Year: 2022

लक्ष्मी यक्षिणी साधना-Mata lakshmi yakshini sadhna Ph. 85280 – 57364

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लक्ष्मी यक्षिणी साधना-Mata lakshmi yakshini sadhna Ph. 85280 – 57364

 

लक्ष्मी यक्षिणी साधना-Mata lakshmi yakshini sadhna 

लक्ष्मी यक्षिणी साधना-Mata lakshmi yakshini sadhna Ph. 85280 – 57364
लक्ष्मी यक्षिणी साधना-Mata lakshmi yakshini sadhna Ph. 85280 – 57364

लक्ष्मी यक्षिणी साधना-Mata lakshmi yakshini sadhna Ph. 85280 – 57364 नमस्कार दोस्तों धर्म रहस्य चैनल पर आपका एक बार फिर से स्वागत है ! मैं बात करूंगा लक्ष्मी यक्षिणी साधना के बारे में वैसे तो तांत्रिक ग्रंथों में इनका विवरण बहुत ही कम मिलता है, खोज करके निकाला है! 

तो यह अद्भुत प्रभाव वाली शुद्ध रूप वाली कहलाती है इनका प्रभाव बहुत ही अच्छा है अगर कोई निश्चित कर लेता है तो उसे  Malamal  कर देती हैं !  और अगर गलती हो जाए तो फिर से को दरिद्री भी बना देती हैं इसलिए इनकी साधना में इस विशेष ख्याल रखना चाहिए ! और शुभ फलों को देने वाली देवी को प्रसन्न करने के लिए इनकी साधना करनी चहिए!

पहले सुबह प्रातः काल 4:00 से ही इनकी साधना करनी है, आपको सुबह उठकर 4:00 का मतलब है!  कि प्रकाश निकला ना हो और रात्रि जाने वाली हो तू सुबह की ठीक 4:00 बजे से आप किसी भी मौसम में कर सकते है  साधना शुरू कर सकते हैं !  

 

इनकी साधना के लिए जो विशेष नियम होता है यह होता है कि 21 पवित्र स्थान की आपको इसके लिए बहुत आवश्यकता है ! अगर घर में ही करते हैं तो भी आपको जो स्थान होगा उसे बहुत ही ज्यादा पवित्र करना होगा  ! 

कोई आपके मकान को अपवित्र व्यक्ति कभी भी न छुपाए जब तक आपकी साधना चल रही है मकान में किसी भी वियकती का प्रवेश बिल्कुल ना हो और  साधना काल में उस मकान की सफाई लिपाई पुताई धूप चंदन धूनी  आपको देनी है ! उस कमरे में पुष्पों की माला लटका देनी होंगी ,चित्र खुशबू और इन सब चीजों का विशेष प्रयोग करना होगा  एक अच्छा  वातावरण तैयार करना होगा !

जैसे कि वह देवी जब आए तो अत्यधिक खुश होकर कि आपके सामने प्रकट हो ! इसलिए इनकी साधना में बिल्कुल उसी तरह आपको करनी होती जैसे माता लक्ष्मी की साधना होती हैक !  यह उन्हीं की यक्षिणी है उन्हीं की सेविका है !  उनकी सेविका होने की वजह से बहुत ही धन  देने में सक्षम  है ! आपको किस प्रकार करनी है साधना में बता रहा हूं !

 

लक्ष्मी यक्षिणी साधना-Mata lakshmi yakshini sadhna साधना विधी

लक्ष्मी यक्षिणी साधना-Mata lakshmi yakshini sadhna साधना विधी  – सबसे पहले उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में लक्ष्मी की मूर्ति जो है आपने बनानी है वह अष्टधातु में बनाकर आपको स्थापित कर लेनी है अगर संभव नहो तो आप पर्तिमा  को स्थापित  कर सकते है !  गंगाजल में स्नान करा कर मस्तिष्क पर केसर और कस्तूरी का आपको जो है लिप लगाना है ! तिलक आपको उसके माथे पर लगाना और आपको स्वयं जो है कुशासन पर बैठकर चमकदार वस्तु को धारण करना है !

 और पीले रंग का आसन अपने नीचे रखना है उस पर मूर्ति रखी जाएगी ! उसके नीचे भी पीले रंग का कपड़ा होना चाहिए इसके बाद फिर स्नानादि करके और भक्ति भाव से आपको संकल्कप करना है ! और उस पर प्रार्थना करनी है जल का भक्ति भाव से पान करें फिर उसके बाद हृदय में मूर्ति का चित्र जो है आपको स्थापित करके की माला से लेकर  मंत्र का जाप करना  है आपको 51 माला जो है लड्डू आपको बनाकर सामने रखना है इस प्रकार आपको 51 दिन आपको लगातार करना है दिन जो है आपको यक्षिणी निश्चित रूप से दर्शन देगी !

अब यक्षिणी  का वर्णन ग्रंथों में मिलता है मैं बता रहा हूं भाई जिस समय यह आती है उसके पूर्व राजा और महाराजाओं की भांति उसके आगमन की तैयारी देवता लोग कर जाते हैं ! चारो और शांती हो जाती है दर का कोई स्थान नही रहता ! 

अर्थात  दर्द की कोई जगह ही नहीं होती   इसमें इसका स्वरूप साक्षात आंखों से दिखाई नहीं देता स्वप्न में दर्शन देती है ,और अद्भुत सुंदरता का वर्णन उसका तंत्र ग्रंथो  में  हुआ है!   

एक सुंदर गोरे वर्ण की आठारह और बीस की उम्रकी लडकी  के रूप में दर्शन देती है!  मृगनयनी अर्थात मृग की तरह  आंखें होती है वही जो है चंपे की डाल के अनुसार  उस तरह की इनकी बाहें होती हैं ! नाक में स्वर्णनाथ पहने हुए साक्षात देवी अवतार नजर आती है हाथों में कमल का फूल धारण किए हुए आती है रूप स्वरूप इस माता लक्ष्मी की तरह  होता है क्योंकि यह उन्हीं की सेविका है प्रभाव इसका जो है प्रसन्न हो जाए तो साधक को मालामाल कर देती है

 

अगर आप  इस की  पूजा सही ढंग से नहीं करता है!  इसलिए इसकी पूजा में इस बात का बहुत ध्यान रखना है साफ-सफाई और नियमावली सही ढंग की होनी चाहिए ! 

गंदगी मन में गंदे विचार गंदी चीजें गंदी बातें करना या इस तरह का गलत  आचरण करना !  ब्रह्मचर्य का पूर्ण निष्ठा से पालन करना यह सब अनिवार्य चीजें हैं ! यहां पर आप इसकी अगर लक्ष्मी यक्षिणी की साधना करते हैं और बिल्कुल आप ही मान लीजिए कि जिस प्रकार माता लक्ष्मी को प्रसन्न किया जाता है ! 

आने  समय वाली और सब कुछ आपको दे देगी धन वैभव सम्मान सभी कुछ आपको देने में सक्षम है !  यह धन पर्धायक और बहुत ही शक्तिशाली है ! क्योंकि माता लक्ष्मी की सेविका है और कहते हैं दिन में जिसके पास धन सम्मान वैभव आ जाए  उस के पास सब कुच्छआ गया ! यह आप की  आर्थिक मदद करेगी अगर आप अगर उच्च कोटि के साधक हुए तो हर प्रकार से आपके साथ तीनों संबंधों में से कोई एक संबंध भी बना लेगी!  यह अद्भुत शुद्धता मैंने यक्षिणी साधना आपको  बताई है !

अधिक जानकारी के लिए फ़ोन करे  ८५२८० ५७३६४

 

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प्राचीन चमत्कारी मुवक्किल muwakkil साधना रहस्यph.85280 57364

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प्राचीन चमत्कारी मुवक्किल muwakkil साधना रहस्यph.85280 57364 गुरु मंत्र साधना में आप का स्वागत है।  मुवक्किल  एक  अल्लाह पाक की शक्ति है  । यह अल्लाह के फ़रिश्ते होते है। मुवक्किल सिर्फ अल्लाह पाक की इबादत में मशरूफ रहते हैं मतलब लीन रहते हैं। यह मुस्लिम धर्म  की पाक शक्ति होती है। लेकिन हम  से पूजा पाठ से  इनको जगा कर इनसे हम जायज काम ले सकते हैं ,जायज मतलब जो काम गलत नहीं हो। 

मुवक्किल  उर्दू अल्फाज में अकील शक्ति को कहा गया है उर्दू अल्फाज में जिसको हम ताबे में लेकर या अपने कब्जे में कर कर हम उससे कोई भी जायज काम करवा सकते हैं। अमल दो तरह का होता है रोहाणी और एक सिफली   पीर बाबा को पीर को पूरी तरीके से रोहाणी तरीके से   बुलाकर मदद की गुजारिश करके अपना काम करना।   दूसरा होता है सिफ़्ली अमल यानी काली बुरी आत्माएं शक्ति श्मशान में जो मौजूद है कब्रिस्तान में जो मौजूद है आत्माओं को उन शैतानों को बुलाकर उनसे काम करवाने के तरीकों को कहां गया  है। 

मुवक्किल सिर्फ अल्लाह पाक की इबादत में मशरूफ रहते हैं मतलब लीन रहते हैं। यह अला पाक की  इबादत में  लगे रहते है। अल्लाह पाक ने   दुनिया में बहुत कुछ बनाया है यह मुवक्किल उसी में से उसी में से एक है। जो वाकई में खुदा की अल्लाह पाक की तिलावत पाक साफ रहता है। मुवक्किल आपका गुलाम बन जाएगा फरिश्ते हैं सिर्फ अल्लाह पाक की बंदगी  में लगे रहते हैं।  आप इनसे से गुजारिश करके करके हाथ पैर जोड़कर इनसे आप अपना काम करवा सकते हैं।  सिर्फ जायज  काम यह गलत काम नहीं करते। 

मुवक्किल Muvakkil  साधना के लाभ ?

प्राचीन चमत्कारी मुवक्किल muwakkil साधना रहस्यph.85280 57364
प्राचीन चमत्कारी मुवक्किल muwakkil साधना रहस्यph.85280 57364

 

मुवक्किल सिर्फ आपकी मदद करने के लिए इंसान का हर काम नहीं करते और  आप इनसे कोई जबरदस्ती काम नहीं करवा सकते हैं।  अगर आप जबरदस्ती करने की कोशिश करोगे आप के साथ बुरा होगा ।  सिर्फ जायज़  काम जैसे की  कोई बीमारियों का इलाज जो वाकई में बीमार है भूत प्रेत जादू टोने के असर की वजह से उसकी बीमारियां इतनी बढ़ गई कि वह लाइलाज हो गई। 

 

आप ऐसी बीमारियों का इलाज मुवक्किल से मिनट करके करवा सकते हैं।  गुमशुदा का पता बरसों से खो गया है गुम गया है , अगर आप पर कोई तांत्रिक किरया  होई हो    परिवार पर कर दिया हो सुखचैन सबको आपके घर में वाकई में बर्बादी परेशानी ,दुश्मनी   ने खेल बना लिया हो ऐसी तकलीफ दूर कर सकते हैं।

आप अपने दुश्मन  को झुका सकते है।  पैसों से रोजी-रोटी से मालामाल कर देते हैं ,परेशानी और मुसीबतों को सारी जिंदगी की दुआ आपको दे सकते हैं।  सिर्फ नहीं दे सकते कयामत तक जीने के लिए दुआ सारी जिंदगी आप जियो ऐसे जिंदगी की दुआ नहीं दे सकते। 

इसलिए इन्हें तरीके से ही  फरिश्ते होते हैं खुदा के बनाए हुए होते हैं।  यह परी  जिन्नात से  से भी ज्यादा काम कर सकते हैं। जो काम जिन्नात हम्जाद परी भी नहीं कर सकते वह काम वह पल भर में कर सकते हैं।  बुरी नियत रखकर अगर आप इबादत करोगे तो आपकी इबादत  कबूल होगी।

अल्लाह का हुकुम मानते हैं।  आप अल्लाह  का वास्ता दे कर काम करवा सकते है। मुवक्किल  नोटों की बारिश  भी कर सकते है और साधक को अमीर बना सकते है। 

प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364

प्राचीन चमत्कारी उच्छिष्ट गणपति शाबर साधना Uchchhishta Ganapati  Sadhna  PH. 85280 57364

काला जादू black magic क्या है? और इस के क्या रहस्य है PH.8528057364

1 मुवक्किल साधना  Muvakkil Sadhna  को कोण कर सकता है ?

कोई  भी जाती धरम का  साधक इस साधना  को कर सकता है। इस  में कोई  बंधन नहीं है 

मुवक्किल Muvakkil  कौंन   होते है ?

यह अल्लाह के फ़रिश्ते होते है। मुवक्किल सिर्फ अल्लाह पाक की इबादत में मशरूफ रहते हैं मतलब लीन रहते हैं। यह मुस्लिम धर्म  की पाक शक्ति होती है। 

Bajrang Baan बजरंग बाण पाठ की साधना ph.85280 57364

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Bajrang Baan बजरंग बाण पाठ की साधना

Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना ph.85280 57364

Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना
Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना

 

Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना बजरंग बली श्री हनुमान की कृपा से सभी जन कभी न कभी परेशान  होते ही हैं। श्री हनुमान अपने भक्तपर,अपने साधक पर जितनी सरलता से कृपा दृष्टि करते हैं, उतनी ही सरल है उनकी साधना विधि भी कोई भी साधक सिर्फ हनुमान पाठ कर ले अथवा यर्दि थोड़ा ज्यादा कठिनाई का समय आए, तो बजरंगबाण का नियमानुसार पाठ करे, तो शीघ्र ही समस्या का समाधान प्राप्त होने लगता है।

यादि बजरंग बाण Bajrang Baan Bajrang Baan  का नियमानुसार जप किया जाए और प्रद्धापूर्वक बजरंग बली की उपासना की जाए, तो मन को शांति तो प्राप्त होती बा है, इन्द्र इच्छा शक्ति भी अप्रत्याशित गति से बढ़ती है, और दृढ़ इच्छा शक्ति से कठिनतम् कार्य भी आसान हो जाते हैं, यह मेरा अटल विश्वास है, क्योंकि इससे मैंने अनेक लोगों को लाभ प्राप्त करते देखा है। सर्व प्रथम बजरंगबाण Bajrang Baan की विधि व सम्बन्धित जप प्रस्तुत है तथा इसके बाद बजरंग बाण Bajrang Baan दिया जा रहा है। –

 

Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan  साधना विधि

Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना
Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ की साधना

 

Bajrang Baan बजरंग बाण Bajrang Baan  साधना विधि  – अपने पूजा कक्ष में हनुमानजी की मूर्ति अथवा चित्ररखें फिर स्नान के बाद चंदन, पुश्य, धूप अगरबती, नैवेद्य आदि से मेरा अनुभव तो या कहता है, कि तीन दिनों पश्चात् टी पूजन करें, इसके बाद श्री हनुमानजी को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते ऐसा लगने लगता है, मानों अन्तर्मन में अद्भुत शक्ति का सञ्चार हुए

निम्न स्तुति करें- होने लगा है। द इच्छा शक्ति बढ़ने लगती है। अतुलित बलधामं हेम शेलार दे। दसवें न्यारहवें दिन से भय, शोक जैसी मन: स्थितियां बबुजवन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।। समान होने लगती है, गन सेवा भाव और आनन्नातिरेक से सकल गुण निधानं वानराणामधीशं। उल्लसित रहने लगता है रघुपति प्रिय मतं वात पार नमामि ।।

अद्धापूर्वक विश्वास के साथ कोई भी व्यक्ति इसे अपने इसके बाद उपर्युक बजरंग बाण Bajrang Baan का प्रेम पूर्वक पाठ करें उपयोग में ला सकता है। अन्त में एक बात और स्पष्ट कर देना प्रतिदिन एक ही बार पाठ करना पर्याप्त है, आप मै जितनी अधिक चाहता, स्त्रियां भी इसका प्रयोग कर सकती हैं, केवलरजस्वला प्रजा होगी, उतनी ही जल्दी लाभ भी नजर आयेगा। काल में और सनक काल में उनके लिश्यह वर्जित है। बजरंग बाण Bajrang Baan पीडीएफ

हनुमान की भांति सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला हनुमत प्रयोग हनुमान का एक बंदर की तरह मुंह है, एक पूंछ है, यह मात्र एक कल्पना है। ‘वानर एक जाति थी उस समय, जिस प्रकार से हमारी जाह्मण जाति है, क्षत्रिय जाति है. वैश्य जाति है, इसी प्रकार से बानर जाति थी | यह तो हमने बानर का तात्पर्य बंदर समझ लिया और पूंछ पीछे लगा दी. जबकि न तो उनके पूंछ थी और न ही कोई पूंछ की भावना बी |

महाभारत युद्ध में अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा- मैं विजयी होना चाहता हूं, मैं क्या का? श्रीकृष्ण ने कहा-ध्वजा पर हनुमान का स्थापन कर दो। उस समय कृष्ण एक ही लाइन बोलते हैं, कि अगर तुम्हें विजय प्राप्त करनी है. तो ध्वजा पर हनुमान का स्थापन कर दो, जिससे कि प्रत्येक क्षण मान तुम्हारी आँखों के सामने रहें। और शास्त्र साक्षी है, कि हनुमान को कभी असफलता का मुंह नहीं देखना पड़ा।

सौ योजन के समुद्र को छलांग लगाते समय यह नहीं सोचा, कि समुद्र में जब जाउंगा या बगा। माता सीना को खोजने लंका अकेले पहुंच गए, और पूंछ में आग लगाकर लंका दान की, नब भी उन्हें अपनी जान का खतरा नहीं लगा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि प्रत्येक क्षण उनके हृदय में अपने गुरु की छवि, ग़म की छवि बनी ही रहती थी, एक भीक्षण के लिए अपने प्रभु की छवि उनके हृदय से अलग होती ही नहीं थी और यही उनकी बिजय का रहस्य भी था |

हनुमान की भांति ही जीका में सर्वत्र विजय प्राप्ति के लिए, चाहे बहशत्रुओ पर हो या रोगों परया अभावों पर, निम्न मंत्र का एक महीने तक ‘बजरंगयंत्र के समक्ष लाल हकीक माला से नित्यएकमाला सम्पन्न करने सेइच्छा की पूर्ति होती है ॥ नमो हनुमते रुद्रावताराब सर्वशत्रुसंडारणाय सर्वरोषहराव सर्ववशीकरणाय समवृतरथ स्वाहा ।।  प्राचीन बजरंग बाण Bajrang Baan link

बजरंग बाण Bajrang Baan के चमत्कार  और बजरंग बाण Bajrang Baan पाठ के लाभ

 

बजरंग बाण Bajrang Baan के चमत्कार   यह एक बहुत ही सुंदर पृष्ठ है। संत शिरोमणि तुलसीदास जी द्वारा रचित बजरंग बाण Bajrang Baan बहुत शक्तिशाली, दिव्य और अदम्य है। महात्मा तुलसीदास जी ने अपने जीवन में मंगलमूर्ति हनुमान जी का कई बार साक्षात्कार करने वाले पवन सुत के गुणों का वर्णन करते हुए इस प्रभावशाली बजरंग बाण Bajrang Baan की अद्भुत चमत्कारी रचना की है।यह एक ऐसा दिव्य मंत्र है जिसमें महाबली शक्ति हनुमान जी की सिद्धि संकटों पर सटीक लक्ष्य लेती है, संकट दूर होते हैं।

इस बजरंग बाण Bajrang Baan के हर शब्द में अद्वितीय शक्ति निहित है। मनोविज्ञान के सिद्धांत के अनुसार मनुष्य जिन विचारों को बार-बार पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ दोहराता है, वह उसकी आदत और स्वभाव हमेशा के लिए बन जाता है। बजरंग बाण Bajrang Baan में पूर्ण श्रद्धा रखने और श्रद्धापूर्वक उसे बार-बार दोहराने से हनुमान जी की शक्तियां हमारे मन में जमा होने लगती हैं। इससे कम समय में ही सारे संकट दूर हो जाते हैं। बजरंग बाण Bajrang Baan हिंदी में विस्तार से अर्थ सहित     

बजरंग बाण Bajrang Baan मंत्र

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीसा।। सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दुत धरू मारू धाई कै।।

 

हनुमान चालीसा बजरंग बाण Bajrang Baan हनुमान अष्टक

 

हनुमान चालीसा

 

 

बजरंग बाण Bajrang Baan
 
 
हनुमान बजरंग बाण Bajrang Baan (Hanuman Bajrang Baan)

दोहा

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।

तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।।

चौपाई

जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।

जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।

जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।

आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।

जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा।।

बाग उजारि सिन्धु मंह बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा।।

अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा।।

लाह समान लंक जरि गई। जै जै धुनि सुर पुर में भई।।

अब विलंब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी।।

जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होई दुख करहु निपाता।।

जै गिरधर जै जै सुख सागर। सुर समूह समरथ भट नागर।।

ॐ हनु-हनु-हनु हनुमंत हठीले। वैरहिं मारू बज्र सम कीलै।।

गदा बज्र तै बैरिहीं मारौ। महाराज निज दास उबारों।।

सुनि हंकार हुंकार दै धावो। बज्र गदा हनि विलम्ब न लावो।।

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीसा।।

सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दुत धरू मारू धाई कै।।

जै हनुमन्त अनन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।

पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत है दास तुम्हारा।।

वन उपवन जल-थल गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।

पाँय परौं कर जोरि मनावौं। अपने काज लागि गुण गावौं।।

जै अंजनी कुमार बलवन्ता। शंकर स्वयं वीर हनुमंता।।

बदन कराल दनुज कुल घालक। भूत पिशाच प्रेत उर शालक।।

भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल वीर मारी मर।।

इन्हहिं मारू, तोंहि शमथ रामकी। राखु नाथ मर्याद नाम की।।

जनक सुता पति दास कहाओ। ताकी शपथ विलम्ब न लाओ।।

जय जय जय ध्वनि होत अकाशा। सुमिरत होत सुसह दुःख नाशा।।

उठु-उठु चल तोहि राम दुहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई।।

ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।

ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।।

अपने जन को कस न उबारौ। सुमिरत होत आनन्द हमारौ।।

ताते विनती करौं पुकारी। हरहु सकल दुःख विपति हमारी।।

ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा। कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।

हे बजरंग, बाण सम धावौ। मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ।।

हे कपिराज काज कब ऐहौ। अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।।

जन की लाज जात ऐहि बारा। धावहु हे कपि पवन कुमारा।।

जयति जयति जै जै हनुमाना। जयति जयति गुण ज्ञान निधाना।।

जयति जयति जै जै कपिराई। जयति जयति जै जै सुखदाई।।

जयति जयति जै राम पियारे। जयति जयति जै सिया दुलारे।।

जयति जयति मुद मंगलदाता। जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।।

ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा। पावत पार नहीं लवलेषा।।

राम रूप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना।।

विधि शारदा सहित दिनराती। गावत कपि के गुन बहु भाँति।।

तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखउं विधि नाना।।

यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई।।

सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे।।

एहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करै लहै सुख ढेरी।।

याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत बाण तुल्य बनवाना।।

मेटत आए दुःख क्षण माहिं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं।।

पाठ करै बजरंग बाण Bajrang Baan की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।

डीठ, मूठ, टोनादिक नासै। परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासे।।

भैरवादि सुर करै मिताई। आयुस मानि करै सेवकाई।।

प्रण कर पाठ करें मन लाई। अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई।।

आवृत ग्यारह प्रतिदिन जापै। ताकी छाँह काल नहिं चापै।।

दै गूगुल की धूप हमेशा। करै पाठ तन मिटै कलेषा।।

यह बजरंग बाण Bajrang Baan जेहि मारे। ताहि कहौ फिर कौन उबारे।।

शत्रु समूह मिटै सब आपै। देखत ताहि सुरासुर काँपै।।

तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई। रहै सदा कपिराज सहाई।।

दोहा

प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरैं उर ध्यान।।

तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।

 
 
हनुमान अष्टक
 
 

॥ हनुमानाष्टक ॥
बाल समय रवि भक्षी लियो तब,
तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।
ताहि सों त्रास भयो जग को,
यह संकट काहु सों जात न टारो ।
देवन आनि करी बिनती तब,
छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि,
संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥

बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,
जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि साप दियो तब,
चाहिए कौन बिचार बिचारो ।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,
सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥

अंगद के संग लेन गए सिय,
खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,
बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।
हेरी थके तट सिन्धु सबे तब,
लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥

रावण त्रास दई सिय को सब,
राक्षसी सों कही सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,
जाए महा रजनीचर मरो ।
चाहत सीय असोक सों आगि सु,
दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥

बान लाग्यो उर लछिमन के तब,
प्राण तजे सूत रावन मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,
तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।
आनि सजीवन हाथ दिए तब,
लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥

रावन जुध अजान कियो तब,
नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,
मोह भयो यह संकट भारो I
आनि खगेस तबै हनुमान जु,
बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥

बंधू समेत जबै अहिरावन,
लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिन्हीं पूजि भलि विधि सों बलि,
देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।
जाये सहाए भयो तब ही,
अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥

काज किये बड़ देवन के तुम,
बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को,
जो तुमसे नहिं जात है टारो ।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,
जो कछु संकट होए हमारो ॥ ८ ॥

॥ दोहा ॥
लाल देह लाली लसे,
अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन,
जय जय जय कपि सूर ॥

 
 
प्रश्न  बजरंग बाण Bajrang Baan क्यों नहीं पढ़ना चाहिए?
 
 
बजरंग बाण Bajrang Baan क्यों नहीं पढ़ना चाहिए उन लोगो को नहीं पढ़ना चाहिए जो मास मछली खाते है या पर स्त्री के साथ भोग करते है!
 
 
प्रश्न  बजरंग बाण Bajrang Baan कब पढ़ना चाहिए?
 
१२से २.३० बजे के बीच में  बजरंग बाण Bajrang Baan कब पढ़ना चाहिए
 
 
प्रश्न  बजरंग बाण Bajrang Baan का पाठ कौन सा है?
 

जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।

जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।

जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।

 
प्रश्न  बजरंग बाण Bajrang Baan का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
 

कोई गिनती नहीं कितनी बार भी

 
प्रश्न  बजरंग बाण Bajrang Baan का पाठ करने से क्या फल मिलता है?

 पीरियड में पूजा क्यों नहीं करते ? periods  me pooja kyu nhi karti

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periods me pooja kyu nhi karti पीरियड में पूजा क्यों नहीं करते ?

periods  me pooja kyu nhi karti  पीरियड में पूजा क्यों नहीं करते ?         

periods  me pooja kyu nhi karti  क्यों है पीरियड्स के दौरान पूजा वर्जित, जानिए ऐसे सवालों के जवाब
प्राचीन मान्यताओं के पीछे एक वैज्ञानिक तथ्य भी था। हालांकि, हमने कभी इस तथ्य को समझने की कोशिश नहीं की। तो वह विश्वास एक बुरी प्रथा में बदल गया।

पीरियड्स के दौरान न करें पूजाहिंदू धर्म में पीरियड्स को लेकर कई नियम हैं। इन नियमों के अनुसार महिलाओं को मंदिर में पूजा करने या जाने की अनुमति नहीं है। महिलाओं को अक्सर आश्चर्य होता है कि पीरियड्स को अपवित्र क्यों माना जाता है।

अगर महिला उपवास कर रही है और मासिक धर्म एक ही दिन आता है तो क्या करें? क्या ऐसी स्थिति में उपवास उचित होगा? ऐसे कई सवाल आपके मन में होंगे। ऐसे ही सवालों के जवाब आज हम आपको बताने जा रहे हैं।

पूजा वर्जित क्यों है –   पीरियड में पूजा क्यों नहीं करते  periods  me pooja kyu nhi karti  ? 

पूजा वर्जित क्यों है -   पीरियड में पूजा क्यों नहीं करते :periods  me pooja kyu nhi karti  ? 
पूजा वर्जित क्यों है –   पीरियड में पूजा क्यों नहीं करते periods  me pooja kyu nhi karti  ?

     

प्राचीन मान्यताओं के पीछे एक वैज्ञानिक तथ्य भी था। हालांकि, हमने कभी इस तथ्य को समझने की कोशिश नहीं की। तो वह विश्वास एक बुरी प्रथा में बदल गया। पीरियड्स के दौरान पूजा न करने का कारण यह है कि पुराने दिनों में पूजा बिना जाप के पूरी नहीं होती थी। पीरियड्स के दौरान महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं जो दर्द और थकान का कारण बनते हैं। एक महिला के लिए ज्यादा देर तक बैठना और पूजा करना संभव नहीं था।

साफ-सफाई का ध्यान रखा जाता है  periods  me pooja kyu nhi karti  

पूजा में स्वच्छता का हमेशा ध्यान रखा जाता है। पुराने जमाने में पीरियड्स के दौरान साफ-सफाई रखने का कोई जरिया नहीं था। तब महिला के कपड़े खराब हो जाते थे। ऐसे में उसे आराम के लिए पूजा नहीं करने दिया गया ताकि वह अपना ख्याल रख सके। एक अलग रहने का कमरा प्रदान किया गया था।

हालाँकि, मानसिक पूजा और जप की कभी मनाही नहीं की गई थी। कालांतर में लोगों ने इन कारणों को समझने की कोशिश नहीं की। नतीजतन, यह एक स्टीरियोटाइप बन गया। आजकल महिलाओं को पीरियड्स के दौरान स्टेफिलोकोकस जैसी कई चीजें होती हैं।

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उपवास के दौरान माहवारी आने पर क्या करें? periods  me pooja kyu nhi karti  

अगर आप उपवास कर रहे हैं और पीरियड्स आ गए हैं तो आपको अपना व्रत पूरा करना चाहिए। पीरियड्स के दौरान भगवान में आस्था कम नहीं होती है। मन की पवित्रता ईश्वर के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है। यदि आपको उपवास के दौरान मासिक धर्म आता है, तो आप दूर बैठ सकते हैं और किसी और से धार्मिक सेवा करवा सकते हैं। मासिक धर्म के दौरान उपवास के सभी नियमों का पालन करें। साफ-सफाई का ध्यान रखें।

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शरीर के सात चक्र की जानकारी Information about the seven chakras of the body चक्रा का परिचय जैसा कि पाठकगण प्रस्तुत चित्र में चक्रों का स्थान, नाम व संख्या जान चुके हैं-मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र-ये सात चक्र हैं। जिस प्रकार स्थूल दृष्टि से नाड़ी नसों के सर्वाधिक जमावड़ा होने के कारण (जंक्शन होने के कारण) नाभि, हृदय व मस्तिष्क महत्त्वपूर्ण हैं उसी प्रकार सूक्ष्म दृष्टि से ये चक्र भी महत्त्वपूर्ण हैं। क्योंकि ये शक्ति, ऊर्जा व प्राण के सूक्ष्म किन्तु अत्यंत महत्त्वपूर्ण जंक्शन ही नहीं बल्कि शरीर के विभिन्न ‘पॉवर स्टेशन’ हैं। इनमें से प्रत्येक की अपनी निश्चित शक्तियां, अपने निश्चित प्रभाव और अपने निश्चित अधिकार हैं। किन्तु ये ‘पॉवर स्टेशन’ सोए हुए या निष्क्रिय रहते हैं।

बिल्कुल उसी प्रकार मानो समस्त यन्त्रों, साधनों, उपकरणों तथा संचालन व्यवस्था आदि से सम्पन्न और हर दृष्टि से समर्थ किसी बिजलीघर या पॉवर स्टेशन की बिजली चली जाए और उसकी समस्त शक्तियां व संचालन बिजली के आने तक निष्प्राण रह जाए।’ ये जो बिजली/करंट/ऊर्जा या शक्ति है-जिसके अभाव में हर दृष्टि से सम्पन्न व समृद्ध होते हुए भी हमारे शरीर के सातों चक्र/पॉवर स्टेशन मृतप्राय रहते हैं, यही कुण्डलिनी शक्ति है। बिजली की सप्लाई जिस-जिस उपकरण में हो जाती है, वही उपकरण क्रियाशील हो जाता है। ठीक इसी प्रकार जिस-जिस चक्र या ‘पॉवर स्टेशन’ पर यह कुण्डलिनी शक्ति पहुंच जाती है, वही सक्रिय हो जाता है।

किसी विशिष्ट चक्र में कुण्डलिनी शक्ति का प्रवेश और वहां से आगे/ऊपर बढ़कर क्रमशः अगले चक्र में प्रवेश ‘चक्र भेदन’ कहा जाता है। (इस विषय में हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगे)। इस प्रकार ‘षट्चक्र भेदन’ (छह चक्रों को भेद कर) कुण्डलिनी को सातवें चक्र में स्थित किया जाता है। सातवें चक्र का भेदन कर कुण्डलिनी शक्ति मोक्ष के समय परमात्मा में विलीन होकर स्वयं परमात्म स्वरूप हो जाती है। यह भी एक विलक्षण तथ्य है कि सप्त चक्रों ही की भांति कुण्डलिनी शक्ति भी मनुष्यों में सुप्त/निष्क्रिय अवस्था में ही रहती है। योग द्वारा उसे साधक को जगाना पड़ता है। योग के अतिरिक्त कुण्डलिनी जागरण के मन्त्रादि अन्य विधान भी कहे गए हैं। हम आगे यथासम्भव प्रकाश सभी विधानों पर डालेंगे, कुण्डलिनी एवं सप्तचक्र मूल रूप से योगपद्धति/योगविधान की ही चर्चा करेंगे। क्योंकि यही सर्वमान्य, विवाद रहित, पूर्ण प्रामाणिक तथा अपेक्षाकृत सहज प्रणाली है। और इन सबसे बड़ी बात यह कि यही प्रणाली बोधगम्य भी है तथा मेरी वर्णन सामर्थ्य के भीतर भी तो सबसे पहले सप्त चक्रों के विषय में जानते हैं

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कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां – Main Nadis of Kundalini

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां - Main Nadis of Kundalini

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां – Main Nadis of Kundalini

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां - Main Nadis of Kundalini
कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां – Main Nadis of Kundalini

 

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां – Main Nadis of Kundalini  नाड़ियां एवं कुण्डलिनी प्राणवाहक प्रमुख नाड़ियां मनुष्य के शरीर में 72000 नाड़ियों का होना माना गया है। बहुत से ग्रन्थों में असंख्य नाड़ियों का भी जिक्र आता है। (जब संख्या बहुत अधिक हो, तो उसकी महत्ता को दर्शाने के लिए भी असंख्य कह दिया जाता है।

अत: यह कोई ऐसा विरोधाभास नहीं है)। इन नाड़ियों में 15 प्राणवाहक नाड़ियों को प्रमुख माना गया है। इन पन्द्रह नाड़ियों को क्रमशः सुषुम्ना, इड़ा, पिंगला, गांधारी, हस्तजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, शूरा, कुहू, सरस्वती, वारुणी, अलम्बुषा, विश्वोदरी, चित्रा और शंखिनी नाम से जाना जाता है। इन पन्द्रह में से भी पहली तीन-सुषम्ना इड़ा व पिंगला का विशेष महत्त्व है।

योग विद्या तथा कुण्डलिनी जागरण के सम्बन्ध में भी यही तीन नाड़ियां विशेष महत्त्व की हैं। इन्हीं तीन नाड़ियों के लिए ‘त्रिवेणी’ शब्द का प्रयोग ग्रन्थों में हुआ है। मूलाधार से अलग होकर चलती ये तीनों नाड़ियां आज्ञा चक्र में मिलती हैं।

अत: मूलाधार को ‘मुक्त त्रिवेणी’ और आज्ञाचक्र को ‘युक्तत्रिवेणी’ कहा गया है। जैसा कि चक्र प्रकरण में बता आए हैं, ‘संगम’, ‘तीर्थराज’, ‘त्रिवेणी’ आदि शब्दों का मर्म वास्तव में क्या है। इसी ‘युक्तत्रिवेणी’ (आज्ञाचक्र ) को ‘त्रिकूट’ भी कहते हैं।

कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां - Main Nadis of Kundalini
कुण्डलिनी की प्रमुख नाड़ियां – Main Nadis of Kundalini

कुछ विद्वान इसी को ‘चित्रकूट’ भी कहते हैं जहां राम सीता सहित वास करते हैं। यानि ब्रह्म और माया या प्रकृति व पुरुष साथ-साथ रहते हैं। बहरहाल…उपर्युक्त तथ्यों को इन तीनों नाड़ियों का महत्त्व सिद्ध करने के लिए पुनः दोहराया गया है।

इन तीन प्रमुख नाड़ियों में भी सुषुम्ना अति अधिक महत्त्व वाली है, क्योंकि कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर इसी नाड़ी में गति करती है। यह नाड़ी अति सूक्ष्म नली के समान गुदा के निकट से मेरुदण्ड से होती हुई ऊपर सहस्रार तक चली गई है।

इसके प्रारम्भ स्थान से ही इसकी बाएं ओर से इड़ा तथा दाईं ओर से पिंगला नाड़ी भी ऊपर गई है किन्तु ये दोनों नाड़ियां नथुनों पर आकर समाप्त हो जाती हैं।

(स्वर विज्ञान की दृष्टि से ये दोनों नाड़ियां महत्त्वपूर्ण हैं। प्राणायाम प्रकरण में स्वर विज्ञान’ की चर्चा करेंगे)। किन्तु सुषम्ना ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है। ये तीनों नाड़ियां आज्ञाचक्र पर मिलती हैं, अतः आज्ञाचक्र को ‘तीसरा नेत्र’ भी कहा गया है। सुषुम्ना नाड़ी स्वयं में एक अति सूक्ष्म नली के समान है। इस नली (सुषुम्ना) के भीतर एक और अत्यंत सूक्ष्म नली के समान नाड़ी है जो ‘वज्र नाड़ी’ कही गई है।

‘वज्र’ नाड़ी में भी एक और नाड़ी जो ‘वज्रनाड़ी’ से भी सूक्ष्मतर है, गुजरती है जो ‘चित्रणी’ नाड़ी के नाम से जानी जाती है। ‘चित्रणी’ नाड़ी के भीतर से भी मकड़ी के जाले से भी सूक्ष्म ‘ब्रह्मनाड़ी’ गुजरती है। यही कुण्डलिनी शक्ति का वास्तविक मार्ग है। इन अति सूक्ष्म माड़ियों का ज्ञान योगियों को ही सम्भव है। आधुनिक विज्ञान इस विषय में पंगु व दीन है।

ये नाड़ियां सत्त्व प्रधान, प्रकाशमय व अद्भुत शक्तियों वाली हैं तथा सूक्ष्म शरीर व सूक्ष्म प्राण का स्थान है। . PRIL CID इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना नाड़ियों की स्थिति ये सभी नाड़ियां मेरुदण्ड से सम्बन्धित हैं।

जिन विशेष स्थानों पर अन्य नाड़ियां इनसे मिलती हैं वे ‘जंक्शन’ ही चक्र कहे जाते हैं जो कि शरीरस्थ ‘पॉवर स्टेशन’ हैं, जैसा कि पहले बता आए हैं क्योंकि सबका सम्बन्ध मेरुदण्ड से है और सुषुम्ना नाड़ी मेरुदंड के भीतर से गुजरती है। सुषुम्ना के भीतर से वज्र, वज्र के भीतर से चित्रणी और चित्रणी के भीतर से ब्रह्मनाड़ी गुज़रती है।

यह ब्रह्मनाड़ी कुण्डलिनी शक्ति के प्रवाह का मार्ग है इस तथ्य से पाठक सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि कुण्डलिनी के जागरण व संचालन में मेरुदण्ड का सीधा रखना कितना अधिक आवश्यक है।

सीधे मेरुदण्ड में ही इन समस्त नाड़ियों के सीधे व तने रहने से कुण्डलिनी शक्ति का प्रवाह सरलता, सुगमता व सहजता से निरावरोध हो सकता है। मेरुदण्ड का झुके रहना प्रवाह मार्ग की सरलता में अवरोधक सिद्ध होता है। पाठक जानते हैं कि दो बिन्दुओं को मिलाने वाली सबसे कम दूरी सरल रेखा होती है।

अत: मेरुदण्ड सीधा रखकर विधिवत् आसन पर बैठने से कुण्डलिनी अपेक्षाकृत सरलता से ही नहीं, बल्कि तीव्रता और शीघ्रता से अपनी यात्रा कर पाती है। इसके अलावा मूलबन्ध आदिबन्धों का लगा होना भी इस काल में आवश्यक होता है (इस विषय में हम कुण्डलिनी जागरण काल में रखी जाने वाली सावधानियों के अर्न्तगत आगे चर्चा करेंगे)

अन्यथा बहुत-सी हानियां सम्भावित होती हैं। अत: जैसा कि कुछ अल्पज्ञों का मत है कि जैसे मर्जी, जब मर्जी, जहां मर्जी बैठकर, लेटकर, खड़े होकर, अधलेटे होकर ध्यान करें और कुण्डलिनी को जागृत करें- यह ‘सहज योग’ है, यह सरासर भ्रामक, मिथ्या व अज्ञानपूर्ण है। अनुशासन, विधान तथा नियमों का बंधन न रहने से यह भले ही औसत बुद्धि वाले लोगों को सरल, सहज व सुखद मालूम पड़े किन्तु कल्याणकारक व सफलदायक नहीं हो सकता, यह निश्चित है। प्रबुद्ध पाठक समझ सकते हैं कि मालूम पड़ने और वास्तव में होने में बहुत अंतर होता है।

जिस समय श्मशान में लकड़ियां या धर्मकांटे पर ट्रकों में लदा माल तोला जाता है, तब एक-दो किलो इधर-उधर हो जाना कोई मायने नहीं रखता। किन्तु जब पंसारी की दुकान पर चीनी, दाल, चावल आदि तोला जाता है तब एक-दो किलो का अंतर बहुत मायने रखता है। अलबत्ता 5-10 ग्राम का अंतर तब कोई मायने नहीं रखता। लेकिन जब सुनार के पास सोना या जवाहरात तुलवाया जाता है, तब 5-10 ग्राम का अन्तर बहुत मायने रखता है। उस समय तो माशे, तोले, रत्ती का भी अन्तर मायने रखता है।

इसलिए उनकी तराजू बिल्कुल ‘एक्यूरेट’ व शीशे के बॉक्स में रहती है, ताकि हवा से भी ज़रा-सी न हिल जाए। दाल सब्जी बनाते समय, बर्तन में डाला गया पानी दो चार चम्मच कम ज्यादा हो जाए तो अन्तर नहीं पड़ता, किन्तु दवाई बनाते समय पानी उचित अनुपात से कम ज्यादा हो तो दिक्कत हो सकती है। इसके विपरीत प्रयोगशाला में परीक्षण के समय किसी रसायन या विलयन में कोई खतरनाक, घातक या अतिसंवेदनशील अम्ल मिलाते समय नियत अनुपात से बूंद भर भी इधर-उधर हो जाना किसी अप्रिय घटना को जन्म दे सकता है।

इसी प्रकार अन्य बहुत से उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनसे यह तथ्य साफ-साफ समझा जा सके कि जितनी माईन्यूट (सूक्ष्म) कैलकुलेशन (गणना) में हम जाएंगे, उतनी ही हमें एक्यूरेसी (प्रतिपन्नता)की आवश्यकता होती है। जैसे मर्जी, जब मर्जी, जहां मर्जी, जितना मर्जी का सिद्धांत वहां लागू नहीं हो सकता क्योंकि वह न सिर्फ हमें सही परिणाम पर नहीं पहुंचने देगा बल्कि हमारे व औरों के लिए घातक भी सिद्ध हो सकता है। रस्सी को लापरवाही से छुआ जा सकता है, बिजली के तार को नहीं और नंगे बिजली के तार को (जिस पर रबर का सुरक्षा खोल न चढ़ा हुआ हो) छूने के लिए तो और भी सावधानी दरकार होती है।

अतः सूक्ष्म किन्तु शक्तिशाली व चमत्कारी प्रभाव वाली उपलब्धियों को पाने के लिए वैसी ही सधी हुई, सही दिशा में, नियमपूर्वक, निरंतर मेहनत की ज़रूरत होती है। बिना निरंतर अभ्यास के, बिना सावधानी रखे, बिना नियमों का बंधन स्वीकार किए हम सुरक्षित रूप से साईकिल तक चलाना नहीं सीख सकते, कुण्डलिनी शक्ति चालन की बात तो बहुत दूर की बात है। जब ऊपर चढ़ना होता है, जब पतली रस्सी पर चलना होता है, तब आंखें खोलकर, पूरी सावधानी बरत कर और एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना होता है।

अभ्यास द्वारा दक्षता प्राप्त हो जाने के बाद फिर भले ही आंखें बंद भी रखें तो अन्तर नहीं पड़ता। हां, अगर नीचे गिरना चाहें और छत की मुंडेर ऊंची न हो, फिर भले ही आंखें बंद कर, जब मर्जी, जहां मर्जी, जैसे मर्जी व जितना मर्जी चलें बड़ी सहजता से नीचे आ गिरेंगे। अत: योग के नाम पर ‘सहजता’ का दुमछल्ला लगाने वाले ठगों से तो पाठकों को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए।

यद्यपि हम इस चर्चा में मूल विषय से भटक रहे हैं, तथापि पाठकों के मार्गदर्शन के लिए यह ज़रूरी समझ रहा हूं ताकि पाठक भ्रमित न हों, ठगें न जाएं और अन्त में असफलता हाथ आने पर योग विद्या को ही अनास्था की दृष्टि से न देखने लगें। गुरु बनने की योग्यता वाला योगी कभी दुकान खोलकर नहीं बैठता। जो दुकान खोलकर बैठा है वह तो व्यापारी है।

वह भला ज्ञान को, योग को क्या जाने? जो सामूहिक रूप से आए हुए दर्शनार्थियों पर एक साथ कुण्डलिनी जागरण कराने का सब्जबाग दिखाते हैं, जो सामूहिक ‘शक्तिपात की बात करते हैं, उनके बारे में संदेह होता है कि वे कुण्डलिनी जागरण या शक्तिपात का अर्थ भी समझते हैं या नहीं। कुण्डलिनी जागरण न हुआ, गोया मूंगफली बांटना हो गया। उससे भी अधिक अफसोस उन दर्शनार्थियों की बुद्धि व आस्था पर होता है, जो ऐसे धर्मगुरुओं के चक्कर में फंसकर वहां पहुंच जाते हैं, और उन लम्पटों के पैरों में नाक रगड़ना अपना सौभाग्य मानते हैं।

इसका एकमात्र कारण अज्ञान है। अत: सावधान । । मंजिल पे पहुंचना है तो मंजिल शनास बन। वरना ये रहनुमा तुझे दरदर फिराएंगे।

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आज्ञा चक्र सम्पूर्ण प्राचीन रहस्य agya chakra

आज्ञा चक्र सम्पूर्ण प्राचीन रहस्य agya chakra

 

आज्ञा चक्र सम्पूर्ण प्राचीन रहस्य agya chakra

आज्ञा चक्र सम्पूर्ण प्राचीन रहस्य agya chakra आज्ञा चक्र कुछ विद्वान इसे ‘अंजना चक्र’ भी कह देते हैं। इसका स्थान दोनों भृकुटियों के मध्य-नासिका की संधि के ऐन ऊपर है। यह योग विद्या में साधना की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण चक्र है। निराकार ब्रह्म का ध्यान व अन्तर्नाटक आदि इसी चक्र पर योगीजन किया करते हैं। शरीर के समस्त अवयवों तथा संस्थानों को आज्ञा गति नाद की भांति (सब ओर) आज्ञा चक्र का प्रसारण यहीं से होता है। इस चक्र तक पहुंचा हुआ योगी अधोगति को पुनः प्राप्त नहीं होता। इस चक्र का महत्त्व सिद्ध करने के लिए यही तथ्य काफी है कि इस चक्र का तत्त्वबीज मंत्र ॐ है, जो परमात्मा या ब्रह्म का प्रणव मंत्र है। क्योंकि यह अकार, उकार और मकार (अ+उ+म ) तीनों की शक्तियों का सम्मिलन है।

इन्हें ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश अथवा ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति और संकल्प/इच्छा शक्ति कहा गया है। किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए इन्हीं तीन शक्तियों की अनिवार्यता होती है। हमें उस कर्म विशेष के विषय में ज्ञान हो, उस कर्म विशेष को करने/संपादन की सामर्थ्य हो और उस कर्म विशेष को करने की हमारी इच्छा/संकल्प हो तभी हम उस कर्म विशेष को कर सकते हैं।

क्योंकि यदि हममें करने की सामर्थ्य होगी पर ज्ञान नहीं तो भी हम उस कार्य विशेष को कर नहीं पाएंगे। यदि हमें उस कार्य विशेष का ज्ञान होगा किन्तु क्रिया की सामर्थ्य नहीं, तो भी हम उसे कर नहीं पाएंगे, किन्तु यदि हममें क्रिया और ज्ञान दोनों की सामर्थ्य, किसी कार्य विशेष के सम्बन्ध में हो तो भी हम उस कार्य को तब तक नहीं करेंगे जब तक हमें उस कार्य को करने की इच्छा न हो। कोई कार्य बिना संकल्प के सम्पन्न नहीं हो सकता। इस प्रकार ये तीन मूलशक्तियां किसी कार्य के सम्पादन में अथवा व्यवहार में अनिवार्य होती हैं।

अपने-अपने स्थान पर तीनों ही शक्तियों का महत्त्व है, तो भी संकल्पशक्ति शेष दोनों शक्तियों के एकत्रित होने के बावजूद संकल्प या इच्छा के अभाव में कार्य का सम्पादन नहीं होता। दोनों ही शक्तियां (ज्ञान व कर्म/क्रिया) अकेली होने पर तो व्यवहार में आती ही नहीं, मिलकर भी व्यवहार में तब तक नहीं आती जब तक उनमें संकल्प शक्ति न आ जुड़े। जबकि संकल्प शक्ति अकेली ही यदि बलवती और प्रचण्ड हो तो ज्ञान और क्रिया शक्ति को जुटा लेती है और कार्य सम्पन्न कर लेती है।

इसी संकल्पशक्ति के अधिष्ठाता भगवान शिव हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन शक्तियों के अभौतिक देवता हैं। क्योंकि सृष्टि के निर्माण कार्य में मूलत: ज्ञान की आवश्यकता होती है, जिसके अधिष्ठाता देव ब्रह्मा हैं। सृष्टि के संचालन, पोषण व विकास में मूलतः क्रिया आवश्यक होती है, जिसके अधिष्ठाता देव विष्णु हैं, और संहार या विध्वंस के लिए संकल्प की मूल आवश्यकता होती है, जिसके अधिष्ठाता देव शिव हैं।

अतः सृष्टि ब्रह्मा के, संचालन/पालन विष्णु के और संहार/लय शिव के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जहां, ज्ञान, क्रिया व संकल्प शक्ति के अभौतिक देव हैं, वहीं सूर्य, अग्नि और चन्द्र इन्हीं शक्तियों के भौतिक देव हैं जिन्हें हम इन्द्रियों द्वारा अनुभव कर सकते हैं। यहां यह भी ध्यान देना चाहिए कि संहार के देवता होने के कारण श्मशान में शिव प्रतिमा अवश्य स्थापित की जाती है। किन्तु यह ‘इकार’ की शक्ति (इच्छा शक्ति ) का ही प्रताप है जो ‘शव’ को भी कल्याणकारी ‘शिव’ में बदल देता है। सूर्य प्रकाश का स्रोत है। प्रकाश के अभाव में ज्ञान सम्भव नहीं है। अतः सूर्य को जगत् गुरु माना जाता है। अग्नि-ऊर्जा व ऊष्मा का स्रोत है। बिना ऊर्जा के कोई भी क्रिया नहीं हो सकती। क्रिया के लिए शक्ति, शक्ति के लिए ईंधन या ऊर्जा और कुण्डलिनी शक्ति कैसे जागृत करें-3 48ईंधन या ऊर्जा के लिए अग्नि आवश्यक होती है।

 

इसी प्रकार मन के अधिकारी देवता चन्द्रमा हैं। मन ही इच्छा या संकल्प कर सकता है। अत: संकल्पशक्ति के देवता चन्द्रमा ही माने गए हैं । समुद्रों का ज्वार-भाटा चन्द्रमा से नियन्त्रित है। स्त्रियों में रज की मासिक प्रवृत्ति चन्द्रमा से सम्बन्धित है। मानव के भावावेश तथा मन को चन्द्रमा प्रभावित व प्रवृत्त करता है। पूर्णिमा की रात और आमवस की रात में मनुष्य की मनोदशा में विशेष अन्तर पाया जाता है। अपराध शास्त्र के आंकड़ों के अनुसार के पूर्णिमा की रात में यौन सम्बन्ध अपराध विशेष रूप से अधिक घटित होते हैं। काव्य व साहित्य में चन्द्रमा, चांदनी, पूनम आदि का विशेष वर्णन चन्द्रमा से पड़ने वाले मानसिक प्रभाव को स्पष्ट रूप से परिलक्षित करते हैं। यहां तक कि चन्द्रमा की घटने बढ़ने की कला का सम्बन्ध भी बहुत से विद्वान इच्छा शक्ति से जोड़ते हैं।

शिव के मस्तक पर चन्द्रमा को सुशोभित दिखाने का एक प्रतीकात्म्क कारण यह भी है। बहरहाल। ॐ प्रणव मंत्र है जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश की एकता यानि परमब्रह्म/परमेश्वर का द्योतक है। (ENGLISH में परमात्मा के लिए प्रयुक्त शब्द GOD भी वास्तव में इन्हीं तीन शक्तियों का परिचायक है। GENERATOR, OPERATOR और DESTRUCTER यानि उत्पन्न करने वाला, संचालित करने वाला और विनष्ट करने वाला, और यही ॐ आज्ञा चक्र का बीज मंत्र है, इससे आज्ञा चक्र का महत्त्व स्पष्ट होता है। आज्ञाचक्र का यन्त्राकार लिंग के समान है, क्योंकि स्वयं इस चक्र को लिंगाकार माना गया है।

यह सफेद रंग से प्रकाशित दो दलों/पंखुड़ियों के कमल के समान है। (विज्ञान के अनुसार पिट्युटरि ग्लैण्ड और पायनियल ग्लैण्ड को इन दलों का संकेतक माना जा सकता है।) इन दलों पर हं और क्षं अक्षर/वर्ण हैं जो इस चक्र की कमलदल ध्वनि को प्रकट करते हैं। इस चक्र का तत्त्वबीज ॐ है। अतः ॐकार इसकी बीज ध्वनि है। पंच महाभूतों से परे और सूक्ष्म ‘मह’ तत्त्व का यह मुख्य स्थान है। इसका लोक ‘तपः’ है। इसके तत्त्व बीज़ की गति नाद के समान है अतः इस चक्र का बीज वाहन नाद है, जिस पर लिंगदेवता विराजते हैं। इस चक्र के अधिपति देवता ज्ञान दाता शिव अपनी षडानन और चतुर्हस्ता शक्ति ‘हाकिनी’ के साथ है। अतः इस चक्र की शक्ति देवी ‘हाकिनी’ हैं। विभिन्न चक्रों पर ध्यान करने से जो फल साधक को प्राप्त होते हैं, वे सभी दिव्य फल अकेले आज्ञा चक्र पर ही ध्यान करने से प्राप्त होते हैं। त्रिकालदर्शन, दिव्यदर्शन, दूरदर्शन तथा मन्त्र, शक्ति व ईश साक्षात्कार का स्थान भी यही है अतः इसे शिव का तीसरा नेत्र भी कहा गया है।

इसी स्थान पर मन व प्राण के स्थिर हो जाने पर सम्प्रज्ञात समाधि की योग्यता होती है। ‘दिव्यचक्षु’ यही आज्ञा चक्र है। इसका तेज सूर्य तथा चन्द्र के सम्मिलित तेज से भी प्रबल कहा गया है। इसी चक्र के दाएं व बाएं से क्रमश: गान्धारी व हस्तिनी नाड़ियां नेत्रों तक जाती हैं, जिनका कार्य नेत्रों को प्रकाश देना है। प्रकृति व पुरुष का, जड़ व चेतन का अथवा माया व ब्रह्म का यही संयोग स्थल है। इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना तीनों नाड़ियां यहां मिलती हैं अतः इसे ‘युक्तत्रिवेणी’ भी कहा जाता है।

 

यहीं से नेत्रों का प्रकाश बाहर भीतर के अंगों को देख सकता है। अतः इस चक्र पर ध्यान करने से वृत्तियां अन्तर्मुखी होती हैं । मन की चंचलता नष्ट होती है और भ्रान्ति दूर होकर आत्म तत्त्व में स्थिरता आती है। आज्ञा चक्र में ही गुरु की आज्ञा से शुद्ध ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति होती है। रामायण आदि धर्म ग्रन्थों में वर्णित तीर्थराज’ (प्रयाग )जहां-गंगा, यमुना व सरस्वती का संगम होता है और जिसमें स्नान करके सारे पाप धुल जाते हैं, वह तीर्थराज वास्तव में यह आज्ञाचक्र ही है। क्योंकि यहीं इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना तीनों नाड़ियों का संगम होता है। इसी में स्नान करने (तन्मय होने) से मुक्ति होती है। जैसा कि ‘ज्ञान संकलिनि तंत्र’ में कहा भी गया है- इड़ा भागीरिथी गंगा पिंगला यमुना नदी। तयोर्मध्यगता नाड़ी सुषम्णाख्या सरस्वती॥ -(ज्ञान संकलिनि तंत्र) अर्थात् इड़ा गंगा और पिंगला यमुना नदी है। इन दोनों के मध्य से जाने वाली नाड़ी सुषम्ना को ही सरस्वती कहते हैं। (और आज्ञाचक्र पर ये तीनों नाड़ियां मिलती हैं)।

आज्ञा चक्र कमल की कर्णिका में ही मन का निवास कहा गया है। स्थूल बुद्धि वाले मनुष्य स्थूल हृदय को ही मन समझ लेते हैं। वास्तव में मन तो अतिसूक्ष्म है और एक अणुमात्र है। जैसा कि ‘चरक संहिता’ में मन को परिभाषित करते हुए महर्षि चरक ने कहा भी है-‘अणुत्वं चैकत्वं मनः’ (जो अणु है और एक है, वही मन है)। अकार, उकार व मकार की संयुक्तावस्था में ब्रह्मा, विष्णु व महेश की संयुक्तावस्था का प्रतीक आज्ञाचक्र का बीज मंत्र ॐ बिन्दु, शक्ति व नाद से युक्त है। इन्हीं से तीन शक्तियों-रौडी, ज्येष्ठा और वामा का उत्पन्न होना माना गया है।

इस प्रकार नाद शिव और शक्ति के संयोगावस्था का भी प्रतीक सिद्ध होता है। आज्ञा चक्र में ध्यान से-सर्वज्ञता, सर्वदर्शिता, परकाया प्रवेश, त्रिकालज्ञता तथा स्थिरप्रज्ञता की प्राप्ति समस्त सिद्धियों सहित होती है। साधक मन, कर्म व वचन से मन सहित समस्त इंद्रियां उसके वश में रहती हैं। सर्वज्ञ और तत्त्वदर्शी होने से उत्पादन, पालन व संहार में समर्थ हो जाता है। उसमें आनन्द, विकारहीनता तथा साक्षी भाव का उदय होता है तथा जन्मान्तरों के संस्कारों के समस्त मल व पाप कट कर शुद्धावस्था को प्राप्त होता है।

अतः इस रहस्यपूर्ण आज्ञाचक्र को भली भांति समझ लेना चाहिए। यह कुण्डलिनी यात्रा का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण व निर्णायक पड़ाव है। यद्यपि इसके आगे एक प्रमुख चक्र का भेद शेष रह जाता है, तथापि उस चक्र का भेदन करने में फिर विशेष प्रयास की आवश्यकता नहीं रह जाती, वहां स्वतः प्रवेश हो जाता है। इसीलिए आज्ञा चक्र तक पहुंचा हुआ योगी पुनः अधोगति को प्राप्त नहीं होता। उसकी इच्छा के विरुद्ध कुण्डलिनी वहां से वापस नहीं लौट पाती। इसके अलावा मनश्चक्र और बुद्धिचक्र इसी आज्ञाचक्र के दोनों दलों के संधि स्थल पर रहते हैं। षड्दलात्मक मनश्चक्र को ‘मनोनय कोष’ भी कहा जाता है।

इस संदर्भ में आगे मन सम्बन्धी प्रकरण में विस्तार से पढ़ेंगे। इसी आज्ञा चक्र में प्राण व मन को स्थिर करने से प्राप्त होने वाले दिव्यफल के विषय में कबीरदास जी ने ‘कबीर वाणी’ में अपने रहस्योत्पादक विशिष्ट अंदाज में कहा है कि- देह रूपी मकान के द्वार पर झरोखे बन्द करके मैंने प्राण रूपी चोर को पकड़ उसके भागने के समस्त मार्ग बन्द कर दिए। फिर हृदय की कुटिया में उसे बांधकर ॐ के कोड़े से उसे खूब पीटा-जिससे सहज नाद गूंज उठा। यह आज्ञा चक्र भेदना अत्यंत कठिन है इसलिए कबीर ने इसे ‘दसवें द्वारे ताला लागी’ कहा है।

यहीं आकर गुरु का महत्त्व पूर्णतः सिद्ध होता है, क्योंकि बिना गुरु की कृपा/आज्ञा से इस चक्र का ताला नहीं खुलता (इसमें प्रवेश नहीं होता)। तभी तो कबीरदास को कहना पड़ा- गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागू पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोबिंद दियो मिलाय।। यह आज्ञाचक्र प्रभु का साक्षात्कार स्थल है। गुरु की कृपा व अनुमति से इस चक्र में प्रवेश होता है, तभी ईश्वर साक्षात्कार होता है। इसलिए गुरु द्वारा गोबिन्द मिलने की बात कही है। इस संदर्भ में यदि आज्ञा चक्र को बैकुण्ठ का द्वार मान लें तो उचित ही होगा। ऐसा मानते ही पुराणों में वर्णित कथाओं का मर्म स्पष्ट हो जाएगा। बैकुण्ठ के द्वार पर वज्रकपाट लगे हैं। दो द्वारपाल वहां सतत पहरा देते हैं। बैकुण्ठ की सात ड्योढ़ियां हैं।

ब्रह्मा जी के सनकादि मानस पुत्र भागवत पुराण के अनुसार जब विष्णु दर्शन की इच्छा से बैकुण्ठ गए तो छ: ड्योढ़ी चढ़ जाने के बाद सातवीं पर चढ़ने से जय-विजय दोनों द्वारपालों ने उन्हें रोक लिया। यहां सातों ड्योढ़ियों, सात चक्रों की तथा बैकुण्ठद्वार आज्ञाचक्र का प्रतीक है और बैकुण्ठ के दोनों द्वारपाल इस चक्र के दो दलों के वर्ण ‘हं’ वर्ण के प्रतीक हैं। अभिप्राय यही है कि इस चक्र का भेदन ब्रह्माजी के मानस पुत्रों, योग विद्या में प्रवीण सनकादि ऋषियों के लिए भी कठिन है। फिर साधारण योगियों की तो बात ही क्या। इस प्रकार विभिन्न धर्मग्रन्थों में अन्यत्र भी इस प्रकार के कूट संकेत कथाओं के माध्यम से बिखेरे गए हैं।

जैसे वाल्मीकिय रामायण में नौ द्वारों व सात प्रकोष्ठों वाली अयोध्या नगरी का वर्णन जहां राजा दशरथ अपनी तीन रानियों के साथ रहते हैं-वास्तव में शरीर (नौ छिद्र और सात चक्र) में रहने वाले दसों इंद्रियों के राजा मन (दशरथ से सिद्ध होता है-दस घोड़ों का रथी या दसों दिशाओं में जाने वाला रथ-दोनों ही प्रकार से इसका आशय ‘मन’ ही सिद्ध होता है) का यह कूट संकेत है जिसकी तीन रानियां सात्त्विक, राजसिक व तामसिक बुद्धि ही हैं। मन और बुद्धि के संयोग से उत्पन्न होने वाली चेतना ही राम हैं। चेतना के अभाव में बुद्धि तो जड़ होकर रह सकती है। शरीर भी निष्क्रिय (कोमा में) होकर रह सकता है किन्तु मन नहीं । अतः राम के बनवास पर केवल दशरथ के ही प्राण छूटते हैं, अन्य किसी के नहीं। इसी प्रकार के बीसियों उदाहरण हैं जो रामायण या पुराणों में कथाओं के माध्यम से गुप्त संकेतों में पूरा योग-रहस्य समझाते हैं। सभी को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर पुस्तक के पृष्ठों का अतिक्रमण मूल विषय के साथ अन्याय होगा।

पाठकों को प्रेरित करने के लिए इतना दिशा-निर्देशन भी बहुत है कि वे धर्मग्रन्थों को मात्र कथाओं के रूप में न लें-उसमें छिपे मर्म को खोजें। योग या अध्यात्म जैसा गूढ, रहस्यपूर्ण व शुष्क विषय जन सामान्य या औसत बुद्धि के लोगों का भी कल्याण कर सके अत: उसे कथानक के रूप में जहां तहां पर प्रस्तुत किया गया है और यह निर्देश भी दिए गए हैं कि रामायण बराबर पढ़ें। पुराण बार-बार पढ़ें। बार-बार पढ़ने से ग्रन्थ समझ में आएगा। बार-बार का अभिप्राय यही है कि धीरे-धीरे अभ्यास व बुद्धि की रगड़ संस्कार भी दृढ़ करेगी और प्रकाश भी उत्पन्न करेगी। जब प्रकाश उत्पन्न होगा तो पाठक कथाओं में छिपे मर्म को शनैः शनैः पहचानने लगेगा। अस्तु ।

आज्ञा चक्र में आगरा आप को प्रकाश जैसा दिखाई  देता है।  यह ध्यान के समय दिखाई  देता है तो यह समझ लेना चाहिए के आप के चक्र को ऊर्जा प्रपात हो रही है आप का अभ्यास सही चल रहा  है ऐसा समझ सकते है।
 इस चक्र को जागृत करने के लेया आप को गुरु की आवश्यकता होगी जो आप का उचित मार्ग दर्शन करें।  इस के साथ ही आप को प्रणायाम  करनी की आवश्यकता होगी।
आज्ञा चक्र से वशीकरण भी संभव इस के लिए  आप को त्राटक साधना कर सकते है आज्ञा चक्र  को त्राटक खोलोता  साधक  को सम्मोहन  शक्ति प्रपात होती है
आज्ञा चक्र का बीज मंत्र ॐ है इस बीज मंत्र  से आज्ञा चक्र खुलता है
आज्ञा चक्र के अभ्यास के दिनों में चक्र में वेब्रेशन महसूस होती है और इस के इलावा और भी बहुत सारे  अनुभव होते  है।
आज्ञा चक्र के बहुत सारे  फायदा जैसे के साधक को अच्छे बुरे पता चल जाता है और साधक को भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी प्रपात हो जाती है साधक तिरकाल दर्शी बन जाता है
आज्ञा चक्र के  जागृत होने पर साधक को भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी प्रपात हो जाती है।  साधक किसी के भी मन की बात जान जाता है।

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अनाहत चक्र सम्पूर्ण रहस्य anahata-chakra ph .85280 57364

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अनाहत चक्र सम्पूर्ण रहस्य Anahata-Chakra ph .85280 57364 अनाहत चक्र इस चक्र का स्थान हृदय है। इसीलिए इसे ‘हृदय कमल’ या ‘हृदचक्र’ भी कह देते हैं। यहां अनाहत ध्वनि (बिना प्रयास या थाप के, बिना आघात के स्वतः ही उत्पन्न होने वाली ध्वनि) स्वतः ही होती रहती है। इस लिए इस चक्र को अनाहत कहा गया है। क्योंकि ध्वनियों के दो ही मूल प्रकार हैं-आहत व अनाहत। आहत ध्वनि किसी प्रकार की छेड़छाड़ या आघात से उत्पन्न होती है और अनाहत ध्वनि अज्ञात कारण से स्वतः ही उत्पन्न होती है।

  • अनाहत चक्र  के लाभ
  • अनाहत चक्र जागरण लक्षण
  • अनाहत चक्र रंग 

 

अनाहत चक्र अनाहत चक्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि नीचे के तीन और ऊपर के तीन चक्रों में यह संतुलनात्मक सेतु बनाता है। इसके अलावा इसी चक्र में हृत्पुण्डरीक कमल भी है, जिसमें कि योगीजन अपने आराध्य या इष्ट देव का ध्यान करते हैं। तांत्रिक ग्रन्थों के अनुसार भी (जैसा कि शिव सार तन्त्र में कहा गया है) ‘शब्द ब्रह्म कहलाने वाले सदाशिव इसी अनाहत चक्र में हैं। क्योंकि इस स्थान से उत्पन्न होने वाली ध्वनि है त्रिगुणमय ॐ एवं सदाशिव।’ यह चक्र विशेष महत्त्ववान है। पंचमहाभूतों में यह चक्र ‘वायु’ तत्त्व का मुख्य स्थान है। वायु तत्त्व की तन्मात्रा ‘स्पर्श’ है, अत: ‘स्पर्श’ इस चक्र का प्रधान गुण/ज्ञान है।

इसी कारण इस चक्र की ज्ञानेन्द्रिय त्वचा और कर्मेन्द्रिय हाथ हैं । नाक व मुख से प्रवेश कर समस्त शरीर में विचरने वाली एवं जीवन के लिए परमावश्यक प्राणवायु का यह चक्र मुख्य स्थान है। इस चक्र का लोक ‘मर्ह’ या ‘महत्’ है जो अन्त:करण का मुख्य स्थान है। इस चक्र के अधिपति देवता ईशान रुद्र हैं जो अपनी त्रिनेत्रा चतुर्भुजा शक्ति काकिनी’ के साथ हैं। अतः इस चक्र की शक्ति ‘काकिनी’ हैं। इस चक्र का यन्त्र रूप षट्कोणाकार यह चक्र सिंदूरी रंग से प्रकाशित बारह दलों/पंखुड़ियों से युक्त हैं जिन पर स्थित कं, खं, गं, घं, डं, चं, छं, जं, झं, जं, टं तथा ठं। ये बारह वर्ण (अक्षर) कमल दल की ध्वनियों को दर्शाते हैं। इस चक्र का तत्त्व बीज ‘यं’ इसकी बीज ध्वनि का परिचायक है। इसका बीज वाहन मृग है जो इस चक्र की तिरछी बीज गति को स्पष्ट करता है। इस चक्र पर ध्यान के समय अंगूठे और तर्जनी उंगली के सिरों को परस्पर दबाया जाता है। इससे मन स्थिर होता है और उसकी मृग जैसी चंचलता रुकती है। वायु का स्वभाव विश्रामहीनता/हर समय गति करते रहना है।

तदनुसार इस चक्र का यन्त्र व तत्त्व रूप षट्कोण हर दिशा में गति को दर्शाता है। इस षटकोण में एक अधोमुखी तथा एक ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण सम्मिलित है जो क्रमशः शक्ति व शैव-मान्यताओं का प्रतीक होने से दोनों का समन्वय (अर्धनारीश्वर) प्रदर्शित भी करता है। साथ ही ऊपर के तीन लोकों व चक्रों और नीचे के तीन लोकों व चक्रों का संतुलन व सामंजस्य भी इंगित करता है जो इस चक्र के प्रधान गुणों में से एक है। चंचलता, भटकाव, चेष्टा, लोभ, आशा, निराशा, चिंता, कपट, अविवेक, अनुताप, भ्रम (मरीचिका), वितर्क, सक्रियता, दृढ़ता, हठ, तृष्णा, सवंदेनशीलता, उत्साह आदि गुणावगुण इस चक्र की विशेषता हैं।

परकाया प्रवेश तथा वायु गमन इसी चक्र के प्रताप से सम्भव हो पाता है। ज्ञान, दक्षता, वाक्पटुता, समर्थता, निपुणता, शास्त्रों का मर्म समझना, काव्यामृत के रसास्वादन में प्रवीणता आदि इसी चक्र पर ध्यान लगाने से प्राप्त होते हैं। इस चक्र के बीज मन्त्र ‘यं’ का पुनरावृत्ति के साथ शुद्ध रूप से उच्चारण हृदय को तरंगित कर वहां के समस्त अवरोध दूर करता है, जिससे शक्ति का प्रवाह निर्बाध गति से ऊपर की ओर होने लगता है परिणाम स्वरूप परम प्रभु की आह्लादिनी शक्ति से साधक का साक्षात्कार होता है और उसे सब ओर आनन्द की ही प्रतीति होने लगती है। श्वांसों और प्राणों पर अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सिद्धियों का आरम्भ इस चक्र को जीतने से होने लगता है। समदर्शिता, स्थायित्व/नियंत्रण, प्रेम, सत्यता, निर्लोभता, दया, क्षमा, करुणा, विवेकशीलता, अहिंसकता आदि गुणों का उदय इस चक्र के शुभ प्रभावों के अन्तर्गत ही आता है।

इस अनाहत चक्र में एक लिंग का होना भी माना गया है, जिसे ‘बाणलिंग’ कहते हैं। इसके ऊपर अति सूक्ष्म छिद्र में हृत्पुण्डरीक कमल का निवास बताया गया है, जहां योगी जन अपने आराध्य देवता का ध्यान करते हैं। गहन प्रेम की स्थिति में योगमार्ग को जाने बिना ही (प्रेमयोग के माध्यम से) अनजाने में प्रेमी इस कमल तक पहुंच जाता है और अपनी प्रेयसी को इस कमल में उसी प्रकार बसा लेता है, जैसे हनुमानजी के हृदयकमल में श्रीराम बसे रहते हैं। तभी तो कोई शायर अनजाने में ही यह पते की बात कह गया है- तस्वीर-ए-यार हमने अपने दिल में बसा रखी है। जब जी में आया, जरा गर्दन झुकाई, देख लिया। शुद्ध प्रेम की स्थिति में प्रेमी अर्धयोगी हो जाता है, इसमें दो राय नहीं है।

क्योंकि योग के प्रधान गुणों व लक्षणों में से एक-तन्मयता/एकाग्रता/ स्वविस्मृति- कन्सन्ट्रेशन उसमें सहज ही आ जाता है। यही गुण एक उच्च कोटि के कलाकार, कवि, लेखक, दार्शनिक, वैज्ञानिक या संगीतकार में भी होता है। अत: मेरी दृष्टि में वे सभी पथभ्रष्ट/दिशाभ्रष्ट योगी होते हैं, बहरहाल। लगे हाथ इस चक्र के बीजवाहन मृग का भी विवेचन करते चलें। चंचलता, तिरछी गति, किसी भी ओर सशंक दौड़ जाना, मृग तृष्णा/मृग मारीचिका, अस्थिरता, विश्रामहीनता, सतर्कता, जागरूकता, उत्साह, संवदेनशीलता और प्रसन्नता में कुलांचें भरना आदि समस्त गुण मृग में विद्यमान हैं जो इस चक्र से सम्बन्धित हैं। अतः इसका बीज वाहन मृग सर्वथा सार्थक है।

 

अनाहत चक्र बीज मंत्र 

इस चक्र के बीज मन्त्र ‘यं’ का पुनरावृत्ति के साथ शुद्ध रूप से उच्चारण हृदय को तरंगित कर वहां के समस्त अवरोध दूर करता है, जिससे शक्ति का प्रवाह निर्बाध गति से ऊपर की ओर होने लगता है परिणाम स्वरूप परम प्रभु की आह्लादिनी शक्ति से साधक का साक्षात्कार होता है और उसे सब ओर आनन्द की ही प्रतीति होने लगती है। श्वांसों और प्राणों पर अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार सिद्धियों का आरम्भ इस चक्र को जीतने से होने लगता है। समदर्शिता, स्थायित्व/नियंत्रण, प्रेम, सत्यता, निर्लोभता, दया, क्षमा, करुणा, विवेकशीलता, अहिंसकता आदि गुणों का उदय इस चक्र के शुभ प्रभावों के अन्तर्गत ही आता है।

अनाहत चक्र  के लाभ

इस चक्र की साधना करने पर साधक के अंदर समदर्शिता, स्थायित्व/नियंत्रण, प्रेम, सत्यता, निर्लोभता, दया, क्षमा, करुणा, विवेकशीलता, अहिंसकता आदि गुणों का उदय इस चक्र के शुभ प्रभावों के अन्तर्गत ही आता है।  परकाया प्रवेश तथा वायु गमन इसी चक्र के प्रताप से सम्भव हो पाता है। ज्ञान, दक्षता, वाक्पटुता, समर्थता, निपुणता, शास्त्रों का मर्म समझना, काव्यामृत के रसास्वादन में प्रवीणता आदि इसी चक्र पर ध्यान लगाने से प्राप्त होते हैं 

अनाहत चक्र जागरण लक्षण
जब यह चक्र जागृत होता है साधक के भीतर बहुत सरे परवर्तन होती है जैसे साधक के सुभाव में मधुरता आने लगती है क्रोध की जगह ख़तम हो जाती है प्रेम, सत्यता, निर्लोभता, दया, क्षमा, करुणा, विवेकशीलता, अहिंसकता आदि गुणों का उदय महसूस होगा  है।
अनाहत चक्र के अधिपति देवता
इस चक्र के अधिपति देवता ईशान रुद्र हैं जो अपनी त्रिनेत्रा चतुर्भुजा शक्ति काकिनी’ के साथ हैं। अतः इस चक्र की शक्ति ‘काकिनी’ हैं।
अनाहत चक्रका रंग 

इस चक्र का यन्त्र रूप षट्कोणाकार यह चक्र सिंदूरी रंग से प्रकाशित बारह दलों/पंखुड़ियों से युक्त हैं जिन पर स्थित कं, खं, गं, घं, डं, चं, छं, जं, झं, जं, टं तथा ठं। ये बारह वर्ण (अक्षर) कमल दल की ध्वनियों को दर्शाते हैं।

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मणिपूर चक्र सम्पूर्ण जानकारी और रहस्य Manipura Chakra ph. 85280 57364 

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मणिपूर चक्र सम्पूर्ण जानकारी और रहस्य Manipura Chakra ph. 85280 57364 मणिपूरक चक्र इसे मणिपुर चक्र भी कहा गया है। यह भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। नाभि मूल में इसका स्थान है। अतः पवन संस्थान व शौर्य संस्थान से इसका सीधा सम्बन्ध है। व्यक्ति के अहं, प्रभुत्व व धाक जमाने की भावना, नाम कमाने की इच्छा, सर्वश्रेष्ठ बनने की ललक तथा शक्ति अर्जन के प्रयास इसी चक्र के प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। ऊपर मणिपूरक चक्र इसके अलावा संघर्ष, प्रायश्चित्त, नि:स्वार्थ सेवा, धर्म, सत्संग या कुसंग (संगति), निष्ठा, दृढ़ता आदि भी इसी चक्र से प्रभावित होते हैं। संगति का अर्थ है-संग-संग 33या साथ-साथ गति करना।

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  • मणिपुर चक्र Manipura Chakra विचार
  • मणिपुर चक्र  Manipura Chakra में किस तत्व वास है 
 

अत: संगति सदैव संतुलन उत्पन्न करने वाली होती है। यह विषमता को समाप्त कर समता को उत्पन्न करती है। अत: कर्म व धर्म में संतुलन उत्पन्न करना इसी चक्र के प्रताप से सम्भव होता है। प्रकृति व धर्म का संतुलन जब स्वभाव व कर्म से हो जाता है, तो साधक नैसर्गिक लोक में पदार्पण कर सकता है। अतः मणिपूरक चक्र अध्यात्म का प्रवेश द्वार कहा जा सकता है। नाभि शरीर का केन्द्र है। गर्भावस्था में नाभि द्वारा ही शिशु का पोषण व विकास होता है। नाभि से ही भ्रूण विकसित होता है। गुरुत्वाकर्षण बल के प्रति संतुलन बनाने का कार्य नाभि ही करती है। आघात पहुंचने या असंतुलित हो जाने से नाभि उतर जाती है। ऊपरी शरीर व निचले शरीर का संतुलन नाभि पर ही रहता है।

रॉकेट को जिस प्रकार अंतरिक्ष में जाते समय गुरुत्वाकर्षण सीमा का अतिक्रमण करते समय विशिष्ट बल की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति को भी ऊपरी चक्रों पर जाने के लिए मणिपूरक चक्र का बेधन करने में विशेष बल लगाना पड़ता है। (इस विषय में आगे विस्तार से पढ़ेंगे)। इसलिए इसे आध्यात्मिक प्रवेश द्वार कहा गया है, इसीलिए नाभि में अमृतकुंड होना भी कहा जाता है। इसके अलावा योग में अत्यंत महत्त्वपूर्ण रुद्रग्रंथि का निवास भी यहीं है (चक्र प्रकरण के बाद इसकी चर्चा होगी)। अतः यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि संगति या संतुलन नाभि में ही स्थित होने से मणिपूरक चक्र के प्रभाव में आता है। मणिपूरक चक्र से प्रभावित मनुष्य रात्रि में 6 से 8 घंटे सोने वाला होता है।

 

इस चक्र में ध्यान लगाने से स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्राप्ति होती है, अपने शरीर व ग्रन्थियों का भौतिक ज्ञान होता है तथा पाचन सम्बन्धी दोषों व विकारों का निवारण होता है तथा साधक में तेज उत्पन्न होता है। क्योंकि ‘अग्नि’ तत्त्व का यह चक्र प्रतिनिधित्व करता है। पंचमहाभूतों में ‘अग्नि’ का मुख्य आधार होने के कारण मणिपूर चक्र की ज्ञानेन्द्रिय नेत्र व कर्मेन्द्रिय पैर हैं। रूप या तेज इसका प्रधान गुण या ज्ञान है, जो अग्नितत्त्व की तन्मात्रा है।

खान-पान के रस को पूरे शरीर में समान रूप से वितरित करने वाला समान वायु है, जिसका इस चक्र में मुख्य निवास है। यह चक्र त्रिकोणाकार है। जो रक्तवर्ण का है। नीले हरे रंग से प्रकाशित दस कमलदलों (पंखुड़ियों) से यह घिरा हुआ है। इन पंखुड़ियों पर डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, वं, फं वर्ण (अक्षर) हैं जो इस चक्र की कमल दल ध्वनियों के सूचक हैं। इसकी बीज ध्वनि ‘रं’ हैं, क्योंकि ‘रं’ इसका तत्त्व बीज है। इस चक्र की बीज गति मेष/मेढ़े के समान उछलकर चलने की है अत: मेढ़ा इस चक्र का बीज वाहन है। (अग्नि का वाहन भी मेढ़ा कहा गया है और अग्नि का बीज मंत्र भी ‘रं’ ही होता है)। अग्नि तत्त्व और समानवायु का यह मुख्य स्थान है। इस चक्र का लोक स्वः है। इसका यन्त्ररूप अधोमुखी त्रिकोण है, जो लाल रंग का है। इसका बीज वर्ण स्वर्णिम रक्त है।

इस चक्र के अधिपति देवता रुद्र शिव हैं, जो अपनी चर्तुभुजा शक्ति ‘लाकिनी’ के साथ हैं। इस चक्र पर ध्यान लगाते समय प्रयुक्त होने वाली कर मुद्रा में मध्यमा उंगली व अंगूठे के सिरों को परस्पर दबाया जाता है। मध्यमा व अंगूठे के सिरों को दबाने से शरीर में उष्मा उत्पन्न होती है। इसके बीज मंत्र ‘रं’ की यदि शुद्धोच्चारण के साथ बारम्बार पुनरावृत्ति की जाती है तो उस ध्वनि की तरंगों के प्रभाव से रस को आत्मसात् करने की शक्ति व पाचन शक्ति बढ़ती है क्योंकि इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है। इसके अलावा ऊर्जा भी बढ़ती है जो आयु व सामर्थ्य को बढ़ाती है। प्रायः मणिपूरक चक्र से प्रभावित व्यक्ति क्रोधी होते हैं क्योंकि अग्नि का स्वभाव ही ऊष्ण है।

यही कारण है कि कई स्थानों पर इसे ‘सूर्य चक्र’ भी कहा गया है। इस चक्र का बीज वाहन मेढ़ा सर्वथा उपयुक्त है। क्योंकि मेढ़ा स्वाभिमानी, बलवान, अहं में चूर और रणोन्मत्त होता है। यह उछलकर सीधा सिर से आक्रमण करता है और मेढ़ा अग्नि का वाहन भी है। जोश और अहं मेढ़े में शक्ति के साथ मौजूद होता है। यद्यपि यही गुण वृषभ या सांड में भी है, किन्तु उसमें वह फुर्ती और उछलकर चलने/लड़ने का स्वभाव नहीं है जो इस चक्र की बीजगति को इंगित कर सके अत: इसका बीज-वाहन मेढ़ा सर्वथा उचित ही है। प्रायः अग्नि का सूचक लाल रंग माना गया है। यहां मणिपूरक चक्र के कमल दलों का रंग नीला कहा गया है। (यद्यपि यन्त्र रूप त्रिकोण लाल रंग वाला ही है।)

यहां पाठकों को एक विरोधाभास प्रतीत हो सकता है, क्योंकि नीला व लाल परस्पर विरोधी रंग हैं और अग्नि का पर्याय मुख्यतः लाल रंग माना गया है। अतः पाठकों को यह स्पष्ट करना ज़रूरी समझता हूं कि अग्नि का रंग वास्तव में नीला है। कभी भी अग्नि को ध्यान से देखें (माचिस या मोमबत्ती की लौ को ही सही), मध्य में नीला फिर काला सा सिलेटी, फिर लाल, संतरी और पीला रंग क्रमश: बाहर की ओर दिखाई देते हैं।

यह रंग भेद अग्नि की जिह्वाओं तथा उसकी ऊष्णता के स्तर को ही दिखाते हैं। जैसा कि पुराणों व उपनिषदों में अग्नि की सात जिह्वाओं/लपटों का वर्णन भी है- काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सधूम्रवर्णा। स्फुलिंगिनी विश्वरुचि च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वा ॥ –(मुण्डकोपनिषद्) अर्थात्-काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी एवं विश्वरुचि-अग्निदेव की ये 7 जिह्वाएं हैं। इससे सिद्ध होता है कि अग्नि का लाल रंग उसकी सुलोहिता नामक जिह्वा और स्लेटी काला रंग उसकी धूम्रवर्णा नाम की जिह्वा के कारण है। पीला रंग तो तेज, ऊष्णता व प्रकाश के कारण है किन्तु अग्नि का रंग वैसे नीला ही है क्योंकि मूल में सदा नीली आभा विद्यमान रहती है।

यहां पाठक सूर्य और शुक्र के सम्बन्ध में वैज्ञानिक अन्वेषणों के निष्कर्ष भी देखें। सूर्य लाल है जो तीव्र प्रकाश की अवस्था में पीला मालूम होता है। जबकि शुक्र का रंग नीला है। वैज्ञानिक अन्वेषणों के आधार पर हम जानते हैं कि शुक्र सूर्य. से कई हज़ार गुना अधिक गरम है और वैज्ञानिकों ने उसके धरातल की भीषण व प्रचण्ड गरमी के आधार पर उसे ‘जीता जागता नरक’ कहा है। (इस विशेषता के आधार पर इस तथ्य को भी कसिए कि शुक्र को दानवों का गुरु कहा गया है।) मणिपूरक चक्र की विशेष साधना-निर्मोहता, शांति, वैराग्य, समता, तन्मयता, आनन्द, धृति, निश्चलता तथा उदासीनता (न्यूट्रल होना/निर्लिप्त होना) को बढ़ाने वाली कही गई है। मणिपूर चक्र का सम्बन्धित लोक ‘स्वः’ यानि स्वर्गलोक है जो अन्य ऊपर के लोकों में सबसे निचला है अतः इसको आध्यात्मिक प्रवेशद्वार कहना ठीक ही है।

 

मणिपुर चक्र Manipura Chakra  के देवता

स चक्र के अधिपति देवता रुद्र शिव हैं, जो अपनी चर्तुभुजा शक्ति ‘लाकिनी’ के साथ हैं। इस चक्र पर ध्यान लगाते समय प्रयुक्त होने वाली कर मुद्रा में मध्यमा उंगली व अंगूठे के सिरों को परस्पर दबाया जाता है। मध्यमा व अंगूठे के सिरों को दबाने से शरीर में उष्मा उत्पन्न होती है।

मणिपुर चक्र Manipura Chakra विचार

इस चक्र में ध्यान लगाने से स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्राप्ति होती है, अपने शरीर व ग्रन्थियों का भौतिक ज्ञान होता है तथा पाचन सम्बन्धी दोषों व विकारों का निवारण होता है तथा साधक में तेज उत्पन्न होता है। क्योंकि ‘अग्नि’ तत्त्व का यह चक्र प्रतिनिधित्व करता है। पंचमहाभूतों में ‘अग्नि’ का मुख्य आधार होने के कारण मणिपूर चक्र की ज्ञानेन्द्रिय नेत्र व कर्मेन्द्रिय पैर हैं। रूप या तेज इसका प्रधान गुण या ज्ञान है, जो अग्नितत्त्व की तन्मात्रा है।
 

मणिपुर चक्र  Manipura Chakra में किस तत्व वास है 

इस चक्र में ध्यान लगाने से स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्राप्ति होती है, अपने शरीर व ग्रन्थियों का भौतिक ज्ञान होता है तथा पाचन सम्बन्धी दोषों व विकारों का निवारण होता है तथा साधक में तेज उत्पन्न होता है। क्योंकि ‘अग्नि’ तत्त्व का यह चक्र प्रतिनिधित्व करता है। पंचमहाभूतों में ‘अग्नि’ का मुख्य आधार होने के कारण मणिपूर चक्र की ज्ञानेन्द्रिय नेत्र व कर्मेन्द्रिय पैर हैं। रूप या तेज इसका प्रधान गुण या ज्ञान है, जो अग्नितत्त्व की तन्मात्रा है।

मणिपुर चक्र Manipura Chakra का मंत्र 

इसके बीज मंत्र ‘रं’ की यदि शुद्धोच्चारण के साथ बारम्बार पुनरावृत्ति की जाती है तो उस ध्वनि की तरंगों के प्रभाव से रस को आत्मसात् करने की शक्ति व पाचन शक्ति बढ़ती है क्योंकि इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है। इसके अलावा ऊर्जा भी बढ़ती है जो आयु व सामर्थ्य को बढ़ाती है। प्रायः मणिपूरक चक्र से प्रभावित व्यक्ति क्रोधी होते हैं क्योंकि अग्नि का स्वभाव ही ऊष्ण है।

मणिपुर चक्र Manipura Chakra के लाभ

इस चक्र में ध्यान लगाने से स्वास्थ्य व दीर्घायु की प्राप्ति होती है, अपने शरीर व ग्रन्थियों का भौतिक ज्ञान होता है तथा पाचन सम्बन्धी दोषों व विकारों का निवारण होता है तथा साधक में तेज उत्पन्न होता है।

मणिपुर चक्र Manipura Chakra का रंग

मणिपूरक चक्र के कमल दलों का रंग नीला कहा गया है। (यद्यपि यन्त्र रूप त्रिकोण लाल रंग वाला ही है।)
यहां पाठकों को एक विरोधाभास प्रतीत हो सकता है, क्योंकि नीला व लाल परस्पर विरोधी रंग हैं और अग्नि का पर्याय मुख्यतः लाल रंग माना गया है। अतः पाठकों को यह स्पष्ट करना ज़रूरी समझता हूं कि अग्नि का रंग वास्तव में नीला है। कभी भी अग्नि को ध्यान से देखें (माचिस या मोमबत्ती की लौ को ही सही), मध्य में नीला फिर काला सा सिलेटी, फिर लाल, संतरी और पीला रंग क्रमश: बाहर की ओर दिखाई देते हैं।

स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी – Swadhisthana Chakra Complete information

स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी - Swadhisthana Chakra Completeinformation

स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी – Swadhisthana Chakra Completeinformation

स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी - Swadhisthana Chakra Completeinformation
स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी – Swadhisthana Chakra Completeinformation

स्वाधिष्ठान चक्र सम्पूर्ण जानकारी – Swadhisthana Chakra Complete information स्वाधिष्ठान चक्र कुण्डलिनी की रहस्यमयी और विलक्षण यात्रा का दूसरा पड़ाव, मानव शरीर में स्थित दूसरा प्रमुख चक्र स्वाधिष्ठान है। जननेन्द्रिय के ऊपर तथा नाभि के नीचे ‘पेडू’ में यह चक्र अवस्थित है। यह पुरुषों के वीर्य व स्त्रियों में रज का स्थान कहा जाता है। पंच महाभूतों में यह ‘जल’ तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। अर्थात् जल गति लं भ Alle यं म नीचे स्वाधिष्ठान चक्र तत्त्व का यह मुख्य स्थान है। जल तत्त्व का प्रतिनिधि होने के कारण इसका प्रधान ज्ञान या गुण ‘रस’ है (जो जल तत्त्व की तन्मात्रा है)। इसलिए इसकी ज्ञानेन्द्रिय रसना/जिह्वा और कर्मेंद्रिय लिंग व योनि (जननांग) हैं।

  • स्वाधिष्ठान चक्रजागरण
  • स्वाधिष्ठान चक्र के लिए रत्न
  • स्वाधिष्ठान चक्रके कार्य
  • स्वाधिष्ठान चक्रकी बीमारी
  • स्वाधिष्ठान चक्र कैसे जागृत करें

इसका रूप चन्द्राकार है। जो सफेद रंग का है। इसके यन्त्र का रूप अर्धचन्द्र युक्त वृत्ताकार है जो श्वेत है। रक्ताभ हिंगुल वर्ण (सिंदूरी रंग) से प्रकाशित छः पंखुड़ियों या दलों से यह युक्त है। इन दलों के अक्षर बं, भं, मं, यं, रं और लं हैं। यही इसकी कमल दल ध्वनि है। इस चक्र की बीज ध्वनि वं है। क्योंकि वं इसका तत्त्व बीज है। इस चक्र का बीज वाहन मकर है, जो इसके तत्त्व बीज की गति को दर्शाता है, यानि मगरमच्छ द्वारा लगाई जाने वाली डुबकी की भांति नीचे की ओर। इसका बीज वर्ण स्वर्णिम श्वेत है जल के समान प्रांजल। भुवः’ लोक इस चक्र का लोक कहा गया है। पूर्ण शरीर में फैलकर गति करने वाले व्यान वायु का यह मुख्य स्थान है। इस चक्र के अधिपति देवता विष्णु हैं जो अपनी चतुर्भुज ‘राकिनी’ के साथ हैं। इससे चक्र की शक्ति का ‘राकिनी’ होना भी सिद्ध होता है। स्वाधिष्ठान चक्र पर ध्यान लगाते समय प्रयुक्त की जाने वाली कर मुद्रा में अंगूठे व अनामिका के सिरों को परस्पर दबाया जाता है।

जिस प्रकार चैतन्यता का प्रभाव मूलाधार चक्र के ध्यान से उत्पन्न होता है उसी प्रकार ध्यान द्वारा स्वाधिष्ठान चक्र का अतिक्रमण कर लेने से प्रसन्नता से चैतन्यता ओत-प्रोत हो जाती है। साधक में प्रफुल्लता आती है। जल तत्त्व का प्रतिनिधि होने से कल्पनाशीलता इस चक्र का प्रधान भौतिक प्रभाव है। इस चक्र के बिगड़ने से ‘जलोदर’ आदि रोग सम्भावित होते हैं। वैसे प्रायः इस चक्र से प्रभावित व्यक्ति घुटनों में सिर देकर आठ से दस घंटे रात्रि में सोता है। माना जाता है कि 8 से 14 वर्ष तक की आयु में मनुष्य स्वाधिष्ठान चक्र के विशेष प्रभाव में रहता है। 

उद्विग्नता, उलझन, कल्पना की उड़ान तथा कुटुम्बियों व मित्रों से बनाए जाने वाले भौतिक सम्बन्ध इसी चक्र के प्रभाव से होते हैं। इच्छाओं व कल्पनाओं के साथ बाह्य व आन्तरिक जगत से तालमेल बिठाने के प्रयास में मानव के व्यक्तित्त्व का विकास होता है, जो इसी चक्र के प्रभाव क्षेत्र में आता है। इस चक्र की साधना बल, सामर्थ्य, विवेक, धैर्य तथा दृढ़ता व विश्वास को बढ़ाने वाली कही गई है। इसके तत्त्व बीज ‘वं’ की शुद्धतापूर्वक उच्चारित की गई आवृत्ति मानव शरीर के निम्न भागों के अवरोध हटाकर वहां शक्ति को प्रवाहित करती है।

कल्पना शक्ति को साधकर कला आदि में उसका बेहतर उपयोग किया जा सकता है। यह एक महत्त्वपूर्ण चक्र है। जैसा कि नाम से भी स्पष्ट है-‘स्व’ का अधिष्ठान करने वाला यानि-स्वाधिष्ठान। प्रजनन, कल्पना, मनोरंजन, प्रसन्नता, डाह, ईर्ष्या, दया शून्यता, द्वेष, उद्विग्नता, बेचैनी आदि गुणावगुण इसी चक्र से प्रभावित होते हैं। जल तत्त्व व चन्द्र से सम्बन्धित होने के कारण, भावुकता, चंचलता आदि मन के विशिष्ट गुण इसी चक्र के प्रभाव में आते हैं। 

इस चक्र के तत्त्व बीज की गति को दर्शाने के लिए वाहन रूप में मकर का प्रयोग भी उचित व तर्कपूर्ण है। मकर को डुबकी मार कर नीचे जाने के 31स्वभाव से न केवल बीजगति का संकेत मिलता है अपितु मकर की चालाकी (शिकार के समय), उसका तैरना (मनोरंजन) उसकी प्रबल काम शक्ति (प्रजनन सामर्थ्य तथा मन का वेग) और उसकी व्यावहारिकता जो जल और थल दोनों में रहने से सिद्ध होती है।

मगरमच्छ के आंसू बहाना’ मुहावरा ही मकर की चालाकी तथा व्यावहारिकता के गुण को सिद्ध करता है। जबकि मूलाधार का बीज वाहन हाथी (ऐरावत, जिसकी 7 सूडें कही गई हैं) न केवल बीज गति से निर्बाध सामने की ओर जाने को सूचित करता है बल्कि बल, बुद्धि, चैतन्यता, भोजन, सुरक्षा, अपने में ही मस्त रहना, इच्छा

तथा इच्छाओं में मन के भटकाव का भी द्योतक है। महत्त्वाकांक्षाओं को भी प्रकट करता है। अंकुश द्वारा हाथी को वश में करने के समान इच्छाओं के बलवान हाथी को बुद्धि के अंकुश द्वारा वश में करने की प्रेरणा देते गणेश अपने अंकुश सहित मूलाधार के अधिकारी व निवासी देवता बताए ही गए हैं। 

यद्यपि मकर व हाथी के स्वभाव व विशेषताओं की चर्चा यहां पर आवश्यक नहीं थी, तो भी पाठकों को चाहिए कि स्वबुद्धि के प्रयोग से सामने आने वाले तथ्यों को तोलते भी रहें, ताकि विषय पर उनकी मन से आस्था बने और विश्वास उत्पन्न हो सके। इसके अतिरिक्त विषय की महत्ता व गूढ़ता के रहस्य समझे जा सकें।

 अतः पूर्ण व विस्तृत चर्चा के लिए स्थान न होते हुए भी, कहीं-कहीं जहां अत्यंत आवश्यकता महसूस कर रहा हूं, अथवा जिस मुद्दे पर की गई चर्चा विषय को सुगम्य बनाने में सहायक हो सकती है, वहां-वहां विषय प्रवाह में हल्का-सा अवरोध दोष उत्पन्न होने के बावजूद ऐसा तुलनात्मक विवरण यथा सामर्थ्य इसी उद्देश्य से दे रहा हूं, कि पाठक सुनें और गुनें। स्वयं भी अपनी तुला पर तोलें। 32 कुण्डलिनी शक्ति कैसे जागृत करें

विशेष जानकारी

स्वाधिष्ठान चक्र Swadhisthana Chakra  के लिए रत्न – स्वाधिष्ठान चक्र को सिद्ध करने के लिए  या  बेलेन्स रखने के लिए   किसी भी रत्न  की जरूरत नहीं है !

स्वाधिष्ठान चक्र  Swadhisthana Chakra को कैसे ठीक करें–   इस चक्र के अभ्यास करने से इसे  ठीक कर सकते है ! ध्यान भी इस का अच्छा माध्यम हो सकता है

स्वाधिष्ठान चक्र Swadhisthana Chakra  की बीमारी –  इस चक्र के ब्लॉक होने से या इस चक्र  का संतुलन बिगड़ने से आप को मानसिक बीमारयां जायदा लगती है

स्वाधिष्ठान चक्र  Swadhisthana Chakra  जागरण – यह  चक्र को जागृत करने के लिए कठिन अभ्यास की जरूरत होती है !

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