Year: 2022

Tilasmi paryog ख़्वाजा तिलस्मी प्रयोग से त्रिकाल ज्ञान ph. 8528057364

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Tilasmi paryog ख़्वाजा तिलस्मी प्रयोग से त्रिकाल ज्ञान ph. 8528057364 इस साधना से भूत भविष्य जान सकते है यह सुलेमानी प्रयोग है। 

हाजिरात का ख्वाजा मन्त्र  – “ख्वाजा खित्र जिन्द पीर मैदर मादर दस्तगीर मदत मेरा पीरान पीर करो घोड़े पर भीड़ चढ़ो हजरत पीर हाजर सो हाजर ।”

Tilasmi paryog ख़्वाजा तिलस्मी प्रयोग विधि

Tilasmi paryog ख़्वाजा तिलस्मी प्रयोग विधि- किसी भी शुक्रवार से मन्त्र को नित्य १०८ की संख्या में उल्टी आरम्भ करके २१ दिन तक इस माला पर जपें लौंग, इलायची और लोबान की धूप देने रहें। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध हो जाता है। प्रयोग के समय सुबह बजे एक छोटे बच्चे को स्नानादि से पवित कर स्वच्छ वस्त्र पहना कर एक लकड़ी के पट्टे पर बैठायें तथा उसके दायें अंगूठे के नाखून पर काली स्याही (काजल) लगा दें और उसमें मुंह देखने को कहें तथा स्वयं आगे बैठकर उक्त मन्त्र को पढ़ते हुए धूप देते रहें। लड़के को सबसे पहले मैदान दिखाई देगा। जब वह यह कहे कि मुझे मैदान दिखाई दे रहा है, तब आप उससे कहें कि मैदान की जगह चौगान दिखाई देने लगे। फिर लड़का जब चौगान दीखने की बावत कहे, तब आप कहें कि दो जने आओ।’ जब दो जने आजायें तब कहें कि ‘दो और आ जाओ ।’

जब दो और आजायें, तब कहें कि दो और भी जायें। इस प्रकार चार दफा करें। जब आठ आदमी आ जायें, तब कहें कि झार वाले को बुलाकर झाड़ू लगवाओ। जब झाड़ू लग जाये तब कहें कि ‘भिश्ती को बुला कर छिड़काव कराओ।’ जब छिड़काव हो जाये तब कहें कि फर्म बिछवानो’ जब फर्श बिछ जायें, तब कहें कि ‘दो कुर्सी और तस्त मँगाओ ।’ तख्त तथा कुर्सी आ जाने पर कहें कि गद्दी बिछवाओ, गट्टी बिछ जाने पर कहें कि ‘पीर साहब को जाकर हमारी ओर से अर्ज करें कि आपका फलां खादिम आपको याद कर रहा है, इसलिए मेहरबानी करके मुशी साहब को साथ लेकर यहाँ तशरीफ लायें।’

जब मुंशी साहब तथा पीर साहब आ जायें तब मुंशी से कहें कि वह भोग को पीर साहब की न करें यह कहकर भोग, इलायची, इन इन सबको दें। फिर मुंशी से कहें कि पीरान पीर साहब से हमारी अर्ज करें कि आपका फलां खादिम फलां काम के बारे में पूछ रहा है।’ यह कहकर अपना काम बतायें तो लड़के द्वारा उसका जबाब मिलेगा। यदि लड़का उत्तर को समझ जाय तो ठीक कहे, न समझ सके तो मुशी से कहे कि मैं नहीं समझा. इसलिए मुझे फलां भाषा में चिखकर उ.म.शी. उसी भाषा में लिखकर दिखा देगा । हो, वह पूछ लेना चाहिए। इस विधि से जी कुछ पूछ सकते   है 

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प्राचीन प्रत्यंगिरा साधना Pratyangira Sadhana Ph.85280 57364

 

 

प्राचीन प्रत्यंगिरा साधना Pratyangira Sadhana Ph.85280 57364 अपने शत्रुओं को इससे तीक्ष्य शान्त के द्वारा .. प्रत्यंगिरा Pratyangira प्रयोगआज जीवन एक कुरुक्षेत्र बन कर रह गया है। “कुरुक्षेत्र” शब्द से उस स्थान को परिभाषित किया जा सकता है जहां द्वन्द्व है। द्वन्द्व वहां होता है, जहां दो में विषम भाव परिलक्षित होता है

और यह विषम भाव ही तो कारण होता है तनावग्रस्त बने रहने का। दोनों पक्ष (वादी और प्रतिवादी) तनाव ग्रस्त रहते ही हैं, क्योंकि दोनों अपने-अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में लगे हुए हैं, यही कारण है कि संसार में कोई भी ऐसा नहीं, जो तनाव मुक्त हो. स्वार्थ एक ऐसा दलदल है, जिसमें से निकल पाना कठिन है, जितना उसमें से बाहर निकलने का प्रयत्न करते हैं.

उतना ही और धंसते बले जाते हैं ऐसे घुटन भरे जीवन का क्या अर्थ, जहां सुख-चैन से दो घड़ी सांस भी न ले सकते हो। जब तक मानव-मन स्वार्थ प्रेरित एवं तनाव ग्रस्त रहेगा, तब तक वह हर स्थान कुरुक्षेत्र ही कहा जायेगा, जहां ऐसे लोग रहते हैं, अतः जब तक स्वार्थ भाव समाप्त नहीं होगा, तब तक यों ही चलता रहेगा कौरवो पांडवों के मध्य का यह युद्ध जिसकी ओट में छिपा है- ‘अन्धकार’ और ‘मृत्यु’ ।

– क्या तनावग्रस्त बने रहना ही जीवन का प्रयोजन है? जीवन का प्रयोजन तो कुछ और है पर हम अपने बनाये हुए कुरुक्षेत्र में ही फंस कर रह गये हैं और भ्रमित हो गये हैं अपने लक्ष्य से। * जीवन इतना सुलभ नहीं है, जितना आप समझ बैठे हैं जब तक आप अपने मन से दुर्भावनाओं से बनी गांठें नहीं निकाल पायेंगे, तब तक शांति और तृप्ति कैसे मिल सकती है.

असल जब त शत्रुता का नहीं हो द्वेष, वैम क्रोध समाप तब तक यह कुर नहीं हो सकता. की साधना द्वारा करना सम्भव है. की तेजोमय ज्व शत्रुओं क में तो दुर्भावनाएं ही हमारी शत्रु है, जो हमारे भीतर शत्रुता के भाव को जन्म देती हैं, कि मैं जो करता हूँ, ठीक करता हूँ, मैं जो कहता हूँ, ठीक कहता हूँ, मैं सच्चा हूँ, सामने वाला झूठा है इन अवगुणों को मानव देखते हुए भी नहीं देख पाता और अपने आप को सदाचारी, सद्व्यवहारी, सद्गुणकारी समझ बैठता है, फलस्वरूप जीवन कुरुक्षेत्र का मैदान बन जाता है।

आज जिधर भी दृष्टि जाती है उधर द्वेष की चिनगारियां बिखरी हुई हैं, आखिर कब वह समय आयेगा जब मानव अपने मन से दुर्भावनाओं को निकाल सकेगा, क्योंकि जब ऐसा सम्भव होगा, तभी व्यक्ति सुखी हो और ऐसा तब सम्भव हो सकेगा, निर्द्वन्द्व हो सकेगा.सकेगा, जब वह अपने आप को सही रूप में पहिचान लेगा. कि यह क्या है?

मनुष्य उस शक्ति से अपरिचित है, जिसने उसका निर्माण किया है, तेजस्वी माता-पिता की संतान होकर भी वह भयभीत है. क्योंकि उसने मा का जन्मदायिनी स्वरूप ही देखा है। यह तो उसका एक स्वरूप है, दूसरा स्वरूप तो उसका शक्तिदायिनी स्वरूप है, जिसकी शक्ति से मानव अनभिज्ञ है। संसार में केवल मा ही ऐसी होती है, जिसे चुकारे जाने पर वह व्याकुल हो उठती है अपने शिशु को कलेजे से लगा लेने के लिए…

फिर वह बालक कितना हो दुराचारी क्यों न हो, दोगी क्यों न तक मन से का भाव समाप्त होगा, ईर्ष्या, मनस्य, घृणा, प्त नहीं होगा, कुरुक्षेत्र का युद्ध खत्म पर प्रत्यंगिरा देवी सिद्धि प्राप्त कर ऐसा क्योंकि प्रत्यंगिरा . ● वाला से जड़-मूल से का नाश होगा! हो उसे संकट से उबारने के लिए वह तत्क्षण प्रस्तुत हो ही जाती है, और ठीक एक अवोध शिशु की भांति आपको भी तो बस उस मां को पुकारना है और निश्चिन्त हो जाना है, क्योंकि परम शक्तिशालिनी मा अपने पुत्र को शक्तिवान बना ही देती है जीवन के कुरुक्षेत्र को जीतने के लिए।

मां की शक्ति को प्राप्त करने के लिए आपको सम्पन्न करना है “प्रत्यंगिरा प्रयोग” आगे का काम तो उसका है, आपको चिन्ता करने की जरूरत नहीं है और न ही भयभीत होने की आवश्यकता है, आपको तो देवी प्रत्यंगिरा का श्रद्धापूर्वक नाम लेना है. प्रत्यंगिरा आदिशक्ति का अत्यधिक स्वत तकारी स्वरूप है, जिसकी साधना तो फलदायी सिद्ध होती ही है। यो तो कोई भी शक्ति साधना विफल नहीं मानी जाती. किन्तु प्रत्यंगिरा प्रयोग का अपना विशेष महत्त्व है, जो बड़े से बड़े शत्रु को भी शांत कर देने वाली है, क्योंकि इसका है। उद्भव शिव की शक्ति शिवा से हुआ शिवा है ही कल्याणकारी, जो अपने भक्तो की विधि सुरक्षा करती है। प्रत्यंगिरा के साधक को न तो अपमृत्यु का भय रहता है, और न ही कोई आशंका ही व्याप्त होती है, क्योंकि यह प्रयोग साधक को हर प्रकार से सुरक्षित कर देता है।

जीवन में अक्सर धोखे होते रहते हैं. यदि आपको यह ज्ञात हो जाय कि अमुक शत्रु के कारण आपका जीवन कंटकाकीर्ण हो गया है, तो सुरक्षा का उपाय क्यों नहीं किया जाय, शत्रु की शक्ति को ही क्यों न इतना क्षीण बना दिया जाय कि वह मुंह की खाये।

मानव का शत्रु केवल मात्र प्रतिद्वन्द्वी मानव ही नहीं होता, अपितु कभी-कभी तो मानव के आन्तरिक कारण ही उसके शत्रु बन जाते हैं और ऐसी स्थिति में प्रत्यंगिरा जहां बाहरी शत्रुओं का विनाश करती है, साथ ही अन्दर निहित विकारों की उत्पत्ति से जन्मी शत्रुता के भाव को भी पूर्णतः समाप्त कर देती है, फलस्वरूप जहां यह प्रयोग भौतिक दृष्टि से लाभदायक है, वहीं आध्यात्मिक दृष्टि से भी फलदायी हैं, जो मन के विकारों को समाप्त कर, शुद्धता और निर्मलता प्रदान कर भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से उन्नति और सफलता प्रदान करता है।

प्रत्यंगिरा Pratyangira प्रयोग विधिः

 

प्रत्यंगिरा Pratyangira प्रयोग विधिः इस प्रयोग के लिए आवश्यक सामग्री है दिव्य मंत्रों से प्राण-प्रतिष्ठित “प्रत्यंगिरा Pratyangira  यंत्र”, “विभीतिका माला” एवं “शत्रुमर्दनी गुटिका” । इस प्रयोग को करने का विशेष दिन है १८.१२.६५ सोमवार इस प्रयोग को किसी भी माह की एकादशी को भी सम्पन्न किया जा सकता है। यह प्रयोग रात्रिकालीन है। साधक निश्चित समय पर पश्चिम दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठ जाये। सामने चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर किसी स्टील या तांबे की प्लेट पर कुंकुम से रंगे हुए चावल से अपने शत्रु विशेष का नाम अंकित करके यंत्र को स्थापित करें । .

गुटिका को भी यंत्र के सामने स्थापित करें, उसके बाद इन्द्र, वरुण, कुबेर और यम जो चार दिशाओं के अधिपति है, उनके निमित्त चार दीपक (सरसों के तेल के) जला लें। चारों देवताओं का अपनी पूर्ण मनोरथ सिद्धि के लिए कुंकुम, अक्षत, धूप व दीप से पूजन करें। ८. यंत्र और गुटिका पर कुंकुम और अक्षत चढ़ाकर पूजन करें तथा लाल रंग के पुष्पों को चढ़ायें। धूप व दीप लगातार जलते रहने चाहिये । या . इसके बाद यंत्र के सामने एक कटोरी रखें और उसमें निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए कुकुम से रंगे चावल को तब तक चढ़ाये, जब तक कि वह कटोरी पूर्णरूप से भर न जाय। मंत्र

।।ॐ प्रत्यंगिरायै स्वाहा ।।

फिर उन चावलों से यंत्र व दीपकों के चारों ओर घेरा डालें। इसके बाद हाथ में जल लेकर संकल्प करें और प्रत्यंगिरा देवी का ध्यान करते हुए अपनी मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करें, फिर जल को भूमि पर छोड़ दे । ।।

ॐ शत्रुदारिण्यै फट् । ।

का  मंत्र जप की समाप्ति के पश्चात् व मंत्र जप से पूर्व एक-एक माला गुरु मंत्र का जप अवश्य कर लें। शत्रुमर्दनी गुटिका को अपने आसन के नीचे दबा दें और यंत्र की ओर देखते हुए “विभीतिका माला” से निम्न मंत्र का १ माला जप करें- मंत्र जप समाप्ति के बाद गुरु आरती एवं जगदम्बा आरती करें।

यंत्र. गुटिका एवं माला को नदी या समुद्र में प्रवाहित कर दें और दोनों हाथ जोड़कर प्रत्यगिरा PRATYANGIRA को नमस्कार करें। पूजन में प्रयुक्त लाल अक्षत को किसी पीपल के पेड़ पर या मंदिर में चढ़ा आयें। एक दिन का यह प्रयोग साधक के जीवन के विरोधी उत तत्त्वों को समाप्त करने वाला अचूक अस्त्र है, जिससे जीवन की उन्नति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करने वाले शत्रुओं को के जड़मूल से नष्ट किया जा सकता है और भौतिकता के ओ साथ-साथ अध्यात्म के पथ पर भी अग्रसर हुआ जा सकता के है, इसलिए प्रत्येक गृहस्थ व्यक्ति को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष यह प्रयोग सम्पन्न कर अपने जीवन में सफलता प्राप्त के करनी ही चाहिए।

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kritya sadhana -प्राचीन तीक्ष्ण कृत्या kritya साधना ph. 85280 57364 कितना अद्भुत था कामाक्षा का तांत्रिक सम्मेलन इस सम्मेलन में मां कृपाली भैरवी, पिशाच सिद्धियों की स्वामिनी देवुल भैरवी, त्रिजटा अघोरी, बाया भैरवनाथ, पगला बाबा आदि विश्व विख्यात तांत्रिक आये हुए थे।

सभापति कौन बनेगा, इस बात पर सभी एकमत नहीं हो पा रहे थे, कि तभी त्रिजटा अघोरी ने अत्यन्त मेघ गर्जना के साथ परम पूज्य गुरुदेव का नाम प्रस्तावित किया और घोषणा की- “यही एक मात्र ऐसे व्यक्तित्व है, जो साधना के प्रत्येक क्षेत्र, चाहे यह तंत्र का हो या मंत्र का हो, कृत्या kritya साधना हो चाहे भैरव साधना हो या किसी भी तरह की कोई भी साधना हो, पूर्णतः सिद्धहस्त है।” भुर्भुआ बाबा ने भी इस बात का अनुमोदन किया।

जब सबने पूज्य गुरुदेव को देखा, तो उन्हें सहज में विश्वास नहीं हुआ, कि धोती-कुर्ता पहना हुआ यह व्यक्ति क्या वास्तव में इतने अधिक शक्तियों का स्वामी है। इसी भ्रमवश कपाली बाबा ने गुरुदेव को चुनौती दे दी। कपाली बाबा ने कहा- “तुम्हारा अस्तित्व मेरे एक छोटे से प्रयोग से ही समाप्त हो जायेगा।

अतः पहले तुम ही मेरे ऊपर प्रयोग करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करो।” गुरुदेव ने अत्यन्त विनम्र भाव से उनकी चुनौती को स्वीकार करते हुए कहा- “आपको अपनी कृत्या krityaओं पर भरोसा करना चाहिए, किन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए, कि दूसरा व्यक्ति भी कृत्या krityaओं से सम्पन्न हो सकता है।

 

 

” “मैं आपका सम्मान करते हुए आपको सावधान करता हूं कि आपके प्रयोग से मेरा कुछ मुस्कराते हुए गुरुदेव ने फिर कहा नहीं बिगड़ेगा। यदि आप को अहं है, कि आप मुझे समाप्त कर देंगे, तो पहले आप ही अपने सबसे शक्तिशाली व संहारक अस्त्र का प्रयोग कर सकते हैं।”

इतना सुनते ही कपाली बाबा ने अत्यन्त तीक्ष्ण संहारिणी कृत्या kritya’ का आवाहन करके सरसों के दानों को गुरुदेव की तरफ फेंकते हुए कहा- ‘ले अपनी करनी का फल भुगत।” संहारिणी कृत्या kritya का प्रहार यदि विशाल पर्वत पर भी कर दिया जाय, तो उस पर्वत का नामो-निशान समाप्त हो जाए। अत्यन्त उत्सुक और भयभीत नजरों से अन्य साधक मंच की ओर देख रहे थे, किन्तु आश्चर्य कि पूज्य गुरुदेव अपने स्थान से दो चार कदम पीछे हट कर वापिस उसी स्थान पर आकर खड़े हो गए। कपाली बाबा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।

 

 

उन्हें तो उम्मीद ही नहीं थी कि यह साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति संहारिणी कृत्वा का सामना कर सकेगा। इसके बाद कणली बाबा ने ‘बावन भैरवों’ का एक साथ प्रहार किया, लेकिन उनका यह प्रहार भी पूज्य गुरुदेव का बाल बांका न कर सका। कृपाली भैरवी तथा अन्य तांत्रिकों ने गुरुदेव को प्रयोग करने के लिए कहा।

गुरुदेव ने कपालो बाबा से कहा- “मैं एक ही प्रयोग करूंगा। यदि तुम इस प्रयोग से बच गए, तो मैं तुम्हारा शिष्यत्व स्वीकार कर लूंगा।” गुरुदेव ने दो क्षण के बाद ही अपनी मुट्ठी कपाली बाला की तरफ करके खोली दी और उसी समय कपाली बाबा लड़खड़ा कर गिर पड़े. उनके मुंह से खून की धारा यह निकली।

 गुरुदेव ने कहा- “यदि कपाली बाबा क्षमा मांग लें, तो मैं उन्हें दया करके जीवनदान दे सकता हूं।” कपाली बाबा के मुंह से खून निकल रहा था, फिर भी उनमें चेतना बाकी थी। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। गुरुदेव ने अत्यन्त कृपा करके अपना प्रयोग वापिस लिया और वहां उपस्थित साधकों के अनुग्रह पर कपाली बाबा के सिर से दो-चार बाल उखाड़ कर उनको अपना शिष्यत्व प्रदान किया और तांत्रिक सम्मेलन के सभापति बने। उपरोक्त घटनाक्रम गुरुदेव द्वारा लिखित ‘तांत्रिक सिद्धियां नामक पुस्तक में उद्धृत है।

इस घटनाक्रम से स्पष्ट हो गया है, कि कृत्या kritya अपने आपमें पूर्णतः मारण प्रयोग है। एक बार यदि इसका प्रयोग कर दिया जाय, तो सामने वाले व्यक्ति के साथ ही साथ उसके आस-पास के व्यक्ति भी घायल हो जाते हैं, चाहे वह कितना ही बड़ा सिद्ध योगी या तांत्रिक हो। कृत्या kritya चौंसठ प्रकार की होती है। इसमें संहारिणी कृत्या kritya सर्वाधिक उम्र और विनाशकारी होती है।

यदि कोई साधक इसका प्रयोग कर दे, तो सामने वाले का बचना तभी सम्भव है, जब वह भी संहारिणी कृत्या kritya का प्रयोग जानता हो। संहारिणी कृत्या kritya को खेचरी कृत्या kritya द्वारा ही नष्ट किया जा सकता है। कृत्या kritya : पग-पग पर सहायक इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है, कि गृहस्थ साधक इसकी साधना नहीं कर सकता है। मारण प्रभाव से युक्त होने बाद भी कृत्या kritya गृहस्थ साधक के लिए कई सृजनात्मक प्रभावों से भी युक्त है-

* कृत्या kritya साधना को सम्पन्न करने के बाद साधक में आशीर्वाद व श्राप देने की अद्भुत क्षमता प्राप्त हो जाती है। कृत्या kritya साधना के द्वारा मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण सिद्ध हो जाता है।

* कृत्या kritya सिद्ध होने पर साधक आत्मिक रूप से बलशाली व शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला बन जाता है। कृत्या kritya सिद्ध किया हुआ साधक किसी असाध्य रोग से ग्रसित व्यक्ति को यदि कृत्या kritya मंत्र से अभिमंत्रित जल पिला दे, तो वह रोगी पूर्णतः रोग मुक्त हो जाता है।

★ कृत्या kritya सिद्ध करने के बाद साधक पर मारण, वशीकरण या अन्य किसी भी कृत्या kritya के तांत्रिक प्रयोग का असर नहीं होता। प्रयोग विधान कृत्या kritya साधना सिद्ध करने के लिए अमावस्या की रात्रि को सर्वश्रेष्ठ व सिद्ध समय कहा गया है।

कृत्या kritya साधना  विधि 

जिन्होंने इसे सिद्ध करने की गुरु आज्ञा प्राप्त की है या इससे सम्बन्धित विशेष दीक्षा प्राप्त की है, क्योंकि इस तीक्ष्ण साधना में जरा सी भी गलती साधक के लिए हानिप्रद सिद्ध होगी।

यह साधना 11 दिन में सम्पन्न होती है। इस साधना में साधक काली धोती पहनें व काले रंग के आसन का प्रयोग करें। यह रात्रिकालीन साधना है।

इस साधना को करने में निम्न सामग्री आवश्यक है- पंचमहामंत्रों से अनुप्राणित शिव शक्ति साधना से सिद्ध और ब्रह्मप्राणश्चेतनायुक्त कृत्या kritya तेजक’ तथा ‘कृत्या kritya माला’।  को या किसी भी अमावस्या की रात्रि को दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके आसन पर बैठें और संकल्प करें, कि मैं अपने जीवन में आने वाली प्रत्येक समस्या में सहायता प्राप्त करने के लिए 11 दिन का अनुष्ठान करने का संकल्प लेता हूं।

इसके बाद बाएं हाथ में जल लेकर शरीर पर दस बार देह रक्षा मंत्र बोल कर जल छिड़कें- देह रक्षा मंत्र ॐ रं क्षं देहत्व रक्षायै फट् इसके बाद दशों दिशाओं में बाएं हाथ से अश्वन फेंकते हुए दिशा बन्धन करें, जिससे साधना काल में कोई व्यवधान न आए- दिशा बन्धन मंत्र ॐ ऐं क्लीं ह्रीं क्रीं ॐ फट् फिर पूज्य गुरुदेव के चित्र का और कृत्या kritya तेजक का पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें तथा मूल मंत्र की 11 माला जप करें-

 

कृत्या kritya मूल मंत्र ॐ क्लीं क्लीं कृत्यायै क्रीं क्रीं फट्

★ आसन पर बैठने के बाद बीच में उठें नहीं। साधना काल मैं यदि कोई आवाज सुनाई दे, तो उसकी ओर ध्यान न दें। मंत्र जप का क्रम किसी भी परिस्थिति में बीच में न तोड़ें। इस प्रकार 17 दिन तक प्रयोग करें। ग्यारहवें दिन तेजक को अपने गले में पहनें या बांह पर बांध लें। साधक इसे तीस दिन तक अवश्य पहनें, जिससे कृत्या kritya का तेज साधक के शरीर में रम सके और साधक सफलता पूर्वक इसका प्रयोग कर सके। 30 दिनों के बाद साधक तेजक और माला को नदी वा तालाब में विसर्जित कर दें। इस साधना में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन व एक समय भोजन करना आवश्यक है।

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Kali Sadhana काली महाविद्या  साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph. 85280 57364

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Kali Sadhana काली महाविद्या साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph. 85280 57364

 

Kali Sadhana काली महाविद्या  साधना मंत्र प्रयोग

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Kali Sadhana काली महाविद्या  साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph. 85280 57364 इस पोस्ट में माँ काली साधना के बारे में चर्चा  विस्तार सहित की जाएगी माँ काली साधना इस जीवन में क्यों जरूरी है इस विषय पर विस्तार सहित चर्चा करगे आप इस पोस्ट को पूरा पढ़े 

महाविद्या काली  बिजली की तरह कड़क कर वज्र की तरह गिरती है जो शत्रुओं जीवन में शत्रुओं का एक-एक करके रोम. विनाश करने का अर्थ है अपनी जीवनशक्ति का ही विनाश और शत्रु तो इस जीवन में एक नहीं अनेक हैं तनाव, आर्थिक अभाव. गृहकलह पीड़ा क्या ये सब मी शत्रु नहीं है. जीवन के सहज आनंद में? इनको तो समाप्त करने की एक मात्र साधना सर्वसम्मति से शास्त्रों में स्वीकृत है।

साधना जगत के किसी भी रहस्य की चर्चा केवल व केवल रश्मिनयों के आधार पर की हैं और यह विज्ञान या वहम तनाव, आर्थिक अभाव, गृहक शत्रु नहीं है, जीव साधना सामा जगात के किसी भी रहस्य की चर्चा केवल द केवल रश्मियों के आधार पर की व समझी जा सकती है। रश्मियों का संघटन विघटन ही साधना में सफलता-असफलत बन कर हमारे समझ आता है, और संघक किसी भी स्तर पर खड़ा हो, यह घटना अवश्यम्भावी होती है यह बात अलग है, कि साधक साधना के किस चरण अथवा दृष्टि के विकास की किस अवस्था में इसका सात् कर पाता है। इसका यदि सरल सा एक भौतिक उदाहरण देना हो तो सूर्य ग्रह से दिया जा सकता है।

 

सूर्य हमारे समक्ष इस धरा पर नहीं उत्तर आता किंतु उसकी रश्मनयों के माध्यम से हम उसका नित्य ही साक्षात करते रहते हैं, उसे अपनी देह पर अनुभव करते रहते हैं। साधक भी सचना के विकसित चरणों में किसी भी देवी अथवा देवता का ऐसा अनुभव अपनी अन्तर्देह पर करने में सक्षम हो जाता है। इसी अनुभव से चित्त में जो धारणा बनती है वही साधना के क्षेत्र में बिम्ब कही जाती है, जो वास्तविक होती भी है और नहीं भी वास्तविक इस कारण होती है, क्योंकि हमने सधना के माध्यम से ऐसा कुछ अनुभूत किया होता है और वास्तविक इस कारण नहीं भी हो सकती है, क्योंकि समुचित रूप से विश्लेषण करने की क्षमता तब तक पता नहीं विकसित हुई हो, अथवा नहीं साधना, थ्योरी आफ रेजेज (रश्मि विज्ञान) नहीं है, किंतु इसी आधार पर किसी सीमा तक अन्तश्चेतना को विकसित इनको तो समाप्त क सर्वसम्मति से शा अपनी जीवनशक्ति का ही विनाश में एक नहीं अनेक हैं जह, पीड़ा क्या ये सब मी रोग. कर धारणा व विवेचनाएं की जा सकती हैं और यही कार्य तो विज्ञान या सइस भी कर रहा है।

ध्वनि का कोई स्वरूप नहीं होता, किंतु विज्ञान एक तरंग के रूप में उसकी सफलतापूर्वक व्याख्या करता है। यही व्याख्या किसी भी मुहूर्त के विषय में की जा रुकतों हैं। चैतन्यता के कुछ विशेष क्षण होते हैं, देवताओं की प्रसन्नता व वर प्रदान के कुछ दुर्लभ क्षण होते हैं, प्रकृति जब स्वयं अणु- अणु मैं अपनी उदारता लुटाने को तत्पर हो जाती है, किसी विशेष कार्य को सम्पन्न कर लेने का मूक संकेत देने लग जाती है, वही मुहूर्त होता है।

 

साइंस के आधार पर इसको व्याख्या नहीं की जा सकती और साइंस तो स्वयं आज कई क्षेत्रों में अनुत्तरित रह गई है। मानव मस्तिष्क में कितने तन्तु होते हैं अथवा मानव मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, जैसे अनेक प्रश्न आज भी उसके लिए पहेली ही है। यह ठीक है, के विज्ञान ने क्लोन (प्रतिरूप) बनाने में सफलता प्राप्त कर ली हैं, किंतु यदि वह सृजन की क्षमता से युक्त हो गई। है, तो क्यों नहीं आज तक कैंसर जैसे प्राचीन रोग का समाधान मिला ?

यह विज्ञान की आलोचना नहीं हैं बस यह कहने का प्रयास है कि उसकी भी एक सीमा है। हो सकता है भविष्य में कैंसर का, एड्स का कोई प्रभावशाली उपाय या समाधान मिल और फिर क्या यह संभव नहीं है, कि कभी साइस वा विज्ञान भी भारतीय ज्ञान के इन विज्ञान पक्षों का कोई रहस्य तंत्र-यंत्र विज्ञान जार उन के सहज आनंद में? करने की एक मात्र साधना स्त्रों में स्वीकृत है विवेचित कर दे हो सकता है सब कोई शोध ‘द थोरो इन्पेक्ट ऑफ नेचर ऑन द इनर कॉन्शस ऑफ ग्रेट इंडियन ऋषीज जैसे भारी भरकम नाम से सामने आए और शायद तब भारतवासियों को भी गर्व हो सके कि जो आज हजारों वर्ष पूर्व उन ऋषियों ने कहा, जिनका हम यद-कदा बस विवाह, मुंडन पर सारण कर लेते हैं, ये भी कितने इंटिफिक माइड के थे।

भाग कर भी प्रभाव होता है, विशेष कर उस | देश में जो देश सौ वर्षो तक गुलाम रहा हो वहां तो होगा ही। भाषा का मी एक कुचक्र होता है और ऐसे कुचक्रों का तो केवल युग पुरुष ही तोड़ पाते हैं ‘गुरु गोरखनाथ’ या भगवान बुद्ध की तरह। मुहूर्त की आज के समय में समुचित अथवा ‘साइंटिफिक’ व्याख्या संभाव्य हो अथवा न हो, किंतु एक बात तो स्पष्ट है ही, कि काल के जो क्षण व्यतीत हो जाते हैं, दे फिर लौट कर नहीं अते और वहीं किसी मुहूर्त का उपयोग करने का तात्पर्य भी होता है। साधक को किसी साइटिफिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह स्वयं अन्तश्चेतना से मुहूर्त के प्रभाव का साक्षी अन्तर्मन से बन जाता है। 1 

स्वयं अनुभव करने लग जाता है, कि काल के कुछ ऐसे होते हैं जब उसे साधना में सफलता अल्प प्रयास से मिल  जाती है। पाश्चात्य सभ्यता में जिसे मूड कहते हैं या भारतीय सभ्यता में जिसे चैतन्य क्षण कहते है वे सभी क्षण वास्तव में मुहूर्त के ही होते हैं। वस्तुत अंग्रेजी के शब्द ‘मोड’ (ढंग, | प्रकार) का ही परिवर्तित रूप ‘मूड’ कहलाता है, जो अपनी अन्तर्भावना में मुहूर्त के ही समीपस्थ सिद्ध होता है। इसके उपरांत साधक को भी मुहूर्त के विषय में प्रायः | एक प्रकार की अस्पष्टता ही होती है। काल का जो क्षण होती तो इस वर्ष ही निकल गया, वह कैसे निकल गया नहीं हर वर्ष पडती हैं जैसी अनेक हाते प्रत्येक साधक के मन में उमड़ती घुमड़ती रहती हैं, भले ही वह मदद कहे या न कहे।

किंतु साधक को यह ध्यान रखना चाहिए, कि यद्यपि यह सत्य है, कि होली अथवा कोई भी पर्व प्रत्येक वर्ष घाटत होता है, किंतु प्रत्येक वर्ष नक्षत्र, योग एवं चंद्रमा की स्थिति के कारण मुहूतों में भी आन्तरिक विशेषता प्रबंधित अथवा न्यून होती रहती है। होली की रात्रि को भी अपनी एक पृथक चैतन्यता होती है जो दीपावली में नही हो सकती और दीपावली की होली में नहीं।

होली का पर्व या होलिका दहन की रात्रि वास्तव में उतना ही अधिक तीव्र प्रभाव रखती है जितना अधिक प्रभाव सूर्य ग्रहण के क्षण रखते हैं। यह व्याख्या से अधिक अनुभव का विषय है। जिस प्रकार सूर्य ग्रहण के क्षण अपने आप में शात्रोक्त साधनाओं के विलक्षण होते हैं, ठीक उसी प्रकार होली की रात्रि भी तांत्रिक साधकों के मध्य केवल व केवल प्रबल महाविद्या प्रयोगों के लिए ही आरक्षित सी रहती है।

प्रत्येक उच्चकोटि का तांत्रिक परे वर्ष भर प्रतीक्षा करता रहता है, कि कब होली का पर्व पर और यह अपनी साधना को पूर्णता दे सके। शेष वर्ष तो वह एक प्रकार से इसकी पृष्ठभूमि ही बनाता रहता है। यह उचित भी है क्योंकि सूर्य ग्रहण की ही भांति होलिका दहन की रात्रि में सम्पन्न की जाने वाली प्रत्येक माला अपने आप में सौ मालाओं का प्रभाव रखती है। साचक स्वयं अनुमान कर सकते हैं कि जिन उच्चकोटि की साधनाओं में, जहां पांच लाख अथवा दस लाख न्त्र जप पांच हजार अथवा दस हजार माला मंत्र जप से सम्पूर्ण करने पहते हैं।

वहीं होली की रात्रि में इन्हें मात्र इक्यावन अथवा एक सौ एक माला मंत्र जप से सम्पूर्ण किया जा सकता है। मुहूतों का यही तो वैशिष्ट्य होता है, कि ऐसे अवसर पर कम परिश्रम से जीवन में बहुत कुछ अर्जित किया जा सकता है। होलिका दहन की रात्रि में साधक अपनी रुचि व क्षमता के अनुकूल कोई भी तांत्रिक साधना सन्न कर सकता है, किंतु जह जीवन में कुछ विशिष्ट करने को कामना हो और इससे भी अधिक जीवन में एक ऐसा आधार बनाने की भावना हो, जिस आधार पर खड़ होकर जीवन में पौरुष प्रखरता तेज का समावेश हो सके, वहा किसी एक महाविद्या साधना का आश्रय लेना पड़ जाता है। महाकाली यह मात्र एक महाविद्या साधना नहीं स्वयं अपने आप में होली का उत्सव ही है, जिसको सम्पन्न कर साधक, अपने दुभाग्य को योगाग्नि में भस्म कर फिर सुख-सौभाग्य के अबीर गुलाल मैं नहा उठता है। और भीग जाता है।

महाकाली का स्वरूता वा है, क्रोधोन्मत्त है, संहारकारी है, सामान्य व्यक्ति के लिए भयप्रद है किंतु है तो अन्ततोगत्वा मां का ही स्वरूप… जो कुछ सामान्य व्यक्ति के लिए भयप्रद है वहीं साधक के लिए उसकी ‘मां’ के आयुध है उसके जीवन के वैषम्य को समाप्त करने में सहायक… आनंद के टेसू की गुनगुनी फुहार मे महाविद्या उनमें से न केवल सर्वश्रेष्ठ चन् सर्वधन भी है। शक्ति साधनाओं में भी प्रदेश का एक क्रम होता है जिस प्रकार कोई बालक सीधे ही दसवीं कक्षा में प्रवेश नहीं ले सकता, ठीक उसी प्रकार शक्ति साधनाओं में प्रवेश के आतुर साधक को भी सर्वप्रथम महाकाल महाविद्या की साधना सम्पन्न करती पड़ती है।

दूसरी ओर यह साधना के उच्चतर अयमों में प्रविष्ट हो गए साधकों की भी इष्ट साधना होती है क्योंकि साधना केवल गणित नहीं होती। यह सत्य है, कि साधनाओं का एक क्रम होता है, किंतु क्या साधना करना उसी प्रकार है, जिस प्रकार हम दैनिक जीवन में स्वार्थवश सम्बन्ध बनाते और तोड़ते रहते हैं? यदि एक अतरिकता ही नहीं विकसित की तो साधना के क्षेत्र में प्रविष्ट होने का अर्थ ही क्या इसी आंतरिकत के वशीभूत होकर अनेक साधकों के जीवन की यह (महाकाली) न केवल आधारभूत सधना वरन सर्वस्व हो गई।

श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन में महाकाली साधना के अतिरिक्त अन्य किसी लधना को प्रश्रय ही नहीं दिया और केवल इसी आधार पर एवंथा निरक्षर होते हुए भी उन्होंने स्वामी विवेकानंद जैसे प्रखर व्यक्तित्व को शिष्य रूप में प्रस्तुत करने में सफलता भी पाई। केवल महाकालो ही नहीं अपितु प्रत्येक महाविद्या अपने अम में सम्पूर्ण है, लेकिन किसी एक विशेष गुण का प्रतिनिधित्व करती हुई और प्रारम्भिक साधक को उस महाविद्या विशेष के प्राथमिक (अर्थात् विशेष गुण की साधना करना हो उचित रहता है। कोई भी महाविद्या जीवन की आधारभूत साधना तो विकास के किसी क्रम में जाकर बन पाती है।

यह एक साधकोचित मर्यादा भी है और साधना जगत की वास्तविकता भी। जिस प्रकार महाकाली शक्ति की प्रथम धन्य है, ठीक इसी प्रकार पौरुष प्रखरता और तेज भी जीवन की प्राथमिक आवश्यकताएं हैं। जीवन के क्षेत्र में भी और साधना के क्षेत्र में भी। पीता के अभाव में कुछ भी सुव्यवस्थित नहीं हो सकता और पौरत से तात्पय मर्दानगी से नहीं वरन जीवन की उस दृढता से है जो प्रत्येक स्त्री था पुरुष में होनी ही चाहिए। जीवन घिसट-घिसट कर चलने के लिए प्रभु ने हमको नहीं दिया है। जीवन इतना सस्ता नहीं हो सकता है, कि उसे विविध शत्रुओं से संघर्ष करने में व्यतीत कर दिया जाए।

केवल बाह्य शत्रु अथवा किती स्त्री-पुरुष के रूप में विद्यमान शत्रु ही नहीं, शत्रु तो आंतरिक भी होते हैं। आंतरिक शत्रुओं से लड़कर ही फिर हम किसी बाह्य शत्रु से चुनौती ले सकते हैं। यदि आतंरिक बल नहीं है, तो न किसी शत्रु से शारीरिक अथवा मानसिक युद्ध ठाना जा सकता है और न उसमें सफलता पाई जा सकती है। व्यापार करते हैं तो किसी प्रतिद्वन्द्वी द्वारा प्रताड़ित किया जाना, नौकरी करते हैं तो अधकारी द्वारा अपमानित किया जान समय से दोति न मिलना, घर में कलह होते हैं रहना इत्यादि सद शत्रु ही है।

 

इन सभी शत्रुओं से पृथक-पृथक लड़ने में व्यक्ति की जीवनी शक्ति इस प्रकार चुक जाती है, कि फिर न तो उसके स साधना करने की शक्ति शेष रह जाती है और न कभी-कभी साधना के प्रति विश्वास। ऐसी स्थिति में बुद्धिमत्ता इसी में हैं, कि वह उपाय सोचा जाए और सोच कर प्रयोग में लाया जाए जो सभी शत्रुओं का एक बार में ही संहार कर दे। महाकाली साधना इसी का एक प्रयास है शत्रु संहार की दो मुख महाविद्या सघनार है प्रथम महाकाल और द्वितीय बगलामुखी किंतु दोनों ने एक सूक्ष्म भेद है। बगलामुखी साधना जहां किसी प्रत्यक्ष शत्रु के विरुद्ध प्रभावशाली होती हैं. वहीं महाकाली प्रत्यक्ष शत्रु के साथ-साथ जीवन के अन्यान्य पक्षों में छिपे शत्रुओं के प्रति भी सक्रिय होती हैं। इसके अतिरिक्त बगलामुखी महाविद्या की साधना विधि अत्यंत दुष्कर है बगलामुखी महाविद्या को सिद्ध करने के लिए आवश्यक है कि साधक कठोर अन्य नियम संरने का पलन करने के साथ-साथ निरंतर गुरु साहचर्य में रहे। जो श्रेष्ठ साधक होते हैं, वे ऐसा करते भी हैं. किंतु जहां केवल जीवन को सवारते हुए एक निश्चित क्रम शालीनता के साथ शक्ति साधन के क्षेत्र में प्रविष्ट होने की शत आती है, फिर वहां महाकाली का महत्व सर्वोपरि स्वयं सिद्ध हैं।

साथ ही इस बात की तो चर्चा पहले भी की है, कि महाकाली महाविद्या ही महाविद्या साधनाओं का प्रवेश द्वार है। बगलामुखी एक पहुंचना है तब भी महाकाली साधना तो सम्पन्न करनी ही पड़ेगी। इस वर्ष होली का मुहूर्त इस साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त अवसर है। यों तो साधक इस साधना को जीवन में विशेष संकट आने पर अथवा मन में साधना के प्रति एक ललक रहने पर किसी भी मह के कृष्ण पक्ष की अष्टमों को सम्पन्न कर सकता है, किंतु होली पर्व की तो चैतन्यता है विलक्षण होती है फिर इस वर्ष की होली का पर्व तो विशेष योगों से गठित हुआ है।

महा काली साधना विधि 

 

बाह्य वातावरण शांत होने से साधक चैतन्यता को पूरी तरह से आत्मसात करने में सफल हो पाता है। महाकाली को महाविद्या के रूप में सिद्ध करने अथवा जीवन की विविध समस्याओं को | सुलझाने के आतुर शिष्यों को चाहिए कि वे उपर्युक्त काल में लाल वस्त्र धारण कर लाल रंग के ही आसन पर दक्षिण की ओर |

मुख करके बैठें और अपने सामने लकड़ी के किसी बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर ताम्रपत्र पर अंकित ‘महाकाली यंत्र स्थापित करें। अपने दाहिने हाथ की ओर (यंत्र के समीप) ‘भैरव गुटिका’ नध्य में तेजस गुटिका तथा बांयी ओर ‘क्लीं गुटिका का स्थापन कर सभी का पूजन जल कुंकुंम अक्षत, पुष्प धूप से करें, जिससे जीवन में व शरीर में बल, ओज च पौष का समन्वय हो सके। इसके पश्चात तेल का एक दीपक प्रज्ज्वलित कर दें, जो सम्पूर्ण साधनाकाल में अखंड रूप से जलता रहे। अब महाकाली यंत्र का भी संक्षिप्त पूजन करें और यंत्र पर दस कुंकुंम की बिंदियां ब्ली मंत्र के साथ लगाएं तथा निम्न | प्रकार से

काली ध्यान

उच्चरित करें – खड्गं चक्रगदेषुचापपरिधान्दूल भुशुण्डी शिर: शंख सदधती करैस्त्रिनयनां सर्वांगभूषावृताम् । नीलाश्मतिमास्यपाद दशकां सेवे महाकालिका यामस्तत्स्वपिते हरौ कमलजी हन्तुं मधु कैटभम् ।।

ध्यान उच्चरित कर भगवती महाकाली से अपने जीवन के सभी दुख दैन्य समाप्त करने की याचना कर उन्हें पूर्ण रूप से अपने प्राणों में समाहित करने की भावना के साथ महाविद्याल से निम्न मंत्र की इक्कीस माला मंत्र जप निष्क्रम्प भाव से करें मंत्र

maha kali sadhna mantra महा काली साधना मंत्र 

॥ ॐ क्रीं क्लीं महाकालि हुं हुं फट् OM KREEM KLEEM MAHAAKAALI HUM HUM PHAT

मंत्र जप काल में हुई किसी भी अनुभूति से न हो विचलित हों, न उन्हें सार्वजनिक करें। साधना के दूसरे या तीसरे दिन सभी सामग्रियां लाल वस्त्र में लपेट कर किसी नदी मंदिर अथवा स्वच्छ जलाशय में विसर्जित कर दें। भगवती महाकाली को यह दुर्लभ साधना वास्तव में महाकाली को प्राणों में समाहित करने की ही साधना है यह सत्य है, कि प्रत्येक दैवी शक्ति बह्य रूप से भी शक का हित साधन करने में साधना के उपरांत तत्पर रहती है, किंतु उसे शक्ति को अपने शरीर में समाहित करना न केवल साधक के लिए अधिक हितकारी होता है वरन उस दैवीय शक्ति के लिए भी अहलादकारी होता है। यही इस सघना की मूल भावना है। यहीं किसी भी साधना की मूल भावना होती है।

 

 

 

 

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ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे के लाभ
ॐ एम क्लीं चामुण्डायै विच्चे मंत्र जाप के लाभ

Navarna Mantra Ke Labh चमत्कारी नवार्ण मंत्र Navarna Mantra के लाभ Ph.85280 57364 नवरात्रि में सर्वत्र विजय की है तब तक रक्त बीज की तरह दूसरा उत्पन्न हो जाता है। इस कारण व्यक्ति अपने जीवन में अत्यधिक भय ग्रस्त रहता है, जिसके कारण वह मानसिक संतुलन नहीं रख पाता है। इन कारणों के चलते व्यक्ति की शक्ति क्षीण होने लगती है और शारीरिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी वह दीन एवं हीन दिखाई पड़ता है। जीवन में इस तरह के संग्राम को व्यक्ति केवल ॥ अपनी शक्ति के माध्यम से नहीं जीत सकता है।

इसके लिए उसके पास दैवीय बल होना आवश्यक है, मंत्र सिद्धि होनी ‘आवश्यक है।  एक मात्र साधना-जो  वन पग पग परिवर्तशील है और न जाने कब, कौन । सौ विकट स्थिति से गुजरना पड़ जाय, शत्रु हर मोड़ 1 पर खड़े रहते हैं, कब हमला कर दें, कोई भरोसा नहीं।

मनुष्य के शत्रु एक नही हजारों होते हैं, जब तक वह एक को परास्त करता महाभारत काल में श्रीकृष्ण ने गीता में यह कहा है, कि हे अर्जुन! तुम युद्ध को शस्त्रों के माध्यम से नहीं जीत सकते, जब तक कि तुम्हारे पीछे देवीय बल नहीं होगा, जब तक तुम्हें मंत्र सिद्धि नहीं होगी, इसीलिए तुमने जो गुरु द्रोणाचार्य से मंत्र सिद्धि प्राप्त की है, उस मंत्र सिद्धि को स्मरण करते हुए गांडीव उठाओ, तभी तुम महाभारत युद्ध जीत सकोगे, केवल धनुष और तीर चलाने से ये दुर्योधन, दुःशासन जैसे पापी समाप्त नहीं। हो सकते, अतः द्रोणाचार्य ने तुम्हें तीर चलाना ही नहीं सिखाया अपितु मंत्र शक्ति भी दी है।

वास्तव में साधना शक्ति का वह स्रोत है, जिसमें व्यक्ति शारीरिक रूप से तो स्वस्थ और बलवान होता है, साथ ही मानसिक रूप से भी यह पूर्ण स्वस्थ और बलवान होता ही है; क्योंकि उसे साधना का बल, ओज और तेजस्विता प्राप्त हो जाती है, जो उसे हर क्षेत्र में विजयी बनाने में सहायक सिद्ध होती है।

यदि व्यक्ति के पास साधना का तेज, मंत्र बल हो तो वह पराजित हो ही नहीं सकता और यदि व्यक्ति नवार्ण मंत्र Navarna Mantra की साधना सम्पन्न करता है, तो प्रबल शक्ति युक्त बनता ही है। नवार्ण साधना से साधक अपने जीवन में आने वाले हर शत्रु को, हर बाधा को हमेशा-हमेशा के लिए दूर कर सकता है। प्रायः नवार्ण साधना के विधि-विधान के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

इस साधना का मूल रहस्य इसके अक्षरों के मंत्र में निहित विराद शक्ति में छिपा हुआ है। भगवती दुर्गा की साधना में नवार्ण मंत्र Navarna Mantra का विशेष महत्व है। व्यक्ति चाहे किसी पक्ष का उपासक हो, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सुख- समृद्धि एवं पूर्णता के लिए नवार्ण साधना अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती ही है। चामुण्डा तंत्र में कहा गया है, कि नवार्ण मंत्र Navarna Mantra की साधना ।

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सिद्ध होने पर व्यक्ति के जीवन में नौ लाभ स्वतः प्राप्त होने लगते हैं, वे इस प्रकार है-

१. इस साधना के सिद्ध होने पर साधक की स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है, वाणी में ओज आ जाता है, जिससे वह अच्छा वक्ता बन जाता है।

२. यह साधना सिद्ध होने पर व्यक्ति के जीवन में दरिद्रता समाप्त हो जाती है और आर्थिक स्रोत खुलने लगते हैं।

३. इस साधना के सिद्ध होने पर साधक के समस्त शत्रु समाप्त हो जाते हैं और वे उसके विरुद्ध कोई भी षड्यंत्र नहीं कर पाते हैं अपितु मित्रवत् व्यवहार रखने लगते हैं। इस साधना के सिद्ध होने से सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह होती है, कि उस साधक की सर्वत्र विजय एवं प्रसिद्धि होने लगती है, साथ ही उसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, लगभग समाप्त हो जाता है।

४. साधक के सौभाग्य के द्वार खुलने लगते हैं। उसे दीर्घायु प्राप्त होती है। घर में आकस्मिक विपत्ति व संकट नहीं आते हैं तथा किसी भी प्रकार का रोग व्याप्त नहीं होता है।

५. नवार्ण साधना सिद्ध होने पर आत्म कल्याण की पूर्ण प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है, जिससे कुण्डलिनी जागरण की स्थिति प्राप्त होने लगती है।

६. इस साधना के सिद्ध होने पर सन्तान सुख मिलने लगता है। यदि सन्तान न हो, तो श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न होती है।

७. नवार्ण साधना सिद्ध होने पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि व्यक्ति के जीवन में यदि बाधाएं हैं, तो उसका भाग्योदय होकर उन्नति होने लगती है। आय के स्रोत खुलने लगते हैं तथा पग-पग की बाधाएं समाप्त हो जाती हैं।

८. नवार्ण साधना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह प्रायः नवार्ण साधना के विधि-विधान के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इस साधना का मूल रहस्य इसके अक्षरों के मंत्र में निहित विराट् शक्ति में छिपा हुआ है। है कि व्यक्ति हर क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त करता ही है, चाहे वह स्वास्थ्य की दृष्टि से हो, चाहे गृहस्थ सुख-सुविधा से हो या आध्यात्मिक उन्नति से, वह निश्चित ही पूर्णता करता है।

९. नवार्ण मंत्र Navarna Mantra साधना के लिए शाखों में बताया गया है, कि इस मंत्र से पूर्व प्रणव (ॐ) नहीं लगाना चाहिए, नवार्ण मंत्र Navarna Mantra स्वयं में अत्यन्त तेजस्वी मंत्र है, जो अपार शक्ति समेटे हुए है। नवार्ण मंत्र Navarna Mantra की साधना को नवरात्रि के अवसर पर सम्पन्न करना, जीवन के सौमान्य को ही उदित करना है, क्योंकि ऐसी विलक्षण साधना को प्राप्त करना, उसे पुनः सम्पन्न करना, योगियों लिए भी श्रेयस्कर होता है।

नवार्ण मंत्र Navarna Mantra साधना को सम्पन्न करने के लिए साधक चाहे तो नवरात्रि के अतिरिक्त किसी भी शुक्ल पक्ष की प्रतिप्रदा को भी आरम्भ कर सकता है, परन्तु इसके लिये उत्तम तथा निर्धारित मुहूर्त नवरात्रि ही मानी गई है। इस साधना को सम्पन्न करने के लिए ‘गणपति चित्र, दुर्गा चित्र, नवार्ण यंत्र, खड्ग माला’ की आवश्यकता होती है।

आप इस सामग्री को कहीं से भी प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन नवार्ण यंत्र तथा खड्ग माला चामुण्डा तंत्र के अनुसार प्राण प्रतिष्ठित और मंत्र सिद्ध होनी चाहिए। गणपति चित्र तथा दुर्गा चित्र भी मंत्र सिद्ध हो तो उत्तम है। नवरात्रि में यह प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति को सम्पन्न कर ही लेना चाहिए, तथा उन साधकों को जो नवरात्रि शिविर में भाग न ले सकें तथा वे साधक जो नवरात्रि शिविर में आ रहे हैं, किन्तु उनका परिवार घर पर ही रुक रहा है, तो परिवार के एक या सभी सदस्यों को यह साधना सम्पन्न कर ही लेनी चाहिए, जिससेमां दुर्गा का आशीर्वाद आपकी तथा आपके सम्पूर्ण परिवार की सुरक्षा करता रहे। 

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Hanuman Sadhna प्राचीन रहस्यमय हनुमान साधना विधि विधान सहितph. 85280 57364  हनुमान साधना  Hanuman Sadhna  एक विशेष प्रकार की धार्मिक साधना  है, जिसमें हनुमान जी की उपासना और साधना की जाती है। हनुमान जी हिंदू धर्म के प्रमुख देवता में से एक हैं जो हिंदू धर्म के ग्रंथ रामायण में प्रमुख चरित्र हैं। हनुमान जी को शक्तिशाली, धैर्यवान, बलवान और सेवा भावना से युक्त माना जाता है।

हनुमान साधना Hanuman Sadhna का मुख्य उद्देश्य हनुमान जी की कृपा, आशीर्वाद और शक्ति प्राप्ति करना होता है। यह साधना विभिन्न तरीकों में की जा सकती है, जैसे कि मंत्र जाप, ध्यान, पूजा-अर्चना, व्रत आदि। यह साधना विशेष रूप से हनुमान जी की उपासना के लिए की जाती है और इसमें निष्ठा, धैर्य और समर्पण की आवश्यकता होती है।

हनुमान साधना Hanuman Sadhna करने वाले व्यक्ति को शक्ति, स्थैर्य, बुद्धि, स्वास्थ्य और सुख-शांति की प्राप्ति होती है। यह साधना भक्ति, वैराग्य, सेवा और ध्यान को बढ़ाती है और व्यक्ति को आत्मिक और आध्यात्मिक विकास में सहायता प्रदान करता 

हनुमान साधना Hanuman Sadhna labh करने से विभिन्न तरह के लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं। यहां कुछ मुख्य लाभ हैं:

  1. शक्ति और सामर्थ्य: हनुमान जी एक बलशाली देवता है और उनकी साधना से आपको शक्ति और सामर्थ्य मिलता है। आपकी दैनिक जीवन गतिविधियों में बदलाव आता है और आप शक्तिशाली और सक्रिय बनते हैं।
  2. भक्ति और आंतरिक ध्यान: हनुमान साधना Hanuman Sadhna आपकी भक्ति बढ़ाती है और आपको आंतरिक ध्यान में ले जाती है। आपका मानसिक शांति, स्थिरता और आत्म-समर्पण बढ़ता है।
  3. सुरक्षा और रक्षा: हनुमान जी की कृपा से आपकी सुरक्षा बढ़ती है और आपको रक्षा की शक्ति प्राप्त होती है। आप नकारात्मक शक्तियों से बचे रहते हैं और सुरक्षित महसूस करते हैं।
  4. बुद्धि और विवेक: हनुमान जी विवेक और बुद्धि का प्रतीक हैं और उनकी साधना से आपकी बुद्धि बढ़ती है। आपके मन में सतत विचारधारा और विवेकपूर्ण निर्णय होते हैं।
  5. स्वास्थ्य और आरोग्य: हनुमान साधना Hanuman Sadhna से स्वास्थ्य और आरोग्य  की  प्राप्ति होती   है। हनुमान जी की कृपा से आपकी शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। आपकी शक्ति, ताकत और  परिश्रम  की प्रापति होती  है  ।
  1. बुराई से मुक्ति: हनुमान जी बुराई और अशुभता को हर किसी के जीवन से दूर रखते हैं। उनकी साधना से आप अन्याय, कष्ट और नुकसान से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। संकटमोचन भजाग्वं आप के सभी संकटो दूर रखते है 
  2. धन संपत्ति: हनुमान जी की कृपा से आपके धन संपत्ति में बरक्कत होती  है। आपके वित्तीय स्थिति में सुधार होता है और आपको आर्थिक उन्नति मिलती है।
  3. ग्रह शांति: हनुमान जी की साधना Hanuman Sadhna से आपके ग्रहों की शांति हो सकती है। आपके कुंडली में ग्रहों के दोष या आपदा को दूर करने में सहायता मिल सकती है।
  4. मानसिक शक्ति और धैर्य: हनुमान साधना Hanuman Sadhna आपको मानसिक शक्ति और धैर्य प्रदान करती है। आप जीवन की चुनौतियों को सामने लेने में सक्षम बनते हैं और धैर्य से उनका समाधान करते हैं।
  5. समृद्धि और सुख: हनुमान जी की कृपा से आप समृद्धि और सुख: हनुमान जी की कृपा से आपके जीवन में समृद्धि और सुख की वृद्धि हो सकती है। आपको सफलता, सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति हो सकती है।
  1. शत्रु नाश: हनुमान जी की साधना से आपके शत्रु और विरोधी नाश में मदद मिल सकती है। आपकी सुरक्षा बढ़ती है और आपको शत्रुओं से बचाने में सहायता मिलती है।
  2. विचार शक्ति और बुद्धि: हनुमान जी की साधना से आपकी विचार शक्ति बढ़ती है और आपको बुद्धि की प्राप्ति होती है। आपका मस्तिष्क ताजगी और स्थिरता से भरा रहता है, जो आपकी सोच, निर्णय और विचार प्रक्रिया में सुधार करता है।

इन सभी लाभों के साथ हनुमान साधना Hanuman Sadhna आपको शक्ति, स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि और आनंद की प्राप्ति में सहायता कर सकती है। यह आपकी आत्मिक और शारीरिक विकास में मदद कर सकती है और आपकी जीवन गुणवत्ता को सुधार सकती है। हानुमान जी की साधना को श्रद्धा और निष्ठा से करें और गुरु के मार्गदर्शन में रहें।

Hanuman Sadhna  हनुमान साधना अनुभव 

 

 एकांत  में  रहने वाले, कामना रहित साधक वास्तव में अपनी आत्मलीनता के परम सुख का त्याग कर स्वयं को उत्सर्ग करने में ही लगे रहते हैं, किसी प्रान्त था देश के लिए नहीं, किसी जाति या धर्म विशेष के लिए भी नहीं, अपितु सभी के लिए, अखिल विश्व के लिए क्योंकि साधना उनके लिए ‘स्व’ से ऊपर उठने की क्रिया जो है ग्रीष्म: कौ अग्नि वर्षा करती हुई दोपहर में उसका आगमन गांव में सुखद हरियाली का प्रतीक बन गया था।

 

अत्यन्त अल्प समय मैं ही अपनी उदात्त प्रेम भावना को असहाय ग्रामीणों की सेवा सुश्रुषा के रूप में लुटाते हुए वह हृदय में छिपी अपनी समष्टिगत करुणा का परिचय दे चुका था। आज वह कितने ही मुरझाये दिलों में प्रेरणा और प्रकाश भरने का अधिकारी है, सब कितना प्यार करते हैं उसे गांव का एक भी घर उसकी कृपा दृष्टि की अमृत फुहार से अछूता नहीं बचा..

भव्य गौर वर्ण, सिर पर छोटी सी शिखा व मस्तक पर कभी न मिटने वाला रक्त चन्दन का तिलक पर आंखों में असीम वेदना, करुणा और जिज्ञासा थी। नेत्रों में एक निस्तब्धता थी, जिसे देख कर लगता था, मानों अंधकार होने पर भी वह प्रकाश की ओर बढ़ रहा हो उसके लम्बे व पतले अधरों पर विचित्र स्फुरण था, जैसे किसी अत्यन्त पवित्र शब्द का उद्घोष करने को व्याकुल हो उठे हों।

पर गांव वालों को इससे क्या? वे तो अत्यन्त कौतूहल से उस अल्पवय साधु को देख रहे थे, जो गांव की सीमा पर न जाने कहां से जेठ की तपती धूप में प्रकट हो गया था। पिछले कई माह से ग्रामीणों का जीवन किसी दैवीय आपदा से अस्त-व्यस्त हो चुका था, कितने परिजनों की अकाल मृत्यु हुई, कितनों के शिशु मृत्यु शैय्या पर झूल रहे थे। कई घर तो पूरी तरह से बरबाद हो चुके ये शव को कंधा देने वाला भी शेष नहीं था। कदाचित इन्हीं कारणों से वे ग्रामीण किसी भी आगन्तुक को अत्यन्त भय की दृष्टि से देखा करते थे।

“पर यह तो बिल्कुल अलग सा दिखता है” पीली धोती पहने व कंधे पर लाल झोली उठाये वह तरुण साधक प्रत्येक को अपनी ओर मानों खींच रहा था. ‘सचमुच ही इसमें तपस्या का तेज दिखाई दे रहा है, क्या मालूम ईश्वर ने हम दुःखी ग्रामीणों के कल्याण का माध्यम बना कर ही इसे यहां भेज दिया हो… कितनी प्रेमभरी आंखों से पूरे गांव को निहार रहा है”- कुछ ग्रामीण यह विचार कर ही रहे थे, कि उस युवा तपस्वी ने उनके पास आकर अत्यन्त विनम्रता पूर्वक पूछा “यदि आप संत जन कृपा करें, तो मैं कुछ समय के लिए इस गांव में ठहरना चाहता हूँ।।

“विश्वास रखिये, मैं हर प्रकार से मंगल हो करूंगा।” — अन्य “हां बेटा! तुम इसे अपना ही गांव समझो ” कोई होता, तो गांव वाले धक्के दे कर भगा देते, पर उसकी सम्मोहक वाणी और संत जन का सम्बोधन सुन वे भोले ग्रामीण प्रसन्न हुए बिना न रह सके पर आजकल इस गांव में मृत्यु ने अपना भयानक पञ्जा फैला रखा है, कोई परिवार सुखी नहीं है, इसीलिए तुम बाहर हनुमान मंदिर में डेरा डाल सकी, तो हमें कोई असुविधा नहीं है।

 

‘हनुमान मंदिर ” साधु के कान मानों इसी शब्द की प्रतीक्षा कर रहे थे, उसकी आंखों में अपूर्व चमक कौंध उठी। अपना कमण्डल व थैली उठाये वह दूर अमराइयों के बीच स्थित उस पुराने खण्डहरनुमा हनुमान मन्दिर के प्रांगण मैं प्रवेश कर गया।

अपने लाल अंगोछे से मन्दिर की धूल साफ की और पत्तियों को एकत्र कर धूनी में डालने के पश्चात् एक ओर आसन लगा कर बैठ गया। गांव के दो युवा खटिकों की इहलीला समाप्त होने के कारण यह अमराई और मन्दिर दोनों हो ग्रामीणों की दृष्टि में अभिशप्त साबित हो चुके थे, अतः वे दूर से ही कुछ समय टकटकी लगा कर साधु के क्रिया-कलाप से संतुष्ट हो लौट चले। मर्मान्तक पीड़ाओं से मुक्ति तपस्वी की रात्रि व्यतीत होनी थी, कि गांव का कायापलट आरम्भ हो गया।

मृत्यु शैय्या पर लेटे गांव के लच्छू महाराज का एकमात्र पुत्र प्रातः ही उठ बैठा और भावविभोर शब्दों में इतना ही कह पाया ‘मां! रात में भूत बगीचे के हनुमान जी मेरे पास आये थे, मुझे छूते रहे और जाते-जाते कहने लगे, कि अब मैं अच्छा हो जाऊंगा, पहले की तरह खेल सकूंगा। माता-पिता बालक के शरीर में रोग का कोई लक्षण न देख प्रसन्नता से रो पड़े।

कल तक जिसके लिए कोई उपचार शेष नहीं बचा था, वही मरणासन्न पुत्र आज किलकारियां भरते हुए मां की गोद में सिमटा जा रहा था। तब भी ग्रामीणों को उस तपस्वी की महिमा का पूरा अंदाज नहीं मिल पाया था, अभी भी वे उसके निकट जाने से डरते थे। वह बुषा र रात्रिपर्यन्त एक ही आसन पर बैठा हुआ मंत्र जप किया करता, सामने रक्तवर्णीय जंगली फूल व गुड़ का नैवेद्य बिखरा होता और वहदीपक के धीमे प्रकाश में किसी प्रखर देवात्मा का आवाहन करता प्रतीत होता, कभी-कभी तो भावावेश में रोने भी लगता।

दिन के तीसरे प्रहर जब गांव का बाल समूह विद्यालय, से लौटता, तो अमराइयों में बसे उस साधक का लोभ बरबस ही उन्हें वहां खींच लाता। उस समय वह प्रत्येक से उसके घर का कुशल-क्षेम पूछता और तकलीफ सुनते ही अत्यन्त विश्वास के साथ अगले दिन ठीक हो जाने का आश्वासन भी दे देता। भोले-भाले बालक घर लौट कर माता-पिता को यह समाचार सुनाते और फिर कुछ डांट-फटकार खाकर चुप हो जाते। ग्रामवासी अभी भी जिस साधु को भय से देखते थे, बालकों को वही अपना सबसे परम मित्र प्रतीत होता।

आषाढ़ मास का प्रारम्भ हो चुका था। हल्की-फुल्की रिमझिम वर्षा ने अचानक एक दिन प्रलयंकारी रूप धारण कर लिया। वृद्धजन आश्चर्य से भर उठे, अपने जीवन में इस गांव में वर्षा का इतना भीषण ताण्डव उन्हें कभी स्मरण नहीं आया था। खेत-खलिहान डूबने लगे, सूरज देवता तो जैसे अदृश्य ही हो गये थे। चारों ओर जलाप्लावन का दृश्य उपस्थित हो गया। एक-एक करके मवेशियों की मृत्यु होने लगी।

घर गिर जाने की आशंका से कितने ही परिवार गांव खेड़ कर पलायन कर गये, जो बचे, वे अन्न-जल को भी तरसने लगे, साथ ही संक्रामक रोगों ने भी सबको अपनी गिरफ्त में ले लिया था, किसी को अब जीवन का भरोसा नहीं रह गया। इन्हीं दुर्दिन के क्षणों में गांव बालों को उस तपस्वी का वास्तविक देवात्मा स्वरूप दिखाई पड़ा।

कष्ट भोगते रोगियों को वह कुछ अभिमंत्रित जल दे देता और उनकी तकलीफ मिटने लगती। गांव का सूखा तालाब, जो अब एक विशाल झील का रूप ले चुका था, उसमें से उस साधु ने कई बालकों को काल कवलित होने से बचा लिया। अपने प्राणों का तो जैसे उसे कोई मोह था ही नहीं, मूसलाधार वर्षा में भी वह आराम से तैरते हुए झील में प्रवेश कर डूबते मवेशियों को खींच लाता।

पता नहीं कितनी अद्भुत शारीरिक क्षमता भगवान ने उसे प्रदान की थी, कि वह कभी रुग्ण नहीं होता था, अपितु दिवस पर्यन्त दूसरों की सेवा में ही लीन रहता और रात्रि साधना में ही चीत जाती। प्रबल पराक्रम का रहस्य अन्ततः प्रकृति का ताण्डव समाप्त हुआ, तपस्वी की रात्रि साधना सफल हो चुकी थी।

अब उसके प्रस्थान का समय आ चुका था। गांव की सीमा पर पहुंचे उन ग्रामीणों ने तपस्वी के पुण्य चरणों में प्रणाम कर क्षमा याचना करते हुए कहा ‘भगवन्। अज्ञानवश हमसे जो भी भूल हो गई हो, उन्हें क्षमा कर देना कभी इधर आगमन हो, तो सेवा का अवसर हमें ही दें, आपके उपकारों से हम कभी उऋण नहीं हो पायेंगे। ”

तपस्वी की आंखें छलक उठी स्नेह पूर्वक उस ग्रामीण के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा ‘कल्याण करने की सामर्थ्य तो एकमात्र मेरे गुरुदेव में ही है, मैं तो उनका एक निमित्त मात्र ही हूं। पीड़ित मानवता के पति उनकी असीम करुणा ही मुझे यहां खींच लाई सेवा से मिलने वाला आत्म संतोष ही मेरे लिए सबसे बड़ा वरदान है, वही मेरी प्रसन्नता है।

‘अब इस गांव में कभी कोई संकट या देवी आपदा आ ही नहीं सकती। मेरी ‘हनुमान साधना’  Hanuman Sadhna यहां पूर्णत: सफल हुई है। गांव को सीमा पर विराजमान बड़े हनुमान जी स्वयं इस गांव की सुरक्षा करते रहेंगे, अपने गुरु की साक्षी में मैंने यही वरदान उनसे प्राप्त किया है। ” विलक्षण साधना प्रक्रिया गुरुदेव के अत्यन्त प्रियपात्र उस तरुण सिद्ध तपस्वी ने अपनी कठिन तांत्रोक्त

Hanuman Sadhna हनुमान साधना विधि विधान 

Hanuman Sadhana प्राचीन रहस्यमय हनुमान साधना विधिविधान सहित ph. 85280 57364
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बजरंग साधना का जो सरल विधान बताया, वह इस प्रकार है। सर्वप्रथम प्राण प्रतिष्ठित ‘हनुमान यंत्र’ को प्राप्त कर लें, किसी मंगलवार की रात्रि में स्वयं स्नान कर लाल रंग का शुद्ध वस्त्र पहन हनुमान यंत्र को बाजोट पर लाल वस्त्र बिछा कर उस पर सिन्दूर छिड़क कर स्थापित कर दें, दक्षिण दिशा की ओर आपका मुख हो। 1 पहले गुरु ध्यान कर वीर मुद्रा में बैठ कर भी का दीपक जलायें और सामने स्थापित हनुमान यंत्र को स्नान करा कर उस पर तेल मिश्रित सिन्दूर का लेपन करें, स्वयं भी सिन्दूर का तिलक करें तथा लाल पुष्प और कोई भी फल नैवेद्य रूप में समर्पित करें। तत्पश्चात् मंत्रसिद्ध ‘मूंगा माला’ से निम्नलिखित मंत्र का 21 माला मंत्र जप करें मंत्र

Hanuman Sadhna mantra

॥ ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय हनुमते नमः ।। OM NAMO BHAGVATE ANJANEYAY MAHABALAY HANUMATE NAMAH

जय समाप्ति पर नहीं लाल बिछने पर शयन करें। यही क्रम 11 दिनों तक नित्य दोहरायें तथा नैवेद्य को स्वयं ग्रहण करें। यथासम्भव मौन रहें तथा प्रयोग को भी गोपनीय ही रखें। पूर्ण एकनिष्ठ भाव व विश्वास के साथ साधना सम्पन्न करने पर अंतिम दिन बजरंग बली प्रत होकर स्वयं दर्शन देते ही है तथा सभी विपदाओं का शमन करते हुए पूर्ण सुरक्षा प्रदान करते हैं। हनुमान साधना के आवश्यक नियम हनुमान साधना में शुद्धता अनिवार्य है।

लाल पुष्प कमल, गुड़हल आदि को ही अर्पित करें। नैवेद्य में प्रातः पूजन में गुड़, लड्डू, दोपहर में गुड़, घी और गेहूं की रोटी का चूरमा तथा रात्रि में आम, अमरूद या केले का नैवेद्य चढ़ायें। इस साधना में घी की एक या पांच बतियों वाला दीपक जलायें। पूर्ण साधना काल में अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य ही करें।

मंत्र जप करते समय दृष्टि सदैव यंत्र पर ही टिकी रहे। ‘हनुमान दीक्षा’ प्राप्त कर साधना में प्रवृत्त होने पर प्रथम बार में ही इष्ट के साक्षात् जाज्वल्यमान स्वरूप से साक्षात्कार सम्भव है। साथ ही इस साधना अवधि में किसी प्रकार की विघ्न-बाधा अथवा भयावह स्थिति उत्पन्न नहीं होती। साधना काल में एकान्तवास तथा मौन अत्युतम है।

शारीरिक अथवा मानसिक रोगों को समाप्ति के लिए उसी प्रकार का संकल्प मंत्र जप से पहले अवश्य ले लेना चाहिए। मात्र 11 दिनों तक नियम पूर्वक किया गया यह विलक्षण प्रयोग अतुलनीय बल पराक्रम व निष्काम सेवा भक्ति के भाव से साधक को आप्लावित कर उसे जीवन के उच्चतम सोपान पर प्रतिष्ठित कर देता है।

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Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph.85280 57364

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Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph.85280 57364 आज हम  छिन्नमस्ता साधना की जानकारी प्रदान करेंगे। इस पोस्ट में साधको छिन्नमस्ता साधना का दैनिक ज़िंदगी में क्या महत्व है इस के बारे में बताया गया है और  दुर्गम मुनष्य जीवन को यह देवी कैसे सुगम बनाती है यह बताया गया है।  आप इस पोस्ट को विस्तार सहित पढ़े 

एक नहीं अनेक स्क बीज है इस जीवन में जिनका समूल नाश करता छिन्नमस्ता जो शक्ति का सर्वाधिक तीक्ष्ण स्वरूप है पौराणिक कथाओं में तो बस रक्तबीज की कथा मिलती है, किन्तु आज व्यक्ति के दैनंदिन जीवने में चारों और समस्या रूपी जो अनेक रक्तबीज खड़े हैं, उनके सहार का क्या उपाय किया जाए जैसे जैसे व्यक्ति की एक समस्या सुलझती है, कि उससे जुड़ी चार नई समस्याएं आ जाती है। केवल एक या दो वर्ष नहीं, पूरे के पूरे जीवन पर्यन्ता- ऐसी ही स्थितियों के लिए किया गया है शक्ति साधनाओं का सृजन और छिन्नमस्ता की साधना इनमें एक पृथक व विशिष्ट स्थान रखती है।सकती य विरोधाभासी धार प्रतीत है, किन्तु है शत प्रतिशत सत्य कि जहां कांच का पूर्ण प्रवाह होता है, वहीं प्रेस का भी पूर्ण प्रवाह सम्भव हो सकता है।

यह जो इस युग की तथाकथित सभ्यता है कि इन्हें दो परस्पर विरोधी गुणमान लिया गया है और ऐसा इस कारण हुआ है कि जीवन की गति तीव्र होने के साथ-साथ व्यक्ति ने पौरुष का आश्रय स्यांग हृदय के आवरण को ओढ़ लिया है। हृदय के आवरण के साथ गतिशील होने पर व्यक्ति को प्रारम्भिक सफलताएं सस्ती लोकप्रियता अवश्य मिल जाती है, किन्तु होती है सब बालू की भांति एक ही आघात से भरभरा कर गिर जाती है और इसका सर्वाधिक पुष्ट प्रमाण है दिन प्रतिदिन केवल विदेशों में ही नहीं

एक अहं विकसित कहे जाने वाले देश भारत में बढ़ती हृदय रोगियों की संख्या व्यक्ति किसी प्रकार से समस्त चतुराई को लगाकर कुछ अर्जित करता है, लेकिन पाता है, कि उसके कुछ अर्जित करते ही उससे जुड़ी चार और समस्याएं खड़ी हो गई हैं या यह अनुभव करता है, कि उसकी चतुराई से किए गए। अजून में संघ लगाकर उसे झपट लेने वाले और आ गए हैं, तो उसे अपना जीवन ही व्यर्थ लगने लगता है और वह इसी वेद में या तो अस्वस्थ होकर बिस्तर पकड़ लेता है या इस जगत को ही अलविदा कह देता है।

केवल हृदय रोग ही नहीं वरन निरन्तर बढ़ा रही आत्महत्याओं की संख्या भी प्रकार से इसी की और संकेत करती है। एक बेटोजगार व्यक्ति इधर-उधर से सम्पर्क कट, उच्चतम शिक्षा प्राप्त होने के बावजूद भी जब उत्कोच (घुस) देकर किसी नौकरी  को पाता है और नौकरी  पाने के बाद पाता है, कि उसकी समस्याओं का अन्त नहीं हुआ  ‘प्रारम्भ’ हुआ है।

अपने शीर्ष अधिकारी नित्य प्रणाम करना है, उनके बच्चों तक की ही नहीं कुते तक कोजी हजूरी करनी पड़ती है या उन्हें जोड़ो कर हर माह एक नियत राशि पहुंचानी होती है अथवा कार्यालय के राजनीतिक इन्हों में उलझना है या इसी प्रकार के अनेकानेक लिया तो वह हतप्रभ सी चन अतियां, जड़ हो जाता है एक पिता अपनी सारे चातुर्य और धन-बल को लगाकर अपनी योग्य और सुशिक्षित पुत्री का विवाह किसी प्रतिष्ठित परिवार में करता है किन्तु विवाह के बाद पता चलता है, कि उसका पति परपीड़क (Sadist) प्रवृत्ति का है या उसकी और से विवाह के बाद अधिक की नाग की जाती है अथवा तलाक की धमकी मिलने लगती है, तो ऐसी स्थिति में परिवार की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए उस परिवार को किन दावों से गुजरना पडता है। इसका यत्र विज्ञान अनुमान तो कोई प्रत्यक्षदर्शी ही कर सकता है। ए

क व्यक्ति अपनी जीवन भर की पूँजी को मकान बनवाता है और सोचता है, कि उसे नित्य मकान मालिक के तानों, उलाहनों, धमकियों से मुक्ति मिल सकेगी, किन्तु बनवाने के बाद भूमि के स्वामित्व को लेकर और दावेदार खड़े हो जाते हैं या कोई कानूनी अन निकल आती है अथवा पड़ोसी दुष्ट प्रकृति का जाता है, तो ऐसे में वह घर उस गुड़ भरी हंसिया की हो जाता है, जो न उगली जा सकती है. न निगली सकती है। ऊपर तो ये केवन तीन उदाहरण हैं किन्तु जीवन का स्वरूप इन तीन उदाहरणों से परे कहीं अधिक विस्तारित है।

पग-पग पर व्यक्ति अनुभव करता है, कि उसने अपनी किसी समस्या के लिए जो समाधान प्राप्त किया है, वह तव में चार नई समस्याओं को जन्म देने वाला बनता रहा है और इस ऊहापोह में व्यक्ति इस तरह से कर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि उसके जीवन की गति, हृदय का उमंग, ओठों की मुस्कराहट सब कुछ खो जाती है। ऐसे में वह कोई भी चातुर्य कार्य नहीं करता है और लड़ते-लड़ते व्यक्ति उस स्थिति में पहुंच जाता है. कि उसके अन्दर चातुर्य प्रयोग करने की क्षमता भी नहीं रह जाती है। अन्त में वह हारे को हरिनाम या ‘हरि इच्छा, प्रभु इच्छा का मनत सलबरा ओढ़ एक घुटन में घिर कर रह जाता है।

साधनाएं केवल ऐकान्तिक सुख अथवा समाधि को उपलब्ध करवा देने का माध्यम नहीं होती और जो होती हैं उन्हें कुछ समय के लिए विश्राम दे देना चाहिए जब तक जीवन की ऐसी ही स्थितियों के निश्चित और फलप्रद समाधान न मिल जाएं, क्योंकि साधना का सारा अस्तित्व ही जिस आधार पर टिका है वह है ‘विद्रोह’ । भाग्य साधना ने भाग्य लिपि में क्या अंकित किया है, यह पढ़ने का अवकाश साधक के पास नहीं होता और न होना चाहिए। साधक का तात्पर्य ही होता है कि वह अपनी इच्छानुसार परिवेश का निर्माण स्वयं कर लेता है और इसमें माध्यम बनाता है विविध साधनाओं को यथार्थ शिष्य केवल गुरु-गुरु की रट नहीं लगाता, वरन जीवन की समस्याओं का समाधान स्वयं अपने पौरुष से पाने का प्रयास करता है।

इस लेख के प्रारम्भ में जिस पौरुष की चर्चा की उसका वस्तुतः यही तात्पर्य है। पौरुषता का तात्पर्य केवल एक पुरुष शटीर और बात-बात पर ऐंठने से नहीं होता, वरन् जहां कोई भी साधक अथवा साधिका जीवन की विविध स्थितियों का शान्त चित से आकलन कर उनका उपाय सोचता है और यह चिन्तन करता है, कि इसके लिए कौन सी मुक्ति फलप्रद होगी, वह भी पौरुष ही है। साधना भी एक प्रकार की ही विषय वस्तु है यह अलग बात है. कि आज साधना के क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले व्यक्ति की धारणा एक अव्यवहारिक, अब्बाक और प्रायः पोंगा के रूप में की जाती है किन्तु जो यथार्थ में साधना के क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले व्यक्ति को जिन आलोडनों विलोड़गों का सामना करना पड़ता है।

एक ओर उनमें प्रबल वेग, पौरुष, क्रोध और ज्ञान का समुद्र सा उमड़ता रहता है, तो वहीं उन्हें क्षमा, प्रेम, करुणा और शान्त मनःस्थिति जैसे सर्वथा विरोधी भावों का आश्रय लेकर समाज में एक सामान्य व्यक्ति की तरह गतिशील होते हुए सकारात्मक व निर्माणात्मक कार्यों को पूर्णता भी देनी होती है और ऐसे व्यक्तित्व ही सही अर्थों में दत्त महाविद्याओं में से किसी भी महाविद्या के यथार्थ साधक हो सकते हैं। अन्तर इस बात से नहीं पड़ता है, कि कौन सा साधक किस महाविद्या की साधना में लीन है. यरन मुख्य यहीं है, कि क्या महाविद्या साधना मैं प्रवृत्त पूर्व एक पृष्ठभूमि का निर्माण कर चुका है।

जगदम्बा का कोई भी स्वरूप हो और किसी कारण जहां महाविद्याओं में एक ओर से शक्ति प्रवाह रहता है वहीं दूसरी ओर से प्रेम, ममता जैसे भावों की भी समाहिती होती है, जो इन को साथ लेता है यही महाविद्या साधनाओं में सकता है और जिसने जीवन में किसी एक साधना में भी सफलता प्राप्त कर ली. उसका आलोकित हो जाता है।

मस्ता साधना भी इसी श्रेणी की एक समुच्चय है जिसका समाज में भयवश और भ्रमवश अत्यन्त प्रसार हो सका है। इसके नाम के अनुरूप यह मिथ्या धारणा कर लेते हैं, कि इस साधना होने पर यदि साधना में कोई चूक हो गई, तो देवी सिर के टुकड़े-टुकड़े (छिन्नमस्तक) कर देंगी। यह है कि केवल छिन्नमस्ता ही नहीं किसी भी महाविद्या के पूर्ण क्रम में प्रवेश करने पर गुरु निर्देशन में नियमों का दृढ़ता से पालन करना पड़ता है, किन्तु यह तात्पर्य नहीं कि साधक किसी देवी या देवता के मात्र से भयभीत होकर उससे सम्बन्धित साधना का ही त्याग दे।

किसी भी शक्ति का तात्पर्य केवल यह नहीं होता, कि साधक पहले पूर्णता प्राप्त करे तभी उसके (उस शक्ति) विविध प्रयोग करे, अपितु जिनको अपने जीवन में समाहित कर सहज ही दैनदिन जीवन में आने वाली कठिनाईयों से मुक्ति पाता हुआ अपने अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति में सहजता और निर्द्वन्द्वता से प्रविष्ट हो सके। प्रस्तुत छिन्नमस्ता साधना के साथ भी यही तथ्य है, कि आवश्यक नहीं, कि पहले साधक छिन्नमस्ता की सिद्धि करे तभी इस प्रयोग को सम्पन्न करने की पात्रता प्राप्त कर सके।

दूसरे शब्दों में यहां छिन्नमस्ता महाविद्या साधना की विधि नहीं अपितु छिन्नमस्ता महाविद्या पर आधारित एक ऐसे प्रयोग की प्रस्तुति की जा रही है, जिसे सम्पन्न कर साधक जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में निर्विघ्नता की स्थिति प्राप्त कर सकता है। जीवन का कोई भी महत्वपूर्ण कार्य कट लेता है, तो न केवल उसका विशेष कार्य ही निर्विघ्नता पूर्वक सम्पन्न होता है वरन् आगे की सम्भावित सभी विपरीत स्थितियों का समाधान भी हो जाता है।

Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना विधि

प्रस्तुत प्रयोग में आवश्यक उपकरण के रूप में साधक के पास ताम्र-पत्र पर अंकित छिन्नमस्ता यंत्र’, ‘दो दि मधुररूपेण रुद्राक्ष (जो छिन्नमस्ता की दो अभिन्न शक्तियां जया और विजया के प्रतीक है) छिन्नमस्ता माता होनी आवश्यक है। साधक इस साधना को किसी भी मंगलवार की रात्रि में दस बजे के आस-पास प्रारम्भ कर सकता है। यह एक दिवसीय साधना है, अतः विशेष श्रमसाध्य भी नहीं है। साधक स्वयं लाल रंग की धोती पहन दक्षिण मुख हो. न लाल रंग के आसन पर ही बैठें और सामने लकड़ी के में बाजोट पर लाल रंग का वस्त्र बिछाकर समस्त साधना क सामग्रियों की स्थापना कर दें।

दोनों धुपे रुद्रावर यंत्र दाई  ओर  बाई  और रखें तथा समस्त साधना सामग्री का पूजन सिन्दूर व अक्षत से करें। यदि सम्भव हो, तो लाल रंग के पुष्प चढ़ाएं। अगरबत्ती अथवा धूप लगाने की विशेष आवश्यकता नहीं है किन्तु तेल का इतना बड़ा दीपक अवश्य जला लें, जो समस्त मंत्र जप के काल में प्रज्ज्वलित रहे। इसके पश्चात् साधक अपनी जिस मनोकामना की मूर्ति में तत्पर होने जा रहा है, उसका मन ही मन स्मरग करें मनोकामना किसी भी प्रकार की हो उसमें संकोच में करने की आवश्यकता नहीं है। यह प्रयोग प्रत्येक मनोकामना के प्रति समान रूप से प्रभावी है किन्तु साधक को प्रत्येक नई मनोकामना चाहे वह रोजगार की प्राप्ति से सम्बन्धित हो अथवा व्यवसाय को प्रारम्भ करने से अथवा विवाह या सन्तान या गृहस्थ सुख से प्रत्येक बार नई साधना सामग्री के साथ ही प्रयोग को सम्पन्न करें मनोकामना स्मरण के पश्चात देवी के उग्र स्वरूप का ध्यान करते हुए और मन में । यह भावना करते हुए, कि उनके वरदायक प्रभाव से साधक का पथ निष्कंटक हो रहा है।

Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना ध्यान

मास्वमण्डलमध्यमां निजशिरश्छित्रं विकीर्णालिक स्फारास्यं प्रपिवद्गलात्स्वधिरं वामे करे विभ्रतीम् याभासक्तरतिस्मारोपरिगतां सख्याँ निजे डाकिनीवर्णिन्यौ परिदृश्य मोदकलितां श्रीछिन्नमस्तां भजे ॥

साधक छिन्नमस्ता माला से निम्न मंत्र की केवल 21 माला मंत्र जप सम्पन्न करें।

मंत्र. ।। ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं वैरोचनीये ह्रीं फट् स्वाहा OM SHREEM HREEM HREEM KLEEM AVIEM VAJRAVAIROCHANEFYE HROUM HREEM PHAT SWAHA

मंत्र जप के पश्चात् दूसरे समस्त सामग्रियों का किसी पवित्र सरोवर में विसर्जित कर दें।

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Sapneshwari sadhna - स्वप्नेश्वरी त्रिकाल दर्शन साधना Ph.85280 57364

 

Sapneshwari sadhna – स्वप्नेश्वरी त्रिकाल दर्शन साधना Ph.85280 57364 यह साधना प्रत्येक मानव के लिए आवश्यक है, जो साधक ऊंचे स्तर की साधना नहीं कर पाते या जिन्हें इतना अवकाश नहीं मिलता, उन्हें स्वप्नेश्वरी साधना  Sapneshwari sadhna सम्पन्न करनी चाहिए जिससे कि वे जीवन में स्वयं का तथा दूसरे लोगों का कल्याण कर सकें। इस साधना से आप भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी हासिल कर सकते है हर सवाल का जवाब आपको सपने के माध्यम  हासिल कर सकते है।  

 

जीवन की अनेक समस्याएं होती है. अनेक बाधाएं होती हैं, चाहे वह प्रेम-प्रसंग का विषय हो अथवा ऋण से मुक्ति का. जिनका स्पष्ट रूप से उल्लेख भी नहीं किया जा सकता और जिनका समाधान प्राप्त करना भी आवश्यक होता है।

और ऐसी ही स्थितियों में बत जाती है सहायक ऐसी कोई विशिष्ट साधना जो त्वरित फलप्रद हो स्वप्नेश्वरी साधना  Sapneshwari sadhna उसी त्वरित फलप्रद श्रेणी की साधना है। प्रयोग जब भी कोई समस्या आपके सामने हो और उसका हल नहीं मिल रहा हो, तो इस प्रकार मन्त्र जप किया हुआ साधक उस समस्या को कागज पर लिख ले और रात्रि को सिरहाने रख कर सो जाय, रात्रि को स्वप्नेश्वरी Sapneshwari देवी स्वप्न में ही उस समस्या का हल स्पष्ट रूप से बता देती हैं,

 

जिससे कि साधक को निर्णय करने में आसानी होती है। साधक चाहे तो किसी भी व्यक्ति की समस्या इसी प्रकार से हल कर सकता है, उदाहरण के लिए व्यक्ति का प्रमोशन किस तारीख को होगा या मैं अमुक व्यक्ति के साथ लेन-देन कर रहा हूँ, यह ठीक रहेगा या नहीं, ऐसे प्रश्न स्पष्ट रूप से कागज पर लिख लेने चाहिए, और अपने सिरहाने रात्रि को सोते समय देख लेने चाहिये, तत्पश्चात् स्वप्नेश्वरी देवी  Sapneshwari को मन ही मन प्रणाम कर सो जाना चाहिए, ऐसा करने पर उसे रात्रि को ही स्वप्न में उसका प्रामाणिक हल मिल जाता है। वस्तुतः यह महत्वपूर्ण साधना है, और साधक इसके माध्यम से साधक हजारों-लाखों लोगों का कल्याण कर सकता है।

 

स्वप्नेश्वरी देवी साधना  Sapneshwari sadhna विधान

Sapneshwari sadhna - स्वप्नेश्वरी त्रिकाल दर्शन साधना Ph.85280 57364

 

इस साधना के लिए मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त स्वप्नेश्वरी यंत्र स्वप्नेश्वरी देवी का चित्र आवश्यक है, तथा यह यंत्र तांबे के पतरे पर या चांदी के पतरे पर बना हुआ लेना चाहिए तथा उस चित्र को मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त चैतन्य कर देना चाहिए, जिससे कि उसका प्रभाव मिल सके, यदि आपके शहर में योग्य पण्डित हो, तो प्राण प्रतिष्ठा की जा सकती है,

स्वप्नेश्वरी देवी के चित्र को फ्रेम में मढ़वा कर रख साधना प्रारम्भ करने से पूर्व चावल, कुकुम या केशर, जल का लोटा, दीपक, अगरबत्ती पहले से ही तैयार करके रख देनी चाहिए। यह साधना सोमवार से प्रारम्भ की जाती है।

यह मात्र पांच दिन की साधना है। इसमें नित्य 101 मालाएं फेरनी आवश्यक है, इस साधना में हकीक का ही प्रयोग किया जाता है, अन्य मालाएं वर्जित हैं। यह साधना दिन को या रात्रि को भी की जा सकती है। साधक चाहे तो पचास मालाएं दिन को तथा इक्यावन मालाएं रात्रि को भी कर सकता हैं. इस प्रकार दिन और रात में दो बार में पूर्ण मंत्र जप हो जाना चाहिए।

माला सोमवार को साधक स्नान कर धोती पहन कर उत्तर की ओर मुंह कर बैठ जायें, सामने लकड़ी के बाजोट पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा दें और उस पर स्वप्नेश्वरी देवी का यंत्र व स्वप्नेश्वरी देवी का चित्र स्थापित कर दें, इसके बाद अलग बर्तन में स्वप्नेश्वरी देवी के यंत्र को जल से, फिर कच्चे दूध से तथा फिर जल से धोकर पोंछकर बाजोट पर रखे किसी पात्र में यंत्र को स्थापित कर दें, यह पात्र ताम्बे का स्टील या चांदी का हो सकता है, फिर कुकुम या केशर से तिलक करें सामने अगरबत्ती व दीपक लगायें दूध का बना प्रसाद चढ़ायें और

फिर एकनिष्ठता से ध्यान करें-

ध्यान स्वप्नेश्वरी देवी  Sapneshwari 

स्वप्नेश्वरी नमस्तुभ्यं फलाय वरदाय च। मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्व प्रदर्शयः ।।

मंत्र स्वप्नेश्वरी देवी  Sapneshwari devi 

फिर नीचे लिखे मंत्र की एक सौ एक मालाएँ नित्य जये मंत्र  ॐ  ह्रीं स्वप्नेश्वरी ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं की ॐ ॥ OM KREEM KREEM KREEM HREEM HREEM SWAPNESHWARI HREEM HREEM KREEM KREEM KREEM OM

इस प्रकार नित्य एक सौ एक माला मंत्र जप करें. इन पांच दिनों में साधक जमीन पर सोयं, एक समय भोजन करें। पांच दिन तक मंत्र जप के बाद छठे दिन इसी मंत्र की मात्र शुद्ध घृत से एक हजार एक आहुतिया दें, फिर पांच कुमारी कन्याओं को भोजन करायें और उन्हें यथोचित यस्त्र दान आदि देकर सन्तुष्ट करें, इस प्रकार करने पर साधना सम्पन्न मानी जाती है। ‘इस का इस्तमाल कैसे करना है वो लेख में पहले ही बता दिया गया है 

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आज हम  क्रिया योग Kriya Yoga के सम्बन्धी जानकारी प्रदान करेंगे इस पोस्ट  क्रिया योग Kriya Yoga का प्रयोग और मंत्र भी प्रदान किया जाएगा आप इस पोस्ट  को पूरा पढ़े  अन्तर्मन तथा बाह्यमन को बोड़ कर मानव को ध्यान, धारणा और समाधि की ओर ले जाने वाला है


यह क्रिया योग Kriya Yoga सिद्धि प्रयोग क्रिया योग Kriya Yoga में व्यक्ति के लिए किसी प्रकार का कोई भेद बाधक नहीं होता है, किन्तु इसके लिए योग्य गुरु का मार्गदर्शन नितान्त आवश्यक है। वैसे तो क्रिया योग Kriya Yoga के लिए नियम, आसन, प्राणायाम आदि आवश्यक है, लेकिन मंत्रात्मक साधना से इसमें अनुकूलता की सम्भावनाएं निश्चय ही बढ़ जाती हैं।

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मानव शरीर इतना रहस्यमय है कि हजारों वर्षों से वैज्ञानिक, चिकित्सक, योगी व साधक इसके रहस्य को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं और प्रत्येक बार यही अनुभव होता है कि अभी बहुत कुछ जानना है

फिर भी मानव का यह प्रयत्न रहा है कि यह अधिक से अधिक इस बारे में ज्ञान अर्जित करे और अपने ज्ञान का अनुभव आने वाली पीढ़ी को दे। गहराई से विचार करने पर स्पष्ट होता है, कि मानव मन दो हिस्सों में विभक्त है- अन्तर्मन एवं बाह्यमन। हम इसे अन्तश्चेतना तथा बहिश्चेतना भी कह सकते हैं। इसमें अन्तश्चेतना सर्वदा सक्रिय शुद्ध एवं निर्मल बनी रहती है।

 

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मानव जो भी दैनिक कार्य व्यवहार अपनाता है. उसकी प्रेरणा में बहिश्चेतना की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, अन्तश्चेतना की नहीं, क्योंकि अन्तश्चेतना मानव को विशुद्ध मानव और उसमें देवत्व बनाए रखने में सहायक होती है। क्रिया योग Kriya Yoga में व्यक्ति अपनी बहिश्चेतना का सम्पर्क अन्तश्चेतना से करता है और अन्तश्चेतना प्रायः सभी विकारों से मुक्त रहती है।

उस पर न तो किसी प्रकार के विकारों का प्रभाव पड़ता है और न ही वह बहकावों में आती है, क्योंकि उसमें पूर्ण देवत्व का भाव होता है। यह अन्तश्चेतना ही मानव को सही अर्थों में मानव बनाए रखती है और देवत्व की ओर अग्रहार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इसलिए बहिश्चेतना को अन्तश्चेतना से जोड़ने की क्रिया महत्वपूर्ण होती हैं और मानव को विकारों से मुक्त कटाने का यह एक सुन्दरतम प्रयास है। जब अन्तर्मन और ब्राह्ममन परस्पर जुड़ जाते है. तो इन दोनों मन को जोड़ने की क्रिया ही, क्रिया योग Kriya Yoga कहलाती है।

इस दशा में अर्थात् दोनों मन जुड़ने की प्रक्रिया में व्यक्ति एक दिव्य प्रकाश की अनुभूति अपन अन्दर महसूस करने लगता है, जिससे उसके तनाव समाप्त होने लगते हैं। उसे आनन्द की अनुभूति होने लगती है और वह समझा लेता है, कि वास्तविक सुख हमारे अन्दर मौजूद है, जिसे कहीं बाहर से नहीं लाना पड़ता है।

क्रिया योग Kriya Yoga के मुख्य रूप से तीन आधार है – ध्यान, धारणा और समाधि इसमें ध्यान ऐसी प्रक्रिया है. जो व्यक्ति को निरन्तर चैतन्यता, मानसिक विश्राम और गति प्रदान करती है।

Kriya Yoga  के तीन भाग  ध्यान , धारणा  समाधि’ पूरी जानकारी 

 

 1 ‘ध्यान’ का तात्पर्य यह है, कि मानो जल शान्त हो और हम उसकी तलहटी में देख सकें वास्तव में ध्यान अपने अन्दर की समस्त बेचैनी छटपटाहट, व्यग्रता और तनाव को समाप्त करने की प्रक्रिया है।

ध्यान योग की दशा में जब साधक अपने अन्तर्मन ने उतरता है, तो प्रारम्भ में एक प्रकाश का बिन्दु दिखाई देता है और धीरे-धीरे इस प्रकाश का घेरा बढ़ता जाता है आरम्भ में यह बिन्दु छोटा सा एवं नीली आभा लिए तुभ्य बढ़ने के क्रम में प्रकाश का परा लगता है और आगे बढ़ने पर उसे कई रम या जाती दिखने लगते हैं।

यह ध्यान योग में प्रगति का है। ध्यान में और अधिक एकाग्रता आने पर रंग भी दिखाई देना बंद हो जाते हैं और सफेद तेज प्रकाश दृष्टिगोचर होने लगता है। इस प्रकाश का दृष्टिगोचर होना की तृतीय नेत्र खुलने की स्थिति है. जिससे साधक को स्वयं का तथा अन्य किसी का भी भविष्य वर्तमान स्पष्ट होने लगता है।

 

2 धारणा   ध्यान से आगे की जो स्थिति है वह है ‘धारणा’ ‘धारणा’ का अर्थ है, अपने आप में लीन हो जाना। इस अवस्था में पहुंच कर व्यक्ति संसार में केवल साक्षी नाव से रहता है अर्थात् सासारिक माया-मोह उस पर व्याप्त नहीं होते हैं और उसमें दृष्टा भाव उत्पन्न हो जाता है और यह परमहंस की स्थिति में आ जाता धारण के पश्चात की जो अवस्था होती है वह ‘समाधि’ की होती है। ‘

 

3 समाधि’ का तात्पर्य यह है, कि अपने को विस्मृत कर देना, स्वय को पूर्णता तक पहुंचा देना, पूरे ब्रह्माण्ड में स्वयं को एकाकार कर देना, समस्त ब्रह्माण्ड में सशरीर विचरण करने की क्षमता अर्जित कर लेना और प्रकृति के कार्यों में हस्तक्षेप करके उसको अपने अनुकूल बना देना |

समाधि अवस्था प्राप्त करने पश्चात् व्यक्ति पुनः जन्म नहीं लेता, वह तो फिर अवतरित हो सकता है। ऐसी अवस्था में उसका चेहरा अपने आप में देदीप्यमान हो जाता है और वह पूर्णता प्राप्त कर लेता है। क्रिया योग Kriya Yoga वास्तव में अपने शरीर के मल का निवारण कर, ऐसा विव्यतम बनाने का एक सुन्दर एवं विशिष्ट प्रयास है, जिससे उसमें ईश्वरत्व | स्पष्ट हो जाता है। क्रिया योग Kriya Yoga की उच्चतम अवस्था निर्विकल्प समाधि की होती है, जिसे निर्विचार मन की प्राप्ति तक ले जाया जा सकता है। निर्विचार मन बनाकर व्यक्ति स्वतः ही अपना उपचार कट सकता है।

विदेशों में तकनीक को ‘मॉटोहीलिंग’ कहते हैं। हमारे देश में प्राय: इसे योग निद्रा की संज्ञा दी जाती. है। क्रिया योग Kriya Yoga की स्थिति निर्मित होने के लिए इतने अधिक प्राणायाम व यौगिक क्रिया कर पाना प्रत्येक साधक के लिए सम्भव ना होता है इसकी भूमि में कई कारण होते हैं. जैसे उचित मार्गदर्श का अभाव।

यौगिक क्रियाएं बिना प्रयोगात्मक मार्गदर्शन के करना उचित नहीं रहता है प्रयोगात्मक दैनिक प्रशिक्षण आज के व्यस्ततम युग में हर साधक के लिए उपलब्ध नही हो पाता है, क्योंकि आज के युग में धौगिक प्रशिक्षण केन्द्रों का नितान्त अभाव ही है।

क्रिया योग Kriya Yoga के लिए साधनात्मक मार्ग एक सवल एवं व्यवस्थित मार्ग के रूप में अपनाया जा सकता है। इसमें ज्यादा कठिन एवं यौगिक क्रियाएं, व्यायाम, आसन अथवा हठ योग की क्रियाओं की आवश्यकता नहीं होती है, अपितु अपने दैनिक कार्य को सम्पादित करते हुए प्रतिदिन कुछ समय नित्य मंत्र जप कर अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। इस प्रयोग में आपको नित्य एकटक होकर यत्र पर देखते हुए जप करना है. इससे ध्यान की स्थिति प्रारम्भ होती है। प्रारम्भ में घर की समस्याएं आफिस की।

उलझने स्वतः ही कम हो जाएगी और आपको स्पष्ट मार्ग मिलने लगेगा। यत्र विज्ञान इस प्रयोग को सम्पन्न करने पर निर्दिचार मस्तिष्क की अवस्था आने लगती है, क्योंकि हमारे मस्तिष्क में एक सेकण्ड में लाखो विचार आकर चले जाते हैं, हम भविष्य के बाने-बाने इन विचारों से जोड़ते रहते हैं और इनका दुष्प्रभाव यह होता है, कि मस्तिष्क जो भी उच्चकोटि कि योगी व साधक होते हैं, वे अपने को प्राप्त करने के लिए अन्तश्चेतना का विकास करने में रेलवे रहते हैं और इसके विकास से वे अपने लक्ष्य तिक पहुंचने का सामर्थ्य अर्जित कर लेते हैं।

हमारा चेतन मन बुद्धि से प्रभावित होकर अधिक क्रियाशील हो जाता है, जबकि अवचेतन मन उपेक्षित सा रह जाता है और इसका दुष्प्रभाव यह होता है, कि यदि जीवन में एकाएक विपरीत परिस्थिति आ जाये, तो अवचेतन मन साथ नहीं देता है और नर्वस ब्रेकडाउन की स्थिति तक बन जाती है। इसका एकमात्र व सरल निदाल ही हैं निर्विचार मस्तिष्क । |

के कोमल तन्दुओं पर अधिक दबाव पड़ता है और व्यक्ति मानसिक पंगु हो जाता है और उसके मस्तिष्क का विकास नहीं हो पाता है। 2 3. विचार शून्य की स्थिति में व्यक्ति अपने लघु देह व लघु परिवेश से कटकर समस्त ब्रह्माण्ड का एक अंश बनने की प्रक्रिया में होता है और तब उसे भावना रखनी चाहिए में असीमित शक्ति के रूप में एक पुंजीभूत रूप ने, समस्त ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी व्याप्त है, उसमें विस्तारित हो रहा हूं। यह मात्र कल्पना का विषय नहीं है वरन इस समस्त ब्रह्माण्ड में ईश्वर तत्व का जो विस्तार है और जिसके द्वारा ही तरंगों का संचरण सम्भव हो पाता है, उसके द्वारा व्यक्ति अपनी मानसिक तरंगों का विस्तार कर बैठे सकता है।

एक स्थान पर बैठ कर ही सैकड़ों मील दूर व्यक्ति को आज्ञा दी जा सकती है। 4. 5. 6. सूक्ष्म शरीर के माध्यम से सैकड़ों मील टूट जाया जा सकता है। दूरस्थ स्थानों का वार्तालाप सुना जा सकता है तथा इसी प्रकार के कार्य जो अचटज मटे प्रतीत होते हैं, मानसिक क्षमता के विस्तार से सम्भव है। किया योग सिद्धि का एक विशिष्ट प्रयोग दिया जा रहा है, जो साधक अपने जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करना चाहें, में इस तरह के प्रयोग को सम्पन्न कर आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने का सुन्दर सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।


क्रिया योग Kriya Yoga  साधना  प्रयोग विधि

क्रिया योग साधना  प्रयोग विधि  1 इस प्रयोग को  या किसी भी रविवार को कर सकते हैं। 4. सुगन्धित अगरबत्ती व घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर दें और दैनिक साधना विधि पुस्तक के अनुसार गुरु पूजन तथा यंत्र का पूजन करे। इसके पश्चात् क्रिया सिद्धि माला से ही गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप 5 दिन तक करें मंत्र  साधक प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण करें तथा सफेद सूती आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुह कर बैठें।

सर्वप्रथम अपने सामने बाजोट पर वस्त्र बिछाकर उस पर किसी तांबे के पात्र में क्रिया योग Kriya Yoga यंत्र स्थापित करें। उसके सम्मुख किया सिद्धि माला स्थापित कर दें।

क्रिया योग साधना मंत्र 

॥ ॐ ह्रीं ह्रीं ऐं क्रिया सिद्धिं ॐ ॥ OM HREEM HREEM AYEIM KRIYA SIDDHIM OM 7.

. प्रतिदिन मंत्र जप के पश्चात् पद्मासन या सिद्धासन में बैठे हुए मेरुदण्ड सीधा रखें और ध्यान नासिकाय पर कर यह अनुभव करें, कि मैं निरन्तर विराट पुरुष को अपने चारों ओर देख रहा हूं. मुझमें तेजस्विता, श्रेष्ठता और दिव्यता बढ़ती जा रही है, उनके संरक्षण में मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जा रहा हूँ। मैं प्रसन्नचित्त हूँ मेरा रोम-रोम प्रसन्नता और संतोष से खिल रहा है, क्योंकि मेरी बुद्धि में सात्विकता सेजस्विता दिव्यता और समर्थ्यता है। इस तरह उक्त भावना का मनन धीरे-धीरे पांच था दस मिनट तक करें, ताकि इन विचारों की स्थायी छाप मन पर पड़ती रहे। इसके पश्चात् गुरुदेव जी को प्रणाम कर नित्य प्रयोग सम्पन्न करें।

पांच दिन के पश्चात यत्र तथा माला किसी नदी में प्रवाहित कर दें। पांच दिन के पश्चात नित्य प्रातः 4 बजे से 6 बजे के बीच मे कभी भी 10 मिनट तक उपरोक्त क्रम संख्या को अनुसरण तीन माह तक करें। विशेष-साधना प्रारम्भ करने से पूर्व नित्यक्रम में नेति व यस्ती आदि क्रियाएं और हल्का सा व्यायाम कर लें, तो ज्यादा उचित है।

प्रयोग सम्पन्न करने के उपरान्त हल्का फलाहार या दूध अपनी सुविधानुसार ग्रहण कर लें, तत्पश्चात् ही अपने दैनिक कार्य को कसी भी सम्पादित करें। सुगन्धित अगरबत्ती व घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर दें और दैनिक साधना विधि पुस्तक के अनुसार गुरु पूजन तथा यंत्र का पूजन करे।

 इसके पश्चात् क्रिया सिद्धि माला से ही गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप 5 दिन तक करें – मंत्र  साधक प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण करें तथा सफेद सूती आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुह कर बैठें। सर्वप्रथम अपने सामने बाजोट पर वस्त्र बिछाकर उस पर किसी तांबे के पात्र में क्रिया योग Kriya Yoga यंत्र स्थापित करें। उसके सम्मुख किया सिद्धि माला स्थापित कर दें। ।।

ॐ ह्रीं ह्रीं ऐं क्रिया सिद्धिं ॐ ॥ OM HREEM HREEM AYEIM KRIYA SIDDHIM OM

इस तरह उक्त भावना का मनन धीरे-धीरे पांच था दस मिनट तक करें, ताकि इन विचारों की स्थायी छाम मन पर पड़ती रहे। इसके पश्चात् गुरुदेव जी को प्रणाम कर नित्य प्रयोग सम्पन्न करें। पांच दिन के पश्चात यत्र तथा माला किसी नदी में प्रवाहित कर दें। पांच दिन के पश्चात नित्य प्रातः 4 बजे से 6 बजे के बीच मे कभी भी 10 मिनट तक उपरोक्त क्रम संख्या 6 को अनुसरण तीन माह तक करें।

विशेष साधना प्रारम्भ करने से पूर्व नित्य क्रम में नेति व यस्ती आदि क्रियाएं और हल्का सा व्यायाम कर लें, तो ज्यादा उचित है। प्रयोग सम्पन्न करने के उपरान्त हल्का फलाहार या दूध अपनी सुविधानुसार ग्रहण कर लें, तत्पश्चात् ही अपने दैनिक कार्य को सम्पादित करें।

 प्रतिदिन मंत्र जप के पश्चात् पद्मासन या सिद्धासन में बैठे हुए मेरुदण्ड सीधा रखें और ध्यान नासिकाश पर कर यह अनुभव करें, कि मैं निरन्तर विराट पुरुष को अपने चारों ओर देख रहा हूं. मुझमें तेजस्विता, श्रेष्ठता और दिव्यता बढ़ती जा रही है, उनके संरक्षण में मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जा रहा हूँ। मैं प्रसन्नचित्त हूं. मेरा रोम-रोम प्रसन्नता और संतोष से खिल रहा है, क्योंकि मेरी बुद्धि में सात्विकता, तेजस्विता, दिव्यता और समर्थ्यता है। 

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पद्मावती मंत्र साधना – भविष्य जानने की विद्या ph.85280 57364

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पद्मावती मंत्र साधना - भविष्य जानने की विद्या ph.85280 57364

पद्मावती मंत्र साधना – भविष्य जानने की विद्या ph.85280 57364

 

पद्मावती मंत्र साधना - भविष्य जानने की विद्या ph.85280 57364
पद्मावती मंत्र साधना – भविष्य जानने की विद्या ph.85280 57364

पद्मावती मंत्र साधना – भविष्य जानने की विद्या ph.85280 57364 आप सभी कैसे हो मैं उम्मीद करता हूं आप लोग सही सलामत से होंगे हम मां भगवती से यही कामना करता हूं आप लोग इधर भी हो उधर खुश रहो चलिए दोस्तों आज पूछा लगाने का कुछ मैं प्रयोग में बताऊंगा दोस्तों क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में जॉन सभी साधक साधिकाएं होंगे तो इसका बारे में मालूम होगा दोस्तों ठीक है यह जो 1 घंटा है ठीक है मुझे का जॉन होता है ना वह है दोस्तों ठीक है क्योंकि हमारे इधर बहुत और आकर दोस्तों पूछा लगता है ठीक है तो यह जो एक तरीका है दोस्तों मुझे बहुत अच्छा लगता है दोस्तों ठीक है इसका एक मंत्र है दोस्तों वैदिक है  ठीक है किसी का भी भूत भविष्य वर्तमान जान सकते है सर्व ज्ञान हो जाएगा आपको 

 

भूत भविष्य वर्तमान जानने का मंत्र |

ॐ ह्रीं पद्मावतीं देवीं कथय कथय स्वाहा ।

साधन विधि – दो वर्ष तक प्रतिदिन १०८ बार इस मन्त्र का जप
करने से यह विद्या सिद्ध होती है । विद्या सिद्ध हो जाने पर साधक
को सब विषयों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है । जो भक्त योगी शैया पर
बैठ कर रात्रि के समय इस मन्त्र का प्रतिदिन १०८ बार जप करता
है, वह प्रतिदिन के समस्त हितकर वृतान्त को जान लेता है । तन्त्र
शस्त्रों में कहा गया है कि इस मन्त्र के साधक को ब्रह्मा, विष्ण आदि
का तथा त्रैलोक्य का वृतान्त भी ज्ञात हो जाता है । शुभदायिनी
पद्मावती विद्या उससे स्वप्न में सब वृतान्त कहती हैं ।