Category: दस महाविद्या

दस महाविद्या साधना का सम्पूर्ण रहस्य और विस्तार सहित जानकारी प्रदान की जाएगी दस महा विद्या की साधना और रहस्य प्रदान किया जाएगा

Kali Sadhana काली महाविद्या  साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph. 85280 57364

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Kali Sadhana काली महाविद्या साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph. 85280 57364

 

Kali Sadhana काली महाविद्या  साधना मंत्र प्रयोग

सहित Ph. 85280 57364

maa tara sadhna माँ तारा साधना और माँ तारा साधना के लाभ ph. 85280 57364
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Kali Sadhana काली महाविद्या  साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph. 85280 57364 इस पोस्ट में माँ काली साधना के बारे में चर्चा  विस्तार सहित की जाएगी माँ काली साधना इस जीवन में क्यों जरूरी है इस विषय पर विस्तार सहित चर्चा करगे आप इस पोस्ट को पूरा पढ़े 

महाविद्या काली  बिजली की तरह कड़क कर वज्र की तरह गिरती है जो शत्रुओं जीवन में शत्रुओं का एक-एक करके रोम. विनाश करने का अर्थ है अपनी जीवनशक्ति का ही विनाश और शत्रु तो इस जीवन में एक नहीं अनेक हैं तनाव, आर्थिक अभाव. गृहकलह पीड़ा क्या ये सब मी शत्रु नहीं है. जीवन के सहज आनंद में? इनको तो समाप्त करने की एक मात्र साधना सर्वसम्मति से शास्त्रों में स्वीकृत है।

साधना जगत के किसी भी रहस्य की चर्चा केवल व केवल रश्मिनयों के आधार पर की हैं और यह विज्ञान या वहम तनाव, आर्थिक अभाव, गृहक शत्रु नहीं है, जीव साधना सामा जगात के किसी भी रहस्य की चर्चा केवल द केवल रश्मियों के आधार पर की व समझी जा सकती है। रश्मियों का संघटन विघटन ही साधना में सफलता-असफलत बन कर हमारे समझ आता है, और संघक किसी भी स्तर पर खड़ा हो, यह घटना अवश्यम्भावी होती है यह बात अलग है, कि साधक साधना के किस चरण अथवा दृष्टि के विकास की किस अवस्था में इसका सात् कर पाता है। इसका यदि सरल सा एक भौतिक उदाहरण देना हो तो सूर्य ग्रह से दिया जा सकता है।

 

सूर्य हमारे समक्ष इस धरा पर नहीं उत्तर आता किंतु उसकी रश्मनयों के माध्यम से हम उसका नित्य ही साक्षात करते रहते हैं, उसे अपनी देह पर अनुभव करते रहते हैं। साधक भी सचना के विकसित चरणों में किसी भी देवी अथवा देवता का ऐसा अनुभव अपनी अन्तर्देह पर करने में सक्षम हो जाता है। इसी अनुभव से चित्त में जो धारणा बनती है वही साधना के क्षेत्र में बिम्ब कही जाती है, जो वास्तविक होती भी है और नहीं भी वास्तविक इस कारण होती है, क्योंकि हमने सधना के माध्यम से ऐसा कुछ अनुभूत किया होता है और वास्तविक इस कारण नहीं भी हो सकती है, क्योंकि समुचित रूप से विश्लेषण करने की क्षमता तब तक पता नहीं विकसित हुई हो, अथवा नहीं साधना, थ्योरी आफ रेजेज (रश्मि विज्ञान) नहीं है, किंतु इसी आधार पर किसी सीमा तक अन्तश्चेतना को विकसित इनको तो समाप्त क सर्वसम्मति से शा अपनी जीवनशक्ति का ही विनाश में एक नहीं अनेक हैं जह, पीड़ा क्या ये सब मी रोग. कर धारणा व विवेचनाएं की जा सकती हैं और यही कार्य तो विज्ञान या सइस भी कर रहा है।

ध्वनि का कोई स्वरूप नहीं होता, किंतु विज्ञान एक तरंग के रूप में उसकी सफलतापूर्वक व्याख्या करता है। यही व्याख्या किसी भी मुहूर्त के विषय में की जा रुकतों हैं। चैतन्यता के कुछ विशेष क्षण होते हैं, देवताओं की प्रसन्नता व वर प्रदान के कुछ दुर्लभ क्षण होते हैं, प्रकृति जब स्वयं अणु- अणु मैं अपनी उदारता लुटाने को तत्पर हो जाती है, किसी विशेष कार्य को सम्पन्न कर लेने का मूक संकेत देने लग जाती है, वही मुहूर्त होता है।

 

साइंस के आधार पर इसको व्याख्या नहीं की जा सकती और साइंस तो स्वयं आज कई क्षेत्रों में अनुत्तरित रह गई है। मानव मस्तिष्क में कितने तन्तु होते हैं अथवा मानव मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, जैसे अनेक प्रश्न आज भी उसके लिए पहेली ही है। यह ठीक है, के विज्ञान ने क्लोन (प्रतिरूप) बनाने में सफलता प्राप्त कर ली हैं, किंतु यदि वह सृजन की क्षमता से युक्त हो गई। है, तो क्यों नहीं आज तक कैंसर जैसे प्राचीन रोग का समाधान मिला ?

यह विज्ञान की आलोचना नहीं हैं बस यह कहने का प्रयास है कि उसकी भी एक सीमा है। हो सकता है भविष्य में कैंसर का, एड्स का कोई प्रभावशाली उपाय या समाधान मिल और फिर क्या यह संभव नहीं है, कि कभी साइस वा विज्ञान भी भारतीय ज्ञान के इन विज्ञान पक्षों का कोई रहस्य तंत्र-यंत्र विज्ञान जार उन के सहज आनंद में? करने की एक मात्र साधना स्त्रों में स्वीकृत है विवेचित कर दे हो सकता है सब कोई शोध ‘द थोरो इन्पेक्ट ऑफ नेचर ऑन द इनर कॉन्शस ऑफ ग्रेट इंडियन ऋषीज जैसे भारी भरकम नाम से सामने आए और शायद तब भारतवासियों को भी गर्व हो सके कि जो आज हजारों वर्ष पूर्व उन ऋषियों ने कहा, जिनका हम यद-कदा बस विवाह, मुंडन पर सारण कर लेते हैं, ये भी कितने इंटिफिक माइड के थे।

भाग कर भी प्रभाव होता है, विशेष कर उस | देश में जो देश सौ वर्षो तक गुलाम रहा हो वहां तो होगा ही। भाषा का मी एक कुचक्र होता है और ऐसे कुचक्रों का तो केवल युग पुरुष ही तोड़ पाते हैं ‘गुरु गोरखनाथ’ या भगवान बुद्ध की तरह। मुहूर्त की आज के समय में समुचित अथवा ‘साइंटिफिक’ व्याख्या संभाव्य हो अथवा न हो, किंतु एक बात तो स्पष्ट है ही, कि काल के जो क्षण व्यतीत हो जाते हैं, दे फिर लौट कर नहीं अते और वहीं किसी मुहूर्त का उपयोग करने का तात्पर्य भी होता है। साधक को किसी साइटिफिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह स्वयं अन्तश्चेतना से मुहूर्त के प्रभाव का साक्षी अन्तर्मन से बन जाता है। 1 

स्वयं अनुभव करने लग जाता है, कि काल के कुछ ऐसे होते हैं जब उसे साधना में सफलता अल्प प्रयास से मिल  जाती है। पाश्चात्य सभ्यता में जिसे मूड कहते हैं या भारतीय सभ्यता में जिसे चैतन्य क्षण कहते है वे सभी क्षण वास्तव में मुहूर्त के ही होते हैं। वस्तुत अंग्रेजी के शब्द ‘मोड’ (ढंग, | प्रकार) का ही परिवर्तित रूप ‘मूड’ कहलाता है, जो अपनी अन्तर्भावना में मुहूर्त के ही समीपस्थ सिद्ध होता है। इसके उपरांत साधक को भी मुहूर्त के विषय में प्रायः | एक प्रकार की अस्पष्टता ही होती है। काल का जो क्षण होती तो इस वर्ष ही निकल गया, वह कैसे निकल गया नहीं हर वर्ष पडती हैं जैसी अनेक हाते प्रत्येक साधक के मन में उमड़ती घुमड़ती रहती हैं, भले ही वह मदद कहे या न कहे।

किंतु साधक को यह ध्यान रखना चाहिए, कि यद्यपि यह सत्य है, कि होली अथवा कोई भी पर्व प्रत्येक वर्ष घाटत होता है, किंतु प्रत्येक वर्ष नक्षत्र, योग एवं चंद्रमा की स्थिति के कारण मुहूतों में भी आन्तरिक विशेषता प्रबंधित अथवा न्यून होती रहती है। होली की रात्रि को भी अपनी एक पृथक चैतन्यता होती है जो दीपावली में नही हो सकती और दीपावली की होली में नहीं।

होली का पर्व या होलिका दहन की रात्रि वास्तव में उतना ही अधिक तीव्र प्रभाव रखती है जितना अधिक प्रभाव सूर्य ग्रहण के क्षण रखते हैं। यह व्याख्या से अधिक अनुभव का विषय है। जिस प्रकार सूर्य ग्रहण के क्षण अपने आप में शात्रोक्त साधनाओं के विलक्षण होते हैं, ठीक उसी प्रकार होली की रात्रि भी तांत्रिक साधकों के मध्य केवल व केवल प्रबल महाविद्या प्रयोगों के लिए ही आरक्षित सी रहती है।

प्रत्येक उच्चकोटि का तांत्रिक परे वर्ष भर प्रतीक्षा करता रहता है, कि कब होली का पर्व पर और यह अपनी साधना को पूर्णता दे सके। शेष वर्ष तो वह एक प्रकार से इसकी पृष्ठभूमि ही बनाता रहता है। यह उचित भी है क्योंकि सूर्य ग्रहण की ही भांति होलिका दहन की रात्रि में सम्पन्न की जाने वाली प्रत्येक माला अपने आप में सौ मालाओं का प्रभाव रखती है। साचक स्वयं अनुमान कर सकते हैं कि जिन उच्चकोटि की साधनाओं में, जहां पांच लाख अथवा दस लाख न्त्र जप पांच हजार अथवा दस हजार माला मंत्र जप से सम्पूर्ण करने पहते हैं।

वहीं होली की रात्रि में इन्हें मात्र इक्यावन अथवा एक सौ एक माला मंत्र जप से सम्पूर्ण किया जा सकता है। मुहूतों का यही तो वैशिष्ट्य होता है, कि ऐसे अवसर पर कम परिश्रम से जीवन में बहुत कुछ अर्जित किया जा सकता है। होलिका दहन की रात्रि में साधक अपनी रुचि व क्षमता के अनुकूल कोई भी तांत्रिक साधना सन्न कर सकता है, किंतु जह जीवन में कुछ विशिष्ट करने को कामना हो और इससे भी अधिक जीवन में एक ऐसा आधार बनाने की भावना हो, जिस आधार पर खड़ होकर जीवन में पौरुष प्रखरता तेज का समावेश हो सके, वहा किसी एक महाविद्या साधना का आश्रय लेना पड़ जाता है। महाकाली यह मात्र एक महाविद्या साधना नहीं स्वयं अपने आप में होली का उत्सव ही है, जिसको सम्पन्न कर साधक, अपने दुभाग्य को योगाग्नि में भस्म कर फिर सुख-सौभाग्य के अबीर गुलाल मैं नहा उठता है। और भीग जाता है।

महाकाली का स्वरूता वा है, क्रोधोन्मत्त है, संहारकारी है, सामान्य व्यक्ति के लिए भयप्रद है किंतु है तो अन्ततोगत्वा मां का ही स्वरूप… जो कुछ सामान्य व्यक्ति के लिए भयप्रद है वहीं साधक के लिए उसकी ‘मां’ के आयुध है उसके जीवन के वैषम्य को समाप्त करने में सहायक… आनंद के टेसू की गुनगुनी फुहार मे महाविद्या उनमें से न केवल सर्वश्रेष्ठ चन् सर्वधन भी है। शक्ति साधनाओं में भी प्रदेश का एक क्रम होता है जिस प्रकार कोई बालक सीधे ही दसवीं कक्षा में प्रवेश नहीं ले सकता, ठीक उसी प्रकार शक्ति साधनाओं में प्रवेश के आतुर साधक को भी सर्वप्रथम महाकाल महाविद्या की साधना सम्पन्न करती पड़ती है।

दूसरी ओर यह साधना के उच्चतर अयमों में प्रविष्ट हो गए साधकों की भी इष्ट साधना होती है क्योंकि साधना केवल गणित नहीं होती। यह सत्य है, कि साधनाओं का एक क्रम होता है, किंतु क्या साधना करना उसी प्रकार है, जिस प्रकार हम दैनिक जीवन में स्वार्थवश सम्बन्ध बनाते और तोड़ते रहते हैं? यदि एक अतरिकता ही नहीं विकसित की तो साधना के क्षेत्र में प्रविष्ट होने का अर्थ ही क्या इसी आंतरिकत के वशीभूत होकर अनेक साधकों के जीवन की यह (महाकाली) न केवल आधारभूत सधना वरन सर्वस्व हो गई।

श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन में महाकाली साधना के अतिरिक्त अन्य किसी लधना को प्रश्रय ही नहीं दिया और केवल इसी आधार पर एवंथा निरक्षर होते हुए भी उन्होंने स्वामी विवेकानंद जैसे प्रखर व्यक्तित्व को शिष्य रूप में प्रस्तुत करने में सफलता भी पाई। केवल महाकालो ही नहीं अपितु प्रत्येक महाविद्या अपने अम में सम्पूर्ण है, लेकिन किसी एक विशेष गुण का प्रतिनिधित्व करती हुई और प्रारम्भिक साधक को उस महाविद्या विशेष के प्राथमिक (अर्थात् विशेष गुण की साधना करना हो उचित रहता है। कोई भी महाविद्या जीवन की आधारभूत साधना तो विकास के किसी क्रम में जाकर बन पाती है।

यह एक साधकोचित मर्यादा भी है और साधना जगत की वास्तविकता भी। जिस प्रकार महाकाली शक्ति की प्रथम धन्य है, ठीक इसी प्रकार पौरुष प्रखरता और तेज भी जीवन की प्राथमिक आवश्यकताएं हैं। जीवन के क्षेत्र में भी और साधना के क्षेत्र में भी। पीता के अभाव में कुछ भी सुव्यवस्थित नहीं हो सकता और पौरत से तात्पय मर्दानगी से नहीं वरन जीवन की उस दृढता से है जो प्रत्येक स्त्री था पुरुष में होनी ही चाहिए। जीवन घिसट-घिसट कर चलने के लिए प्रभु ने हमको नहीं दिया है। जीवन इतना सस्ता नहीं हो सकता है, कि उसे विविध शत्रुओं से संघर्ष करने में व्यतीत कर दिया जाए।

केवल बाह्य शत्रु अथवा किती स्त्री-पुरुष के रूप में विद्यमान शत्रु ही नहीं, शत्रु तो आंतरिक भी होते हैं। आंतरिक शत्रुओं से लड़कर ही फिर हम किसी बाह्य शत्रु से चुनौती ले सकते हैं। यदि आतंरिक बल नहीं है, तो न किसी शत्रु से शारीरिक अथवा मानसिक युद्ध ठाना जा सकता है और न उसमें सफलता पाई जा सकती है। व्यापार करते हैं तो किसी प्रतिद्वन्द्वी द्वारा प्रताड़ित किया जाना, नौकरी करते हैं तो अधकारी द्वारा अपमानित किया जान समय से दोति न मिलना, घर में कलह होते हैं रहना इत्यादि सद शत्रु ही है।

 

इन सभी शत्रुओं से पृथक-पृथक लड़ने में व्यक्ति की जीवनी शक्ति इस प्रकार चुक जाती है, कि फिर न तो उसके स साधना करने की शक्ति शेष रह जाती है और न कभी-कभी साधना के प्रति विश्वास। ऐसी स्थिति में बुद्धिमत्ता इसी में हैं, कि वह उपाय सोचा जाए और सोच कर प्रयोग में लाया जाए जो सभी शत्रुओं का एक बार में ही संहार कर दे। महाकाली साधना इसी का एक प्रयास है शत्रु संहार की दो मुख महाविद्या सघनार है प्रथम महाकाल और द्वितीय बगलामुखी किंतु दोनों ने एक सूक्ष्म भेद है। बगलामुखी साधना जहां किसी प्रत्यक्ष शत्रु के विरुद्ध प्रभावशाली होती हैं. वहीं महाकाली प्रत्यक्ष शत्रु के साथ-साथ जीवन के अन्यान्य पक्षों में छिपे शत्रुओं के प्रति भी सक्रिय होती हैं। इसके अतिरिक्त बगलामुखी महाविद्या की साधना विधि अत्यंत दुष्कर है बगलामुखी महाविद्या को सिद्ध करने के लिए आवश्यक है कि साधक कठोर अन्य नियम संरने का पलन करने के साथ-साथ निरंतर गुरु साहचर्य में रहे। जो श्रेष्ठ साधक होते हैं, वे ऐसा करते भी हैं. किंतु जहां केवल जीवन को सवारते हुए एक निश्चित क्रम शालीनता के साथ शक्ति साधन के क्षेत्र में प्रविष्ट होने की शत आती है, फिर वहां महाकाली का महत्व सर्वोपरि स्वयं सिद्ध हैं।

साथ ही इस बात की तो चर्चा पहले भी की है, कि महाकाली महाविद्या ही महाविद्या साधनाओं का प्रवेश द्वार है। बगलामुखी एक पहुंचना है तब भी महाकाली साधना तो सम्पन्न करनी ही पड़ेगी। इस वर्ष होली का मुहूर्त इस साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त अवसर है। यों तो साधक इस साधना को जीवन में विशेष संकट आने पर अथवा मन में साधना के प्रति एक ललक रहने पर किसी भी मह के कृष्ण पक्ष की अष्टमों को सम्पन्न कर सकता है, किंतु होली पर्व की तो चैतन्यता है विलक्षण होती है फिर इस वर्ष की होली का पर्व तो विशेष योगों से गठित हुआ है।

महा काली साधना विधि 

 

बाह्य वातावरण शांत होने से साधक चैतन्यता को पूरी तरह से आत्मसात करने में सफल हो पाता है। महाकाली को महाविद्या के रूप में सिद्ध करने अथवा जीवन की विविध समस्याओं को | सुलझाने के आतुर शिष्यों को चाहिए कि वे उपर्युक्त काल में लाल वस्त्र धारण कर लाल रंग के ही आसन पर दक्षिण की ओर |

मुख करके बैठें और अपने सामने लकड़ी के किसी बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर ताम्रपत्र पर अंकित ‘महाकाली यंत्र स्थापित करें। अपने दाहिने हाथ की ओर (यंत्र के समीप) ‘भैरव गुटिका’ नध्य में तेजस गुटिका तथा बांयी ओर ‘क्लीं गुटिका का स्थापन कर सभी का पूजन जल कुंकुंम अक्षत, पुष्प धूप से करें, जिससे जीवन में व शरीर में बल, ओज च पौष का समन्वय हो सके। इसके पश्चात तेल का एक दीपक प्रज्ज्वलित कर दें, जो सम्पूर्ण साधनाकाल में अखंड रूप से जलता रहे। अब महाकाली यंत्र का भी संक्षिप्त पूजन करें और यंत्र पर दस कुंकुंम की बिंदियां ब्ली मंत्र के साथ लगाएं तथा निम्न | प्रकार से

काली ध्यान

उच्चरित करें – खड्गं चक्रगदेषुचापपरिधान्दूल भुशुण्डी शिर: शंख सदधती करैस्त्रिनयनां सर्वांगभूषावृताम् । नीलाश्मतिमास्यपाद दशकां सेवे महाकालिका यामस्तत्स्वपिते हरौ कमलजी हन्तुं मधु कैटभम् ।।

ध्यान उच्चरित कर भगवती महाकाली से अपने जीवन के सभी दुख दैन्य समाप्त करने की याचना कर उन्हें पूर्ण रूप से अपने प्राणों में समाहित करने की भावना के साथ महाविद्याल से निम्न मंत्र की इक्कीस माला मंत्र जप निष्क्रम्प भाव से करें मंत्र

maha kali sadhna mantra महा काली साधना मंत्र 

॥ ॐ क्रीं क्लीं महाकालि हुं हुं फट् OM KREEM KLEEM MAHAAKAALI HUM HUM PHAT

मंत्र जप काल में हुई किसी भी अनुभूति से न हो विचलित हों, न उन्हें सार्वजनिक करें। साधना के दूसरे या तीसरे दिन सभी सामग्रियां लाल वस्त्र में लपेट कर किसी नदी मंदिर अथवा स्वच्छ जलाशय में विसर्जित कर दें। भगवती महाकाली को यह दुर्लभ साधना वास्तव में महाकाली को प्राणों में समाहित करने की ही साधना है यह सत्य है, कि प्रत्येक दैवी शक्ति बह्य रूप से भी शक का हित साधन करने में साधना के उपरांत तत्पर रहती है, किंतु उसे शक्ति को अपने शरीर में समाहित करना न केवल साधक के लिए अधिक हितकारी होता है वरन उस दैवीय शक्ति के लिए भी अहलादकारी होता है। यही इस सघना की मूल भावना है। यहीं किसी भी साधना की मूल भावना होती है।

 

 

 

 

Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph.85280 57364

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Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph.85280 57364 आज हम  छिन्नमस्ता साधना की जानकारी प्रदान करेंगे। इस पोस्ट में साधको छिन्नमस्ता साधना का दैनिक ज़िंदगी में क्या महत्व है इस के बारे में बताया गया है और  दुर्गम मुनष्य जीवन को यह देवी कैसे सुगम बनाती है यह बताया गया है।  आप इस पोस्ट को विस्तार सहित पढ़े 

एक नहीं अनेक स्क बीज है इस जीवन में जिनका समूल नाश करता छिन्नमस्ता जो शक्ति का सर्वाधिक तीक्ष्ण स्वरूप है पौराणिक कथाओं में तो बस रक्तबीज की कथा मिलती है, किन्तु आज व्यक्ति के दैनंदिन जीवने में चारों और समस्या रूपी जो अनेक रक्तबीज खड़े हैं, उनके सहार का क्या उपाय किया जाए जैसे जैसे व्यक्ति की एक समस्या सुलझती है, कि उससे जुड़ी चार नई समस्याएं आ जाती है। केवल एक या दो वर्ष नहीं, पूरे के पूरे जीवन पर्यन्ता- ऐसी ही स्थितियों के लिए किया गया है शक्ति साधनाओं का सृजन और छिन्नमस्ता की साधना इनमें एक पृथक व विशिष्ट स्थान रखती है।सकती य विरोधाभासी धार प्रतीत है, किन्तु है शत प्रतिशत सत्य कि जहां कांच का पूर्ण प्रवाह होता है, वहीं प्रेस का भी पूर्ण प्रवाह सम्भव हो सकता है।

यह जो इस युग की तथाकथित सभ्यता है कि इन्हें दो परस्पर विरोधी गुणमान लिया गया है और ऐसा इस कारण हुआ है कि जीवन की गति तीव्र होने के साथ-साथ व्यक्ति ने पौरुष का आश्रय स्यांग हृदय के आवरण को ओढ़ लिया है। हृदय के आवरण के साथ गतिशील होने पर व्यक्ति को प्रारम्भिक सफलताएं सस्ती लोकप्रियता अवश्य मिल जाती है, किन्तु होती है सब बालू की भांति एक ही आघात से भरभरा कर गिर जाती है और इसका सर्वाधिक पुष्ट प्रमाण है दिन प्रतिदिन केवल विदेशों में ही नहीं

एक अहं विकसित कहे जाने वाले देश भारत में बढ़ती हृदय रोगियों की संख्या व्यक्ति किसी प्रकार से समस्त चतुराई को लगाकर कुछ अर्जित करता है, लेकिन पाता है, कि उसके कुछ अर्जित करते ही उससे जुड़ी चार और समस्याएं खड़ी हो गई हैं या यह अनुभव करता है, कि उसकी चतुराई से किए गए। अजून में संघ लगाकर उसे झपट लेने वाले और आ गए हैं, तो उसे अपना जीवन ही व्यर्थ लगने लगता है और वह इसी वेद में या तो अस्वस्थ होकर बिस्तर पकड़ लेता है या इस जगत को ही अलविदा कह देता है।

केवल हृदय रोग ही नहीं वरन निरन्तर बढ़ा रही आत्महत्याओं की संख्या भी प्रकार से इसी की और संकेत करती है। एक बेटोजगार व्यक्ति इधर-उधर से सम्पर्क कट, उच्चतम शिक्षा प्राप्त होने के बावजूद भी जब उत्कोच (घुस) देकर किसी नौकरी  को पाता है और नौकरी  पाने के बाद पाता है, कि उसकी समस्याओं का अन्त नहीं हुआ  ‘प्रारम्भ’ हुआ है।

अपने शीर्ष अधिकारी नित्य प्रणाम करना है, उनके बच्चों तक की ही नहीं कुते तक कोजी हजूरी करनी पड़ती है या उन्हें जोड़ो कर हर माह एक नियत राशि पहुंचानी होती है अथवा कार्यालय के राजनीतिक इन्हों में उलझना है या इसी प्रकार के अनेकानेक लिया तो वह हतप्रभ सी चन अतियां, जड़ हो जाता है एक पिता अपनी सारे चातुर्य और धन-बल को लगाकर अपनी योग्य और सुशिक्षित पुत्री का विवाह किसी प्रतिष्ठित परिवार में करता है किन्तु विवाह के बाद पता चलता है, कि उसका पति परपीड़क (Sadist) प्रवृत्ति का है या उसकी और से विवाह के बाद अधिक की नाग की जाती है अथवा तलाक की धमकी मिलने लगती है, तो ऐसी स्थिति में परिवार की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए उस परिवार को किन दावों से गुजरना पडता है। इसका यत्र विज्ञान अनुमान तो कोई प्रत्यक्षदर्शी ही कर सकता है। ए

क व्यक्ति अपनी जीवन भर की पूँजी को मकान बनवाता है और सोचता है, कि उसे नित्य मकान मालिक के तानों, उलाहनों, धमकियों से मुक्ति मिल सकेगी, किन्तु बनवाने के बाद भूमि के स्वामित्व को लेकर और दावेदार खड़े हो जाते हैं या कोई कानूनी अन निकल आती है अथवा पड़ोसी दुष्ट प्रकृति का जाता है, तो ऐसे में वह घर उस गुड़ भरी हंसिया की हो जाता है, जो न उगली जा सकती है. न निगली सकती है। ऊपर तो ये केवन तीन उदाहरण हैं किन्तु जीवन का स्वरूप इन तीन उदाहरणों से परे कहीं अधिक विस्तारित है।

पग-पग पर व्यक्ति अनुभव करता है, कि उसने अपनी किसी समस्या के लिए जो समाधान प्राप्त किया है, वह तव में चार नई समस्याओं को जन्म देने वाला बनता रहा है और इस ऊहापोह में व्यक्ति इस तरह से कर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि उसके जीवन की गति, हृदय का उमंग, ओठों की मुस्कराहट सब कुछ खो जाती है। ऐसे में वह कोई भी चातुर्य कार्य नहीं करता है और लड़ते-लड़ते व्यक्ति उस स्थिति में पहुंच जाता है. कि उसके अन्दर चातुर्य प्रयोग करने की क्षमता भी नहीं रह जाती है। अन्त में वह हारे को हरिनाम या ‘हरि इच्छा, प्रभु इच्छा का मनत सलबरा ओढ़ एक घुटन में घिर कर रह जाता है।

साधनाएं केवल ऐकान्तिक सुख अथवा समाधि को उपलब्ध करवा देने का माध्यम नहीं होती और जो होती हैं उन्हें कुछ समय के लिए विश्राम दे देना चाहिए जब तक जीवन की ऐसी ही स्थितियों के निश्चित और फलप्रद समाधान न मिल जाएं, क्योंकि साधना का सारा अस्तित्व ही जिस आधार पर टिका है वह है ‘विद्रोह’ । भाग्य साधना ने भाग्य लिपि में क्या अंकित किया है, यह पढ़ने का अवकाश साधक के पास नहीं होता और न होना चाहिए। साधक का तात्पर्य ही होता है कि वह अपनी इच्छानुसार परिवेश का निर्माण स्वयं कर लेता है और इसमें माध्यम बनाता है विविध साधनाओं को यथार्थ शिष्य केवल गुरु-गुरु की रट नहीं लगाता, वरन जीवन की समस्याओं का समाधान स्वयं अपने पौरुष से पाने का प्रयास करता है।

इस लेख के प्रारम्भ में जिस पौरुष की चर्चा की उसका वस्तुतः यही तात्पर्य है। पौरुषता का तात्पर्य केवल एक पुरुष शटीर और बात-बात पर ऐंठने से नहीं होता, वरन् जहां कोई भी साधक अथवा साधिका जीवन की विविध स्थितियों का शान्त चित से आकलन कर उनका उपाय सोचता है और यह चिन्तन करता है, कि इसके लिए कौन सी मुक्ति फलप्रद होगी, वह भी पौरुष ही है। साधना भी एक प्रकार की ही विषय वस्तु है यह अलग बात है. कि आज साधना के क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले व्यक्ति की धारणा एक अव्यवहारिक, अब्बाक और प्रायः पोंगा के रूप में की जाती है किन्तु जो यथार्थ में साधना के क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले व्यक्ति को जिन आलोडनों विलोड़गों का सामना करना पड़ता है।

एक ओर उनमें प्रबल वेग, पौरुष, क्रोध और ज्ञान का समुद्र सा उमड़ता रहता है, तो वहीं उन्हें क्षमा, प्रेम, करुणा और शान्त मनःस्थिति जैसे सर्वथा विरोधी भावों का आश्रय लेकर समाज में एक सामान्य व्यक्ति की तरह गतिशील होते हुए सकारात्मक व निर्माणात्मक कार्यों को पूर्णता भी देनी होती है और ऐसे व्यक्तित्व ही सही अर्थों में दत्त महाविद्याओं में से किसी भी महाविद्या के यथार्थ साधक हो सकते हैं। अन्तर इस बात से नहीं पड़ता है, कि कौन सा साधक किस महाविद्या की साधना में लीन है. यरन मुख्य यहीं है, कि क्या महाविद्या साधना मैं प्रवृत्त पूर्व एक पृष्ठभूमि का निर्माण कर चुका है।

जगदम्बा का कोई भी स्वरूप हो और किसी कारण जहां महाविद्याओं में एक ओर से शक्ति प्रवाह रहता है वहीं दूसरी ओर से प्रेम, ममता जैसे भावों की भी समाहिती होती है, जो इन को साथ लेता है यही महाविद्या साधनाओं में सकता है और जिसने जीवन में किसी एक साधना में भी सफलता प्राप्त कर ली. उसका आलोकित हो जाता है।

मस्ता साधना भी इसी श्रेणी की एक समुच्चय है जिसका समाज में भयवश और भ्रमवश अत्यन्त प्रसार हो सका है। इसके नाम के अनुरूप यह मिथ्या धारणा कर लेते हैं, कि इस साधना होने पर यदि साधना में कोई चूक हो गई, तो देवी सिर के टुकड़े-टुकड़े (छिन्नमस्तक) कर देंगी। यह है कि केवल छिन्नमस्ता ही नहीं किसी भी महाविद्या के पूर्ण क्रम में प्रवेश करने पर गुरु निर्देशन में नियमों का दृढ़ता से पालन करना पड़ता है, किन्तु यह तात्पर्य नहीं कि साधक किसी देवी या देवता के मात्र से भयभीत होकर उससे सम्बन्धित साधना का ही त्याग दे।

किसी भी शक्ति का तात्पर्य केवल यह नहीं होता, कि साधक पहले पूर्णता प्राप्त करे तभी उसके (उस शक्ति) विविध प्रयोग करे, अपितु जिनको अपने जीवन में समाहित कर सहज ही दैनदिन जीवन में आने वाली कठिनाईयों से मुक्ति पाता हुआ अपने अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति में सहजता और निर्द्वन्द्वता से प्रविष्ट हो सके। प्रस्तुत छिन्नमस्ता साधना के साथ भी यही तथ्य है, कि आवश्यक नहीं, कि पहले साधक छिन्नमस्ता की सिद्धि करे तभी इस प्रयोग को सम्पन्न करने की पात्रता प्राप्त कर सके।

दूसरे शब्दों में यहां छिन्नमस्ता महाविद्या साधना की विधि नहीं अपितु छिन्नमस्ता महाविद्या पर आधारित एक ऐसे प्रयोग की प्रस्तुति की जा रही है, जिसे सम्पन्न कर साधक जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में निर्विघ्नता की स्थिति प्राप्त कर सकता है। जीवन का कोई भी महत्वपूर्ण कार्य कट लेता है, तो न केवल उसका विशेष कार्य ही निर्विघ्नता पूर्वक सम्पन्न होता है वरन् आगे की सम्भावित सभी विपरीत स्थितियों का समाधान भी हो जाता है।

Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना विधि

प्रस्तुत प्रयोग में आवश्यक उपकरण के रूप में साधक के पास ताम्र-पत्र पर अंकित छिन्नमस्ता यंत्र’, ‘दो दि मधुररूपेण रुद्राक्ष (जो छिन्नमस्ता की दो अभिन्न शक्तियां जया और विजया के प्रतीक है) छिन्नमस्ता माता होनी आवश्यक है। साधक इस साधना को किसी भी मंगलवार की रात्रि में दस बजे के आस-पास प्रारम्भ कर सकता है। यह एक दिवसीय साधना है, अतः विशेष श्रमसाध्य भी नहीं है। साधक स्वयं लाल रंग की धोती पहन दक्षिण मुख हो. न लाल रंग के आसन पर ही बैठें और सामने लकड़ी के में बाजोट पर लाल रंग का वस्त्र बिछाकर समस्त साधना क सामग्रियों की स्थापना कर दें।

दोनों धुपे रुद्रावर यंत्र दाई  ओर  बाई  और रखें तथा समस्त साधना सामग्री का पूजन सिन्दूर व अक्षत से करें। यदि सम्भव हो, तो लाल रंग के पुष्प चढ़ाएं। अगरबत्ती अथवा धूप लगाने की विशेष आवश्यकता नहीं है किन्तु तेल का इतना बड़ा दीपक अवश्य जला लें, जो समस्त मंत्र जप के काल में प्रज्ज्वलित रहे। इसके पश्चात् साधक अपनी जिस मनोकामना की मूर्ति में तत्पर होने जा रहा है, उसका मन ही मन स्मरग करें मनोकामना किसी भी प्रकार की हो उसमें संकोच में करने की आवश्यकता नहीं है। यह प्रयोग प्रत्येक मनोकामना के प्रति समान रूप से प्रभावी है किन्तु साधक को प्रत्येक नई मनोकामना चाहे वह रोजगार की प्राप्ति से सम्बन्धित हो अथवा व्यवसाय को प्रारम्भ करने से अथवा विवाह या सन्तान या गृहस्थ सुख से प्रत्येक बार नई साधना सामग्री के साथ ही प्रयोग को सम्पन्न करें मनोकामना स्मरण के पश्चात देवी के उग्र स्वरूप का ध्यान करते हुए और मन में । यह भावना करते हुए, कि उनके वरदायक प्रभाव से साधक का पथ निष्कंटक हो रहा है।

Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना ध्यान

मास्वमण्डलमध्यमां निजशिरश्छित्रं विकीर्णालिक स्फारास्यं प्रपिवद्गलात्स्वधिरं वामे करे विभ्रतीम् याभासक्तरतिस्मारोपरिगतां सख्याँ निजे डाकिनीवर्णिन्यौ परिदृश्य मोदकलितां श्रीछिन्नमस्तां भजे ॥

साधक छिन्नमस्ता माला से निम्न मंत्र की केवल 21 माला मंत्र जप सम्पन्न करें।

मंत्र. ।। ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं वैरोचनीये ह्रीं फट् स्वाहा OM SHREEM HREEM HREEM KLEEM AVIEM VAJRAVAIROCHANEFYE HROUM HREEM PHAT SWAHA

मंत्र जप के पश्चात् दूसरे समस्त सामग्रियों का किसी पवित्र सरोवर में विसर्जित कर दें।

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दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा लाभ Das Mahavidya Deeksha Ph.85280 57364

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दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा लाभ Das Mahavidya Deeksha Ph.85280 57364

दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा लाभ Das Mahavidya

Deeksha Ph.85280 57364

 

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दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा लाभ Das Mahavidya Deeksha Ph.85280 57364 इस सृष्टि के समस्त जड़-चेतन पदार्थ अपूर्ण हैं, क्योंकि पूर्ण तो केवल वह ब्रह्म ही है जो सर्वत्र व्याप्त है। अपूर्ण रह जाने पर ही जीव को पुनरपि जन्मं पुनरपि मरण’ के चक्र में बार-बार संसार में आना पड़ता है, और फिर उन्हीं क्रिया- कलापों में संलग्न होना पड़ता है।

शिशु जब मां के गर्भ से जन्म लेता है, तो ब्रह्म स्वरूप ही होता है, उसी पूर्ण का रूप होता है, परन्तु गर्भ के बाहर आने के बाद उसके अन्तर्मन पर अन्य लोगों का प्रभाव पड़ता है और इस कारण धीरे-धीरे नवजात शिशु को अपना पूर्णत्व बोध विस्मृत होने लगता है और एक प्रकार से वह पूर्णता से अपूर्णता की ओर अग्रसर होने लगता है। और इस तरह एक अन्तराल बीत जाता है, वह छोटा शिशु | अब वयस्क बन चुका होता है।

 

नित्य नई समस्याओं से जूझता हुआ वह अपने आप को अपने ही आत्मजनों की भीड़ में भी नितान्त | अकेला अनुभव करने लगता है। रोज-रोज की भाग-दौड़ से एक तरह से वह थक जाता है, और जब उसे याद जाती है प्रभु की, तो कभी कभी पत्थर की मूर्तियों के आगे दो आंसू भी कुलका देता है।

परन्तु उसे कोई हल मिलता नहीं चलते-चलते जब कभी पुण्यों के उदय होने पर सद्गुरु से मुलाकात होती है, तब उसके जीवन में प्रकाश की एक नई किरण फूटती है। ऐसा इसलिए सिद्धाश्रम प्राप्ति के लिए भी दो महाविद्याओं में दक्ष होना एक अनिवार्यता है और यदि साधक को योग्य गुरु से एक-एक कर इन दस महाविद्याओं की दीक्षाएं प्राप्त हो जाएं, तो उसके सौभाग्य की तुलना ही नहीं की जा सकती है। गुरुदेव अपने अंगुष्ठ द्वारा अपनी 

उर्जा को साधक के आज्ञा चक्र में स्थापित कर देते हैं। होता है, क्योंकि मात्र सद्गुरु ही उसे बोध कराते हैं, कि वह अपूर्ण था नहीं अपितु बन गया है। गुरुदेव उसे बोध कराते हैं, कि वह असहाय नहीं, अपितु स्वयं उसी के अन्दर अनन्त सम्भावनाएं भरी पड़ी हैं, असम्भव को भी सम्भव कर दिखाने की क्षमता छुपी हुई है, गुरु की इसी क्रिया को दीक्षा कहते हैं, जिसमें गुरु अपने प्राणों को भर कर अपनी ऊर्जा को अष्टपाश में बंधे जीव में प्रवाहित करते हैं। गुरु दीक्षा प्राप्त करने के बाद साधक का मार्ग साधना के क्षेत्र में खुल जाता है। साधनाओं की बात आते ही दस महाविद्या का नाम सबसे ऊपर आता है। प्रत्येक महाविद्या का अपने आप में एक अलग ही महत्व है।

लाखों में कोई एक ही ऐसा होता है जिसे सद्गुरु से महाविद्या दीक्षा प्राप्त हो पाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद सिद्धियों के द्वार एक के बाद एक कर साधक के लिए खुलते चले जाते हैं।

दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा  लाभ Das Mahavidya ki Deeksha दीक्षाओं से सम्बन्धित लाभ निम्न हैं-

1 काली महाविद्या दीक्षा – जीवन में शत्रु बाधा एवं कलह से पूर्ण मुक्ति तथा निर्भीक होकर विजय प्राप्त करने के लिए यह दीक्षा अद्वितीय है। देवी काली के दर्शन भी इस दीक्षा के बाद ही सम्भव होते हैं, गुरु द्वारा यह दीक्षा प्राप्त होने के बाद ही कालीदास में ज्ञान का स्रोत फूटा था, जिससे उन्होंने ‘मेघदूत’, ‘ऋतुसंहार’ जैसे अतुलनीय काव्यों की रचना की, इस दीक्षा से व्यक्ति की शक्ति भी कई गुना बढ़ जाती है।

2 तारा दीक्षा– इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक को अर्थ की दृष्टि से कोई कष्ट नहीं रह जाता। उसके अन्दर ज्ञान, बुद्धि, शक्ति का प्रस्फुटन प्रारम्भ हो जाता है। तारा के सिद्ध साधकों को आकस्मिक धन प्राप्त होता है, ऐसा बहुधा देखने में आया है।

3 षोडशी त्रिपुर सुन्दरी दीक्षा – गृहस्थ सुख, अनुकूल विवाह एवं पौरुष प्राप्ति हेतु इस दीक्षा का विशेष महत्व है। मनोवांछित कार्य सिद्धि के लिए भी यह दीक्षा उपयुक्त है। इस दीक्षा से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थो की प्राप्ति होती है।

4 भुवनेश्वरी दीक्षा– यह दीक्षा प्राप्त करना ही साधकों के लिए सौभाग्य का प्रतीक है। भुवनेश्वरी की कृपा से जीवन में ऐश्वर्य एवं सम्पन्नता स्थाई रूप से आती है, गृहस्थ जीवन स्वर्ग तुल्य हो जाता है। भोग एवं मोक्ष को एक साथ प्राप्त करने के लिए भुवनेश्वरी दीक्षा को श्रेष्ठ माना गया है।

 5  छिन्नमस्ता दीक्षा प्रायः देखने में आता है, कि व्यक्ति अकारण ही किन्हीं मुकदमे में उलझ गया है, या शत्रु उस पर हावी हो रहे हैं, या बने हुए कार्य बिगड़ जाते हैं, यह सब साधक पर किए गए किसी तंत्र प्रयोग का भी परिणाम हो सकता है, इसके निवारण हेतु छिन्नमस्ता दीक्षा) का प्रावधान है। यह दीक्षा प्राप्त करने के उपरान्त न केवल स्थितियां अनुकूल होती हैं, वरन साधक के लिए तंत्र साधनाओं में आगे बढ़ने का मार्ग भी प्रशस्त हो जाता है।

 6 त्रिपुर भैरवी दीक्षा भूत-प्रेत एवं इतर योनियों द्वारा बाधा आने पर जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। त्रिपुर भैरवी दीक्षा से जहां प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है, वहीं शारीरिक दुर्बलता भी समाप्त होती है, व्यक्ति का स्वास्थ्य निखरने लगता है एवं उसमें आत्मशक्ति त्वरित गति से जाग्रत होती है, जिससे वह असाध्य कार्यों को भी पूर्ण करने में सक्षम हो पाता है।

7 धूमावती दीक्षा– इस दीक्षा के प्रभाव से शत्रु शीघ्र ही पराजित होते है। उच्चाटन आदि क्रियाओं में सिद्धि के लिए भी यह दीक्षा आवश्यक है। सन्तान यदि अस्वस्थ रहती हो, नित्य कोई रोग लगा रहता हो, तो धूमावती दीक्षा अत्यन्त अनुकूल मानी गई है।

8 बगलामुखी दीक्षा– यह दीक्षा अत्यन्त तेजस्वी, प्रभावकारी है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक निडर एवं निर्भीक हो जाता है। प्रबल से प्रबल शत्रु को निस्तेज करने एवं सर्व कष्ट बाधा निवारण के लिए इससे अधिक उपयुक्त कोई दीक्षा नहीं है। इसके प्रभाव से रुका धन पुनः प्राप्त हो जाता है। भगवती वल्गा अपने साधकों को एक सुरक्षा चक्र प्रदान करती हैं, जो साधक को अजीवन हर खतरे से बचाता रहता है।

 9 मातंगी दीक्षा– आज के इस मशीनी युग में जीवन यंत्रवत्, ठूंठ और नीरस बनकर रह गया है। जीवन में सरसता, आनन्द, भोग-विलास, प्रेम, सुयोग्य पति पत्नी प्राप्ति के लिए वाक् सिद्धि के शक्ति मांतगी दीक्षा श्रेष्ठ है। इसके अलावा साधक में गुण भी आ जाते हैं। उसमें आशीर्वाद व श्राप देने की जाती है, और वह एक सम्मोहक व कुशल वक्ता बन जाता है।

10 कमला दीक्षा– दरिद्रता को जड़ से समाप्त कर धन का अक्षय स्रोत प्राप्त करने में कमला दीक्षा अत्यंत प्रभावी होती है। इसके प्रभाव से व्यापार में चतुर्दिक वृद्धि होती है, यदि नौकरी पेशा व्यक्ति है, तो उसकी पदोन्नति होती है। बेरोजगार व्यक्ति को राज्यपद प्राप्त होता है। एक तरह से इस दीक्षा के माध्यम से जीवन में स्थायित्व आ जाता है।

दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा लाभ Das Mahavidya Deeksha प्रत्येक महाविद्या दीक्षा अपने आप में ही अद्वितीय है, साधक अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर गुरुदेव से निर्देश प्राप्त कर इनमें से कोई भी दीक्षा प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक दीक्षा के महत्व का एक प्रतिशत भी वर्णन स्थाना भाव के कारण यहां नहीं हुआ है, वस्तुतः मात्र एक महाविद्या साधना सफल हो जाने पर ही साधक के लिए सिद्धियों का मार्ग खुल जाता है, और एक-एक करके सभी साधनाओं में सफल होता हुआ वह पूर्णता की ओर अग्रसर हो जाता है। यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है, कि दीक्षा कोई जादू | नहीं है,

कोई मदारी का खेल नहीं है, कि बटन दबाया और उधर कठपुतली का नाच शुरू हो गया। दीक्षा तो एक संस्कार है, जिसके माध्यम से कुसंस्कारों का क्षय होता है, अज्ञान, पाप और दारिद्र्य का नाश होता है, ज्ञान, शक्ति व सिद्धि प्राप्त होती है और मन में उमंग व प्रसन्नता आ पाती है।

दीक्षा के द्वारा साधक की पशुवृत्तियों का शमन होता है. और जब उसके चित्त में शुद्धता आ जाती है, उसके बाव ही इन दीक्षाओं के गुण प्रकट होने लगते हैं और साधक अपने अंदर सिद्धियों का दर्शन कर आश्चर्य चकित रह जाता है। जब कोई पूर्ण श्रद्धा भाव से दीक्षा प्राप्त करता है, तो गुरु को भी प्रसन्नता होती है, कि मैंने बीज को उपजाऊ भूमि में ही रोपा है। वास्तव में ही वे सौभाग्यशाली कहे जाते हैं, जिन्हें जीवन में योग्य गुरु द्वारा ऐसी दुर्लभ महाविद्या दीक्षाएं प्राप्त होती हैं, ऐसे साधकों से तो देवता भी ईर्ष्या करते हैं।

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प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना दुर्भाग्य की गूढ़ रेखाओं को मिटाकर सौभाग्य में बदलने की दिव्य क्रिया – फ़ोन 85280 57364

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प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana Ph. 8528057364

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana Ph. 8528057364
प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana Ph. 8528057364

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana  जो साधक के शत्रुओं का नाश करती है साधक के ऊपर किसी भी प्रकार का तंत्र दोष समाप्त करती है महाविद्याओं में धूमावती महाविद्या साधना अपने आप में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस साधना के बारे में दो बातें विशेष रूप से हैं, प्रथम तो यह दुर्गा की विशेष कलह निवारणी शक्ति है, दूसरी यह कि यह पार्वती का विशाल एवं रक्ष स्वरूप है। जो क्षुधा (भूख) के विकलित कृष्ण वर्णीय रूप हैं, जो अपने भक्तों को अभय देने वाली तथा उनके शत्रुओं के लिए साक्षात् काल स्वरूप हैं । इस साधना के सिद्ध होने पर भूत-प्रेत, पिशाच व अन्य तंत्र बाधा का साध उसके परिवार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ।

जब कोई साधक भगवती धूमावती की साधना सम्पन्न करता है, तो वे प्रसन्न होकर साधक के शत्रुओं का भक्षण कर लेती हैं और साधक को अभय प्रदान करती हैं ।धूमावती’ दस महाविद्याओं में से एक हैं। जिस प्रकार ‘तारा’ बुद्धि और समृद्धि की, ‘त्रिपुर सुन्दरी’ पराक्रम एवं सौभाग्य की सूचक मानी जाती हैं, इसी प्रकार ‘धूमावती’ शत्रुओं पर प्रचण्ड वज्र की तरह प्रहार करने वाली मानी जाती हैं। यह अपने आराधक को अप्रतिम बल प्रदान करने वाली देवी हैं जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में सहायक सिद्ध होती ही हैं, यदि पूर्ण निष्ठा व विश्वास के साथ ‘धूमावती साधना’ को सम्पन्न कर लिया जाय तो ।

दस महाविद्याओं के क्रम में ‘धूमावती’ सप्तम् महाविद्या हैं। ये शुत्र का भक्षण करने वाली महाशक्ति और दुःखों की निवृत्ति करने वाली हैं। बुरी शक्तियों से पराजित न होना और विपरीत स्थितियों को अपने अनुकूल बना देने की शक्ति साधक को इनकी साधना से प्राप्त होती है।कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है, और उसके आगे सबको हार माननी पड़ती है, किन्तु जो समय पर हावी हो जाता है, वह उससे भी ज्यादा बलशाली कहलाता है।

शक्ति सम्बलित होना और शक्तिशाली होना तो केवल शक्ति-साधना के माध्यम से ही संभव है, जिसके माध्यम से दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित किया जा सकता है। जो भयग्रस्त, दीन-हीन और अभावग्रस्त जीवन जीते हैं, वे कायर और बुजदिल कहलाते हैं, किन्तु जो बहादुर होते हैं, वे सब कुछ अर्जित कर, जो कुछ उनके भाग्य में नहीं है, उसे भी साधना के बल पर प्राप्त करने की सामर्थ्य रखते हैं… और यदि साधना हो किसी महाविद्या की, तो उसके भाग्य के क्या कहने, क्योंकि दस महाविद्याओं में से किसी एक महाविद्या को सिद्ध कर लेना भी जीवन का अप्रतिम सौभाग्य कहलाता हैं।

आज समाज में जरूरत से ज्यादा द्वेष, ईर्ष्या, छल, कपट, हिंसा और शत्रुता का वातावरण बन गया है, फलस्वरूप यदि। व्यक्ति शांतिपूर्वक रहना चाहे, तो भी वह नहीं रह सकता। अतः जीवन की असुरक्षा समाप्त करने की दृष्टि से यह साधना विशेष महत्वपूर्ण एवं अद्वितीय है। धूमावती ‘दारुण विद्या’ हैं। सृष्टि में जितने भी दुःख हैं, व्याधियां हैं, बाधायें हैं. इनके शमन हेतु उनकी साधना श्रेष्ठतम मानी जाती है। जो व्यक्ति या साधक इस महाशक्ति की आराधना-उपासना करता है, ये उस साधक पर अति प्रसन्न हो, उसके शत्रुओं का भक्षण तो करती ही हैं, साथ ही उसके जीवन में धन-धान्य, समृद्धि की कमी नहीं होने देतीं, क्योंकि यह लक्ष्मी प्राप्ति में आने वाली बाधाओं का पूर्ण भक्षण कर देती हैं।

अतः लक्ष्मी प्राप्ति के लिए भी साधक को इस शक्ति की आराधना करते रहना चाहिए। महाविद्याओं में धूमावती की साधना बहुत ही क्लिष्ट मानी जाती है। इसके लिए साधक को बहुत ही पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। इस साधना से पूर्व तत्सम्बन्धित दीक्षा लेने का प्रयास करना चाहिए, इससे साधना काल में किसी प्रकार के भय आदि होने की संभावना नहीं रहती।

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना  विधि  Dhumavati mahavidya sadhana 

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना विधि Dhumavati mahavidya sadhana साधना विधान इस प्रयोग में निम्न सामग्री अपेक्षित है- ‘प्राणश्चेतना युक्त धूमावती यंत्र’, ‘दीर्घा माला’ तथा ‘अघोरा गुटिका’ । इसे किसी भी माह की अष्टमी, अमावस्या अथवा रविवार के दिन सम्पन्न करें। यह रात्रिकालीन साधना है, इसे रात्रि 9 बजे से 12 बजे के मध्य सम्पन्न करें। I साधक को स्नान आदि से पवित्र होकर, साधना-कक्ष में पश्चिम दिशा की ओर मुख कर ऊनी आसन पर बैठकर साधना करनी चाहिए। लाल वस्त्र, लाल धोती और गुरु चादर का प्रयोग करें। यह साधना सुनसान स्थान में, श्मशान में, जंगल में, गुफा में या किसी भी एकांत स्थल पर, जहां कोई विघ्न उपस्थित न हो, करना श्रेयस्कर रहता है। अपने सामने चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर धूमावती का चित्र स्थापित करें, फिर किसी प्लेट में ‘यंत्र’ को स्थापित करें।यंत्र को जल से धोकर उस पर कुकुम से तीन बिन्दु लाइन से लगा लें, जो सत्व, रज एवं तम गुणों के प्रतीक स्वरूप हैं। धूप व दीप जला दें तथा पूजन प्रारम्भ करें 

विनियोगः

दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लें, निम्न संदर्भ को पढ़े- अस्य धूमावती मंत्रस्य पिप्पलाद ऋषि, र्निवृच्छन्दः, ज्येष्ठा देवता, ‘धूं’ बीजं, स्वाहा शक्ति:, धूमावती कीलकं ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः । हाथ में लिए हुए जल को भूमि पर या किसी पात्र में छोड़ दें।

ऋष्यादि न्यासः ॐ पिप्पलाद ऋषये नमः शिरसि (सिर को स्पर्श करें) ॐ निवृच्छन्द से नमः मुखे (मुख को स्पर्श करें) ॐ ज्येष्ठा देवतायै नमः हृद्धि

(हृदय को स्पर्श करें) ॐ धूं बीजाय नमः गुझे (गुह्य स्थान को स्पर्श करें) ॐ स्वाहा शक्तये नमः पादयो (पैरों को स्पर्श करें) ॐ धूमावती कीलकाय नमः नाभौ (नाभि को स्पर्श करें) ॐ विनियोगाय नमः सर्वांगे

(सभी अंगों को स्पर्श करें)कर न्यासः ॐ धूं धूं अंगुष्ठाभ्यां नमः (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अंगूठों को स्पर्श करें।) ॐ हूं तर्जनीभ्यां नमः (दोनों अंगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ मां मध्यमाभ्यां नमः

(दोनों अंगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ वं अनामिकाभ्यां नमः (दोनों अंगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ तीं कनिष्ठिाभ्यां नमः

(दोनों अंगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः (परस्पर दोनों धूम हाथों को स्पर्श करें)

. यंत्र गुटिका और माला को दोनों हाथ की अंजलि में ले 14 लें, एकाग्रचित होकर दीपक की लौ पर मंत्र ॐ धूं धूं धूमावती) का 51 बार जप करते हुए ‘त्राटक’ करें। 11. इसके बाद सामग्री को दोनों नेत्रों से स्पर्श कराये, सामग्रियों को यथासंभव चौकी पर रख दें, ‘गुटिका’ को यंत्र के सामने रखें।

   संकल्प

– दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें, कि अमुक मासे महीने का नाम बोलें) अमुक दिने (दिन का नाम बोलें) अमुक गोत्रोत्पन्नो अपने गोत्र का नाम बोलें) अमुक (अपना नाम बोलें) समस्त शत्रु भय व्याधि निवारणार्याच दुःख दारिद्र्य  | विनाशाय श्री धूमावती साधना करिष्ये। हाथ में लिए जल को भूमि पर छोड़ दें। 

 ध्यान

 ध्यान दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवती सु धूमावती का ध्यान करें- अत्युच्चा मलिनाम्बरालिन गाया दुर्मना रुक्षामित्रितया विशालदशना सूर्योदरी पंचला । प्रस्वेदाम्बुचिता बुवाकु सतः कृष्णातिरुक्षाप्रभाः देवा मुक्तकत्वा सदाशिव कलिर्भूमावती मन्त्रिणा ।

अर्थात् ‘मलिन वस्त्र पहने हुए सबको भयभीत करने वाली, मन में विकार को उत्पन्न करने वाली, रूखे बाल वाली, मूख और प्यास से व्याकुल, बड़े-बड़े दांतों वाली, बड़े पेट वाली, | पसीने से भरी हुई, बड़ी-बड़ी आंखों वाली कांतिहीन खुले बालों वाली, सदा अप्रिय व्यवहार को चाहने वाली भगवती स प्रकार भगवती धूमावती के स्वरूप का चिन्तन करते हुए बायें हाथ में गुटिका को लेकर मुट्ठी बांध लें तथा ‘दीर्घा माला’ से निम्न मंत्र का 5 माला नित्य तीन दिन तक जप करें-

विश्वास, विश्वास, अपने आप में विश्वास, ईश्वर में विश्वास यही महानता का रहस्य है। यदि तुम पुराण के तैंतीस करोड़ देवताओं और विदेशियों द्वारा बतलाए हुए सब देवताओं में विश्वास करते हो, पर यदि अपने आप में विश्वास नहीं करते, तो तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती। अपने आप में विश्वास करो, उस पर स्थिर रहो और शक्तिशाली बनी । धूमावती का में ध्यान करता हूं कि वे मेरे जीवन की समस्त विघ्न बाधाओं का नाश करें।’ .

मंत्र ।। ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा।।

जप समाप्ति के बाद सभी सामग्रियों को चौकी पर बिछे कपड़े में ही लपेट कर चौथे दिन शाम को किसी जन शून्य स्थान में जाकर गड्ढा खोदकर दबा दें और पीछे मुड़कर न देखें। . घर आकर हाथ-पैर धो लें। यह साधना दुर्भाग्य की गूढ़ रेखाओं को मिटाकर सौभाग्य में बदलने की दिव्य क्रिया है। इस साधना के बाद निश्चय ही जीवन में सौभाग्य का सूर्योदय होगा और सम्पन्नतायुक्त एवं श्री सुखी जीवन का प्रादुर्भाव सम्पन्न होगा।

 

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Yogini Sadhana प्राचीन योगिनी साधना रहस्य -विधि विधान

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 Yogini Sadhana प्राचीन योगिनी साधना रहस्य -विधि विधान आज हम योगिनी साधना पर चर्चा करेंगे। यद्यपि स्त्री का हर रूप मधुर होता है, फिर भी जीवन में हर रूप का एक निश्चित अर्थ और महत्वपूर्ण स्थान होता है। चाहे मां का रूप हो, बहन हो या बेटी का, चाहे वह पत्नी हो या प्रेमिका या दोस्त। स्वरूप भिन्न हो सकते हैं. लेकिन गहरे दृष्टिकोण से हर रूप भोग के प्रयास में डूबे मातृत्व के एक अंतरशाला का प्रवाह लेकर ही चलता है, क्योंकि ऐसा करना हर स्त्री का मूल धर्म है, लेकिन इन सभी रूपों से कुछ अलग है, जो न केवल विशिष्ट है बल्कि विशिष्ट भी है, उसी एक रूप योगिनी का नाम है!

योगिनी एक नारी  देह में आबद्ध होते हुए, नारी मन की समस्त कोमल भावनाओं को एकत्र कर उपस्थित होते हुए भी अन्ततोगत्वा शक्ति का एक पुंज ही होती है, जो नारी देह का आश्रय लेकट सम्मुख आती है, क्योंकि शक्ति का आश्रय स्थल सदैव से ही नारी को स्वीकार किया गया है। केवल साधक ही नहीं, प्रत्येक सामान्य मनुष्य के जीवन में भावनाएं होती है, जो उसे सहज प्रवाह दे सकती हैं। जीवन से यदि भावनाओं को ही निकाल दिया जाए, तो मनुष्य व यंत्र में अंतर ही क्या रह जाएगा? किन्तु मनुष्य यंत्र नहीं हो सकता।  एक पहले ही इस युग की सभ्यता’ ने मनुष्य यंत्र बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है जिसके परिणाम की अधिक व्याख्या या वर्णन की आवश्यकता नहीं है। जो सम्मुख है, वह है एक यंत्रवत् जीवन जिसमें न किसी के प्रति कोई ममत्व है, न अपनत्व, न उछाह न वेग, न प्रेम और न ही फिर इन भावनाओं के अभाव में जीवन के प्रति कोई लक्ष्य ही।

किसी भी व्यक्ति से पूछ कर देखिए, कि उसके जीवन में जो आपाधापी चल रही है या जिस आपाधापी का न केवल उसने सृजन कर लिया है वदन् जिसका वह निरन्तर पोषण भी करता जा रहा है, उसका अर्थ क्या है? क्यों वह सदैव इतना उद्विग्न बना रहता है? इसके मूल्य पर उसे क्या प्राप्त हो जाएगा? किसी के पास भी इसका निश्चित उत्तर नहीं होगा, क्योंकि इन बातों का कोई निश्चित उत्तर हो भी नहीं सकता। भावनाएं जो जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि हो सकती हैं, जब उसी का अभाव हो गया, उसी का हनन् करके कुछ निर्मित करने की चेष्टा की, तो भूल तो वहीं से प्रारम्भ ही हो गयी।

और इसी बिन्दु पर आकर योगिनी साधना का महत्व स्वयमेव स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि योगिनी साधना का अर्थ ही है- भावनाओं की साधना, अपनत्व व ममत्व की साधना, जीवन में जो कुछ विस्मृत हो चला हो, जो कुछ टूट गया हो या जो कुछ रिक्त रह गय हो, उन सभी को अर्जित कर लेने या पुनः प्राप्त कर लेने की साधना यह तो भावनाओं का ही बल होता है कि जीवन में कोई भी व्यक्ति वह सब कुछ कर जाता है, जो अन्यथा उसके सहज बल से सम्भव नहीं था और यहां यह ध्यान रखने की बात है, कि बल का तात्पर्य शरीरिक बल से नहीं होता है।

यह तो मानसिक बल होता है, जो एक नर को पुरुष बनने की ओर तथा पुरुष को पुरुषोत्तम बनने की ओर उत्प्रेरित करता है और इसके मूल में होती हैं वे भावनाएं, जिनके मूल में होता है प्रेम! (यह कहना शायद पुनरोक्ति हो। जाएगा कि प्रेम का आधार होती है स्त्री) जो अपनत्व का भाव पत्नी के रूप में अधिक स्पष्टता से सामने आता है, प्रेमिका के रूप में वही भाव इस रूप में किंचित परिवर्तित हो जाता है, कि वह अपने प्रिय को सभी रूपों में केवल श्रेष्ठ ही नहीं श्रेष्ठतम देखना चाहती है. क्योंकि सामाजिक शिष्टाचार के अन्तर्गत एक प्रेमिका से अधिक पत्नी को अपनी मनोभावनाएं प्रकट करने की छूट होती है।

अंतर केवल सामाजिक बंधनों का है, विवेक का नहीं, और यह जीवन में सबसे अधिक संतोष और संतुष्टि से अधिक एक अद्वितीय सौ संतुष्टि का कारण बन जाता है। कोई मेरे लिए भी चिंतित रहता है, कोई | वह अनकहे रूप में मुझ पर अपना प्यार बरसाते रहते हैं, कोई मेरे बारे में भी सोचता रहता है और सबसे बड़ी बात यह है कि कोई मेरे पूरे अस्तित्व पर अपना अधिकार मानता है। क्योंकि इसका मतलब है कि ऐसा आश्वासन मिलना। भावनाओं पर आधारित केवल एक प्रकार की सुरक्षा भावना और आश्वासन ही वास्तविक सुरक्षा भावना दे सकता है, अन्यथा व्यक्ति को यह नहीं पता होता कि वह इसे प्राप्त करने के प्रयास में कहां भटकता है।

जीवन एक निरपेक्ष घटना नहीं होती है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी पद प्रतिष्ठा अथवा आर्थिक स्थिति का क्यों न हो. अपने जीवन का ताना-बाना किसी व्यक्ति या और अधिक विशद रूप में कहें तो किसी भावना से जोड़ कर ही बुनना चाहता है। सामान्यतयः व्यक्ति अपने जीवन को या अपनी अस्मिता को अपने परिवार से जोड़ कर जीवित रखना चाहता है। इसमें कोई अनुचित बात भी नहीं है।

परिवार जैसी सामाजिक संस्था के निर्माण के पीछे उद्देश्य ही यही रहा है, किन्तु निरन्तर बढ़ते हुए आर्थिक एवं अन्यान्य दबावों के बाद क्या आज यह सम्भव रह गया है. कि व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से कुछ अलग हट कर अपने जीवन को आहलाद व मधुरता देने वाले क्षणों के विषय में चिंतन तक कर सके ?

जीवन में ऐसी स्थिति आ जाने पर जिस प्रवाह की आवश्यकता होती है, वह किसी गणित की अपेक्षा केवल साधनाओं से ही उपलब्ध हो सकती है, क्योंकि प्रत्येक साधना स्वयं में शक्ति का एक-एक अजरा प्रवाह ही तो होती है। और यही तथ्य योगिनी साधना के विषय में भी पूर्णतयः सत्य है। आज समाज में योगिनी शब्द को लेकर क्या धारणा है, इसको कदाचित विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं अनेक व्यक्तियों की दृष्टि में भैरवी व योगिनी के मध्य भी कोई भेद नहीं होता।

यूं भैरवी की प्रस्तुति ही कहा प्रासंगिक रूप में सम्भव हो पायी है? किन्तु योगिनी इतना हल्का शब्द नहीं होता। योगिनी स्वयं में शक्ति तत्व की एक विशिष्ट प्रस्तुति व स्वरूप होती है, जिसकी साधना सम्पन्न करना प्राण तत्व को संचेतन कटने का एक उपाय होता है। यह सत्य है कि योगिनी की प्रस्तुति एक प्रेमिका रूप में होती है। किन्तु यह आवश्यक नहीं कि प्रेमिका शब्द से सदैव वासनात्मक अर्थ ही अभिप्रेत हो क्या प्रेमिका शब्द से एक महिला मित्र का अर्थ अभिप्रेत नहीं हो सकता है? वस्तुत योगिनी का वर्णन प्रेमिका रूप में होने के जो है वह है कि भारतीय समाज इतना की मान्यताओं में महिला मित्र की कभी कोई ही नहीं रही. लेकिन जो भावगत है वह सदैव से यही रहा है।

साथ ही प्रेमिका का तात्पर्य होता है, ऐसी स्त्री, जो अपने प्रिय पर अपना सावरकर देने में ही अपना सुख मन हो और न केवल विलक्षण सौन्दर्य के मेंट इस रूप में भी योगिनी की कोई भी उभी करने में असमर्थ ही होगी। जीवन को भावनाओं के आधार पर पुनः निर्मित करने व योगिनी के रूप में एक वास्तविक प्रेमिका प्राप्त करने के इच्छुक साधकों के हेतु 

जिसे सकर वे अपने भावनाशून्य हो रहे जीवन में हास्य, विनोद व मधुरता जैसे कुछ नये पृष्ठ जोड़ पाने में समर्थ हो सकते हैं।

योगिनी साधना Yogini Sadhana  विधि 

इस साधना में प्रवृत्त होने वाले साधकों के लिए आवश्यक है कि वे ताम्रपत्र पर अंकित ‘योगिनी यंत्र’ व सफेद हकीक की माता को साधनात्मक उपकरण के रूप में प्राप्त कर लें। यह साधना उपरोक्त दिवस (योगिनी एकादशी) के अतिरिक्त किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न की जा सकती है। साधना में वस्त्र आदि का रंग श्वेत होना चाहिए तथा दिशा उत्तर मुख होनी चाहिए। इस साधना में किसी विशेष विधि-विधान को सम्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है। यंत्र व माला का सामान्य पूजन करने पश्चात् दत्तचित्त भाव से निम्न मंत्र की ग्यारह माला मंत्र जप सम्पन्न करें- खिलता हुआ गोरा रंग भरा भरा सा पुष्ट मांसल बदन, अंडाकार चेहरा, खंजन पक्षी की भांति नयन और उन नयनों की एक-एक चपलता में झिलमिलाते प्रेम के कई कई सदिश योगिनी तो स्वयं में एक उपमा है, उसकी उपमा दें भी तो किससे दें  प्रेमिका . अवसर पर ही है, 

मंत्र  योगिनी साधना Yogini Sadhana

॥ ॐ ह्रीं योगिनि आगच्छ आगच्छ स्वाहा ॥ OM HREEM YOGINI AAGACHH AAGACHH SWAHA

यह एक दिवसीय साधना है तथा साधना सम्पन्न करने के दूसरे दिन यंत्र ६ माला को किसी स्वच्छ जलाशय में या निर्जन स्थान पर विसर्जित कर देना चाहिए। जैसा कि प्रारम्भ में कहा, योगिनी शक्ति तत्व का ही एक विशिष्ट प्रस्तुतिकरण होती है, अतः यह स्वाभाविक ही है, कि इसे मनोयोग पूर्वक सम्पन्न करने वाले साधक को जीवन के प्रत्येक पक्ष में अनुकूलता मिलने की क्रिया स्वयमेव | प्रारम्भ हो जाए, चाहे वह धन सम्बन्धी पक्ष हो, स्वास्थ्य की समस्या हो सौन्दर्य प्राप्ति की कामना हो या गृहस्थ जीवन के किसी भी पक्ष को स्पर्श करता कोई भी पक्ष क्यों न हो। प्रस्तुत साधना की एक अन्य गुहा विशेषता यह साधना भी है। अनुभवों को भी है कि यह प्रबल पौरुष प्राप्ति की साधना सम्पन्न करने के उपरान्त अपने गोपनीय ही रखें।

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dhumavati SADHNA प्राचीन धूमावती साधना अनुभव और लाभ PH.8528057364

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dhumavati SADHNA प्राचीन धूमावती साधना अनुभव और लाभ PH.8528057364

 

आज  हम Dhumavati धूमावती साधना की चर्चा करेंगे अपना जीवन यापन कठिन परिस्थितियों में रहकर कर रहा है, चाहे वह किसी संस्था में कार्यरत हो या व्यवसाय कर रहा अथवा स्वतंत्र क्षेत्र में कार्य कर रहा हो. हर क्षेत्र में कठिनाई, बाधाएं शत्रु बाधा एवं प्रतिस्पर्धा आदि चुनौतियां हर पल व्यक्ति को नीचा दिखाने के लिए तत्पर रहती है। इन सब कारणों की वजह से व्यक्ति हर पल अपने सम्मान की रक्षा के लिए चिन्तित रहता ही है।

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इसके समाधान एवं निष्कंटक अपने क्षेत्र में प्रगति के लिए प्रबल दैवीय संरक्षण प्राप्त होना, आज नितांत आवश्यक हो गया है। दैवीय संरक्षण कैसे प्राप्त हो, इसके लिए साधक को थोड़ा सा प्रयास करने की एवं उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इन दोनों की समविन्त क्रिया से साधक दैवीय कृपा प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है।

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वैसे भी प्रत्येक देवी देवता मनुष्य को हर पल, हर क्षण, रक्षा-सुरक्षा प्रदान करने के लिए तत्पर रहते हैं, आवश्यकता केवल इस बात की है, कि हम इनकी कृपा के अधिकारी बनें आवश्यकता इस बात की है. कि हम उनसे सहयोग एवं आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रबल भावना एवं पात्रता रखें। जीवन में चाहे भौतिक पक्ष में उन्नति की बात हो अथवा आध्यात्मिक उन्नति एवं पूर्णता प्राप्त करने की त हो, उसमें महाविद्या साधना का महत्व सर्वोपरि है।

अलग-अलग कार्यों हेतु शिव के घटदान स्वल्प उनकी शक्ति स्वरूप से इन दस महाविद्या की उत्पत्ति मानी गयी है, जिनकी साधना साधक अपनी समस्या के निवारण के लिए उचित मुहूर्त पर सम्पन्न क सफल व्यक्ति बन सकता है। दस महाविद्याओं में भगवतीDhumavati धूमावती साधना स्थायी | सम्पति की प्राप्ति, प्रचण्ड शत्रुनाश, विपत्ति निवारण संतान की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण साधना है। वास्तव में इस साधना को सम्पन्न करना जीवन की अद्वितीयता है।

तांत्रिकों की इष्ट देवी माँ तारा का रहस्य Tara Rahasya, Ph. 85280 57364

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Maa Tara Rahasya माँ तारा साधना रहस्य और ऐतिहासिक तथ्य ph. 8528057364

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तांत्रिकों की इष्ट देवी माँ तारा का रहस्य Tara Rahasya, Ph. 85280 57364  तंत्र साधकों, विशेषकर शाक्त सम्प्रदाय से सबंध रखने वाले तांत्रिकों के लिये दस महाविद्याओं की साधनाएं सम्पन्न करना अति आवश्यक है। इन दस महाविद्याओं को पूर्ण रूप से सिद्ध करने के बाद ही वह आगे पथ पर अग्रसर हो पाते हैं और सम्पूर्णता के साथ दिव्य आनन्द की अनुभूति प्राप्त कर पाते हैं। तंत्र साधना की इन दस महाविद्याओं में ‘तारा महाविद्या’ का अपना विशिष्ट स्थान रहा है। इसलिये तांत्रिकों के लिये तारा महाविद्या की साधना सबसे श्रेष्ठ और अद्भुत एवं प्रभावपूर्ण मानी गयी है।

इस महाविद्या को पूर्णतः से सिद्ध करते ही तांत्रिक महातांत्रिकों की कतार में सम्मिलित हो जाता है। फिर उस साधक के लिये कुछ भी अगम्य और अबोध नहीं रह जाता। प्रकृति उसकी कल्पना और इच्छा मात्र से संचालित होने लग जाती है। यद्यपि तारा महाविद्या को पूर्ण रूप से स्वयं में आत्मसात कर पाना अपवाद स्वरूप ही किसी तांत्रिक के वश की ही बात होती है। इसीलिये बहुत कम साधक ही तंत्र क्रिया के माध्यम से तारा महाविद्या को पूर्ण रूप से साथ साधने में सक्षम हो पाये हैं । भगवान राम के कुल पुरोहित वशिष्ठ जी को इस महाविद्या का प्रथम तंत्र साधक माना जाता है ।

लंकाधिपति रावण ने भी तारा महाविद्या की साधना की थी। वर्तमान युग में बंगाल के प्रख्यात तंत्र साधक वामाक्षेपा, कामाख्या के महातांत्रिक रमणीकान्त देवशर्मन, नेपाल के सुप्रसिद्ध तांत्रिक परमहंस देव आदि ही कुछ ऐसे तांत्रिक हुये हैं, जो तारा महाविद्या की दिव्य अनुभूतियां प्राप्त कर पाने में सफल हो पाये हैं। बंगाल के तांत्रिक वामाक्षेपा के संबंध में तो ऐसी किंवदंतियां प्रचलित रही हैं कि वह माँ की उपासना में इतने अधिक तल्लीन रहते थे कि उन्हें हफ्तों और कभी-कभी तो महीनों तक स्वयं की कोई सुध-बुध नहीं रहती थी।

https://www.youtube.com/watch?v=wIGWIBmZAFg&pp=ygUSbWFtYSDgpKTgpL7gpLDgpL4g

इस शमशानवासी तांत्रिक की दयनीय हालत जब माँ से सहन नहीं होती थी, वह स्वयं आकर अपने प्रिय भक्त को अपना स्तनपान कराया करती थी । तांत्रिक देवशर्मन के संबंध में भी अनेक अद्भुत बातें प्रचलित रही हैं । शाक्त तांत्रिकों की इन दस महाविद्याओं की साधनाओं में जो साधक गहरी रुचि रखते हैं और जो इन महाविद्याओं को स्वयं में आत्मसात करना चाहते हैं, इन महाविद्याओं को सिद्ध करना चाहते हैं, उन सभी को एक बात ठीक से समझ लेनी चाहिये कि आज के जो तथाकथित तंत्र गुरु इन महाविद्याओं की साधना के संबंध में जो दिवास्वप्न दिखाते हैं, वह सब वास्तविकता से बहुत दूर की चीजे हैं।

वास्तव में तो वह स्वयं भी किसी वास्तविक अनुभूति की प्रक्रिया से नहीं गुजरे होते हैं। उनकी सम्पूर्ण बातें पुस्तकीय पाठन, मानसिक सृजन और काल्पनिक बीज से अंकुरित होती हैं। तंत्र साधकों द्वारा जो मुण्डमाला तंत्र, चामुण्डा तंत्र, शाक्त प्रमोद तारा तंत्र जैसे अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं, उनमें दस महाविद्याओं के रूप में माँ तारा का द्वितीय स्थान रखा गया है । इन्हें विश्वव्यापिनी आद्यशक्ति का द्वितीय रूपान्तरण माना गया है, जो स्वयं को अनंत- अनंत रूपों में विभाजित करके सृष्टि की रचना और पोषण का कार्य देखती है ।

इसलिये यह महाविद्या सृजन शक्ति से सदैव सम्पन्न रहती है। तंत्र साहित्य में माँ तारा की साधना, पूजा-उपासना और तांत्रिक अनुष्ठानों पर बहुत विस्तार से प्रकाश डाला गया है। माँ तारा के ऐसे अनुष्ठानों को सम्पन्न करके अनेक प्रकार की पीड़ाओं तथा कष्टों से सहज ही मुक्ति मिल जाती है और माँ के साधक सहज ही विभिन्न प्रकार के भौतिक सुख, साधनों की प्राप्ति कर लेते हैं। इतना ही नहीं, इस महाविद्या की साधना के माध्यम से परमात्मा का सहज साक्षात्कार पाकर मुक्ति लाभ भी सहज एवं सम्भव हो जाता है।

माँ तारा का स्वरूप आद्य जननी महाकाली से बहुत साम्य रखता है । यद्यपि यह कज्जल सी काली न होकर गहरे नीले वर्ण वाली है । इसलिये इन्हें ‘नील सरस्वती’ भी कहा जाता है। माँ का यह नीला रंग अनन्त, असीम सीमाओं और क्षमताओं का प्रतीक है। माँ की इन असीम, अनंत क्षमताओं की वास्तविक अनुभूति इनकी साधना के माध्यम से ही प्राप्त हो पाती है । अतः द्वितीय महाविद्या के रूप में माँ तारा अनंत, असीम संभावनाओं की प्रतीक है। तारा की तंत्र साधना और उनके तांत्रिक अनुष्ठानों के विषय में गहराई से जानने से पहले अगर ‘तंत्र’ और ‘तंत्र की सीमाओं’ के विषय में थोड़ा जान लिया जाये तो अधिक उपयुक्त रहेगा, क्योंकि इससे तंत्र के वास्तविक रूप विशेषकर तांत्रिकों की महाविद्याओं और उनकी अनुकंपा के प्रसाद स्वरूप प्राप्त होने वाले फलों को समझने में सहजता रहेगी।

 

 

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जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism
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जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism : तारा महाविद्या की साधना तंत्र साधकों के अतिरिक्त बौद्ध भिक्षुओं और जैन साधकों भी खूब प्रचलित रही है । अगर बात जैन धर्म की की जाये तो प्राचीन समय से ही जैन मतावलम्बियों में माँ तारा की उपासना होती आ रही है। दरअसल जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकरों की मान्यता है और उन्हीं के अनुसार चौबीस तीर्थंकरों की चौबीस शासन देवियां मानी गयी हैं। इन देवियों को जिन शासन में शीर्ष स्थान प्रदान किया गया है। जैन धर्म में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को स्वीकार किया गया है और उसी प्रकार भगवान ऋषभदेव के शासन की प्रभाविका देवी चक्रेश्वरी मानी गयी है। जैन धर्म में आठवें तीर्थंकर के रूप में चन्द्रप्रभु की मान्यता है और उनकी शासन देवी ज्वाला मालिनी देवी मानी गयी ।

इसी प्रकार बाइसवें तीर्थंकर की मान्यता भगवान नेमिनाथ को दी गई है और उनकी शासन देवी का स्थान अम्बिका को दिया गया है । तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ माने गये हैं और उनकी शासन प्रभाविका देवी के रूप में ही माँ तारा की प्रतिष्ठा माता पद्मावती के रूप में की गयी है। जैन धर्मावलम्बियों में देवी पद्मावती के रूप में माँ तारा की पूजा, अर्चना, आराधना से इहलोक के साथ-साथ परलोक संबंधी समस्त सुख, वैभवों की प्राप्ति की मान्यता रही है। माता पद्मावती के प्रति भक्ति और उनके आशीर्वाद की गौरव गाथा जैन ग्रंथों में यत्र- तत्र विपुल मात्रा में उपलब्ध है। यहां एक ओर लोकेषणा (सांसारिक इच्छाओं की प्राप्ति) के लिये माँ की पूजा-अर्चना की जाती है, वहीं दूसरी ओर बड़े-बड़े जैन मुनियों ने अलौकिक एवं दिव्य आनन्द की प्राप्ति के लिये कल्याणमयी माँ पद्मावती को अपनी आराधना का अंग बनाया । 

 

ऐसे उल्लेख मिलते हैं कि प्रसिद्ध जैन मुनि हरिभद्र शूरि ने अम्बिका देवी को प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया, तो वहीं दूसरी ओर आचार्य भट्ट अकलंक ने माता पद्मावती को प्रसन्न करके उनसे वरदान ग्रहण किया । आचार्य भद्रबाहू स्वामी ने एक व्यंतर (देव) के घोर उपसर्ग से आत्मरक्षा के निमित्त माँ पद्मावती की अभ्यर्थना की थी । एक अन्य जैन श्रुति के अनुसार श्रृणुमान, गुरुदत्त तथा महताब जैसे जैन श्रावकों पर भी मा पद्मावती की सदैव विशेष अनुकंपा बनी रही 1 माता पद्मावती को विभिन्न नामों से स्मरण किया जाता है, जिनमें सरस्वती, दुर्गा, तारा, शक्ति, अदिति, काली, त्रिपुर सुन्दरी आदि प्रमुख हैं। माता पद्मावती की स्तुति, भक्ि के लिये जैन ग्रंथों में विपुल स्तोत्र साहित्य उपलब्ध है ।

इनकी स्तुति एवं भक्ति समस्त दुःखों का शमन करने वाली, प्रभु का सान्निध्य, सामीप्य के साथ-साथ दिव्य आनन्द प्रदान करने वाली संजीवनी मानी गयी है । विभिन्न स्तोत्रों के रूप में माता पद्मावती की पूजा- अर्चना भक्त हृदयों का कंठहार बन गयी है । पार्श्वदेव गणि कृत भैरव पद्मावती कल्प स्तोत्र में कहा गया है कि माता पद्मावती की आराधना से राज दरबार में, शमशान में, भूत-प्रेत के उच्चाटन में, महादु:ख में, शत्रु समागम के अवसर पर भी किसी तरह का भय व्याप्त नहीं रहता । सांसारिक इच्छाओं से अभिभूत होकर बहुत से लोग माँ की पूजा-अर्चना में निमग्न होते हैं, लेकिन जब वह लौकिक भक्ति के साथ विशेष अनुष्ठान (तांत्रिक पद्धति) से करते हैं, तो उनका अनुष्ठान अलौकिक रूप धारण कर लेता है ऐसी अवस्था में साधक की भक्ति मंगललोक में प्रवेश कर जाती है, जैसे सौभाग्य रूप दलित कलिमलं मंगल मंगला नाम अर्थात् माता सौभाग्य रूप है तथा कलियुग के दोष हरण कर उत्कृष्ट मंगल को प्रदान करने वाली है।

तंत्र की भांति ही जैन धर्म भी माता पद्मावती का चतुर्भुजधारी रूप स्वीकार किया गया है। माता पद्मावती की प्रत्येक भुजा में क्रमशः आशीर्वाद, अंकुश, दिव्य फल और चतुर्थ भुजा में पाश (फंदा) माना गया है। माँ की इन भुजाओं का विशेष प्रतीकात्मक अर्थ है। जैसे माँ का प्रथम वरदहस्त समस्त प्राणी जगत को आशीर्वाद का संकेत प्रदान करता है। दूसरी बाजू में अंकुश है जो इस बात का प्रतीक है कि साधक को प्रत्येक स्थिति में अपने ऊपर अंकुश (संयम) बनाये रखना चाहिये। तीसरी बाजू में दिव्य फल भक्ति के फल को प्रदान करने वाला है, जबकि चतुर्थ बाजू में पाश प्रत्येक प्राणी को कर्मजाल से स्वयं को सदैव के लिये बचाये रखने के लिये प्रेरित करता है 

जैनधर्म में माता पद्मावती का वाहन कर्कुट नाग माना गया है। यह भी तांत्रिकों की भांति माँ के रौद्ररूप का परिचायक है । कर्कुट नाग का अर्थ विषैले नाग से है। यह पापाचारियों के लिये दण्ड का चिह्न है। माता पद्मावती पार्श्वनाथ की लघु प्रतिमा को अपने शीश पर धारण किये रहती हैं । गुजरात में मेहसाणा के पास मेरी एक जैन मुनि से भेंट हुई थी, जो पिछले लगभग चालीस सालों से माँ पद्मावती की साधना करते आ रहे हैं। उन्होंने तांत्रिक पद्धति से माँ का साक्षात्कार प्राप्त करने में सफल्ता प्राप्त की है । इन जैन मुनि के आशीर्वाद मात्र से चमत्कार घटित होते हुये देखे गये हैं ।

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प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान

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माँ बगलामुखी की ब्रह्मास्त्र साधना लड़ाई-झगड़ा, शत्रुओं से परेशानी, मुकदमेबाजी और न्यायालय आदि में पूर्ण विजय पाने के लिये बगलामुखी महाविद्या की पूजा-अर्चना करने, उनके अनुष्ठान सम्पन्न कराने का प्रचलन अनंतकाल से चला आ रहा है। प्राचीनकाल से ही नहीं, आधुनिक समय में भी असंख्य लोगों ने माँ बगलामुखी की कृपा से शत्रु बाधाओं एवं न्यायालय में विचाराधीन मुकदमों आदि समस्याओं पर विजय पायी है तथा अन्य नाना प्रकार की आपदाओं से मुक्ति प्राप्त की है। माँ बगलामुखी की कृपा से उनके भक्त साधारण स्थिति से उठकर असाधारण रूप से उच्च पद तक पाने में सफल हुये हैं ।

  • बगलामुखी साधना
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  • बगलामुखी  साधना  विशेष
  • बगलामुखी साधना की सावधानियां 
  •     बगलामुखी बीज मंत्र 

 

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माँ बगलामुखी की उपासना, अनुष्ठान आदि शत्रु बाधाओं के दौरान ही नहीं, अपितु अन्य अनेक कार्यों के निमित्त भी की जाती है। इनका सम्बन्ध एकाएक आर्थिक हानि से बचने, किसी अज्ञात भय से बचने, किसी के धोखे में फंस जाने, अकारण किसी के साथ लड़ाई-झगड़े में पड़ जाने, किसी अज्ञात शत्रु द्वारा परेशान किये जाने की भी समस्यायें हो सकती हैं। ऐसी समस्त प्रतिकूल स्थितियों से भी महामाई अपने साधकों को सहज ही निकाल लेती है। महामाई बगलामुखी की अनुकंपा से शीघ्र ही बिगड़े हुये काम बनने लगते हैं।

माँ बगलामुखी का दस महाविद्याओं में आठवां स्थान है। दरअसल आद्य शक्ति के दस रूप दसों दिशाओं में विद्यमान रहते हैं। उनमें दक्षिण दिशा की स्वामिनी महाविद्या बगलामुखी को माना गया है, इसलिये इनकी साधना का दक्षिण मार्ग ही अधिक प्रचलित है। शिवपुराण और देवी भागवत पुराण में शिव के दस रूपों की दस महाशक्तियां भी बताई गई हैं। यह दस महशक्तियां ही संसार में दस महाविद्याओं के रूप में पहचानी एवं पूजी जाती हैं। तंत्रशास्त्र में जगह-जगह इस बात का उल्लेख आया है कि शक्तिविहीन शिव भी शव के समान हो जाते हैं। शिव की जो भी क्षमताएं एवं शक्तियां हैं, उनके मूल में एक मात्र आद्यशक्ति ही कार्य करती है ।

शिव की दस आद्यशक्तियां हैं, जो इस प्रकार जानी जाती हैं- महाकाल शिव की शक्ति काली नामक महाविद्या है, शिव के काल भैरव रूप की शक्ति भैरवी नामक महाविद्या है, कबंध नामक शिव की शक्ति छिन्नमस्तका है, त्र्यंबकम् नामक शिव रूप की शक्ति हैं भुवनेश्वरी नामक महाविद्या, ठीक उसी प्रकार एकवक्त्र नामक महारुद्र शिव की महाशक्ति बगलामुखी नामक महाविद्या है। शिव के इस रूप को वल्गामुख शिव के नाम से भी जाना जाता है।

maa tara sadhna माँ तारा साधना और माँ तारा साधना के लाभ ph. 85280 57364

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maa tara sadhna माँ तारा साधना और माँ तारा साधना के लाभ ph. 85280 57364 तारा महाविद्या और उनकी साधना का रहस्य तंत्र शास्त्र में माँ तारा का उल्लेख दूसरी महाविद्या के रूप में किया गया है । शाक्त तांत्रिकों में प्रथम महाविद्या के रूप में महाकाली का स्थान रखा गया है। तंत्र में महाकाली को इस चराचर जगत की मूल आधार शक्ति माना गया है।

इन्हीं की प्रेरणा शक्ति से यह जगत और उसके समस्त प्राणी जीवन्त एवं गतिमान रहते हैं । समस्त जीवन के प्राण स्रोत माँ काली के साथ संलग्न रहते हैं । इसीलिये इस शक्ति से विहीन जगत तत्क्षण निर्जीव हो जाता है। तंत्र के अति प्राचीन प्रतीकों में महाकाली को शिव पर आरूढ़ दिखाया गया है। यह भी इसी तथ्य का प्रतीक है कि ‘शक्ति’ हीन ‘शिव’ भी निर्जीव ‘शव’ के रूप में रूपान्तरित हो जाते हैं।

महाकाली के रूप में इस आद्यशक्ति का रहस्य बहुत अद्भुत है, क्योंकि चेतना के समस्त सूत्र इसी महाशक्ति में समाहित रहते हैं । इसीलिये महाकाली का ‘श्याम’ रूप माना गया है। जिस प्रकार सभी तरह के रंग काले रंग में विलीन हो जाते हैं, ठीक वैसे ही समस्त जगत काली में समाहित हो जाता है 

जो साधक महाकाली को पूर्णत: समर्पित हो जाता है, उस साधक के समस्त कष्टों का माँ काली स्वतः ही हरण कर लेती है । इसीलिये महाकाली को समर्पित साधक समस्त प्रकार के दुःख, दर्द, पीड़ाओं, अभावों, कष्टों से मुक्त हो जाते हैं। बहुत से लोग अज्ञानवश महाकाली को भय, क्रोध और मृत्यु का प्रतीक भर मानते हैं । इस विश्वास से उनकी अज्ञानता ही उजागर होती है। वास्तव में महाकाली मृत्यु पर विजय और भयहीन होने की प्रतीक है।

महाकाली की भयानक एवं क्रोधयुक्त मुद्रा एवं उनका अति उग्र प्रदर्शन उनकी अनंत शक्ति का द्योतक है। तंत्र शास्त्र में प्रथम महाविद्या के रूप में महाकाली का अधिपत्य रात्रि के बारह बजे से प्रातः सूर्योदय तक रहता है। घोर अंधकार महाकाली का साधना काल है, जबकि सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ ही द्वितीय महाविद्या के रूप में तारा विद्या का साम्राज्य चारों ओर फैलने लग जाता है।

महाकाली चेतना का प्रतीक है तो तारा महाविद्या बुद्धि, प्रसन्नता, सन्तुष्टि, सुख, सम्पन्नता और विकास का प्रतीक है। इसीलिये तारा का साम्राज्य फैलते ही अर्थात् सूर्य की प्रथम रश्मि के भूमण्डल पर अवतरित होते ही सृष्टि का प्रत्येक कण चेतना शक्ति युक्त होता चला जाता है ।

रात्रि के अंधकार में जो जीव-जन्तु निद्रा के आवेश में आकर सुस्त और निष्क्रिय पड़ जाते हैं, फूलों की प्रफुल्लित हुई कलियां मुर्झा जाती हैं, प्राणियों में जो पशु भाव उतर जाता है, वह सब प्रातःकाल होते ही अपने मूल स्वरूप में लौट आता है ।

तारा महाविद्या का रहस्य बोध कराने वाली हिरण्यगर्भ विद्या मानी गई है। इस विद्या के अनुसार वेदों ने सम्पूर्ण विश्व (सृष्टि) का मुख्य आधार सूर्य को स्वीकार किया है। सूर्य अग्नि का एक रूप है। अग्नि का एक नाम हिरण्यरेता भी है। सौरमण्डल हिरण्यरेत (अग्नि) से आविष्ट है। इसीलिये इसे हिरण्यमय कहा जाता है।

आग्नेयमंडल के नाभि में सौर ब्रह्म तत्त्व प्रतिष्ठित है, इसलिये सौरब्रह्म को हिरण्यगर्भ कहा गया है । जिस प्रकार विश्वातीत कालपुरुष की महाशक्ति महाकाली है, उसी प्रकार सौरमण्डल में प्रतिष्ठित हिरण्यगर्भ पुरुष की महाशक्ति ‘तारा’ को माना गया है।

जिस प्रकार गहन अन्धकार में छोटा दीपक भी अत्यन्त प्रकाशमान प्रतीत होता है, उसी तरह महानतम के अर्थात् अंतरिक्ष में तारा शक्ति युक्त सूर्य सदैव प्रकाशमान बना रहता है, इसलिये श्रुतियों में सूर्य नक्षत्र’ नाम से भी जाने गये हैं।