Author: Rodhar nath

मैं रुद्र नाथ हूँ — एक साधक, एक नाथ योगी। मैंने अपने जीवन को तंत्र साधना और योग को समर्पित किया है। मेरा ज्ञान न तो किताबी है, न ही केवल शाब्दिक यह वह ज्ञान है जिसे मैंने संतों, तांत्रिकों और अनुभवी साधकों के सान्निध्य में रहकर स्वयं सीखा है और अनुभव किया है।मैंने तंत्र विद्या पर गहन शोध किया है, पर यह शोध किसी पुस्तकालय में बैठकर नहीं, बल्कि साधना की अग्नि में तपकर, जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे जीकर प्राप्त किया है। जो भी सीखा, वह आत्मा की गहराइयों में उतरकर, आंतरिक अनुभूतियों से प्राप्त किया।मेरा उद्देश्य केवल आत्मकल्याण नहीं, अपितु उस दिव्य ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना है, जिससे मनुष्य अपने जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझ सके और आत्मशक्ति को जागृत कर सके।यह मंच उसी यात्रा का एक पड़ाव है — जहाँ आप और हम साथ चलें, अनुभव करें, और उस अनंत चेतना से जुड़ें, जो हमारे भीतर है ।Rodhar nath https://gurumantrasadhna.com/rudra-nath/

Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph.85280 57364

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Chinnamasta Sadhana - छिन्नमस्ता साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph.85280 57364

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Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph.85280 57364

 

 

Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना मंत्र प्रयोग सहित Ph.85280 57364 आज हम  छिन्नमस्ता साधना की जानकारी प्रदान करेंगे। इस पोस्ट में साधको छिन्नमस्ता साधना का दैनिक ज़िंदगी में क्या महत्व है इस के बारे में बताया गया है और  दुर्गम मुनष्य जीवन को यह देवी कैसे सुगम बनाती है यह बताया गया है।  आप इस पोस्ट को विस्तार सहित पढ़े 

एक नहीं अनेक स्क बीज है इस जीवन में जिनका समूल नाश करता छिन्नमस्ता जो शक्ति का सर्वाधिक तीक्ष्ण स्वरूप है पौराणिक कथाओं में तो बस रक्तबीज की कथा मिलती है, किन्तु आज व्यक्ति के दैनंदिन जीवने में चारों और समस्या रूपी जो अनेक रक्तबीज खड़े हैं, उनके सहार का क्या उपाय किया जाए जैसे जैसे व्यक्ति की एक समस्या सुलझती है, कि उससे जुड़ी चार नई समस्याएं आ जाती है। केवल एक या दो वर्ष नहीं, पूरे के पूरे जीवन पर्यन्ता- ऐसी ही स्थितियों के लिए किया गया है शक्ति साधनाओं का सृजन और छिन्नमस्ता की साधना इनमें एक पृथक व विशिष्ट स्थान रखती है।सकती य विरोधाभासी धार प्रतीत है, किन्तु है शत प्रतिशत सत्य कि जहां कांच का पूर्ण प्रवाह होता है, वहीं प्रेस का भी पूर्ण प्रवाह सम्भव हो सकता है।

यह जो इस युग की तथाकथित सभ्यता है कि इन्हें दो परस्पर विरोधी गुणमान लिया गया है और ऐसा इस कारण हुआ है कि जीवन की गति तीव्र होने के साथ-साथ व्यक्ति ने पौरुष का आश्रय स्यांग हृदय के आवरण को ओढ़ लिया है। हृदय के आवरण के साथ गतिशील होने पर व्यक्ति को प्रारम्भिक सफलताएं सस्ती लोकप्रियता अवश्य मिल जाती है, किन्तु होती है सब बालू की भांति एक ही आघात से भरभरा कर गिर जाती है और इसका सर्वाधिक पुष्ट प्रमाण है दिन प्रतिदिन केवल विदेशों में ही नहीं

एक अहं विकसित कहे जाने वाले देश भारत में बढ़ती हृदय रोगियों की संख्या व्यक्ति किसी प्रकार से समस्त चतुराई को लगाकर कुछ अर्जित करता है, लेकिन पाता है, कि उसके कुछ अर्जित करते ही उससे जुड़ी चार और समस्याएं खड़ी हो गई हैं या यह अनुभव करता है, कि उसकी चतुराई से किए गए। अजून में संघ लगाकर उसे झपट लेने वाले और आ गए हैं, तो उसे अपना जीवन ही व्यर्थ लगने लगता है और वह इसी वेद में या तो अस्वस्थ होकर बिस्तर पकड़ लेता है या इस जगत को ही अलविदा कह देता है।

केवल हृदय रोग ही नहीं वरन निरन्तर बढ़ा रही आत्महत्याओं की संख्या भी प्रकार से इसी की और संकेत करती है। एक बेटोजगार व्यक्ति इधर-उधर से सम्पर्क कट, उच्चतम शिक्षा प्राप्त होने के बावजूद भी जब उत्कोच (घुस) देकर किसी नौकरी  को पाता है और नौकरी  पाने के बाद पाता है, कि उसकी समस्याओं का अन्त नहीं हुआ  ‘प्रारम्भ’ हुआ है।

अपने शीर्ष अधिकारी नित्य प्रणाम करना है, उनके बच्चों तक की ही नहीं कुते तक कोजी हजूरी करनी पड़ती है या उन्हें जोड़ो कर हर माह एक नियत राशि पहुंचानी होती है अथवा कार्यालय के राजनीतिक इन्हों में उलझना है या इसी प्रकार के अनेकानेक लिया तो वह हतप्रभ सी चन अतियां, जड़ हो जाता है एक पिता अपनी सारे चातुर्य और धन-बल को लगाकर अपनी योग्य और सुशिक्षित पुत्री का विवाह किसी प्रतिष्ठित परिवार में करता है किन्तु विवाह के बाद पता चलता है, कि उसका पति परपीड़क (Sadist) प्रवृत्ति का है या उसकी और से विवाह के बाद अधिक की नाग की जाती है अथवा तलाक की धमकी मिलने लगती है, तो ऐसी स्थिति में परिवार की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए उस परिवार को किन दावों से गुजरना पडता है। इसका यत्र विज्ञान अनुमान तो कोई प्रत्यक्षदर्शी ही कर सकता है। ए

क व्यक्ति अपनी जीवन भर की पूँजी को मकान बनवाता है और सोचता है, कि उसे नित्य मकान मालिक के तानों, उलाहनों, धमकियों से मुक्ति मिल सकेगी, किन्तु बनवाने के बाद भूमि के स्वामित्व को लेकर और दावेदार खड़े हो जाते हैं या कोई कानूनी अन निकल आती है अथवा पड़ोसी दुष्ट प्रकृति का जाता है, तो ऐसे में वह घर उस गुड़ भरी हंसिया की हो जाता है, जो न उगली जा सकती है. न निगली सकती है। ऊपर तो ये केवन तीन उदाहरण हैं किन्तु जीवन का स्वरूप इन तीन उदाहरणों से परे कहीं अधिक विस्तारित है।

पग-पग पर व्यक्ति अनुभव करता है, कि उसने अपनी किसी समस्या के लिए जो समाधान प्राप्त किया है, वह तव में चार नई समस्याओं को जन्म देने वाला बनता रहा है और इस ऊहापोह में व्यक्ति इस तरह से कर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि उसके जीवन की गति, हृदय का उमंग, ओठों की मुस्कराहट सब कुछ खो जाती है। ऐसे में वह कोई भी चातुर्य कार्य नहीं करता है और लड़ते-लड़ते व्यक्ति उस स्थिति में पहुंच जाता है. कि उसके अन्दर चातुर्य प्रयोग करने की क्षमता भी नहीं रह जाती है। अन्त में वह हारे को हरिनाम या ‘हरि इच्छा, प्रभु इच्छा का मनत सलबरा ओढ़ एक घुटन में घिर कर रह जाता है।

साधनाएं केवल ऐकान्तिक सुख अथवा समाधि को उपलब्ध करवा देने का माध्यम नहीं होती और जो होती हैं उन्हें कुछ समय के लिए विश्राम दे देना चाहिए जब तक जीवन की ऐसी ही स्थितियों के निश्चित और फलप्रद समाधान न मिल जाएं, क्योंकि साधना का सारा अस्तित्व ही जिस आधार पर टिका है वह है ‘विद्रोह’ । भाग्य साधना ने भाग्य लिपि में क्या अंकित किया है, यह पढ़ने का अवकाश साधक के पास नहीं होता और न होना चाहिए। साधक का तात्पर्य ही होता है कि वह अपनी इच्छानुसार परिवेश का निर्माण स्वयं कर लेता है और इसमें माध्यम बनाता है विविध साधनाओं को यथार्थ शिष्य केवल गुरु-गुरु की रट नहीं लगाता, वरन जीवन की समस्याओं का समाधान स्वयं अपने पौरुष से पाने का प्रयास करता है।

इस लेख के प्रारम्भ में जिस पौरुष की चर्चा की उसका वस्तुतः यही तात्पर्य है। पौरुषता का तात्पर्य केवल एक पुरुष शटीर और बात-बात पर ऐंठने से नहीं होता, वरन् जहां कोई भी साधक अथवा साधिका जीवन की विविध स्थितियों का शान्त चित से आकलन कर उनका उपाय सोचता है और यह चिन्तन करता है, कि इसके लिए कौन सी मुक्ति फलप्रद होगी, वह भी पौरुष ही है। साधना भी एक प्रकार की ही विषय वस्तु है यह अलग बात है. कि आज साधना के क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले व्यक्ति की धारणा एक अव्यवहारिक, अब्बाक और प्रायः पोंगा के रूप में की जाती है किन्तु जो यथार्थ में साधना के क्षेत्र में प्रविष्ट होने वाले व्यक्ति को जिन आलोडनों विलोड़गों का सामना करना पड़ता है।

एक ओर उनमें प्रबल वेग, पौरुष, क्रोध और ज्ञान का समुद्र सा उमड़ता रहता है, तो वहीं उन्हें क्षमा, प्रेम, करुणा और शान्त मनःस्थिति जैसे सर्वथा विरोधी भावों का आश्रय लेकर समाज में एक सामान्य व्यक्ति की तरह गतिशील होते हुए सकारात्मक व निर्माणात्मक कार्यों को पूर्णता भी देनी होती है और ऐसे व्यक्तित्व ही सही अर्थों में दत्त महाविद्याओं में से किसी भी महाविद्या के यथार्थ साधक हो सकते हैं। अन्तर इस बात से नहीं पड़ता है, कि कौन सा साधक किस महाविद्या की साधना में लीन है. यरन मुख्य यहीं है, कि क्या महाविद्या साधना मैं प्रवृत्त पूर्व एक पृष्ठभूमि का निर्माण कर चुका है।

जगदम्बा का कोई भी स्वरूप हो और किसी कारण जहां महाविद्याओं में एक ओर से शक्ति प्रवाह रहता है वहीं दूसरी ओर से प्रेम, ममता जैसे भावों की भी समाहिती होती है, जो इन को साथ लेता है यही महाविद्या साधनाओं में सकता है और जिसने जीवन में किसी एक साधना में भी सफलता प्राप्त कर ली. उसका आलोकित हो जाता है।

मस्ता साधना भी इसी श्रेणी की एक समुच्चय है जिसका समाज में भयवश और भ्रमवश अत्यन्त प्रसार हो सका है। इसके नाम के अनुरूप यह मिथ्या धारणा कर लेते हैं, कि इस साधना होने पर यदि साधना में कोई चूक हो गई, तो देवी सिर के टुकड़े-टुकड़े (छिन्नमस्तक) कर देंगी। यह है कि केवल छिन्नमस्ता ही नहीं किसी भी महाविद्या के पूर्ण क्रम में प्रवेश करने पर गुरु निर्देशन में नियमों का दृढ़ता से पालन करना पड़ता है, किन्तु यह तात्पर्य नहीं कि साधक किसी देवी या देवता के मात्र से भयभीत होकर उससे सम्बन्धित साधना का ही त्याग दे।

किसी भी शक्ति का तात्पर्य केवल यह नहीं होता, कि साधक पहले पूर्णता प्राप्त करे तभी उसके (उस शक्ति) विविध प्रयोग करे, अपितु जिनको अपने जीवन में समाहित कर सहज ही दैनदिन जीवन में आने वाली कठिनाईयों से मुक्ति पाता हुआ अपने अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति में सहजता और निर्द्वन्द्वता से प्रविष्ट हो सके। प्रस्तुत छिन्नमस्ता साधना के साथ भी यही तथ्य है, कि आवश्यक नहीं, कि पहले साधक छिन्नमस्ता की सिद्धि करे तभी इस प्रयोग को सम्पन्न करने की पात्रता प्राप्त कर सके।

दूसरे शब्दों में यहां छिन्नमस्ता महाविद्या साधना की विधि नहीं अपितु छिन्नमस्ता महाविद्या पर आधारित एक ऐसे प्रयोग की प्रस्तुति की जा रही है, जिसे सम्पन्न कर साधक जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में निर्विघ्नता की स्थिति प्राप्त कर सकता है। जीवन का कोई भी महत्वपूर्ण कार्य कट लेता है, तो न केवल उसका विशेष कार्य ही निर्विघ्नता पूर्वक सम्पन्न होता है वरन् आगे की सम्भावित सभी विपरीत स्थितियों का समाधान भी हो जाता है।

Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना विधि

प्रस्तुत प्रयोग में आवश्यक उपकरण के रूप में साधक के पास ताम्र-पत्र पर अंकित छिन्नमस्ता यंत्र’, ‘दो दि मधुररूपेण रुद्राक्ष (जो छिन्नमस्ता की दो अभिन्न शक्तियां जया और विजया के प्रतीक है) छिन्नमस्ता माता होनी आवश्यक है। साधक इस साधना को किसी भी मंगलवार की रात्रि में दस बजे के आस-पास प्रारम्भ कर सकता है। यह एक दिवसीय साधना है, अतः विशेष श्रमसाध्य भी नहीं है। साधक स्वयं लाल रंग की धोती पहन दक्षिण मुख हो. न लाल रंग के आसन पर ही बैठें और सामने लकड़ी के में बाजोट पर लाल रंग का वस्त्र बिछाकर समस्त साधना क सामग्रियों की स्थापना कर दें।

दोनों धुपे रुद्रावर यंत्र दाई  ओर  बाई  और रखें तथा समस्त साधना सामग्री का पूजन सिन्दूर व अक्षत से करें। यदि सम्भव हो, तो लाल रंग के पुष्प चढ़ाएं। अगरबत्ती अथवा धूप लगाने की विशेष आवश्यकता नहीं है किन्तु तेल का इतना बड़ा दीपक अवश्य जला लें, जो समस्त मंत्र जप के काल में प्रज्ज्वलित रहे। इसके पश्चात् साधक अपनी जिस मनोकामना की मूर्ति में तत्पर होने जा रहा है, उसका मन ही मन स्मरग करें मनोकामना किसी भी प्रकार की हो उसमें संकोच में करने की आवश्यकता नहीं है। यह प्रयोग प्रत्येक मनोकामना के प्रति समान रूप से प्रभावी है किन्तु साधक को प्रत्येक नई मनोकामना चाहे वह रोजगार की प्राप्ति से सम्बन्धित हो अथवा व्यवसाय को प्रारम्भ करने से अथवा विवाह या सन्तान या गृहस्थ सुख से प्रत्येक बार नई साधना सामग्री के साथ ही प्रयोग को सम्पन्न करें मनोकामना स्मरण के पश्चात देवी के उग्र स्वरूप का ध्यान करते हुए और मन में । यह भावना करते हुए, कि उनके वरदायक प्रभाव से साधक का पथ निष्कंटक हो रहा है।

Chinnamasta Sadhana – छिन्नमस्ता साधना ध्यान

मास्वमण्डलमध्यमां निजशिरश्छित्रं विकीर्णालिक स्फारास्यं प्रपिवद्गलात्स्वधिरं वामे करे विभ्रतीम् याभासक्तरतिस्मारोपरिगतां सख्याँ निजे डाकिनीवर्णिन्यौ परिदृश्य मोदकलितां श्रीछिन्नमस्तां भजे ॥

साधक छिन्नमस्ता माला से निम्न मंत्र की केवल 21 माला मंत्र जप सम्पन्न करें।

मंत्र. ।। ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं वैरोचनीये ह्रीं फट् स्वाहा OM SHREEM HREEM HREEM KLEEM AVIEM VAJRAVAIROCHANEFYE HROUM HREEM PHAT SWAHA

मंत्र जप के पश्चात् दूसरे समस्त सामग्रियों का किसी पवित्र सरोवर में विसर्जित कर दें।

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Sapneshwari sadhna – स्वप्नेश्वरी त्रिकाल दर्शन साधना Ph.85280 57364 यह साधना प्रत्येक मानव के लिए आवश्यक है, जो साधक ऊंचे स्तर की साधना नहीं कर पाते या जिन्हें इतना अवकाश नहीं मिलता, उन्हें स्वप्नेश्वरी साधना  Sapneshwari sadhna सम्पन्न करनी चाहिए जिससे कि वे जीवन में स्वयं का तथा दूसरे लोगों का कल्याण कर सकें। इस साधना से आप भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी हासिल कर सकते है हर सवाल का जवाब आपको सपने के माध्यम  हासिल कर सकते है।  

 

जीवन की अनेक समस्याएं होती है. अनेक बाधाएं होती हैं, चाहे वह प्रेम-प्रसंग का विषय हो अथवा ऋण से मुक्ति का. जिनका स्पष्ट रूप से उल्लेख भी नहीं किया जा सकता और जिनका समाधान प्राप्त करना भी आवश्यक होता है।

और ऐसी ही स्थितियों में बत जाती है सहायक ऐसी कोई विशिष्ट साधना जो त्वरित फलप्रद हो स्वप्नेश्वरी साधना  Sapneshwari sadhna उसी त्वरित फलप्रद श्रेणी की साधना है। प्रयोग जब भी कोई समस्या आपके सामने हो और उसका हल नहीं मिल रहा हो, तो इस प्रकार मन्त्र जप किया हुआ साधक उस समस्या को कागज पर लिख ले और रात्रि को सिरहाने रख कर सो जाय, रात्रि को स्वप्नेश्वरी Sapneshwari देवी स्वप्न में ही उस समस्या का हल स्पष्ट रूप से बता देती हैं,

 

जिससे कि साधक को निर्णय करने में आसानी होती है। साधक चाहे तो किसी भी व्यक्ति की समस्या इसी प्रकार से हल कर सकता है, उदाहरण के लिए व्यक्ति का प्रमोशन किस तारीख को होगा या मैं अमुक व्यक्ति के साथ लेन-देन कर रहा हूँ, यह ठीक रहेगा या नहीं, ऐसे प्रश्न स्पष्ट रूप से कागज पर लिख लेने चाहिए, और अपने सिरहाने रात्रि को सोते समय देख लेने चाहिये, तत्पश्चात् स्वप्नेश्वरी देवी  Sapneshwari को मन ही मन प्रणाम कर सो जाना चाहिए, ऐसा करने पर उसे रात्रि को ही स्वप्न में उसका प्रामाणिक हल मिल जाता है। वस्तुतः यह महत्वपूर्ण साधना है, और साधक इसके माध्यम से साधक हजारों-लाखों लोगों का कल्याण कर सकता है।

 

स्वप्नेश्वरी देवी साधना  Sapneshwari sadhna विधान

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इस साधना के लिए मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त स्वप्नेश्वरी यंत्र स्वप्नेश्वरी देवी का चित्र आवश्यक है, तथा यह यंत्र तांबे के पतरे पर या चांदी के पतरे पर बना हुआ लेना चाहिए तथा उस चित्र को मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त चैतन्य कर देना चाहिए, जिससे कि उसका प्रभाव मिल सके, यदि आपके शहर में योग्य पण्डित हो, तो प्राण प्रतिष्ठा की जा सकती है,

स्वप्नेश्वरी देवी के चित्र को फ्रेम में मढ़वा कर रख साधना प्रारम्भ करने से पूर्व चावल, कुकुम या केशर, जल का लोटा, दीपक, अगरबत्ती पहले से ही तैयार करके रख देनी चाहिए। यह साधना सोमवार से प्रारम्भ की जाती है।

यह मात्र पांच दिन की साधना है। इसमें नित्य 101 मालाएं फेरनी आवश्यक है, इस साधना में हकीक का ही प्रयोग किया जाता है, अन्य मालाएं वर्जित हैं। यह साधना दिन को या रात्रि को भी की जा सकती है। साधक चाहे तो पचास मालाएं दिन को तथा इक्यावन मालाएं रात्रि को भी कर सकता हैं. इस प्रकार दिन और रात में दो बार में पूर्ण मंत्र जप हो जाना चाहिए।

माला सोमवार को साधक स्नान कर धोती पहन कर उत्तर की ओर मुंह कर बैठ जायें, सामने लकड़ी के बाजोट पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा दें और उस पर स्वप्नेश्वरी देवी का यंत्र व स्वप्नेश्वरी देवी का चित्र स्थापित कर दें, इसके बाद अलग बर्तन में स्वप्नेश्वरी देवी के यंत्र को जल से, फिर कच्चे दूध से तथा फिर जल से धोकर पोंछकर बाजोट पर रखे किसी पात्र में यंत्र को स्थापित कर दें, यह पात्र ताम्बे का स्टील या चांदी का हो सकता है, फिर कुकुम या केशर से तिलक करें सामने अगरबत्ती व दीपक लगायें दूध का बना प्रसाद चढ़ायें और

फिर एकनिष्ठता से ध्यान करें-

ध्यान स्वप्नेश्वरी देवी  Sapneshwari 

स्वप्नेश्वरी नमस्तुभ्यं फलाय वरदाय च। मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्व प्रदर्शयः ।।

मंत्र स्वप्नेश्वरी देवी  Sapneshwari devi 

फिर नीचे लिखे मंत्र की एक सौ एक मालाएँ नित्य जये मंत्र  ॐ  ह्रीं स्वप्नेश्वरी ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं की ॐ ॥ OM KREEM KREEM KREEM HREEM HREEM SWAPNESHWARI HREEM HREEM KREEM KREEM KREEM OM

इस प्रकार नित्य एक सौ एक माला मंत्र जप करें. इन पांच दिनों में साधक जमीन पर सोयं, एक समय भोजन करें। पांच दिन तक मंत्र जप के बाद छठे दिन इसी मंत्र की मात्र शुद्ध घृत से एक हजार एक आहुतिया दें, फिर पांच कुमारी कन्याओं को भोजन करायें और उन्हें यथोचित यस्त्र दान आदि देकर सन्तुष्ट करें, इस प्रकार करने पर साधना सम्पन्न मानी जाती है। ‘इस का इस्तमाल कैसे करना है वो लेख में पहले ही बता दिया गया है 

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Kriya Yoga sadhna प्राचीन क्रिया योग साधना और रहस्य ph. 85280 57364

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Kriya Yoga sadhna प्राचीन क्रिया योग साधना और रहस्य ph. 85280 57364

 

Kriya Yoga sadhna प्राचीन क्रिया योग साधना और रहस्य ph. 85280 57364

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Kriya Yoga sadhna प्राचीन क्रिया योग साधना और रहस्य ph. 85280 57364

आज हम  क्रिया योग Kriya Yoga के सम्बन्धी जानकारी प्रदान करेंगे इस पोस्ट  क्रिया योग Kriya Yoga का प्रयोग और मंत्र भी प्रदान किया जाएगा आप इस पोस्ट  को पूरा पढ़े  अन्तर्मन तथा बाह्यमन को बोड़ कर मानव को ध्यान, धारणा और समाधि की ओर ले जाने वाला है


यह क्रिया योग Kriya Yoga सिद्धि प्रयोग क्रिया योग Kriya Yoga में व्यक्ति के लिए किसी प्रकार का कोई भेद बाधक नहीं होता है, किन्तु इसके लिए योग्य गुरु का मार्गदर्शन नितान्त आवश्यक है। वैसे तो क्रिया योग Kriya Yoga के लिए नियम, आसन, प्राणायाम आदि आवश्यक है, लेकिन मंत्रात्मक साधना से इसमें अनुकूलता की सम्भावनाएं निश्चय ही बढ़ जाती हैं।

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मानव शरीर इतना रहस्यमय है कि हजारों वर्षों से वैज्ञानिक, चिकित्सक, योगी व साधक इसके रहस्य को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं और प्रत्येक बार यही अनुभव होता है कि अभी बहुत कुछ जानना है

फिर भी मानव का यह प्रयत्न रहा है कि यह अधिक से अधिक इस बारे में ज्ञान अर्जित करे और अपने ज्ञान का अनुभव आने वाली पीढ़ी को दे। गहराई से विचार करने पर स्पष्ट होता है, कि मानव मन दो हिस्सों में विभक्त है- अन्तर्मन एवं बाह्यमन। हम इसे अन्तश्चेतना तथा बहिश्चेतना भी कह सकते हैं। इसमें अन्तश्चेतना सर्वदा सक्रिय शुद्ध एवं निर्मल बनी रहती है।

 

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मानव जो भी दैनिक कार्य व्यवहार अपनाता है. उसकी प्रेरणा में बहिश्चेतना की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, अन्तश्चेतना की नहीं, क्योंकि अन्तश्चेतना मानव को विशुद्ध मानव और उसमें देवत्व बनाए रखने में सहायक होती है। क्रिया योग Kriya Yoga में व्यक्ति अपनी बहिश्चेतना का सम्पर्क अन्तश्चेतना से करता है और अन्तश्चेतना प्रायः सभी विकारों से मुक्त रहती है।

उस पर न तो किसी प्रकार के विकारों का प्रभाव पड़ता है और न ही वह बहकावों में आती है, क्योंकि उसमें पूर्ण देवत्व का भाव होता है। यह अन्तश्चेतना ही मानव को सही अर्थों में मानव बनाए रखती है और देवत्व की ओर अग्रहार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इसलिए बहिश्चेतना को अन्तश्चेतना से जोड़ने की क्रिया महत्वपूर्ण होती हैं और मानव को विकारों से मुक्त कटाने का यह एक सुन्दरतम प्रयास है। जब अन्तर्मन और ब्राह्ममन परस्पर जुड़ जाते है. तो इन दोनों मन को जोड़ने की क्रिया ही, क्रिया योग Kriya Yoga कहलाती है।

इस दशा में अर्थात् दोनों मन जुड़ने की प्रक्रिया में व्यक्ति एक दिव्य प्रकाश की अनुभूति अपन अन्दर महसूस करने लगता है, जिससे उसके तनाव समाप्त होने लगते हैं। उसे आनन्द की अनुभूति होने लगती है और वह समझा लेता है, कि वास्तविक सुख हमारे अन्दर मौजूद है, जिसे कहीं बाहर से नहीं लाना पड़ता है।

क्रिया योग Kriya Yoga के मुख्य रूप से तीन आधार है – ध्यान, धारणा और समाधि इसमें ध्यान ऐसी प्रक्रिया है. जो व्यक्ति को निरन्तर चैतन्यता, मानसिक विश्राम और गति प्रदान करती है।

Kriya Yoga  के तीन भाग  ध्यान , धारणा  समाधि’ पूरी जानकारी 

 

 1 ‘ध्यान’ का तात्पर्य यह है, कि मानो जल शान्त हो और हम उसकी तलहटी में देख सकें वास्तव में ध्यान अपने अन्दर की समस्त बेचैनी छटपटाहट, व्यग्रता और तनाव को समाप्त करने की प्रक्रिया है।

ध्यान योग की दशा में जब साधक अपने अन्तर्मन ने उतरता है, तो प्रारम्भ में एक प्रकाश का बिन्दु दिखाई देता है और धीरे-धीरे इस प्रकाश का घेरा बढ़ता जाता है आरम्भ में यह बिन्दु छोटा सा एवं नीली आभा लिए तुभ्य बढ़ने के क्रम में प्रकाश का परा लगता है और आगे बढ़ने पर उसे कई रम या जाती दिखने लगते हैं।

यह ध्यान योग में प्रगति का है। ध्यान में और अधिक एकाग्रता आने पर रंग भी दिखाई देना बंद हो जाते हैं और सफेद तेज प्रकाश दृष्टिगोचर होने लगता है। इस प्रकाश का दृष्टिगोचर होना की तृतीय नेत्र खुलने की स्थिति है. जिससे साधक को स्वयं का तथा अन्य किसी का भी भविष्य वर्तमान स्पष्ट होने लगता है।

 

2 धारणा   ध्यान से आगे की जो स्थिति है वह है ‘धारणा’ ‘धारणा’ का अर्थ है, अपने आप में लीन हो जाना। इस अवस्था में पहुंच कर व्यक्ति संसार में केवल साक्षी नाव से रहता है अर्थात् सासारिक माया-मोह उस पर व्याप्त नहीं होते हैं और उसमें दृष्टा भाव उत्पन्न हो जाता है और यह परमहंस की स्थिति में आ जाता धारण के पश्चात की जो अवस्था होती है वह ‘समाधि’ की होती है। ‘

 

3 समाधि’ का तात्पर्य यह है, कि अपने को विस्मृत कर देना, स्वय को पूर्णता तक पहुंचा देना, पूरे ब्रह्माण्ड में स्वयं को एकाकार कर देना, समस्त ब्रह्माण्ड में सशरीर विचरण करने की क्षमता अर्जित कर लेना और प्रकृति के कार्यों में हस्तक्षेप करके उसको अपने अनुकूल बना देना |

समाधि अवस्था प्राप्त करने पश्चात् व्यक्ति पुनः जन्म नहीं लेता, वह तो फिर अवतरित हो सकता है। ऐसी अवस्था में उसका चेहरा अपने आप में देदीप्यमान हो जाता है और वह पूर्णता प्राप्त कर लेता है। क्रिया योग Kriya Yoga वास्तव में अपने शरीर के मल का निवारण कर, ऐसा विव्यतम बनाने का एक सुन्दर एवं विशिष्ट प्रयास है, जिससे उसमें ईश्वरत्व | स्पष्ट हो जाता है। क्रिया योग Kriya Yoga की उच्चतम अवस्था निर्विकल्प समाधि की होती है, जिसे निर्विचार मन की प्राप्ति तक ले जाया जा सकता है। निर्विचार मन बनाकर व्यक्ति स्वतः ही अपना उपचार कट सकता है।

विदेशों में तकनीक को ‘मॉटोहीलिंग’ कहते हैं। हमारे देश में प्राय: इसे योग निद्रा की संज्ञा दी जाती. है। क्रिया योग Kriya Yoga की स्थिति निर्मित होने के लिए इतने अधिक प्राणायाम व यौगिक क्रिया कर पाना प्रत्येक साधक के लिए सम्भव ना होता है इसकी भूमि में कई कारण होते हैं. जैसे उचित मार्गदर्श का अभाव।

यौगिक क्रियाएं बिना प्रयोगात्मक मार्गदर्शन के करना उचित नहीं रहता है प्रयोगात्मक दैनिक प्रशिक्षण आज के व्यस्ततम युग में हर साधक के लिए उपलब्ध नही हो पाता है, क्योंकि आज के युग में धौगिक प्रशिक्षण केन्द्रों का नितान्त अभाव ही है।

क्रिया योग Kriya Yoga के लिए साधनात्मक मार्ग एक सवल एवं व्यवस्थित मार्ग के रूप में अपनाया जा सकता है। इसमें ज्यादा कठिन एवं यौगिक क्रियाएं, व्यायाम, आसन अथवा हठ योग की क्रियाओं की आवश्यकता नहीं होती है, अपितु अपने दैनिक कार्य को सम्पादित करते हुए प्रतिदिन कुछ समय नित्य मंत्र जप कर अपने लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। इस प्रयोग में आपको नित्य एकटक होकर यत्र पर देखते हुए जप करना है. इससे ध्यान की स्थिति प्रारम्भ होती है। प्रारम्भ में घर की समस्याएं आफिस की।

उलझने स्वतः ही कम हो जाएगी और आपको स्पष्ट मार्ग मिलने लगेगा। यत्र विज्ञान इस प्रयोग को सम्पन्न करने पर निर्दिचार मस्तिष्क की अवस्था आने लगती है, क्योंकि हमारे मस्तिष्क में एक सेकण्ड में लाखो विचार आकर चले जाते हैं, हम भविष्य के बाने-बाने इन विचारों से जोड़ते रहते हैं और इनका दुष्प्रभाव यह होता है, कि मस्तिष्क जो भी उच्चकोटि कि योगी व साधक होते हैं, वे अपने को प्राप्त करने के लिए अन्तश्चेतना का विकास करने में रेलवे रहते हैं और इसके विकास से वे अपने लक्ष्य तिक पहुंचने का सामर्थ्य अर्जित कर लेते हैं।

हमारा चेतन मन बुद्धि से प्रभावित होकर अधिक क्रियाशील हो जाता है, जबकि अवचेतन मन उपेक्षित सा रह जाता है और इसका दुष्प्रभाव यह होता है, कि यदि जीवन में एकाएक विपरीत परिस्थिति आ जाये, तो अवचेतन मन साथ नहीं देता है और नर्वस ब्रेकडाउन की स्थिति तक बन जाती है। इसका एकमात्र व सरल निदाल ही हैं निर्विचार मस्तिष्क । |

के कोमल तन्दुओं पर अधिक दबाव पड़ता है और व्यक्ति मानसिक पंगु हो जाता है और उसके मस्तिष्क का विकास नहीं हो पाता है। 2 3. विचार शून्य की स्थिति में व्यक्ति अपने लघु देह व लघु परिवेश से कटकर समस्त ब्रह्माण्ड का एक अंश बनने की प्रक्रिया में होता है और तब उसे भावना रखनी चाहिए में असीमित शक्ति के रूप में एक पुंजीभूत रूप ने, समस्त ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी व्याप्त है, उसमें विस्तारित हो रहा हूं। यह मात्र कल्पना का विषय नहीं है वरन इस समस्त ब्रह्माण्ड में ईश्वर तत्व का जो विस्तार है और जिसके द्वारा ही तरंगों का संचरण सम्भव हो पाता है, उसके द्वारा व्यक्ति अपनी मानसिक तरंगों का विस्तार कर बैठे सकता है।

एक स्थान पर बैठ कर ही सैकड़ों मील दूर व्यक्ति को आज्ञा दी जा सकती है। 4. 5. 6. सूक्ष्म शरीर के माध्यम से सैकड़ों मील टूट जाया जा सकता है। दूरस्थ स्थानों का वार्तालाप सुना जा सकता है तथा इसी प्रकार के कार्य जो अचटज मटे प्रतीत होते हैं, मानसिक क्षमता के विस्तार से सम्भव है। किया योग सिद्धि का एक विशिष्ट प्रयोग दिया जा रहा है, जो साधक अपने जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करना चाहें, में इस तरह के प्रयोग को सम्पन्न कर आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने का सुन्दर सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।


क्रिया योग Kriya Yoga  साधना  प्रयोग विधि

क्रिया योग साधना  प्रयोग विधि  1 इस प्रयोग को  या किसी भी रविवार को कर सकते हैं। 4. सुगन्धित अगरबत्ती व घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर दें और दैनिक साधना विधि पुस्तक के अनुसार गुरु पूजन तथा यंत्र का पूजन करे। इसके पश्चात् क्रिया सिद्धि माला से ही गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप 5 दिन तक करें मंत्र  साधक प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण करें तथा सफेद सूती आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुह कर बैठें।

सर्वप्रथम अपने सामने बाजोट पर वस्त्र बिछाकर उस पर किसी तांबे के पात्र में क्रिया योग Kriya Yoga यंत्र स्थापित करें। उसके सम्मुख किया सिद्धि माला स्थापित कर दें।

क्रिया योग साधना मंत्र 

॥ ॐ ह्रीं ह्रीं ऐं क्रिया सिद्धिं ॐ ॥ OM HREEM HREEM AYEIM KRIYA SIDDHIM OM 7.

. प्रतिदिन मंत्र जप के पश्चात् पद्मासन या सिद्धासन में बैठे हुए मेरुदण्ड सीधा रखें और ध्यान नासिकाय पर कर यह अनुभव करें, कि मैं निरन्तर विराट पुरुष को अपने चारों ओर देख रहा हूं. मुझमें तेजस्विता, श्रेष्ठता और दिव्यता बढ़ती जा रही है, उनके संरक्षण में मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जा रहा हूँ। मैं प्रसन्नचित्त हूँ मेरा रोम-रोम प्रसन्नता और संतोष से खिल रहा है, क्योंकि मेरी बुद्धि में सात्विकता सेजस्विता दिव्यता और समर्थ्यता है। इस तरह उक्त भावना का मनन धीरे-धीरे पांच था दस मिनट तक करें, ताकि इन विचारों की स्थायी छाप मन पर पड़ती रहे। इसके पश्चात् गुरुदेव जी को प्रणाम कर नित्य प्रयोग सम्पन्न करें।

पांच दिन के पश्चात यत्र तथा माला किसी नदी में प्रवाहित कर दें। पांच दिन के पश्चात नित्य प्रातः 4 बजे से 6 बजे के बीच मे कभी भी 10 मिनट तक उपरोक्त क्रम संख्या को अनुसरण तीन माह तक करें। विशेष-साधना प्रारम्भ करने से पूर्व नित्यक्रम में नेति व यस्ती आदि क्रियाएं और हल्का सा व्यायाम कर लें, तो ज्यादा उचित है।

प्रयोग सम्पन्न करने के उपरान्त हल्का फलाहार या दूध अपनी सुविधानुसार ग्रहण कर लें, तत्पश्चात् ही अपने दैनिक कार्य को कसी भी सम्पादित करें। सुगन्धित अगरबत्ती व घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर दें और दैनिक साधना विधि पुस्तक के अनुसार गुरु पूजन तथा यंत्र का पूजन करे।

 इसके पश्चात् क्रिया सिद्धि माला से ही गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर निम्न मंत्र की 11 माला मंत्र जप 5 दिन तक करें – मंत्र  साधक प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण करें तथा सफेद सूती आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुह कर बैठें। सर्वप्रथम अपने सामने बाजोट पर वस्त्र बिछाकर उस पर किसी तांबे के पात्र में क्रिया योग Kriya Yoga यंत्र स्थापित करें। उसके सम्मुख किया सिद्धि माला स्थापित कर दें। ।।

ॐ ह्रीं ह्रीं ऐं क्रिया सिद्धिं ॐ ॥ OM HREEM HREEM AYEIM KRIYA SIDDHIM OM

इस तरह उक्त भावना का मनन धीरे-धीरे पांच था दस मिनट तक करें, ताकि इन विचारों की स्थायी छाम मन पर पड़ती रहे। इसके पश्चात् गुरुदेव जी को प्रणाम कर नित्य प्रयोग सम्पन्न करें। पांच दिन के पश्चात यत्र तथा माला किसी नदी में प्रवाहित कर दें। पांच दिन के पश्चात नित्य प्रातः 4 बजे से 6 बजे के बीच मे कभी भी 10 मिनट तक उपरोक्त क्रम संख्या 6 को अनुसरण तीन माह तक करें।

विशेष साधना प्रारम्भ करने से पूर्व नित्य क्रम में नेति व यस्ती आदि क्रियाएं और हल्का सा व्यायाम कर लें, तो ज्यादा उचित है। प्रयोग सम्पन्न करने के उपरान्त हल्का फलाहार या दूध अपनी सुविधानुसार ग्रहण कर लें, तत्पश्चात् ही अपने दैनिक कार्य को सम्पादित करें।

 प्रतिदिन मंत्र जप के पश्चात् पद्मासन या सिद्धासन में बैठे हुए मेरुदण्ड सीधा रखें और ध्यान नासिकाश पर कर यह अनुभव करें, कि मैं निरन्तर विराट पुरुष को अपने चारों ओर देख रहा हूं. मुझमें तेजस्विता, श्रेष्ठता और दिव्यता बढ़ती जा रही है, उनके संरक्षण में मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जा रहा हूँ। मैं प्रसन्नचित्त हूं. मेरा रोम-रोम प्रसन्नता और संतोष से खिल रहा है, क्योंकि मेरी बुद्धि में सात्विकता, तेजस्विता, दिव्यता और समर्थ्यता है। 

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पद्मावती मंत्र साधना – भविष्य जानने की विद्या ph.85280 57364

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पद्मावती मंत्र साधना - भविष्य जानने की विद्या ph.85280 57364

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पद्मावती मंत्र साधना – भविष्य जानने की विद्या ph.85280 57364 आप सभी कैसे हो मैं उम्मीद करता हूं आप लोग सही सलामत से होंगे हम मां भगवती से यही कामना करता हूं आप लोग इधर भी हो उधर खुश रहो चलिए दोस्तों आज पूछा लगाने का कुछ मैं प्रयोग में बताऊंगा दोस्तों क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में जॉन सभी साधक साधिकाएं होंगे तो इसका बारे में मालूम होगा दोस्तों ठीक है यह जो 1 घंटा है ठीक है मुझे का जॉन होता है ना वह है दोस्तों ठीक है क्योंकि हमारे इधर बहुत और आकर दोस्तों पूछा लगता है ठीक है तो यह जो एक तरीका है दोस्तों मुझे बहुत अच्छा लगता है दोस्तों ठीक है इसका एक मंत्र है दोस्तों वैदिक है  ठीक है किसी का भी भूत भविष्य वर्तमान जान सकते है सर्व ज्ञान हो जाएगा आपको 

 

भूत भविष्य वर्तमान जानने का मंत्र |

ॐ ह्रीं पद्मावतीं देवीं कथय कथय स्वाहा ।

साधन विधि – दो वर्ष तक प्रतिदिन १०८ बार इस मन्त्र का जप
करने से यह विद्या सिद्ध होती है । विद्या सिद्ध हो जाने पर साधक
को सब विषयों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है । जो भक्त योगी शैया पर
बैठ कर रात्रि के समय इस मन्त्र का प्रतिदिन १०८ बार जप करता
है, वह प्रतिदिन के समस्त हितकर वृतान्त को जान लेता है । तन्त्र
शस्त्रों में कहा गया है कि इस मन्त्र के साधक को ब्रह्मा, विष्ण आदि
का तथा त्रैलोक्य का वृतान्त भी ज्ञात हो जाता है । शुभदायिनी
पद्मावती विद्या उससे स्वप्न में सब वृतान्त कहती हैं ।

Lakshmi Sadhna आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना Ph.8528057364

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Lakshmi Sadhna आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना Ph.8528057364

  Lakshmi Sadhna paryog  आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना प्रयोग Ph.8528057364

  Lakshmi Sadhna paryog  आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना प्रयोग Ph.852805736 सृष्टि के रचयिता विष्णु की नींव  , जिनकी साधना पूर्ण हो चुकी  है,  जीवन  के दोनों पक्षों की पूर्णता – आध्यात्मिक और भौतिक जीवन।  भगवती लक्ष्मी  ब्रह्मांड के   रचयिता  विष्णु की मूल शक्ति और त्रिगुणात्मक रूप में भगवती महालक्ष्मी के रूप में पूरी दुनिया  के  कारण  पूजनीय  हैं। 

  Lakshmi Sadhna paryog  आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना प्रयोग Ph.8528057364
Lakshmi Sadhna paryog  आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना प्रयोग Ph.8528057364

आधार है भगवती लक्ष्मी, जो क्षीरसागर से उत्पन्न होकर पूरी दुनिया का पोषण करती हैं, जीवन  में सभी सुख, सौभाग्य, आनंद और पूर्णता  प्रदान करती  हैं।   ऐसी महादेवी हैं, जिनकी पूजा करने के लिए दुनिया का हर व्यक्ति  उत्सुक  रहता है  ।

यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि भगवती लक्ष्मी की पूजा,  पूजा दुनिया के हर देश में की जाती  है, चाहे वह एक अलग नाम से हो, एक अलग रूप में हो। यह कर्म  के  एक अलग तरीके से हो सकता है  , लेकिन लक्ष्मी की आस्था  पूरी दुनिया में है, क्योंकि लक्ष्मी के बिना जीवन का मूल सत्य समाप्त हो जाता है।  जीवन के दो पहलू हैं, आध्यात्मिक और शारीरिक  लक्ष्मी आध्यात्मिक जीवन का आधार भी है, क्योंकि  अध्यात्म जीवित रहे तो मानवता  भी जीवित रहेगी।  लक्ष्मी इसकी जड़ है

ठीक इसी प्रकार से सम्पूर्ण भौतिक सम्पदा की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी ही हैं। यह अलग बात है, कि आज विश्व में अधिकांश व्यक्ति आर्थिक समस्याओं से घिरे हैं, जिनके पास भौतिक जीवन में उपयोग आने वाली वस्तुओं का अभाव ही रहता है, पर इसका कारण क्या है, मनुष्य को अपनी अज्ञानता त्याग कर इसके मूल में जाना ही पड़ेगा।

यह बात तो निर्विवाद सत्य है, किमात्र परिश्रम से जीवन में पूर्णता और सम्पूर्णता नहीं आ सकती। एक कार्यशील व्यक्ति दिन भर परिश्रम कर शाम को सौ-दो सौ ही कमा सकता है और इतने धन से उसके जीवन के अभाव समाप्त नहीं होते हैं, क्योंकि परिश्रम धन प्राप्ति का केवल एक भाग है।

धन की प्राप्ति तो देवी- कृपा या भगवती महालक्ष्मी की साधना से ही पूर्णतया सम्भव है। परन्तु जो व्यक्ति अहंकार से ग्रसित है, जो व्यक्ति नास्तिक है, जो व्यक्ति देवताओं की साधना को, आराधना को, सिद्धियों को, मंत्रों को नहीं पहचानते या उन पर विश्वास नहीं करते, वे जीवन में बहुत बड़े अभाव पाल-पोस रहे होते हैं, उनके जीवन में सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं होता,

निर्धनता उनके चारों ओर मंडराती रहती है, जीवन की समस्याएं उसके सामने मुंह उठाए खड़ी रहती हैं ऐसा व्यक्ति चाहे अपने- आप को कितना ही संतोषी कह कर कर्महीन, भाग्यहीन हो जाता है, पर यह ध्रुव सत्य है कि वह अपने जीवन में उस आनन्द और मधुरता को,

उस सम्पूर्णता और वैभव को प्राप्त नहीं कर सकता, जो देवी कृपा या भगवती लक्ष्मी की कृपा से प्राप्त होता है। कुछ व्यक्ति जो जीवन में धन सम्पदा से युक्त होते हैं और वे ये समझ बैठें कि लक्ष्मी तो उनके पास आनी ही है, वे भूल कर रहे हैं।

यह लक्ष्मी तो निश्चय ही उनके द्वारा पूर्व जन्म में किए गए साधना और सुकृत कार्यों से ही प्राप्त हुई है। साधना वह क्रिया है जिसके माध्यम से मनुष्य देवताओं को भी विवश कर सकता है, कि वे सम्पूर्णता से उसके साथ रहें, उसकी सहायता करें, उसके जीवन में जो न्यूनता है वह पूर्ण हो इसीलिए

श्रीमद्भगवदगीता में लिखा है, कि देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः प्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ (३,११) हे मनुष्य तुम साधन यज्ञ, पूजन, ध्यान द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें, इस प्रकार से निःस्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम पूर्णत्व प्राप्त कर सकोगे।

 

प्रत्येक व्यक्ति वह चाहे गृहस्थ जीवन में हो, भौतिक जीवन में हो, संन्यासी हो, योगी हो, चाहे हिमालय में विचरण करने वाला हो, लक्ष्मी की कृपा का अवलम्बन तो उसको लेना ही पड़ता है। जो व्यक्ति

इस कटु सत्य को समझ लेता है, जो इस बात को समझ लेता है, कि जीवन का आधारभूत सत्य भौतिक सम्पदा के माध्यम से ही जीवन में पूर्णता और निश्चिन्तता आ सकती है, वह लक्ष्मी की आराधना, लक्ष्मी का अर्चन और लक्ष्मी की कृपा का अभिलाषी जरूर होता है।

 मैं यह नहीं कहता, कि कुंकुंम, अक्षत् से पूजा की जाए: मैं यह भी नहीं कहता, कि आरती उतारी जाए. . ये तो पूजा के प्रकार हैं। साधना तो इससे बहुत ऊंचाई पर है, जहां मंत्र जप के माध्यम से हम देवताओं को भी इस बात के लिए विवश कर देते हैं, कि वे अपनी सम्पूर्णता के साथ व्यक्ति के साथ रहें,

उसकी सहायता करें, उसके जीवन के जो अभाव हैं, जो परेशानियां हैं, जो अड़चनें हैं, जो बाधाएं हैं उन्हें दूर करें, जिससे उसका जीवन ज्यादा सुखमय, ज्यादा मधुर, ज्यादा आनन्ददायक हो सके।

इसमें कोई दो राय नहीं, कि जीवन में महाकाली और सरस्वती की साधना भी जरूरी है, क्योंकि काली की साधना से जहां जीवन निष्कंटक और शत्रु रहित बनता है, वहीं महा सरस्वती साधना के माध्यम से उसे बोलने की शक्ति प्राप्त होती है, उसका व्यक्तित्व निखरता है, वह समाज में सम्माननीय और पूजनीय बनता है।

मगर यह सब तब हो सकता है, जब धन का आधार हो- बस्वास्ति वित्तं नरः कुलीन, सः पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः । स एवं वक्ता स च दर्शनीयः, सर्व गुणाः मावन्ते ॥

‘भृर्तहरी ‘ चाहे हम रुद्र की साधना करें और चाहे हम ब्रह्मा की साधना करें, चाहे हम  इन्द्र, मरुद्गण, यम या कुबेर की साधना करें, किन्तु वैभव और धन की अधिष्ठात्री देवी तो भगवती लक्ष्मी ही हैं, मात्र लक्ष्मी की साधना के माध्यम से ही व्यक्ति अपने अभावों को दूर कर सकता है।

६६ जिसके पास लक्ष्मी की कृपा है ‘यस्यास्ति वित्तं समाज उसको समझदार समझता है, प्रतिष्ठित समझता है, ऊंचे खानदान का समझता है, उसे पण्डित कहते हैं, उसे गुणज्ञ कहते हैं. लोग उससे सलाह लेते हैं, उसके पास बैठते हैं, उससे मित्रता करने का प्रयत्न करते हैं।

जिसके पास लक्ष्मी की कृपा होती है, वह अपने आप अच्छा वक्ता बन जाता है सः एव बक्ता, स च माननीयः….. समाज में लोग उसका सम्मान करते हैं, उसके पास बैठने, उससे मित्रता करने को प्रयत्नशील होते हैं। मृर्तहरी ऋषि कह रहे हैं- ‘सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ते’ ये सब गुण मनुष्य के नहीं है, ये तो भगवती लक्ष्मी की कृपा के गुण हैं, जो साधक को प्राप्त हैं। प्रश्न उठता है, कि क्या प्रत्येक मनुष्य के लिए लक्ष्मी की साधना आवश्यक है?

हमारे जीवन में अन्न की नितांत आवश्यकता है, जल की नितांत आवश्यकता है, प्राणवायु लेने की नितांत आवश्यकता है, किन्तु केवल इन तीनों से मनुष्य जीवन सुमधुर नहीं बन सकता है, जीवन में श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिए लक्ष्मी की साधना भी नितान्त आवश्यक है। जो इस सत्य को नहीं समझ सकते, वे जीवन में कुछ भी नहीं समझ सकते।

जो व्यक्ति जितना जल्दी इस तथ्य को समझ लेता है, वह इस बात को भी समझ लेता है, किजीवन में पूर्णता प्राप्त करने के लिए लक्ष्मी की आराधना, लक्ष्मी का सहयोग आवश्यक है और ऐसा ही व्यक्ति जीवन में सही अर्थों में पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकता है।

यह जरूरी नहीं है, कि कोई योगी, साधु, संन्यासी या साधक ही लक्ष्मी की साधना करे, लक्ष्मी की साधना तो कोई भी कर सकता है, चाहे पुरुष हो, चाहे स्त्री हो, चाहे बालक हो, चाहे वृद्ध हो, चाहे अमीर हो, चाहे गरीब हो कोई भी लक्ष्मी की साधना से ही जीवन में पूर्णता, सौभाग्य, सुख और सम्पन्नता प्राप्त कर सकता है।

चाहे हम रूद्र की साधना करें और चाहे हम ब्रह्मा की साधना करें, चाहे हम इन्द्र, मरुद्गण, यम और कुबेर की साधना करें, किन्तु वैभव और धन की अधिष्ठात्री देवी तो भगवती लक्ष्मी ही हैं, मात्र लक्ष्मी की साधना के माध्यम से ही व्यक्ति अपने अभावों को दूर कर सकता है,

पूर्वनों की गरीबी और निर्धनता को अपने जीवन से हटा सकता है, नीवनको आनन्ददायक बना सकता है, सम्पन्नता और वैभव का योग कर सकता है… और यदि लक्ष्मी की कृपा हो गई, तो वह सुकृत कार्य कर सकता है, मंदिर, धर्मशाला, तालाब, अस्पताल का करा सकता है और समाज सेवा के माध्यम से हजारों-लाखों लोगों का कल्याण कर सकता है।

भगवती लक्ष्मी की साधना से नहां व्यक्ति स्वयं अपने जीवन को श्रेष्ठ बना कर पूर्णता प्राप्त कर सकता है, वहीं समाज के बहुत बड़े वर्ग को सुख और सौभाग्य, आनन्द और मधुरता प्रदान करने का माध्यम बन सकता है। म

 

नुष्य जीवन में लक्ष्मी की कौन सी विशेष साधनाएं करे, जिससे उसके जीवन में लक्ष्मी का वास हो सके और दरिद्रता रूपी मैल को बाहर निकाल कर जीवन कान्तिमय बना सके, इसी क्रम में कुछ लघु प्रयोग दिए जा रहे हैं, जिनके बारे में आप कह सकते हैं देखन में छोटे लगें, पर कार्य करें गम्भीर’-

  Lakshmi Sadhna paryog  लक्ष्मी साधना प्रयोग  नियम 

शत अष्टोत्तरी महालक्ष्मी यंत्रः विशेष नियम साधना प्रारम्भ करने से पूर्व लक्ष्मी से सम्बन्धित कुछ विशिष्ट तथ्य जान लेने चाहिए-

१. महालक्ष्मी की साधना, मंत्र जप अथवा अनुष्ठान को अथवा किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के किसी बुधवार से प्रारम्भ करें, तो ज्यादा उचित रहता है।

२. साधना प्रारम्भ करने से पूर्व यदि व्यक्ति महालक्ष्मी ‘दीक्षा’ प्राप्त कर ले, तो सफलता निश्चित हो प्राप्त होती है।

३. किसी भी प्रकार की भगवती महालक्ष्मी से सम्बन्धित साधना सम्पन्न करने के लिए ‘शत अष्टोत्तरी महालक्ष्मी यंत्र’ को स्थापित करने और उसके सामने साधना, उपासना या अनुष्ठान सम्पन्न करने से निश्चय ही सफलता प्राप्त होती है,

क्योंकि यह यंत्र अपने आप में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है, इसमें सहस्र लक्ष्मियों की स्थापना और उनका कीलन होता है, जिससे कि साधक के घर में स्थायित्व प्रदान करती हुई लक्ष्मी स्थापित होती है। यहां दिए तीन प्रयोगों की सामग्रियां इसी पद्धति से निर्मित हैं।

४. साधक साधना में कमल या गुलाब के पुष्प का प्रयोग पूजन के समय अवश्य करें।

५. ‘कमलगट्टे की माला से मंत्र जप करना ही ज्यादा उचित माना गया है।

६. इस प्रकार की साधना व्यक्ति अपने घर में या व्यापार स्थान में अकेले या पत्नी के साथ सम्पन्न कर सकता है। लक्ष्मी से सम्बन्धित तीन प्रयोग जो ऊपर वर्णित शत अष्टोत्तरी यंत्र पर ही आधारित है, स्पष्ट किए जा रहे हैं-


  Lakshmi Sadhna paryog  लक्ष्मी साधना प्रयोग विभिन  कार्य  सिद्धि  के लिए 

Lakshmi Sadhna paryog  आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना प्रयोग Ph.8528057364
Lakshmi Sadhna paryog  आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना प्रयोग Ph.8528057364

१.  Lakshmi Sadhna paryog  लक्ष्मी साधना प्रयोग शीघ्र धन प्राप्ति  के लिए  

यह प्रयोग तांत्रोक्त नारियल पर आधारित है धनदायक प्रयोग है। लाल रंग के वस्व पर तांत्रोक्त नारियल’ के साथ ‘शतष्टोत्तरी महालक्ष्मी महायंत्र स्थापित करें, उसका संक्षिप्त पूजन कर निम्न ‘5 या देवि सर्वभूतेषु महालक्ष्मी रूपेण संस्थिता । || मंत्र का जप कमल गट्टे की माला से ५ (पांच) माला करें- ॥

ॐ ह्रीं श्रीं ऐश्वर्य महालक्ष्मी आजच्छ ॐ नमः ॥ Om Hreem Shreem Eishvarya Mahaalakshmi Aangachchh Om Namah मंत्र जप समाप्त कर अगले दिन समस्त सामग्री नदी में विसर्जित कर दें।

२. Lakshmi Sadhna paryog  लक्ष्मी साधना प्रयोग मनोरथ पूर्ति  के लिए  ‘ऐश्वर्य महालक्ष्मी’

पर आधारित यह प्रयोग मनोरथ पूर्ति में सहायक है। साधक स्नानादि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें और किसी पात्र में ‘श्रीं’ बीज मंत्र कुंकुंम से लिखें, उस पर एक पुष्प रखें तथा पुष्प पर “शत अष्टोत्तरी महालक्ष्मी यंत्र स्थापित करें, गुरु का ध्यान कर निम्न मंत्र का ‘कमलगट्टे की 5 माला से ११ (ग्यारह) माला जप करें-

॥ ॐ श्रीं वांछितं साधय ऐश्वर्च देहि ही महालक्षम् ॐ नमः ॥ Om Shreem Vaanchhitam Saadhay Eishvaryam Dehi Hreem Mahaalakabmyei Om Namah जप समाप्त कर एक दिन बाद समस्त सामग्री को किसी नदी में विसर्जित करें। 

३. Lakshmi Sadhna paryog  लक्ष्मी साधना प्रयोग आकस्मिक धन लाभ  के लिए

आकस्मिकधन लाभ का प्रयोग है, जिसे कोई भी व्यक्ति सम्पन्न कर सकता है। किसी पात्र में “शत अष्टोत्तरी महालक्ष्मी  यंत्र स्थापित करें। अन, कुंकुम तथा पुष्प अर्पित कर यंत्र का पूजन करें। इस साधना में कमल गट्टे की माला की जगह प्रत्येक मंत्र का उच्चारण करते समय ‘कमल गट्टे के बीज’ यंत्र पर अर्पित करें। इस तरह मंत्र का उच्चारण करते हुए १०८ बीज अर्पित करते हैं। ॥

ॐ ह्रीं ह्रीं धनं देहि दापय ॐ नमः ॥ Om Hreem Hreem Dhanam Dehl Daapay Om Namah

प्रयोग के बाद यंत्र को लाल वस्त्र में लपेटकर पूजन स्थान में रख दें तथा कमल गट्टे के बीजों को नदी में प्रवाहित कर दें। इस यंत्र पर आप पांच बार ही प्रयोग सम्पन्न कर सकते हैं, किन्तु यह ध्यान रखें कि मंत्र जप के लिए हर बार नए कमल गट्टे के बीज लेने होंगे जो ‘श्री सूक्त के द्वारा चैतन्य किए गए हो। उसके पश्चात यंत्र नदी में विसर्जित कर दें। 

इन तीनों प्रयोगों को आप एक ही दिन में प्रातः, मध्यात, सायं अथवा रात्रि अलग-अलग समय में भी सम्पन्न कर सकते हैं या किसी भी एक प्रयोग के बाद दस पन्द्रह मिनट का अन्तराल देकर दूसरे प्रयोग को प्रारम्भ कर सकते हैं। इन तीनों प्रयोगों के लिए निर्धारित दिवस है  या किसी भी शुक्ल पक्ष का बुधवार। 

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Diwali Sadhana दिवाली के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग PH.85280 57364

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Diwali Sadhana दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग diwali laxmi sadhana prayog PH.85280 57364

 

Diwali Sadhana दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग diwali laxmi sadhana prayog PH.85280 57364

Diwali Sadhana दिवाली के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग PH.85280 57364
Diwali Sadhana दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग PH.85280 57364

 

 

Diwali Sadhana दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग PH.85280 57364  diwali laxmi sadhana prayog गुरु मंत्र साधना कॉम में स्वागत है  आज हम दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर  दिवाली Diwali पर किए जाने वाले 108  प्रयोग आप के समक्ष रखेंगे।  यह प्रयोग आप की ज़िंदगी की हर समस्या को दूर करेंगे आप यह पोस्ट अंत तक पढ़े।

लक्ष्मी का अर्थ हमारे शास्त्रों में केवल मात्र धन से ही सम्बन्धित नहीं है, अपितु जीवन के विविध आयाम् धन- धान्य, गृहस्थ, आरोग्य, शांति, पुत्र, पौत्र, शत्रु विनाश, यश, समृद्धि, प्रतिष्ठा, भवन से भी है। यही कारण है, कि लक्ष्मी को अनेकानेक नामों से सम्बोधित किया गया है और उनके प्रत्येक स्वरूप का पूजन भी वर्णित किया गया है।

दीपावली Diwali Diwali का पर्व महालक्ष्मी की साधना का पर्व है, इस अवसर पर लक्ष्मी के ही विभिन्न स्वरूपों से सम्बन्धित प्रयोग प्रस्तुत हैं, जिन्हें सम्पन्न कर आप अवश्य ही लाभ प्राप्त कर सकेंगे और अपने जीवन की समस्याओं को इन लघु प्रयोगों के माध्यम से समाप्त कर सकेंगे।

इन प्रयोगों को आप दीपावली Diwali Diwali diwali laxmi sadhana prayog  से पूर्व इन प्रयोगों को आरम्भ करने से पूर्व साधक संक्षिप्त रूप से गुरु-पूजन अवश्य करें, यदि आपने दीक्षा न भी ली हो तो भी मानसिक रूप से गुरु का पूजन कर प्रयोग सम्पन्न करें। इन प्रयोगों को अत्यन्त शुद्धता और पवित्रता के साथ सम्पन्न करें, प्रयोग करते समय मन में कुविचार, अश्रद्धा, आदि भाव न लाएं। दिवाली Diwali साधना

 

 

१. भगवती लक्ष्मी के धनप्रदायक  diwali laxmi sadhana prayog

भगवती लक्ष्मी के धनप्रदायक स्वरूप  को ‘श्री’ नाम से सम्बोधित किया गया है। दीपावली Diwali Diwali के दिवस पर लाल रंग का वस्त्र बिछा कर पीले पुष्प के आसन पर ‘श्री चक्र’ स्थापित कर पूजन करें। फिर निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें ।। ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं नमः // Om Hreem Shreem Hreem Namah यह प्रयोग दीपावली Diwali Diwali के दिन आप कभी भी प्रातः, सायं या मध्यरात्रि में करें, आधी रात में ही ‘श्री चक्र’ को वस्त्र में बांधकर तिजोरी में रख दें, ग्यारह दिन के पश्चात इसे नदी में प्रवाहित कर दें। आकस्मिक धन की प्राप्ति होती है। 

२. आकर्षक शरीर की प्राप्ति के लिए diwali laxmi sadhana prayog

साधक या साधिका रूप चतुर्दशी  के दिन ‘पद्मा’ को अपने दाहिने हाथ में लेकर सिर, दोनों नेत्र, दोनों कान, मुख, गले, हृदय, उदर, दोनों हाथ, नाभि, जंघा, पैर पर क्रम से स्पर्श करते हुए ग्यारह ग्यारह बार निम्न मंत्र का उच्चारण करें-

।। ॐ ह्रीं पद्मे आगच्छ नमः ॥ Om Hreem Padme Aagachh Namah प्रयोग समाप्त होने पर ‘पद्मा’ को निर्जन स्थान पर फेंक अधिक या साधिका की देह आकर्षक बनेगी। दिवाली Diwali साधना मंत्र

३. ‘हल्ट हकीक’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन पूजन कर धारण से कितना भी मानसिक तनाव हो, वह धीरे-धीरे समाप्त हो। है, सवा माह के बाद हल्ट हकीक को नदी में प्रवाहित कर दें।  

४. विद्या प्राप्ति में कठिनाई आ रही हो, तो  diwali laxmi sadhana prayog

विद्या प्राप्ति में कठिनाई आ रही हो, तो  diwali laxmi sadhana prayog  साधक बली के दिन एक पेंसिल, जिससे बच्चा लिखता हो, को सफेद मैं बांधकर निम्न मंत्र का २१ बार जप करें- ॥ ॐ ऐं क्रीं ऐं ॐ ॥ Om Ayeim Kreem Ayeim Om मंत्र जप नित्य  करें, फिर को बच्चे उसी पेंसिल से उपरोक्त मंत्र तीन बार लिखाएं। पेंसिल को क्षत रखें। दिवाली Diwali पर साधना

५. साधक में कार्य करने की शक्ति न्यून होती जा रही हैं। कार्य आरम्भ तो करता है, लेकिन कोई भी कार्य पूरा नहीं कर है, तो साधक यह प्रयोग सम्पन्न करें। दीपावली Diwali Diwali के दिन किसी पात्र में ‘ईप्सा’ रखकर उसका न करें, घी का दीपक लगा दें, निम्न मंत्र का जप १८ दिन तक २१ बार करें- ॥ ॐ ऐं तेजस् सिद्धिं क्लीं ॐ फट् ॥ Om Ayeim Teijas Siddhim Kleem Om Phat 

 

६. ‘अनौपम्या’ को लाल वस्त्र में बांधकर घर के उत्तर में रखने से घर में शांति का वातावरण बनता है। सवा माह के ‘अनौपम्या’ को नदी में प्रवाहित कर दें। –

७. यदि आप बरोजगार हैं और आपको कार्य की तत्क्षण चश्यकता है, तो ‘त्रिविधा’ को अपने दाहिने हाथ में लेकर प्रातः ७ बजे तथा सायं ७ बजे निम्न मंत्र का २१ बार जप करें- ॥ ॐ ह्रीं कार्य सिद्धिं ॐ नमः ॥ Om Hreem Kaarya Siddhim Om Namah. यह प्रयोग नौ दिन तक करें, शीघ्र ही मार्ग मिलेगा तथा प्रयोग के बाद त्रिविधा किसी मन्दिर में चढ़ा दें। 

८. यदि आप अपने वर्तमान कार्यक्षेत्र से सन्तुष्ट नहीं है और उसे बदलना चाहते हैं, लेकिन कोई उपयुक्त अवसर नहीं मिल रहा है, तो किसी पात्र में चावल भर कर उसमें ‘सुरेश्वरी’ स्थापित कर दें, नित्य पांच दिन तक ४१ बार निम्न मंत्र का जप करें- ॥ ॐ ऐं ह ह्रीं फट् ॥ Om Ayeim Hasfrem Hreem Phat पांचवें दिन सुरेश्वरी को नदी में या निर्जन स्थान में प्रवाहित कर दें।

९. घर में कितना धान्यादि लाकर रख दिया जाय, किन्तु फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वह कम ही रहे, जिसके कारण सदैव तनाव सा व्याप्त रहे, तो ऐसे स्थिति से निपटने के लिए ‘महाधात्री’ को किसी पात्र में गुलाब के पुष्प की पखड़ियों का आसन बनाकर स्थापित करें, महाधात्री का पूजन अष्टगंध तथा चावल से करें। उसके समक्ष घी का दीपक लगाकर नित्य ४५ मिनट मंत्र का उच्चारण करें- ॥ ॐ ह्रीं धनमानव आबद्ध सिद्धिं ॐ फट् ॥ Om Hreem Dhanmaanay Aabaddh Siddhim Om Phat यह प्रयोग पांच दिन तक करें, पांचवें दिन ‘महाधात्री’ को घर के भण्डार गृह में रख दें। सवा माह के बाद महाघात्री को नदी में प्रवाहित कर दें। 

१०. धन के निरन्तर आगमन के लिए किसी पात्र में कुंकुंम से अष्टदल कमल का निर्माण कर ‘प्रमोदा’ को स्थापित कर उस पर कमल के पांच पुष्प चढ़ाएं, घी का दीपक लगाकर निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें- ।। ॐ श्रीं श्रीं महाधनं देहि ॐ नमः ॥ Om Shreem Shreem Mahaadhanam Dehi Om Namah यह प्रयोग सात दिन तक करें, सातवें दिन ‘प्रमोदा’ को नदी में प्रवाहित कर दें।

११. महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए   diwali laxmi sadhana prayog

किसी पात्र में पाच गुलाब के पुष्प रखकर ‘ईश्वरी’ को स्थापित करें, घी का | दीपक लगाकर ईश्वरी का पूजन करें, निम्न मंत्र का जप ३५ बार ६ दिन तक करें- ॥ ॐ ह्रीं श्रियं देहि महालक्ष्मी आगच्छ ॥ Om Hreem Shriyam Dehi Mahaalakshmee Aagachh छह दिनों के पश्चात ईश्वरी को नदी में प्रवाहित कर दें।

१२. यश, सम्मान की प्राप्ति के लिए  diwali laxmi sadhana prayog

यश, सम्मान की प्राप्ति के लिए साधक धनत्रयो को स्नान कर ‘महिमा’ को अपने आज्ञा चक्र (दोनों भौहों के मध्य) रखते हुए निम्न मंत्र का जप ६५ बार करें – ॥ ॐ ऐं कीर्ति ऋद्धिं देहि देहि ॐ ॥ Om Ayeim Keertim Riddhim Debi Dehi Om यह प्रयोग भाई दूज तक करें, भाई दूज के दिन ‘महिमा’ क नदी में प्रवाहित कर दें। 

 

१३. वस्तु सम्बन्धी व्यापार की वृद्धि के लिए diwali laxmi sadhana prayog

साधक को चाहिए , कि पांच घी के दीपक लगाकर मध्य में पुष्प के आस- पर ‘ऋद्धि’ स्थापित करें, खड़े हो ‘कमलगट्टे की माला’ से निम्न मंत्र की तीन माला मंत्र जप करें- ॥ ॐ ह्रीं ऐं व्यापार वृद्धिं ॐ नमः ॥ Om Hreem Ayeim Vyaapaar Vriddhim Om Namah जप के उपरान्त माला ‘ऋद्धि’ के ऊपर रख दें, यह प्रयोग तीन दिन तक करें। पांच दिन के बाद ‘ऋद्धि’ तथा ‘माला’ नदी में प्रवाहित कर दें।  दीपावली Diwali Diwali साधना में

१४. मशीन सम्बन्धी व्यापार की वृद्धि के लिए साधक को चाहिए, कि मसूर की दाल से एक लाइन में सात ढेरियां बनाएं… सातों ढेरियों पर एक-एक पान का पत्ता तथा लौंग रख दें, तेल का दीपक लगा दें, धूप लगा दें। ‘अक्षया’ को मध्य की ढेरी पर स्थापित कर निम्न मंत्र का ३१ बार जप करें। ॥ ॐ वं विश्वकर्मा आजन्म साधव ॐ ॥ Om Vam Vishwakarmaa Aagachh Saadhay Om यह प्रयोग नौ दिन का है, नौ दिन के बाद ‘अक्षया’ को अपने व्यापार स्थल में स्थापित कर दें, सवा माह के पश्चात अक्षया को नदी में प्रवाहित कर दें। 

१५. चिकित्सा के व्यवसाय में सफलता के लिए  हरे रंग के वस्त्र में ‘वीर्हमाना’ बांध दें, उसे चिकित्सा सम्बन्धी व्यवसाय में ऐसे स्थान पर रखें जहां सिर्फ आप देख सकें, नित्य ‘वीर्हमाना’ पर एक लाल पुष्प चढ़ा कर निम्न मंत्र का जप २० दिन तक केवल ग्यारह बार करने से चिकित्सा के व्यवसाय में सफलता मिलेगी- ॥ ॐ ह्रीं ह्रीं हां हः ॐ नमः ॥ Om Hreem Hroum Hraam Hrah Om Namah २१ दिन के बाद वीईमाना को नदी में विसर्जित कर दें।  दीपावली Diwali Diwali साधना में

१६. व्यापार  खोलने के लिए अक्सर यह सुनने में आता है, कि दुश्मनी वश या स्वार्थ वश लोग एक दूसरे का व्यापार बांध देते हैं, जिसका सामना व्यापारी वर्ग को अक्सर करना पड़ता है। ऐसे टोटकों को समाप्त करने के लिए लाल रंग का वस्त्र बिछाकर हल्दी से त्रिभुज बनाकर उसके प्रत्येक कोण में एक-एक पुष्प रखें। एक पात्र में स्वस्तिक का निर्माण कर ‘नित्या’ उसके ऊपर रखें। ‘नित्या’ का संक्षिप्त पूजन कर, त्रिभुज में रखें प्रत्येक पुष्प पर अपना दाहिना हाथ रखते हुए निम्न मंत्र का २१-२१ बार जप करें- ॥ ॐ ह्रीं व्यापार बाधा निवारणाय फट् // Om Hreem Vyaapaar Baadhaa Nivarannaay Phat मंत्र जप पूर्ण होने पर पुष्प तोड़कर नित्या पर चढ़ा दें। इस प्रकार जब आखिरी पुष्प भी चढ़ जाए, तो नित्या तथा समस्त पुष्प की पंखुड़ियों को सावधानी पूर्वक श्मशान घाट में फेंक दें। #दीपावली Diwali Diwali साधनामें

१७. यदि घर का कोई सदस्य क्रोध में अधिक रहने लगा है और उचित या अनुचित बात का निर्णय किए बगैर सबका अपमान करने लगा है, तो साधक यह प्रयोग अपनाएं। जो क्रोध करता हो का नाम सफेद रंग के वस्त्र पर कुंकुंम से लिखकर उसमें ‘जवाला’ को रख कर बांध दें तथा उसे किसी भी वृक्ष पर निम्न मंत्र का ५१ बार जप करते हुए टांग दें – ॥ ॐ क्रीं क्रोषं संहरय वशव ॐ फट् ॥ Om Kreem Krodham Sanharay Vashay Om Phat 

 

 

Diwali Sadhana दिवाली के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग PH.85280 57364
Diwali Sadhana दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग PH.85280 57364

१८.ग्राहक दुकान की ओर आकर्षिन  लाल रंग के वस्त्र में अष्टगंध से ‘श्री’ लिखें, फिर उसमें ‘त्रिधा’ को बांध कर दुकान के बाहर टांगने से ग्राहक दुकान की ओर आकर्षित होगा। तीन माह बाद त्रिघा को नदी में विसर्जित कर दें। 

१९. स्वयं के व्यक्तित्व में विशेषता लाने के लिए ‘सूक्ष्मा’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन धारण कर लें, नित्य प्रातः स्नान करते हुए | निम्न मंत्र का जप करते हुए स्नान करें। ॥ ॐ श्रीं ई ब्रिवं साधव फट् // Om Shreem Eem Shriyam Saadhay Phat ग्यारह दिन के बाद ‘सूक्ष्मा’ को नदी में प्रवाहित कर दें। 

२०. यदि शत्रु अत्यधिक हावी हो रहा है, तो साधक यह प्रयोग सम्पन्न करें। यम द्वितीया के दिन रात्रि नौ बजे के बाद पांच कोयले रखकर ‘महेसरी’ रख दें, तीन दिन तक निम्न मंत्र का जप १०१ बार करें- ॥ ॐ क्लीं ह्रीं ऐं शत्रुनाशाय फट् // Om Kleem Hreem Ayeim Shatrunaashaay Phat जप के पश्चात रात में ही कोयले सहित ‘महेसरी’ को निर्जन स्थान में फेंक दें। 

२१. ‘जगजयेष्ठा’ को घर में सफेद रंग के वस्त्र में बांधकर उसे घर की उत्तर दिशा में रख देने से घर में हो रहा कलह में शांति आएगी।

२२. धन की प्राप्ति हेतु या आकस्मिक धन के आगमन के लिए ‘जगजयेष्ठा’ को निम्न मंत्र का ५१ बार उच्चारण कर धारण कर लें – ॥ ॐ ह्रीं हुं फट् ॥ Om Hreem Hum Ayeim Phat यह प्रयोग तीन दिन तक करें, तीन दिन के बाद जगजयेष्ठा को निर्जन स्थान में फेंक दें। 

२३. यदि आपका बच्चा बहुत अधिक झूठ बोलने लगा है और समझाने पर भी नहीं समझे, तो उसे दीवाली के दिन ‘सत्या’ पहना दें तथा नित्य आप उसके नाम का संकल्प लेकर २१ बार निम्न मंत्र का जप करें- ॥ ॐ फ्रें फ्रें हूं फट् // Om Frem Frem Hoom Phat २१ दिन के बाद सत्या को नदी में प्रवाहित कर दें।

२४. यदि आपका पुत्र गलत कार्यों में फंस कर घर से विमुख होता जा रहा है, तो उसे गलत कार्यों से उबरने के लिए, तो मानसिक संबल प्रदान करें ही, साथ ही यह प्रयोग भी करें। मिट्टी को गूंथ कर पांच ढेरियां बनाकर मध्य में ‘अपर्णा’ रख दें, अपर्णा का सिन्दूर से पूजन करें, अपने पुत्र का फोटो भी रख दें। बाकी चारों ढेरियों पर क्रमशः प्रत्येक ढेरी पर निम्न मंत्र का ३१ बार उच्चारण करते हुए सिन्दूर की बिंदी लगाएं- ॥ ॐ ऐं सौः ह्रीं ॐ // Om Ayeim Souh Hreem On मंत्र जप कर अपने पुत्र का फोटो उठाकर रख दें तथा बाकी चारों ढेरियों व अपर्णा को निम्न मंत्र का जप करते हुए क्रोधयुक्त हो दक्षिण दिशा में फेंक दें। 

२५. ‘क्रिया योग’ भी भगवती लक्ष्मी का ही एक स्वरूप है, साधक भगवती की कृपा से ही आध्यात्मिक जीवन में उन्नति कर सकता है। साधक नित्य प्रातः निम्न मंत्र का दस मिनट जप कर ध्यान करें, तो निश्चय ही उसे सफलता मिलेगी। ॥ ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं ग्लों ॐ फट् ॥ Om Shreem Hreem Hleem Gloum Om Phat

२६. ‘सम्पूर्णा’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन धारण करें, साधक का व्यक्तित्व उसकी दृष्टि से पूर्णता प्राप्त करता है। सवा माह तक उसको धारण करने के पश्चात सम्पूर्णा नदी में प्रवाहित कर दें। 

 

२७. घर से मन उचाट हो रहा है और मानसिक रूप से व्यक्ति व्यथित ज्यादा रहने लगा हो, तो ‘शुद्ध’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन लाल रंग के वस्त्र में निम्न मंत्र का ५१ बार उच्चारण कर बांध दें तथा उसे पूजन स्थान में रख दें तथा नित्य उसे देखते हुए मंत्र का जप करें- ॥ ॐ मं तच कुछ कुछ ॐ ॥ Om Mam Manas Cheitanyam Kuru Kuru Om यह प्रयोग सात दिन तक करें, सात दिन के बाद ‘शुद्ध’ अपने बगीचे में दबा दें या किसी मन्दिर में चढ़ा दें। धीरे 

२८. यदि पति या पत्नी का आकर्षण एक दूसरे से कम होता जा रहा है, तो उनके मध्य आकर्षण बढ़ाने के लिए एक पात्र में कुंकुंम से स्वस्तिक का निर्माण कर ‘आकर्षिणी’ स्थापित कर दें। उस पर कुंकुंम से पति तथा पत्नी के नाम का प्रथम अक्षर लिखें। उस पर प्रथम दिन लाल रंग के २१ पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप करें, दूसरे दिन पीले रंग के 

२१ पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र जप करें तथा तीसरे दिन सफेद रंग के २१ पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप करें- ॥ ॐ ह्रीं मोहिते आकर्षय नमः स्वाहा ॥ Om Hreem Mohite Aakarshay Namah Swaahaa नित्य पुष्पों को एकत्र कर किसी मन्दिर में चढ़ा दें। तीसरे दिन पुष्पों के साथ ही ‘आकर्षिणी’ को मन्दिर में चढ़ा दें।

२९. यदि साधक भवन खरीदना चाहता है, वह भवन को खरीदने की सारी औपचारिकताएं भी सम्पूर्ण कर लेता है, फिर भी किसी न किसी कारण से वह भवन खरीद नहीं पाता है, तो साधक ‘वसुधा लक्ष्मी यंत्र’ को लाल रंग के वस्त्र पर स्थापित कर यंत्र का पूजन करें, घी के तीन दीपक लगा दें तथा निम्न मंत्र का जप २१ बार कर यंत्र पर एक बिन्दी लगा दें। इस प्रकार यह क्रम तीन बार दोहराएं जब तीन बिन्दी लग जाए, तो व्यक्ति जिस भवन को खरीदना चाहता है। वहां पर यंत्र पर लगा कुंकुंम गिरा दें- ॥ ॐ ह्रीं वसुधालम्बे नमः ॥ Om Hreem Vasudhaa-lakshmyei Namah प्रयोग के बाद यंत्र नदी में प्रवाहित कर दें। “

३०. यदि भूमि खरीदी हुई है, लेकिन उस पर भवन निर्माण का कार्य हो पाना असम्भव लग रहा है, तो साधक भूमि के मध्य में ‘वसुधा लक्ष्मी यंत्र’ को एक हाथ भर गड्ढा खोदकर अपने हाथों से दीपावली Diwali Diwali के दिन स्थापित कर दें। 

३१. यदि भवन आधा बन कर रुका हुआ है, तो साधक किसी पात्र में ‘वसुमती’ स्थापित कर उस पर जल चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप १०१ बार करके, जल भवन में छिड़क दें- ॥ ॐ श्री ही कार्य सिद्धि ॐ नमः ॥ Om Ayeim Shreem Hreem Kaarya Siddhim Om Namah यह प्रयोग ९ दिन तक करें, नौ दिन के बाद ‘वसुमती’ को नदी में प्रवाहित कर दें। 

३२. शत्रुओं को निष्प्रभावी करने के लिए समाज में जो व्यक्ति उन्नति की ओर अग्रसर होता है। ★ धीरे-धीरे उसके शत्रु बढ़ते ही जाते हैं, कुछ तो स्वार्थवश होते हैं, कु ईर्ष्याग्रस्त लोग होते हैं, ऐसे शत्रुओं को निष्प्रभावी करने के लि ‘धूमाग्र’ को किसी पात्र में स्थापित कर उसका पूजन करें, धूमाना के समक्ष निम्न मंत्र का ३१ बार जप करें- ॥ ॐ हूं हूं शत्रुस्तंभनं ठः ठः स्वाहा ॥ Om Hroom Hroom Shatrustambhanam Tthah Tthah Swash जय समाप्त कर धूमाग्र को लाल वस्त्र में बांध कर रख दें। यह प्रयोग सात दिन तक करें। सात दिन के बाद धूमाग्र को ला वस्त्र में बांध कर नदी में प्रवाहित कर दें। 

३३. शत्रु मुकदमों को बढ़ता ही जा रहा है और पिछले वर्षों से चले आ रहे मुकदमे का निर्णय होना निश्चित नहीं लग रहा है ‘धूमाग्र’ पर काजल से अपने शत्रु विशेष या समस्त शत्रु लिखकर नि मंत्र का उच्चारण ग्यारह बार पांच दिन तक नित्य करें- ॥ ॐ हूं शत्रून् वशय विजय सिद्धिं ॐ फट् । Om Hroom Shatroon Vashay Vijay Siddhim Om Phat पांच दिन के बाद धूमाग्र को नदी में प्रवाहित कर दें। 

३४. आपके कार्यों का निरन्तर विरोध हो रहा हो औ आपको समझ में नहीं आ रहा है, कि यह विरोधी कौन है तो प्रयोग सम्पन्न करें। किसी थाली में कोयले का चूरा कर बिछा उस पर ‘कालिका’ स्थापित करें, कालिका का पूजन सिन्दूर तक लाल पुष्प से पूजन करें, निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें- क न ॥ ॐ क्लीं कालि शत्रु शमनं कुरु कुरु फट् // Om Kleem Kaali Shatru-shamanam Kuru Kuru Phat यह प्रयोग ३ दिन तक करें, तीन दिन के बाद ‘कालि को निर्जन स्थान में फेंक दें। 

३५.सन्तान सुख प्राप्त  दीपावली Diwali Diwali के दिन ‘भ्रमराम्बा’ को लाल पुष्प के ऊप स्थापित करें, भ्रमराम्बा का पूजन कुंकुंम, अक्षत तथा पुष्प से क भ्रमराम्बा पर कुंकुंम से रंगे हुए चावल मिलाकर चढ़ाते हुए निम् मंत्र का ६५ बार जप करें- – ॥ ॐ नमो भगवते पुत्र सुखं साधय कुरु कुरु नमः Om Namo Bhagwate Putra Sukham Saadhay Kuru Kuru Nam यह प्रयोग म्यारह दिन तक करें, ग्यारह दिन के बाद भ्रमराम को नदी में प्रवाहित कर दें। सन्तान सुख प्राप्त होता है। 

३६. पुत्र की प्राप्ति के लिए साधक ‘सिद्धि गुटिका’ लेकर पत्नी के नाम से संकल्पित कर, पत्नी को धारण करा दें त नित्य स्वयं तथा आपकी पत्नी निम्न मंत्र का जप ५१-५१ बार करें- ॥ ॐ श्रीं सोभाग्य वृद्धिं कुरु कुरु ॐ नमः ॥ – Om Shreem Soubhaagya Vriddhim Kuru Kuru Om Namah २१ दिन के बाद सिद्धि गुटिका नदी में प्रवाहित कर दें। 

३७. यदि सन्तान अनियंत्रित हो, तो ‘सिद्धि गुटिका’ के निम्न मंत्र का ७५ बार जप कर सन्तान की फोटो के साथ बांध कर रख दें- ॥ ॐ ह्रीं ज्वालामालिनि पुत्रं वशय आकर्षण ॐ नमः ॥ Om Hreem Jwaalaamaalini Putram Vashay Aakarshann Om Namah यह प्रयोग दीपावली Diwali Diwali के दिन करें। २१ दिन के बाद पुनः एक बार ७५ बार जप कर लें। उसके पश्चात सिद्धि गुटिका नदी में प्रवाहित कर दें। 

३८. यदि आप सौन्दर्यवान बनना चाहते हैं, तो रूप चतुर्दशी के दिन ‘सौन्दर्या’ को किसी पात्र में स्थापित कर उस पर जल चढ़ाते हुए, निम्न मंत्र का १५ मिनट तक जप करें, तथा उस जल को अपने ऊपर छिड़क लें- ।। ॐ श्रीं कृष्ण सौन्दर्य सिद्धिं ॐ नमः ॥ Om Shreem Krishana Soundarya Siddhim Om Namah इस प्रकार यह प्रयोग ९ दिन तक करें, ९ दिन बाद गुटिका नदी में प्रवाहित कर दें। 

३९. सौन्दर्ययुक्त  होने  प्रत्येक स्त्री का स्वप्न होता है, कि वह सौन्दर्ययुक्त व बनी रहे, लेकिन इस प्रदूषण युक्त, तनाव युक्त वातावरण में यह सम्भव नहीं हो पाता, लेकिन इस प्रयोग के माध्यम से स्त्री अपने सौन्दर्य को बनाकर रखने में समर्थ हो सकती है। ‘अप्सरा सौन्दर्य प्राप्ति गुटिका’ को अपने दाहिने हाथ में लेकर दाहिना हाथ सीधा रखें, टिका पर दृष्टिपात करते हुए निम्न मंत्र का ६१ बार जप करें- ॥ ॐ ह्रीं सः सूर्याब सौन्दर्य देहि स्वाहा ॥ Om Hreem Sah Sooryaay Soundarya Dehi Swaahan यह प्रयोग सात दिन तक करें, सात दिन के बाद अप्सरा सौन्दर्य गुटिका को जल में प्रवाहित कर दें। यह प्रयोग करते समय एक समय भोजन करें। 

४०. पूरे शरीर को निश्चित अनुपात में ढालने के लिए यह प्रयोग सम्पन्न करें। ‘इन्द्रेश’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन धारण कर लें तथा नित्य निम्न मंत्र का वज्रासन में बैठकर १०१ बार जप करें-॥ ॐ ह्रीं अमृते अमृत कल्पं साधव ॐ फट् ॥ Om Hreem Amrite Amrit Kalpam Saadhay Om Phat यह प्रयोग ग्यारह दिन तक करें, ग्यारह दिन के बाद इन्द्रेश को नदी में प्रवाहित कर दें। 

४१. कमल के बीज से निम्न मंत्र का जप करते हुए घी के ‘साथ १०१ आहुतियां देने से साधक की प्रत्येक कामना पूर्ण होती है। ॥ ॐ क्लीं चामुण्डे मनोवाति कुरु कुरु कट् ॥ Om Kleem Chaamunde Manovaanchhitam Kuru Kuru Phat 

४२. विशेष कामना की पूर्ति  के लिए किसी पात्र में ‘विधात्री’ स्थापित कर उसका पूजन करें, विधात्री पर तिल तथा जौ चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप ७५ बार करने से विशेष कामना की पूर्ति होती है- ॥ ॐ कं कामदेवाय मनोवांछित साधय ॐ फट् ॥ Om Kam Kaamdevaay Manovaanchhit Saadhay Om Phat यह प्रयोग तीन दिन तक करें। तीन दिन के बाद विधात्री को नदी में प्रवाहित कर दें, तिल तथा जौ एकत्र कर किसी को दान में दें। 

४३. विभवासु को लाल रंग के वस्त्र में बांध कर किसी वृक्ष में लटका देने से स्वयं के ऊपर आई विपत्तियां समाप्त होती है। 

४४. ‘सामुधा’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन अपने सिर पर से निम्न मंत्र का जप करते हुए ग्यारह बार घुमा कर दक्षिण दिशा में फेंक देने से रोगों से मुक्ति मिलती है। ॥ ॐ क्लीं आपदुद्धरणाव फट् ॥ Om Kleem Aapaduddharannaay Phat 

४५. ग्रह बाधा के कारण जीवन में सफलता नहीं मिल पा रही है तो ‘सौशिल्य’ को किसी पात्र में स्थापित कर उसका पूजन कुंकुम, अक्षत, पुष्प से पूजन करें, निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें- ॥ ॐ जूं सः ग्रह बाधा निवारणाय फट् // Om Jum Sah Graha Basdhaa Nivaarannaay Phat यह प्रयोग सात दिन तक करें, सात दिन के बाद ‘सौशिल्य’ को नदी में प्रवाहित कर दें। 

४६. शनि, राहु, मंगल ग्रह विपरीत प्रभाव दिखाने वाले हैं, तो साधक को चाहिए किसी पात्र में चावल भरकर उसमें ‘सौशिल्य’ स्थापित कर दें, सौशिल्य का पूजन अष्टगंध, लाल पुष्प से करें, जिस ग्रह विशेष के लिए प्रयोग कर रहे हैं, उसकी शांति के लिए संकल्प लें- ‘मैं ( ग्रह का नाम) की शांति के लिए यह प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूं। निम्न मंत्र का जप ७५ बार करें ॥ ॐ शं ग्रह दोष नाशय फट् ॥ Om Sham Grah Dosh Naashay Phat यह प्रयोग ११ दिन तक करें, ग्यारह दिन के बाद सौशिल्य को नदी में प्रवाहित कर दें। 

४७. मानसिक तनाव को दूर करने के लिए ‘शुद्धक’ को धारण कर लें, नित्य प्रातः ६ बजे से ६.३० तक ध्यान लगाएं, मानसिक तनाव तो समाप्त होगा ही, साथ ही समस्याओं का हल भी मिलेगा। सवा महीने बाद शुद्धक को नदी में प्रवाहित कर दें।

४८. जो अध्यात्म की उच्चता को धारण करना चाहता है और निरन्तर इसी प्रयास में संलग्न है, तो उसे यह प्रयोग अवश्य करना चाहिए। सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर कुंकुंम से स्वस्तिक का निर्माण कर उस पर ‘क्रिया योग्या’ स्थापित करें, इसका पूजन कर घी का दीपक लगा दें, दीपक की लौ पर त्राटक करते हुए निम्न मंत्र का जप आधे घण्टे तक करें- दा ॥ ॐ ह्रीं श्रीं ऐं क्रिवायोग्या सिद्धिं ॐ नमः ॥ Om Hreem Shreem Ayeim Kriyaayogyaa Siddhim Om Namah यह प्रयोग ग्यारह दिन तक करें, ग्यारह दिन के बाद क्रियायोग्या को नदी में प्रवाहित कर दें, दीपक की लौ पर नित्य त्राटक कर मंत्र जप करते रहें। 

४९. ‘अमृतस्यन्दिनी’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन अपने। स्थान में स्थापित कर, नित्य उस पर त्राटक करते हुए गुरु मंत्र का जप करने से साधक का कल्याण होता है। तीन महीने बाद अमृतस्यन्दिनी नदी में विसर्जित कर दें। 

५०. ‘रतिम्भरा यंत्र’ को पूजन स्थान में रखने मात्र से ही साधक के घर में बुद्धि, विद्या, श्री का वास होता है। यंत्र स्थापन के तीन माह के पश्चात यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें। साधना सामग्री 

५१. लाल रंग के वस्त्र पर ‘सर्वाभिलाषा पूर्णेच्छु यंत्र को स्थापित कर यंत्र का पूजन सुगंधित द्रव्य तथा पुष्प से करें, सुगंधित अगरबती लगाकर निम्न मंत्र का जप ११ दिन तक नित्य २१ बार करने से साधक को यौवन, सौन्दर्य, उमंग उत्साह की प्राप्ति होती है। ॥ ॐ ह्रीं सः सोन्दर्य सः ह्रीं ॐ ॥ Om Hreem Sab Soundaryam Sah Hreem Om ग्यारह दिन के बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें।

५२. विवाह योग्य कन्या का शीघ्र विवाह  हेतु किसी पात्र में अष्टगंध से षट्कोण बनाकर ‘सर्वाधारा यंत्र’ को स्थापित करें। यंत्र का पूजन करें, यंत्र पर दृष्टि एकाग्र करते हुए निम्न मंत्र का जप ६५ बार करें- ॥ ॐ क्लीं विवाह सिद्धिं ॐ ऐं फट् ॥ Om Kleem Vivaah Siddhim Om Ayeim Phat विवाह योग्य कन्या का शीघ्र विवाह होगा। यह प्रयोग पांच दिन का है, प्रयोग के समय कन्या का फोटो भी सामने रखें। प्रयोग समाप्त कर यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें। 

५३. सफेद वस्त्र पर ‘सहस्राणी’ स्थापित कर, उसका पूजन कुंकुंम, अक्षत तथा पुष्प से करने से स्त्री सौभाग्यशाली होती. है। सहस्राणी के समक्ष मात्र ११ बार निम्न मंत्र का उच्चारण करें- ॥ ॐ श्रीं श्रीं सोभाग्यं सिद्धबे ॐ नमः ॥ Om Shreem Shreem Soubhaagyam Siddhaye Om Namah सवा माह के पश्चात सहस्राणी को नदी में प्रवाहित कर दें।। 

५४. ‘सुख सौभाग्य यंत्र’ को बायें हाथ में लेकर उसे दाहिने हाथ से ढकते हुए निम्न मंत्र का ३१ बार उच्चारण करने से स्त्री अनेकानेक गुणों से युक्त होती है- ॥ ॐ ऐं आं सुगुणं आं ऐं फट् ॥ Om Ayeim Aam Sugunnam Aam Ayeim Phat यह प्रयोग ११ दिन का है। ग्यारह दिन के बाद यंत्र को नदी में विसर्जित कर दें। 

५५. ‘कमल गट्टे की माला’ से निम्न मंत्र का एक माला जप दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके करें, अष्टगंध का तिलक लगाएं, फिर वह साधक अपने आस-पास रहने वाले लोगों को सम्मोहि सा कर लेता है। यह प्रयोग पांच दिन तक करें- ॥ ॐ सं सर्व सम्मोहनाव फट् ॥ Om Sam Sarva Sammohanany Phat पांच दिन बाद माला नदी में प्रवाहित कर दें। 

५६. यदि पत्नी अत्यधिक कलहकारिणी हो गई हो तथा वश में न आये, तो साधक धनत्रयोदशी को पांच तेल के दीपक अपने चारों ओर लगा दें तथा मध्य में स्वयं खड़ा होकर निम्न मंत्र की ‘कमलगट्टे की माला’ से पांच माला जप करें- ॥ॐ हूँ फट् ॥ Om Kleem Hroom Streem Phat स्त्री का स्वभाव परिवर्तित होता है तथा वह पति के अनुसार चलती है, मंत्र जप कर माला तोड़कर उसके दानें घर से बाहर चारों दिशाओं में फेंक दें।

५७. यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक विपरीत बोलने ल हो तथा समझाने पर भी नियंत्रण में न आये, तो आक के पत्ते पर हल्दी से उस व्यक्ति का नाम लिख, निम्न मंत्र का जप ‘काली हकीक माला’ से सात माला कर, पत्ते सहित माला को किसी भी वृक्ष की जड़ में दबा दें। व्यक्ति आपके विरुद्ध फिर नहीं बोलेगा। ॥ ॐ ह्रीं श्रीं फट् ॥ Om Hreem Bhreem Hrum Phat 

५८. यदि पति पत्नी से विमुख हो रहा है और उसका ध्यान घर से कहीं और लग रहा है, तो स्त्री निम्न जप करते हुए भोजन करे, पति का पुन: पत्नी की ओर आकर्षण होगा। ॥ ॐ ह्रीं ठः ठः ह्रीं ॐ ॥ Om Hreem Tthah Tthab Hreem Om 

५९. जिस व्यक्ति को क्रोध अत्यधिक आता है, उसका क्रोध नियंत्रित करने के लिए, एक कागज पर अष्टगंध से उस व्यक्ति का नाम लिखें। उस कागज को गाय के दूध में डूबा दें, ‘त्रिगुणा माला’ से निम्न मंत्र-यंत्र विज्ञान ’10’ मंत्र का पांच माला जप करें। यह प्रयोग पांच दिन तक करें – ॥ ॐ क्लीं ऐं क्लीं फट् ॥ Om Kleem Ayeim Kleem Phat पांचवें दिन माला को नदी में विसर्जित कर दें।

६०. पुत्र या पुत्री के असंयमित आचरण के कारण यदि बदनामी हो रही है, तो उनका उन कारणों से उच्चाटन करने के लिए निम्न प्रयोग सम्पन्न करें- काले रंग के वस्त्र में ‘जयन्ती माला’ रखकर सिन्दूर से पोत कर पांच कीलें तथा एक कोयला रख कर मौली से बांध दें। पोटली को अपने हाथ में लेकर निम्न मंत्र का ६० बार जप करें- ॥ ॐ क्लीं सौः ही स्वाहा ॥ Om Kleem Ayeim Souh Hreem Swaahaa प्रयोग के पश्चात इसे किसी भी वृक्ष की जड़ में दबा दें, ऐसा करने से पुत्र/पुत्री को अपनी नासमझी का एहसास होगा और वह स्वयं को नियंत्रित कर लेंगें।

६१. शत्रु शान्ति हेतु चार अंगुल की नीम की लकड़ी लेकर उससे शत्रु का नाम किसी कागज पर लिखें, उस कागज पर लकड़ी रख दें, तथा उस पर ही एक तेल का दीपक रख दें। ‘जयन्ती माला’ से निम्न मंत्र की ग्यारह माला मंत्र जप करें। ॥ ॐ क्रीं क्लीं शत्रु शमनं क्लीं क्रीं फट् ॥ Om Kreem Kleem Shatrushamanam Kleem Kreem Phat यह प्रयोग तीन दिन तक करें, दीपक को न बदलें अपितु उसमें ही तेल डालकर जला दें। शत्रु कितना भी हावी हो रहा हो, एकदम से शांत हो जायेगा। यह अत्यन्त तीव्र प्रयोग है। तीसरे दिन अग्नि प्रज्ज्वलित कर माला को तोड़कर प्रत्येक मनके को घी में डुबोते हुए निम्न मंत्र जप करें, अंतिम आहुति में कागज तथा लकड़ी भी डाल दें। 

६२. धन प्राप्ति  हेतु निम्न मंत्र को अष्टगंध से सफेद रंग के वस्त्र पर लिख दि उस वस्त्र पर अपना बायां हाथ रखते हुए दाहिने हाथ से ‘लक्ष्मी माला’ से एक माला निम्न मंत्र जप करें। यह प्रयोग सात दिन तक करें। सातवें दिन वस्त्र को धन रखने के स्थान पर रख दें तथा माला को नदी में प्रवाहित कर दें। अनवरत धन प्राप्ति का स्रोत प्राप्त होगा। ॥ ॐ ही अक्षवं धनमानव फट् ॥ Om Hreem Akshayam Dhanmaanay Phat 

६३. चौड़े मुंह के मिट्टी के पात्र में पान, तुलसी, दूब, बिल्ब पुत्र, घी, चीनी, दूध डालकर तथा उसमें ‘लक्ष्मी यंत्र’ रखकर सफेद कपड़े से उसका मुंह बांध दें, उस पात्र का पूजन कर निम्न मंत्र का जप ७५ बार करें- उ उ ल है प्र 0 वि पु Я पृ ॥ ॐ क्लीं क्लीं ह्रीं फट् ॥ Om Kleem Kleem Hleem Phat खेत में एक हाथ का गड्ढा खोद कर दबा देने से खेत की ‘अगस्त’ 98 मंत्र-तंत्र- उपद्रवी जीवों से रक्षा में सहायता मिलती है। साधना सामग्री पैकेट-210/-

६४. किसी कागज पर लाल चंदन से गणपति बनाकर उस पर ‘लक्ष्मी यंत्र’ रखकर लाल पुष्प चढ़ायें, तेल का दीपक लगाकर निम्न मंत्र का जप ६५ बार करें- ॥ ॐ ह्रीं विचित्रे कामं पूरब ॐ ॥ Om Hreem Vichitre Kaamam Pooray Om व्यक्ति की कामना पूर्ण होती है। यह प्रयोग पांच दिन का है। पाचवें दिन यंत्र को उसी कागज में लाल धागे से बांधकर नदी में प्रवाहित कर दें।

६५. कुबेर के समान धन-धान्य प्राप्ति करने के लिए साधक ‘इन्द्राक्षी यंत्र’ को स्थापित कर उसका सुगंधित द्रव्य से पूजन कर निम्न मंत्र का जप ७५ बार करें। ॥ ॐ ह्रीं श्रीं नमो भगवते धनं देहि देहि ॐ // Om Hreem Shreem Namo Bhagwate Dhanam Dehi Dehi Om यह प्रयोग ग्यारह दिन तक नियमित रूप से करें, म्यारह दिन के बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें। – साधना सामग्री पैकेट 120/-

६६. किसी पात्र में कुंकुंम से षोडशदल कमल बनाकर उसमें ‘अष्टलक्ष्मी यंत्र’ स्थापित करें, अग्नि प्रज्ज्वलित कर १०१ बिल्वपत्र को घी के साथ निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए आहुति दे, तो स्त्री पुत्रवती होती है। ॥ ॐ ह्रीं फ्रें सः सः ॐ // Om Hreem Frem Sah Sah Om प्रयोग समाप्त कर यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें। 

६७. सर्वत्र विजय प्राप्त करने के लिए ‘कीर्तिजया यंत्र’ को किसी पात्र में स्थापित कर यंत्र का पूजन करें। उस पर सफेद पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का २१ बार उच्चारण करें- ॥ ॐ ऐं क्रों सर्व विजवाब ॐ ॥ Om Ayeim Krom Sarva Vijayaay Om मंत्र जप के बाद समस्त पुष्प एकत्रित कर वृक्ष की जड़ में डाल दें। यह प्रयोग सात दिन तक करें, सात दिन के बाद यंत्र भी नदी प्रवाहित कर दें। 

६८. ‘महानारायणी यंत्र’ को किसी पात्र में रखकर उसका पूजन करें, यंत्र को जल में डुबो दें तथा मध्यमा अंगुली से २१ बार जल में ही निम्न मंत्र लिखें, उस जल से सन्तान को स्नान करवाएं। सन्तान को नजर नहीं लगेगी। यह प्रयोग ९ दिन तक करें। ।। ॐ श्रीं महाभिषेक ह्रीं ॐ ॥ Om Shreem Mahaabhishekam Hleem Om नौ दिन के बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें।

६९. साधक चौखट पर बैठ अपने बाएं हाथ में ‘महानारायणी यंत्र’ को लेकर, किसी पात्र से यंत्र पर निरन्तर दूध चढ़ायें और निम्न मंत्र का ३५ बार जप करें, तो साधक की आयुवृद्धि होती है। ॥ ॐ ऐं दीर्घायुष्यं सिद्धवे ॐ नमः ॥ Om Ayeim Deergbaayushyam Siddhaye Om Namah यह प्रयोग मात्र तीन दिन करें। तीन दिनों के बाद यंत्र नदी में प्रवाहित कर दें। 

७०. ‘बीसा मुद्रिका’ को खेत के मध्य में रखकर उसके चारों ओर चार दीपक लगा दें, मुद्रिका का पूजन कर निम्न मंत्र का १०१ बार जप करते हुए अक्षत चढ़ाते जाएं- ॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अन्नपूर्ण स्वाहा ।। Om Hreem Shreem Kleem Annapoorane Swaahan मंत्र जप समाप्त कर मुद्रिका को वहीं पर गड्ढा खोदकर दबा दें। खेत के चारों ओर मंत्र पढ़ते हुए अक्षत अपने पीछे फेंकते चलें। जब पूरी परिक्रमा हो जाय तो खेत को प्रणाम कर घर वापस आ जाएं, फसल उत्तम होगी। 

७१. ‘सर्वमंगला यंत्र’ को स्थापित कर यंत्र का पूजन आक के पुष्प से करें, घी का दीपक लगा दें, अग्नि प्रज्ज्वलित कर निम्न मंत्र से खीर की ३१ आहुतियां दें – ॥ ॐ क्लीं महाकालाब अभीष्ट सिद्धिं नमः ॥ Om Kleem Mahaskaalany Abbeeshta Siddhim Namah साधक की अभीष्ट सिद्धि होती है। यह प्रयोग तीन दिन तक करें। तीन दिन बाद यंत्र नदी में प्रवाहित कर दें। 

७२. ‘सर्वमंगला यंत्र’ को स्थापित कर, यंत्र का पूजन कर, निम्न मंत्र का ७५ बार जप करने से व्यक्ति को ध्यानस्थ होने में शीघ्र सफलता प्राप्त होती है- ॥ ॐ क्रीं ही हूं आं ॐ ॥ Om Kreem Hreem Hroom Aam Om यह प्रयोग २१ दिन का है, २१ दिन के बाद समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित कर दें। 

७३. ‘स्वास्थ्य लक्ष्मी यंत्र’ का पूजन कर ५१ लाल पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप चढ़ाते हुए करने से साधक आरोग्य प्राप्त करता है तथा स्वयं के कायाकल्प का भी अनुभव करता है।. ॥ ॐ ह्रीं आरोग्यं देहि देहि फट् ॥ Om Hreem Aarogyam Dehi Dehi Phat यह प्रयोग सात दिन करें, सात दिन के बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें। 

७४. दीपावली Diwali Diwali के दिन ‘महालक्ष्मी यंत्र’ पर ५१ ‘कमल गट्टे के बीज’ पुष्प के साथ निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए ‘अगस्त’ 98 मंत्र-तंत्र- अर्पित करने से साधक धन प्राप्त करता है। ।। ॐ ह्रीं ह्रीं महालक्ष्मी आगच्छ नमः ॥ Om Hreem Hreem Mahaalakshmee Aagacchh Namah प्रयोग के पश्चात यंत्र तथा कमल गट्टे के बीज नदी में प्रवाहित कर दें। 

७५. लाल वस्त्र पर ‘जयंकारी स्थापित कर पूजन करें। अग्नि प्रज्ज्वलित कर तिल को सरसों के तेल से सिक्त कर १०१ आहुति निम्न मंत्र का जप करते हुए करने से साधक के समस्त शत्रु स्तम्भित होते हैं। ॥ ॐ क्लीं ऐं शत्रुस्तंमनाव फट् ॥ Om Kleem Ayeim Shatru-stambhanaay Phat अगले दिन ‘जयंकारी’ नदी में प्रवाहित कर दें। साधना सामग्री पैकेट – 45/-

७६. सफेद वस्त्र पर कुंकुंम से स्वस्तिक का निर्माण कर ‘आदित्यवर्णा’ स्थापित करें, यंत्र का पूजन करें, घी का दीपक प्रज्ज्वलित करें, आदित्यवर्णा के समक्ष सात दिन तक निम्न मंत्र का ६१ बार जप करने से साधक स्वयं में शिव के समान आनंद का अनुभव करता है। ॥ ॐ शं शिव मनुभवाय नमः ॥ Om Sham Shiv Manubhavaay Namah प्रयोग समाप्त कर आदित्यवर्णा को नदी में प्रवाहित कर दें। 

७७. यदि घर में निरन्तर रोग बना हुआ रहता हो, तो साधक दीपावली Diwali Diwali के एक दिन पूर्व रात्रि दस बजे यह प्रयोग सम्पन्न करें, किसी पात्र में ‘महानीला’ स्थापित कर महानीला का पूजन करें उस पर निम्न मंत्र का जप करते हुए जल चढ़ाएं- ॥ ॐ ठः ठः रोगनाशाव फट् // Om Tthah Tthah Rognaashaay Phat उस जल को पूरे घर में छिड़क दें। यह प्रयोग सात दिन तक करें, सात दिन के पश्चात महानीला को नदी में प्रवाहित कर दें। 

७८. निम्न मंत्र का प्रत्येक शनिवार को भगवती लक्ष्मी देवी पर जल चढ़ाते हुए उच्चारण करने से कामना पूर्ण होती है। ॥ ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं मनोवांछितं ॐ फट् ॥ Om Shreem Hreem Kleem Manovaanchhitam Om Phat

७९. दीपावली Diwali Diwali के दिन प्रात: काल ही स्नानादि से निवृत्त होकर, सफेद वस्त्र पर कुंकुंम से स्वस्तिक का निर्माण कर उस पर ‘शर्वाणी’ स्थापित करें, उसका पूजन सिन्दूर तथा पुष्प से कर तेल का दीपक लगा दें तथा निम्न मंत्र का जप ६५ बार करने से साधक जिस भी आजीविका से सम्बन्धित ज्ञान प्राप्त कर, अपनाना चाहता है, उसका मार्ग मिलता। है। ॥ ॐ क्रीं ह्रीं ज्ञान सिद्धिं ॐ फट् स्वाहा ॥ Om Kreem Hreem Gyan Siddhim Om Phat Swashas -यंत्र विज्ञान 18′ RO यह प्रयोग पांच दिन का है। पांच दिन के बाद शर्वाणी नदी मैं प्रवाहित कर दें। 

८०. किसी पात्र में ‘शर्वाणी’ स्थापित करें, शर्वाणी का पूजन सिन्दूर, अक्षत तथा पुष्प से करें, तिल का भोग लगाएं। शर्वाणी के समक्ष निम्न मंत्र का ६५ बार जप करने से दुर्घटना का भय समाप्त होता ॥ ॐ क्रीं कालिके हूं फट् स्वाहा ॥ Om Kreem Kaalike Hroom Phat Swanhas यह प्रयोग सात दिन का है। सात दिन के बाद शर्वाणी को नदी में प्रवाहित कर दें। 

८१. ‘वारुणी’ को एक पात्र में स्थापित करें, सामने तीन तिल के तेल का दीप प्रज्ज्वलित करें, प्रत्येक दीप का पूजन करें, । उसके पश्चात वारुणी का पूजन कर निम्न मंत्र का जप ६५ बार करने से व्यक्ति रोजगार प्राप्त करता है। ॥ ॐ हूं हूं महाकाल प्रसीद प्रसीद ॐ फट् // Om Hroom Hroom Mahaakaal Praseed Praseed Om Phat यह प्रयोग सात दिन का है। सात दिन के बाद वारुणी को नदी में प्रवाहित कर दें। 

८२. वट वृक्ष के पांच पत्ते लेकर उनको एक के ऊपर एक कर रख दें, उस पर ‘शक्ति खड्ग’ को स्थापित कर लाल कनेर के पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का २१ बार जप करने से साधक या साधिका इच्छित लड़का या लड़की से विवाह करता है- ।। ॐ ऐं अमीष्ट सिद्धिं विवाह बाधा निवारणाय फट् ॥ Om Ayeim Abheesht Siddhim Vivaah Baadhaa Nivaarannasy Phat यह प्रयोग पांच दिन तक करें, पांच दिन के बाद शक्ति खड्ग को नदी में विसर्जित कर दें।

८३. सफेद रंग के वस्त्र पर चावल की ढेरी बनाकर ‘शक्ति खड्ग’ को स्थापित कर निम्न मंत्र का ७५ बार जप करने से साधक दीर्घायु प्राप्त करता है। ॥ ॐ श्रीं ॐ दीर्घायुष्यं ॐ नमः ॥ Om Shreem Om Deerghasyushyam Om Namah अगले दिन शक्ति खड्ग को नदी में प्रवाहित कर दें।

८४. दीपावली Diwali Diwali के दिन सूर्योदय के समय सूर्य के समक्ष खड़े होकर अपने हाथ में ‘त्रैलोक्य भूषणा’ लेकर दोनों हाथ ऊपर कर निम्न मंत्र का जप बीस मिनट तक करें, जप समाप्त करके त्रैलोक्य भूषणा को पूजन स्थान में रख दें, भाग्योदय होगा। होली पर त्रैलोक्य भूषणा को होलिका में विसर्जित कर दें। ।। ॐ ह्रीं भाग्योदय कुरु कुरु रुद्रव फट् // Om Hreem Bhaagyoday Kuru Kuru Rudray Phat 

८५. ‘अन्नपूर्णा यंत्र’ को किसी पात्र में अक्षत भर कर स्थापित कर दें, अन्नपूर्णा यंत्र का पूजन कुंकुंम, अक्षत तथा पुष्प से करें, तीन बत्तियों का घी का दीपक लगाकर निम्न मंत्र का ५१ बार उच्चारण करने से अन्नादि के व्यापार में वृद्धि होती है। ॥ ॐ ह्रीं अन्नपूर्ण व्यापार वृद्धिं कुरु कुरु ॐ फट् // Om Hreem Annapoornne Vyaapaar Vriddhim Kuru Kuru Om Phat यह प्रयोग ग्यारह दिन का है। ग्यारह दिन के बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें। 

८६. सफेद रंग के वस्त्र पर अष्टदल कमल अष्टगंध से बनाएं उसके ऊपर ‘कमला यंत्र’ स्थापित कर यंत्र का पूजन कमल के पुष्प से करें, आटे के पांच दीपक प्रज्ज्वलित कर उपरोक्त मंत्र का उच्चारण ३१ बार करें- ॥ ॐ ई हीं नित्य क्लिन्ने ॐ फट् ॥ Om Eem Hreem Nitya Klinne Om Phat यह प्रयोग ९ दिन तक करें, दुकान की ब्रिकी में वृद्धि होगी। ९ दिन के बाद यंत्र को नदी में विसर्जित कर दें। 

८७. अशोक के सात पत्ते लेकर क्रम से रख दें, सातों के ऊपर चावल की ढेरी बनाकर एक-एक इलायची स्थापित करें, उसके आगे ‘कमला यंत्र’ स्थापित कर प्रत्येक इलायची पर कुंकुंम चढ़ायें। निम्न मंत्र का ६५ बार जप करें- / ओं क्रों व्यापार वृद्धिं नमः ॥ Om Krom Vyaapaar Vriddhim Namah वस्त्र से सम्बन्धित व्यापार में विशेष लाभ प्राप्त होगा यह प्रयोग आठ दिन तक करें, आठवें दिन यंत्र को नदी में विसर्जित कर दें। साधना सामग्री पैकेट-210/-

८८. उड़द की दाल को किसी पात्र में भरकर उस ‘शंखिनी’ स्थापित करें, शंखिनी पर गुड़हल का पुष्प चढ़ाएं, सुगन्धित अगरबत्ती लगा दें। निम्न मंत्र का ५१ बार जप करें- ॥ ॐ ऐं क्लीं त्रिपुरे व्यापार वृद्धिं साधय ॐ फट् ॥ Om Ayeim Kleem Tripure Vyaapaar Vriddhim Saadhay Om Phat सौन्दर्य प्रसाधन से सम्बन्धित व्यापार में धन लाभ होगा। यह प्रयोग ७ दिन तक करें, सातवें दिन शंखिनी को दाल सहित किसी नदी में विसर्जित कर दें। 

८९. पांच तेल के दीपक गोलाई में रखकर, मध्य में ‘महोत्कट’ स्थापित करें, महोत्कट का पूजन पुष्प, अक्षत से करें। निम्न मंत्र का ६१ बार मंत्र जप करें- ॥ ॐ ह्रीं ह्रीं व्यापार वृद्धिं ॐ ॥ Om Hloum Hleem Vyaapaar Vriddhim Om मशीन से सम्बन्धित व्यापारियों के लिए यह ब्रिकी वर्ल्डक -यंत्र विज्ञान *197 SA मशीन से सम्बन्धित व्यापारियों के लिए यह ब्रिकी वर्द्धक प्रयोग है। यह प्रयोग पांच दिन तक करें, पांचवें दिन ‘महोत्कट’ को किसी वृक्ष की जड़ में दबा दें। ·

९०. पृथ्वी पर आटे से चतुर्दल कमल का निर्माण कर | उसके ऊपर अक्षत रखकर ‘भू-वसना’ स्थापित करें, भू-वसना का पूजन कर, निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें – ॥ ॐ ह्रीं ह्रीं भूवेवाय ॐ ॥ Om Hreem Hreem Bhoo-devasy Ayeim Ayeim Om यह प्रयोग सात दिन तक करें, बाद में भू-वसना को नदी में प्रवाहित कर दें, भूमि सम्बन्धी व्यापार में लक्ष्मी की वृद्धि होगी। साधना सामग्री पैकेट 135/-

९१. ‘कात्यायनी यंत्र’ को सफेद रंग के वस्त्र में बांधकर निम्न मंत्र का ६१ बार उच्चारण कर, किसी निर्जन स्थान में फेंक दें या नदी में प्रवाहित करें- ॥ ॐ श्रीं सोभाग्यं सुमंगलाय फट् ॥ Om Shreem Soubhaagyam Sumangalaay Phat कैसी भी विपरीत परिस्थितियां हो व्यक्ति के अनुकूल होने लगती है। 

९२. किसी पात्र में ‘कात्यायनी यंत्र’ को स्थापित कर यंत्र का पूजन सिन्दूर से कर, पांच तेल के दीपक लगा दें, यंत्र पर २१ पीले पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप करें- ॥ ॐ श्रीं श्रं स सम्मोहनाव फट् // Om Shreem Shroom som Sammohanaay Phat इस प्रयोग को ७ दिन तक करें। व्यक्ति में सम्मोहन की क्षमता की वृद्धि होती है। सात दिन बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें। नित्य पांच बार उपरोक्त मंत्र का जप कर लें। 

९३. घर में क्ले बढ़ गया हो, पुत्रों के मध्य तनाश अधिकव हो, कि वे एक दूसरे का मुख देखना न पसन्द कर रहे हों तथा धन के लोभ मैं नित नये कुचक्र रच रहे हों, तो घर का मुखिया या कोई भी सदस्य यह प्रयोग सम्पन्न करे, जिससे घर में सुख-सौहार्द का वातावरण बन सके। किसी पात्र में पुष्प का आसन बनाकर ‘नारसिंही’ को स्थापित कर नारसिंही का पूजन करें, अक्षत (चावल) के वे दाने जो टूटे न हों को १०१ बार निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए नारसिंही पर चढ़ायें- ॥ ॐ क्लीं श्रं वं ॐ फट् ॥ Om Kleem Shram Vam Om Phat यह प्रयोग पांच दिन तक करें। पांचवें दिन समस्त चावल तथा नारसिंही को किसी वट वृक्ष के नीचे गड्ढा खोद कर दबा दें। 

९४. सफेद रंग के वस्त्र पर किसी पात्र में अष्टगंध से निम्न मंत्र लिखकर ‘स्वस्था’ स्थापित करें, स्वस्था का पूजन करें। इसके ज ‘अगस्त’ 98 मंत्र-तंत्र पश्चात दूध, दही, घी तथा मधु मिलाकर स्वस्था पर चढ़ाते हुए ७५ बार निम्न मंत्र का जप करें- ॥ ॐ हाँ आरोग्य सिद्धिं शिवाय नमः ॥ Om Hroum Aarogya Siddhim Shivaay Namah व्यक्ति के घर में आरोग्यता का निवास होगा। यह प्रयोग तीन दिन तक करें, तीन दिन के बाद स्वस्था को नदी में प्रवाहित कर दें।

९५. किसी पात्र में कुंकुंम से स्वस्तिक का निर्माण कर उसमें ‘शिवा’ स्थापित करें, शिवा का पूजन करें, अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसमें राई तथा नमक से निम्न मंत्र की ३१ बार आहुतियां दें। समस्त शत्रु तेजहीन, निर्बल हो जायेंगे तथा आपके मार्ग में रोड़े नहीं बन सकेंगे- ॥ ॐ इसकल हीं रुद्राव शत्रुनाशाय फट् // Om Hasakal Hreem Rudrasy Shatrunaashaay Phat यह प्रयोग पांच दिन तक करें। पांच दिन के पश्चात शिवा तथा समस्त भस्म एकत्र कर नदी में प्रवाहित कर दें।

९६. लाल रंग के वस्त्र पर पुष्प का आसन रखकर ‘भवमालिनी’ का स्थापन कर उस पर १०१ कमल के बीज निम्न मंत्र उच्चारित करते हुए चढ़ाने से व्यक्ति के घर लक्ष्मी का स्थाई स्रोत बनता है। यह प्रयोग दीपावली Diwali Diwali के दिन सम्पन्न करें। ।। ॐ श्रीं ह्रीं लक्ष्मी आबद्धं सिद्धवे नमः ॥ Om Shreem Hreem Lakshmee Aabaddham Siddhaye Namah प्रयोग समाप्ति पर समस्त सामग्री को बांधकर नदी में प्रवाहित कर दें तथा नित्य निम्न मंत्र का प्रातः म्यारह बार उच्चारण कर लें। 

९७. ‘घोषवर्जिता’ को लाल रंग के वस्त्र में अपने व्यापार स्थल पर रख दें तथा २१ दिन तक नित्य निम्न मंत्र का ६५ बार जप करें – ॥ ॐ हं क्षं लं व्यापार वृद्धिं फट् ॥ Om Ham Ksham Lam Vyaapaar Vriddhim Phat घोषवर्जिता को उसी वस्त्र में बांधकर बाइसवें (२२) दिन नदी में प्रवाहित कर दें तो व्यापार में बढ़ोत्तरी होगी। 

९८. किसी पात्र में जल लेकर उसको देखते हुए निम्न मंत्र का २१ बार जप कर उस जल को पूरे घर में छिड़क दें, यह प्रयोग नित्य करने से घर में छोटी-मोटी बाधाएं तो समाप्त होंगी ही, साथ ही वातावरण प्रसन्नतादायक बना रहेगा। ॥ ॐ खें खों बाधा निवारणाय फट् // Om Khem Khoum Bandhaa Nivaarannay Phat

९९. जो व्यक्ति पशुपालन करते हैं, वे पशुओं की रक्षा को लेकर हर क्षण चिन्तित रहते हैं, कि न जाने किस बीमारी से वे बेजान जीव ग्रसित हो जाएं। उनकी सुरक्षा के लिए यह प्रयोग सम्पन्न करें। जिस स्थान में पशु रहते हैं उस स्थान के उत्तर दिशा की ओर ‘सूर्य्या’ के मंत्र-यंत्र विज्ञान 20 सामने ५१ बार निम्न मंत्र का उच्चारण कर दबा दें- ॥ ॐ ही पशुपतवे रोजनाशाय फट् ॥ Om Hreem Pashupataye Rognaashaay Phat नित्य इसी मंत्र का ५१ बार उच्चारण करते हुए अगरबती उसी स्थल पर लगा दें। पशु स्वस्थ बने रहेगें। 

१००. ‘घोषवर्जिता’ को किसी पात्र में स्थापित कर, घोषवर्जिता का पूजन कुंकुंम अक्षत, पुष्प से कर घी का दीपक लगा दें, निम्न मंत्र का जप ५१ बार ग्यारह दिन तक करें- ॥ ॐ ह्रीं आकस्मिकं धनं देहि देहि ॐ // Om Hreem Aakasmikam Dhanam Dehi Dehi Om ग्यारह दिन के बाद घोषवर्जिता को नदी में प्रवाहित कर दें, साधक आकस्मिक धन प्राप्ति के स्रोत प्राप्त करता है।

१०१. चावल की ग्यारह ढेरियां बना लें प्रत्येक पर एक सुपारी रखें, मध्य में ‘नृसिंहीं स्थापित करें, नृसिंहीं का पूजन सिन्दूर तथा पुष्प से करें, इसी प्रकार सभी ढेरियों का पूजन करें। पांच बत्तियों का दीपक लगाएं। निम्न मंत्र का जप १०१ बार करें, यह प्रयोग ग्यारह दिन तक करें- ॥ ॐ आं ही करें] महाकट् ॥ Om Aam Hreem Krom Mahaa-arisinghaay Phat साधक का व्यक्तित्व प्रचण्ड, तेजस्वी होगा। ग्यारह दिन बाद समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दें। 

१०२. किसी पात्र में काजल से दो आंखें बनाएं, उस पर ‘महाचण्ड’ को स्थापित करें, उस पर कुंकुंम से अपने शत्रु का नाम लिखें, फिर क्रोध मुद्रा में निम्न मंत्र का ७५ बार जप करते हुए महाचण्ड पर काली सरसों के दाने फेंकें- ॥ ॐ ऐं क्लीं शत्रु शमनं ॐ फट् ॥ Om Ayeim Kleem Shatrushamanam Om Phat मंत्र जप समाप्त कर समस्त सरसों जला दें। यह प्रयोग आठ दिन तक करें। शत्रु मानसिक रूप से आपसे भयभीत होगा ही तथा दिनों-दिन वह अपने कर्मों का फल भोगता रहेगा। आठ दिन के बाद सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दें। 

१०३. लाल रंग के वस्त्र पर अष्टगंध से त्रिभुज बनाकर उसके मध्य में ‘वसुप्रदा’ को स्थापित करें, उसका पूजन करें, तेल का दीपक लगाकर निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें- ॥ ॐ ह्रीं वास्तुदेवाय नमः ॥ Om Hreem Vaastudevaay Namah साधक भूमि, भवन निर्माण आदि का कार्य सफलता पूर्वक कर लेता है। यह प्रयोग ६ दिन का है छः दिन के बाद ‘वसुप्रदा’ को नदी में प्रवाहित कर दें। 

-१०४. जो साधक विद्या, लक्ष्मी, यश प्राप्त करना चाहता है यह प्रयोग सम्पन्न करे। किसी पात्र में कुंकुंम घोल दें, उसमें एक पुष्प रखकर उस पर ‘बागीश्वर’ स्थापित करें, उसके समक्ष खड़े। होकर निम्न मंत्र का ६५ बार मंत्र जप करें- ॥ ॐ हां हंसः हाँ हाँ ॐ स्वाहा ॥ Om Haam Hansah Hroum Hroum Om Swaahas यह प्रयोग तीन दिन तक करें। तीन दिन के पश्चात बागीश्वर को नदी में विसर्जित कर दें। 

१०५. ‘जयाश्री’ को कुंकुंम से रंगे हुए चावल पर स्थापित करें जयाश्री का पूजन कुंकुंम, अक्षत तथा पुष्प चढ़ाकर करें। जयाश्री के समक्ष घी का दीपक लगाकर निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें- ॥ ॐ ह्रीं क्रीं धनागमं साधव ॐ ॐ ॥ Om Hreem Kreem Dhanaagamam Sandhay Om Om धन प्राप्ति के नये अवसर मिलेंगे। यह प्रयोग तीन दिन का है। तीसरे दिन जयाश्री को नदी में प्रवाहित कर दें। 

१०६. किसी पात्र में ‘इन्द्राक्षी माला’ स्थापित कर इन्द्राक्षी माला का पूजन अष्टगंध, पुष्प तथा अक्षत से कर, सुगंधित धूप लगायें। निम्न मंत्र का जप ३५ बार नित्य नौ दिन तक करें- ॥ ॐ ह्रीं देहि महेन्द्राय फट् ॥ Om Hreem Iddham Dehi Mahendraay Phat साधक का व्यक्तित्व इन्द्र के समान प्रभावशाली होता है। 

१०७. ‘रतिप्रिया माला’ को किसी पात्र में स्थापित कर, यज्ञ कुण्ड में अग्नि प्रज्ज्वलित कर घी तथा जीरे से निम्न मंत्र का १०१ बार आहुति देने से जिस व्यक्ति का भी आकर्षण करें, तो वह साधक के अनुकूल होता है। ॥ ॐ सं संकर्षणाव रतिप्रियाब फट् ॥ Om Sam Sankarshannaay Ratipriyaay Phat अगले दिन रतिप्रिया माला को किसी मन्दिर में चढ़ा दें। 

१०८. जो साधक समाज में निरन्तर अग्रणी बने रहना चाहते हैं, वे ‘सिद्धिमाला’ से निम्न मंत्र का जप एक माला २१ दिन तक करें ॥ ॐ फट् ॥ 20 Om Ayeim Frem Heim Hroom Phat २१ दिन के बाद सिद्धिमाला को नदी में प्रवाहित कर दें। –

दीपावली Diwali Diwali के सभी १०८ प्रयोगों में से साधक अपनी आवश्यकतानुसार जितने चाहे, उतने प्रयोग सम्पन्न कर सकता है। यदि साधक चाहें, तो एक दिन में एक से अधिक प्रयोग भी कर सकता है, किन्तु यह ध्यान रखें, कि दो प्रयोगों को करने के बीच में कम से कम एक घण्टे का गैप अवश्य दें। 

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Narsingh Sadhna – भगवान प्राचीन नृसिंह साधना PH.8528057364

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Narsingh Sadhna - भगवान प्राचीन नृसिंह साधना PH.8528057364

 

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Narsingh Sadhna – भगवान प्राचीन नृसिंह साधना PH.8528057364 यदि आप साधक हैं तो केवल नर नहीं नर केसरी बनिए इस  नृसिंह साधना से प्रत्येक युग में भगवान युग की आवश्यकता के अनुरूप स्वरूप ग्रहण कर इस धरा पर अवतरित होते हैं अपने भक्तों के कष्ट निवारण करने के लिए यह एक सुस्थापित धारणा है हिन्दु धर्म की।

किंतु क्या उनके प्रत्येक आगमन में कोई मुक संदेश भी नहीं निहित होता? इसी की समुचित विवेचना कर रहा है यह लेख इस नृसिंह जयन्ती के अवसर पर जिस प्रकार से पुनर्जन्म का विश्वास हिन्दू धर्म का एक मूलभूत विश्वास है, उसी प्रकार से इस बात में दृढ आस्था है कि ईश्वर अपने भक्तों के कष्ट निवारणार्थ समय-समय पर अवतरण के माध्यम से आकर उन्हें पाप-ताप-ताप से मुक्त करने की क्रिया करते हैं।

यह भी हिन्दू धर्म का एक आधारभूत विश्वास है। दोनों ही विश्वासों के पीछे जो मुख्य बात है, वह यही है, कि भारतीय चिंतन में कभी भी ईश्वर से अलगाव की कल्पना तक नहीं की गई है। जिस प्रकार जीवन एक सहज घटना है उसी प्रकार ईश्वर का निश्चित कालावधि. पर अवतरण भी एक सतत् घटना है, जो मत्स्यावतार से लेकर इस कलियुग में होने वाले कल्कि अवतरण के रूप में पुराणादि शास्त्रों में विस्तार से वर्णित है। जैसा कि लोक श्रुतियों में मान्य है जब यह घरा ढाई हजार वर्ष तक तपस्या करती है, तब ईश्वर युग के अनुरूप स्वरूप ग्रहण कर इस घटा पर अवतरण के माध्यम से अपने भक्तों का |

कत्याण करते हैं तथा उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने के उपाय सृजित करते हैं। वस्तुतः प्रत्येक अवतरण का एक निश्चित अर्थ रहा है और सामान्य लोक विश्वास से पृथक (कि ईश्वर ऐसा प्राणी मात्र के उद्धार के लिए करते हैं अवतरण की घटना के विशिष्ट अर्थ भी होते हैं।

प्रत्येक अवतरण किसी एक या दो भक्त की विपत्ति में रक्षा करने अथवा उसके उद्धार तक ही सीमित न रह कर अनेक गूढ़ संदेश भी छिपाए हुए होता है, यद्यपि पौराणिक कथाओं से अभिव्यक्त ऐसा ही होता है, मानों ईश्वर ने किसी भक्त विशेष की पुकार पर इस धरा पर आना स्वीकार किया और यही बात भगवान श्री विष्णु के नृसिंहावतार के संदर्भ में भी पूर्ण प्रासंगिक है।

 

पौराणिक गाथाओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा के दो द्वारपालों ने एक बार भगवान ब्रह्मा की आज्ञा के पालन के क्रम में भगवान ब्रह्मा के चार प्रथम मानस पुत्रों में से एक को भीतर प्रवेश करने से वर्जित कर दिया, जिससे उन्होंने क्रोधयुक्त हो उन दोनों को राक्षस योनि में चले जाने का श्राप दे दिया।

बाद में क्रोध शांत होने व वास्तविकता का ज्ञान होने पर उन्होंने द्वारपालों की प्रार्थना पर उन्हें यह वरदान दिया कि यद्यपि उनका वचन मिथ्या नहीं हो सकता, अतः वे राक्षस योनि में तो जाएंगे ही, किंतु उनका वह स्वयं भगवान विष्णु के हाथों से होने के कारण ये मुक्त होकर परमपद की प्राप्ति कर सकेंगे।

कालांतर में ये दोनों द्वारपाल ही क्रमशः हिरण्यक्ष एवं हिरण्यकश्यप के रूप में आए, जिनके अत्याचारों से सारी धरा ही नहीं देवलोक आदि तक त्राहि-त्राहि कर पड़े, जिन्हें समाप्त करने के लिए भगवान विष्णु ने दो बार अवतार लिए।

हिरण्याक्ष को समाप्त करने के लिए शूकर अवतार तथा हिरण्यकश्यप को समाप्त करने के लिए नृसिंह अवतार इसी कारणवश संभव हुए। पौराणिक गाथाओं की कथात्मक शैली में क्या तथ्य छुपे होते हैं अथवा क्या वे केवल विशिष्ट घटनाओं का कथात्मक विस्तार भर होती हैं, यह तो पृथक विवेचना और चिंतन की बात है, किंतु जैसा कि प्रारम्भ में कहा, कि प्रत्येक अवतरण स्वयं में एक संदेश भी निहित रखता है, उसी क्रम में चिंतन करने पर स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है, कि भगवान श्री विष्णु के इस विशिष्ट अवतरण (नृसिंह अवतरण) का भी एक गूढ संदेश है और संदेश है, ‘नृ’ | अर्थात् मनुष्य को ‘सिंह’ अर्थात् पटाक्रमी बनने का संदेश |

यह जीवन का एक सुस्वीकृत तथ्य है, कि केवल इस युग में ही नहीं वरन् प्रत्येक युग में वही व्यक्ति जीवित रह सका है, जिसने जीवन में संघर्ष किया है। जीवन संघर्षो का एक अविराम क्रम होता है तथा इसमें जो क्षण भर चूका जीवन उसकी प्राण शक्ति का हनन कर देता है। |

और फिर ऐसा व्यक्ति जिसके प्राणों का ही हनन किया जा चुका हो, कोई आवश्यक नहीं कि जीवित रहते हुए भी वह जीवित व्यक्तियों की श्रेणी में आता हो, क्योंकि केवल श्वास-प्रश्वास के चलते रहने को ही तो जीवन नहीं कहा जा सकता ।

वास्तव में जीवन तो उसका कहा जा सकता है, जो अपने जीवन के लक्ष्यों को सिंह की भांति झपट कर प्राप्त करने की क्षमता से युक्त हो। वन्य प्राणियों में सर्वाधिक ओजस्वी पशु सिंह को ही माना गया है, जो अनायास कभी किसी पर हमला करता ही नहीं, किंतु | आवश्यकता पड़ने पर अथवा क्रुद्ध हो जाने पर जब वह हुंकार भर कर खड़ा हो जाता है, तो अन्य छोटे-छोटे जानवरों की कौन कहे मस्त गजराज भी कतरा कर निकल जाने में ही अपनी भलाई समझते हैं। ऋषियों ने भी पुरुष की इसी सिंहवत रूप में कल्पना की थी।

सिंहवत बनना केवल शौर्य प्रदर्शन की ही एक घटना नहीं होती वरन सिंहवत् बनना इस कारण से भी आवश्यक है, कि केवल इसी प्रकार का स्वरूप ग्रहण करके ही जीवन की गति को सुनिर्धारित किया जा सकता है, अन्यथा एक-एक |

 

आवश्यकता के लिए वर्षो वर्ष घिसट कर उसे प्राप्त करने जीवन का सारा सौन्दर्य, साटा रस समाप्त हो जाता है। भगवान विष्णु ने तो एक ही हिरण्यकश्यप को समाप्त करने के लिए नृसिंह स्वरूप में, पौराणिक गाथाओं के अनसार अवतरण लिया था,

किंतु मनुष्य के जीवन में त प्रतिदिन नूतन राक्षस आते रहते हैं, जो हिरण्यकश्यप की है भांति अस्पष्ट होते हैं, यह अस्पष्ट ही होता कि उनका समापन कैसे संभव हो, उनसे मुक्ति पाने का क्या उपाय हो सकत है? और यह भी सत्य है, कि यदि जीवन में अभाव, तनाव पीड़ा (शारीरिक, मानसिक अथवा दोनों), दारिद्र्य जैसे राक्षसों से एक-एक करके निपटने का चिंतन किया जाए. तो मनुष्य की आधी से अधिक क्षमता तो इसी विचार-विमर्श में निकल जाती हैं, शेष जो आधी बचती है, वह किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देती।

साथ ही जीवन के ऐसे राक्षसों से तो केवल सामान्य प्रयास से ही नहीं वरन् ऐसे क्षमता युक्त प्रयास से जूझना आवश्यक होता है, जो साक्षात् नरकेसरी की ही क्षमता हो। तभी जीवन में कुछ ऐसा घटित हो सकता है, जिस पर गर्वित हुआ जा सकता है। सामान्यतः साधना का क्षेत्र अत्यन्त दुष्कर प्रतीत होता है, क्योंकि साधना जीव को वास्तविकताओं का यथावत् प्रस्तुतिकरण व विवेचन कर देती है।

उसमें भक्ति जगत की भांति दिवास्वप्नों की मधुर लहर नहीं होती है. किंतु अन्ततोगत्या व्यक्ति का हित साधना से ही साधित होता है, क्योंकि साधना जीवन की कटु वास्तविकताओं का यथावत् वर्णन करने के साथ-साथ उससे मुक्त होने का उपाय भी वर्णित करती चलती है।

 

वस्तु स्थितियों कां विवेचन इस कारणवश आवश्यक होता है, जिससे साधक के मन में एक सुस्पष्ट धारणा बन सके, कि अन्ततोगत्वा उसकी समस्या क्या है, किस प्रकार से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है?

यहां नृसिंहावतार की संक्षिप्त व्याख्या से भी यही तात्पर्य था और साधकों की सुविधार्थ उस साधना विधि का प्रस्तुतिकरण भी किया जा रहा है, जो इस व्याख्या को पूर्णता देने की क्रिया है अर्थात् केवल वर्णन-विवेचन नहीं, यह उपाय भी प्रस्तुत करने का प्रयास है, जिसके माध्यम से कोई भी साधक अपने जीवन को संवारता हुआ, अपनी रंग-रग में सिंह की ही लपक और शौर्य को भरता हुआ जीवन की उन समस्याओं पर झपट्टा मार सकता है,

जो नित नये स्वरूप ने आती रहती है तथा यह भी जीवन का एक कटु सत्य है, कि जब तक जीवन रहेगा तब तक समस्याएं भी आएंगी ही लेकिन जो साधक दृढ निश्चयी होते हैं, जिनके मन में सर्वोच्च बनने का भाव हिलोरे ले रहा होता है, वे अवश्यमेव ऐसी साधना सम्पन्न कर अपने जीवन को एक नया ओज व क्षमता देते हैं, जैसा कि नीचे की पक्तियों में प्रस्तुत साधना विधि की भावना है। नृसिंह साधना को मूलरूप में सम्पन्न करने के इच्छुक साधक के पास ताम्रपत्र पर अंकित नृसिंह यंत्र व नृसिंह माला आवश्यक उपकरण के रूप में होनी चाहिए।

नृसिंह  साधना   विधि Narsingh  Sadhna vidhi

Narsingh Sadhna - भगवान प्राचीन नृसिंह साधना PH.8528057364
Narsingh Sadhna – भगवान प्राचीन नृसिंह साधना PH.8528057364

यह साधना नृसिंह NARSINGHअथवा किसी भी रविवार की रात्रि में सम्पन्न की जा सकती है। साधक इसमें वस्त्र आदि का रंग काला रखें तथा दिशा दक्षिण की ओर मुख करके हो यंत्र व माला का सामान्य पूजन कुंकुंम, अक्षत, पुष्प की पंखुडियों से कर तेल का एक बड़ा दीपक लगा दें य निम्न मंत्र की इक्यावन (51) मालाएं ‘नृसिंह माला से दत्तचित्त भाव से करें मंत्र ॥

नरसिंह NARSINGH MANTRA तांत्रिक मंत्र

ॐ श्रीं क्रीं नृसिंहाय नमः ॥ OM KSHROUM KROUM NREE SINGHAAYA NAMAH

साधक यह मंत्र जप दो बार में भी सम्पन्न कर सकते हैं, अर्थात् एक बार में इक्कीस (21) माला मंत्र जप कर पुनः विश्राम कर इकतीस (31) माला मंत्र जप सम्पन्न करके कर सकते हैं, किंतु सम्पूर्ण मंत्र जप एक ही दिन में सम्पन्न हो जाना आवश्यक होता है। मंत्र जप के अगले दिन सभी सामग्रियों को दक्षिण दिशा में जाकर कहीं सुनसान में गड्ढा खोदकर दबा दें तथा घर आकर स्नान कर लें। संभव है मंत्र जप के पश्चात् साधक को आगामी दस-पन्द्रह दिनों तक शरीर में विचित्र से खिंचाव आदि होते महसूस हो, किंतु ये सभी साधना में सफलता के विशेष लक्षण होते हैं।

 

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चमत्कारी वीर बेताल साधना – Veer Betal sadhna ph .8528057364

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चमत्कारी वीर बेताल साधना - Veer Betal sadhna ph .8528057364

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चमत्कारी वीर बेताल साधना - Veer Betal sadhna ph .8528057364
चमत्कारी वीर बेताल साधना – Veer Betal sadhna ph .8528057364

 

चमत्कारी वीर बेताल साधना – Veer Betal sadhna ph .8528057364 वीर बेताल Veer Betal सिद्धि जो जीवन की अद्वितीय साधना है, जो व्यक्ति को रंक से राजा बना देती है, जो साधारण व्यक्ति को अद्वितीय बलशाली बना देती है और उसके द्वारा कठिन और असम्भव कार्य भी चुटकी बजाते सम्पन्न हो जाते हैं।

मैं यह कहूं कि ‘ वीर बेताल Veer Betal स्वयं में सरलता, दयालुता और ठगे जाने की सीमा तक बुद्धि से सरल, किसी दिद्युत शक्ति की ही दूसरी संज्ञा होती है, तो क्या अनेक पाठक मेरा विश्वास कर सकेंगे? केवल पाठक ही नहीं वीर बेताल Veer Betal के नाम से किसी रोमांचक अनुभूति की प्रतीक्षा में दिल थाम कर बैठे रहने वाले साधक मी सहसा मेरी बात पर विश्वास नहीं कर सकेंगे।इस तथ्य से परिचित हूं किन्तु जो सत्यता है वह यही है।

यह सत्यता स्वयं में विरोधाभासी भी है और हतप्रभ कर देने वाली भी. किन्तु निरपेक्ष रूप से सत्यता यही है। विरोधाभासी इस कारणवश, कि एक विद्युत शक्ति की तीव्रता से भरा व्यक्तित्व सरल, दयालु और ठगे जाने की सीमा तक बुद्धि से सरल कैसे हो सकता है? विद्युत का तो गुण ही होता है. आघात दे देना, भस्म कर देना, एक ही क्षण में सब कुछ जलाकर राख कर देना और जरा सा चूके, तो स्वयं सृजनकर्ता को ही दिनष्ट कर देना; किन्तु विद्युत की ऐसी धारणा केवल विज्ञान या साइंस में ही सम्भाव्य हो सकती है, भारतीय ज्ञान में नहीं।

वीर बेताल Veer Betal वस्तुतः ज्ञान पक्ष की एक विद्युत ही है, जिसको नियंत्रित करने वाला विज्ञान ही ‘साधना’ कहलाता है। ‘भारतीय विज्ञान’ जो साइंस नहीं है, नियंत्रण करने के आग्रह से युक्त कोई कला अथवा युक्ति भर ही होती है, क्योंकि नियंत्रित शक्ति ही सृजन कर सकती है, अनियंत्रित शक्ति नहीं।

वीर बेताल Veer Betal क्यों भारतीय चिंतन में जुगुप्सा उत्पन्न करने वाला हो गया? क्यों सामान्य साधक और गृहस्थ साथक उसके नान तक से ही घृणा करने लग जाते हैं? जैसे प्रश्नों के उत्तर में मैं वही कई बार दोहराई बात पुनः नहीं कहना चाहता कि गलत हाथों में पड़ यह साधना भी तंत्र व सावर मंत्रों की ही भांति निम्न दृष्टि से देखी जाने लग गई।

यह तो सत्य है कि ऐसी विलक्षण साधनाएं, जो अपने आप में अचूक थीं. गलत हाथों में पड़कर समाज की सामान्य धारा से बहिष्कृत कर दी गई. किन्तु क्या कभी किसी ने इस बात पर ध्यान देना चाहा है, कि क्यों ये साधनाएं गलत हाथों में जा पड़ी? क्या इसमें केवल उन्ही लोगों का योगदान रहा जिनकी प्रवृत्तिया दूषित थीं अथवा समाज का भी कोई योगदान रहा होगा?

कटु सत्य तो यही है कि ऐसी दुर्लभ विद्याओं के गलत हाथों में पड़ जाने का कारण स्वयं समाज ही होता है। जब समाज के प्रबुद्ध वर्ग के व्यक्ति ललक और गम्भीरता से स्वयं परीक्षण कर सत्यता को परखने की भावना व क्रिया त्याग देते हैं, तभी समाज में ऐसा क्षय होता है।

वस्तुतः कोई भी साधन स्वयमेव जाकर गलत हाथों में नहीं पड़ जाती। बस होता इतना ही है कि विवेचनादान, गम्भीर और प्रबुद्ध साधक अपनी बौद्धिकता के दम्भ में इन साधनाओं के प्रति एक प्रकार का उपेक्षा भाव (अथवा जिसे पूर्वाग्रह कहें तो अधिक उचित रहेगा ) मन में पनपा लेते हैं, जिससे साधना उनके मध्य में वितरित न होकर केवल ऐसे व्यक्तियों के मध्य प्रश्रय पा जाती है, जिनका लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण स्वार्थ सिद्धि ही होता है। उग्र साधनाओं अथवा तीव्र साधनाओं के संदर्भ में तो यही बात विशेष रूप से होती है, क्योंकि जितनी उम्र साधना होगी स्वार्थ सिद्धि उतनी ही तीव्रता से हो सकेगी। |

पृथकतः कहना चाहूंगा कि कोई भी साधना अपने मूल स्वरूप में न तो उग्र होती है, न सौम्य केवल उसको प्रयुक्ति और किसी एक क्षेत्र में बार बार प्रयुक्ति ही उसे सौम्य या उग्र की संज्ञा दे जाती है। उदाहरणार्थं बगलामुखी महाविद्या साधना, जिसका केवल एक मात्र प्रयोग शत्रुनाश के लिए विख्यात होने के कारण वह उग्र साधनाओं की श्रेणी में स्थापित कर दी गई, जबकि भगवती बगलामुखी की यह सत्य है, कि वीर बेताल Veer Betal साधना को सम्पन्न करने के लिए साधक के पास अद्भुत बल और बल से भी अधिक मानसिक दृढ़ता का होना आवश्यक है, किन्तु इसमें इतना आश्चर्य क्यों ? इतनी वितृष्णा भी क्यों ? -जबकि इससे अधिक सरल और सहज कोई और साधना है. ही नहीं । एक अन्य सज्ञा पीताम्बरा भी है।

पीताम्बरा अर्थात् भगवान श्रीमन्नारायण की आधारभूत शक्ति पीताम्बर धारी की ही कियाशील शक्ति है पीताम्बरा अर्थात् भगवती बगलामुखी। 

वीर बेताल Veer Betal साधना प्राचीन काल में इस हेयता को नहीं प्राप्त हुई थी। यदि ऐसा होता तो क्यों हनुमान इसे सम्पन्न कर, केवल हनुमान ही नहीं वीर हनुमान की संज्ञा पर जाते? एक साधारण वानर से किस प्रकार ‘अतुलित बलधाम, हेमशैलाभदेह’ की स्थिति को प्राप्त कर लेते।

साधको  को जिज्ञासा हो सकती है. कि रामचरित मानस अथवा रामायण में तो ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता, कि हनुमान ने दीर वैताल की साधना सम्पन्न की थी? प्रत्युत्तर में इतना ही कहना है कि रामचरित मानस में तो उस कसरत या दंड बैठक का भी वर्णन नहीं मिलता है. जिसे सम्पन्न कर हनुमान ने उपरोक्त स्थिति प्राप्त  साधनाओ की चर्चा करना रामचरित मानस का उद्देश्य है ही नहीं यह तो एक भक्ति परक रचना है, जिसमें प्रसंगवश हनुमान को ऐसी विदिध शक्तियां वर्णित होती जाती हैं, जो अष्टादश सिद्धियों के अन्तर्गत आती हैं।

यदि रामचरित मानस अष्टादश सिद्धियों को प्रकारांतर से स्वीकार करती है, हनुमान द्वारा अणिमा लघिमा का प्रयोग अथवा उनका आकाश गमन करना स्वीकार करती है, तो या प्रकारांतर से साधना की महत्ता को ही नहीं वर्णित कर जाती? जिस प्रकार आज ‘वीर’ शब्द किसी बलवान पौरुषवान व्यक्ति के केवल शरीर का ही पर्याय है,

उसी प्रकार प्रारम्भ में यह उस सम्मान का पर्याय था, जो किसी साधक द्वाटरा वीर बेताल Veer Betal साधना करने और उसमें सफल होने पर उसके नाम के साथ सम्मिलित कर उसके साधकत्व का समाज में सम्मान करने की बात होती थी। यह सत्य है कि वीर बेताल Veer Betal साधना को सम्पन्न करने के लिए साधक के पास अदभुत बल और बल से भी अधिक मानसिक दृढ़ता का होना आवश्यक है. किन्तु इसमें इतना आश्चर्य क्यों? इतनी वितृष्णा भी क्यों?

विद्युत नियंत्रण करने वाले व्यक्ति को भी तो कुछ क्षमताएं विकसित करनी पड़ती हैं, कुछ उपकरण या यंत्र साथ रखने पड़ते हैं अपने साथ तभी तो विद्युत की आक्रमणकारी शक्ति का प्रभाव समाप्त कर उसका कल्याणकारी उपयोग कर पाना संभव होता है। वीर बेताल Veer Betal साधना में विद्युत अर्थात इलेक्ट्रिक के दिपरीत प्रारम्भ से ही कोई विपरीत प्रभाव होता ही नहीं. किन्तु जैसा कि प्रारम्भ में कहा, कि वीर बेताल Veer Betal का स्वरूप इस प्रकार का होता है कि निर्णय ले सकता उसकी क्षमता से बाहर होता है और तब साधक, सावना के माध्यम से वस्तुतः उसे निर्देशित करने की कला ही सीखता है।

यह मिथ्या धारणा  है, कि वीर  बैताल इतर योनि की श्रेणी में आता है। वीर बेताल Veer Betal तो साक्षात् भगवान शिव का ही अंश और गण होता है तथा इसी कारण अपने स्वामी भोलेनाथ की ही भांति भोला भी होता है। वीर बेताल Veer Betal तो प्रत्यक्षीकरण की अपेक्षा समाहितीकरण की साधना ही अधिक होती है। तथा इसी कारणवश प्राचीन काल में गुरुजन अपने समीप रहने वाले शिष्यों को यह साधना अवश्यमेव सम्पन्न करा कर उन्हें दृढ़ता, पौरुषता के गुणों से युक्त करते थे, जिससे वे समाज में जाकर निर्विघ्नता के साथ सक्रिय रह सके। इसी का अत्यन्त सूक्ष्म  भेद यह है, कि जहां गुरु यह अनुभव करते थे कि उनका कोई शिष्य सीधे वीर ताल साधना को करने में असमर्थ है, तब वे उसे प्रारम्भ में हनुमान साधना सम्पन्न करवाते हुए वीर बेताल Veer Betal साधना तक ले जाते थे।

वीर बेताल Veer Betal तो हनुमान की ही भांति स्वामी भक्ति और सरलता का उदाहरण होता है, जिस प्रकार हनुमान सही जड़ी न पहचान पाने के कारण पूरा पर्यंत ही उठा लाए थे। प्राय: भोलेपन में वीर बेताल Veer Betal भी सिद्ध होने के बाद ऐसा कुछ कर सकता है। इसीलिए तो कहा कि कठिन वीर  साधना नहीं है, कठिन तो है वीर बेताल Veer Betal पर नियंत्रण रखना। पौरुष पर पौरुष ही नियंत्रण कर सकता है। केवल हनुमान या जामवन्त ही नहीं, वीर साधना की सिद्धि करने वाले अनेक राजपुरुष और व्यक्तित्व हुए हैं। 

विक्रमादित्य और कर्ण सरीखे ने समझ लिया था, कि यदि ये इतिहास के पन्नों अपना नाम दुर्धर्ष योद्धा के रूप में अंकित कराना हैं तो उन्हें पूर्ण प्रामाणिकता से वीर बेताल Veer Betal साधना सिद्धि प्राप्त करनी ही होगी उन्होंने ऐसा किया भी और कारणवश वीर विक्रमादित्य व वीर कर्ण के नाम से हमें अमर हो गए। क्या यह संभव नहीं, कि कर्ण में देने की जो उदारता थी, इतना भोलापन उतर आया उसके मूल में इसी वीर बेताल Veer Betal साधना का ही कोई कार्य कर रहा हो? तभी तो कर्ण को केवल वीर कर्ण नहीं दानवीर कर्ण भी कहा गया।

कालांतर में ज्यों ज्यों कतिपय कारणों से शिष्यों को धारणा शक्ति घटती गई, तेज व बल को समाहित करने की पात्रता का जो अभाव हो गया और जिसे परिलक्षित कर गुरुजनों ने अपने शिष्यों को बीर वैताल की मूल साधना के स्थान पर उनके भी साधक हनुमान की साधना को कराना आरम्भ करा दिया।

कदाचित वही कारण है वीर बेताल Veer Betal नाका इतिहास के पृष्ठों में सिमट जाने का। हनुमान की स्थापना आज गली-गली, चौराहे-चौराहे पर है। सम्भव है आने वाले दो सौ वर्षों में वीर्य, बल, तेज, ब्रह्मचर्य का इतना भी सम्मान न रह जाए और वीर बेताल Veer Betal साधना की ही भांति लोग हनुमान साधना को भी भय मिश्रित आश्चर्य से देखने लग जाए।

ऐसी स्थिति में दोष किसका होगा? यही कारण है कि साधना की अक्षुण्णता समाज में बनी रहनी चाहिए, जिससे न तो हमारी संतानें उससे वंचित हो न उसके विकृत अथवा कम प्रभावशाली रूप को प्राप्त करने के लिए विवश हो यही मंतव्य है, 

सम्भव है आने वाले दो सौ वर्षों में वीर्य, बल, तेज, ब्रह्मचर्य का इतना भी सम्मान न रह जाए और वीर बेताल Veer Betal साधना की ही भांति लोग हनुमान साधना को भी भय मिश्रित आश्चर्य से देखने लग जाएं। ऐसी स्थिति में दोष किसका होगा? साधना का परीक्षण अपने संन्यस्त शिष्यों के माध्यम से करने के बाद, इसे समाज के समक्ष स्पष्ट करना आवश्यक समझा, क्योंकि इस युग धर्म की यही अपेक्षा है तथा गुरुत्व के गुणों से युक्त व्यक्तित्व ही युग की अपेक्षा का वास्तविक आकलन कर सकते हैं।

पुन स्पष्ट करना चाहूंगा कि वीर बेताल Veer Betal साधना केवल पौरुष प्राप्ति की जीवन में निर्भय बनने की तथा साथ ही साथ अतुलित बल के स्वामी बनने की साधना होती है। शेष सब कुछ मूल साधना में सफल हो जाने के उपरांत ही घटित होना संभव हो पाता है, चाहे वह अष्टादश सिद्धियों का विषय हो अथवा दीर वैताल के माध्यम से मनोवांछित कार्य सम्पन्न कराने का इस साधना को सम्पन्न करने के इच्छुक योग्य गम्भीर साधक के लिए आवश्यक है 

वीर बेताल Veer Betal साधना विधि 

 

रात्रि में दस बजे के पश्चात् स्नान कर घर के किसी एकांत स्थान पर साधना में प्रवृत्त हो या इस साधना को किसी भी मंगलवार से की जा सकती है। घर के अतिरिक्त इसे किसी प्राचीन एवं निर्जन शिव मंदिर के प्रांगण अथवा किसी नदी, सालाब के किनारे निर्जन तट पर सम्पन्न करना भी शास्त्रोच्ति माना गया है। पहनने के वस्त्र आसन सामने बिछाने वाला वस्त्र सभी गहरे काले रंग के होने आवश्यक हैं।

साधक साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व प्रत्येक छोटी से छोटी साधना सामग्री अपने समीप रख लें। साधना के बी में उठना, साधना भंग के समान हो जाता है। इस साधना की आवश्यक सामग्री ताम्रपत्र पर अंकित वीर बेताल Veer Betal यत्र एवं वीर बेताल Veer Betal माला हैं।

यंत्र को साधक अपने सामने बिछे काले वस्त्र पर किसी ताम्र पात्र में रख कर स्नान कराएं और वो-पोंछ कर पुनः (पात्र का जल फेंक दें) पात्र में स्थापित कर, सिंदूर व अक्षत से पूजन करें। पूजन के उपरांत यंत्र के ऊपर एक सुपारी रख कर उसका भी इसी प्रकार से पूजन कर

निम्न ध्यान

उच्चारित करें कु फं फुल्लार शब्दो वसति फणिजयते यस्य कण्ठे डि डि नितिडिन्नम् डमरु यस्य पाणी प्रकम्पम् । तक तक तन्दाति तन्दात् धीगति श्रीमति व्योमदार्मि सकल भय हरो भैरवो स स न पायात् ।।

इसके पश्चात ‘वीर बेताल Veer Betal माला से निम्न मंत्र को पन्द्रह (15) माला मंत्र जप सम्पन्न करें मंत्र ॥

ॐ वीर सिद्धिं दर्शय दर्शय फट् ॥ OM BHRAAM BHREEM BHROUM VEER SIDDHIM DARSHAY DARSHAY PHAT साधना का उपरोक्त क्रम आगामी चार दिनों तक (कुल पांच दिन ) तक अक्षुण्ण रूप से बनाएं रखें। यदि सम्भव हो, तो प्रत्येक दिन साधना उसी समय प्रारम्भ करे, जिस समय पर प्रथम दिन प्रारम्भ की थी। अंतिम दिन समस्त साधना सामग्री को किसी नदी, सरोवर अथवा शिव मंदिर में भेंट के साथ विसर्जित कर दें। जीवन में अभाव की समाप्ति, विश्वस्त सहायक, पौरुष व बल की यह अनुपम साधना है, जिसका अनुभव साधक स्वयं साधना सम्पन्न करने के उपरांत कर सकते। है। प्रस्तुत साधना में बटुक भैरव का समावेश साधना की अतिरिक्त विशिष्टता है

 

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दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा लाभ Das Mahavidya Deeksha Ph.85280 57364

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दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा लाभ Das Mahavidya Deeksha Ph.85280 57364

दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा लाभ Das Mahavidya

Deeksha Ph.85280 57364

 

9k= https://gurumantrasadhna.com/author/gurumantrasadhna-comgmail-com/page/29/

 

दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा लाभ Das Mahavidya Deeksha Ph.85280 57364 इस सृष्टि के समस्त जड़-चेतन पदार्थ अपूर्ण हैं, क्योंकि पूर्ण तो केवल वह ब्रह्म ही है जो सर्वत्र व्याप्त है। अपूर्ण रह जाने पर ही जीव को पुनरपि जन्मं पुनरपि मरण’ के चक्र में बार-बार संसार में आना पड़ता है, और फिर उन्हीं क्रिया- कलापों में संलग्न होना पड़ता है।

शिशु जब मां के गर्भ से जन्म लेता है, तो ब्रह्म स्वरूप ही होता है, उसी पूर्ण का रूप होता है, परन्तु गर्भ के बाहर आने के बाद उसके अन्तर्मन पर अन्य लोगों का प्रभाव पड़ता है और इस कारण धीरे-धीरे नवजात शिशु को अपना पूर्णत्व बोध विस्मृत होने लगता है और एक प्रकार से वह पूर्णता से अपूर्णता की ओर अग्रसर होने लगता है। और इस तरह एक अन्तराल बीत जाता है, वह छोटा शिशु | अब वयस्क बन चुका होता है।

 

नित्य नई समस्याओं से जूझता हुआ वह अपने आप को अपने ही आत्मजनों की भीड़ में भी नितान्त | अकेला अनुभव करने लगता है। रोज-रोज की भाग-दौड़ से एक तरह से वह थक जाता है, और जब उसे याद जाती है प्रभु की, तो कभी कभी पत्थर की मूर्तियों के आगे दो आंसू भी कुलका देता है।

परन्तु उसे कोई हल मिलता नहीं चलते-चलते जब कभी पुण्यों के उदय होने पर सद्गुरु से मुलाकात होती है, तब उसके जीवन में प्रकाश की एक नई किरण फूटती है। ऐसा इसलिए सिद्धाश्रम प्राप्ति के लिए भी दो महाविद्याओं में दक्ष होना एक अनिवार्यता है और यदि साधक को योग्य गुरु से एक-एक कर इन दस महाविद्याओं की दीक्षाएं प्राप्त हो जाएं, तो उसके सौभाग्य की तुलना ही नहीं की जा सकती है। गुरुदेव अपने अंगुष्ठ द्वारा अपनी 

उर्जा को साधक के आज्ञा चक्र में स्थापित कर देते हैं। होता है, क्योंकि मात्र सद्गुरु ही उसे बोध कराते हैं, कि वह अपूर्ण था नहीं अपितु बन गया है। गुरुदेव उसे बोध कराते हैं, कि वह असहाय नहीं, अपितु स्वयं उसी के अन्दर अनन्त सम्भावनाएं भरी पड़ी हैं, असम्भव को भी सम्भव कर दिखाने की क्षमता छुपी हुई है, गुरु की इसी क्रिया को दीक्षा कहते हैं, जिसमें गुरु अपने प्राणों को भर कर अपनी ऊर्जा को अष्टपाश में बंधे जीव में प्रवाहित करते हैं। गुरु दीक्षा प्राप्त करने के बाद साधक का मार्ग साधना के क्षेत्र में खुल जाता है। साधनाओं की बात आते ही दस महाविद्या का नाम सबसे ऊपर आता है। प्रत्येक महाविद्या का अपने आप में एक अलग ही महत्व है।

लाखों में कोई एक ही ऐसा होता है जिसे सद्गुरु से महाविद्या दीक्षा प्राप्त हो पाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद सिद्धियों के द्वार एक के बाद एक कर साधक के लिए खुलते चले जाते हैं।

दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा  लाभ Das Mahavidya ki Deeksha दीक्षाओं से सम्बन्धित लाभ निम्न हैं-

1 काली महाविद्या दीक्षा – जीवन में शत्रु बाधा एवं कलह से पूर्ण मुक्ति तथा निर्भीक होकर विजय प्राप्त करने के लिए यह दीक्षा अद्वितीय है। देवी काली के दर्शन भी इस दीक्षा के बाद ही सम्भव होते हैं, गुरु द्वारा यह दीक्षा प्राप्त होने के बाद ही कालीदास में ज्ञान का स्रोत फूटा था, जिससे उन्होंने ‘मेघदूत’, ‘ऋतुसंहार’ जैसे अतुलनीय काव्यों की रचना की, इस दीक्षा से व्यक्ति की शक्ति भी कई गुना बढ़ जाती है।

2 तारा दीक्षा– इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक को अर्थ की दृष्टि से कोई कष्ट नहीं रह जाता। उसके अन्दर ज्ञान, बुद्धि, शक्ति का प्रस्फुटन प्रारम्भ हो जाता है। तारा के सिद्ध साधकों को आकस्मिक धन प्राप्त होता है, ऐसा बहुधा देखने में आया है।

3 षोडशी त्रिपुर सुन्दरी दीक्षा – गृहस्थ सुख, अनुकूल विवाह एवं पौरुष प्राप्ति हेतु इस दीक्षा का विशेष महत्व है। मनोवांछित कार्य सिद्धि के लिए भी यह दीक्षा उपयुक्त है। इस दीक्षा से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थो की प्राप्ति होती है।

4 भुवनेश्वरी दीक्षा– यह दीक्षा प्राप्त करना ही साधकों के लिए सौभाग्य का प्रतीक है। भुवनेश्वरी की कृपा से जीवन में ऐश्वर्य एवं सम्पन्नता स्थाई रूप से आती है, गृहस्थ जीवन स्वर्ग तुल्य हो जाता है। भोग एवं मोक्ष को एक साथ प्राप्त करने के लिए भुवनेश्वरी दीक्षा को श्रेष्ठ माना गया है।

 5  छिन्नमस्ता दीक्षा प्रायः देखने में आता है, कि व्यक्ति अकारण ही किन्हीं मुकदमे में उलझ गया है, या शत्रु उस पर हावी हो रहे हैं, या बने हुए कार्य बिगड़ जाते हैं, यह सब साधक पर किए गए किसी तंत्र प्रयोग का भी परिणाम हो सकता है, इसके निवारण हेतु छिन्नमस्ता दीक्षा) का प्रावधान है। यह दीक्षा प्राप्त करने के उपरान्त न केवल स्थितियां अनुकूल होती हैं, वरन साधक के लिए तंत्र साधनाओं में आगे बढ़ने का मार्ग भी प्रशस्त हो जाता है।

 6 त्रिपुर भैरवी दीक्षा भूत-प्रेत एवं इतर योनियों द्वारा बाधा आने पर जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। त्रिपुर भैरवी दीक्षा से जहां प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है, वहीं शारीरिक दुर्बलता भी समाप्त होती है, व्यक्ति का स्वास्थ्य निखरने लगता है एवं उसमें आत्मशक्ति त्वरित गति से जाग्रत होती है, जिससे वह असाध्य कार्यों को भी पूर्ण करने में सक्षम हो पाता है।

7 धूमावती दीक्षा– इस दीक्षा के प्रभाव से शत्रु शीघ्र ही पराजित होते है। उच्चाटन आदि क्रियाओं में सिद्धि के लिए भी यह दीक्षा आवश्यक है। सन्तान यदि अस्वस्थ रहती हो, नित्य कोई रोग लगा रहता हो, तो धूमावती दीक्षा अत्यन्त अनुकूल मानी गई है।

8 बगलामुखी दीक्षा– यह दीक्षा अत्यन्त तेजस्वी, प्रभावकारी है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक निडर एवं निर्भीक हो जाता है। प्रबल से प्रबल शत्रु को निस्तेज करने एवं सर्व कष्ट बाधा निवारण के लिए इससे अधिक उपयुक्त कोई दीक्षा नहीं है। इसके प्रभाव से रुका धन पुनः प्राप्त हो जाता है। भगवती वल्गा अपने साधकों को एक सुरक्षा चक्र प्रदान करती हैं, जो साधक को अजीवन हर खतरे से बचाता रहता है।

 9 मातंगी दीक्षा– आज के इस मशीनी युग में जीवन यंत्रवत्, ठूंठ और नीरस बनकर रह गया है। जीवन में सरसता, आनन्द, भोग-विलास, प्रेम, सुयोग्य पति पत्नी प्राप्ति के लिए वाक् सिद्धि के शक्ति मांतगी दीक्षा श्रेष्ठ है। इसके अलावा साधक में गुण भी आ जाते हैं। उसमें आशीर्वाद व श्राप देने की जाती है, और वह एक सम्मोहक व कुशल वक्ता बन जाता है।

10 कमला दीक्षा– दरिद्रता को जड़ से समाप्त कर धन का अक्षय स्रोत प्राप्त करने में कमला दीक्षा अत्यंत प्रभावी होती है। इसके प्रभाव से व्यापार में चतुर्दिक वृद्धि होती है, यदि नौकरी पेशा व्यक्ति है, तो उसकी पदोन्नति होती है। बेरोजगार व्यक्ति को राज्यपद प्राप्त होता है। एक तरह से इस दीक्षा के माध्यम से जीवन में स्थायित्व आ जाता है।

दस महाविद्या साधना गुरु दीक्षा लाभ Das Mahavidya Deeksha प्रत्येक महाविद्या दीक्षा अपने आप में ही अद्वितीय है, साधक अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर गुरुदेव से निर्देश प्राप्त कर इनमें से कोई भी दीक्षा प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक दीक्षा के महत्व का एक प्रतिशत भी वर्णन स्थाना भाव के कारण यहां नहीं हुआ है, वस्तुतः मात्र एक महाविद्या साधना सफल हो जाने पर ही साधक के लिए सिद्धियों का मार्ग खुल जाता है, और एक-एक करके सभी साधनाओं में सफल होता हुआ वह पूर्णता की ओर अग्रसर हो जाता है। यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है, कि दीक्षा कोई जादू | नहीं है,

कोई मदारी का खेल नहीं है, कि बटन दबाया और उधर कठपुतली का नाच शुरू हो गया। दीक्षा तो एक संस्कार है, जिसके माध्यम से कुसंस्कारों का क्षय होता है, अज्ञान, पाप और दारिद्र्य का नाश होता है, ज्ञान, शक्ति व सिद्धि प्राप्त होती है और मन में उमंग व प्रसन्नता आ पाती है।

दीक्षा के द्वारा साधक की पशुवृत्तियों का शमन होता है. और जब उसके चित्त में शुद्धता आ जाती है, उसके बाव ही इन दीक्षाओं के गुण प्रकट होने लगते हैं और साधक अपने अंदर सिद्धियों का दर्शन कर आश्चर्य चकित रह जाता है। जब कोई पूर्ण श्रद्धा भाव से दीक्षा प्राप्त करता है, तो गुरु को भी प्रसन्नता होती है, कि मैंने बीज को उपजाऊ भूमि में ही रोपा है। वास्तव में ही वे सौभाग्यशाली कहे जाते हैं, जिन्हें जीवन में योग्य गुरु द्वारा ऐसी दुर्लभ महाविद्या दीक्षाएं प्राप्त होती हैं, ऐसे साधकों से तो देवता भी ईर्ष्या करते हैं।

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प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना दुर्भाग्य की गूढ़ रेखाओं को मिटाकर सौभाग्य में बदलने की दिव्य क्रिया – फ़ोन 85280 57364

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प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana Ph. 8528057364

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana Ph. 8528057364
प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana Ph. 8528057364

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana  जो साधक के शत्रुओं का नाश करती है साधक के ऊपर किसी भी प्रकार का तंत्र दोष समाप्त करती है महाविद्याओं में धूमावती महाविद्या साधना अपने आप में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस साधना के बारे में दो बातें विशेष रूप से हैं, प्रथम तो यह दुर्गा की विशेष कलह निवारणी शक्ति है, दूसरी यह कि यह पार्वती का विशाल एवं रक्ष स्वरूप है। जो क्षुधा (भूख) के विकलित कृष्ण वर्णीय रूप हैं, जो अपने भक्तों को अभय देने वाली तथा उनके शत्रुओं के लिए साक्षात् काल स्वरूप हैं । इस साधना के सिद्ध होने पर भूत-प्रेत, पिशाच व अन्य तंत्र बाधा का साध उसके परिवार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ।

जब कोई साधक भगवती धूमावती की साधना सम्पन्न करता है, तो वे प्रसन्न होकर साधक के शत्रुओं का भक्षण कर लेती हैं और साधक को अभय प्रदान करती हैं ।धूमावती’ दस महाविद्याओं में से एक हैं। जिस प्रकार ‘तारा’ बुद्धि और समृद्धि की, ‘त्रिपुर सुन्दरी’ पराक्रम एवं सौभाग्य की सूचक मानी जाती हैं, इसी प्रकार ‘धूमावती’ शत्रुओं पर प्रचण्ड वज्र की तरह प्रहार करने वाली मानी जाती हैं। यह अपने आराधक को अप्रतिम बल प्रदान करने वाली देवी हैं जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में सहायक सिद्ध होती ही हैं, यदि पूर्ण निष्ठा व विश्वास के साथ ‘धूमावती साधना’ को सम्पन्न कर लिया जाय तो ।

दस महाविद्याओं के क्रम में ‘धूमावती’ सप्तम् महाविद्या हैं। ये शुत्र का भक्षण करने वाली महाशक्ति और दुःखों की निवृत्ति करने वाली हैं। बुरी शक्तियों से पराजित न होना और विपरीत स्थितियों को अपने अनुकूल बना देने की शक्ति साधक को इनकी साधना से प्राप्त होती है।कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है, और उसके आगे सबको हार माननी पड़ती है, किन्तु जो समय पर हावी हो जाता है, वह उससे भी ज्यादा बलशाली कहलाता है।

शक्ति सम्बलित होना और शक्तिशाली होना तो केवल शक्ति-साधना के माध्यम से ही संभव है, जिसके माध्यम से दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित किया जा सकता है। जो भयग्रस्त, दीन-हीन और अभावग्रस्त जीवन जीते हैं, वे कायर और बुजदिल कहलाते हैं, किन्तु जो बहादुर होते हैं, वे सब कुछ अर्जित कर, जो कुछ उनके भाग्य में नहीं है, उसे भी साधना के बल पर प्राप्त करने की सामर्थ्य रखते हैं… और यदि साधना हो किसी महाविद्या की, तो उसके भाग्य के क्या कहने, क्योंकि दस महाविद्याओं में से किसी एक महाविद्या को सिद्ध कर लेना भी जीवन का अप्रतिम सौभाग्य कहलाता हैं।

आज समाज में जरूरत से ज्यादा द्वेष, ईर्ष्या, छल, कपट, हिंसा और शत्रुता का वातावरण बन गया है, फलस्वरूप यदि। व्यक्ति शांतिपूर्वक रहना चाहे, तो भी वह नहीं रह सकता। अतः जीवन की असुरक्षा समाप्त करने की दृष्टि से यह साधना विशेष महत्वपूर्ण एवं अद्वितीय है। धूमावती ‘दारुण विद्या’ हैं। सृष्टि में जितने भी दुःख हैं, व्याधियां हैं, बाधायें हैं. इनके शमन हेतु उनकी साधना श्रेष्ठतम मानी जाती है। जो व्यक्ति या साधक इस महाशक्ति की आराधना-उपासना करता है, ये उस साधक पर अति प्रसन्न हो, उसके शत्रुओं का भक्षण तो करती ही हैं, साथ ही उसके जीवन में धन-धान्य, समृद्धि की कमी नहीं होने देतीं, क्योंकि यह लक्ष्मी प्राप्ति में आने वाली बाधाओं का पूर्ण भक्षण कर देती हैं।

अतः लक्ष्मी प्राप्ति के लिए भी साधक को इस शक्ति की आराधना करते रहना चाहिए। महाविद्याओं में धूमावती की साधना बहुत ही क्लिष्ट मानी जाती है। इसके लिए साधक को बहुत ही पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। इस साधना से पूर्व तत्सम्बन्धित दीक्षा लेने का प्रयास करना चाहिए, इससे साधना काल में किसी प्रकार के भय आदि होने की संभावना नहीं रहती।

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना  विधि  Dhumavati mahavidya sadhana 

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना विधि Dhumavati mahavidya sadhana साधना विधान इस प्रयोग में निम्न सामग्री अपेक्षित है- ‘प्राणश्चेतना युक्त धूमावती यंत्र’, ‘दीर्घा माला’ तथा ‘अघोरा गुटिका’ । इसे किसी भी माह की अष्टमी, अमावस्या अथवा रविवार के दिन सम्पन्न करें। यह रात्रिकालीन साधना है, इसे रात्रि 9 बजे से 12 बजे के मध्य सम्पन्न करें। I साधक को स्नान आदि से पवित्र होकर, साधना-कक्ष में पश्चिम दिशा की ओर मुख कर ऊनी आसन पर बैठकर साधना करनी चाहिए। लाल वस्त्र, लाल धोती और गुरु चादर का प्रयोग करें। यह साधना सुनसान स्थान में, श्मशान में, जंगल में, गुफा में या किसी भी एकांत स्थल पर, जहां कोई विघ्न उपस्थित न हो, करना श्रेयस्कर रहता है। अपने सामने चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर धूमावती का चित्र स्थापित करें, फिर किसी प्लेट में ‘यंत्र’ को स्थापित करें।यंत्र को जल से धोकर उस पर कुकुम से तीन बिन्दु लाइन से लगा लें, जो सत्व, रज एवं तम गुणों के प्रतीक स्वरूप हैं। धूप व दीप जला दें तथा पूजन प्रारम्भ करें 

विनियोगः

दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लें, निम्न संदर्भ को पढ़े- अस्य धूमावती मंत्रस्य पिप्पलाद ऋषि, र्निवृच्छन्दः, ज्येष्ठा देवता, ‘धूं’ बीजं, स्वाहा शक्ति:, धूमावती कीलकं ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः । हाथ में लिए हुए जल को भूमि पर या किसी पात्र में छोड़ दें।

ऋष्यादि न्यासः ॐ पिप्पलाद ऋषये नमः शिरसि (सिर को स्पर्श करें) ॐ निवृच्छन्द से नमः मुखे (मुख को स्पर्श करें) ॐ ज्येष्ठा देवतायै नमः हृद्धि

(हृदय को स्पर्श करें) ॐ धूं बीजाय नमः गुझे (गुह्य स्थान को स्पर्श करें) ॐ स्वाहा शक्तये नमः पादयो (पैरों को स्पर्श करें) ॐ धूमावती कीलकाय नमः नाभौ (नाभि को स्पर्श करें) ॐ विनियोगाय नमः सर्वांगे

(सभी अंगों को स्पर्श करें)कर न्यासः ॐ धूं धूं अंगुष्ठाभ्यां नमः (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अंगूठों को स्पर्श करें।) ॐ हूं तर्जनीभ्यां नमः (दोनों अंगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ मां मध्यमाभ्यां नमः

(दोनों अंगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ वं अनामिकाभ्यां नमः (दोनों अंगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ तीं कनिष्ठिाभ्यां नमः

(दोनों अंगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः (परस्पर दोनों धूम हाथों को स्पर्श करें)

. यंत्र गुटिका और माला को दोनों हाथ की अंजलि में ले 14 लें, एकाग्रचित होकर दीपक की लौ पर मंत्र ॐ धूं धूं धूमावती) का 51 बार जप करते हुए ‘त्राटक’ करें। 11. इसके बाद सामग्री को दोनों नेत्रों से स्पर्श कराये, सामग्रियों को यथासंभव चौकी पर रख दें, ‘गुटिका’ को यंत्र के सामने रखें।

   संकल्प

– दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें, कि अमुक मासे महीने का नाम बोलें) अमुक दिने (दिन का नाम बोलें) अमुक गोत्रोत्पन्नो अपने गोत्र का नाम बोलें) अमुक (अपना नाम बोलें) समस्त शत्रु भय व्याधि निवारणार्याच दुःख दारिद्र्य  | विनाशाय श्री धूमावती साधना करिष्ये। हाथ में लिए जल को भूमि पर छोड़ दें। 

 ध्यान

 ध्यान दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवती सु धूमावती का ध्यान करें- अत्युच्चा मलिनाम्बरालिन गाया दुर्मना रुक्षामित्रितया विशालदशना सूर्योदरी पंचला । प्रस्वेदाम्बुचिता बुवाकु सतः कृष्णातिरुक्षाप्रभाः देवा मुक्तकत्वा सदाशिव कलिर्भूमावती मन्त्रिणा ।

अर्थात् ‘मलिन वस्त्र पहने हुए सबको भयभीत करने वाली, मन में विकार को उत्पन्न करने वाली, रूखे बाल वाली, मूख और प्यास से व्याकुल, बड़े-बड़े दांतों वाली, बड़े पेट वाली, | पसीने से भरी हुई, बड़ी-बड़ी आंखों वाली कांतिहीन खुले बालों वाली, सदा अप्रिय व्यवहार को चाहने वाली भगवती स प्रकार भगवती धूमावती के स्वरूप का चिन्तन करते हुए बायें हाथ में गुटिका को लेकर मुट्ठी बांध लें तथा ‘दीर्घा माला’ से निम्न मंत्र का 5 माला नित्य तीन दिन तक जप करें-

विश्वास, विश्वास, अपने आप में विश्वास, ईश्वर में विश्वास यही महानता का रहस्य है। यदि तुम पुराण के तैंतीस करोड़ देवताओं और विदेशियों द्वारा बतलाए हुए सब देवताओं में विश्वास करते हो, पर यदि अपने आप में विश्वास नहीं करते, तो तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती। अपने आप में विश्वास करो, उस पर स्थिर रहो और शक्तिशाली बनी । धूमावती का में ध्यान करता हूं कि वे मेरे जीवन की समस्त विघ्न बाधाओं का नाश करें।’ .

मंत्र ।। ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा।।

जप समाप्ति के बाद सभी सामग्रियों को चौकी पर बिछे कपड़े में ही लपेट कर चौथे दिन शाम को किसी जन शून्य स्थान में जाकर गड्ढा खोदकर दबा दें और पीछे मुड़कर न देखें। . घर आकर हाथ-पैर धो लें। यह साधना दुर्भाग्य की गूढ़ रेखाओं को मिटाकर सौभाग्य में बदलने की दिव्य क्रिया है। इस साधना के बाद निश्चय ही जीवन में सौभाग्य का सूर्योदय होगा और सम्पन्नतायुक्त एवं श्री सुखी जीवन का प्रादुर्भाव सम्पन्न होगा।

 

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