प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान
प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364
माँ बगलामुखी की ब्रह्मास्त्र साधना लड़ाई-झगड़ा, शत्रुओं से परेशानी, मुकदमेबाजी और न्यायालय आदि में पूर्ण विजय पाने के लिये बगलामुखी महाविद्या की पूजा-अर्चना करने, उनके अनुष्ठान सम्पन्न कराने का प्रचलन अनंतकाल से चला आ रहा है। प्राचीनकाल से ही नहीं, आधुनिक समय में भी असंख्य लोगों ने माँ बगलामुखी की कृपा से शत्रु बाधाओं एवं न्यायालय में विचाराधीन मुकदमों आदि समस्याओं पर विजय पायी है तथा अन्य नाना प्रकार की आपदाओं से मुक्ति प्राप्त की है। माँ बगलामुखी की कृपा से उनके भक्त साधारण स्थिति से उठकर असाधारण रूप से उच्च पद तक पाने में सफल हुये हैं ।
बगलामुखी साधना
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माँ बगलामुखी का ध्यान मंत्र
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बगलामुखी साधना की सावधानियां
बगलामुखी बीज मंत्र
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माँ बगलामुखी की उपासना, अनुष्ठान आदि शत्रु बाधाओं के दौरान ही नहीं, अपितु अन्य अनेक कार्यों के निमित्त भी की जाती है। इनका सम्बन्ध एकाएक आर्थिक हानि से बचने, किसी अज्ञात भय से बचने, किसी के धोखे में फंस जाने, अकारण किसी के साथ लड़ाई-झगड़े में पड़ जाने, किसी अज्ञात शत्रु द्वारा परेशान किये जाने की भी समस्यायें हो सकती हैं। ऐसी समस्त प्रतिकूल स्थितियों से भी महामाई अपने साधकों को सहज ही निकाल लेती है। महामाई बगलामुखी की अनुकंपा से शीघ्र ही बिगड़े हुये काम बनने लगते हैं।
माँ बगलामुखी का दस महाविद्याओं में आठवां स्थान है। दरअसल आद्य शक्ति के दस रूप दसों दिशाओं में विद्यमान रहते हैं। उनमें दक्षिण दिशा की स्वामिनी महाविद्या बगलामुखी को माना गया है, इसलिये इनकी साधना का दक्षिण मार्ग ही अधिक प्रचलित है। शिवपुराण और देवी भागवत पुराण में शिव के दस रूपों की दस महाशक्तियां भी बताई गई हैं। यह दस महशक्तियां ही संसार में दस महाविद्याओं के रूप में पहचानी एवं पूजी जाती हैं। तंत्रशास्त्र में जगह-जगह इस बात का उल्लेख आया है कि शक्तिविहीन शिव भी शव के समान हो जाते हैं। शिव की जो भी क्षमताएं एवं शक्तियां हैं, उनके मूल में एक मात्र आद्यशक्ति ही कार्य करती है ।
शिव की दस आद्यशक्तियां हैं, जो इस प्रकार जानी जाती हैं- महाकाल शिव की शक्ति काली नामक महाविद्या है, शिव के काल भैरव रूप की शक्ति भैरवी नामक महाविद्या है, कबंध नामक शिव की शक्ति छिन्नमस्तका है, त्र्यंबकम् नामक शिव रूप की शक्ति हैं भुवनेश्वरी नामक महाविद्या, ठीक उसी प्रकार एकवक्त्र नामक महारुद्र शिव की महाशक्ति बगलामुखी नामक महाविद्या है। शिव के इस रूप को वल्गामुख शिव के नाम से भी जाना जाता है।
चमत्कारी उच्छिष्ट गणपति शाबर साधना uchchhishta ganapati sadhna उच्छिष्ट गणपति शाबर साधना समय के साथ-साथ अनेक परिवर्तन अपने आप होते चले जाते हैं। यह परिवर्तन अक्सर लोगों की मानसिकता में आने वाले बदलाव के परिणामस्वरूप परिलक्षित होते हैं। आज ऐसा समय है जहां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में बहुत अधिक प्रतिस्पर्द्धा देखने में आ रही है।
इस स्थिति का जो ठीक से सामना कर पाते हैं, वे निरन्तर उन्नति करते चले जाते हैं। अनेक लोगों से बहुत आगे निकल जाते हैं। जो पीछे रह जाते हैं, वे आगे निकले लोगों के प्रति ईर्ष्या से भर जाते हैं। ऐसे में उनका एकमात्र प्रयास रहता है कि किसी भी प्रकार से उन्हें चोट पहुंचाना, उन्हें परेशान करना ।
इसके लिये अनेक हत्थकण्डे अपनाये जाते हैं। इन्हीं में एक हत्थकण्डा यह भी है कि किसी को झूठे केस में फंसा कर अदालतों के चक्कर काटने को विवश कर देना । अनेक लोग इन्हीं कारणों से अदालतों में फंसे नजर आते हैं। कभी-कभी तो व्यक्तिगत शत्रुता निकालने के लिये भी ऐसा गलत कार्य कर देते हैं। ऐसी स्थिति में अक्सर आम व्यक्ति ही फंसता है । कभी-कभी तो ऐसे लोग भी फंस जाते हैं जिन्होंने कभी किसी अदालत का मुंह तक नहीं देखा था । ऐसा लोगों के लिये उच्छिष्ट गणपति साधना uchchhishta ganapat बहुत लाभदायक सिद्ध होती है ।
भगवान गणपति को समस्त प्रकार के सुख एवं वैभव देने वाले तथा कष्टों का हरण करने वाले देव के रूप में माना जाता है । इसलिये इस साधना के प्रभाव से अदालत में झूठे केसों में फंसे लोगों की समस्याओं का समाधान होने लगता है । इस साधना को अनेक साधकों द्वारा सम्पन्न किया गया है। उनमें से अधिकांश को अदालत ने सम्मान सहित बरी किया है। पाठकों के लिये इस साधना का उल्लेख कर रहा हूं ।
उच्छिष्ट गणपति Uchchhishta Ganapati शाबर साधना विधि इस शाबर गणपति अनुष्ठान के लिये सबसे पहले एक वट मूल (बरगद की जड़) निर्मित गणेश प्रतिमा, पांच गोमती चक्र और एक श्वेत चन्दन माला की आवश्यकता होती है। अनुष्ठान के लिये बैठने के लिये लाल रंग का ऊनी आसन, सिन्दूर, घी, धूप, दीप, लोबान, लाल कनेर के पुष्प, लाल रेशमी वस्त्र, स्वयं के पहनने के लिये एक लाल या श्वेत रंग की धोती, केसर से रंगा जनेऊ आदि वस्तुओं की आवश्यकता रहती है ।
सबसे पहले किसी विशेष शुभ मुहूर्त जैसे कि होली, दीपावली, दशहरा अथवा ग्रहण आदि के समय किसी वट वृक्ष की जड़ खोदकर घर ले आयें और उसे गणपति प्रतिमा का रूप प्रदान करके अपने पास रख लें। उसी शुभ मुहूर्त में इस वट गणेश प्रतिमा की विधिवत् षोडशोपचार पूजा-अर्चना करके चेतना सम्पन्न कर लेना चाहिये । ऐसी चेतना सम्पन्न प्रतिमा ही अनुष्ठान को सम्पन्न करने के काम में लायी जाती है ।
यह शाबर अनुष्ठान लगातार ग्यारह बुधवार को किया जाता । इसे किसी शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि अथवा शुक्लपक्ष के किसी भी बुधवार से प्रारम्भ किया जा सकता है। अगर इस शाबर अनुष्ठान को किसी प्राचीन गणेश मंदिर में बैठकर रात्रि के समय सम्पन्न किया जाये तो तत्काल इसका प्रभाव दिखाई देने लग जाता है । यद्यपि इस अनुष्ठान को किसी तालाब के किनारे स्थित वट वृक्ष के नीचे बैठकर अथवा घर पर भी किसी एकान्त कक्ष में सम्पन्न किया जा सकता है। अनुष्ठान काल में अन्य सदस्यों का प्रवेश इस कक्ष में वर्जित रहे ।
इस शाबर अनुष्ठान के लिये रात्रि का समय उपयुक्त रहता है। इसे प्रातःकाल चार से सात बजे के मध्य भी किया जा सकता है। जिस दिन से इस अनुष्ठान को शुरू करना हो, उस दिन रात्रि के नौ बजे के आसपास स्नान करके शरीर शुद्धि कर लें। स्वच्छ श्वेत या लाल रंग की धोती शरीर पर धारण कर लें। शरीर का शेष भाग निवस्त्र ही रहे। इसके पश्चात् अपने पूजाकक्ष में जाकर लाल ऊनी आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जायें । अगर यह अनुष्ठान गणेश मंदिर में बैठकर सम्पन्न करना हो तो उस स्थिति में पूर्वाभिमुख होकर बैठना आवश्यक नहीं है । उस स्थिति में गणेश प्रतिमा के सामने मुंह करके बैठना ही पर्याप्त रहता है।
आसन पर बैठने के पश्चात् अपने सामने लकड़ी की एक चौकी रख कर उसके ऊपर लाल रंग का रेशमी वस्त्र बिछा लें। चौकी पर चांदी या तांबे की एक प्लेट रख कर उसमें केसर से एक स्वस्तिक की आकृति बनायें और उस पर चेतना सम्पन्न वट मूल निर्मित गणपति प्रतिमा को स्थापित कर दें । एक कांसे की कटोरी में घी और सिन्दूर को ठीक से मिला लें तथा अग्रांकित गणपति मंत्र का ग्यारह बार उच्चारण करते हुये पहले गणेश प्रतिमा को गंगाजल के छींटें दें और फिर उस पर सिन्दूर का लेप कर दें।
उच्छिष्ट गणपति मंत्र Uchchhishta Ganapati MANTRA
गणपति मंत्र है- ॐ वट वरदाय विजय गणपतये नमः ।
सिन्दूर लेपन के पश्चात् उपरोक्त मंत्र का उच्चारण करते हुये गणेश प्रतिमा पर 21 लाल कनेर के पुष्प चढ़ावें । उन्हें अक्षत, पान, सुपारी और दूर्वा अर्पित करें। फिर गणेश जी पर इसी मंत्र का उच्चारण करते हुये एक-एक करके पांचों गोमती चक्र भी अर्पित कर दें।
गोमती चक्रों को अर्पित करने से पहले एक-एक लौंग, इलाइची और थोड़े से अक्षत अर्पित करें। इनके साथ ही गणपति के सामने घी का दीपक प्रज्ज्वलित करके रखें। गणपति को नैवेद्य के रूप में गुड़ और थोड़े से भुने हुये चने रखे जाते हैं। चौकी पर ही गणेश प्रतिमा के बायीं तरफ एक मिट्टी के बर्तन में गाय का जला हुआ कण्डा रखकर उसमें लोबान, सुगन्धबाला, सूखे हुये लाल गुलाब की पंखुड़ियां एवं की बार-बार धूनी दें।
तत्पश्चात् अपनी आंखें बंद करके तथा हाथों से ज्ञानमुद्रा (हथेलियों को खुला रख कर अंगुष्ठा मूल की ओर तर्जनी के प्रथम पोर का स्पर्श करना) बनाकर पूर्ण भक्तिभाव से अपनी प्रार्थना को बार-बार दोहराते रहें ।
वट मूल निर्मित यह गणपति प्रतिमा इतनी चेतना सम्पन्न बन जाती है कि जब साधक पूर्ण तन्यमयता के साथ अपनी प्रार्थना करता है, तो अनुष्ठान के प्रारम्भिक दिनों में ही वह एक विशेष प्रकार का कम्पन शरीर में अनुभव करने लग जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान अन्तिम ग्यारहवें बुधवार तक गणपति के सवा लाख मंत्रों का जाप करना होता है। अतः प्रत्येक रात्रि को कितने मंत्रों का जाप करना है, इसका निर्णय आप ही करें। इस अनुष्ठान में मंत्रजाप के लिये श्वेत चंदन माला का प्रयोग किया जाता है।
चंदन माला की जगह स्फटिक माला का प्रयोग भी किया जा सकता है। इस प्रकार के अनुष्ठानों में कभी भी पहले पूजा-पाठ के काम में लायी गई वस्तुओं का पुनः प्रयोग नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह बताया जाता है कि किसी भी तरह के अनुष्ठानों में त्रयुक्त की जाने वाली तांत्रोक्त वस्तुएं विशेष शक्ति सम्पन्न रहती हैं और उनकी यह शक्तियां पूजा-पाठ, अनुष्ठानों के दौरान प्रभावित होती रहती हैं ।
अतः प्रत्येक अनुष्ठान में सदैव नवीन चीजों को ही प्रयोग में लाना चाहिये । इनके अलावा भी कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिये। जैसे कि पूरे जपकाल के दौरान घी का दीपक निरन्तर जलते रहना चाहिये तथा मिट्टी के बर्तन में भी निरन्तर लोबान, घी आदि की समिधा अर्पित करते रहना चाहिये । जब प्रथम दिन का मंत्रजाप पूर्ण संख्या में सम्पन्न हो जाये तो एक बार पुनः अपनी प्रार्थना को गणपति के सामने दोहरा लेना चाहिये ।
तत्पश्चात् ही गणपति की आज्ञा लेकर आसन से उठना चाहिये । गणपति को जो गुड़ और भुने चने का नैवेद्य चढ़ाया जाता है। जप के पश्चात् उसमें से थोड़ा सा अंश निकाल कर मिट्टी के बर्तन की अग्नि को अर्पित करना चाहिये । उसका थोड़ा सा अंश कौये अथवा काले कुत्ते को खिला देना चाहिये तथा थोड़ा सा अंश स्वयं ग्रहण करके शेष को पानी में प्रवाहित कर देना चाहिये ।
इस शाबर गणपति अनुष्ठान का यह क्रम निरन्तर 31 दिन तक इसी प्रकार ही बनाये रखना चाहिये। यद्यपि इस अनुष्ठान के दौरान अपने सभी घरेलू अथवा व्यवसाय संबंधी कार्यों को पूर्ण रूप से जारी रखा जा सकता है, नौकरी आदि पर भी जाया जा सकता है, लेकिन पूरे अनुष्ठानकाल में पूर्ण सदाचार का पालन अवश्य करना चाहिये।
दिन में केवल एक समय सुपाच्य भोजन ग्रहण करें । ब्रह्मचर्य का पालन करें, अनुष्ठान के बीच-बीच में भी अपने अनुभवों पर गुरु के साथ विचार-विमर्श करते रहें । पूरे अनुष्ठान काल के दौरान मंत्रजाप के पश्चात् तेल का एक दीया जलाकर घर की मुण्डेर पर अथवा किसी वट / पीपल ( बेरी वृक्ष) के नीचे अवश्य रख दें। इस दीये का इस अनुष्ठान में विशेष महत्व होता है।
इस साधना क्रम को अगले ग्यारह बुधवार तक इस प्रकार से बनाये रखना चाहिये । प्रत्येक रात्रि को स्नान करके स्वच्छ श्वेत या लाल धोती पहन कर ही अनुष्ठान में बैठना चाहिये। चौकी पर एकत्रित हुई पूजा सामग्री को तथा मिट्टी के बर्तन की राख को किसी पात्र में भर कर एकत्रित करते रहना चाहिये ।
प्रत्येक दिन वटमूल निर्मित गणेश प्रतिमा को गंगाजल के छींटे मारकर घी मिश्रित सिन्दूर का लेपन करना चाहिये। मंत्रोच्चार के साथ नियमित रूप से 21 लाल कनेर के पुष्प, अक्षत, पान, सुपारी और पांचों गोमती चक्रों को पूर्ववत् अर्पित करते रहना चाहिये ।
इसके पश्चात् दीपदान करके गुड़ और भुने चने का नैवेद्य चढ़ाना चाहिये । तत्पश्चात् प्रथम दिन की भांति मिट्टी के बर्तन में आग जलाकर लोबान, लाल गुलाब की पंखड़ियां, सुगंधबाला और घी मिश्रित समिधा अर्प करनी चाहिये। इसके बाद अपनी आंखें बन्द करके और हाथों से ज्ञानमुद्रा बनाकर पूर्ण एकाग्रता के साथ अपनी प्रार्थना को बार-बार दोहराना चाहिये तथा गणपति से आज्ञा लेकर चंदन अथवा स्फटिक माला पर 4000 मंत्रजाप पूर्ण कर लेने चाहिये। जपोपरान्त की सम्पूर्ण प्रक्रिया को भी पूर्ववत् ही बनाये रखना चाहिये । आसन से उठने से पहले अपनी प्रार्थना को पुनः दोहरा लेना चाहिये तथा गणपति की आज्ञा लेकर ही आसन से उठना चाहिये ।
गणपति को अर्पित किये गये नैवेद्य का उपयोग भी पूर्ववत् करना चाहिये। साथ ही आसन से उठने के बाद तेल का एक दीप जलाकर घर की मुण्डेर अथवा वट या पीपल या बेरी वृक्ष के नीचे रख देना चाहिये। अनुष्ठान का यही क्रम है जो पूरे अनुष्ठान काल में बना रहता है ।
जिस दिन यह अनुष्ठान पूर्ण होने वाला होता है उस दिन नैवेद्य के रूप में गुड़ और भुने चनों के साथ मोतीचूर के लड्डू भी गणेश को अर्पित किये जाते हैं, साथ ही उस दिन मंत्रजाप पूर्ण हो जाने के पश्चात् 51 मंत्रों से घी की आहुतियां मिट्टी के बर्तन में दी जाती है। पांच कन्याओं को मिष्ठान आदि के साथ भोजन करवा कर एवं दान-दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
अनुष्ठान समाप्ति के पश्चात् गणपति प्रतिमा को छोड़कर शेष समस्त सामग्रियों को नये लाल रंग के वस्त्र में बांध करके बहते हुये पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है, जबकि गणपति प्रतिमा को अपने पूजास्थल पर प्रतिष्ठित कर लिया जाता है । इस प्रकार इस शाबर गणपति अनुष्ठान को सम्पन्न करने से निश्चित ही मुकदमे के निर्णय को अपने अनुकूल बदला जा सकता है।
जब तक मुकदमे की कार्यवाही पूर्ण न हो जाये, तब तक मुकदमे की प्रत्येक तारीख पेशी से पहले पड़ने वाले बुधवार को उक्त गणेश प्रतिमा के सामने बैठकर अपना यथाशक्ति (पांच या तीन माला) मंत्रजाप के क्रम को बनाये रखना चाहिये । न्यायालय की कार्यवाही के दौरान मानसिक रूप से मंत्र का जाप करते रहना चाहिये ।
यह शाबर पद्धति पर आधारित एक अद्भुत एवं प्रभावशाली अनुष्ठान है, जिसका प्रभाव अवश्य ही सामने आता है । एक सबसे महत्त्वपूर्ण बात की तरफ आपका ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है। उच्छिष्ट गणपति की यह साधना केवल वही साधक करे जो बिना किसी विशेष कारण से अदालत में किसी मुकदमे में फंसा दिया गया हो।
ऐसे व्यक्ति की ही गणपति सहायता करते हैं और उसे अवश्य समस्याओं और दुःखों से उभार लेते हैं । जो व्यक्ति जानबूझ कर किसी अपराध में लिप्त हुआ हो अथवा कोई आदतन अपराधी प्रवृत्ति का है, वह इस साधना को न करे। अगर ऐसे व्यक्ति यह साधना करते हैं तो उन्हें लाभ प्राप्त नहीं होगा ।
maa tara sadhna माँ तारा साधना और माँ तारा साधना के लाभ ph. 85280 57364
maa tara sadhna माँ तारा साधना और माँ तारा साधना के लाभ ph. 85280 57364 तारा महाविद्या और उनकी साधना का रहस्य तंत्र शास्त्र में माँ तारा का उल्लेख दूसरी महाविद्या के रूप में किया गया है । शाक्त तांत्रिकों में प्रथम महाविद्या के रूप में महाकाली का स्थान रखा गया है। तंत्र में महाकाली को इस चराचर जगत की मूल आधार शक्ति माना गया है।
इन्हीं की प्रेरणा शक्ति से यह जगत और उसके समस्त प्राणी जीवन्त एवं गतिमान रहते हैं । समस्त जीवन के प्राण स्रोत माँ काली के साथ संलग्न रहते हैं । इसीलिये इस शक्ति से विहीन जगत तत्क्षण निर्जीव हो जाता है। तंत्र के अति प्राचीन प्रतीकों में महाकाली को शिव पर आरूढ़ दिखाया गया है। यह भी इसी तथ्य का प्रतीक है कि ‘शक्ति’ हीन ‘शिव’ भी निर्जीव ‘शव’ के रूप में रूपान्तरित हो जाते हैं।
महाकाली के रूप में इस आद्यशक्ति का रहस्य बहुत अद्भुत है, क्योंकि चेतना के समस्त सूत्र इसी महाशक्ति में समाहित रहते हैं । इसीलिये महाकाली का ‘श्याम’ रूप माना गया है। जिस प्रकार सभी तरह के रंग काले रंग में विलीन हो जाते हैं, ठीक वैसे ही समस्त जगत काली में समाहित हो जाता है
जो साधक महाकाली को पूर्णत: समर्पित हो जाता है, उस साधक के समस्त कष्टों का माँ काली स्वतः ही हरण कर लेती है । इसीलिये महाकाली को समर्पित साधक समस्त प्रकार के दुःख, दर्द, पीड़ाओं, अभावों, कष्टों से मुक्त हो जाते हैं। बहुत से लोग अज्ञानवश महाकाली को भय, क्रोध और मृत्यु का प्रतीक भर मानते हैं । इस विश्वास से उनकी अज्ञानता ही उजागर होती है। वास्तव में महाकाली मृत्यु पर विजय और भयहीन होने की प्रतीक है।
महाकाली की भयानक एवं क्रोधयुक्त मुद्रा एवं उनका अति उग्र प्रदर्शन उनकी अनंत शक्ति का द्योतक है। तंत्र शास्त्र में प्रथम महाविद्या के रूप में महाकाली का अधिपत्य रात्रि के बारह बजे से प्रातः सूर्योदय तक रहता है। घोर अंधकार महाकाली का साधना काल है, जबकि सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ ही द्वितीय महाविद्या के रूप में तारा विद्या का साम्राज्य चारों ओर फैलने लग जाता है।
महाकाली चेतना का प्रतीक है तो तारा महाविद्या बुद्धि, प्रसन्नता, सन्तुष्टि, सुख, सम्पन्नता और विकास का प्रतीक है। इसीलिये तारा का साम्राज्य फैलते ही अर्थात् सूर्य की प्रथम रश्मि के भूमण्डल पर अवतरित होते ही सृष्टि का प्रत्येक कण चेतना शक्ति युक्त होता चला जाता है ।
रात्रि के अंधकार में जो जीव-जन्तु निद्रा के आवेश में आकर सुस्त और निष्क्रिय पड़ जाते हैं, फूलों की प्रफुल्लित हुई कलियां मुर्झा जाती हैं, प्राणियों में जो पशु भाव उतर जाता है, वह सब प्रातःकाल होते ही अपने मूल स्वरूप में लौट आता है ।
तारा महाविद्या का रहस्य बोध कराने वाली हिरण्यगर्भ विद्या मानी गई है। इस विद्या के अनुसार वेदों ने सम्पूर्ण विश्व (सृष्टि) का मुख्य आधार सूर्य को स्वीकार किया है। सूर्य अग्नि का एक रूप है। अग्नि का एक नाम हिरण्यरेता भी है। सौरमण्डल हिरण्यरेत (अग्नि) से आविष्ट है। इसीलिये इसे हिरण्यमय कहा जाता है।
आग्नेयमंडल के नाभि में सौर ब्रह्म तत्त्व प्रतिष्ठित है, इसलिये सौरब्रह्म को हिरण्यगर्भ कहा गया है । जिस प्रकार विश्वातीत कालपुरुष की महाशक्ति महाकाली है, उसी प्रकार सौरमण्डल में प्रतिष्ठित हिरण्यगर्भ पुरुष की महाशक्ति ‘तारा’ को माना गया है।
जिस प्रकार गहन अन्धकार में छोटा दीपक भी अत्यन्त प्रकाशमान प्रतीत होता है, उसी तरह महानतम के अर्थात् अंतरिक्ष में तारा शक्ति युक्त सूर्य सदैव प्रकाशमान बना रहता है, इसलिये श्रुतियों में सूर्य नक्षत्र’ नाम से भी जाने गये हैं।