है। वायु तत्त्व की तन्मात्रा ‘स्पर्श’ है, अत: ‘स्पर्श’ इस चक्र का प्रधान गुण/ज्ञान है।

इसी कारण इस चक्र की ज्ञानेन्द्रिय त्वचा और कर्मेन्द्रिय हाथ हैं । नाक व मुख से प्रवेश कर समस्त शरीर में विचरने वाली एवं जीवन के लिए परमावश्यक प्राणवायु का यह चक्र मुख्य स्थान है। इस चक्र का लोक ‘मर्ह’ या ‘महत्’ है जो अन्त:करण का मुख्य स्थान है। इस चक्र के अधिपति देवता ईशान रुद्र हैं जो अपनी त्रिनेत्रा चतुर्भुजा शक्ति काकिनी’ के साथ हैं। अतः इस चक्र की शक्ति ‘काकिनी’ हैं। इस चक्र का यन्त्र रूप षट्कोणाकार यह चक्र सिंदूरी रंग से प्रकाशित बारह दलों/पंखुड़ियों से युक्त हैं जिन पर स्थित कं, खं, गं, घं, डं, चं, छं, जं, झं, जं, टं तथा ठं। ये बारह वर्ण (अक्षर) कमल दल की ध्वनियों को दर्शाते हैं। इस चक्र का तत्त्व बीज ‘यं’ इसकी बीज ध्वनि का परिचायक है। इसका बीज वाहन मृग है जो इस चक्र की तिरछी बीज गति को स्पष्ट करता है। इस चक्र पर ध्यान के समय अंगूठे और तर्जनी उंगली के सिरों को परस्पर दबाया जाता है। इससे मन स्थिर होता है और उसकी मृग जैसी चंचलता रुकती है। वायु का स्वभाव विश्रामहीनता/हर समय गति करते रहना है।

तदनुसार इस चक्र का यन्त्र व तत्त्व रूप षट्कोण हर दिशा में गति को दर्शाता है। इस षटकोण में एक अधोमुखी तथा एक ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण सम्मिलित है जो क्रमशः शक्ति व शैव-मान्यताओं का प्रतीक होने से दोनों का समन्वय (अर्धनारीश्वर) प्रदर्शित भी करता है। साथ ही ऊपर के तीन लोकों व चक्रों और नीचे के तीन लोकों व चक्रों का संतुलन व सामंजस्य भी इंगित करता है जो इस चक्र के प्रधान गुणों में से एक है। चंचलता, भटकाव, चेष्टा, लोभ, आशा, निराशा, चिंता, कपट, अविवेक, अनुताप, भ्रम (मरीचिका), वितर्क, सक्रियता, दृढ़ता, हठ, तृष्णा, सवंदेनशीलता, उत्साह आदि गुणावगुण इस चक्र की विशेषता हैं।

परकाया प्रवेश तथा वायु गमन इसी चक्र के प्रताप से सम्भव हो पाता है। ज्ञान, दक्षता, वाक्पटुता, समर्थता, निपुणता, शास्त्रों का मर्म समझना, काव्यामृत के रसास्वादन में प्रवीणता आदि इसी चक्र पर ध्यान लगाने से प्राप्त होते हैं। इस चक्र के बीज मन्त्र ‘यं’ का पुनरावृत्ति के साथ शुद्ध रूप से उच्चारण हृदय को तरंगित कर वहां के समस्त अवरोध दूर करता है, जिससे शक्ति का प्रवाह निर्बाध गति से ऊपर की ओर होने लगता है परिणाम स्वरूप परम प्रभु की आह्लादिनी शक्ति से साधक का साक्षात्कार होता है और उसे सब ओर आनन्द की ही प्रतीति होने लगती है। श्वांसों और प्राणों पर अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सिद्धियों का आरम्भ इस चक्र को जीतने से होने लगता है। समदर्शिता, स्थायित्व/नियंत्रण, प्रेम, सत्यता, निर्लोभता, दया, क्षमा, करुणा, विवेकशीलता, अहिंसकता आदि गुणों का उदय इस चक्र के शुभ प्रभावों के अन्तर्गत ही आता है।

इस अनाहत चक्र में एक लिंग का होना भी माना गया है, जिसे ‘बाणलिंग’ कहते हैं। इसके ऊपर अति सूक्ष्म छिद्र में हृत्पुण्डरीक कमल का निवास बताया गया है, जहां योगी जन अपने आराध्य देवता का ध्यान करते हैं। गहन प्रेम की स्थिति में योगमार्ग को जाने बिना ही (प्रेमयोग के माध्यम से) अनजाने में प्रेमी इस कमल तक पहुंच जाता है और अपनी प्रेयसी को इस कमल में उसी प्रकार बसा लेता है, जैसे हनुमानजी के हृदयकमल में श्रीराम बसे रहते हैं। तभी तो कोई शायर अनजाने में ही यह पते की बात कह गया है- तस्वीर-ए-यार हमने अपने दिल में बसा रखी है। जब जी में आया, जरा गर्दन झुकाई, देख लिया। शुद्ध प्रेम की स्थिति में प्रेमी अर्धयोगी हो जाता है, इसमें दो राय नहीं है।

क्योंकि योग के प्रधान गुणों व लक्षणों में से एक-तन्मयता/एकाग्रता/ स्वविस्मृति- कन्सन्ट्रेशन उसमें सहज ही आ जाता है। यही गुण एक उच्च कोटि के कलाकार, कवि, लेखक, दार्शनिक, वैज्ञानिक या संगीतकार में भी होता है। अत: मेरी दृष्टि में वे सभी पथभ्रष्ट/दिशाभ्रष्ट योगी होते हैं, बहरहाल। लगे हाथ इस चक्र के बीजवाहन मृग का भी विवेचन करते चलें। चंचलता, तिरछी गति, किसी भी ओर सशंक दौड़ जाना, मृग तृष्णा/मृग मारीचिका, अस्थिरता, विश्रामहीनता, सतर्कता, जागरूकता, उत्साह, संवदेनशीलता और प्रसन्नता में कुलांचें भरना आदि समस्त गुण मृग में विद्यमान हैं जो इस चक्र से सम्बन्धित हैं। अतः इसका बीज वाहन मृग सर्वथा सार्थक है।

 

अनाहत चक्र बीज मंत्र 

इस चक्र के बीज मन्त्र ‘यं’ का पुनरावृत्ति के साथ शुद्ध रूप से उच्चारण हृदय को तरंगित कर वहां के समस्त अवरोध दूर करता है, जिससे शक्ति का प्रवाह निर्बाध गति से ऊपर की ओर होने लगता है परिणाम स्वरूप परम प्रभु की आह्लादिनी शक्ति से साधक का साक्षात्कार होता है और उसे सब ओर आनन्द की ही प्रतीति होने लगती है। श्वांसों और प्राणों पर अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सिद्धियों का आरम्भ इस चक्र को जीतने से होने लगता है। समदर्शिता, स्थायित्व/नियंत्रण, प्रेम, सत्यता, निर्लोभता, दया, क्षमा, करुणा, विवेकशीलता, अहिंसकता आदि गुणों का उदय इस चक्र के शुभ प्रभावों के अन्तर्गत ही आता है।

अनाहत चक्र  के लाभ

इस चक्र की साधना करने पर साधक के अंदर समदर्शिता, स्थायित्व/नियंत्रण, प्रेम, सत्यता, निर्लोभता, दया, क्षमा, करुणा, विवेकशीलता, अहिंसकता आदि गुणों का उदय इस चक्र के शुभ प्रभावों के अन्तर्गत ही आता है।  परकाया प्रवेश तथा वायु गमन इसी चक्र के प्रताप से सम्भव हो पाता है। ज्ञान, दक्षता, वाक्पटुता, समर्थता, निपुणता, शास्त्रों का मर्म समझना, काव्यामृत के रसास्वादन में प्रवीणता आदि इसी चक्र पर ध्यान लगाने से प्राप्त होते हैं 

अनाहत चक्र जागरण लक्षण
जब यह चक्र जागृत होता है साधक के भीतर बहुत सरे परवर्तन होती है जैसे साधक के सुभाव में मधुरता आने लगती है क्रोध की जगह ख़तम हो जाती है प्रेम, सत्यता, निर्लोभता, दया, क्षमा, करुणा, विवेकशीलता, अहिंसकता आदि गुणों का उदय महसूस होगा  है।
अनाहत चक्र के अधिपति देवता
इस चक्र के अधिपति देवता ईशान रुद्र हैं जो अपनी त्रिनेत्रा चतुर्भुजा शक्ति काकिनी’ के साथ हैं। अतः इस चक्र की शक्ति ‘काकिनी’ हैं।
अनाहत चक्रका रंग 

इस चक्र का यन्त्र रूप षट्कोणाकार यह चक्र सिंदूरी रंग से प्रकाशित बारह दलों/पंखुड़ियों से युक्त हैं जिन पर स्थित कं, खं, गं, घं, डं, चं, छं, जं, झं, जं, टं तथा ठं। ये बारह वर्ण (अक्षर) कमल दल की ध्वनियों को दर्शाते हैं।

CATEGORIES

यह साधना भी पढ़े नीचे  दिए  गए लिंक से

प्राचीन चमत्कारी उच्छिष्ट गणपति शाबर साधना Uchchhishta Ganapati  Sadhna  PH. 85280 57364

रत्नमाला अप्सरा साधना – एक दिवसीय अप्सरा साधना ek divaseey apsara saadhana ph.85280 57364

नाथ पंथ की महागणपति प्रत्यक्षीकरण साधना भगवान गणेश के दर्शन के लिए ph.85280 57364

Pataal Bhairavi – पाताल भैरवी बंगाल का जादू की मंत्र साधना Pataal Bhairavi bangal ka jadu mantra

प्राचीन प्रत्यंगिरा साधना Pratyangira Sadhana Ph.85280 57364

kritya sadhana -प्राचीन तीक्ष्ण कृत्या साधना ph. 85280 57364

Hanuman Sadhana प्राचीन रहस्यमय हनुमान साधना विधि विधान सहित ph. 85280 57364

Sapneshwari sadhna – स्वप्नेश्वरी त्रिकाल दर्शन साधना Ph.85280 57364

Lakshmi Sadhna आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना Ph.8528057364

Narsingh Sadhna – भगवान प्राचीन नृसिंह साधना PH.8528057364

चमत्कारी वीर बेताल साधना – Veer Betal sadhna ph .8528057364

Panchanguli – काल ज्ञान देवी पंचांगुली रहस्य विस्तार सहित Ph. 85280 57364

Veer Bulaki Sadhna – प्राचीन रहस्यमय वीर बुलाकी साधना PH.85280 57364

चमत्कारी प्राचीन लोना चमारी साधना शाबर मंत्र lona chamari ph.85280 57364

sham Kaur Mohini माता श्याम कौर मोहिनी की साधना और इतिहास -ph.85280 57364

Masani Meldi माता मेलडी मसानी प्रत्यक्ष दर्शन साधना और रहस्य ph. 85280 57364

Lama Tibet Tantra लामा तिब्बत तंत्र का वशीकरण साधना

नाहर सिंह वीर परतक्षीकरण साधना nahar singh veer sadhana ph.85280 – 57364

पुलदनी देवी त्रिकाल ज्ञान साधना भूत भविष्य वर्तमान जानने की साधना bhoot bhavishya vartman janne ki

भुवनेश्वरी साधना महाविद्या साधना रहस्य (Bhuvaneshvari Mahavidya MANTRA TANTRA SADHBNA)

काले इल्म की काल भैरव साधना kala ilm aur kala jadu sadhna ph. 85280 57364

काला कलुआ प्रत्यक्षीकरण साधना ( काले इल्म की शक्तियां पाने की साधना) Ph. – 85280 57364

Kachha Kalua – कच्चा कलुआ साधना – सम्पूर्ण रहस्य के साथ ph.8528057364

कमला महाविद्या साधना ( करोड़पति बनने की साधना ) साधना अनुभव के साथ kamala mahavidya mantra

baglamukhi sadhna प्राचीन शक्तिशाली मां बगलामुखी साधना ph.85280 57364

प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364

रंभा अप्सरा साधना और अनुभव rambha apsara sadhna ph.8528057364

urvashi apsara sadhna उर्वशी अप्सरा साधना एक चनौती PH. 85280 57364

अप्सरा साधना और तंत्र apsara sadhna aur tantra

रत्नमाला अप्सरा साधना – एक दिवसीय अप्सरा साधना ek divaseey apsara saadhana ph.85280 57364

(अप्सरा साधना के लाभ ) अप्सरा साधना का हमारे जीवन मे महत्व (Benefits of Apsara ) Our life of Apsara is

अप्सरा साधना में आहार कैसा होना चाहिए   apsara mantra sadhna

उर्वशी अप्सरा साधना प्रत्यक्षीकरण urvashi apsara pratyaksh sadhana mantra vidhi ph.85280

 yakshini sadhana

rakta chamunda रक्तचामुण्डा यक्षिणी सब से तीव्र वशीकरण साधना Ph.85280 57364

तुलसी यक्षिणी साधना tulsi yakshini sadhana

कनक यक्षिणी साधना प्रत्यक्षीकरण kanak yakshini sadhna ph. 85280 57364

पीपल यक्षिणी वशीकरण साधना pipal yakshini sadhana ph. 85280 57364

 त्रिकाल ज्ञान साधना

Sapneshwari sadhna – स्वप्नेश्वरी त्रिकाल दर्शन साधना Ph.85280 57364

Panchanguli sadhana – चमत्कारी प्राचीन त्रिकाल ज्ञान पंचांगुली साधना रहस्य ph.85280 57364

vartali devi sadhana वार्ताली देवी साधना भूत भविष्य वर्तमान जानने की साधना ph. 85280 -57364

पुलदनी देवी त्रिकाल ज्ञान साधना भूत भविष्य वर्तमान जानने की साधना bhoot bhavishya vartman janne ki

सात्विक सौम्य करन पिशाचिनी साधना भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी के लिए karna pishachini sadhana

hanumat Margdarshan sadhna हनुमत मार्गदर्शन साधना

maa durga Trikal gyan sadhna माँ दुर्गा त्रिकाल ज्ञान सध्ना

काला इल्म इल्म और काला जादू

Kachha Kalua – कच्चा कलुआ साधना – सम्पूर्ण रहस्य के साथ ph.8528057364

काला जादू black magic क्या है? और इस के क्या रहस्य है PH.8528057364

काले इल्म की काल भैरव साधना kala ilm aur kala jadu sadhna ph. 85280 57364

काला कलुआ प्रत्यक्षीकरण साधना ( काले इल्म की शक्तियां पाने की साधना) Ph. – 85280 57364

यंत्र मंत्र तंत्र ज्ञान

गायत्री मंत्र के लाभ The Benefits Of Chanting Gayatri Mantra

Kachha Kalua – कच्चा कलुआ साधना – सम्पूर्ण रहस्य के साथ ph.8528057364

kritya sadhana -प्राचीन तीक्ष्ण कृत्या साधना ph. 85280 57364

Khetarpal Sadhna खेत्रपाल साधना और खेत्रपाल रहस्य कौन है

यह तंत्र साधना कभी न करे एक शादीशुदा साधक tantra sadhana

मायावी विद्या और कृष्ण के पौत्र के माया से अपहरण mayavi vidya ph.85280

इस्‍माइल जोगी का परिचय Introduction to Ismail Jogi

maran aadi mantra Prayogo me savdhaniya मारणादि मंत्र प्रयोगों में सावधानियां

vashikaran uchatan akarshan mantra paryogo savdhani वशीकरण, उच्चाटन,आकर्षणादि मन्त्र

Trikal gyan varahi sadhna त्रिकाल ज्ञान वाराही

Taratak Meditation kundalini jagarn karni ke pahile seedhee त्राटक ध्यानकुण्डलिनी जागरण करने 

mantra Tantra khatkarm मंत्र तंत्र षट्कर्म Ph 85280 57364

Tantra wikipedia

MUSLIM sadhna

प्राचीन चमत्कारी मुवक्किल muwakkil साधना रहस्यph.85280 57364

Muslim sadhna मनवांछित इस्लामिक शक्ति को सिद्ध करने की साधना ph.85280 57364

sulemani panch peer sadhna सुलेमानी पाँच पीर साधना

Khabees – खबीस शैतान का सम्पूर्ण जानकारी- कैसा होता है

ख्वाजा पीर जी की साधना Khawaja Peer Sadhana

Sifli ilm सिफली इलम रहस्य हिंदी में विस्तार सहित ph.85280 57364

Tilasmi paryog ख़्वाजा तिलस्मी प्रयोग से त्रिकाल ज्ञान ph. 8528057364

Tantra English

Kamakhya Sindoor: History, Benefits, and Uses

Kamakhya Devi – A Journey Through the Mystical Temple of the Mother Goddess

What is Tantra?

Significance of wealth in life Maha lakshmi Sadhana ph.8528057364

mantra tantra education and guru knowledge

Is Tantra a Rapid Path to Self-Realization

what is Mantra Tantra Shastra?

Milarepa- The Great Tibetan Tantric & His Enlightenment

A Man Who Learnt a Magical Secret Mantra Secret Mantra

Relationship between Kundalini Tantra Yantra,Mantra

How is Aghori Tantra Mantra Sadhana?

Tantra Mantra education is not pornography and sexy science

Difference between Beej mantras and Tantric mantras and how to use them

Social media link

 guru  mantra  sadhna  Facebook  page 

 guru  mantra  sadhna  facebook  group

 guru  mantra  sadhna  youtube

 guru  mantra  sadhna   WordPress  

 guru  mantra  sadhna  LinkedIn

 guru  mantra  sadhna   email

 guru  mantra  sadhna  qoura

other links

best web hosting 

best domain  company 

best translate  tool

best news  website  

best singer

best mobile phone company

best  bank

best  shopping website 

best  laptop  company 

the best place in India

my  WordPress  use plugin

Ad Invalid Click Protector (AICP)

Rank Math SEO

Ad Invalid Click Protector

Advanced Editor Tools

Classic Editor

Clear Sucuri Cache

Easy Table of Contents

Featured Image from URL (FIFU)

Jetpack

Rank Math SEO

Webpushr Push Notifications

WordPress Automatic Plugin

WP Permalink Translator


guru mantra sadhna pages

 guru  mantra  sadhna Disclaimer

 guru  mantra  sadhna  Privacy Policy

 guru  mantra  sadhna  Terms and Conditions

 guru  mantra  sadhna  Contact

मणिपूर चक्र सम्पूर्ण जानकारी और रहस्य Manipura Chakra ph. 85280 57364 

मणिपूर चक्र सम्पूर्ण जानकारी और रहस्य Manipura Chakra ph. 85280 57364 

मणिपूर चक्र सम्पूर्ण जानकारी और रहस्य Manipura Chakra ph. 85280 57364 

मणिपूर चक्र सम्पूर्ण जानकारी और रहस्य Manipura Chakra ph. 85280 57364 
मणिपूर चक्र सम्पूर्ण जानकारी और रहस्य Manipura Chakra ph. 85280 57364

मणिपूर चक्र सम्पूर्ण जानकारी और रहस्य Manipura Chakra ph. 85280 57364 मणिपूरक चक्र इसे मणिपुर चक्र भी कहा गया है। यह भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। नाभि मूल में इसका स्थान है। अतः पवन संस्थान व शौर्य संस्थान से इसका सीधा सम्बन्ध है। व्यक्ति के अहं, प्रभुत्व व धाक जमाने की भावना, नाम कमाने की इच्छा, सर्वश्रेष्ठ बनने की ललक तथा शक्ति अर्जन के प्रयास इसी चक्र के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। ऊपर मणिपूरक चक्र इसके अलावा संघर्ष, प्रायश्चित्त, नि:स्वार्थ सेवा, धर्म, सत्संग या कुसंग (संगति), निष्ठा, दृढ़ता आदि भी इसी चक्र से प्रभावित होते हैं। संगति का अर्थ है-संग-संग 33या साथ-साथ गति करना।

  • मणिपुर चक्र Manipura Chakra  के देवता
  • मणिपुर चक्र Manipura Chakra का मंत्र 
  • मणिपुर चक्र Manipura Chakra साधना
  • मणिपुर चक्र Manipura Chakra विचार
  • मणिपुर चक्र  Manipura Chakra में किस तत्व वास है 
 

अत: संगति सदैव संतुलन उत्पन्न करने वाली होती है। यह विषमता को समाप्त कर समता को उत्पन्न करती है। अत: कर्म व धर्म में संतुलन उत्पन्न करना इसी चक्र के प्रताप से सम्भव होता है। प्रकृति व धर्म का संतुलन जब स्वभाव व कर्म से हो जाता है, तो साधक नैसर्गिक लोक में पदार्पण कर सकता है। अतः मणिपूरक चक्र अध्यात्म का प्रवेश द्वार कहा जा सकता है। नाभि शरीर का केन्द्र है। गर्भावस्था में नाभि द्वारा ही शिशु का पोषण व विकास होता है। नाभि से ही भ्रूण विकसित होता है। गुरुत्वाकर्षण बल के प्रति संतुलन बनाने का कार्य नाभि ही करती है। आघात पहुंचने या असंतुलित हो जाने से नाभि उतर जाती है। ऊपरी शरीर व निचले शरीर का संतुलन नाभि पर ही रहता है।

रॉकेट को जिस प्रकार अंतरिक्ष में जाते समय गुरुत्वाकर्षण सीमा का अतिक्रमण करते समय विशिष्ट बल की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति को भी ऊपरी चक्रों पर जाने के लिए मणिपूरक चक्र का बेधन करने में विशेष बल लगाना पड़ता है। (इस विषय में आगे विस्तार से पढ़ेंगे)। इसलिए इसे आध्यात्मिक प्रवेश द्वार कहा गया है, इसीलिए नाभि में अमृतकुंड होना भी कहा जाता है। इसके अलावा योग में अत्यंत महत्त्वपूर्ण रुद्रग्रंथि का निवास भी यहीं है (चक्र प्रकरण के बाद इसकी चर्चा होगी)। अतः यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि संगति या संतुलन नाभि में ही स्थित होने से मणिपूरक चक्र के प्रभाव में आता है। मणिपूरक चक्र से प्रभावित मनुष्य रात्रि में 6 से 8 घंटे सोने वाला होता है।

 

इस चक्र में ध्यान लगाने से स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्राप्ति होती है, अपने शरीर व ग्रन्थियों का भौतिक ज्ञान होता है तथा पाचन सम्बन्धी दोषों व विकारों का निवारण होता है तथा साधक में तेज उत्पन्न होता है। क्योंकि ‘अग्नि’ तत्त्व का यह चक्र प्रतिनिधित्व करता है। पंचमहाभूतों में ‘अग्नि’ का मुख्य आधार होने के कारण मणिपूर चक्र की ज्ञानेन्द्रिय नेत्र व कर्मेन्द्रिय पैर हैं। रूप या तेज इसका प्रधान गुण या ज्ञान है, जो अग्नितत्त्व की तन्मात्रा है।

खान-पान के रस को पूरे शरीर में समान रूप से वितरित करने वाला समान वायु है, जिसका इस चक्र में मुख्य निवास है। यह चक्र त्रिकोणाकार है। जो रक्तवर्ण का है। नीले हरे रंग से प्रकाशित दस कमलदलों (पंखुड़ियों) से यह घिरा हुआ है। इन पंखुड़ियों पर डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, वं, फं वर्ण (अक्षर) हैं जो इस चक्र की कमल दल ध्वनियों के सूचक हैं। इसकी बीज ध्वनि ‘रं’ हैं, क्योंकि ‘रं’ इसका तत्त्व बीज है। इस चक्र की बीज गति मेष/मेढ़े के समान उछलकर चलने की है अत: मेढ़ा इस चक्र का बीज वाहन है। (अग्नि का वाहन भी मेढ़ा कहा गया है और अग्नि का बीज मंत्र भी ‘रं’ ही होता है)। अग्नि तत्त्व और समानवायु का यह मुख्य स्थान है। इस चक्र का लोक स्वः है। इसका यन्त्ररूप अधोमुखी त्रिकोण है, जो लाल रंग का है। इसका बीज वर्ण स्वर्णिम रक्त है।

इस चक्र के अधिपति देवता रुद्र शिव हैं, जो अपनी चर्तुभुजा शक्ति ‘लाकिनी’ के साथ हैं। इस चक्र पर ध्यान लगाते समय प्रयुक्त होने वाली कर मुद्रा में मध्यमा उंगली व अंगूठे के सिरों को परस्पर दबाया जाता है। मध्यमा व अंगूठे के सिरों को दबाने से शरीर में उष्मा उत्पन्न होती है। इसके बीज मंत्र ‘रं’ की यदि शुद्धोच्चारण के साथ बारम्बार पुनरावृत्ति की जाती है तो उस ध्वनि की तरंगों के प्रभाव से रस को आत्मसात् करने की शक्ति व पाचन शक्ति बढ़ती है क्योंकि इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है। इसके अलावा ऊर्जा भी बढ़ती है जो आयु व सामर्थ्य को बढ़ाती है। प्रायः मणिपूरक चक्र से प्रभावित व्यक्ति क्रोधी होते हैं क्योंकि अग्नि का स्वभाव ही ऊष्ण है।

यही कारण है कि कई स्थानों पर इसे ‘सूर्य चक्र’ भी कहा गया है। इस चक्र का बीज वाहन मेढ़ा सर्वथा उपयुक्त है। क्योंकि मेढ़ा स्वाभिमानी, बलवान, अहं में चूर और रणोन्मत्त होता है। यह उछलकर सीधा सिर से आक्रमण करता है और मेढ़ा अग्नि का वाहन भी है। जोश और अहं मेढ़े में शक्ति के साथ मौजूद होता है। यद्यपि यही गुण वृषभ या सांड में भी है, किन्तु उसमें वह फुर्ती और उछलकर चलने/लड़ने का स्वभाव नहीं है जो इस चक्र की बीजगति को इंगित कर सके अत: इसका बीज-वाहन मेढ़ा सर्वथा उचित ही है। प्रायः अग्नि का सूचक लाल रंग माना गया है। यहां मणिपूरक चक्र के कमल दलों का रंग नीला कहा गया है। (यद्यपि यन्त्र रूप त्रिकोण लाल रंग वाला ही है।)

यहां पाठकों को एक विरोधाभास प्रतीत हो सकता है, क्योंकि नीला व लाल परस्पर विरोधी रंग हैं और अग्नि का पर्याय मुख्यतः लाल रंग माना गया है। अतः पाठकों को यह स्पष्ट करना ज़रूरी समझता हूं कि अग्नि का रंग वास्तव में नीला है। कभी भी अग्नि को ध्यान से देखें (माचिस या मोमबत्ती की लौ को ही सही), मध्य में नीला फिर काला सा सिलेटी, फिर लाल, संतरी और पीला रंग क्रमश: बाहर की ओर दिखाई देते हैं।

यह रंग भेद अग्नि की जिह्वाओं तथा उसकी ऊष्णता के स्तर को ही दिखाते हैं। जैसा कि पुराणों व उपनिषदों में अग्नि की सात जिह्वाओं/लपटों का वर्णन भी है- काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सधूम्रवर्णा। स्फुलिंगिनी विश्वरुचि च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वा ॥ –(मुण्डकोपनिषद्) अर्थात्-काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी एवं विश्वरुचि-अग्निदेव की ये 7 जिह्वाएं हैं। इससे सिद्ध होता है कि अग्नि का लाल रंग उसकी सुलोहिता नामक जिह्वा और स्लेटी काला रंग उसकी धूम्रवर्णा नाम की जिह्वा के कारण है। पीला रंग तो तेज, ऊष्णता व प्रकाश के कारण है किन्तु अग्नि का रंग वैसे नीला ही है क्योंकि मूल में सदा नीली आभा विद्यमान रहती है।

यहां पाठक सूर्य और शुक्र के सम्बन्ध में वैज्ञानिक अन्वेषणों के निष्कर्ष भी देखें। सूर्य लाल है जो तीव्र प्रकाश की अवस्था में पीला मालूम होता है। जबकि शुक्र का रंग नीला है। वैज्ञानिक अन्वेषणों के आधार पर हम जानते हैं कि शुक्र सूर्य. से कई हज़ार गुना अधिक गरम है और वैज्ञानिकों ने उसके धरातल की भीषण व प्रचण्ड गरमी के आधार पर उसे ‘जीता जागता नरक’ कहा है। (इस विशेषता के आधार पर इस तथ्य को भी कसिए कि शुक्र को दानवों का गुरु कहा गया है।) मणिपूरक चक्र की विशेष साधना-निर्मोहता, शांति, वैराग्य, समता, तन्मयता, आनन्द, धृति, निश्चलता तथा उदासीनता (न्यूट्रल होना/निर्लिप्त होना) को बढ़ाने वाली कही गई है। मणिपूर चक्र का सम्बन्धित लोक ‘स्वः’ यानि स्वर्गलोक है जो अन्य ऊपर के लोकों में सबसे निचला है अतः इसको आध्यात्मिक प्रवेशद्वार कहना ठीक ही है।

 

मणिपुर चक्र Manipura Chakra  के देवता

स चक्र के अधिपति देवता रुद्र शिव हैं, जो अपनी चर्तुभुजा शक्ति ‘लाकिनी’ के साथ हैं। इस चक्र पर ध्यान लगाते समय प्रयुक्त होने वाली कर मुद्रा में मध्यमा उंगली व अंगूठे के सिरों को परस्पर दबाया जाता है। मध्यमा व अंगूठे के सिरों को दबाने से शरीर में उष्मा उत्पन्न होती है।

मणिपुर चक्र Manipura Chakra विचार

इस चक्र में ध्यान लगाने से स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्राप्ति होती है, अपने शरीर व ग्रन्थियों का भौतिक ज्ञान होता है तथा पाचन सम्बन्धी दोषों व विकारों का निवारण होता है तथा साधक में तेज उत्पन्न होता है। क्योंकि ‘अग्नि’ तत्त्व का यह चक्र प्रतिनिधित्व करता है। पंचमहाभूतों में ‘अग्नि’ का मुख्य आधार होने के कारण मणिपूर चक्र की ज्ञानेन्द्रिय नेत्र व कर्मेन्द्रिय पैर हैं। रूप या तेज इसका प्रधान गुण या ज्ञान है, जो अग्नितत्त्व की तन्मात्रा है।
 

मणिपुर चक्र  Manipura Chakra में किस तत्व वास है 

इस चक्र में ध्यान लगाने से स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्राप्ति होती है, अपने शरीर व ग्रन्थियों का भौतिक ज्ञान होता है तथा पाचन सम्बन्धी दोषों व विकारों का निवारण होता है तथा साधक में तेज उत्पन्न होता है। क्योंकि ‘अग्नि’ तत्त्व का यह चक्र प्रतिनिधित्व करता है। पंचमहाभूतों में ‘अग्नि’ का मुख्य आधार होने के कारण मणिपूर चक्र की ज्ञानेन्द्रिय नेत्र व कर्मेन्द्रिय पैर हैं। रूप या तेज इसका प्रधान गुण या ज्ञान है, जो अग्नितत्त्व की तन्मात्रा है।

मणिपुर चक्र Manipura Chakra का मंत्र 

इसके बीज मंत्र ‘रं’ की यदि शुद्धोच्चारण के साथ बारम्बार पुनरावृत्ति की जाती है तो उस ध्वनि की तरंगों के प्रभाव से रस को आत्मसात् करने की शक्ति व पाचन शक्ति बढ़ती है क्योंकि इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है। इसके अलावा ऊर्जा भी बढ़ती है जो आयु व सामर्थ्य को बढ़ाती है। प्रायः मणिपूरक चक्र से प्रभावित व्यक्ति क्रोधी होते हैं क्योंकि अग्नि का स्वभाव ही ऊष्ण है।

मणिपुर चक्र Manipura Chakra के लाभ

इस चक्र में ध्यान लगाने से स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्राप्ति होती है, अपने शरीर व ग्रन्थियों का भौतिक ज्ञान होता है तथा पाचन सम्बन्धी दोषों व विकारों का निवारण होता है तथा साधक में तेज उत्पन्न होता है।

मणिपुर चक्र Manipura Chakra का रंग

मणिपूरक चक्र के कमल दलों का रंग नीला कहा गया है। (यद्यपि यन्त्र रूप त्रिकोण लाल रंग वाला ही है।)
यहां पाठकों को एक विरोधाभास प्रतीत हो सकता है, क्योंकि नीला व लाल परस्पर विरोधी रंग हैं और अग्नि का पर्याय मुख्यतः लाल रंग माना गया है। अतः पाठकों को यह स्पष्ट करना ज़रूरी समझता हूं कि अग्नि का रंग वास्तव में नीला है। कभी भी अग्नि को ध्यान से देखें (माचिस या मोमबत्ती की लौ को ही सही), मध्य में नीला फिर काला सा सिलेटी, फिर लाल, संतरी और पीला रंग क्रमश: बाहर की ओर दिखाई देते हैं।

स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी – Swadhisthana Chakra Complete information

स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी - Swadhisthana Chakra Completeinformation

स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी – Swadhisthana Chakra Completeinformation

स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी - Swadhisthana Chakra Completeinformation
स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी – Swadhisthana Chakra Completeinformation

स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी – Swadhisthana Chakra Complete information स्वाधिष्ठान चक्र कुण्डलिनी की रहस्यमयी और विलक्षण यात्रा का दूसरा पड़ाव, मानव शरीर में स्थित दूसरा प्रमुख चक्र स्वाधिष्ठान है। जननेन्द्रिय के ऊपर तथा नाभि के नीचे ‘पेडू’ में यह चक्र अवस्थित है। यह पुरुषों के वीर्य व स्त्रियों में रज का स्थान कहा जाता है। पंच महाभूतों में यह ‘जल’ तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। अर्थात् जल गति लं भ Alle यं म नीचे स्वाधिष्ठान चक्र तत्त्व का यह मुख्य स्थान है। जल तत्त्व का प्रतिनिधि होने के कारण इसका प्रधान ज्ञान या गुण ‘रस’ है (जो जल तत्त्व की तन्मात्रा है)। इसलिए इसकी ज्ञानेन्द्रिय रसना/जिह्वा और कर्मेंद्रिय लिंग व योनि (जननांग) हैं।

  • स्वाधिष्ठान चक्रजागरण
  • स्वाधिष्ठान चक्र के लिए रत्न
  • स्वाधिष्ठान चक्रके कार्य
  • स्वाधिष्ठान चक्रकी बीमारी
  • स्वाधिष्ठान चक्र कैसे जागृत करें

इसका रूप चन्द्राकार है। जो सफेद रंग का है। इसके यन्त्र का रूप अर्धचन्द्र युक्त वृत्ताकार है जो श्वेत है। रक्ताभ हिंगुल वर्ण (सिंदूरी रंग) से प्रकाशित छः पंखुड़ियों या दलों से यह युक्त है। इन दलों के अक्षर बं, भं, मं, यं, रं और लं हैं। यही इसकी कमल दल ध्वनि है। इस चक्र की बीज ध्वनि वं है। क्योंकि वं इसका तत्त्व बीज है। इस चक्र का बीज वाहन मकर है, जो इसके तत्त्व बीज की गति को दर्शाता है, यानि मगरमच्छ द्वारा लगाई जाने वाली डुबकी की भांति नीचे की ओर। इसका बीज वर्ण स्वर्णिम श्वेत है जल के समान प्रांजल। भुवः’ लोक इस चक्र का लोक कहा गया है। पूर्ण शरीर में फैलकर गति करने वाले व्यान वायु का यह मुख्य स्थान है। इस चक्र के अधिपति देवता विष्णु हैं जो अपनी चतुर्भुज ‘राकिनी’ के साथ हैं। इससे चक्र की शक्ति का ‘राकिनी’ होना भी सिद्ध होता है। स्वाधिष्ठान चक्र पर ध्यान लगाते समय प्रयुक्त की जाने वाली कर मुद्रा में अंगूठे व अनामिका के सिरों को परस्पर दबाया जाता है।

जिस प्रकार चैतन्यता का प्रभाव मूलाधार चक्र के ध्यान से उत्पन्न होता है उसी प्रकार ध्यान द्वारा स्वाधिष्ठान चक्र का अतिक्रमण कर लेने से प्रसन्नता से चैतन्यता ओत-प्रोत हो जाती है। साधक में प्रफुल्लता आती है। जल तत्त्व का प्रतिनिधि होने से कल्पनाशीलता इस चक्र का प्रधान भौतिक प्रभाव है। इस चक्र के बिगड़ने से ‘जलोदर’ आदि रोग सम्भावित होते हैं। वैसे प्रायः इस चक्र से प्रभावित व्यक्ति घुटनों में सिर देकर आठ से दस घंटे रात्रि में सोता है। माना जाता है कि 8 से 14 वर्ष तक की आयु में मनुष्य स्वाधिष्ठान चक्र के विशेष प्रभाव में रहता है। 

उद्विग्नता, उलझन, कल्पना की उड़ान तथा कुटुम्बियों व मित्रों से बनाए जाने वाले भौतिक सम्बन्ध इसी चक्र के प्रभाव से होते हैं। इच्छाओं व कल्पनाओं के साथ बाह्य व आन्तरिक जगत से तालमेल बिठाने के प्रयास में मानव के व्यक्तित्त्व का विकास होता है, जो इसी चक्र के प्रभाव क्षेत्र में आता है। इस चक्र की साधना बल, सामर्थ्य, विवेक, धैर्य तथा दृढ़ता व विश्वास को बढ़ाने वाली कही गई है। इसके तत्त्व बीज ‘वं’ की शुद्धतापूर्वक उच्चारित की गई आवृत्ति मानव शरीर के निम्न भागों के अवरोध हटाकर वहां शक्ति को प्रवाहित करती है।

कल्पना शक्ति को साधकर कला आदि में उसका बेहतर उपयोग किया जा सकता है। यह एक महत्त्वपूर्ण चक्र है। जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है-‘स्व’ का अधिष्ठान करने वाला यानि-स्वाधिष्ठान। प्रजनन, कल्पना, मनोरंजन, प्रसन्नता, डाह, ईर्ष्या, दया शून्यता, द्वेष, उद्विग्नता, बेचैनी आदि गुणावगुण इसी चक्र से प्रभावित होते हैं। जल तत्त्व व चन्द्र से सम्बन्धित होने के कारण, भावुकता, चंचलता आदि मन के विशिष्ट गुण इसी चक्र के प्रभाव में आते हैं। 

इस चक्र के तत्त्व बीज की गति को दर्शाने के लिए वाहन रूप में मकर का प्रयोग भी उचित व तर्कपूर्ण है। मकर को डुबकी मार कर नीचे जाने के 31स्वभाव से न केवल बीजगति का संकेत मिलता है अपितु मकर की चालाकी (शिकार के समय), उसका तैरना (मनोरंजन) उसकी प्रबल काम शक्ति (प्रजनन सामर्थ्य तथा मन का वेग) और उसकी व्यावहारिकता जो जल और थल दोनों में रहने से सिद्ध होती है।

मगरमच्छ के आंसू बहाना’ मुहावरा ही मकर की चालाकी तथा व्यावहारिकता के गुण को सिद्ध करता है। जबकि मूलाधार का बीज वाहन हाथी (ऐरावत, जिसकी 7 सूडें कही गई हैं) न केवल बीज गति से निर्बाध सामने की ओर जाने को सूचित करता है बल्कि बल, बुद्धि, चैतन्यता, भोजन, सुरक्षा, अपने में ही मस्त रहना, इच्छा

तथा इच्छाओं में मन के भटकाव का भी द्योतक है। महत्त्वाकांक्षाओं को भी प्रकट करता है। अंकुश द्वारा हाथी को वश में करने के समान इच्छाओं के बलवान हाथी को बुद्धि के अंकुश द्वारा वश में करने की प्रेरणा देते गणेश अपने अंकुश सहित मूलाधार के अधिकारी व निवासी देवता बताए ही गए हैं। 

यद्यपि मकर व हाथी के स्वभाव व विशेषताओं की चर्चा यहां पर आवश्यक नहीं थी, तो भी पाठकों को चाहिए कि स्वबुद्धि के प्रयोग से सामने आने वाले तथ्यों को तोलते भी रहें, ताकि विषय पर उनकी मन से आस्था बने और विश्वास उत्पन्न हो सके। इसके अतिरिक्त विषय की महत्ता व गूढ़ता के रहस्य समझे जा सकें।

 अतः पूर्ण व विस्तृत चर्चा के लिए स्थान न होते हुए भी, कहीं-कहीं जहां अत्यंत आवश्यकता महसूस कर रहा हूं, अथवा जिस मुद्दे पर की गई चर्चा विषय को सुगम्य बनाने में सहायक हो सकती है, वहां-वहां विषय प्रवाह में हल्का-सा अवरोध दोष उत्पन्न होने के बावजूद ऐसा तुलनात्मक विवरण यथा सामर्थ्य इसी उद्देश्य से दे रहा हूं, कि पाठक सुनें और गुनें। स्वयं भी अपनी तुला पर तोलें। 32 कुण्डलिनी शक्ति कैसे जागृत करें

विशेष जानकारी

स्वाधिष्ठान चक्र Swadhisthana Chakra  के लिए रत्न – स्वाधिष्ठान चक्र को सिद्ध करने के लिए  या  बेलेन्स रखने के लिए   किसी भी रत्न  की जरूरत नहीं है !

स्वाधिष्ठान चक्र  Swadhisthana Chakra को कैसे ठीक करें–   इस चक्र के अभ्यास करने से इसे  ठीक कर सकते है ! ध्यान भी इस का अच्छा माध्यम हो सकता है

स्वाधिष्ठान चक्र Swadhisthana Chakra  की बीमारी –  इस चक्र के ब्लॉक होने से या इस चक्र  का संतुलन बिगड़ने से आप को मानसिक बीमारयां जायदा लगती है

स्वाधिष्ठान चक्र  Swadhisthana Chakra  जागरण – यह  चक्र को जागृत करने के लिए कठिन अभ्यास की जरूरत होती है !

केदारनाथ यात्रा 2022: प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर के कपाट 6 मई को खुलेंगे भक्तों के लिए

आयुर्वेद चेतावनी: गर्मी की गर्मी को वीटिवर या खस की जड़ों से हराएं

शेयर मार्केट लाइव, स्टॉक मार्केट टुडे लाइव share market live, stock market today live

FACEBOOK 

Muladhara Chakra मूलाधार चक्र सम्पूर्ण ज्ञान हिंदी में 

download 22 https://gurumantrasadhna.com/2022/01/27/

Muladhara Chakra मूलाधार चक्र सम्पूर्ण ज्ञान हिंदी में

download 22 https://gurumantrasadhna.com/2022/01/27/

Muladhara Chakra मूलाधार चक्र सम्पूर्ण ज्ञान हिंदी में    – मूलाधार चक्र Muladhara Chakra इस चक्र को कुछ ग्रन्थों में ‘आधार चक्र’ भी कहा गया है। कोष्ठक में दिया गया नाम इस चक्र का पर्याय नहीं है, किन्तु इसका स्थान ठीक-ठीक समझ पाने में पाठकों के लिए सहायक होगा, अत: लिख दिया गया है। इस चक्र का नाम आधार या मूल आधार इसलिए है, क्योंकि यह चक्र सुषुन्ना के मूल में अवस्थित है। यही भाग शरीर का आधार भी है और समस्त चक्रों के मूल में यही सर्वप्रथम है। गति 9A . सामने मूलाधार चक्र योग विद्या या कुण्डलिनी की दृष्टि से यह चक्र न केवल अति अधिक महत्त्वपूर्ण है अपितु सम्पूर्ण योग प्रणाली का मूल या आधार भी है। कारण-देवता-ब्रह्मा millone शक्ति-डाकिनी कुण्डलिनी शक्ति इसी चक्र में अवस्थित होती है (इस विषय में हम आगे विस्तार से पढ़ेंगे) । जीवन के प्रारम्भिक सातवें वर्षों में की चेष्टाएं प्रायः इसी चक्र से प्रभावित होती हैं। स्वयं में ही रत रहना तथा असुरक्षा बोध से ग्रस्त रहना इसका प्रबल प्रमाण है।

 

मूलाधार चक्र के देवता

 मूलाधार चक्र जागरण के लक्षण
मूलाधार चक्र के फायदे
मूलाधार चक्र के रोग
मूलाधार चक्र कहां होता है
मूलाधार चक्र को कैसे जागृत करें
मूलाधार चक्र मुद्रा
मूलाधार चक्र बीज मंत्र

मूलाधार चक्र Muladhara Chakra के देवता ?

मूलाधार चक्र Muladhara Chakra के देवता  इस चक्र के अधिपति देवता चतुर्भुज ब्रह्मा हैं, और उनकी शक्ति चतुर्भुज डाकिनी भी साथ हैं जो चक्र की शक्ति की सूचक है। इस चक्र के अधिकारी गणेश हैं तथा इसका बीज वर्ण स्वर्णिम है। अतः यन्त्राकृति व तत्त्वरूप में पीतवर्ण के साथ स्वर्ण-सी आभा भी रहती है।

मूलाधार चक्र Muladhara Chakra जागरण के लक्षण ?

मूलाधार चक्र जागरण के लक्षण  सक्रिय होने पर लिप्सा, छल, हिंसा, शरारत, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार का नाश हो जाता है। इस चक्र का जागरण व्यक्ति के भीतर प्रेम और भावना जागृत करता है। जब यह जागृत हो जाता है, तो व्यक्ति के समय ज्ञान स्वचालित रूप से प्रकट होने लगता है। एक व्यक्ति एक बहुत ही आत्मविश्वासी, सुरक्षित, चरित्रगत रूप से जिम्मेदार और भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अत्यंत मित्रवत और बिना किसी स्वार्थ के, मानवता का प्रेमी और सर्वप्रिय व्यक्ति बन जाता है।

मूलाधार चक्र Muladhara Chakra  के फायदे ?

मूलाधार चक्र Muladhara Chakra के फायदे   आर्थिक तंगी से नजात मिलती है और धन के रास्ते खुलते है ।सक्रिय होने पर लिप्सा, छल, हिंसा, शरारत, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार का नाश हो जाता है। इस चक्र का जागरण व्यक्ति के भीतर प्रेम और भावना जागृत करता है। जब यह जागृत हो जाता है, तो व्यक्ति के समय ज्ञान स्वचालित रूप से प्रकट होने लगता है। एक व्यक्ति एक बहुत ही आत्मविश्वासी, सुरक्षित, चरित्रगत रूप से जिम्मेदार और भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता है
मूलाधार चक्र  Muladhara Chakra के रोग ?
  मूलाधार चक्र Muladhara Chakra के रोग  मुलाधार चक्र : इस चक्र में असंतुलन होने पर घुटने, कमर, जोड़ों में दर्द होता है। गुर्दे में संक्रमण, ट्यूमर, रीढ़ की हड्डी में दर्द होता है

मूलाधार चक्र Muladhara Chakra कहां होता है ? 

मूलाधार चक्र Muladhara Chakra कहां होता है दाढ़ चक्र हमारे शरीर में रीड हड्डी के सबसे निचले हिस्से में स्थित है।
मूलाधार चक्र  Muladhara Chakra को कैसे जागृत करें ?
मूलाधार चक्र  Muladhara Chakraको कैसे जागृत करें  गुरु से ज्ञान प्राप्त कर इस चक्र अभ्यास करना चाहिए तब यह चक्रा जगृत होगा
मूलाधार चक्र Muladhara Chakra मुद्रा ?
मूलाधार चक्र Muladhara Chakra मुद्रा  मूलाधार चक्र को जागृत करने के लिए साधना विज्ञान में कई प्रकार के अभ्यास उपाय बताए गए हैं। इनमें मूलबांध, नाड़ीमन्दन प्राणायाम चक्र का ध्यान और नासिका दृष्टि जिसे अग्रचारी मुद्रा भी कहा जाता है, प्रमुख हैं।
मूलाधार चक्र Muladhara Chakra बीज मंत्र ?
मूलाधार चक्र  Muladhara Chakra का बीज मंत्र लं lam है ! जिसका उच्चारण लम के साथ किया जाएगा

मूलाधार चक्र Muladhara Chakra  के विशिष्ट प्रभाव में आया हुआ मनुष्य प्राय: दस से बारह घंटे तक रात्रि में पेट के बल सोता है। मोह, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, द्वेष, कामुकता, प्रजनन एवं माया-इसी चक्र के प्रभाव के ही अर्न्तगत आते हैं। स्वास्थ्य, बल, बुद्धि, स्वच्छता तथा पाचन शक्ति भी इसी चक्र से सम्बन्धित है। शरीर की धातुओं, उपधातुओं व चैतन्य शक्ति को इसी चक्र से बल मिलता है। शारीरिक मलिनता का इस चक्र की अशुद्धि से सीधा सम्बन्ध है। सांसारिक प्रगति और चैतन्यता का मूल यह चक्र मनुष्य के देवत्व की ओर किए जाने वाले विकास का आधार है। मूलाधार चक्र का स्थान सुषुम्ना मूल में गुदा से दो अंगुल आगे व उपस्थ से दो अंगुल पीछे ‘सीवनी’ के मध्य में है। मूलबन्ध लगाते समय इसी प्रदेश को पैर की एड़ी से दबाया जाता है। नीचे की ओर चलने वाली अपान वायु का यह मुख्य स्थान है। इसका सम्बन्धित लोक भूलोक’ है। पंच महाभूतों में यह पृथ्वी तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि यह चक्र पृथ्वी तत्त्व का मुख्य स्थान है।

पृथ्वी तत्त्व से सम्बन्धित होने के कारण इसका प्रधान ज्ञान अथवा गुण ‘गन्ध’ है। अतः इसकी कर्मेन्द्रिय गुदा और ज्ञानेन्द्रिय नासिका है। इसका तत्त्वरूप चतुष्कोण चतुर्भुज (वर्गाकार) है, जो सुनहरे अथवा भूमिपीत वर्ण का है। इसकी यन्त्राकृति पीत वर्ण चतुष्कोण है, जो रक्त वर्ण से प्रकाशित चार पंखुड़ियों/दलों से युक्त है। सुरक्षा, शरण और भोजन इस चक्र के प्रधान भौतिक गुण हैं। इस चक्र का तत्त्व बीच ‘लं’ है, जो इसकी बीज ध्वनि का सूचक है। कमल दल ध्वनियां क्रमश: वं, शं, षं और सं हैं जो इसकी पंखुड़ियों के अक्षर हैं। इसके तत्त्व बीज का वाहन ऐरावत हाथी है। (जिस पर इन्द्र विराजमान हैं)। जो इसकी सामने की ओर की बीजगति को दर्शाता है। इस चक्र के अधिपति देवता चतुर्भुज ब्रह्मा हैं, और उनकी शक्ति चतुर्भुज डाकिनी भी साथ हैं जो चक्र की शक्ति की सूचक है। इस चक्र के अधिकारी गणेश हैं तथा इसका बीज वर्ण स्वर्णिम है। अतः यन्त्राकृति व तत्त्वरूप में पीतवर्ण के साथ स्वर्ण-सी आभा भी रहती है।

 

 

इस चक्र पर ध्यान के समय प्रयुक्त होने वाली कर मुद्रा में अंगूठे तथा कनिष्ठा अंगुली के सिरों को दबाया जाता है, जिसके प्रभाव में चैतन्य का मानवीकरण होता है। ध्यान के समय जब मूलाधार की तत्त्वबीज ध्वनि ‘लं’ का शुद्ध रूप से बार- बार उच्चारण किया जाता है तो ‘लं’ उच्चारण से उत्पन्न होने वाली विशेष तरंगें मूलाधार की नाड़ियों को उत्तेजित करती हैं तथा उर्ध्व मस्तिष्क को तरंगित करती हैं।

परिणामस्वरूप शक्ति के अधोगति में अवरोध उत्पन्न होकर शक्ति उर्ध्वगति (ऊपर की ओर गति करने वाली) होती है जिससे मूल आधार के प्रभावों-असुरक्षा, भय आदि का लोप होता है तथा मनोबल की प्राप्ति होती है। कुछ विद्वान इसे ‘यौनचक्र’ भी कहते हैं। योग मार्ग पर न जाने वाले साधकों के लिए भी मूलबन्ध का अभ्यास लाभकारी है (इस विषय में हम बन्ध प्रकरण में विस्तार से चर्चा करेंगे)। किन्तु एड़ी द्वारा सीवन को दबाते समय मूलबंध दृढ़ता से लगा रहे तथा लंगोट कसी रहे क्योंकि सीवनी मर्मस्थान है। शौर्यकला कुंगफू के सिद्धांतानुसार यहां पर किया प्रहार, आघात अथवा अनुचित दबाव नपुंसकत्व उत्पन्न करता है। मूलाधार Muladhara Chakra के अधिपति देवता ब्रह्मा ही क्यों हैं ? शक्ति डाकिनी ही क्यों है? अधिकारी गणेश ही क्यों हैं? आदि तत्त्वों की मीमांसा भी की जा सकती है, किन्तु उससे न केवल पुस्तक के कलेवर में वृद्धि होगी, अपितु यह चर्चा मूल विषय की सुगम्यता और लयबद्ध प्रस्तुति में बाधक भी होगी।

 

 

तिस पर इस चर्चा से योगमार्ग के साधकों अथवा कुण्डलिनी जागरण के इच्छुक पाठकों को कोई लाभ नहीं होगा, बल्कि वे कन्फ्यूज़ हो सकते हैं। अतः केवल पाण्डित्य सिद्ध करने के लिए ऐसी वे चेष्टा युक्ति संगत नहीं होगी-ऐसा सोचकर इस विषय में चर्चा नहीं कर रहा हूं। इच्छुक पाठक पत्र व्यवहार से अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त कर सकते हैं। वैसे तो चक्रों के स्वरूप का विराटता से वर्णन करना भी आवश्यक नहीं था, क्योंकि कार चलाना सीखने के लिए इंजन के सभी पुों का पूर्ण ज्ञान पाना अनिवार्य नहीं होता। आवश्यक भी नहीं होता, तथापि जिज्ञासा शांति के अलावा कुण्डलिनी जागरण के मन्त्र उपाय की चर्चा के समय इन तमाम जानकारियों की आवश्यकता पाठकों को पड़ेगी अतः पहले ही प्रसंगवश पूर्ण विवरण प्रस्तुत कर दिया गया है। बात मूलाधार चक्र की चल रही थी। मूलाधार चक्र Muladhara Chakra से होकर ही योग मार्ग या कुण्डलिनी यात्रा आरम्भ होती है। यही इस यात्रा का मूल उद्गम और प्रथम सोपान है। अत: इसे ध्यान से समझें।