Tag: कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र

त्रिकालदर्शी सात्विक – कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र ,साधना karna pishachini siddhi mantra ph.85280 57364

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त्रिकालदर्शी सात्विक - कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र ,साधना karna pishachini siddhi mantra ph.85280 57364

त्रिकालदर्शी सात्विक – कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र ,साधना karna pishachini siddh mantra ph.85280 57364

त्रिकालदर्शी सात्विक - कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र ,साधना karna pishachini siddhi mantra ph.85280 57364
त्रिकालदर्शी सात्विक – कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र ,साधना karna pishachini siddhi mantra ph.85280 57364

त्रिकालदर्शी सात्विक – कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र ,साधना karna pishachini siddh mantra ph.85280 57364  इस साधना से  आप को निश्चित ही त्रिकाल ज्ञान हासिल होगा ,आप इस से त्रिकालदर्शी बन सकते है। यह साधना सात्विक और सौम्य  है इस साधना से त्रिकाल ज्ञान भूत भविष्य वर्तमान का ज्ञान साधक को हो जाता है। 

 

गुप्त त्रिकालदर्शी देवी  कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र karna pishachini siddh mantra

 

ॐ लिङ्ग सर्वनाम शक्ति भगती कर्ण पिशाचनी चण्ड-रूपी सच सच मम वचन दे स्वाहा।

कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र – साधना विधि   karna pishachini siddh mantra – sadhna vidhi

पान, सुपारी, लौंग, सिन्दूर, नारियल, अगर ज्योति, लाल वस्त्र, जल का लोटा, लाल चन्दन की माला ।  एक लाख । स्थान एकान्त कमरा एक बटुक सहित कुमारी भोजन । तर्पण- मार्जन |

नवरात्र । यदि ग्रहणकाल में प्रारम्भ करें तो स्पर्श से पन्द्रह मिनट पूर्व से प्रारम्भ करें और मोक्ष के पन्द्रह मिनट बाद तक करें। ग्रहण में नदी के किनारे या श्मशान में जप करें।

सभी सामग्री अपने साथ रक्खें। सफेद चन्दन चूरा, लाल चन्दन चूरा, लोहबान, गुग्गुल प्रत्येक ५-५ छटाँक, कपूर ५ पॅकेट, लौंग १० ग्राम, अगर ५० ग्राम, तगर ५० ग्राम, केशर ढ़ाई ग्राम, कस्तूरी १ ग्राम, बादाम ५० ग्राम, काजू ५० ग्राम, अखरोट ५० ग्राम, गोला ५० ग्राम छुहारे ५० ग्राम, मिसरी १ कुज्जा लें- इन सबको कूटकर मिला लें।

इसमें घी भी मिला लें। फिर खीर बनाए चावल कम दूध ज्यादा रक्खें खीर में ५ मेवे डालें देशी घी, शहद, चीनी-त्रिमधु डालें।

नवरात्र में भूत-शुद्धि, स्थान- शुद्धि, गुरु-स्मरण, गणेश पूजा, नवग्रह पूजा से पूर्व एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें उस पर ताँबे का लोटा या कलश स्थापित करें। कलश पर नारियल रक्खें लोटे या कलश के चारो ओर पान, सुपारी, सिन्दूर, १२ लड्डू इत्यादि वस्तुएँ रक्खें। कलशपूजन करें। साष्टाङ्ग प्रणाम करें। फिर कन्धे पर लाल परना रखकर जप करें।

जप पूर्ण होने पर पहले सामग्री से फिर खीर से तथा अन्त में त्रिमधु से हवन करें। पहले क्षमा प्रार्थना कर साक्षात् देवी रूपी कलश को लेटकर दण्डवत् करें। मन्त्र का चमत्कार अनुष्ठान करने से देवी कण में आकर भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी प्रदान करेगी है। अनुष्ठान के दिनों में ब्रह्मचर्य, एकान्त वास करें। झूठ न बोलें।

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कर्ण पिशाचिनी साधना कर्ण पिशाचिनी का प्रयोग लोकसिद्धि के लिए बहुत ही प्रभावी है। यह साधना उग्र श्रेणी में आती है। अतः किन्हीं सिद्ध गुरुदेव का सहारा लेना चाहिये; अन्यथा सङ्कट में पड़ सकते हैं।

कर्णपिशाचिनी की उग्रता को कम करने के लिए घी कुवार या घृत-कुमारी नामक पौधे की जड़ और उसके पत्तों का गूदा बहुत उपयोगी है। जड़ को विधिवत् उखाड़कर सिद्ध कर अपने पास रखने से और उसके पत्तों के गूदे या रस को सारे शरीर तथा मस्तक में लगाने से उग्रता सौम्यता में बदल जाती है ।

1 कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र

– ॐ नमः कर्ण पिशाचिनी अमोघ सत्यवादिनी ! मम कर्णे अवतरावतर, अतिता नागत वर्तमनानी दर्शय, मम भविष्यं कथय कथय, ह्रीं कर्ण पिशाचिनी स्वाहा ।

लोहे का एक त्रिशूल बनाकर पञ्चोपचारों या षोडशोपचारों से उसका पूजन कर साधनास्थल में जमीन में गाड़ दें। दिन में घी का दिया जलाकर मन्त्र का ११०० जप करें। फिर आधी रात को त्रिशूल का पूजन कर घी और तेल के दीपक जलाकर ग्यारह दिन तक ग्यारह सौ मन्त्रजप करें। अन्त में ‘कर्णपिशाचिनी’ प्रकट होकर वर प्रदान करेंगी, जिससे किसी भी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर ज्ञात होने लगेगा। यह अति उग्र साधना है। अतः सिद्ध गुरुदेव के सान्निध्य में ही करें।

 

2 कर्ण पिशाचिनी सिद्धि मंत्र

“ॐ ह्रीं चण्डवेगिनी वद वद स्वाहा ।”

साधन विधि- सर्व प्रथम इस मंत्र का १०००० जप करना चाहिए। तदुपरान्त किसी कृष्ण वर्ण ( काले रंग) की क्वारी कन्या को अभिमंत्रित कर उसका पूजन करे और उसके हाथों, पाँवों में कुकुम लगाये । अलकों में मल्लिका- पुष्प तथा कनेर के पुष्प लगाकर लाल रंग के डोरे से वेष्टित करे। इस साधन के द्वारा कर्णं पिशाचिनी यक्षिणी साधक के वशीभूत होकर उसे तीनों लोक और तीनों काल के शुभाशुभ का ज्ञान कराती रहती है। साधक को चाहिये कि वह मंत्र सिद्ध हो जाने पर अभिमंत्रित लाल सूत्र, मल्लिका पुष्प तथा लाल कनेर के पुष्प को धारण किये रहे ।

 

3 पिशाची साधन मन्त्र-

ॐ फट् फट् हुँ हुँ : भोः भोः पिशाचि भिन्द भिन्दछिन्द छिन्द लह लह दह दह पच पच मध्य मध्य पेय पेजय धून धून महासुर पूजिते हुं हूँ स्वाहा । —

साधन विधि – रात्रि के समय उच्छिष्ट मुख से श्मशान में बैठ- कर उक्त मन्त्र का जप करे। दस लाख की संख्या में जप करने से सिद्धि प्राप्त होती है तथा पिशाची साधक के समक्ष प्रकट होकर उसे अभिलाषित वर प्रदान करती और सदैव उसके वशीभूत रहती है । पिशाची जिस समय प्रकट हो, उस समय साधक को अर्ध्य, गंधादि द्वारा उसका पूजन करना चाहिए तथा जन काल में भी पूजनादि करना चाहिए । यह ध्यान रखना चाहिए कि मन्त्र जाप के समय में न तो साधक ही किसा व्यक्ति को देखे और न कोई अन्य प्राणी ही साधक को देख पाये । किसी के देख लेने पर जप निष्फल हो जाता है ।

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