Category: यंत्र मंत्र तंत्र ज्ञान

यंत्र मंत्र तंत्र ज्ञान mantra-tantra-yantra  गुरु मंत्र साधना एक मंत्र तंत्र साधना विज्ञान एक प्लेटफार्म है यहा पर मंत्र तंत्र साधना सम्बन्धी ज्ञान प्रदान किया जाता है जो ज्ञान   साधू  संताओ से प्रपात किया है । इस वेबसाइट में तंत्र की  लेख और वीडियो प्रपात होंगे । 

तंत्र के दशकर्मो सम्बन्धी समान्य जानकारी tantra ki dashkarmosambandiSamany

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तंत्र के दशकर्मो सम्बन्धी समान्य जानकारी tantra ki dashkarmosambandiSamany

तंत्र के दशकर्मो सम्बन्धी समान्य जानकारी  tantra ki

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tantra dashkarm
tantra dashkarm

तंत्र के दशकर्मो सम्बन्धी समान्य जानकारी  tantra ki dashkarmo sambandi Samany 

tantra dashkarm तंत्र की असंख्य चमत्कारी साधनाओ का जिक्र मिलता है । अनेको पद्धतियों से य्ह प्रयोग किया जाता है।कार्य की विशिष्टता के अनुसार इनके मन्त्र तंत्र पद्धतियाँ का प्रयोग प्रचलित है । जिन पद्धतियों का संसार में सब से ज्यादा प्रयोग किया जाने लगा । तंत्र की कुछ विशेष पद्धतियों को 6 भागो मे बांटा गया है शान्तिं वश्यं स्तम्भनं च द्वेषं उच्चाटने-मारणे। उक्तानि इमानि कर्माणि शान्तिरोगादि नाशनम् ॥ अर्थात-(१) शान्ति कर्म, (२) वशीकरण, (३) स्तम्भन, (४) विदेषण (५) उच्चाटन एवं (६) मारण-कार्यों, रोग-शत्रु आदि कष्टों के निवारण हे प्रकार के प्रयोगों को षट्कर्म कहते हैं। tantra dashkarm

 

मंत्र प्रयोगो का जैसे समय अनुसार समस्याओ और मनोकामनाओ की पूर्ती के लिए विस्तार बढ़ना लगा कालान्तर में षटकर्मों के वर्गीकरण के अन्तर्गत ही चार प्रयोग और भी जोड़ दिए गए यह कुल दस हो गए जिन को दशकरम बोला जाता है जो निम्नलिखित है ।

(१) शान्तिकर्म, (२) स्तम्भन, (३) मोहन, (४) उच्चाटन, (५) वशीकरण (६) आकर्षण, (७) जृम्भण, (८) विद्वेषण, (९) मारण एवं (१०) पौष्टिक कर्म।

दशकर्म सम्बन्धी लक्षण तथा उनकी अधिष्ठात्री देवी ।। tantra dashkarm

(1) शान्ति कर्म : किसी भी कल्याणकारी कामना से की गई साधना शान्ति कर्म कहलाती है। इस कर्म के अन्तर्गत साधना का मुख्य उद्देश्य परिवारिक एवं सामाजिक क्षेत्र में कल्याणकारी एवं लोकहित की दृष्टि से कर्म किए जाते हैं। इसमें ग्रहों के अनिष्टकारी प्रभाव, रोगादि, दुर्भिक्ष एवं प्राकृतिक उपद्रवों के निवारण हेतु मंत्र प्रयोग किए जाएं तो वह शान्ति प्रयोग कहे जाते हैं। इसकी अधिष्ठात्री देवी रति है। मतान्तर से शान्ति कर्मों के देवता गणेश व अम्बिका देवी हैं।  tantra dashkarm

(2) स्तम्भुन : जिस मंत्र, यन्त्र, तन्त्रादि क्रिया से शत्रु, चोर, डाकू, सर्प, वाघ आदि के आक्रमण, अग्नि, जल, वायु, वाहन एवं शस्त्र को निष्क्रिय करने के लिएअर्थात् वह जहां का तहां अटक जाए या स्थगित एवं स्तम्भित हो जाए उसे स्तम्भन प्रयोग कहते हैं। इसकी अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी (रमा) है।  tantra dashkarm

(3) मोहन कुर्म : मोहन अथवा सम्मोहन दोनों लगभग एक हैं। इस प्रयोग के अन्तर्गत किसी भी लौकिक प्राणी, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि को सम्मोहित एवं वशीभूत किया जा सकता है। राज-मोहन, सभा-मोहन और स्त्री-पुरुष मोहन तीन प्रकार के हैं। इन तीनों की साधनाएं भी पृथक-पृथक हैं। भारतीय अध्यात्म एवं

मंत्रशास्त्र की यह अति प्राचीन एवं विस्तृत प्रभाव वाली अद्भुत विद्या है।

(4) उच्चाटन कर्म : जिस प्रयोग के करने से विद्वेषी की तन्मयता भङ्ग हो, मन उचाट एवं अस्थिर हो, भ्रम की मनोस्थिति, स्थान एवं पद से भ्रष्ट हो जाता है,  tantra dashkarm

उच्चाटन कर्म कहते हैं। जब कोई मान्त्रिक उच्चाटन मंत्र द्वारा किसी व्यक्ति विशेष को उचाटता एवं वितृष्णा की स्थिति में पहुंचा देता है, तो भी यह उच्चाटन कर्म

419 | कहलाता है। इसकी अधिष्ठात्री देवी दुर्गा देवी हैं।

(5) वशीकरण कुर्म : जिस प्रयोग के करने से किसी भी स्त्री या पुरुष की इच्छाशक्ति को निस्तेज करके साधक अपनी इच्छानुसार कार्य लेता है, उसको वशीकरण कहते हैं। इसके प्रभाव से प्रतिकूल मन वाला व्यक्ति भी साधक की शरण में आ जाता है। इसकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती है। |

(6) आकर्षण कुर्म : आकर्षण कर्म भी मोहन और वशीकरण का प्रकारान्तर है। इनमें नाम मात्र भेद हैं। मोहन में जहां अनुकूल बनाने का भाव मुख्य है, वहीं वशीकरण में जीव को अनुकूल एवं अपने अधीनस्थ करने का भाव होता है। आकर्षण में किसी भी दूसरे व्यक्ति को आत्मविस्मृतं करवाकर उसके ध्यान या प्रवृत्ति को अपनी

ओर आकर्षित करने का भाव रहता है। आकर्षण मानसिक रूप से किसी व्यक्ति विशेष को खींचने का भाव ही आकर्षण कर्म होता है। आकर्षण कर्म के प्रभाव से सम्बन्धित प्राणी साधक की इच्छानुसार उसके आकर्षण पाश के बन्धन में रहता है।  tantra dashkarm

(7) जुम्भुण कर्म : जब किन्हीं दो अथवा अधिक व्यक्तियों के मध्य पारस्परिक प्रेमभाव एवं मित्रता समाप्त करके उनमें वैर-विरोध, भय, अविश्वास और अलगाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से किये कर्म को जृम्भण कर्म कहते हैं।

(8) विद्वेषण : विद्वेषण कर्म का प्रभाव भी प्राय: जम्भण जैसा होता है। इस कर्म के प्रयोग से परिवारों में या जाति, समाज या देश में सद्भावना समाप्त करवाकर परस्पर वैमनस्य, फूट या वैर-विरोध पैदा हो जाए, उसे विद्वेषण कहते हैं। इसकी अधिष्ठात्री ज्येष्ठा देवी है।

(9) मारण कुर्म : जिस मंत्र प्रयोग से किसी की जीवन शक्ति का नाश करके असामयिक उसके प्राणों का हरण कर लिया जाए उसे मारण कर्म कहते हैं। मारण, उच्चाटन, जृम्भण, विद्वेषण आदि तामसी प्रयोग हैं। इनके प्रयोग वर्जित एवं निन्दनीय हैं। इनकी अधिष्ठात्री देवी भद्रकाली देवी है। |

(10) पौष्टिक कुर्म : जब कोई साधक अपने अथवा किसी अन्य के कल्याण

या हित के लिए जैसे सुख-समृद्धि, रोग-मुक्ति या परिवारिक एवं राष्ट्रीय एकता या । प्रभु की कृपा प्राप्ति के लिए मंत्र साधना करता है, तो उसे पौष्टिक कर्म कहते हैं। tantra dashkarm

यह कर्म श्रेष्ठ माना गया है। पौष्टिक कर्मों के अधिष्ठाता भगवान शिव हैं। साधक को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से मुक्त होकर आध्यात्मिक सिद्धि की प्राप्ति के लिए। कर्म करना और सभी के लिए मन्त्र साधना के शुभ लाभ को प्राप्त करना ही सर्वश्रेष्ठ कर्म है।

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vashikaran uchatan akarshan mantra paryogo savdhani वशीकरण, उच्चाटन,आकर्षणादि मन्त्र प्रयोगों में सावधानी ।

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vashikaran uchatan akarshan mantra paryogo savdhani

वशीकरण, उच्चाटन,आकर्षणादि मन्त्र प्रयोगों में सावधानी ।

vashikaran uchatan akarshan mantra
vashikaran uchatan akarshan mantra

vashikaran uchatan akarshan mantra कोई वस्तु या शक्ति न तो अच्छी होती है और न ही बुरी होती है। उसका प्रयोग | भी उसको अच्छा या बुरा बना देता है। कोई भी शक्ति ऐसी नहीं जिसका अच्छा या बुरा योग न हो सके। शक्ति या कोई उच्च पदवी जब किसी सद्चरित्र भले मनुष्य के पास होती है, तो वह उसके द्वारा सबका भला करता है और दूसरों को सुख पहुंचाता है। उनके कष्ट निवारण करने का प्रयत्न करता है। यदि वही शक्ति या उच्च पदवी किसी दष्ट एवं नीच मनुष्य के पास होती है, तो वह उसके द्वारा संसार में अनाचार उत्पन्न करने का प्रयत्न करता है, दूसरों को दु:ख देता है और अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए अपने आप को गिरावट में ले आता है।vashikaran uchatan akarshan mantra

जिस वशीकरण से संसार में बुरे मनुष्यों का सुधार किया जाता था  vashikaran uchatan akarshan mantra

वहां उसका प्रयोग काम और क्रोध की वासनाओं को पूरा करने के लिये होने लगा है। उच्चाटन से समाज और देश के शत्रुओं का नाश किया जाता है। आकर्षण से जो शत्रु थे उनको बुला कर मित्रता की जाती थी, परन्तु अब कुत्सित कामना पूर्ति के लिए इसका प्रयोग किया जाने लगा है। इस प्रकार मन्त्रों के प्रयोगों का विपरीत प्रयोग करके मन्त्र शास्त्र के उन प्रयोगों में विष उत्पन्न किया जाने लगा है। मन्त्रों में बड़ी शक्ति है। उनका आश्रय लेकर मनुष्य दु:खों से निवृत्ति प्राप्त करके ईश्वर के चरणों में पहुंच जाता है। साधारण कामनाओं को पूरा करने के लिये, छोटे-छोटे शारीरिक दु:खों से निवृत्ति प्राप्त करने के लिये उस बड़ी शक्ति का प्रयोग वैसे ही है जैसे किसी राजा को प्रसन्न करके उससे बहुमूल्य पदार्थों के बदले तुच्छ वस्तु । vashikaran uchatan akarshan mantra

मांगना अथवा जवाहरात के बदले कांच मांगना। चाहे हमारी कामना ठीक ही हो परन्तु । इतनी बड़ी शक्ति से साधारण वस्तु के लिये प्रार्थना करना एक भूल है। उसके द्वारा तो । नित्य रहने वाला आनन्द, चित्त की शांति और अमृत जीवन पाना चाहिए। मन्त्र का सबसे अधिक दुरुपयोग दसरों का अनिष्ट चिन्तन है, अथवा दुष्ट वासनाओं को पूरा करने का लोभ है। vashikaran uchatan akarshan mantra
मन्त्र में शक्ति है, इस कारण साधक जो इच्छा करेगा वह अवश्य उस 3 द्वारा पूर्ण होगी। जब साधक इच्छा को पूरा करने के लिए अथवा दूसरों को कष्टपहुंचाने के लिए करता है तो उसमें काम, क्रोध आदि उत्पन्न होता है। | भोग से कभी वासनाओं की तृप्ति तो होती ही नहीं है, वह और भी तेज हो जाती

शिव हैं। मैं सामर्थ हूं’ यह अहंकार उसको अन्धा बना देता है। वह वासनाओं में और
है। अधिक फंस जाता है और शक्ति के अधार से पाप में प्रवीण हो जाता है। मन की सात्विक शक्तियां नष्ट हो जाती है, रज और तम उस पर अधिकार कर लेते हैं। वह मनुष्य से दूर हो जाता है। स्वार्थ उसके शुभ विचारों को नष्ट कर देता है। जिस मनुष्य जीवन को पाकर मनुष्य जन्म मरण से छूट जाता था। इसके द्वारा वह अपने लिए घोर नरक। बनाता है। vashikaran uchatan akarshan mantra

संसार में जितनी भी शक्तियां हैं उनमें मानसिक शक्ति सब से प्रधान है। जिस मनुष्य में जितनी भी मानसिक शक्ति अधिक है वह उतना ही बड़ा बन सकता है। तेज, बल, प्रभाव सब मानसिक शक्ति के धर्म हैं परन्तु जब मन्त्र का प्रयोग कुटिल वासनाओं के लिए होता है तब उसका बहुत सा बल नष्ट भी हो जाता है। मन्त्रों को उपयोग वासनात्मक कामनाओं की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि ईश्वर की कृपा पाने के लिए होना चाहिए। vashikaran uchatan akarshan mantra

 

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मन्त्रों को गुप्त रखना मन्त्रों को गुप्त रखना mantro ko gupat rakhna (guru mantra sadhna)

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मन्त्रों को गुप्त रखना mantro ko gupat rakhna (guru      mantra sadhna)

मन्त्रों को गुप्त रखना mantro ko gupat rakhna (guru

mantra sadhna)

a554137e339030d5cdc1c3af49594cfe https://gurumantrasadhna.com/mantra-tantra-yantra/page/9/

मन्त्रों को गुप्त रखना   mantro ko gupat rakhna (guru mantra sadhna) मन्त्र सिद्धि के लिये जिन संस्कारों की आवश्यकता बताई गई है उनमें अन्तिम संस्कार है ‘‘गुप्ती” अर्थात् गुप्त रखना या मन्त्र किसी को बताना नहीं। मन्त्रसाधक के बारे में यह किसी को पता न लगे कि वह किस मन्त्र का जप करता है। यदि नाम का जप मन्त्रविधि से होता है तो उसको भी गुप्त रखना चाहिये। यदि जप के समय को
पास हो तो मानसिक जप करना चाहिए। उपांशु जप करना हो तो सर्वदा एकांत पर करना चाहिए।

मन्त्रों को गुप्त रखना mantro ko gupat rakhna

मन्त्रों का कीर्तन तो कभी भी नहीं होना चाहिए। वाचिक उसे कीर्तन होता है और उसकी विधि कोई नहीं होती है। परन्तु मन्त्र का संकीर्तन किसी भी अवस्था में नहीं होना चाहिए । एक मन्त्र के ग्रहण का सबको अधिकार होता । मन्त्र के गुप्त रखने का फल यह होता है कि लोगों की व्यर्थ बातों से बच । ९। जस मन्त्र को ग्रहण करने की अभिलाषा होती है वह विद्वान् गुरु के पास जा गुरु उसकी योग्यता के अनुकूल मन्त्र देता है, जिसके साधन से वह अपनी कामना का प्राप्त करता है। शास्त्रों में ऐसी आज्ञा है कि मन्त्र को हर किसी के समक्ष प्रकट करना चाहिए। इससे मन्त्र के प्रभाव फल में कमी हो जाती है।

कुपात्र व्यक्ति को टि गया मंत्र, दुरुपयोग होने की आशंका होती है। कई बार मनुष्य पाप का भागी हो जाता है। अत: इसे गुप्त रखना ही कल्याणकारी माना गया है।
‘एतद् गोप्यं महागोप्यं न देयं यस्य कस्यचित् ।” शाबर मन्त्र और ऐसे दूसरे भी मन्त्र श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर होते हैं क्योंकि देखा गया है कि अच्छी से अच्छी औषधि पर भी विश्वास न हो तो लाभ नहीं होता। वैद्य लोग इसी लिये औषधि का नाम नहीं बतलाते हैं। मन्त्रों के बारे में भी यही बात

मन्त्रों को गुप्त रखना mantro ko gupat rakhna

 

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yakshini related basic knowledge and shodhna yakshni sadhna यक्षिणीसम्बन्धी प्रारम्भिक जानकारी और शोभना यक्षिणी साधना (2022)

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यक्षिणी सम्बन्धी प्रारम्भिक जानकारी और शोभना यक्षिणी साधना yakshini related basic knowledge and shodhna yakshni sadhna

यक्षिणी सम्बन्धी प्रारम्भिक ज्ञान शोभना यक्षिणी साधना

yakshini related basic knowledge and shodhna

yakshini sadhna

 

 

यक्षिणी सम्बन्धी प्रारम्भिक जानकारी और शोभना यक्षिणी साधना yakshini related basic knowledge and shodhna yakshni sadhna
यक्षिणी सम्बन्धी प्रारम्भिक जानकारी और शोभना यक्षिणी साधना yakshini related basic knowledge and shodhna yakshni sadhna

 

आज हम यक्षिणी साधना के उपर चर्चा करेंगे कौन सी यक्षिणी 

की साधना आप के लिए उपयोग रहेंगी। 

पहले हम यक्षिणी साधना के विषय मे समाज में बहुत सी गलत

 धारणाएँ हैं । 

कुछ लोगों का मानना है कि यक्षिणी खून मनुष्य का खून चूसती 

हैं।

प्रत्येक व्यक्ति के मन यक्षिणी साधना के सम्बन्ध में कई प्रकार की धारणा है कुछ साधक इस विषय अंजान है ज्ञानता के कारण इस साधना के बारे में गलत सोचते है इस साधना तामसिक साधना समझते हैं बहुत से लोग यक्षिणी का नाम सुनते ही डर जाते हैं कि ये बहुत भयानक होती हैं, किसी चुडैल कि तरह, किसी प्रेतानी कि तरह, मगर ये सब सब आज्ञानता पूरन बाते है । यक्षिणी साधना के विषय मे समाज जो असत्य मिथ्या धारणाओं को दूर करने का प्रयत्न करूंगा अस्ल में यक्षिणी साधना क्या इस के विषय बताने का प्रयत्न करूंगा है । कोई भी साधना करने से पहले उस साधना की प्रारम्भिक जानकारी होने जरूरी है हम भटक न सकें ।

 

यक्षिणी साधना परिचय yakshni sadhna related introduction

yakshni sadhna यक्षिणी एक सौम्य और दैविक शक्ति होती है देवताओं के बाद देवीय शक्तियों के मामले में यक्ष का ही नंबर आता है हमारे भारतीय पौराणिक ग्रंथो में बहुत सारी प्रमुख रहस्यमयी जातियां का वर्णन मिलता है । जैसे कि देव गंधर्व ,यक्ष, अप्सराएं, पिशाच, किन्नर, वानर, रीझ, ,भल्ल, किरात, नाग आदि यक्षिणी भी इन रहस्यमय शक्तियो के अंतर्गत आती है । देवताओं के कोषाध्यक्ष महर्षि पुलस्त्य पौत्र विश्रवा पुत्र कुबेर भी यक्ष जाती के हैं । जैसे कि देवताओं के राजा इंद्र है वैसे ही यक्ष यक्षिणी काराजा कुबेर है कुबेर को यक्षराज बोला जाता है यक्ष यक्षिणीया कुबेर के आधीन होती है।

यक्षिणी साधना को किसी रूप में सिद्ध किया जाता है yakshni sadhna ko kis roop me siddh kiya jata hai

yakshni sadhna कुछ साधको के मन शंकाआऐं होता है कि यह किसी रूप मे सिद्ध होती है कुछ लोगों की धारणा यह सिर्फ प्रेमिका रूप में सिद्ध की जा सकती है जो कि बिलकुल गलत है साधक इच्छा अनुसार किसी भी रूप सिद्ध कर सकता है । इच्छा अनुसार, माता , पुत्रीव स्त्री ( पत्नी ) के रूप में सिद्ध कर सकते है यक्षिणियों की साधना अनेक रूपों में की जाती है, जैसे माँ, बहन, पत्नी अथवा प्रेमिका के रूप में इनकी साधना की जाती है, ओर साधक जिस रूप में इनको साधता है ये उसी प्रकारका व्यवहार व परिणाम भी साधक को प्रदान करती हैं, माँ के रूप में साधने पर वह ममतामयी होकर साधक का सभी प्रकार से पुत्रवत पालन करती हैं तो बहन के रूप में साधने पर वह भावनामय होकर सहयोगात्मक होती हैं, ओर पत्नी या प्रेमिकाके रूप में साधने पर उस साधक को उनसे अनेक सुख तो प्राप्त हो सकते हैं किन्तु उसे अपनी पत्नी व संतान से दूर हो जाना पड़ता है ।उड्डीश तंत्र में जिक्र मिलता है कि इस को किसी भी रूप मे सिद्ध किया जा सकता है ।

सर्वासां यक्षिणीना तु ध्यानं कुर्यात् समाहितः ।

भविनो मातृ पुत्री स्त्री रुपन्तुल्यं यथेप्सितम् ॥

तन्त्र साधक को अपनी इच्छा के अनुसार बहिन , माता , पुत्रीव स्त्री ( पत्नी ) के समान मानकर यक्षिणियों के स्वरुप में साधना अत्यन्त सावधानीपूर्वक करना चाहिए । कार्य में तनिक – सी भी असावधानी हो जाने से सिद्धि की प्राप्ति नहीं होती ।

इस श्लोक से उपरोक्त बात स्पष्ट होती है कि आप इच्छा अनुसार, माता , पुत्रीव स्त्री ( पत्नी ) के रूप में सिद्ध कर सकते है ।

अष्टम यक्षिणी प्रमुख आठ यक्षिणीया ashat yakshni parmukh aath yakshniya

जैसे कि मनुष्यो कुछ विशेष मनुष्य होते है उसी तरह यक्षिणी में भी कुछ विशेष यक्षिणीया होती है । सभी योनियों में इस तरह से होता है । इनमे से निम्न 8 यक्षिणियां प्रमुख मानी जाती है

1.सुर सुन्दरी यक्षिणी

2.मनोहारिणी यक्षिणी

3.कनकावती यक्षिणी

4.कामेश्वरी यक्षिणी

5.रतिप्रिया यक्षिणी

6.पद्मिनी यक्षिणी

7.नटी यक्षिणी

8.अनुरागिणी यक्षिणी

किस यक्षिणी की साधना से क्या फल मिल सकता kiss yakhni ke sadhna se kya phal milta hai

 

सुर सुन्दरी यक्षिणी

यक्षिणी सम्बन्धी प्रारम्भिक ज्ञान शोभना यक्षिणी साधना

यह यक्षिणी सिद्ध होने के बाद साधक को ऐश्वर्य, धन, संपत्ति आदि प्रदान करती है।

 

मनोहारिणी यक्षिणी ये यक्षिणी सिद्ध होने पर साधक के व्यक्तित्व को ऐसा सम्मोहक बना देती है, कि हर व्यक्ति उसके सम्मोहन पाश में बंध जाता है।

 

कनकावती यक्षिणी कनकावती यक्षिणी को सिद्ध करने पर साधक में तेजस्विता आ जाती है। यह साधक की हर मनोकामना को पूरा करने मे सहायक होती है।

 

कामेश्वरी यक्षिणी यह साधक को पौरुष प्रदान करती है और सभी मनोकामनाओं को पूरा करती है।रति प्रिया यक्षिणीसाधक और साधिका यदि संयमित होकर इस साधना को संपन्न कर लें तो निश्चय ही उन्हें कामदेव और रति के समान सौन्दर्य मिलता है।

 

रति प्रिया यक्षिणी yakshni sadhna   साधक  और साधिका यदि संयमित होकर इस साधना को संपन्न कर लें तो निश्चय ही उन्हें कामदेव और रति के समान सौन्दर्य मिलता है।

 

पद्मिनी यक्षिणी यह अपने साधक को आत्मविश्वास व स्थिरता प्रदान करती है और हमेशा उसे मानसिक बल प्रदान करती

 

नटी यक्षिणी को विश्वामित्र ने भी सिद्ध किया था।यह अपने साधक कि पूर्ण रूप से सुरक्षा करती है।

 

अनुरागिणी यक्षिणी साधक पर प्रसन्न होने पर उसे नित्य धन, मान, यश आदि प्रदान करती है और साधक की इच्छा होने पर सहायता करती है

विशेष कामना पूर्ति के हिसाब से अलग अलग साधनाओ को किया जाता है

यक्षिणी अन्य साधना से जल्दी सिद्ध होती है yakshni any sadhna se jaldhi siddhi hote hai

हमारे प्राचीन भारतीय ग्रंथो में बहुत सारे लोको का वर्णन मिलता है इस ब्रह्मांड में कई लोक हैं। सभी लोकों के अलग-अलग देवी देवता हैं जो इन लोकों में रहते हैं । पृथ्वी से इन सभी लोकों की दूरी अलग-अलग है। मान्यता है नजदीकि लोक में रहने वाले देवी-देवता जल्दी प्रसन्न होते हैं, क्योंकि लगातार ठीक दिशा और समय पर किसी मंत्र विशेष की साधना करने पर उन तक तरंगे जल्दी पहुंचती हैं। यही कारण कि यक्ष, अप्सरा, किन्नरी आदि की साधना जल्दी पूरी होती है, क्योंकि इनके लोक पृथ्वी से पास हैं।  yakshni sadhna

तंत्र ग्रंथो के अनुसार यक्षिणी साधना को संपन्न करने के लिए विशेष नियम tantra gratho ki anusaar yakshni sadhna ko sampan kani ki lea vishesh niyam

भोज्यं निरामिष चान्नं वर्ज्य ताम्बूल भक्षणम् ॥

उपविश्य जपादौ च प्रातः स्नात्वा न संस्पृशेत् ॥

यक्षिणी साधन में निरामिष अर्थात् मांस तथा पान का भोजन सर्वथा निषेध है अर्थात् वर्जित है । अपने नित्य कर्म में , प्रातः काल स्नान आदि करके मृगचर्म ( के आसन ) पर बैठकर फिर किसी को स्पर्श न करें । न ही जप और पूजन के बीचमें किसी से बात करें ।

नित्यकृत्यं च कृत्वा तु स्थाने निर्जनिके जपेत् ।यावत् प्रत्यक्षतां यान्ति यक्षिण्यो वाञ्छितप्रदाः ॥

अपना नित्यकर्म करने के पश्चात् निर्जन स्थान में इसका जप करना चाहिए । तब तक जप करें , जब तक मनवांछित फल देने वाली ( यक्षिणी ) प्रत्यक्ष न हो । क्रम टूटने पर सिद्धि में बाधा पड़ती है । अतः इसे पूर्ण सावधानी तथा बिना किसी को बताए करें ।

Shobhna yakshni sadhna शोभना यक्षिणी साधना

यक्षिणी सम्बन्धी प्रारम्भिक जानकारी और शोभना यक्षिणी साधना yakshini related basic knowledge and shodhna yakshni sadhna
यक्षिणी सम्बन्धी प्रारम्भिक जानकारी और शोभना यक्षिणी साधना yakshini related basic knowledge and shodhna yakshni sadhna

शोभना यक्षिणी के विषय में आज जानकारी देने का प्रयत्न करूँगा अगर आप को यक्षिणी साधना के सम्बन्ध में प्रारंभिक जानकारी नहीं है तो उपरोक्त दी गई जानकारी को अवश्य पढे जरूर पढे । कोई भी साधना करने से पहले उस साधना के विशष में जानकारी होना बहुत जरूरी है साधना की प्रारम्भिक जानकारी न होने के कारण आप भटक सकते हो । इस लिए आप पहले उस पोस्ट को जरूर पढे पहले वाली पोस्ट के बाद बहुत सारे साधको का फोन आया कि हमे कोन सी यक्षिणी की साधना से हमें शुरूआत करनी चाहिए कोई ऐसी साधना बताऐ जो सरल हो जिससे घर पर ही संपन्न हो जाए । इस लिए आज आप को ऐसी साधना की जानकारी देने का प्रयत्न करूंगा जो आप घर पर संपन्न कर सिद्धीया कर सकते है ।  yakshni sadhna

शोभना यक्षिणी साधना आप इस साधना को घर पर ही सिद्ध कर सकते हैं यह जितनी सरल साधना उतनी ही प्रभावकारी भी हैं । शोभना यक्षिणी का रूप शांतिमय तेजस्विता से पूरण अत्यंत ही ख़ूबसूरत और यौवन आकर्षण से परिपूर्ण होती है। अगर वृद्धि व्यक्ति इस साधना करें एक युवक की तरह यौवनवान हो जाएगा । साधक काल के दिनो में साधक के शरीर जोश और चेहरे के उपर लालीमा और तेज आ जाता है । दिवय आकर्षण शक्ति प्राप्त होती शत्रु के मन में आप के प्रति आदर भाव पैदा होता है अगर शादी शुदा हो पती पत्नी के रिश्ते में मधुरता आ जाती है । संसार में मान सम्मान की प्राप्ती होती है । साधना के दिनो में आप यह बदलाव महसूस करोगे । हर वह साधक जो साधना क्षेत्र में आगे नया है लेकिन तंत्र मंत्र साधना में आगे बढ़ना चाहता वह साधक शोभना से शुरुआत करनी चाहिए वैसे यह साधना हरेक के लिए है । हरेक मनुष्य इस साधना को कर सकता है स्त्री पुरूष कर सकता है । अगर स्त्री करे तो आपर सुंदरता की प्राप्ती होती है।
yakshni sadhna

(Sadhna vidhi) साधना विधी – साधना में लाल आसन और लाल माला रक्त चंदन की लकड़ी की होनी चाहिए साधक खुद लाल वस्त्र धारण करने चाहिए । साधना वाले कमरे को पहले अच्छे तरह से साफ करे दूध से धोकर इत्र का पोचा लगाए । लाला रंग के आसन पर गंगा जल छिटकाव करना चाहिए । फिर वातावरण को सुगंधित करने के लिए गूगल की धूप जलाए । यक्षिणी मंत्र का 31 माला जप करे 40 दिन तक। साधक को साधना के दिनो में यक्षिणी के दर्शन हो पास आकर बैठ जाए बोले नहीं देवी को दूर से प्रणाम करें बिना आपने आसन से उठे जप करते रहें ।  yakshni sadhna

 

shobna yakshini mantra

 

ॐ ड्रीम अशोक पलवा करतले शोबने श्रीं क्ष स्वः

 

Shobhna yakshni sadhna ki labh शोभना यक्षिणी साधना के लाभ

शोभना यक्षिणी साधक इच्छा अनुसार भोग विलास परूती भी करती है ।

साधक त्रिकाल प्रदान करती है भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी भी प्रदान करती है ।

ईस साधना से साधक को यौवन शक्ति और सौदर्य की प्राप्ति होती है जिससे के साधक स्त्री और पुरुष सभी आकर्षित रहते ।

यक्षिणी साधक संसार शोभा और मान सम्मान दिलाती है इस लिए इस को शोभना यक्षिणी कहते है ।

यक्षिणी साधना में सवाधानीया Yakshni sadhna me savdhaneya

 

भोज्यं निरामिष चान्नं वर्ज्य ताम्बूल भक्षणम् ॥

 

उपविश्य जपादौ च प्रातः स्नात्वा न संस्पृशेत् ॥

यक्षिणी सम्बन्धी प्रारम्भिक जानकारी और शोभना यक्षिणी साधना yakshini related basic knowledge and shodhna yakshni sadhna
यक्षिणी सम्बन्धी प्रारम्भिक जानकारी और शोभना यक्षिणी साधना yakshini related basic knowledge and shodhna yakshni sadhna

 

यक्षिणी साधन में निरामिष अर्थात् मांस तथा पान का भोजन सर्वथा निषेध है अर्थात् वर्जित है । अपने नित्य कर्म में , प्रातः काल स्नान आदि करके मृगचर्म ( के आसन ) पर बैठकर फिर किसी को स्पर्श न करें । न ही जप और पूजन के बीचमें किसी से बात करें ।

 

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Trikal gyan varahi sadhna त्रिकाल ज्ञान वाराही

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Trikal gyan varahi sadhna त्रिकाल ज्ञान वाराही

 

Trikal gyan varahi sadhna त्रिकाल ज्ञान वाराही

 

Varahi Amman HD Images https://gurumantrasadhna.com/mantra-tantra-yantra/page/9/

आज मैं आप को भूत भविष्य वर्तमान काल की जानकारी के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण साधना पोसट कर रहा Trikal gyan varahi sadhna त्रिकाल ज्ञान वाराही साधना की जानकारी देने का प्रयास करूंगा ।

काशी शाहिर पुरातन काल से ही वेदांत ज्ञान प्राप्ति का और मोक्ष प्राप्ती का भी एक सथान है जहां स्वयं भगवान शिव बाबा विश्वनाथ के रूप में हैं वहीं, यहां के कोतवाल बाबा कालभैरव हैं जो काशी को बाहरी बाधाओं से बचाने का जिम्मा संभाले हुए हैं। जबकि वाराही देवी का भी काशी की दैवीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है।

मान्यता के अनुसार मां वाराही क्षेत्र पालिका के रूप काशी की रक्षा करती हैं। इन्हें गुप्त वाराही भी कहा जाता है। जबकि पुराणों के अनुसार मां शती का जिस स्थान पर काशी में दांत गिरा था वहीं मां वाराही देवी उत्पन्न हुईं। इसलिए इन्हें शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है।

मां वाराही असुरों से युद्ध के दौरान मां दुर्गा के सेना की सेनापति भी थीं। कहा जाता है कि मां वाराही के दर्शन-पूजन से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं और मान-प्रतिष्ठा के साथ आयु और शक्ति में वृद्धि होती है। ईस साधना करने से साधक भूत भविष्य वर्तमान काल का ज्ञाता बन जाता लाटरी सट्टे का नंबर भी बता सकता

मंत्र Trikal gyan varahi sadhna

ईस मंत्र के बीस हज़ार जप करने से कार्य की सिद्ध होता है शुक्रवार के दिन से पवित्र हो कि अर्द्धरात्रि मे सुंदर कलश की स्थापना करके उस उपर पान रखे उसके उपर हल्दी देवी की हल्दी से तस्वीर बनाकर स्थापित करे । फिर वाराही नमः ईस मंत्र से भक्तिपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा करके मोदक का निवेदन करें फिर पूजा कर मंत्र जप करे फिर समुख सिर झुकाकर एक आसन्न मे जप करें 20 माला 10 दिन तक करे

देवी स्वप्न आप के हर सवाल जवाब देती है साधक भूत भविष्य वर्तमान काल का ज्ञाता हो जाता है । कृपया आप ईस साधना को अच्छे गुरु से दीक्षा ले कर करे

नोट यह साधना किसी सिद्ध गुरु कि मार्गदर्शन मे करे । साधना के दिनो मे ब्रह्मचर्य जरूर रखे

फोन नंबर 085280 57364
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शिव पंचाक्षर मंत्र महिमा shiv panchakshar mantra mahima

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शिव पंचाक्षर मंत्र महिमा shiv panchakshar mantra mahima

शिव पंचाक्षर मंत्र महिमा shiv panchakshar mantra mahima

 

 

 

शिव पंचाक्षर मंत्र महिमा shiv panchakshar mantra mahima
शिव पंचाक्षर मंत्र महिमा shiv panchakshar mantra mahima

शिव पंचाक्षर मंत्र महिमा shiv panchakshar mantra mahima शिव पंचाक्षर मंत्र की महिमा हमारे पुराणो मे कही गई । कलयुग शिव पंचाक्षर मंत्र का महत्व अन्य मंत्रो से ज्यादा बताया गया है । शिव मंत्र यथार्थ महत्व समझ कर श्रद्धा और भक्ति से जप करने वाले साधक का मुख देखने मात्र से ही तीर्थ दर्शन का फल प्राप्त होता है ।सकाम और निष्काम शिव मंत्रो जप करने वाले साधक को साधना का फल अवश्य प्राप्त होता है । पंचाक्षरी मंत्र का जप करने से शिव और शिवा (पार्वती )जी की कृपा प्राप्त होती है । ईस मंत्र जप करने से सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है यदि ईस मंत्र का जो एक करोड़ मंत्र जप अनुष्ठान करता है उस को भगवान शिव का साक्षात् दर्शन प्राप्त होता है वह अभीष्ट सिद्धीया सहजता से प्राप्त कर लेता है भगवान सदाशिव का रूप हो जाता है ।

ईस सम्बन्ध मे एक शिव पुराण मे एक कथा आती है जो ईस प्रकार है। shiv panchakshar mantra mahima

 

ब्रह्मा जी ने कहा हे नारद ! पंचाक्षरी मंत्र परम श्रेष्ठ मंत्र है इसकी महिमा अनंत है इस मंत्र का जाप करने से सभी सिद्धियां प्राप्त होती है तथा सहस्त्र पाप नष्ट हो जाते हैं वेदों ने भी इस मंत्र द्वारा सिद्धि प्राप्त की है सच्चिदानंद स्वरुप भगवान सदाशिव मंत्र में सदैव अक्षर रूप मे रहते हैं जो मनुष्य संसार सुख में लिप्त होकर अपने जीवन को नष्ट कर रहे हैं उनके कल्याण के हेतु भगवान सदाशिव इस मंत्र को प्रकट किया है
यह पंचाक्षरी मंत्र पापो के समुद्र को बड़वागिन के समान तथा दोषों को नष्ट करने में अग्नि के समान । सभी मनुष्य ईस के अधिकारी है ।
हे नारद ! ब्राह्मण से बढ़कर सद्गुरु अन्य कोई नहीं है क्योंकि अन्य सभी वर्ण ब्राह्मण के शिष्य कहलाते हैं ग्रहसथ मनुष्य को उचित है के नीच वर्ण वाले को अपना गुरु कभी ना बनावे अन्यथा उसे बडा पाप लगता है पंचाक्षरी मंत्र की महिमा के संबंध में हम तुम्हें एक इतिहास बनाते हैं जो अत्यंत पवित्र तथा पापों को नष्ट करने वाला है  shiv panchakshar mantra mahima

हे नारद यदुवंशी के दाशाहर नाम का एक अत्यंत प्रतापी राजा हुआ है वह सभी शास्त्रों में पंडित महान योद्धा परमवीर संतोषी शत्रु विजय सुंदर शीलवान युद्ध में चतुर तथा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला था उसने काशी के राजा की पुत्री कलावती के साथ विवाह किया वह सत्यवती परम सुंदरी तथा पतिव्रता थी एक दिन राजा दाशाहर ने अंतः पुर में पहुंचकर अनेक प्रकार के वस्त्र आभूषणों से अलंकृत अपनी पत्नी के साथ मैथून करना चाहा कलावती ने उसे ऐसा करने से मना किया shiv panchakshar mantra mahima

यह देखकर राजा ने उसे पूरा करने बल पूर्वक भोग करने की इच्छा प्रकट की । तब कलावती ने कहा आप मुझे स्पर्श न करे आप धर्म अधर्म को जानने वाले हैं इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि यदि शीघ्रता में कोई कार्य किया जाता है तो उसका परिणाम अच्छा नहीं होता है मैं इस समय व्रत धारण किए हुए हे राजन वेदों का कथन है कि छः प्रकार की स्त्रियाँ के साथ भोग नही करना चहिए ईस प्रकार की स्त्रियों के साथ भोग करना उचित नहीं है पहली और स्त्री से जो पति से प्रेम नहीं करती हो दूसरे उससे जो रोगिणी होती है तीसरी वह जो गर्भवती होती चौथी वह जो व्रत अथवा नियम संयम को दान किए हुए हो पांचवीं वह जो कामदेव से रहित हो अर्थात ने नुपिसका का हो छठी वह जो मासिक धर्म में हो अस्तु मैं इस समय व्रत में हूं तो आप मेरा व्रत भंग करने वाला कार्य न करें shiv panchakshar mantra mahima

इस प्रकार कलावती ने राजा को बहुत कुछ समझाया परंतु काम वशीभूत होने के कारण राजा कलावती की बातो पर विशेष ध्यान न दिया तथा उसके साथ बलपूर्वक भोग करने लगा संसार में ऐसा कौन सा प्राणी है जो कामदेव पर विजय प्राप्त कर सके अस्तु भोग करने के उपरांत राजा के हृदय में अकस्मात जलने लगा तब वह घबरा कर अपनी रानी से इस प्रकार बोला है मुझे भोग करने अधिक इच्छा थी परंतु यह देख कर आश्चर्य हो रहा है तुम ऐसी कोमलागी होते हुए भी कठोर क्यों कर रही हो तुम्हारा संपूर्ण शरीर अग्नि के समान परजिलत हो रहा है जैस समय मैं तुंहें अपने हृदय से लगाता हूं उस समय मेरा संपूर्ण शरीर जलने लगता है shiv panchakshar mantra mahima

हे नारद राजा के मुख से यह वचन सुनकर रानी ने हसते हुए उतर दिया हे स्वामी मैं इसका कारण बताती हूं जब मैं छोटी थी तब हमारे घर मे दुर्वासा ऋषि पधारे उन्होंने मुझे पंचाक्षरी मंत्र और अन्य मंत्रों का उपदेश किया जिससे मेरा शरीर निष्पाप हो गया आप अपने राज्य में व्यभिचारिणी मध्यपान करने वाली स्त्रीओ के साथ भोग किया । अपना न तो रोज स्नान कर शिव भक्तों का स्वरूप धारण कर शिव पूजन और शिव पंचाक्षर मंत्र जप नही करते हैं यही के कारण है।

रानी के मुख से यह आश्चर्यजनक बचन सुनकर राजा ने कहा तुम मुझे भी वह मंत्र बता दो जिसका तप करने से संपूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं यथोचित भोग * किए बिना मुझे प्रसन्नता नहीं मिल सकेगी अस्तु मुझे यह सुख प्रदान करने के अतिरिक्त उचित है कि तुम मुझे भी निष्पाप बना देने का पर्यन्त करो यह सुनकर रानी ने उत्तर दिया है राजन मैं आपकी पत्नी पत्नी तथा स्त्री हुई अतः आप को चाहिए के आप अपने पुरोहित गर्ग मुनि से मंत्र दीक्षा ले shiv panchakshar mantra mahima

यह सुनकर राजा अपनी रानी को के साथ गर्ग मुनि के सेवा में पहुंचे और दंडवत करने के उपरांत इस प्रकार प्रार्थना करने लगा हे प्रभु आप मुझे मंत्र का उपदेश दे करें कृतार्थ करे राजा की प्रार्थना सुनकर गर्ग मुनि उन दोनों को साथ लेकर यमुना के तट पर उचित कार्य करने के उपरांत उन्होंने राजा को पंचाक्षरी मंत्र का उपदेश किया shiv panchakshar mantra mahima

हे नारद मंत्र का उपदेश प्राप्त करते ही राजा के मुख संपूर्ण पाप अपने आप निकलने लगे तब राजा ने गर्ग जी से प्रार्थना करते हुए यह पूछा हे प्रभु आप मुझे इस चरित्र का कारन बताइए मेरे मुख से अग्नि क्यों निकली गर्ग जी ने उत्तर दिया है राजन तुम्हें बड़े-बड़े पाप करते हुए सैकड़ों वर्ष व्यतीत हो गए जब तुम्हारा पुण्य और पाप बराबर हुए तब तुमने इस जन्म में मनुष्य शरीर को प्राप्त किया अब शिव जी का मंत्र ग्रहण करने के कारन सभी छोटे बड़े पाप जलते हुए पत्थरों के समान मुख से बाहर निकल पड़े हैं अस्तु अब तुम निष्पाप हो गए हो

हे नारद राजा को यह बताने के उपरान्त गर्ग मुनि ने पंचाक्षरी मंत्र की महिमा वर्णन करते हुए पुणः इस प्रकार बोले हे राजन् यह मंत्र अन्य सभी मंत्रों का सम्राट है तथा शिवजी का परम प्रिय है यह सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाला तथा दोनों लोकों के पापों को नष्ट करने वाला है । शिव जी ईस मंत्र मे अक्षर रूप मे विराजमान रहते है
शिव जी एस मंत्र में अक्षर रुप में विराजमान हैं यह मंत्र उनके मुख वचन के समान है और इसमें कोई संदेह नहीं है यह पंचाक्षरी मंत्र का जाप करने से शिव जी की प्राप्ति अवश्य होती है shiv panchakshar mantra mahima

2016 08 13 18 42 52 217131763 https://gurumantrasadhna.com/mantra-tantra-yantra/page/9/

इतनी बता सुनकर ब्रह्मा जी ने कहाहे नारद पंचाक्षरी मंत्र की महिमा का वर्णन कर गर्ग मुनि प्रेम मे मगन हो गए राजा रानी भी आनंद रुपी समुंद्र में डूबने लगे ।जब गर्ग जी की चेतनता प्राप्त हुई वो राजा देखा बोले राजन अब तुम पापों से राहित हो चुके हो अब तू अपनी राजधानी को लौट जाओ वहां पर अपनी पत्नी के साथ अनंद के भोग करो। तब राजा अपने घर लौट आया तदुपरांत जब राजा अपनी रानी के साथ मैथुन किया तो रानी को शरीर चंदन के समान की शीतल प्रतीत हुआ इस कथा को जो मनुष्य सुनता है पड़ता है अथवा दूसरों को सुनाता है उसको अत्यंत कल्याण होता है  shiv panchakshar mantra mahima

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Taratak Meditation kundalini jagarn karni ke pahile seedhee त्राटक ध्यानकुण्डलिनी जागरण करने की पहली सीढ़ी

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Taratak Meditation kundalini jagarn karni ke pahile seedhee त्राटक ध्यानकुण्डलिनी जागरण करने की पहली सीढ़ी

 Taratak Meditation kundalini jagarn karni ke pahile seedhee त्राटक ध्यानकुण्डलिनी जागरण करने की पहली सीढ़ी

Taratak Meditation kundalini jagarn karni ke pahile seedhee त्राटक ध्यान कुण्डलिनी जागरण करने की पहली सीढ़ी प्रिय दोस्तो आज Taratak Meditation kundalini jagarn के विषय पर आप को जानकारी देने का प्रयास करूंगा ।आपने त्राटक के सबंधित कुछ जानकारी सुनी होगी आप ने त्राटक कोई प्रकार की विधि विधान सुने या पढे होंगे जो ईस प्रकार है सूर्य त्राटक के चंद्र त्राटक दीपक त्राटक बिंदू त्राटक आदि आप के मन त्राटक सम्बन्धित कोई प्रकार के शंकाए उत्पन होती कोन सा त्राटक करना चाहिए ।
Taratak Meditation kundalini jagarn karni ke pahile seedhee त्राटक ध्यानकुण्डलिनी जागरण करने की पहली सीढ़ी
Taratak Meditation kundalini jagarn karni ke pahile seedhee त्राटक ध्यानकुण्डलिनी जागरण करने की पहली सीढ़ी

 

आप को त्राटक करने का समय किस समय त्राटक करना चाहिए सभी त्राटक को करना का अलग अलग समय होता है । जो आप को मालूम नही होता जिस की वजह से आप को सफलता नही मिलती

त्राटक किया है और क्यू करे ?  Taratak Meditation

त्राटक एक तरह की आँखो की कसरत है जिसे करने से आँखे की रोशनी और उर्जा बढ़ती है । आँखो की शक्तिया जाग्रत होती है । हमारे योग शास्त्र के हठ योग साधना पद्धति में एक क्रिया होती है जिसका नाम है त्राटक है ।सही तरीके से त्राटक करने से कई – कई साल पुराना चश्मा भी उतर जाता है। त्राटक से आंख की कई प्रकार की बिमारियों नाश हो जाता है ।
जिससे आप की आँखो की रोशनी ईतनी बड़ जाती है आप अंधेरे मे भी सहजता से देख सकते है ।

त्राटक करने से साधक आँखो मे चुबकय शक्ति पैदा हो जाती है जिससे दूर पड़ी चीज को आपनी खींच सकते है ।त्राटक करने से ईतनी शक्ति आ जाती है कि आप जो काम स्वंय आपने हाथो से नही कर पाते वह त्राटक साधना से बड़ी सहजता से कर पाते है आप लोहे की रॉड को आपनी आँखो से सहजता से मोड़ सकते है ।

त्राटक करने से आज्ञा चक्र जाग्रत हो जाता है दिव्य दृष्टि हासिल हो जाती है आस पास की सकारात्मक नकारात्मक अदृश्य वस्तु को देखना, दूरस्थ दृश्यों को ज्ञात करना दूसरे के मनोभावों को ज्ञात सम्मोहन, आकर्षण आदि सिद्धीया सहिज प्राप्त हो जाती है । लाभ ये है कि आप भविष्य में घटने वाली किसी भी घटना का पूर्वानुमान लगा सकने में सक्षम हो जाते हैं। त्राटक सिद्धीया सहजता से प्राप्त नही होती ईस के लिए बहुत कठिन परिश्रम (मेहनत ) करनी पड़ती है ।

त्राटक करने का समय बहुत धीरे धीरे बढ़ाना चाहिए जिससे आँखों पर जोर ना पड़े | यह साधना लगातार तीन महीने तक करने के बाद उसके प्रभावों का अनुभव साधक को मिलने लगता है।
आप को पहिले बताया गया है त्राटक करने के कई तरीके और विधान है लेकिन आप को बिंदू त्राटक से शुरूआत करनी चाहिए । अगर आप बिंदू त्राटक से शुरूआत करते है तो आप की आँखे सूर्य और दीपक त्राटक करने मे सक्षम हो जाती है और आप को ज्यादा कठिनाई नही होती है ।

त्राटक की शुरुआत बिंदु त्राटक से करनी चाहिए जिस तरह से बगैर पहली कक्षा में सफल हुए आप दूसरी में नहीं जा सकते । उसी प्रकार बिंदू त्राटक के बिना आप और त्राटक नही कर सकते ।

बिंदू के बाद आप दीपक त्राटक Taratak Meditation

करे दीपक के बाद चंद्र त्राटक के बाद सूर्य त्राटक करे । सूर्य त्राटक मे सावधानी बरतनी चाहिए ।बिंदू त्राटक की विधी – बिंदू त्राटक करने से पहले आपनी आँखो को शुद्ध जल के छींटे मारे
आप को त्राटक करने का समय किस समय त्राटक करना चाहिए सभी त्राटक को करना का अलग अलग समय होता है । जो आप को मालूम नही होता जिस की वजह से आप को सफलता नही मिलती ।त्राटक किया है और क्यू करे ?
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त्राटक की शुरुआत बिंदु त्राटक से करनी चाहिए जिस तरह से बगैर पहली कक्षा में सफल हुए आप दूसरी में नहीं जा सकते । उसी प्रकार बिंदू त्राटक के बिना आप और त्राटक नही कर सकते । बिंदू के बाद आप दीपक त्राटक करे दीपक के बाद चंद्र त्राटक के बाद सूर्य त्राटक करे । सूर्य त्राटक मे सावधानी बरतनी चाहिए ।बिंदू त्राटक की विधी – बिंदू त्राटक करने से पहले आपनी आँखो को शुद्ध जल के छींटे मारे
बिंदु त्राटक dindu taratak : एक सफेद कागज पर या ड्राइंग पेपर लेकर उसके बीच में एक छोटा-सा काली मिर्च के आकार का काले रंग का गोल बिंदु बनाए उसे बोर्ड के ऊपर चिपका दें या उस कागज को कमरे की दीवार पर इसे पर्याप्त उंचाई पर चिपका सकते है । Taratak Meditation

अब उस कागज से लगभग तीन फुट की दूरी पर जमीन पर आसन बिछाकर सुखासन अथवा पद्मासन में बैठ जायें और काले बिंदु पर दृष्टि को एकाग्र कर लें। शुरू शुरू मे आप की आँखे बहुत ज्यादा पानी निकलगा घबराने कोई बात नही है ।शुरुआत मे ऐसा होता है । शुरुआत 10 मिनट से करे योग्य गुरू के परामर्श के अभ्यास को थोड़ा थोड़ा बड़ाते जाए । देर के अभ्यास के पश्चात् जब काला बिंदु कभी ओझल हो जाये और कभी पुनः प्रकट होने लगे तो समझना चाहिए कि आपको सफलता मिलना आरंभ हो गई है और अभ्यास निरंतर जारी रखें।कुछ दिनों के अभ्यास के पश्चात जब काला बिंदु नजरों से पूर्णतः ओझल हो जाये और जिस कागज पर आप त्राटक कर रहे वो पूरी तरह सफेद चमकने लगे गा और दीवार भी सफेद हो जाए गी। अगर आप को ऐसा अनुभव हो समझ लेना कि आप का त्राटक का पहला चरण पूर्ण हो गया है ।

2 दीपक त्राटक deepak taratak  Taratak Meditation

दीपक त्राटक बहुत प्रभावकारी माना गया है ईस को करने कि बाद साधक को त्राटक की कुछ शक्तिया हासिल हो जाती है । बंद कमरे त्राटक करना चाहिए जिस मे वायु प्रवेश न कर पाए जिससे दीपक की लौ ना हिले । दीपक त्राटक रात्रि के समय या प्रतिः काल शुद्ध देसी घी का एक दीपक या मोमबत्ती जलाकर अपनी आंखों की सीध में ढाई-तीन फीट की दूरी पर रख लेना चाहिए। बैठने की स्थिति जमीन पर आसन बिछाकर अथवा या कुर्सी पर बैठकर भी बनाई जा सकती है । दीपक को जलाकर उसकी लौ पर अपना ध्यान केन्द्रित करें। कुछ देर के अभ्यास के पश्चात् फूंक मारकर लौ को बुझा दें और अंधेरे में देखने का अभ्यास करें। पहले दिन पॉच मिनट से शुरू कर के हर तीन चार दिन में एक मिनट ही बढाना चाहिये । अपनी आंखों की क्षमता के अनुसार इसको चालीस मिनट या अधिक समय तक ले जाना चाहिये। धीरे-धीरे आपको रोशनी का तेज बढ़ता हुआ दिखाई देगा। कुछ दिनों उपरांत आपको रोशनी के प्रकाश के बिना कुछ नहीं दिखाई देगा। आप समझ लेना कि आप कि त्राटक का दुसरा चरण सम्पन्न हुआ
। दुसरे चरण से काफी त्राटक सिद्धीया सहजता से प्राप्त हो जाती है ।

त्राटक

Taratak Meditation
सम्बन्धित जरूरी बाते

त्राटक करने का समय बहुत धीरे धीरे बढ़ाना चाहिए जिससे आँखों पर जोर ना पड़े | सूर्य त्राटक करने का समय होता है सूर्य उदय से 30 मिनट तक आप त्राटक कर सकते है अगर आप ईस के बाद त्राटक करते है तो उस समय सूर्य की रोशनी तेज हो जाती है जिससे आप की आँखे खराब हो सकती है ।शाम को सूर्य अस्त होने से आधा घंटा पहले त्राटक कर सकते है । दीपक त्राटक शुरू करने का समय रात्रि 11बजे या सुबह 4 बजे प्रतः काल करने ठीक है । त्राटक हमेशा गुरु के मार्गदर्शन से करना चाहिए

 

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mantra Tantra khatkarm मंत्र तंत्र षट्कर्म मंत्र तंत्र साधना की शाखा बहुत बड़ी है ईस के कई कर्म है इन मे से षट्कर्म मुख्य जो नीचे दिए गए है। ईसको तंत्र मंत्र शास्त्र मे षट्कर्म कहा गया है कुछ अज्ञानी लोग ईन कर्मो को बुरा मानते है जो बहुत गलत सोच है

प्रिय दोस्तो भगवान की बनाई गई सभी
चीजे सही है केवल उनका का गलत ईसतमाल करने वाले मनुष्य गलत है जैसे कि एक उदाहरण है एक चाकू है जो हमारे घरेलू कामो मे बहुत काम आता है फल सब्जी आदि काटने मे अगर कोई दुष्ट व्यक्ति ईसका उपयोग किसी व्यक्ति को मारने के लिए करता है उस मे ईस चाकू का क्या दोष उस व्यक्ति का दोष है जिसने इस का ईसतमाल गलत काम के लिए किया है उसी प्रकार षट्कर्म का है कोई भी विद्या गलत नही है उसका गलत उपयोग करने वाला गलत है। अगर षट्कर्म कर्म गलत है तो भगवान शिव ईस की रचना न करते और ईस की जानकारी आपने परम भक्त रावण को न देते आप को षट्कर्मो का जानकारी देता हु । mantra Tantra khatkarm मंत्र तंत्र षट्कर्म

1शानित कर्म – जिस प्रयोग के द्वारा रोगो तथा ग्रहो की शानित और निराशा आदि का नाश किया जाए तो उसे शानित कर्म कहते है। ईस की अधिष्ठात्री देवी रति तथा अम्बिका है और देवता गणेश है।

2 स्तम्भ – किसी चलती वस्तु को रोकना (गतिरोध) करना जैसे कि आग पानी पशु पक्षी मनुष्य ।
किसी की चाल-ढाल को बंद सजीव या निर्जीव को जहां का तहां रोक देना, , निष्क्रिय स्थिर कर देना, शत्रु के अस्त्र-शस्त्र को रोक देना, अग्नि के तेज को रोक देना, विरोधी की जीभ, मुख आदि को रोक देना इत्यादि स्तम्भन कर्म कहलाता है। ईस की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी है

3 वशीकरण – जिस प्रयोग के करने से किसी भी व्यक्ति को आपने आधीन अथवा वश कर लिया जाए वह कर्म वशीकरण कर्म कहलाता है । ईस के प्रयोग से प्रतिकूल मन वाला व्यक्ति साधक के शरण मे आ जाता है । ईस की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती है

4 विद्वेषण – दो व्यक्ति मे अत्यंत मित्रता हो उन मे वैर विरोध पैदा करना अथवा झगड़ा करवा देना मित्रता को खत्म कर देना विद्वेषण कर्म है । ईस की अधिष्ठात्री देवी ज्येष्ठा है

5 उचचाटन – किसी के मन में शंका पैदा कर भयभीत या भ्रमित बनाकर मानसिक स्थिति को खराब करना गाव नगर या देश से अनय सथल से भगा देना या स्थानांतरित कर देना उच्चाटन होता है।
ईस की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा है।

6 मारन – किसी भी व्यक्ति पशु पक्षी आदि के प्रान लेना मारन प्रयोग है ईस की अधिष्ठात्री देवी भद्रकाली
है ।

 

विभिन्न प्रयोगो मे रंगो का महत्व mantra Tantra khatkarm मंत्र तंत्र षट्कर्म

 

 

शांति के लिए सफेद रंग की वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए
वशीकरण कर्म के लिए लाल रंग की वस्तुओं के प्रयोग में करना चाहिए
विद्वेषण कर्म में लाल रंग की सामग्री का प्रयोग करना चाहिए
सतंभन प्रारंभ में पीले रंग की सामग्री का प्रयोग करना चाहिए
उच्चाटन कर्म में दो सुरमई रंग की सामग्री का प्रयोग करना चाहिए
मारण कर्म में काले रंग की वस्तुओं का प्रयोग करना शुभ दायक होगा

षट्कर्म कर्म मे आसन्न mantra Tantra khatkarm मंत्र तंत्र षट्कर्म

शांति कर्म के लिए कपास के आसन या हिरण की खाल केआसन पर बैठकर साधना करनी चाहिए

वशीकरण कर्म में बेड़ की खाल पर बैठकर साधना करनी चाहिए
सतंभन कर्म में बाघ की खाल पर बैठकर साधना करनी चाहिए
विद्वेषण करने घोड़े की खाल पर बैठ कर साधना करनी चाहिए
उच्चाटन कर्म में ऊंट की खाल पर बैठकर साधना करनी चाहिए
मारण कर्म में भैंस की खाल पर बैठकर करनी चाहिए

योग आसन्न षट्कर्म के लिए
शांति कर्म के स्वास्तिक आसन पर बैठकर साधना वशीकरण के लिए पदम आसन पर बैठकर साधना का उच्चाटन कर्म में अर्थ स्वास्तिक आसन पर बैठकर सतंभन कर्म में कुकट आसन् पर बैठकर साधना करो
मारण कर्म के लिए विकट आसन पर बैठकर साधना करनी चाहिए

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ईनका सदुपयोग कैसे करे – अगर किसी का लड़का गलती कामो मे लग गया अथवा मां बाप के कहे से बाहर हो गया (वश से ) से बाहर हो गया है उसकी भलाई के लिए उसका जीवन सुधारने के लिए उस उपर वशीकरण का प्रयोग करना सदुपयोग है यद्यपि पती पत्नी मे भी ऐसी परिस्थिति पैदा जाए तो यह प्रयोग कर सकते है।

मारन प्रयोग अगर किसी व्यक्ति से आप को खतरा वह आपको मारने के लिए ड़ूंड रहा हो आप की कोई भी किसी की मदद को तैयार नही है तो आप आपनी जान बचाने के लिए गुरु आज्ञा से मारन प्रयोग कर सकते है क्यूंकि आपनी जान बचाना सभी का धर्म है ।

उचचाटन कर्म जिस व्यक्ति से सभी गांव या नगर लोग परेशान, खतरा हो उसे किसी भी प्रकार की मदद न मिले तो आप उचचाटन प्रयोग कर भगा कर सभी की मदद कर सकते है। आप को कोई भाई-बहन किसी गलत लड़के या लड़की की बुरी संगत मे हो तो आप उसका जीवन सुधारने के लिए विद्वेषण प्रयोग कर सकते। mantra Tantra khatkarm मंत्र तंत्र षट्कर्म