Karn Matangi sadhna प्राचीन कर्ण मातंगी त्रिकालदर्शी साधना
Karn Matangi sadhna प्राचीन कर्ण मातंगी त्रिकालदर्शी साधना
Karn Matangi sadhna प्राचीन कर्ण मातंगी त्रिकालदर्शी साधना नमस्कार मित्रों आप सभी लोगों का हमारे वेबसाइट में हार्दिक स्वागत है। कुछ मित्र हमारे वेबसाइट के सदस्य हैं उन्होंने कहा था कि गुरु जी आप कर्ण मातंगी की साधनाKarn Matangi sadhnaकी जानकारी उपलब्ध करवाइए। हमने आपको कर्ण पिशाचिनी साधना Karn Matangi sadhna से संबंधित पोस्ट में उपलब्ध करवाए थे और आज हम आपको जो है माता कर्ण मातंगी के साधन Karn Matangi sadhna उपलब्ध करवा रहे हैं माँ कर्ण मातंगी साधनाKarn Matangi sadhna जो है कर्ण पिशाचिनी साधना की तरह होती है
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लेकिन कुछ साधको कर्ण पिशाचिनी साधना में दिक्कत का सामना करना पड़ता है भी लेकिन माँ कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna के बाद दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ता है। कर्ण पिशाचिनी आपको भविष्य नहीं बता सकती लेकर कर्ण मातंगीKarn Matangi आपको भविष्य भी बता सकती है और साथ ही साथ आपको जो भी जानकारी देते हो वह 100% सटीक होती है और कई लोगों के साथ यह भी होता है कि मैं कर्ण पिशाचिनी साधना करने के बाद में पूजा पाठ नहीं कर सकते
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कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna के लाभ
कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna के लाभ
हम कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna के पहले हम आपको बताते हैं इस साधना के क्या लाभ है क्यों की जाती है माँ कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna उसको करने से क्या लाभ होते हैं क्योंकि बहुत सारे लोगों को यह नहीं पता होता है भाई कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna क्यों की जाती है क्या इसके लाभ होते हैं तो वह मैं बताता हूं
आपको देखिए अगर कोई भी व्यक्ति बहुत भविष्य की जानकारी प्राप्त करना चाहता है किसी भी क्षेत्र के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहता है या फिर अगर कोई व्यक्ति ज्योतिष के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है और वह चाहता है कि वह मैं भी लोगों के भविष्य के बारे में जानकारी प्राप्त कर सके
तो उसमें यह साधना बहुत ही अच्छी साधना होती है तो उसको हर प्रकार की जानकारी माँ कर्ण मातंगी साधनाKarn Matangi sadhna के द्वारा प्राप्त हो जाती है अगर आप में से कोई भी व्यक्ति अपने भविष्य के बारे में कोई जानकारी प्राप्त करना चाहता है
आप कोई भी कार्य कर रहे हैं और आप यह जानना चाहते हैं सफल होगा या नहीं होगा उसके बारे में भी आप जो है माँ कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और आपको पहले पता चल जाएगा आप जो कार्य करें उसमें आप सफल होगे या नहीं होगे इस का पता चल जाएगा
जिससे इस से अपना समय व्यर्थ नहीं करोगे और दूसरा कार्य करके जिसमें आप सफल होगे अपने जीवन को सुधारो गे अपने वर्तमान को सुधार लेते हो तो भविष्य अपने आप सुरक्षित हो जाता है इसी तरीके से साधना के द्वारा अवश्य की जानकारी प्राप्त करके वर्तमान को सुधार सकते हैं कि आपका भविष अपने आप सुरक्षित हो जाता है अगर किसी पीड़ा से परेशान है और वह उसका इलाज चाहते हैं
उसका निदान चाहते हैं उनके लिए भी यह साधना बहुत ही अच्छी साधना है हर प्रकार की समस्या का हर प्रकार के चीजों के बारे में यह साधना आपको जानकारी उपलब्ध करवा देती है चाहे दुनिया की कोई बड़ी से बड़ी परेशानी क्यों ना हो उसका हल भी माँ कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhnaआपको करवाती है कई प्रकार की सिद्धियां भी अपने आप प्राप्त होने लग जाएंगे आपको दिव्य आभास अपने आप होने लग जाएगा करने लग जाओगे छोड़ दी कि अगर जीवन में कोई परेशानी आएगी
इसलिए आप इस साधना को जरूर कीजिएगा बहुत ही अच्छी साधना है और इसमें आपको जरुर सफलता प्राप्त होगी को जानने के लिए और बहुत अच्छे-अच्छे साधना से पहचान वाले साधको हो गई वह भी भविष्य को जानने के लिए बहुत ही अच्छे और सर्वश्रेष्ठ साधना है लेकिन व आज मैं आपको माँ कर्ण मातंगी साधनाKarn Matangi sadhna के बारे में ही बता रहा हूं
कर्ण मातंगी साधना पूर्ण विधि
जब आप इस साधना को करोगे तो यह साधना आपको शुक्रवार से शुरू करनी होती है शुक्रवार के दिन यह साधना आपको करनी है 21 दिन की साधना होगी है जो आसन और वस्त्र होंगे वह लाल रंग के होंगे इसमें जो माला का प्रयोग करोगे वह हकीक की माला उपयोग मिलोगे हरे रंग की हकीक की माला आपको इसमें उपयोग में लेनी है अगर हरे रंग की हकीक की माला नहीं है तो आप रुद्राक्ष की माला ले सकते हैं लेकिन हरे रंग का की माला लेंगे तो ज्यादा हकीक की माला उत्तम रहेगा
कर्ण मातंगी Karn Matangi कौन है
कर्ण मातंगी कोई अलग देवी नहीं है यह मातंगी महाविद्या ही है जो दस महाविद्या में से एक है इस की एक साधना से भूत भविष्य वर्तमान जान सकते है जिसको सिद्ध करने के बाद देवी आपके भूत भविष्य बताती है कान में आकर कर्ण पिशाचिनी की तरह इस लिए मातंगी को कर्ण मातंगी कहा जाता है।
कर्ण मातंगी Karn Matangi क्यू की जाती है
कर्ण मातंगी साधना भूत भविष्य वर्त्तमान की जानकारी के लिए की जाती है इस से साधक को तिरकाल ज्ञान प्रपात होता है जिस से साधक किसी का भी भूत भविष्य वर्त्तमान जान लेता है
कर्ण मातंगी मंत्र की जानकारी के लिए फ़ोन करो ph 85280 57364
कर्ण मातंगी कोई अलग देवी नहीं है यह मातंगी महाविद्या ही है जो दस महाविद्या में से एक है इस की एक साधना से भूत भविष्य वर्तमान जान सकते है जिसको सिद्ध करने के बाद देवी आपके भूत भविष्य बताती है कान में आकर कर्ण पिशाचिनी की तरह इस लिए मातंगी को कर्ण मातंगी कहा जाता है।
कर्ण मातंगी Karn Matangi क्यों की जाती है
कर्ण मातंगी साधना भूत भविष्य वर्त्तमान की जानकारी के लिए की जाती है इस से साधक को तिरकाल ज्ञान प्रपात होता है जिस से साधक किसी का भी भूत भविष्य वर्त्तमान जान लेता है
कर्ण मातंगी साधना के लाभ
हम कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna के पहले हम आपको बताते हैं इस साधना के क्या लाभ है क्यों की जाती है माँ कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna उसको करने से क्या लाभ होते हैं क्योंकि बहुत सारे लोगों को यह नहीं पता होता है भाई कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna क्यों की जाती है क्या इसके लाभ होते हैं तो वह मैं बताता हूं आपको देखिए अगर कोई भी व्यक्ति बहुत भविष्य की जानकारी प्राप्त करना चाहता है किसी भी क्षेत्र के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहता है या फिर अगर कोई व्यक्ति ज्योतिष के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है और वह चाहता है कि वह मैं भी लोगों के भविष्य के बारे में जानकारी प्राप्त कर सके तो उसमें यह साधना बहुत ही अच्छी साधना होती है तो उसको हर प्रकार की जानकारी माँ कर्ण मातंगी साधनाKarn Matangi sadhna के द्वारा प्राप्त हो जाती है अगर आप में से कोई भी व्यक्ति अपने भविष्य के बारे में कोई जानकारी प्राप्त करना चाहता है आप कोई भी कार्य कर रहे हैं और आप यह जानना चाहते हैं सफल होगा या नहीं होगा उसके बारे में भी आप जो है माँ कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhna से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और आपको पहले पता चल जाएगा आप जो कार्य करें उसमें आप सफल होगे या नहीं होगे इस का पता चल जाएगा जिससे इस से अपना समय व्यर्थ नहीं करोगे और दूसरा कार्य करके जिसमें आप सफल होगे अपने जीवन को सुधारो गे अपने वर्तमान को सुधार लेते हो तो भविष्य अपने आप सुरक्षित हो जाता है इसी तरीके से साधना के द्वारा अवश्य की जानकारी प्राप्त करके वर्तमान को सुधार सकते हैं कि आपका भविष अपने आप सुरक्षित हो जाता है अगर किसी पीड़ा से परेशान है और वह उसका इलाज चाहते हैं उसका निदान चाहते हैं उनके लिए भी यह साधना बहुत ही अच्छी साधना है हर प्रकार की समस्या का हर प्रकार के चीजों के बारे में यह साधना आपको जानकारी उपलब्ध करवा देती है चाहे दुनिया की कोई बड़ी से बड़ी परेशानी क्यों ना हो उसका हल भी माँ कर्ण मातंगी साधना Karn Matangi sadhnaआपको करवाती है कई प्रकार की सिद्धियां भी अपने आप प्राप्त होने लग जाएंगे आपको दिव्य आभास अपने आप होने लग जाएगा करने लग जाओगे छोड़ दी कि अगर जीवन में कोई परेशानी आएगी
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Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना का रहस्य नवरात्रि स्पैशल नवरात्रि एक प्रमुख हिंदू त्यौहार है जो माता दुर्गा के नव रूपों की पूजा और भक्ति के लिए शुभ समय है। इस अवसर पर नवदुर्गा साधनाNav Durga Sadhna का एक विशेष महत्व है जो हिंदू धर्म और धार्मिक शुभ महूर्त में से एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। नवदुर्गा Nav Durga Sadhna साधना साधकों को ध्यान, धारणा और धर्मिक अनुभव की गहराई में ले जाता है और एक आत्मिक अनुभव प्रदान करता है। इस लेख में, हम नवदुर्गा साधना Nav Durga Sadhna के रहस्य, महत्व, तारीका, लाभ और सावधानियों पर चर्चा करेंगे।
नवदुर्गाओं Nav Durga के सम्बन्ध में ऋषि मार्कण्डेय प्रदत्त भगवती पुराण अर्थात् दुर्गा सप्तशती में स्पष्ट उल्लेख करते हुये लिखा है- प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनाति च । सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥ नवमं सिद्धिरात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः । ‘ऽक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणेन महात्मना ॥
चन्द्रघण्टा देवी का उपासना मंत्र:- चन्द्रघण्टा देवी का उपासना मंत्र इस प्रकार है:- पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता । प्रसादं तनुते मह्नं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥
चतुर्थ रात्रि पूजा : माँ भगवती के चतुर्थ स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है । अपनी मंद, हल्की मुस्कान द्वारा अखण्ड ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा नाम दिया गया है । जब सृष्टि अस्तित्व में नहीं आयी थी, सर्वत्र घोर अन्धकार व्याप्त था, तब इन्हीं देवी ने हर्षित हास्ययुक्त खेल ही खेल में इस ब्रह्माण्ड की रचना की थी ।
अतः यही सृष्टि का आदि स्वरूप आद्यशक्ति है। भगवद् पुराण में माँ का निवास सूर्यमण्डल के अन्दर बताया गया है। इसलिये ये अत्यन्त, दिव्य तेज युक्त हैं । इनका तेज दसों दिशाओं में व्याप्त रहता है। माँ कूष्माण्डा का स्वरूप अष्टभुजा युक्त माना गया है । इनके आठों हाथों में क्रमशः धनुष बाण, कमण्डल, कमल, अमृत कलश, गदा और चक्र एवं जप माला सुशोभित रहती है। माँ का वाहन सिंह है ।
माँ का यह स्वरूप विद्या, बुद्धि, विवेक, त्याग, वैराग्य के साथ-साथ अजेयता का प्रतीक है । इसलिये जो साधक माँ की शरण में आकर उनकी कृपा दृष्टि प्राप्ति कर लेता है, उसके शारीरिक, मानसिक और भौतिक, सभी दुःखों का अन्त हो जाता है।
साधक को रोग-शोक से छुटकारा मिलता है तथा उसके आरोग्य एवं यश में निरन्तर वृद्धि होती चली जाती है। । तांत्रिकों की दूसरी विद्या में कूष्माण्डा नामक इस आदिशक्ति का निवास अनाहत चक्र में माना गया है। अनाहत चक्र की स्थिति छाती के मध्य हृदय स्थल पर मानी गयी है।
अतः अनाहत चक्र की जाग्रति से ही साधक स्थूल शरीर की चेतना का परित्याग करके आत्मिक शरीर के स्तर में प्रविष्ट होता है । यह एक तरह से साधक का आध्यात्मिक धरातल पर पुनर्जन्म होता है। माँ कूष्माण्डा का उपासना मंत्र:- माँ कूष्माण्डा का उपासना मंत्र इस प्रकार है:- सुरासम्पूर्ण कलशं : रुधिराप्लुतमेव च । दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
पंचम रात्रि पूजा : नवरात्रियों में पांचवीं रात्रि को भगवती के पांचवें स्वरूप स्कन्दमाता की पूजा- अर्चना करने का विधान है। माँ शैलपुत्री का विवाह शिवजी के साथ हो जाने के पश्चात् स्कन्द कुमार (इन्हें कार्तिकेय भी कहा जाता है) का जन्म हुआ । प्रसिद्ध देवासुर संग्राम के समय यही स्कन्द देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्तिधर कहकर इनकी बड़ी महिमा कही गयी है । इनका वाहन मयूर कहा जाता है ।
इन्हीं स्कन्द अर्थात् आसुरी शक्तियों का नाश करने हेतु एवं अपने साधकों का कल्याण करने व धर्म की पुनर्स्थापना के लिये भगवती दुर्गा अपनी अनन्त, आलौकिक शक्तियों के साथ समय-समय पर विभिन्न स्वरूपों में अवतरित होती हैं। माँ के उपरोक्त नौ स्वरूप भी उनमें से ही हैं।
माँ के इन स्वरूपों की साधना-उपासना करके माँ का आशीर्वाद सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। जीवन में विशेष रूप से माँ की आराधना अगर नवरात्रों में की जाये तो वांछित फल प्राप्त होने के साथ-साथ मनोकामनायें भी पूर्ण होती हैं ।
समस्याओं से सहज ही छुटकारा पाते हुये सभी सुखों का आनन्द लिया जा सकता है। 70 नवरात्रि के अवसर पर इन्हीं नौ स्वरूपों की साधना का विधान रहा है । इनकी साधना की दो परम्पराएं रही हैं। साधना का एक स्वरूप तंत्र साधकों के निमित्त है, जबकि दूसरा स्वरूप आम साधकों के लिये है ।
यहां नवदुर्गाओं के इसी सहज साधना के रूप पर प्रकाश डाला जा रहा है। आम साधकों के लिये तो नवरात्रि के अवसर पर प्रत्येक रात्रि क्रमशः एक – एक स्वरूप की आराधना का विधान है ।
माँ की यह आराधना प्रत्येक दिन व्रत रख कर अथवा शुद्ध- सात्विक भावना बनाये रखकर एवं कंजक पूजन साथ सम्पन्न होती है । के नवरात्रियों में नवदुर्गा के नौ रूपों की उपासाना का विधान अग्रांकित क्रम से रहता है-
1. प्रथम रात्रि Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना
पूजा प्रथम रात्रि को भगवती दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की आराधना की जाती है। पर्वत राज हिमालय की पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा है। इन्हीं का एक अन्य नाम सती भी है। यह वृष पर सवार रहती हैं । इनके दायें हाथ में त्रिशूल तथा बायें हाथ में कमल पुष्प सुशोभित रहता है ।
माँ का यह स्वरूप अनंत शक्तियों का प्रतीक है । तंत्र की एक अन्य पद्धति में इन्हें ही कुण्डलिनी शक्ति का स्वरूप माना गया है, जो जन्म- जन्मान्तर से व्यक्ति के मूलाधार चक्र पर सुषुप्तावस्था में निष्क्रिय रहती है, लेकिन जाग्रत होने पर उसे असीम क्षमताओं से सम्पन्न कर देती है ।
प्रथम नवरात्रि को माँ के इस स्वरूप की पूजा दुःख, दरिद्रता से मुक्ति पाने एवं विवाह आदि की बाधाओं को दूर करने के लिये की जाती है ।
Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना का रहस्य नवरात्रि स्पैशल
शैलपुत्री की उपासना का मंत्र – शैलपुत्री की उपासना का मंत्र इस प्रकार है- वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रधकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम् ॥
2. द्वितीय रात्रि पूजा Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना
: दूसरी नवरात्रि को भगवती दुर्गा द्वितीय स्वरूप के रूप में ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। ब्रह्मचारिणी शब्द का अर्थ है पूर्णत्व के साथ सद् आचरण करने वाली। यह सदैव तपस्या में लीन रहती हैं । इसलिये इनकी शरण में जाने व इनकी आराधना करने से साधक में तप, त्याग, वैराग्य के साथ-साथ संयम व सदाचरण का भाव बढ़ता है तथा साधक मुक्ति की अवस्था का लाभ प्राप्त करता है ।
Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना का रहस्य नवरात्रि स्पैशल
तंत्र साधना की हठयोग परम्परा से ब्रह्मचारिणी का स्थान स्वाधिष्ठान चक्र पर माना गया है । इसलिये इस चक्र के जागरण से साधक में विद्या, बुद्धि व ज्ञान की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप अत्यन्त तेजमय है । इनके दायें हाथ में जप की माला तथा बायें हाथ में कमण्डल है ।
इस स्वरूप का भी यही भाव है कि माँ ज्ञान के सर्वोच्च शिखर को प्राप्त कर चुकी है । भगवद् पुराण में आया है कि माँ ने नारद `के परामर्श से भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिये घोर तपस्या की थी । इसी से देवताओं को राक्षसों के अत्याचार एवं संताप से मुक्ति प्राप्त हो पायी थी ।
माँ के इस स्वरूप की जो साधक विधिवत पूजा-अर्चना करता है, निश्चित ही माँ उसकी समस्त बाधाएं दूर कर देती हैं । उस साधक को फिर सर्वत्र विजय प्राप्त होती है ।
ब्रह्मचारिणी देवी का उपासना मंत्र :- ब्रह्मचारिणी देवी का उपासना मंत्र इस प्रकार है :- दधाना करपद्माभ्यामक्ष माला कमंडलू | देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तम ॥
3.तृतीय रात्रि पूजा : Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना
माँ भगवती की तीसरी शक्ति का नाम चन्द्रघण्टा है । इनके मस्तिष्क में घण्टे की आकार की अर्द्धचन्द्राकृति झलकती रहती है, इसलिये इन्हें चन्द्रघण्टा कहा जाता है।
नवरात्रि उपासना में तीसरी रात्रि चन्द्रघण्टा की रहती है । अतः तृतीय नवरात्रि को इन्हीं के विग्रह की पूजा-अर्चना की जाती है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण की भांति कांतिमय है ।
इनके तीन नेत्र व दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में क्रमश: खड्ग, शस्त्र, बाण आदि अनेक शस्त्र सुशोभित रहते हैं। माँ चन्द्रघण्टा सिंह पर सवारी करती हैं। माँ का यह स्वरूप परम् शांतिदायक और कल्याणप्रद तो है ही, इनके वीर भाव को भी प्रकट करता है ।
Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना का रहस्य नवरात्रि स्पैशल
इसलिये इनके सामने से सभी राक्षस भाग खड़े होते हैं। इसी तरह जो साधक माँ का कृपापात्र बन जाता है, उसके जीवन में फिर किसी तरह का अभाव नहीं रहता । वह समस्त सुखों को सहज ही प्राप्त कर लेता है ।
तांत्रिकों की एक अन्य परम्परा में माँ चन्द्रघण्टा का स्थान मणिपुर चक्र पर माना गया है। अतः जब तंत्र के अभ्यास से व्यक्ति की शक्ति मणिपुर चक्र पर आकर उसे जाग्रत करने लगती है, तो सहज ही उस साधक को अनेक अलौकिक शक्तियां प्राप्ति होने लगती हैं ।
चन्द्रघण्टा देवी का उपासना मंत्र:- चन्द्रघण्टा देवी का उपासना मंत्र इस प्रकार है:- पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता । प्रसादं तनुते मह्नं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥
4. चतुर्थ रात्रि पूजा Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना
: माँ भगवती के चतुर्थ स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है । अपनी मंद, हल्की मुस्कान द्वारा अखण्ड ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा नाम दिया गया है । जब सृष्टि अस्तित्व में नहीं आयी थी, सर्वत्र घोर अन्धकार व्याप्त था, तब इन्हीं देवी ने हर्षित हास्ययुक्त खेल ही खेल में इस ब्रह्माण्ड की रचना की थी ।
Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना का रहस्य नवरात्रि स्पैशल
अतः यही सृष्टि का आदि स्वरूप आद्यशक्ति है। भगवद् पुराण में माँ का निवास सूर्यमण्डल के अन्दर बताया गया है। इसलिये ये अत्यन्त, दिव्य तेज युक्त हैं । इनका तेज दसों दिशाओं में व्याप्त रहता है। माँ कूष्माण्डा का स्वरूप अष्टभुजा युक्त माना गया है । इनके आठों हाथों में क्रमशः धनुष बाण, कमण्डल, कमल, अमृत कलश, गदा और चक्र एवं जप माला सुशोभित रहती है। माँ का वाहन सिंह है
। माँ का यह स्वरूप विद्या, बुद्धि, विवेक, त्याग, वैराग्य के साथ-साथ अजेयता का प्रतीक है । इसलिये जो साधक माँ की शरण में आकर उनकी कृपा दृष्टि प्राप्ति कर लेता है, उसके शारीरिक, मानसिक और भौतिक, सभी दुःखों का अन्त हो जाता है।
साधक को रोग-शोक से छुटकारा मिलता है तथा उसके आरोग्य एवं यश में निरन्तर वृद्धि होती चली जाती है। । तांत्रिकों की दूसरी विद्या में कूष्माण्डा नामक इस आदिशक्ति का निवास अनाहत चक्र में माना गया है। अनाहत चक्र की स्थिति छाती के मध्य हृदय स्थल पर मानी गयी है। ।
अतः अनाहत चक्र की जाग्रति से ही साधक स्थूल शरीर की चेतना का परित्याग करके आत्मिक शरीर के स्तर में प्रविष्ट होता है । यह एक तरह से साधक का आध्यात्मिक धरातल पर पुनर्जन्म होता है। माँ कूष्माण्डा का उपासना मंत्र:- माँ
कूष्माण्डा का उपासना मंत्र इस प्रकार है:- सुरासम्पूर्ण कलशं : रुधिराप्लुतमेव च । दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
5. पंचम रात्रि पूजा :Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना
नवरात्रियों में पांचवीं रात्रि को भगवती के पांचवें स्वरूप स्कन्दमाता की पूजा- अर्चना करने का विधान है। माँ शैलपुत्री का विवाह शिवजी के साथ हो जाने के पश्चात् स्कन्द कुमार (इन्हें कार्तिकेय भी कहा जाता है) का जन्म हुआ ।
प्रसिद्ध देवासुर संग्राम के समय यही स्कन्द देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्तिधर कहकर इनकी बड़ी महिमा कही गयी है ।
Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना का रहस्य नवरात्रि स्पैशल
इनका वाहन मयूर कहा जाता है । इन्हीं स्कन्द तंत्र के दिव्य प्रयोग की माता होने के कारण भगवती के इस पंचम स्वरूप को स्कन्दमाता कहा गया । स्कन्दमाता चार भुजाओं वाली हैं। इनके दायें हाथ में कमल पुष्प है । ऊपर वाले बायें हाथ में भी कमल पुष्प है । बायां एक हाथ वरमुद्रा में है ।
माँ की गोद में स्कन्द बैठे हैं। माँ के तीन नेत्र हैं तथा माँ कमलासान पर आसीन हैं। माँ का यह स्वरूप बहुत ही अनुपम है। यह चारों पुरुषार्थों को एक साथ प्रदान करने वाला है । इसलिये माँ के इस स्वरूप की आराधना से साधकों को समस्त सुख सहज ही प्राप्त हो जाते हैं, वह आध्यात्मिक मार्ग पर भी तेजी से अग्रसर होता है ।
माँ के तंत्र विधान से चारों पुरुषार्थों को प्राप्त किया जा सकता है। 73 तंत्र साधना की एक अन्य पद्धति में स्कन्दमाता के रूप में इस आदिशक्ति की उपस्थिति विशुद्ध चक्र में मानी गयी है । विशुद्ध चक्र का केन्द्र कण्ठ में है, जहां से शक्ति आज्ञाचक्र और सहस्त्रार चक्र की ओर उर्ध्वगमन करती है ।
स्कन्दमाता का उपासना मंत्र :- स्कन्दमाता का उपासना मंत्र इस प्रकार : है:- सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रित करद्वया । शभदास्तु सदां देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥
6. छठवीं रात्रि पूजा Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना
: नवरात्रियों में छठे दिन आदिशक्ति के छठे स्वरूप कात्यायनी की आराधना की जाती है। महर्षि कात्यायन की पुत्री रूप में जन्म लेने कारण माँ दुर्गा के इस स्वरूप का नाम कात्यायनी के रूप में विख्यात हुआ । ऐसी कथा है कि कत नामक एक महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुये ।
Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना का रहस्य नवरात्रि स्पैशल
इन्हीं कात्य के गोत्र में महर्षि कात्यायन का जन्म हुआ था। इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुये बहुत वर्षों तक साधना की । इनकी इच्छा थी कि उनके घर स्वयं माँ भगवती पुत्री के रूप में जन्म लेकर उन्हें कृतार्थ करें । इसलिये जगत जननी को उनके घर कात्यायनी के रूप में अवतरित होना पड़ा ।
माँ कात्यायनी के स्वरूप की आभा स्वर्णमयी है । यह तीन नेत्रों और चार भुजाओं वाली हैं। इनका दायां हाथ वर देने की मुद्रा में है । बायें हाथों में तलवार व कमल पुष्प सुशोभित हैं। माँ सिंह पर सवारी करती है ।
अपने भक्तों की सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाली है। नवरात्रियों के छठवें दिन इनकी विशेष पूजा-अर्चना करने से साधक के समस्त दु:ख कष्ट दूर हो जाते हैं । ऐसा उल्लेख है कि द्वापर युग में ब्रज की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति स्वरूप में प्राप्त करने के लिये माँ के इसी रूप की आराधना की थी ।
तंत्र साधना की हठयोग पद्धति में आद्यशक्ति के इस स्वरूप का निवास भृकुटी के मध्य आज्ञा चक्र पर माना गया है । इसलिये तंत्र साधना में इस स्थान की जाग्रति से साधक का रूपान्तर होने लगता है तथा उसकी चेतना पराभौतिक जगत में प्रविष्ट कर जाती है ।
माँ कात्यायनी का उपासना मंत्र :- माँ कात्यायनी का उपासना मंत्र इस प्रकार है:- चन्द्रहासौ ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दधादेवी दानव धातिनी ||
7. सप्तम रात्रि पूजा :Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना
आद्यशक्ति के सप्तम स्वरूप की आराधना सप्तम नवरात्रि को की जाती है । माँ का सप्तम स्वरूप कालरात्रि के नाम से जाना जाता है । माँ का यह अद्भुत स्वरूप है । इनका रंग श्याम है। बाल बिखरे हुये हैं । यह त्रिनेत्रधारी एवं चतुर्भुजी हैं। इनके ऊपर उठे हुये दायें हाथ में तलवार है व दूसरा हाथ वर देने की मुद्रा में उठा हुआ है। बायें ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा व नीचे वाले हाथ में कटार है ।
Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना का रहस्य नवरात्रि स्पैशल
माँ गदर्भ पर सवार रहती हैं । नासिका से ज्वाला निकलती रहती । गले में माला धारण किये रहती हैं। माँ सबको भयाक्रान्त रखने वाले काल को भी भय देने वाली है । इसलिये इन्हें कालरात्रि कहा जाता है 1 माँ का यह स्वरूप अत्यन्त विकराल है, पर वह अपने भक्तों के लिये बहुत सुकोमल स्वभाव रखती हैं ।
जो कोई भी व्यक्ति माँ की शरण में पहुंच जाता है, अपने उस भक्त को माँ हर संकट से उबारे रखती हैं। माँ की कृपा से साधक अपनी सभी आकांक्षाओं की पूर्ति कर लेता है ।
तंत्र साधना की एक अन्य पद्धति में माँ के इस स्वरूप का स्थान मस्तिष्क स्थित सहस्त्रार चक्र में माना गया है। जो तांत्रिक सहस्त्रार चक्र की जाग्रति कर लेता है, उसके सामने अनन्त संभावनाओं के द्वार खुलते चले जाते हैं । ऐसे साधक अष्ट सिद्धियां भी सहज से प्राप्त कर लेते हैं ।
माँ कालरात्रि की उपासना का मंत्र:– माँ कालरात्रि की उपासना का मंत्र इस प्रकार है :- चतुर्बाहु युक्तादेवी चन्द्रहासेन शोभिता । गदर्भे च समारूढ़ा कालरात्रि भयावहा ||
8 .अष्टम रात्रि पूजा :Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना
माँ भगवती की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है । यह गौर वर्णा हैं । माँ के इस गौरे रंग की उपमा शंख, चन्द्र और कुन्द के पुष्प से दी जाती है । माँ का रूप आठ वर्षीय कन्या जैसा है। इनके समस्त वस्त्र व आभूषण भी श्वेत रंगी हैं ।
Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना का रहस्य नवरात्रि स्पैशल
त्रिनेत्री व चतुर्भुजी माँ की मुख मुद्रा शांत व सौम्य है, जिस पर बाल सुलभ मुस्कान झलकती रहती है । माँ का वाहन वृष है। इनका ऊपरी दायां हाथ वरमुद्रा में है । यह नीचे वाले हाथ में त्रिशूल धारण किये हुये हैं । इनके ऊपरी बायें हाथ में डमरू तथा नीचे वाले हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हैं ।
शिव को प्राप्त करने के लिये दीर्घ अवधि तक की साधना की थी । इस साधना से उन्हें महागौरव की प्राप्ति हुई थी । महागौरी की साधना से साधक का यश और प्रताप निरन्तर बढ़ता जाता है। भगवान शिव की कृपा भी इन पर निरन्तर बनी रहती है । मृत्यु उपरान्त इन्हें शिव तत्त्व की प्राप्ति होती है ।
महागौरी का उपासना मंत्र :- महागौरी का उपासना मंत्र इस प्रकार है:- – – श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः । महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा ॥
9 .नवम रात्रि पूजा Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना
: नवरात्रों की नवम रात्रि सिद्धिदात्री की रहती है । यह आद्यशक्ति माँ दुर्गा का नवम स्वरूप है। माँ सिद्धिदात्री अपने साधकों को समस्त रिद्धयां, सिद्धियां एवं लौकिक व परालौकिक सुखों को प्रदान करने वाली हैं। माँ के इस स्वरूप की साधना से अन्त में मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है ।
Nav Durga Sadhna नवदुर्गा साधना का रहस्य नवरात्रि स्पैशल
माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप चतुर्भुजी है जिनके दाहिने नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख व ऊपरी हाथ में कमल पुष्प सुशोभित रहता है ।
माँ कमल पुष्प पर ही आसीन रहती हैं । माँ का यह स्वरूप समस्त लौकिक एवं परालौकिक सुखों को प्राप्ति कराने वाला है। तांत्रिकों की अन्य परम्परा में सिद्धिदात्री स्वरूप में माँ की साधना अष्टसिद्धियों अर्थात् अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व की प्राप्ति के उद्देश्य के लिये भी की जाती है।
माँ सिद्धिदात्री का उपासना मंत्र:- माँ सिद्धिदात्री का उपासना मंत्र इस प्रकार है:- सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैर सुरैरमरैरपि । सेव्यमाना सदां भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥
अतः निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि माँ भगवती के उपरोक्त नौ स्वरूपों की पूर्ण विधि-विधान से आराधना करने से सहज ही अपने समस्त कष्टों से छुटकारा पाया जा सकता है तथा अनेक प्रकार की मनोकामनाओं की प्राप्ति की जा सकती है। नवरात्रियों के दौरान इनकी विशेष पूजा-अर्चना का विधान प्राचीन समय से चला आ रहा है।
भगवती दुर्गा और उनके नौ रूपों की वैदिक आराधना और तांत्रिक अनुष्ठान भी सर्वत्र प्रसिद्ध रहे हैं। ऋषि मार्कण्डेय द्वारा संकलित किया गया भगवती चरित्र (दुर्गा) सप्तशती) तो बहुत ही अद्भुत है। इसमें भगवती के स्वरूपों, चरित्रों के साथ-साथ अनेक गूढ़ रहस्यों को एक जगह समाहित किया गया है ।
इन रहस्यों के विषय में या तो स्वयं साधनारत होकर ही पूरी तरह से जाना जा सकता है या फिर गुरु कृपा से इनके रहस्य को समझना सम्भव है। साधारंण भक्तों के लिये तो यह तेरह अध्याय एवं 700 श्लोकों में संकलित किया गया एक काव्य भर ही है ।
यद्यपि प्राचीन समय से ही तंत्र साधना के विविध ग्रंथों में ऐसा भी उल्लेख किया जाता रहा है कि दुर्गा सप्तशती पाठ अथवा उसमें वर्णित किये देवी चरित्रों की विधिवत् साधना से भौतिक इच्छाओं के साथ परालौकिक अनुभवों को भी पाया जा सकता है । दुर्गा सप्तशती तंत्र साधना की कामधेनु है ।
प्राचीन प्रत्यंगिरा साधना Pratyangira Sadhana Ph.85280 57364
प्राचीन प्रत्यंगिरा साधना Pratyangira Sadhana Ph.85280 57364 अपने शत्रुओं को इससे तीक्ष्य शान्त के द्वारा .. प्रत्यंगिरा Pratyangira प्रयोगआज जीवन एक कुरुक्षेत्र बन कर रह गया है। “कुरुक्षेत्र” शब्द से उस स्थान को परिभाषित किया जा सकता है जहां द्वन्द्व है। द्वन्द्व वहां होता है, जहां दो में विषम भाव परिलक्षित होता है
और यह विषम भाव ही तो कारण होता है तनावग्रस्त बने रहने का। दोनों पक्ष (वादी और प्रतिवादी) तनाव ग्रस्त रहते ही हैं, क्योंकि दोनों अपने-अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में लगे हुए हैं, यही कारण है कि संसार में कोई भी ऐसा नहीं, जो तनाव मुक्त हो. स्वार्थ एक ऐसा दलदल है, जिसमें से निकल पाना कठिन है, जितना उसमें से बाहर निकलने का प्रयत्न करते हैं.
उतना ही और धंसते बले जाते हैं ऐसे घुटन भरे जीवन का क्या अर्थ, जहां सुख-चैन से दो घड़ी सांस भी न ले सकते हो। जब तक मानव-मन स्वार्थ प्रेरित एवं तनाव ग्रस्त रहेगा, तब तक वह हर स्थान कुरुक्षेत्र ही कहा जायेगा, जहां ऐसे लोग रहते हैं, अतः जब तक स्वार्थ भाव समाप्त नहीं होगा, तब तक यों ही चलता रहेगा कौरवो पांडवों के मध्य का यह युद्ध जिसकी ओट में छिपा है- ‘अन्धकार’ और ‘मृत्यु’ ।
– क्या तनावग्रस्त बने रहना ही जीवन का प्रयोजन है? जीवन का प्रयोजन तो कुछ और है पर हम अपने बनाये हुए कुरुक्षेत्र में ही फंस कर रह गये हैं और भ्रमित हो गये हैं अपने लक्ष्य से। * जीवन इतना सुलभ नहीं है, जितना आप समझ बैठे हैं जब तक आप अपने मन से दुर्भावनाओं से बनी गांठें नहीं निकाल पायेंगे, तब तक शांति और तृप्ति कैसे मिल सकती है.
असल जब त शत्रुता का नहीं हो द्वेष, वैम क्रोध समाप तब तक यह कुर नहीं हो सकता. की साधना द्वारा करना सम्भव है. की तेजोमय ज्व शत्रुओं क में तो दुर्भावनाएं ही हमारी शत्रु है, जो हमारे भीतर शत्रुता के भाव को जन्म देती हैं, कि मैं जो करता हूँ, ठीक करता हूँ, मैं जो कहता हूँ, ठीक कहता हूँ, मैं सच्चा हूँ, सामने वाला झूठा है इन अवगुणों को मानव देखते हुए भी नहीं देख पाता और अपने आप को सदाचारी, सद्व्यवहारी, सद्गुणकारी समझ बैठता है, फलस्वरूप जीवन कुरुक्षेत्र का मैदान बन जाता है।
आज जिधर भी दृष्टि जाती है उधर द्वेष की चिनगारियां बिखरी हुई हैं, आखिर कब वह समय आयेगा जब मानव अपने मन से दुर्भावनाओं को निकाल सकेगा, क्योंकि जब ऐसा सम्भव होगा, तभी व्यक्ति सुखी हो और ऐसा तब सम्भव हो सकेगा, निर्द्वन्द्व हो सकेगा.सकेगा, जब वह अपने आप को सही रूप में पहिचान लेगा. कि यह क्या है?
मनुष्य उस शक्ति से अपरिचित है, जिसने उसका निर्माण किया है, तेजस्वी माता-पिता की संतान होकर भी वह भयभीत है. क्योंकि उसने मा का जन्मदायिनी स्वरूप ही देखा है। यह तो उसका एक स्वरूप है, दूसरा स्वरूप तो उसका शक्तिदायिनी स्वरूप है, जिसकी शक्ति से मानव अनभिज्ञ है। संसार में केवल मा ही ऐसी होती है, जिसे चुकारे जाने पर वह व्याकुल हो उठती है अपने शिशु को कलेजे से लगा लेने के लिए…
फिर वह बालक कितना हो दुराचारी क्यों न हो, दोगी क्यों न तक मन से का भाव समाप्त होगा, ईर्ष्या, मनस्य, घृणा, प्त नहीं होगा, कुरुक्षेत्र का युद्ध खत्म पर प्रत्यंगिरा देवी सिद्धि प्राप्त कर ऐसा क्योंकि प्रत्यंगिरा . ● वाला से जड़-मूल से का नाश होगा! हो उसे संकट से उबारने के लिए वह तत्क्षण प्रस्तुत हो ही जाती है, और ठीक एक अवोध शिशु की भांति आपको भी तो बस उस मां को पुकारना है और निश्चिन्त हो जाना है, क्योंकि परम शक्तिशालिनी मा अपने पुत्र को शक्तिवान बना ही देती है जीवन के कुरुक्षेत्र को जीतने के लिए।
मां की शक्ति को प्राप्त करने के लिए आपको सम्पन्न करना है “प्रत्यंगिरा प्रयोग” आगे का काम तो उसका है, आपको चिन्ता करने की जरूरत नहीं है और न ही भयभीत होने की आवश्यकता है, आपको तो देवी प्रत्यंगिरा का श्रद्धापूर्वक नाम लेना है. प्रत्यंगिरा आदिशक्ति का अत्यधिक स्वत तकारी स्वरूप है, जिसकी साधना तो फलदायी सिद्ध होती ही है। यो तो कोई भी शक्ति साधना विफल नहीं मानी जाती. किन्तु प्रत्यंगिरा प्रयोग का अपना विशेष महत्त्व है, जो बड़े से बड़े शत्रु को भी शांत कर देने वाली है, क्योंकि इसका है। उद्भव शिव की शक्ति शिवा से हुआ शिवा है ही कल्याणकारी, जो अपने भक्तो की विधि सुरक्षा करती है। प्रत्यंगिरा के साधक को न तो अपमृत्यु का भय रहता है, और न ही कोई आशंका ही व्याप्त होती है, क्योंकि यह प्रयोग साधक को हर प्रकार से सुरक्षित कर देता है।
जीवन में अक्सर धोखे होते रहते हैं. यदि आपको यह ज्ञात हो जाय कि अमुक शत्रु के कारण आपका जीवन कंटकाकीर्ण हो गया है, तो सुरक्षा का उपाय क्यों नहीं किया जाय, शत्रु की शक्ति को ही क्यों न इतना क्षीण बना दिया जाय कि वह मुंह की खाये।
मानव का शत्रु केवल मात्र प्रतिद्वन्द्वी मानव ही नहीं होता, अपितु कभी-कभी तो मानव के आन्तरिक कारण ही उसके शत्रु बन जाते हैं और ऐसी स्थिति में प्रत्यंगिरा जहां बाहरी शत्रुओं का विनाश करती है, साथ ही अन्दर निहित विकारों की उत्पत्ति से जन्मी शत्रुता के भाव को भी पूर्णतः समाप्त कर देती है, फलस्वरूप जहां यह प्रयोग भौतिक दृष्टि से लाभदायक है, वहीं आध्यात्मिक दृष्टि से भी फलदायी हैं, जो मन के विकारों को समाप्त कर, शुद्धता और निर्मलता प्रदान कर भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से उन्नति और सफलता प्रदान करता है।
प्रत्यंगिरा Pratyangira प्रयोग विधिः इस प्रयोग के लिए आवश्यक सामग्री है दिव्य मंत्रों से प्राण-प्रतिष्ठित “प्रत्यंगिरा Pratyangira यंत्र”, “विभीतिका माला” एवं “शत्रुमर्दनी गुटिका” । इस प्रयोग को करने का विशेष दिन है १८.१२.६५ सोमवार इस प्रयोग को किसी भी माह की एकादशी को भी सम्पन्न किया जा सकता है। यह प्रयोग रात्रिकालीन है। साधक निश्चित समय पर पश्चिम दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठ जाये। सामने चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर किसी स्टील या तांबे की प्लेट पर कुंकुम से रंगे हुए चावल से अपने शत्रु विशेष का नाम अंकित करके यंत्र को स्थापित करें । .
गुटिका को भी यंत्र के सामने स्थापित करें, उसके बाद इन्द्र, वरुण, कुबेर और यम जो चार दिशाओं के अधिपति है, उनके निमित्त चार दीपक (सरसों के तेल के) जला लें। चारों देवताओं का अपनी पूर्ण मनोरथ सिद्धि के लिए कुंकुम, अक्षत, धूप व दीप से पूजन करें। ८. यंत्र और गुटिका पर कुंकुम और अक्षत चढ़ाकर पूजन करें तथा लाल रंग के पुष्पों को चढ़ायें। धूप व दीप लगातार जलते रहने चाहिये । या . इसके बाद यंत्र के सामने एक कटोरी रखें और उसमें निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए कुकुम से रंगे चावल को तब तक चढ़ाये, जब तक कि वह कटोरी पूर्णरूप से भर न जाय। मंत्र
।।ॐ प्रत्यंगिरायै स्वाहा ।।
फिर उन चावलों से यंत्र व दीपकों के चारों ओर घेरा डालें। इसके बाद हाथ में जल लेकर संकल्प करें और प्रत्यंगिरा देवी का ध्यान करते हुए अपनी मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करें, फिर जल को भूमि पर छोड़ दे । ।।
ॐ शत्रुदारिण्यै फट् । ।
का मंत्र जप की समाप्ति के पश्चात् व मंत्र जप से पूर्व एक-एक माला गुरु मंत्र का जप अवश्य कर लें। शत्रुमर्दनी गुटिका को अपने आसन के नीचे दबा दें और यंत्र की ओर देखते हुए “विभीतिका माला” से निम्न मंत्र का १ माला जप करें- मंत्र जप समाप्ति के बाद गुरु आरती एवं जगदम्बा आरती करें।
यंत्र. गुटिका एवं माला को नदी या समुद्र में प्रवाहित कर दें और दोनों हाथ जोड़कर प्रत्यगिरा PRATYANGIRA को नमस्कार करें। पूजन में प्रयुक्त लाल अक्षत को किसी पीपल के पेड़ पर या मंदिर में चढ़ा आयें। एक दिन का यह प्रयोग साधक के जीवन के विरोधी उत तत्त्वों को समाप्त करने वाला अचूक अस्त्र है, जिससे जीवन की उन्नति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करने वाले शत्रुओं को के जड़मूल से नष्ट किया जा सकता है और भौतिकता के ओ साथ-साथ अध्यात्म के पथ पर भी अग्रसर हुआ जा सकता के है, इसलिए प्रत्येक गृहस्थ व्यक्ति को, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष यह प्रयोग सम्पन्न कर अपने जीवन में सफलता प्राप्त के करनी ही चाहिए।
kritya sadhana -प्राचीन तीक्ष्ण कृत्या kritya साधना ph. 85280 57364 कितना अद्भुत था कामाक्षा का तांत्रिक सम्मेलन इस सम्मेलन में मां कृपाली भैरवी, पिशाच सिद्धियों की स्वामिनी देवुल भैरवी, त्रिजटा अघोरी, बाया भैरवनाथ, पगला बाबा आदि विश्व विख्यात तांत्रिक आये हुए थे।
सभापति कौन बनेगा, इस बात पर सभी एकमत नहीं हो पा रहे थे, कि तभी त्रिजटा अघोरी ने अत्यन्त मेघ गर्जना के साथ परम पूज्य गुरुदेव का नाम प्रस्तावित किया और घोषणा की- “यही एक मात्र ऐसे व्यक्तित्व है, जो साधना के प्रत्येक क्षेत्र, चाहे यह तंत्र का हो या मंत्र का हो, कृत्या kritya साधना हो चाहे भैरव साधना हो या किसी भी तरह की कोई भी साधना हो, पूर्णतः सिद्धहस्त है।” भुर्भुआ बाबा ने भी इस बात का अनुमोदन किया।
जब सबने पूज्य गुरुदेव को देखा, तो उन्हें सहज में विश्वास नहीं हुआ, कि धोती-कुर्ता पहना हुआ यह व्यक्ति क्या वास्तव में इतने अधिक शक्तियों का स्वामी है। इसी भ्रमवश कपाली बाबा ने गुरुदेव को चुनौती दे दी। कपाली बाबा ने कहा- “तुम्हारा अस्तित्व मेरे एक छोटे से प्रयोग से ही समाप्त हो जायेगा।
अतः पहले तुम ही मेरे ऊपर प्रयोग करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करो।” गुरुदेव ने अत्यन्त विनम्र भाव से उनकी चुनौती को स्वीकार करते हुए कहा- “आपको अपनी कृत्या krityaओं पर भरोसा करना चाहिए, किन्तु यह भी ध्यान रखना चाहिए, कि दूसरा व्यक्ति भी कृत्या krityaओं से सम्पन्न हो सकता है।
” “मैं आपका सम्मान करते हुए आपको सावधान करता हूं कि आपके प्रयोग से मेरा कुछ मुस्कराते हुए गुरुदेव ने फिर कहा नहीं बिगड़ेगा। यदि आप को अहं है, कि आप मुझे समाप्त कर देंगे, तो पहले आप ही अपने सबसे शक्तिशाली व संहारक अस्त्र का प्रयोग कर सकते हैं।”
इतना सुनते ही कपाली बाबा ने अत्यन्त तीक्ष्ण संहारिणी कृत्या kritya’ का आवाहन करके सरसों के दानों को गुरुदेव की तरफ फेंकते हुए कहा- ‘ले अपनी करनी का फल भुगत।” संहारिणी कृत्या kritya का प्रहार यदि विशाल पर्वत पर भी कर दिया जाय, तो उस पर्वत का नामो-निशान समाप्त हो जाए। अत्यन्त उत्सुक और भयभीत नजरों से अन्य साधक मंच की ओर देख रहे थे, किन्तु आश्चर्य कि पूज्य गुरुदेव अपने स्थान से दो चार कदम पीछे हट कर वापिस उसी स्थान पर आकर खड़े हो गए। कपाली बाबा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।
उन्हें तो उम्मीद ही नहीं थी कि यह साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति संहारिणी कृत्वा का सामना कर सकेगा। इसके बाद कणली बाबा ने ‘बावन भैरवों’ का एक साथ प्रहार किया, लेकिन उनका यह प्रहार भी पूज्य गुरुदेव का बाल बांका न कर सका। कृपाली भैरवी तथा अन्य तांत्रिकों ने गुरुदेव को प्रयोग करने के लिए कहा।
गुरुदेव ने कपालो बाबा से कहा- “मैं एक ही प्रयोग करूंगा। यदि तुम इस प्रयोग से बच गए, तो मैं तुम्हारा शिष्यत्व स्वीकार कर लूंगा।” गुरुदेव ने दो क्षण के बाद ही अपनी मुट्ठी कपाली बाला की तरफ करके खोली दी और उसी समय कपाली बाबा लड़खड़ा कर गिर पड़े. उनके मुंह से खून की धारा यह निकली।
गुरुदेव ने कहा- “यदि कपाली बाबा क्षमा मांग लें, तो मैं उन्हें दया करके जीवनदान दे सकता हूं।” कपाली बाबा के मुंह से खून निकल रहा था, फिर भी उनमें चेतना बाकी थी। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। गुरुदेव ने अत्यन्त कृपा करके अपना प्रयोग वापिस लिया और वहां उपस्थित साधकों के अनुग्रह पर कपाली बाबा के सिर से दो-चार बाल उखाड़ कर उनको अपना शिष्यत्व प्रदान किया और तांत्रिक सम्मेलन के सभापति बने। उपरोक्त घटनाक्रम गुरुदेव द्वारा लिखित ‘तांत्रिक सिद्धियां नामक पुस्तक में उद्धृत है।
इस घटनाक्रम से स्पष्ट हो गया है, कि कृत्या kritya अपने आपमें पूर्णतः मारण प्रयोग है। एक बार यदि इसका प्रयोग कर दिया जाय, तो सामने वाले व्यक्ति के साथ ही साथ उसके आस-पास के व्यक्ति भी घायल हो जाते हैं, चाहे वह कितना ही बड़ा सिद्ध योगी या तांत्रिक हो। कृत्या kritya चौंसठ प्रकार की होती है। इसमें संहारिणी कृत्या kritya सर्वाधिक उम्र और विनाशकारी होती है।
यदि कोई साधक इसका प्रयोग कर दे, तो सामने वाले का बचना तभी सम्भव है, जब वह भी संहारिणी कृत्या kritya का प्रयोग जानता हो। संहारिणी कृत्या kritya को खेचरी कृत्या kritya द्वारा ही नष्ट किया जा सकता है। कृत्या kritya : पग-पग पर सहायक इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है, कि गृहस्थ साधक इसकी साधना नहीं कर सकता है। मारण प्रभाव से युक्त होने बाद भी कृत्या kritya गृहस्थ साधक के लिए कई सृजनात्मक प्रभावों से भी युक्त है-
* कृत्या kritya साधना को सम्पन्न करने के बाद साधक में आशीर्वाद व श्राप देने की अद्भुत क्षमता प्राप्त हो जाती है। कृत्या kritya साधना के द्वारा मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण सिद्ध हो जाता है।
* कृत्या kritya सिद्ध होने पर साधक आत्मिक रूप से बलशाली व शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला बन जाता है। कृत्या kritya सिद्ध किया हुआ साधक किसी असाध्य रोग से ग्रसित व्यक्ति को यदि कृत्या kritya मंत्र से अभिमंत्रित जल पिला दे, तो वह रोगी पूर्णतः रोग मुक्त हो जाता है।
★ कृत्या kritya सिद्ध करने के बाद साधक पर मारण, वशीकरण या अन्य किसी भी कृत्या kritya के तांत्रिक प्रयोग का असर नहीं होता। प्रयोग विधान कृत्या kritya साधना सिद्ध करने के लिए अमावस्या की रात्रि को सर्वश्रेष्ठ व सिद्ध समय कहा गया है।
कृत्या kritya साधना विधि
जिन्होंने इसे सिद्ध करने की गुरु आज्ञा प्राप्त की है या इससे सम्बन्धित विशेष दीक्षा प्राप्त की है, क्योंकि इस तीक्ष्ण साधना में जरा सी भी गलती साधक के लिए हानिप्रद सिद्ध होगी।
यह साधना 11 दिन में सम्पन्न होती है। इस साधना में साधक काली धोती पहनें व काले रंग के आसन का प्रयोग करें। यह रात्रिकालीन साधना है।
इस साधना को करने में निम्न सामग्री आवश्यक है- पंचमहामंत्रों से अनुप्राणित शिव शक्ति साधना से सिद्ध और ब्रह्मप्राणश्चेतनायुक्त कृत्या kritya तेजक’ तथा ‘कृत्या kritya माला’। को या किसी भी अमावस्या की रात्रि को दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके आसन पर बैठें और संकल्प करें, कि मैं अपने जीवन में आने वाली प्रत्येक समस्या में सहायता प्राप्त करने के लिए 11 दिन का अनुष्ठान करने का संकल्प लेता हूं।
इसके बाद बाएं हाथ में जल लेकर शरीर पर दस बार देह रक्षा मंत्र बोल कर जल छिड़कें- देह रक्षा मंत्र ॐ रं क्षं देहत्व रक्षायै फट् इसके बाद दशों दिशाओं में बाएं हाथ से अश्वन फेंकते हुए दिशा बन्धन करें, जिससे साधना काल में कोई व्यवधान न आए- दिशा बन्धन मंत्र ॐ ऐं क्लीं ह्रीं क्रीं ॐ फट् फिर पूज्य गुरुदेव के चित्र का और कृत्या kritya तेजक का पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें तथा मूल मंत्र की 11 माला जप करें-
कृत्या kritya मूल मंत्र ॐ क्लीं क्लीं कृत्यायै क्रीं क्रीं फट्
★ आसन पर बैठने के बाद बीच में उठें नहीं। साधना काल मैं यदि कोई आवाज सुनाई दे, तो उसकी ओर ध्यान न दें। मंत्र जप का क्रम किसी भी परिस्थिति में बीच में न तोड़ें। इस प्रकार 17 दिन तक प्रयोग करें। ग्यारहवें दिन तेजक को अपने गले में पहनें या बांह पर बांध लें। साधक इसे तीस दिन तक अवश्य पहनें, जिससे कृत्या kritya का तेज साधक के शरीर में रम सके और साधक सफलता पूर्वक इसका प्रयोग कर सके। 30 दिनों के बाद साधक तेजक और माला को नदी वा तालाब में विसर्जित कर दें। इस साधना में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन व एक समय भोजन करना आवश्यक है।
Sapneshwari sadhna – स्वप्नेश्वरी त्रिकाल दर्शन साधना Ph.85280 57364
Sapneshwari sadhna – स्वप्नेश्वरी त्रिकाल दर्शन साधना Ph.85280 57364 यह साधना प्रत्येक मानव के लिए आवश्यक है, जो साधक ऊंचे स्तर की साधना नहीं कर पाते या जिन्हें इतना अवकाश नहीं मिलता, उन्हें स्वप्नेश्वरी साधना Sapneshwari sadhna सम्पन्न करनी चाहिए जिससे कि वे जीवन में स्वयं का तथा दूसरे लोगों का कल्याण कर सकें। इस साधना से आप भूत भविष्य वर्तमान की जानकारी हासिल कर सकते है हर सवाल का जवाब आपको सपने के माध्यम हासिल कर सकते है।
जीवन की अनेक समस्याएं होती है. अनेक बाधाएं होती हैं, चाहे वह प्रेम-प्रसंग का विषय हो अथवा ऋण से मुक्ति का. जिनका स्पष्ट रूप से उल्लेख भी नहीं किया जा सकता और जिनका समाधान प्राप्त करना भी आवश्यक होता है।
और ऐसी ही स्थितियों में बत जाती है सहायक ऐसी कोई विशिष्ट साधना जो त्वरित फलप्रद हो स्वप्नेश्वरी साधना Sapneshwari sadhna उसी त्वरित फलप्रद श्रेणी की साधना है। प्रयोग जब भी कोई समस्या आपके सामने हो और उसका हल नहीं मिल रहा हो, तो इस प्रकार मन्त्र जप किया हुआ साधक उस समस्या को कागज पर लिख ले और रात्रि को सिरहाने रख कर सो जाय, रात्रि को स्वप्नेश्वरी Sapneshwariदेवी स्वप्न में ही उस समस्या का हल स्पष्ट रूप से बता देती हैं,
जिससे कि साधक को निर्णय करने में आसानी होती है। साधक चाहे तो किसी भी व्यक्ति की समस्या इसी प्रकार से हल कर सकता है, उदाहरण के लिए व्यक्ति का प्रमोशन किस तारीख को होगा या मैं अमुक व्यक्ति के साथ लेन-देन कर रहा हूँ, यह ठीक रहेगा या नहीं, ऐसे प्रश्न स्पष्ट रूप से कागज पर लिख लेने चाहिए, और अपने सिरहाने रात्रि को सोते समय देख लेने चाहिये, तत्पश्चात् स्वप्नेश्वरी देवी Sapneshwari को मन ही मन प्रणाम कर सो जाना चाहिए, ऐसा करने पर उसे रात्रि को ही स्वप्न में उसका प्रामाणिक हल मिल जाता है। वस्तुतः यह महत्वपूर्ण साधना है, और साधक इसके माध्यम से साधक हजारों-लाखों लोगों का कल्याण कर सकता है।
इस साधना के लिए मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त स्वप्नेश्वरी यंत्र स्वप्नेश्वरी देवी का चित्र आवश्यक है, तथा यह यंत्र तांबे के पतरे पर या चांदी के पतरे पर बना हुआ लेना चाहिए तथा उस चित्र को मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त चैतन्य कर देना चाहिए, जिससे कि उसका प्रभाव मिल सके, यदि आपके शहर में योग्य पण्डित हो, तो प्राण प्रतिष्ठा की जा सकती है,
स्वप्नेश्वरी देवी के चित्र को फ्रेम में मढ़वा कर रख साधना प्रारम्भ करने से पूर्व चावल, कुकुम या केशर, जल का लोटा, दीपक, अगरबत्ती पहले से ही तैयार करके रख देनी चाहिए। यह साधना सोमवार से प्रारम्भ की जाती है।
यह मात्र पांच दिन की साधना है। इसमें नित्य 101 मालाएं फेरनी आवश्यक है, इस साधना में हकीक का ही प्रयोग किया जाता है, अन्य मालाएं वर्जित हैं। यह साधना दिन को या रात्रि को भी की जा सकती है। साधक चाहे तो पचास मालाएं दिन को तथा इक्यावन मालाएं रात्रि को भी कर सकता हैं. इस प्रकार दिन और रात में दो बार में पूर्ण मंत्र जप हो जाना चाहिए।
माला सोमवार को साधक स्नान कर धोती पहन कर उत्तर की ओर मुंह कर बैठ जायें, सामने लकड़ी के बाजोट पर पीला रेशमी वस्त्र बिछा दें और उस पर स्वप्नेश्वरी देवी का यंत्र व स्वप्नेश्वरी देवी का चित्र स्थापित कर दें, इसके बाद अलग बर्तन में स्वप्नेश्वरी देवी के यंत्र को जल से, फिर कच्चे दूध से तथा फिर जल से धोकर पोंछकर बाजोट पर रखे किसी पात्र में यंत्र को स्थापित कर दें, यह पात्र ताम्बे का स्टील या चांदी का हो सकता है, फिर कुकुम या केशर से तिलक करें सामने अगरबत्ती व दीपक लगायें दूध का बना प्रसाद चढ़ायें और
फिर नीचे लिखे मंत्र की एक सौ एक मालाएँ नित्य जये मंत्र ॐ ह्रीं स्वप्नेश्वरी ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं की ॐ ॥ OM KREEM KREEM KREEM HREEM HREEM SWAPNESHWARI HREEM HREEM KREEM KREEM KREEM OM
इस प्रकार नित्य एक सौ एक माला मंत्र जप करें. इन पांच दिनों में साधक जमीन पर सोयं, एक समय भोजन करें। पांच दिन तक मंत्र जप के बाद छठे दिन इसी मंत्र की मात्र शुद्ध घृत से एक हजार एक आहुतिया दें, फिर पांच कुमारी कन्याओं को भोजन करायें और उन्हें यथोचित यस्त्र दान आदि देकर सन्तुष्ट करें, इस प्रकार करने पर साधना सम्पन्न मानी जाती है। ‘इस का इस्तमाल कैसे करना है वो लेख में पहले ही बता दिया गया है
Lakshmi Sadhna paryog आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना प्रयोग Ph.8528057364
Lakshmi Sadhna paryog आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना प्रयोग Ph.852805736 सृष्टि के रचयिता विष्णु की नींव , जिनकी साधना पूर्ण हो चुकी है, जीवन के दोनों पक्षों की पूर्णता – आध्यात्मिक और भौतिक जीवन। भगवती लक्ष्मी ब्रह्मांड के रचयिता विष्णु की मूल शक्ति और त्रिगुणात्मक रूप में भगवती महालक्ष्मी के रूप में पूरी दुनिया के कारण पूजनीय हैं।
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आधार है भगवती लक्ष्मी, जो क्षीरसागर से उत्पन्न होकर पूरी दुनिया का पोषण करती हैं, जीवन में सभी सुख, सौभाग्य, आनंद और पूर्णता प्रदान करती हैं। ऐसी महादेवी हैं, जिनकी पूजा करने के लिए दुनिया का हर व्यक्ति उत्सुक रहता है ।
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि भगवती लक्ष्मी की पूजा, पूजा दुनिया के हर देश में की जाती है, चाहे वह एक अलग नाम से हो, एक अलग रूप में हो। यह कर्म के एक अलग तरीके से हो सकता है , लेकिन लक्ष्मी की आस्था पूरी दुनिया में है, क्योंकि लक्ष्मी के बिना जीवन का मूल सत्य समाप्त हो जाता है। जीवन के दो पहलू हैं, आध्यात्मिक और शारीरिक लक्ष्मी आध्यात्मिक जीवन का आधार भी है, क्योंकि अध्यात्म जीवित रहे तो मानवता भी जीवित रहेगी। लक्ष्मी इसकी जड़ है
ठीक इसी प्रकार से सम्पूर्ण भौतिक सम्पदा की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी ही हैं। यह अलग बात है, कि आज विश्व में अधिकांश व्यक्ति आर्थिक समस्याओं से घिरे हैं, जिनके पास भौतिक जीवन में उपयोग आने वाली वस्तुओं का अभाव ही रहता है, पर इसका कारण क्या है, मनुष्य को अपनी अज्ञानता त्याग कर इसके मूल में जाना ही पड़ेगा।
यह बात तो निर्विवाद सत्य है, किमात्र परिश्रम से जीवन में पूर्णता और सम्पूर्णता नहीं आ सकती। एक कार्यशील व्यक्ति दिन भर परिश्रम कर शाम को सौ-दो सौ ही कमा सकता है और इतने धन से उसके जीवन के अभाव समाप्त नहीं होते हैं, क्योंकि परिश्रम धन प्राप्ति का केवल एक भाग है।
धन की प्राप्ति तो देवी- कृपा या भगवती महालक्ष्मी की साधना से ही पूर्णतया सम्भव है। परन्तु जो व्यक्ति अहंकार से ग्रसित है, जो व्यक्ति नास्तिक है, जो व्यक्ति देवताओं की साधना को, आराधना को, सिद्धियों को, मंत्रों को नहीं पहचानते या उन पर विश्वास नहीं करते, वे जीवन में बहुत बड़े अभाव पाल-पोस रहे होते हैं, उनके जीवन में सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं होता,
निर्धनता उनके चारों ओर मंडराती रहती है, जीवन की समस्याएं उसके सामने मुंह उठाए खड़ी रहती हैं ऐसा व्यक्ति चाहे अपने- आप को कितना ही संतोषी कह कर कर्महीन, भाग्यहीन हो जाता है, पर यह ध्रुव सत्य है कि वह अपने जीवन में उस आनन्द और मधुरता को,
उस सम्पूर्णता और वैभव को प्राप्त नहीं कर सकता, जो देवी कृपा या भगवती लक्ष्मी की कृपा से प्राप्त होता है। कुछ व्यक्ति जो जीवन में धन सम्पदा से युक्त होते हैं और वे ये समझ बैठें कि लक्ष्मी तो उनके पास आनी ही है, वे भूल कर रहे हैं।
यह लक्ष्मी तो निश्चय ही उनके द्वारा पूर्व जन्म में किए गए साधना और सुकृत कार्यों से ही प्राप्त हुई है। साधना वह क्रिया है जिसके माध्यम से मनुष्य देवताओं को भी विवश कर सकता है, कि वे सम्पूर्णता से उसके साथ रहें, उसकी सहायता करें, उसके जीवन में जो न्यूनता है वह पूर्ण हो इसीलिए
श्रीमद्भगवदगीता में लिखा है, कि देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः प्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ (३,११) हे मनुष्य तुम साधन यज्ञ, पूजन, ध्यान द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें, इस प्रकार से निःस्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम पूर्णत्व प्राप्त कर सकोगे।
प्रत्येक व्यक्ति वह चाहे गृहस्थ जीवन में हो, भौतिक जीवन में हो, संन्यासी हो, योगी हो, चाहे हिमालय में विचरण करने वाला हो, लक्ष्मी की कृपा का अवलम्बन तो उसको लेना ही पड़ता है। जो व्यक्ति
इस कटु सत्य को समझ लेता है, जो इस बात को समझ लेता है, कि जीवन का आधारभूत सत्य भौतिक सम्पदा के माध्यम से ही जीवन में पूर्णता और निश्चिन्तता आ सकती है, वह लक्ष्मी की आराधना, लक्ष्मी का अर्चन और लक्ष्मी की कृपा का अभिलाषी जरूर होता है।
मैं यह नहीं कहता, कि कुंकुंम, अक्षत् से पूजा की जाए: मैं यह भी नहीं कहता, कि आरती उतारी जाए. . ये तो पूजा के प्रकार हैं। साधना तो इससे बहुत ऊंचाई पर है, जहां मंत्र जप के माध्यम से हम देवताओं को भी इस बात के लिए विवश कर देते हैं, कि वे अपनी सम्पूर्णता के साथ व्यक्ति के साथ रहें,
उसकी सहायता करें, उसके जीवन के जो अभाव हैं, जो परेशानियां हैं, जो अड़चनें हैं, जो बाधाएं हैं उन्हें दूर करें, जिससे उसका जीवन ज्यादा सुखमय, ज्यादा मधुर, ज्यादा आनन्ददायक हो सके।
इसमें कोई दो राय नहीं, कि जीवन में महाकाली और सरस्वती की साधना भी जरूरी है, क्योंकि काली की साधना से जहां जीवन निष्कंटक और शत्रु रहित बनता है, वहीं महा सरस्वती साधना के माध्यम से उसे बोलने की शक्ति प्राप्त होती है, उसका व्यक्तित्व निखरता है, वह समाज में सम्माननीय और पूजनीय बनता है।
मगर यह सब तब हो सकता है, जब धन का आधार हो- बस्वास्ति वित्तं नरः कुलीन, सः पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः । स एवं वक्ता स च दर्शनीयः, सर्व गुणाः मावन्ते ॥
‘भृर्तहरी ‘ चाहे हम रुद्र की साधना करें और चाहे हम ब्रह्मा की साधना करें, चाहे हम इन्द्र, मरुद्गण, यम या कुबेर की साधना करें, किन्तु वैभव और धन की अधिष्ठात्री देवी तो भगवती लक्ष्मी ही हैं, मात्र लक्ष्मी की साधना के माध्यम से ही व्यक्ति अपने अभावों को दूर कर सकता है।
६६ जिसके पास लक्ष्मी की कृपा है ‘यस्यास्ति वित्तं समाज उसको समझदार समझता है, प्रतिष्ठित समझता है, ऊंचे खानदान का समझता है, उसे पण्डित कहते हैं, उसे गुणज्ञ कहते हैं. लोग उससे सलाह लेते हैं, उसके पास बैठते हैं, उससे मित्रता करने का प्रयत्न करते हैं।
जिसके पास लक्ष्मी की कृपा होती है, वह अपने आप अच्छा वक्ता बन जाता है सः एव बक्ता, स च माननीयः….. समाज में लोग उसका सम्मान करते हैं, उसके पास बैठने, उससे मित्रता करने को प्रयत्नशील होते हैं। मृर्तहरी ऋषि कह रहे हैं- ‘सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ते’ ये सब गुण मनुष्य के नहीं है, ये तो भगवती लक्ष्मी की कृपा के गुण हैं, जो साधक को प्राप्त हैं। प्रश्न उठता है, कि क्या प्रत्येक मनुष्य के लिए लक्ष्मी की साधना आवश्यक है?
हमारे जीवन में अन्न की नितांत आवश्यकता है, जल की नितांत आवश्यकता है, प्राणवायु लेने की नितांत आवश्यकता है, किन्तु केवल इन तीनों से मनुष्य जीवन सुमधुर नहीं बन सकता है, जीवन में श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिए लक्ष्मी की साधना भी नितान्त आवश्यक है। जो इस सत्य को नहीं समझ सकते, वे जीवन में कुछ भी नहीं समझ सकते।
जो व्यक्ति जितना जल्दी इस तथ्य को समझ लेता है, वह इस बात को भी समझ लेता है, किजीवन में पूर्णता प्राप्त करने के लिए लक्ष्मी की आराधना, लक्ष्मी का सहयोग आवश्यक है और ऐसा ही व्यक्ति जीवन में सही अर्थों में पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकता है।
यह जरूरी नहीं है, कि कोई योगी, साधु, संन्यासी या साधक ही लक्ष्मी की साधना करे, लक्ष्मी की साधना तो कोई भी कर सकता है, चाहे पुरुष हो, चाहे स्त्री हो, चाहे बालक हो, चाहे वृद्ध हो, चाहे अमीर हो, चाहे गरीब हो कोई भी लक्ष्मी की साधना से ही जीवन में पूर्णता, सौभाग्य, सुख और सम्पन्नता प्राप्त कर सकता है।
चाहे हम रूद्र की साधना करें और चाहे हम ब्रह्मा की साधना करें, चाहे हम इन्द्र, मरुद्गण, यम और कुबेर की साधना करें, किन्तु वैभव और धन की अधिष्ठात्री देवी तो भगवती लक्ष्मी ही हैं, मात्र लक्ष्मी की साधना के माध्यम से ही व्यक्ति अपने अभावों को दूर कर सकता है,
पूर्वनों की गरीबी और निर्धनता को अपने जीवन से हटा सकता है, नीवनको आनन्ददायक बना सकता है, सम्पन्नता और वैभव का योग कर सकता है… और यदि लक्ष्मी की कृपा हो गई, तो वह सुकृत कार्य कर सकता है, मंदिर, धर्मशाला, तालाब, अस्पताल का करा सकता है और समाज सेवा के माध्यम से हजारों-लाखों लोगों का कल्याण कर सकता है।
भगवती लक्ष्मी की साधना से नहां व्यक्ति स्वयं अपने जीवन को श्रेष्ठ बना कर पूर्णता प्राप्त कर सकता है, वहीं समाज के बहुत बड़े वर्ग को सुख और सौभाग्य, आनन्द और मधुरता प्रदान करने का माध्यम बन सकता है। म
नुष्य जीवन में लक्ष्मी की कौन सी विशेष साधनाएं करे, जिससे उसके जीवन में लक्ष्मी का वास हो सके और दरिद्रता रूपी मैल को बाहर निकाल कर जीवन कान्तिमय बना सके, इसी क्रम में कुछ लघु प्रयोग दिए जा रहे हैं, जिनके बारे में आप कह सकते हैं देखन में छोटे लगें, पर कार्य करें गम्भीर’-
Lakshmi Sadhna paryog लक्ष्मी साधना प्रयोग नियम
शत अष्टोत्तरी महालक्ष्मी यंत्रः विशेष नियम साधना प्रारम्भ करने से पूर्व लक्ष्मी से सम्बन्धित कुछ विशिष्ट तथ्य जान लेने चाहिए-
१. महालक्ष्मी की साधना, मंत्र जप अथवा अनुष्ठान को अथवा किसी भी मास के शुक्ल पक्ष के किसी बुधवार से प्रारम्भ करें, तो ज्यादा उचित रहता है।
२. साधना प्रारम्भ करने से पूर्व यदि व्यक्ति महालक्ष्मी ‘दीक्षा’ प्राप्त कर ले, तो सफलता निश्चित हो प्राप्त होती है।
३. किसी भी प्रकार की भगवती महालक्ष्मी से सम्बन्धित साधना सम्पन्न करने के लिए ‘शत अष्टोत्तरी महालक्ष्मी यंत्र’ को स्थापित करने और उसके सामने साधना, उपासना या अनुष्ठान सम्पन्न करने से निश्चय ही सफलता प्राप्त होती है,
क्योंकि यह यंत्र अपने आप में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है, इसमें सहस्र लक्ष्मियों की स्थापना और उनका कीलन होता है, जिससे कि साधक के घर में स्थायित्व प्रदान करती हुई लक्ष्मी स्थापित होती है। यहां दिए तीन प्रयोगों की सामग्रियां इसी पद्धति से निर्मित हैं।
४. साधक साधना में कमल या गुलाब के पुष्प का प्रयोग पूजन के समय अवश्य करें।
५. ‘कमलगट्टे की माला से मंत्र जप करना ही ज्यादा उचित माना गया है।
६. इस प्रकार की साधना व्यक्ति अपने घर में या व्यापार स्थान में अकेले या पत्नी के साथ सम्पन्न कर सकता है। लक्ष्मी से सम्बन्धित तीन प्रयोग जो ऊपर वर्णित शत अष्टोत्तरी यंत्र पर ही आधारित है, स्पष्ट किए जा रहे हैं-
Lakshmi Sadhna paryog लक्ष्मी साधना प्रयोग विभिन कार्य सिद्धि के लिए
Lakshmi Sadhna paryog आपार धन प्रदायक लक्ष्मी साधना प्रयोग Ph.8528057364
१. Lakshmi Sadhna paryog लक्ष्मी साधना प्रयोग शीघ्र धन प्राप्ति के लिए
यह प्रयोग तांत्रोक्त नारियल पर आधारित है धनदायक प्रयोग है। लाल रंग के वस्व पर तांत्रोक्त नारियल’ के साथ ‘शतष्टोत्तरी महालक्ष्मी महायंत्र स्थापित करें, उसका संक्षिप्त पूजन कर निम्न ‘5 या देवि सर्वभूतेषु महालक्ष्मी रूपेण संस्थिता । || मंत्र का जप कमल गट्टे की माला से ५ (पांच) माला करें- ॥
ॐ ह्रीं श्रीं ऐश्वर्य महालक्ष्मी आजच्छ ॐ नमः ॥ Om Hreem Shreem Eishvarya Mahaalakshmi Aangachchh Om Namah मंत्र जप समाप्त कर अगले दिन समस्त सामग्री नदी में विसर्जित कर दें।
२. Lakshmi Sadhna paryog लक्ष्मी साधना प्रयोग मनोरथ पूर्ति के लिए ‘ऐश्वर्य महालक्ष्मी’
पर आधारित यह प्रयोग मनोरथ पूर्ति में सहायक है। साधक स्नानादि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें और किसी पात्र में ‘श्रीं’ बीज मंत्र कुंकुंम से लिखें, उस पर एक पुष्प रखें तथा पुष्प पर “शत अष्टोत्तरी महालक्ष्मी यंत्र स्थापित करें, गुरु का ध्यान कर निम्न मंत्र का ‘कमलगट्टे की 5 माला से ११ (ग्यारह) माला जप करें-
॥ ॐ श्रीं वांछितं साधय ऐश्वर्च देहि ही महालक्षम् ॐ नमः ॥ Om Shreem Vaanchhitam Saadhay Eishvaryam Dehi Hreem Mahaalakabmyei Om Namah जप समाप्त कर एक दिन बाद समस्त सामग्री को किसी नदी में विसर्जित करें।
३. Lakshmi Sadhna paryog लक्ष्मी साधना प्रयोग आकस्मिक धन लाभ के लिए
आकस्मिकधन लाभ का प्रयोग है, जिसे कोई भी व्यक्ति सम्पन्न कर सकता है। किसी पात्र में “शत अष्टोत्तरी महालक्ष्मी यंत्र स्थापित करें। अन, कुंकुम तथा पुष्प अर्पित कर यंत्र का पूजन करें। इस साधना में कमल गट्टे की माला की जगह प्रत्येक मंत्र का उच्चारण करते समय ‘कमल गट्टे के बीज’ यंत्र पर अर्पित करें। इस तरह मंत्र का उच्चारण करते हुए १०८ बीज अर्पित करते हैं। ॥
ॐ ह्रीं ह्रीं धनं देहि दापय ॐ नमः ॥ Om Hreem Hreem Dhanam Dehl Daapay Om Namah
प्रयोग के बाद यंत्र को लाल वस्त्र में लपेटकर पूजन स्थान में रख दें तथा कमल गट्टे के बीजों को नदी में प्रवाहित कर दें। इस यंत्र पर आप पांच बार ही प्रयोग सम्पन्न कर सकते हैं, किन्तु यह ध्यान रखें कि मंत्र जप के लिए हर बार नए कमल गट्टे के बीज लेने होंगे जो ‘श्री सूक्त के द्वारा चैतन्य किए गए हो। उसके पश्चात यंत्र नदी में विसर्जित कर दें।
इन तीनों प्रयोगों को आप एक ही दिन में प्रातः, मध्यात, सायं अथवा रात्रि अलग-अलग समय में भी सम्पन्न कर सकते हैं या किसी भी एक प्रयोग के बाद दस पन्द्रह मिनट का अन्तराल देकर दूसरे प्रयोग को प्रारम्भ कर सकते हैं। इन तीनों प्रयोगों के लिए निर्धारित दिवस है या किसी भी शुक्ल पक्ष का बुधवार।
Diwali Sadhana दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोगdiwali laxmi sadhana prayogPH.85280 57364
Diwali Sadhana दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग PH.85280 57364
Diwali Sadhana दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग PH.85280 57364 diwali laxmi sadhana prayog गुरु मंत्र साधना कॉम में स्वागत है आज हम दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर दिवाली Diwali पर किए जाने वाले 108 प्रयोग आप के समक्ष रखेंगे। यह प्रयोग आप की ज़िंदगी की हर समस्या को दूर करेंगे आप यह पोस्ट अंत तक पढ़े।
लक्ष्मी का अर्थ हमारे शास्त्रों में केवल मात्र धन से ही सम्बन्धित नहीं है, अपितु जीवन के विविध आयाम् धन- धान्य, गृहस्थ, आरोग्य, शांति, पुत्र, पौत्र, शत्रु विनाश, यश, समृद्धि, प्रतिष्ठा, भवन से भी है। यही कारण है, कि लक्ष्मी को अनेकानेक नामों से सम्बोधित किया गया है और उनके प्रत्येक स्वरूप का पूजन भी वर्णित किया गया है।
दीपावली Diwali Diwali का पर्व महालक्ष्मी की साधना का पर्व है, इस अवसर पर लक्ष्मी के ही विभिन्न स्वरूपों से सम्बन्धित प्रयोग प्रस्तुत हैं, जिन्हें सम्पन्न कर आप अवश्य ही लाभ प्राप्त कर सकेंगे और अपने जीवन की समस्याओं को इन लघु प्रयोगों के माध्यम से समाप्त कर सकेंगे।
इन प्रयोगों को आप दीपावली Diwali Diwali diwali laxmi sadhana prayog से पूर्व इन प्रयोगों को आरम्भ करने से पूर्व साधक संक्षिप्त रूप से गुरु-पूजन अवश्य करें, यदि आपने दीक्षा न भी ली हो तो भी मानसिक रूप से गुरु का पूजन कर प्रयोग सम्पन्न करें। इन प्रयोगों को अत्यन्त शुद्धता और पवित्रता के साथ सम्पन्न करें, प्रयोग करते समय मन में कुविचार, अश्रद्धा, आदि भाव न लाएं। दिवाली Diwali साधना
१. भगवती लक्ष्मी के धनप्रदायक diwali laxmi sadhana prayog
भगवती लक्ष्मी के धनप्रदायक स्वरूप को ‘श्री’ नाम से सम्बोधित किया गया है। दीपावली Diwali Diwali के दिवस पर लाल रंग का वस्त्र बिछा कर पीले पुष्प के आसन पर ‘श्री चक्र’ स्थापित कर पूजन करें। फिर निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें ।। ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं नमः // Om Hreem Shreem Hreem Namah यह प्रयोग दीपावली Diwali Diwali के दिन आप कभी भी प्रातः, सायं या मध्यरात्रि में करें, आधी रात में ही ‘श्री चक्र’ को वस्त्र में बांधकर तिजोरी में रख दें, ग्यारह दिन के पश्चात इसे नदी में प्रवाहित कर दें। आकस्मिक धन की प्राप्ति होती है।
२. आकर्षक शरीर की प्राप्ति के लिए diwali laxmi sadhana prayog
साधक या साधिका रूप चतुर्दशी के दिन ‘पद्मा’ को अपने दाहिने हाथ में लेकर सिर, दोनों नेत्र, दोनों कान, मुख, गले, हृदय, उदर, दोनों हाथ, नाभि, जंघा, पैर पर क्रम से स्पर्श करते हुए ग्यारह ग्यारह बार निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
।। ॐ ह्रीं पद्मे आगच्छ नमः ॥ Om Hreem Padme Aagachh Namah प्रयोग समाप्त होने पर ‘पद्मा’ को निर्जन स्थान पर फेंक अधिक या साधिका की देह आकर्षक बनेगी। दिवाली Diwali साधना मंत्र
३. ‘हल्ट हकीक’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन पूजन कर धारण से कितना भी मानसिक तनाव हो, वह धीरे-धीरे समाप्त हो। है, सवा माह के बाद हल्ट हकीक को नदी में प्रवाहित कर दें।
४. विद्या प्राप्ति में कठिनाई आ रही हो, तो diwali laxmi sadhana prayog
विद्या प्राप्ति में कठिनाई आ रही हो, तो diwali laxmi sadhana prayog साधक बली के दिन एक पेंसिल, जिससे बच्चा लिखता हो, को सफेद मैं बांधकर निम्न मंत्र का २१ बार जप करें- ॥ ॐ ऐं क्रीं ऐं ॐ ॥ Om Ayeim Kreem Ayeim Om मंत्र जप नित्य करें, फिर को बच्चे उसी पेंसिल से उपरोक्त मंत्र तीन बार लिखाएं। पेंसिल को क्षत रखें। दिवाली Diwali पर साधना
५. साधक में कार्य करने की शक्ति न्यून होती जा रही हैं। कार्य आरम्भ तो करता है, लेकिन कोई भी कार्य पूरा नहीं कर है, तो साधक यह प्रयोग सम्पन्न करें। दीपावली Diwali Diwali के दिन किसी पात्र में ‘ईप्सा’ रखकर उसका न करें, घी का दीपक लगा दें, निम्न मंत्र का जप १८ दिन तक २१ बार करें- ॥ ॐ ऐं तेजस् सिद्धिं क्लीं ॐ फट् ॥ Om Ayeim Teijas Siddhim Kleem Om Phat
६. ‘अनौपम्या’ को लाल वस्त्र में बांधकर घर के उत्तर में रखने से घर में शांति का वातावरण बनता है। सवा माह के ‘अनौपम्या’ को नदी में प्रवाहित कर दें। –
७. यदि आप बरोजगार हैं और आपको कार्य की तत्क्षण चश्यकता है, तो ‘त्रिविधा’ को अपने दाहिने हाथ में लेकर प्रातः ७ बजे तथा सायं ७ बजे निम्न मंत्र का २१ बार जप करें- ॥ ॐ ह्रीं कार्य सिद्धिं ॐ नमः ॥ Om Hreem Kaarya Siddhim Om Namah. यह प्रयोग नौ दिन तक करें, शीघ्र ही मार्ग मिलेगा तथा प्रयोग के बाद त्रिविधा किसी मन्दिर में चढ़ा दें।
८. यदि आप अपने वर्तमान कार्यक्षेत्र से सन्तुष्ट नहीं है और उसे बदलना चाहते हैं, लेकिन कोई उपयुक्त अवसर नहीं मिल रहा है, तो किसी पात्र में चावल भर कर उसमें ‘सुरेश्वरी’ स्थापित कर दें, नित्य पांच दिन तक ४१ बार निम्न मंत्र का जप करें- ॥ ॐ ऐं ह ह्रीं फट् ॥ Om Ayeim Hasfrem Hreem Phat पांचवें दिन सुरेश्वरी को नदी में या निर्जन स्थान में प्रवाहित कर दें।
९. घर में कितना धान्यादि लाकर रख दिया जाय, किन्तु फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वह कम ही रहे, जिसके कारण सदैव तनाव सा व्याप्त रहे, तो ऐसे स्थिति से निपटने के लिए ‘महाधात्री’ को किसी पात्र में गुलाब के पुष्प की पखड़ियों का आसन बनाकर स्थापित करें, महाधात्री का पूजन अष्टगंध तथा चावल से करें। उसके समक्ष घी का दीपक लगाकर नित्य ४५ मिनट मंत्र का उच्चारण करें- ॥ ॐ ह्रीं धनमानव आबद्ध सिद्धिं ॐ फट् ॥ Om Hreem Dhanmaanay Aabaddh Siddhim Om Phat यह प्रयोग पांच दिन तक करें, पांचवें दिन ‘महाधात्री’ को घर के भण्डार गृह में रख दें। सवा माह के बाद महाघात्री को नदी में प्रवाहित कर दें।
१०. धन के निरन्तर आगमन के लिए किसी पात्र में कुंकुंम से अष्टदल कमल का निर्माण कर ‘प्रमोदा’ को स्थापित कर उस पर कमल के पांच पुष्प चढ़ाएं, घी का दीपक लगाकर निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें- ।। ॐ श्रीं श्रीं महाधनं देहि ॐ नमः ॥ Om Shreem Shreem Mahaadhanam Dehi Om Namah यह प्रयोग सात दिन तक करें, सातवें दिन ‘प्रमोदा’ को नदी में प्रवाहित कर दें।
११. महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए diwali laxmi sadhana prayog
किसी पात्र में पाच गुलाब के पुष्प रखकर ‘ईश्वरी’ को स्थापित करें, घी का | दीपक लगाकर ईश्वरी का पूजन करें, निम्न मंत्र का जप ३५ बार ६ दिन तक करें- ॥ ॐ ह्रीं श्रियं देहि महालक्ष्मी आगच्छ ॥ Om Hreem Shriyam Dehi Mahaalakshmee Aagachh छह दिनों के पश्चात ईश्वरी को नदी में प्रवाहित कर दें।
१२. यश, सम्मान की प्राप्ति के लिए diwali laxmi sadhana prayog
यश, सम्मान की प्राप्ति के लिए साधक धनत्रयो को स्नान कर ‘महिमा’ को अपने आज्ञा चक्र (दोनों भौहों के मध्य) रखते हुए निम्न मंत्र का जप ६५ बार करें – ॥ ॐ ऐं कीर्ति ऋद्धिं देहि देहि ॐ ॥ Om Ayeim Keertim Riddhim Debi Dehi Om यह प्रयोग भाई दूज तक करें, भाई दूज के दिन ‘महिमा’ क नदी में प्रवाहित कर दें।
१३. वस्तु सम्बन्धी व्यापार की वृद्धि के लिए diwali laxmi sadhana prayog
साधक को चाहिए , कि पांच घी के दीपक लगाकर मध्य में पुष्प के आस- पर ‘ऋद्धि’ स्थापित करें, खड़े हो ‘कमलगट्टे की माला’ से निम्न मंत्र की तीन माला मंत्र जप करें- ॥ ॐ ह्रीं ऐं व्यापार वृद्धिं ॐ नमः ॥ Om Hreem Ayeim Vyaapaar Vriddhim Om Namah जप के उपरान्त माला ‘ऋद्धि’ के ऊपर रख दें, यह प्रयोग तीन दिन तक करें। पांच दिन के बाद ‘ऋद्धि’ तथा ‘माला’ नदी में प्रवाहित कर दें। दीपावली Diwali Diwali साधना में
१४. मशीन सम्बन्धी व्यापार की वृद्धि के लिए साधक को चाहिए, कि मसूर की दाल से एक लाइन में सात ढेरियां बनाएं… सातों ढेरियों पर एक-एक पान का पत्ता तथा लौंग रख दें, तेल का दीपक लगा दें, धूप लगा दें। ‘अक्षया’ को मध्य की ढेरी पर स्थापित कर निम्न मंत्र का ३१ बार जप करें। ॥ ॐ वं विश्वकर्मा आजन्म साधव ॐ ॥ Om Vam Vishwakarmaa Aagachh Saadhay Om यह प्रयोग नौ दिन का है, नौ दिन के बाद ‘अक्षया’ को अपने व्यापार स्थल में स्थापित कर दें, सवा माह के पश्चात अक्षया को नदी में प्रवाहित कर दें।
१५. चिकित्सा के व्यवसाय में सफलता के लिए हरे रंग के वस्त्र में ‘वीर्हमाना’ बांध दें, उसे चिकित्सा सम्बन्धी व्यवसाय में ऐसे स्थान पर रखें जहां सिर्फ आप देख सकें, नित्य ‘वीर्हमाना’ पर एक लाल पुष्प चढ़ा कर निम्न मंत्र का जप २० दिन तक केवल ग्यारह बार करने से चिकित्सा के व्यवसाय में सफलता मिलेगी- ॥ ॐ ह्रीं ह्रीं हां हः ॐ नमः ॥ Om Hreem Hroum Hraam Hrah Om Namah २१ दिन के बाद वीईमाना को नदी में विसर्जित कर दें। दीपावली Diwali Diwali साधना में
१६. व्यापार खोलने के लिए अक्सर यह सुनने में आता है, कि दुश्मनी वश या स्वार्थ वश लोग एक दूसरे का व्यापार बांध देते हैं, जिसका सामना व्यापारी वर्ग को अक्सर करना पड़ता है। ऐसे टोटकों को समाप्त करने के लिए लाल रंग का वस्त्र बिछाकर हल्दी से त्रिभुज बनाकर उसके प्रत्येक कोण में एक-एक पुष्प रखें। एक पात्र में स्वस्तिक का निर्माण कर ‘नित्या’ उसके ऊपर रखें। ‘नित्या’ का संक्षिप्त पूजन कर, त्रिभुज में रखें प्रत्येक पुष्प पर अपना दाहिना हाथ रखते हुए निम्न मंत्र का २१-२१ बार जप करें- ॥ ॐ ह्रीं व्यापार बाधा निवारणाय फट् // Om Hreem Vyaapaar Baadhaa Nivarannaay Phat मंत्र जप पूर्ण होने पर पुष्प तोड़कर नित्या पर चढ़ा दें। इस प्रकार जब आखिरी पुष्प भी चढ़ जाए, तो नित्या तथा समस्त पुष्प की पंखुड़ियों को सावधानी पूर्वक श्मशान घाट में फेंक दें। #दीपावली Diwali Diwali साधनामें
१७. यदि घर का कोई सदस्य क्रोध में अधिक रहने लगा है और उचित या अनुचित बात का निर्णय किए बगैर सबका अपमान करने लगा है, तो साधक यह प्रयोग अपनाएं। जो क्रोध करता हो का नाम सफेद रंग के वस्त्र पर कुंकुंम से लिखकर उसमें ‘जवाला’ को रख कर बांध दें तथा उसे किसी भी वृक्ष पर निम्न मंत्र का ५१ बार जप करते हुए टांग दें – ॥ ॐ क्रीं क्रोषं संहरय वशव ॐ फट् ॥ Om Kreem Krodham Sanharay Vashay Om Phat
Diwali Sadhana दिवाली Diwali के शुभ अवसर पर १०८ तंत्र साधना प्रयोग PH.85280 57364
१८.ग्राहक दुकान की ओर आकर्षिन लाल रंग के वस्त्र में अष्टगंध से ‘श्री’ लिखें, फिर उसमें ‘त्रिधा’ को बांध कर दुकान के बाहर टांगने से ग्राहक दुकान की ओर आकर्षित होगा। तीन माह बाद त्रिघा को नदी में विसर्जित कर दें।
१९. स्वयं के व्यक्तित्व में विशेषता लाने के लिए ‘सूक्ष्मा’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन धारण कर लें, नित्य प्रातः स्नान करते हुए | निम्न मंत्र का जप करते हुए स्नान करें। ॥ ॐ श्रीं ई ब्रिवं साधव फट् // Om Shreem Eem Shriyam Saadhay Phat ग्यारह दिन के बाद ‘सूक्ष्मा’ को नदी में प्रवाहित कर दें।
२०. यदि शत्रु अत्यधिक हावी हो रहा है, तो साधक यह प्रयोग सम्पन्न करें। यम द्वितीया के दिन रात्रि नौ बजे के बाद पांच कोयले रखकर ‘महेसरी’ रख दें, तीन दिन तक निम्न मंत्र का जप १०१ बार करें- ॥ ॐ क्लीं ह्रीं ऐं शत्रुनाशाय फट् // Om Kleem Hreem Ayeim Shatrunaashaay Phat जप के पश्चात रात में ही कोयले सहित ‘महेसरी’ को निर्जन स्थान में फेंक दें।
२१. ‘जगजयेष्ठा’ को घर में सफेद रंग के वस्त्र में बांधकर उसे घर की उत्तर दिशा में रख देने से घर में हो रहा कलह में शांति आएगी।
२२. धन की प्राप्ति हेतु या आकस्मिक धन के आगमन के लिए ‘जगजयेष्ठा’ को निम्न मंत्र का ५१ बार उच्चारण कर धारण कर लें – ॥ ॐ ह्रीं हुं फट् ॥ Om Hreem Hum Ayeim Phat यह प्रयोग तीन दिन तक करें, तीन दिन के बाद जगजयेष्ठा को निर्जन स्थान में फेंक दें।
२३. यदि आपका बच्चा बहुत अधिक झूठ बोलने लगा है और समझाने पर भी नहीं समझे, तो उसे दीवाली के दिन ‘सत्या’ पहना दें तथा नित्य आप उसके नाम का संकल्प लेकर २१ बार निम्न मंत्र का जप करें- ॥ ॐ फ्रें फ्रें हूं फट् // Om Frem Frem Hoom Phat २१ दिन के बाद सत्या को नदी में प्रवाहित कर दें।
२४. यदि आपका पुत्र गलत कार्यों में फंस कर घर से विमुख होता जा रहा है, तो उसे गलत कार्यों से उबरने के लिए, तो मानसिक संबल प्रदान करें ही, साथ ही यह प्रयोग भी करें। मिट्टी को गूंथ कर पांच ढेरियां बनाकर मध्य में ‘अपर्णा’ रख दें, अपर्णा का सिन्दूर से पूजन करें, अपने पुत्र का फोटो भी रख दें। बाकी चारों ढेरियों पर क्रमशः प्रत्येक ढेरी पर निम्न मंत्र का ३१ बार उच्चारण करते हुए सिन्दूर की बिंदी लगाएं- ॥ ॐ ऐं सौः ह्रीं ॐ // Om Ayeim Souh Hreem On मंत्र जप कर अपने पुत्र का फोटो उठाकर रख दें तथा बाकी चारों ढेरियों व अपर्णा को निम्न मंत्र का जप करते हुए क्रोधयुक्त हो दक्षिण दिशा में फेंक दें।
२५. ‘क्रिया योग’ भी भगवती लक्ष्मी का ही एक स्वरूप है, साधक भगवती की कृपा से ही आध्यात्मिक जीवन में उन्नति कर सकता है। साधक नित्य प्रातः निम्न मंत्र का दस मिनट जप कर ध्यान करें, तो निश्चय ही उसे सफलता मिलेगी। ॥ ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं ग्लों ॐ फट् ॥ Om Shreem Hreem Hleem Gloum Om Phat
२६. ‘सम्पूर्णा’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन धारण करें, साधक का व्यक्तित्व उसकी दृष्टि से पूर्णता प्राप्त करता है। सवा माह तक उसको धारण करने के पश्चात सम्पूर्णा नदी में प्रवाहित कर दें।
२७. घर से मन उचाट हो रहा है और मानसिक रूप से व्यक्ति व्यथित ज्यादा रहने लगा हो, तो ‘शुद्ध’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन लाल रंग के वस्त्र में निम्न मंत्र का ५१ बार उच्चारण कर बांध दें तथा उसे पूजन स्थान में रख दें तथा नित्य उसे देखते हुए मंत्र का जप करें- ॥ ॐ मं तच कुछ कुछ ॐ ॥ Om Mam Manas Cheitanyam Kuru Kuru Om यह प्रयोग सात दिन तक करें, सात दिन के बाद ‘शुद्ध’ अपने बगीचे में दबा दें या किसी मन्दिर में चढ़ा दें। धीरे
२८. यदि पति या पत्नी का आकर्षण एक दूसरे से कम होता जा रहा है, तो उनके मध्य आकर्षण बढ़ाने के लिए एक पात्र में कुंकुंम से स्वस्तिक का निर्माण कर ‘आकर्षिणी’ स्थापित कर दें। उस पर कुंकुंम से पति तथा पत्नी के नाम का प्रथम अक्षर लिखें। उस पर प्रथम दिन लाल रंग के २१ पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप करें, दूसरे दिन पीले रंग के
२१ पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र जप करें तथा तीसरे दिन सफेद रंग के २१ पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप करें- ॥ ॐ ह्रीं मोहिते आकर्षय नमः स्वाहा ॥ Om Hreem Mohite Aakarshay Namah Swaahaa नित्य पुष्पों को एकत्र कर किसी मन्दिर में चढ़ा दें। तीसरे दिन पुष्पों के साथ ही ‘आकर्षिणी’ को मन्दिर में चढ़ा दें।
२९. यदि साधक भवन खरीदना चाहता है, वह भवन को खरीदने की सारी औपचारिकताएं भी सम्पूर्ण कर लेता है, फिर भी किसी न किसी कारण से वह भवन खरीद नहीं पाता है, तो साधक ‘वसुधा लक्ष्मी यंत्र’ को लाल रंग के वस्त्र पर स्थापित कर यंत्र का पूजन करें, घी के तीन दीपक लगा दें तथा निम्न मंत्र का जप २१ बार कर यंत्र पर एक बिन्दी लगा दें। इस प्रकार यह क्रम तीन बार दोहराएं जब तीन बिन्दी लग जाए, तो व्यक्ति जिस भवन को खरीदना चाहता है। वहां पर यंत्र पर लगा कुंकुंम गिरा दें- ॥ ॐ ह्रीं वसुधालम्बे नमः ॥ Om Hreem Vasudhaa-lakshmyei Namah प्रयोग के बाद यंत्र नदी में प्रवाहित कर दें। “
३०. यदि भूमि खरीदी हुई है, लेकिन उस पर भवन निर्माण का कार्य हो पाना असम्भव लग रहा है, तो साधक भूमि के मध्य में ‘वसुधा लक्ष्मी यंत्र’ को एक हाथ भर गड्ढा खोदकर अपने हाथों से दीपावली Diwali Diwali के दिन स्थापित कर दें।
३१. यदि भवन आधा बन कर रुका हुआ है, तो साधक किसी पात्र में ‘वसुमती’ स्थापित कर उस पर जल चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप १०१ बार करके, जल भवन में छिड़क दें- ॥ ॐ श्री ही कार्य सिद्धि ॐ नमः ॥ Om Ayeim Shreem Hreem Kaarya Siddhim Om Namah यह प्रयोग ९ दिन तक करें, नौ दिन के बाद ‘वसुमती’ को नदी में प्रवाहित कर दें।
३२. शत्रुओं को निष्प्रभावी करने के लिए समाज में जो व्यक्ति उन्नति की ओर अग्रसर होता है। ★ धीरे-धीरे उसके शत्रु बढ़ते ही जाते हैं, कुछ तो स्वार्थवश होते हैं, कु ईर्ष्याग्रस्त लोग होते हैं, ऐसे शत्रुओं को निष्प्रभावी करने के लि ‘धूमाग्र’ को किसी पात्र में स्थापित कर उसका पूजन करें, धूमाना के समक्ष निम्न मंत्र का ३१ बार जप करें- ॥ ॐ हूं हूं शत्रुस्तंभनं ठः ठः स्वाहा ॥ Om Hroom Hroom Shatrustambhanam Tthah Tthah Swash जय समाप्त कर धूमाग्र को लाल वस्त्र में बांध कर रख दें। यह प्रयोग सात दिन तक करें। सात दिन के बाद धूमाग्र को ला वस्त्र में बांध कर नदी में प्रवाहित कर दें।
३३. शत्रु मुकदमों को बढ़ता ही जा रहा है और पिछले वर्षों से चले आ रहे मुकदमे का निर्णय होना निश्चित नहीं लग रहा है ‘धूमाग्र’ पर काजल से अपने शत्रु विशेष या समस्त शत्रु लिखकर नि मंत्र का उच्चारण ग्यारह बार पांच दिन तक नित्य करें- ॥ ॐ हूं शत्रून् वशय विजय सिद्धिं ॐ फट् । Om Hroom Shatroon Vashay Vijay Siddhim Om Phat पांच दिन के बाद धूमाग्र को नदी में प्रवाहित कर दें।
३४. आपके कार्यों का निरन्तर विरोध हो रहा हो औ आपको समझ में नहीं आ रहा है, कि यह विरोधी कौन है तो प्रयोग सम्पन्न करें। किसी थाली में कोयले का चूरा कर बिछा उस पर ‘कालिका’ स्थापित करें, कालिका का पूजन सिन्दूर तक लाल पुष्प से पूजन करें, निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें- क न ॥ ॐ क्लीं कालि शत्रु शमनं कुरु कुरु फट् // Om Kleem Kaali Shatru-shamanam Kuru Kuru Phat यह प्रयोग ३ दिन तक करें, तीन दिन के बाद ‘कालि को निर्जन स्थान में फेंक दें।
३५.सन्तान सुख प्राप्त दीपावली Diwali Diwali के दिन ‘भ्रमराम्बा’ को लाल पुष्प के ऊप स्थापित करें, भ्रमराम्बा का पूजन कुंकुंम, अक्षत तथा पुष्प से क भ्रमराम्बा पर कुंकुंम से रंगे हुए चावल मिलाकर चढ़ाते हुए निम् मंत्र का ६५ बार जप करें- – ॥ ॐ नमो भगवते पुत्र सुखं साधय कुरु कुरु नमः Om Namo Bhagwate Putra Sukham Saadhay Kuru Kuru Nam यह प्रयोग म्यारह दिन तक करें, ग्यारह दिन के बाद भ्रमराम को नदी में प्रवाहित कर दें। सन्तान सुख प्राप्त होता है।
३६. पुत्र की प्राप्ति के लिए साधक ‘सिद्धि गुटिका’ लेकर पत्नी के नाम से संकल्पित कर, पत्नी को धारण करा दें त नित्य स्वयं तथा आपकी पत्नी निम्न मंत्र का जप ५१-५१ बार करें- ॥ ॐ श्रीं सोभाग्य वृद्धिं कुरु कुरु ॐ नमः ॥ – Om Shreem Soubhaagya Vriddhim Kuru Kuru Om Namah २१ दिन के बाद सिद्धि गुटिका नदी में प्रवाहित कर दें।
३७. यदि सन्तान अनियंत्रित हो, तो ‘सिद्धि गुटिका’ के निम्न मंत्र का ७५ बार जप कर सन्तान की फोटो के साथ बांध कर रख दें- ॥ ॐ ह्रीं ज्वालामालिनि पुत्रं वशय आकर्षण ॐ नमः ॥ Om Hreem Jwaalaamaalini Putram Vashay Aakarshann Om Namah यह प्रयोग दीपावली Diwali Diwali के दिन करें। २१ दिन के बाद पुनः एक बार ७५ बार जप कर लें। उसके पश्चात सिद्धि गुटिका नदी में प्रवाहित कर दें।
३८. यदि आप सौन्दर्यवान बनना चाहते हैं, तो रूप चतुर्दशी के दिन ‘सौन्दर्या’ को किसी पात्र में स्थापित कर उस पर जल चढ़ाते हुए, निम्न मंत्र का १५ मिनट तक जप करें, तथा उस जल को अपने ऊपर छिड़क लें- ।। ॐ श्रीं कृष्ण सौन्दर्य सिद्धिं ॐ नमः ॥ Om Shreem Krishana Soundarya Siddhim Om Namah इस प्रकार यह प्रयोग ९ दिन तक करें, ९ दिन बाद गुटिका नदी में प्रवाहित कर दें।
३९. सौन्दर्ययुक्त होने प्रत्येक स्त्री का स्वप्न होता है, कि वह सौन्दर्ययुक्त व बनी रहे, लेकिन इस प्रदूषण युक्त, तनाव युक्त वातावरण में यह सम्भव नहीं हो पाता, लेकिन इस प्रयोग के माध्यम से स्त्री अपने सौन्दर्य को बनाकर रखने में समर्थ हो सकती है। ‘अप्सरा सौन्दर्य प्राप्ति गुटिका’ को अपने दाहिने हाथ में लेकर दाहिना हाथ सीधा रखें, टिका पर दृष्टिपात करते हुए निम्न मंत्र का ६१ बार जप करें- ॥ ॐ ह्रीं सः सूर्याब सौन्दर्य देहि स्वाहा ॥ Om Hreem Sah Sooryaay Soundarya Dehi Swaahan यह प्रयोग सात दिन तक करें, सात दिन के बाद अप्सरा सौन्दर्य गुटिका को जल में प्रवाहित कर दें। यह प्रयोग करते समय एक समय भोजन करें।
४०. पूरे शरीर को निश्चित अनुपात में ढालने के लिए यह प्रयोग सम्पन्न करें। ‘इन्द्रेश’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन धारण कर लें तथा नित्य निम्न मंत्र का वज्रासन में बैठकर १०१ बार जप करें-॥ ॐ ह्रीं अमृते अमृत कल्पं साधव ॐ फट् ॥ Om Hreem Amrite Amrit Kalpam Saadhay Om Phat यह प्रयोग ग्यारह दिन तक करें, ग्यारह दिन के बाद इन्द्रेश को नदी में प्रवाहित कर दें।
४१. कमल के बीज से निम्न मंत्र का जप करते हुए घी के ‘साथ १०१ आहुतियां देने से साधक की प्रत्येक कामना पूर्ण होती है। ॥ ॐ क्लीं चामुण्डे मनोवाति कुरु कुरु कट् ॥ Om Kleem Chaamunde Manovaanchhitam Kuru Kuru Phat
४२. विशेष कामना की पूर्ति के लिए किसी पात्र में ‘विधात्री’ स्थापित कर उसका पूजन करें, विधात्री पर तिल तथा जौ चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप ७५ बार करने से विशेष कामना की पूर्ति होती है- ॥ ॐ कं कामदेवाय मनोवांछित साधय ॐ फट् ॥ Om Kam Kaamdevaay Manovaanchhit Saadhay Om Phat यह प्रयोग तीन दिन तक करें। तीन दिन के बाद विधात्री को नदी में प्रवाहित कर दें, तिल तथा जौ एकत्र कर किसी को दान में दें।
४३. विभवासु को लाल रंग के वस्त्र में बांध कर किसी वृक्ष में लटका देने से स्वयं के ऊपर आई विपत्तियां समाप्त होती है।
४४. ‘सामुधा’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन अपने सिर पर से निम्न मंत्र का जप करते हुए ग्यारह बार घुमा कर दक्षिण दिशा में फेंक देने से रोगों से मुक्ति मिलती है। ॥ ॐ क्लीं आपदुद्धरणाव फट् ॥ Om Kleem Aapaduddharannaay Phat
४५. ग्रह बाधा के कारण जीवन में सफलता नहीं मिल पा रही है तो ‘सौशिल्य’ को किसी पात्र में स्थापित कर उसका पूजन कुंकुम, अक्षत, पुष्प से पूजन करें, निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें- ॥ ॐ जूं सः ग्रह बाधा निवारणाय फट् // Om Jum Sah Graha Basdhaa Nivaarannaay Phat यह प्रयोग सात दिन तक करें, सात दिन के बाद ‘सौशिल्य’ को नदी में प्रवाहित कर दें।
४६. शनि, राहु, मंगल ग्रह विपरीत प्रभाव दिखाने वाले हैं, तो साधक को चाहिए किसी पात्र में चावल भरकर उसमें ‘सौशिल्य’ स्थापित कर दें, सौशिल्य का पूजन अष्टगंध, लाल पुष्प से करें, जिस ग्रह विशेष के लिए प्रयोग कर रहे हैं, उसकी शांति के लिए संकल्प लें- ‘मैं ( ग्रह का नाम) की शांति के लिए यह प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूं। निम्न मंत्र का जप ७५ बार करें ॥ ॐ शं ग्रह दोष नाशय फट् ॥ Om Sham Grah Dosh Naashay Phat यह प्रयोग ११ दिन तक करें, ग्यारह दिन के बाद सौशिल्य को नदी में प्रवाहित कर दें।
४७. मानसिक तनाव को दूर करने के लिए ‘शुद्धक’ को धारण कर लें, नित्य प्रातः ६ बजे से ६.३० तक ध्यान लगाएं, मानसिक तनाव तो समाप्त होगा ही, साथ ही समस्याओं का हल भी मिलेगा। सवा महीने बाद शुद्धक को नदी में प्रवाहित कर दें।
४८. जो अध्यात्म की उच्चता को धारण करना चाहता है और निरन्तर इसी प्रयास में संलग्न है, तो उसे यह प्रयोग अवश्य करना चाहिए। सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर कुंकुंम से स्वस्तिक का निर्माण कर उस पर ‘क्रिया योग्या’ स्थापित करें, इसका पूजन कर घी का दीपक लगा दें, दीपक की लौ पर त्राटक करते हुए निम्न मंत्र का जप आधे घण्टे तक करें- दा ॥ ॐ ह्रीं श्रीं ऐं क्रिवायोग्या सिद्धिं ॐ नमः ॥ Om Hreem Shreem Ayeim Kriyaayogyaa Siddhim Om Namah यह प्रयोग ग्यारह दिन तक करें, ग्यारह दिन के बाद क्रियायोग्या को नदी में प्रवाहित कर दें, दीपक की लौ पर नित्य त्राटक कर मंत्र जप करते रहें।
४९. ‘अमृतस्यन्दिनी’ को दीपावली Diwali Diwali के दिन अपने। स्थान में स्थापित कर, नित्य उस पर त्राटक करते हुए गुरु मंत्र का जप करने से साधक का कल्याण होता है। तीन महीने बाद अमृतस्यन्दिनी नदी में विसर्जित कर दें।
५०. ‘रतिम्भरा यंत्र’ को पूजन स्थान में रखने मात्र से ही साधक के घर में बुद्धि, विद्या, श्री का वास होता है। यंत्र स्थापन के तीन माह के पश्चात यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें। साधना सामग्री
५१. लाल रंग के वस्त्र पर ‘सर्वाभिलाषा पूर्णेच्छु यंत्र को स्थापित कर यंत्र का पूजन सुगंधित द्रव्य तथा पुष्प से करें, सुगंधित अगरबती लगाकर निम्न मंत्र का जप ११ दिन तक नित्य २१ बार करने से साधक को यौवन, सौन्दर्य, उमंग उत्साह की प्राप्ति होती है। ॥ ॐ ह्रीं सः सोन्दर्य सः ह्रीं ॐ ॥ Om Hreem Sab Soundaryam Sah Hreem Om ग्यारह दिन के बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें।
५२. विवाह योग्य कन्या का शीघ्र विवाह हेतु किसी पात्र में अष्टगंध से षट्कोण बनाकर ‘सर्वाधारा यंत्र’ को स्थापित करें। यंत्र का पूजन करें, यंत्र पर दृष्टि एकाग्र करते हुए निम्न मंत्र का जप ६५ बार करें- ॥ ॐ क्लीं विवाह सिद्धिं ॐ ऐं फट् ॥ Om Kleem Vivaah Siddhim Om Ayeim Phat विवाह योग्य कन्या का शीघ्र विवाह होगा। यह प्रयोग पांच दिन का है, प्रयोग के समय कन्या का फोटो भी सामने रखें। प्रयोग समाप्त कर यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें।
५३. सफेद वस्त्र पर ‘सहस्राणी’ स्थापित कर, उसका पूजन कुंकुंम, अक्षत तथा पुष्प से करने से स्त्री सौभाग्यशाली होती. है। सहस्राणी के समक्ष मात्र ११ बार निम्न मंत्र का उच्चारण करें- ॥ ॐ श्रीं श्रीं सोभाग्यं सिद्धबे ॐ नमः ॥ Om Shreem Shreem Soubhaagyam Siddhaye Om Namah सवा माह के पश्चात सहस्राणी को नदी में प्रवाहित कर दें।।
५४. ‘सुख सौभाग्य यंत्र’ को बायें हाथ में लेकर उसे दाहिने हाथ से ढकते हुए निम्न मंत्र का ३१ बार उच्चारण करने से स्त्री अनेकानेक गुणों से युक्त होती है- ॥ ॐ ऐं आं सुगुणं आं ऐं फट् ॥ Om Ayeim Aam Sugunnam Aam Ayeim Phat यह प्रयोग ११ दिन का है। ग्यारह दिन के बाद यंत्र को नदी में विसर्जित कर दें।
५५. ‘कमल गट्टे की माला’ से निम्न मंत्र का एक माला जप दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके करें, अष्टगंध का तिलक लगाएं, फिर वह साधक अपने आस-पास रहने वाले लोगों को सम्मोहि सा कर लेता है। यह प्रयोग पांच दिन तक करें- ॥ ॐ सं सर्व सम्मोहनाव फट् ॥ Om Sam Sarva Sammohanany Phat पांच दिन बाद माला नदी में प्रवाहित कर दें।
५६. यदि पत्नी अत्यधिक कलहकारिणी हो गई हो तथा वश में न आये, तो साधक धनत्रयोदशी को पांच तेल के दीपक अपने चारों ओर लगा दें तथा मध्य में स्वयं खड़ा होकर निम्न मंत्र की ‘कमलगट्टे की माला’ से पांच माला जप करें- ॥ॐ हूँ फट् ॥ Om Kleem Hroom Streem Phat स्त्री का स्वभाव परिवर्तित होता है तथा वह पति के अनुसार चलती है, मंत्र जप कर माला तोड़कर उसके दानें घर से बाहर चारों दिशाओं में फेंक दें।
५७. यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक विपरीत बोलने ल हो तथा समझाने पर भी नियंत्रण में न आये, तो आक के पत्ते पर हल्दी से उस व्यक्ति का नाम लिख, निम्न मंत्र का जप ‘काली हकीक माला’ से सात माला कर, पत्ते सहित माला को किसी भी वृक्ष की जड़ में दबा दें। व्यक्ति आपके विरुद्ध फिर नहीं बोलेगा। ॥ ॐ ह्रीं श्रीं फट् ॥ Om Hreem Bhreem Hrum Phat
५८. यदि पति पत्नी से विमुख हो रहा है और उसका ध्यान घर से कहीं और लग रहा है, तो स्त्री निम्न जप करते हुए भोजन करे, पति का पुन: पत्नी की ओर आकर्षण होगा। ॥ ॐ ह्रीं ठः ठः ह्रीं ॐ ॥ Om Hreem Tthah Tthab Hreem Om
५९. जिस व्यक्ति को क्रोध अत्यधिक आता है, उसका क्रोध नियंत्रित करने के लिए, एक कागज पर अष्टगंध से उस व्यक्ति का नाम लिखें। उस कागज को गाय के दूध में डूबा दें, ‘त्रिगुणा माला’ से निम्न मंत्र-यंत्र विज्ञान ’10’ मंत्र का पांच माला जप करें। यह प्रयोग पांच दिन तक करें – ॥ ॐ क्लीं ऐं क्लीं फट् ॥ Om Kleem Ayeim Kleem Phat पांचवें दिन माला को नदी में विसर्जित कर दें।
६०. पुत्र या पुत्री के असंयमित आचरण के कारण यदि बदनामी हो रही है, तो उनका उन कारणों से उच्चाटन करने के लिए निम्न प्रयोग सम्पन्न करें- काले रंग के वस्त्र में ‘जयन्ती माला’ रखकर सिन्दूर से पोत कर पांच कीलें तथा एक कोयला रख कर मौली से बांध दें। पोटली को अपने हाथ में लेकर निम्न मंत्र का ६० बार जप करें- ॥ ॐ क्लीं सौः ही स्वाहा ॥ Om Kleem Ayeim Souh Hreem Swaahaa प्रयोग के पश्चात इसे किसी भी वृक्ष की जड़ में दबा दें, ऐसा करने से पुत्र/पुत्री को अपनी नासमझी का एहसास होगा और वह स्वयं को नियंत्रित कर लेंगें।
६१. शत्रु शान्ति हेतु चार अंगुल की नीम की लकड़ी लेकर उससे शत्रु का नाम किसी कागज पर लिखें, उस कागज पर लकड़ी रख दें, तथा उस पर ही एक तेल का दीपक रख दें। ‘जयन्ती माला’ से निम्न मंत्र की ग्यारह माला मंत्र जप करें। ॥ ॐ क्रीं क्लीं शत्रु शमनं क्लीं क्रीं फट् ॥ Om Kreem Kleem Shatrushamanam Kleem Kreem Phat यह प्रयोग तीन दिन तक करें, दीपक को न बदलें अपितु उसमें ही तेल डालकर जला दें। शत्रु कितना भी हावी हो रहा हो, एकदम से शांत हो जायेगा। यह अत्यन्त तीव्र प्रयोग है। तीसरे दिन अग्नि प्रज्ज्वलित कर माला को तोड़कर प्रत्येक मनके को घी में डुबोते हुए निम्न मंत्र जप करें, अंतिम आहुति में कागज तथा लकड़ी भी डाल दें।
६२. धन प्राप्ति हेतु निम्न मंत्र को अष्टगंध से सफेद रंग के वस्त्र पर लिख दि उस वस्त्र पर अपना बायां हाथ रखते हुए दाहिने हाथ से ‘लक्ष्मी माला’ से एक माला निम्न मंत्र जप करें। यह प्रयोग सात दिन तक करें। सातवें दिन वस्त्र को धन रखने के स्थान पर रख दें तथा माला को नदी में प्रवाहित कर दें। अनवरत धन प्राप्ति का स्रोत प्राप्त होगा। ॥ ॐ ही अक्षवं धनमानव फट् ॥ Om Hreem Akshayam Dhanmaanay Phat
६३. चौड़े मुंह के मिट्टी के पात्र में पान, तुलसी, दूब, बिल्ब पुत्र, घी, चीनी, दूध डालकर तथा उसमें ‘लक्ष्मी यंत्र’ रखकर सफेद कपड़े से उसका मुंह बांध दें, उस पात्र का पूजन कर निम्न मंत्र का जप ७५ बार करें- उ उ ल है प्र 0 वि पु Я पृ ॥ ॐ क्लीं क्लीं ह्रीं फट् ॥ Om Kleem Kleem Hleem Phat खेत में एक हाथ का गड्ढा खोद कर दबा देने से खेत की ‘अगस्त’ 98 मंत्र-तंत्र- उपद्रवी जीवों से रक्षा में सहायता मिलती है। साधना सामग्री पैकेट-210/-
६४. किसी कागज पर लाल चंदन से गणपति बनाकर उस पर ‘लक्ष्मी यंत्र’ रखकर लाल पुष्प चढ़ायें, तेल का दीपक लगाकर निम्न मंत्र का जप ६५ बार करें- ॥ ॐ ह्रीं विचित्रे कामं पूरब ॐ ॥ Om Hreem Vichitre Kaamam Pooray Om व्यक्ति की कामना पूर्ण होती है। यह प्रयोग पांच दिन का है। पाचवें दिन यंत्र को उसी कागज में लाल धागे से बांधकर नदी में प्रवाहित कर दें।
६५. कुबेर के समान धन-धान्य प्राप्ति करने के लिए साधक ‘इन्द्राक्षी यंत्र’ को स्थापित कर उसका सुगंधित द्रव्य से पूजन कर निम्न मंत्र का जप ७५ बार करें। ॥ ॐ ह्रीं श्रीं नमो भगवते धनं देहि देहि ॐ // Om Hreem Shreem Namo Bhagwate Dhanam Dehi Dehi Om यह प्रयोग ग्यारह दिन तक नियमित रूप से करें, म्यारह दिन के बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें। – साधना सामग्री पैकेट 120/-
६६. किसी पात्र में कुंकुंम से षोडशदल कमल बनाकर उसमें ‘अष्टलक्ष्मी यंत्र’ स्थापित करें, अग्नि प्रज्ज्वलित कर १०१ बिल्वपत्र को घी के साथ निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए आहुति दे, तो स्त्री पुत्रवती होती है। ॥ ॐ ह्रीं फ्रें सः सः ॐ // Om Hreem Frem Sah Sah Om प्रयोग समाप्त कर यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें।
६७. सर्वत्र विजय प्राप्त करने के लिए ‘कीर्तिजया यंत्र’ को किसी पात्र में स्थापित कर यंत्र का पूजन करें। उस पर सफेद पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का २१ बार उच्चारण करें- ॥ ॐ ऐं क्रों सर्व विजवाब ॐ ॥ Om Ayeim Krom Sarva Vijayaay Om मंत्र जप के बाद समस्त पुष्प एकत्रित कर वृक्ष की जड़ में डाल दें। यह प्रयोग सात दिन तक करें, सात दिन के बाद यंत्र भी नदी प्रवाहित कर दें।
६८. ‘महानारायणी यंत्र’ को किसी पात्र में रखकर उसका पूजन करें, यंत्र को जल में डुबो दें तथा मध्यमा अंगुली से २१ बार जल में ही निम्न मंत्र लिखें, उस जल से सन्तान को स्नान करवाएं। सन्तान को नजर नहीं लगेगी। यह प्रयोग ९ दिन तक करें। ।। ॐ श्रीं महाभिषेक ह्रीं ॐ ॥ Om Shreem Mahaabhishekam Hleem Om नौ दिन के बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें।
६९. साधक चौखट पर बैठ अपने बाएं हाथ में ‘महानारायणी यंत्र’ को लेकर, किसी पात्र से यंत्र पर निरन्तर दूध चढ़ायें और निम्न मंत्र का ३५ बार जप करें, तो साधक की आयुवृद्धि होती है। ॥ ॐ ऐं दीर्घायुष्यं सिद्धवे ॐ नमः ॥ Om Ayeim Deergbaayushyam Siddhaye Om Namah यह प्रयोग मात्र तीन दिन करें। तीन दिनों के बाद यंत्र नदी में प्रवाहित कर दें।
७०. ‘बीसा मुद्रिका’ को खेत के मध्य में रखकर उसके चारों ओर चार दीपक लगा दें, मुद्रिका का पूजन कर निम्न मंत्र का १०१ बार जप करते हुए अक्षत चढ़ाते जाएं- ॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अन्नपूर्ण स्वाहा ।। Om Hreem Shreem Kleem Annapoorane Swaahan मंत्र जप समाप्त कर मुद्रिका को वहीं पर गड्ढा खोदकर दबा दें। खेत के चारों ओर मंत्र पढ़ते हुए अक्षत अपने पीछे फेंकते चलें। जब पूरी परिक्रमा हो जाय तो खेत को प्रणाम कर घर वापस आ जाएं, फसल उत्तम होगी।
७१. ‘सर्वमंगला यंत्र’ को स्थापित कर यंत्र का पूजन आक के पुष्प से करें, घी का दीपक लगा दें, अग्नि प्रज्ज्वलित कर निम्न मंत्र से खीर की ३१ आहुतियां दें – ॥ ॐ क्लीं महाकालाब अभीष्ट सिद्धिं नमः ॥ Om Kleem Mahaskaalany Abbeeshta Siddhim Namah साधक की अभीष्ट सिद्धि होती है। यह प्रयोग तीन दिन तक करें। तीन दिन बाद यंत्र नदी में प्रवाहित कर दें।
७२. ‘सर्वमंगला यंत्र’ को स्थापित कर, यंत्र का पूजन कर, निम्न मंत्र का ७५ बार जप करने से व्यक्ति को ध्यानस्थ होने में शीघ्र सफलता प्राप्त होती है- ॥ ॐ क्रीं ही हूं आं ॐ ॥ Om Kreem Hreem Hroom Aam Om यह प्रयोग २१ दिन का है, २१ दिन के बाद समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित कर दें।
७३. ‘स्वास्थ्य लक्ष्मी यंत्र’ का पूजन कर ५१ लाल पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप चढ़ाते हुए करने से साधक आरोग्य प्राप्त करता है तथा स्वयं के कायाकल्प का भी अनुभव करता है।. ॥ ॐ ह्रीं आरोग्यं देहि देहि फट् ॥ Om Hreem Aarogyam Dehi Dehi Phat यह प्रयोग सात दिन करें, सात दिन के बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें।
७४. दीपावली Diwali Diwali के दिन ‘महालक्ष्मी यंत्र’ पर ५१ ‘कमल गट्टे के बीज’ पुष्प के साथ निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए ‘अगस्त’ 98 मंत्र-तंत्र- अर्पित करने से साधक धन प्राप्त करता है। ।। ॐ ह्रीं ह्रीं महालक्ष्मी आगच्छ नमः ॥ Om Hreem Hreem Mahaalakshmee Aagacchh Namah प्रयोग के पश्चात यंत्र तथा कमल गट्टे के बीज नदी में प्रवाहित कर दें।
७५. लाल वस्त्र पर ‘जयंकारी स्थापित कर पूजन करें। अग्नि प्रज्ज्वलित कर तिल को सरसों के तेल से सिक्त कर १०१ आहुति निम्न मंत्र का जप करते हुए करने से साधक के समस्त शत्रु स्तम्भित होते हैं। ॥ ॐ क्लीं ऐं शत्रुस्तंमनाव फट् ॥ Om Kleem Ayeim Shatru-stambhanaay Phat अगले दिन ‘जयंकारी’ नदी में प्रवाहित कर दें। साधना सामग्री पैकेट – 45/-
७६. सफेद वस्त्र पर कुंकुंम से स्वस्तिक का निर्माण कर ‘आदित्यवर्णा’ स्थापित करें, यंत्र का पूजन करें, घी का दीपक प्रज्ज्वलित करें, आदित्यवर्णा के समक्ष सात दिन तक निम्न मंत्र का ६१ बार जप करने से साधक स्वयं में शिव के समान आनंद का अनुभव करता है। ॥ ॐ शं शिव मनुभवाय नमः ॥ Om Sham Shiv Manubhavaay Namah प्रयोग समाप्त कर आदित्यवर्णा को नदी में प्रवाहित कर दें।
७७. यदि घर में निरन्तर रोग बना हुआ रहता हो, तो साधक दीपावली Diwali Diwali के एक दिन पूर्व रात्रि दस बजे यह प्रयोग सम्पन्न करें, किसी पात्र में ‘महानीला’ स्थापित कर महानीला का पूजन करें उस पर निम्न मंत्र का जप करते हुए जल चढ़ाएं- ॥ ॐ ठः ठः रोगनाशाव फट् // Om Tthah Tthah Rognaashaay Phat उस जल को पूरे घर में छिड़क दें। यह प्रयोग सात दिन तक करें, सात दिन के पश्चात महानीला को नदी में प्रवाहित कर दें।
७८. निम्न मंत्र का प्रत्येक शनिवार को भगवती लक्ष्मी देवी पर जल चढ़ाते हुए उच्चारण करने से कामना पूर्ण होती है। ॥ ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं मनोवांछितं ॐ फट् ॥ Om Shreem Hreem Kleem Manovaanchhitam Om Phat
७९. दीपावली Diwali Diwali के दिन प्रात: काल ही स्नानादि से निवृत्त होकर, सफेद वस्त्र पर कुंकुंम से स्वस्तिक का निर्माण कर उस पर ‘शर्वाणी’ स्थापित करें, उसका पूजन सिन्दूर तथा पुष्प से कर तेल का दीपक लगा दें तथा निम्न मंत्र का जप ६५ बार करने से साधक जिस भी आजीविका से सम्बन्धित ज्ञान प्राप्त कर, अपनाना चाहता है, उसका मार्ग मिलता। है। ॥ ॐ क्रीं ह्रीं ज्ञान सिद्धिं ॐ फट् स्वाहा ॥ Om Kreem Hreem Gyan Siddhim Om Phat Swashas -यंत्र विज्ञान 18′ RO यह प्रयोग पांच दिन का है। पांच दिन के बाद शर्वाणी नदी मैं प्रवाहित कर दें।
८०. किसी पात्र में ‘शर्वाणी’ स्थापित करें, शर्वाणी का पूजन सिन्दूर, अक्षत तथा पुष्प से करें, तिल का भोग लगाएं। शर्वाणी के समक्ष निम्न मंत्र का ६५ बार जप करने से दुर्घटना का भय समाप्त होता ॥ ॐ क्रीं कालिके हूं फट् स्वाहा ॥ Om Kreem Kaalike Hroom Phat Swanhas यह प्रयोग सात दिन का है। सात दिन के बाद शर्वाणी को नदी में प्रवाहित कर दें।
८१. ‘वारुणी’ को एक पात्र में स्थापित करें, सामने तीन तिल के तेल का दीप प्रज्ज्वलित करें, प्रत्येक दीप का पूजन करें, । उसके पश्चात वारुणी का पूजन कर निम्न मंत्र का जप ६५ बार करने से व्यक्ति रोजगार प्राप्त करता है। ॥ ॐ हूं हूं महाकाल प्रसीद प्रसीद ॐ फट् // Om Hroom Hroom Mahaakaal Praseed Praseed Om Phat यह प्रयोग सात दिन का है। सात दिन के बाद वारुणी को नदी में प्रवाहित कर दें।
८२. वट वृक्ष के पांच पत्ते लेकर उनको एक के ऊपर एक कर रख दें, उस पर ‘शक्ति खड्ग’ को स्थापित कर लाल कनेर के पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का २१ बार जप करने से साधक या साधिका इच्छित लड़का या लड़की से विवाह करता है- ।। ॐ ऐं अमीष्ट सिद्धिं विवाह बाधा निवारणाय फट् ॥ Om Ayeim Abheesht Siddhim Vivaah Baadhaa Nivaarannasy Phat यह प्रयोग पांच दिन तक करें, पांच दिन के बाद शक्ति खड्ग को नदी में विसर्जित कर दें।
८३. सफेद रंग के वस्त्र पर चावल की ढेरी बनाकर ‘शक्ति खड्ग’ को स्थापित कर निम्न मंत्र का ७५ बार जप करने से साधक दीर्घायु प्राप्त करता है। ॥ ॐ श्रीं ॐ दीर्घायुष्यं ॐ नमः ॥ Om Shreem Om Deerghasyushyam Om Namah अगले दिन शक्ति खड्ग को नदी में प्रवाहित कर दें।
८४. दीपावली Diwali Diwali के दिन सूर्योदय के समय सूर्य के समक्ष खड़े होकर अपने हाथ में ‘त्रैलोक्य भूषणा’ लेकर दोनों हाथ ऊपर कर निम्न मंत्र का जप बीस मिनट तक करें, जप समाप्त करके त्रैलोक्य भूषणा को पूजन स्थान में रख दें, भाग्योदय होगा। होली पर त्रैलोक्य भूषणा को होलिका में विसर्जित कर दें। ।। ॐ ह्रीं भाग्योदय कुरु कुरु रुद्रव फट् // Om Hreem Bhaagyoday Kuru Kuru Rudray Phat
८५. ‘अन्नपूर्णा यंत्र’ को किसी पात्र में अक्षत भर कर स्थापित कर दें, अन्नपूर्णा यंत्र का पूजन कुंकुंम, अक्षत तथा पुष्प से करें, तीन बत्तियों का घी का दीपक लगाकर निम्न मंत्र का ५१ बार उच्चारण करने से अन्नादि के व्यापार में वृद्धि होती है। ॥ ॐ ह्रीं अन्नपूर्ण व्यापार वृद्धिं कुरु कुरु ॐ फट् // Om Hreem Annapoornne Vyaapaar Vriddhim Kuru Kuru Om Phat यह प्रयोग ग्यारह दिन का है। ग्यारह दिन के बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें।
८६. सफेद रंग के वस्त्र पर अष्टदल कमल अष्टगंध से बनाएं उसके ऊपर ‘कमला यंत्र’ स्थापित कर यंत्र का पूजन कमल के पुष्प से करें, आटे के पांच दीपक प्रज्ज्वलित कर उपरोक्त मंत्र का उच्चारण ३१ बार करें- ॥ ॐ ई हीं नित्य क्लिन्ने ॐ फट् ॥ Om Eem Hreem Nitya Klinne Om Phat यह प्रयोग ९ दिन तक करें, दुकान की ब्रिकी में वृद्धि होगी। ९ दिन के बाद यंत्र को नदी में विसर्जित कर दें।
८७. अशोक के सात पत्ते लेकर क्रम से रख दें, सातों के ऊपर चावल की ढेरी बनाकर एक-एक इलायची स्थापित करें, उसके आगे ‘कमला यंत्र’ स्थापित कर प्रत्येक इलायची पर कुंकुंम चढ़ायें। निम्न मंत्र का ६५ बार जप करें- / ओं क्रों व्यापार वृद्धिं नमः ॥ Om Krom Vyaapaar Vriddhim Namah वस्त्र से सम्बन्धित व्यापार में विशेष लाभ प्राप्त होगा यह प्रयोग आठ दिन तक करें, आठवें दिन यंत्र को नदी में विसर्जित कर दें। साधना सामग्री पैकेट-210/-
८८. उड़द की दाल को किसी पात्र में भरकर उस ‘शंखिनी’ स्थापित करें, शंखिनी पर गुड़हल का पुष्प चढ़ाएं, सुगन्धित अगरबत्ती लगा दें। निम्न मंत्र का ५१ बार जप करें- ॥ ॐ ऐं क्लीं त्रिपुरे व्यापार वृद्धिं साधय ॐ फट् ॥ Om Ayeim Kleem Tripure Vyaapaar Vriddhim Saadhay Om Phat सौन्दर्य प्रसाधन से सम्बन्धित व्यापार में धन लाभ होगा। यह प्रयोग ७ दिन तक करें, सातवें दिन शंखिनी को दाल सहित किसी नदी में विसर्जित कर दें।
८९. पांच तेल के दीपक गोलाई में रखकर, मध्य में ‘महोत्कट’ स्थापित करें, महोत्कट का पूजन पुष्प, अक्षत से करें। निम्न मंत्र का ६१ बार मंत्र जप करें- ॥ ॐ ह्रीं ह्रीं व्यापार वृद्धिं ॐ ॥ Om Hloum Hleem Vyaapaar Vriddhim Om मशीन से सम्बन्धित व्यापारियों के लिए यह ब्रिकी वर्ल्डक -यंत्र विज्ञान *197 SA मशीन से सम्बन्धित व्यापारियों के लिए यह ब्रिकी वर्द्धक प्रयोग है। यह प्रयोग पांच दिन तक करें, पांचवें दिन ‘महोत्कट’ को किसी वृक्ष की जड़ में दबा दें। ·
९०. पृथ्वी पर आटे से चतुर्दल कमल का निर्माण कर | उसके ऊपर अक्षत रखकर ‘भू-वसना’ स्थापित करें, भू-वसना का पूजन कर, निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें – ॥ ॐ ह्रीं ह्रीं भूवेवाय ॐ ॥ Om Hreem Hreem Bhoo-devasy Ayeim Ayeim Om यह प्रयोग सात दिन तक करें, बाद में भू-वसना को नदी में प्रवाहित कर दें, भूमि सम्बन्धी व्यापार में लक्ष्मी की वृद्धि होगी। साधना सामग्री पैकेट 135/-
९१. ‘कात्यायनी यंत्र’ को सफेद रंग के वस्त्र में बांधकर निम्न मंत्र का ६१ बार उच्चारण कर, किसी निर्जन स्थान में फेंक दें या नदी में प्रवाहित करें- ॥ ॐ श्रीं सोभाग्यं सुमंगलाय फट् ॥ Om Shreem Soubhaagyam Sumangalaay Phat कैसी भी विपरीत परिस्थितियां हो व्यक्ति के अनुकूल होने लगती है।
९२. किसी पात्र में ‘कात्यायनी यंत्र’ को स्थापित कर यंत्र का पूजन सिन्दूर से कर, पांच तेल के दीपक लगा दें, यंत्र पर २१ पीले पुष्प चढ़ाते हुए निम्न मंत्र का जप करें- ॥ ॐ श्रीं श्रं स सम्मोहनाव फट् // Om Shreem Shroom som Sammohanaay Phat इस प्रयोग को ७ दिन तक करें। व्यक्ति में सम्मोहन की क्षमता की वृद्धि होती है। सात दिन बाद यंत्र को नदी में प्रवाहित कर दें। नित्य पांच बार उपरोक्त मंत्र का जप कर लें।
९३. घर में क्ले बढ़ गया हो, पुत्रों के मध्य तनाश अधिकव हो, कि वे एक दूसरे का मुख देखना न पसन्द कर रहे हों तथा धन के लोभ मैं नित नये कुचक्र रच रहे हों, तो घर का मुखिया या कोई भी सदस्य यह प्रयोग सम्पन्न करे, जिससे घर में सुख-सौहार्द का वातावरण बन सके। किसी पात्र में पुष्प का आसन बनाकर ‘नारसिंही’ को स्थापित कर नारसिंही का पूजन करें, अक्षत (चावल) के वे दाने जो टूटे न हों को १०१ बार निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए नारसिंही पर चढ़ायें- ॥ ॐ क्लीं श्रं वं ॐ फट् ॥ Om Kleem Shram Vam Om Phat यह प्रयोग पांच दिन तक करें। पांचवें दिन समस्त चावल तथा नारसिंही को किसी वट वृक्ष के नीचे गड्ढा खोद कर दबा दें।
९४. सफेद रंग के वस्त्र पर किसी पात्र में अष्टगंध से निम्न मंत्र लिखकर ‘स्वस्था’ स्थापित करें, स्वस्था का पूजन करें। इसके ज ‘अगस्त’ 98 मंत्र-तंत्र पश्चात दूध, दही, घी तथा मधु मिलाकर स्वस्था पर चढ़ाते हुए ७५ बार निम्न मंत्र का जप करें- ॥ ॐ हाँ आरोग्य सिद्धिं शिवाय नमः ॥ Om Hroum Aarogya Siddhim Shivaay Namah व्यक्ति के घर में आरोग्यता का निवास होगा। यह प्रयोग तीन दिन तक करें, तीन दिन के बाद स्वस्था को नदी में प्रवाहित कर दें।
९५. किसी पात्र में कुंकुंम से स्वस्तिक का निर्माण कर उसमें ‘शिवा’ स्थापित करें, शिवा का पूजन करें, अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसमें राई तथा नमक से निम्न मंत्र की ३१ बार आहुतियां दें। समस्त शत्रु तेजहीन, निर्बल हो जायेंगे तथा आपके मार्ग में रोड़े नहीं बन सकेंगे- ॥ ॐ इसकल हीं रुद्राव शत्रुनाशाय फट् // Om Hasakal Hreem Rudrasy Shatrunaashaay Phat यह प्रयोग पांच दिन तक करें। पांच दिन के पश्चात शिवा तथा समस्त भस्म एकत्र कर नदी में प्रवाहित कर दें।
९६. लाल रंग के वस्त्र पर पुष्प का आसन रखकर ‘भवमालिनी’ का स्थापन कर उस पर १०१ कमल के बीज निम्न मंत्र उच्चारित करते हुए चढ़ाने से व्यक्ति के घर लक्ष्मी का स्थाई स्रोत बनता है। यह प्रयोग दीपावली Diwali Diwali के दिन सम्पन्न करें। ।। ॐ श्रीं ह्रीं लक्ष्मी आबद्धं सिद्धवे नमः ॥ Om Shreem Hreem Lakshmee Aabaddham Siddhaye Namah प्रयोग समाप्ति पर समस्त सामग्री को बांधकर नदी में प्रवाहित कर दें तथा नित्य निम्न मंत्र का प्रातः म्यारह बार उच्चारण कर लें।
९७. ‘घोषवर्जिता’ को लाल रंग के वस्त्र में अपने व्यापार स्थल पर रख दें तथा २१ दिन तक नित्य निम्न मंत्र का ६५ बार जप करें – ॥ ॐ हं क्षं लं व्यापार वृद्धिं फट् ॥ Om Ham Ksham Lam Vyaapaar Vriddhim Phat घोषवर्जिता को उसी वस्त्र में बांधकर बाइसवें (२२) दिन नदी में प्रवाहित कर दें तो व्यापार में बढ़ोत्तरी होगी।
९८. किसी पात्र में जल लेकर उसको देखते हुए निम्न मंत्र का २१ बार जप कर उस जल को पूरे घर में छिड़क दें, यह प्रयोग नित्य करने से घर में छोटी-मोटी बाधाएं तो समाप्त होंगी ही, साथ ही वातावरण प्रसन्नतादायक बना रहेगा। ॥ ॐ खें खों बाधा निवारणाय फट् // Om Khem Khoum Bandhaa Nivaarannay Phat
९९. जो व्यक्ति पशुपालन करते हैं, वे पशुओं की रक्षा को लेकर हर क्षण चिन्तित रहते हैं, कि न जाने किस बीमारी से वे बेजान जीव ग्रसित हो जाएं। उनकी सुरक्षा के लिए यह प्रयोग सम्पन्न करें। जिस स्थान में पशु रहते हैं उस स्थान के उत्तर दिशा की ओर ‘सूर्य्या’ के मंत्र-यंत्र विज्ञान 20 सामने ५१ बार निम्न मंत्र का उच्चारण कर दबा दें- ॥ ॐ ही पशुपतवे रोजनाशाय फट् ॥ Om Hreem Pashupataye Rognaashaay Phat नित्य इसी मंत्र का ५१ बार उच्चारण करते हुए अगरबती उसी स्थल पर लगा दें। पशु स्वस्थ बने रहेगें।
१००. ‘घोषवर्जिता’ को किसी पात्र में स्थापित कर, घोषवर्जिता का पूजन कुंकुंम अक्षत, पुष्प से कर घी का दीपक लगा दें, निम्न मंत्र का जप ५१ बार ग्यारह दिन तक करें- ॥ ॐ ह्रीं आकस्मिकं धनं देहि देहि ॐ // Om Hreem Aakasmikam Dhanam Dehi Dehi Om ग्यारह दिन के बाद घोषवर्जिता को नदी में प्रवाहित कर दें, साधक आकस्मिक धन प्राप्ति के स्रोत प्राप्त करता है।
१०१. चावल की ग्यारह ढेरियां बना लें प्रत्येक पर एक सुपारी रखें, मध्य में ‘नृसिंहीं स्थापित करें, नृसिंहीं का पूजन सिन्दूर तथा पुष्प से करें, इसी प्रकार सभी ढेरियों का पूजन करें। पांच बत्तियों का दीपक लगाएं। निम्न मंत्र का जप १०१ बार करें, यह प्रयोग ग्यारह दिन तक करें- ॥ ॐ आं ही करें] महाकट् ॥ Om Aam Hreem Krom Mahaa-arisinghaay Phat साधक का व्यक्तित्व प्रचण्ड, तेजस्वी होगा। ग्यारह दिन बाद समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दें।
१०२. किसी पात्र में काजल से दो आंखें बनाएं, उस पर ‘महाचण्ड’ को स्थापित करें, उस पर कुंकुंम से अपने शत्रु का नाम लिखें, फिर क्रोध मुद्रा में निम्न मंत्र का ७५ बार जप करते हुए महाचण्ड पर काली सरसों के दाने फेंकें- ॥ ॐ ऐं क्लीं शत्रु शमनं ॐ फट् ॥ Om Ayeim Kleem Shatrushamanam Om Phat मंत्र जप समाप्त कर समस्त सरसों जला दें। यह प्रयोग आठ दिन तक करें। शत्रु मानसिक रूप से आपसे भयभीत होगा ही तथा दिनों-दिन वह अपने कर्मों का फल भोगता रहेगा। आठ दिन के बाद सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दें।
१०३. लाल रंग के वस्त्र पर अष्टगंध से त्रिभुज बनाकर उसके मध्य में ‘वसुप्रदा’ को स्थापित करें, उसका पूजन करें, तेल का दीपक लगाकर निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें- ॥ ॐ ह्रीं वास्तुदेवाय नमः ॥ Om Hreem Vaastudevaay Namah साधक भूमि, भवन निर्माण आदि का कार्य सफलता पूर्वक कर लेता है। यह प्रयोग ६ दिन का है छः दिन के बाद ‘वसुप्रदा’ को नदी में प्रवाहित कर दें।
-१०४. जो साधक विद्या, लक्ष्मी, यश प्राप्त करना चाहता है यह प्रयोग सम्पन्न करे। किसी पात्र में कुंकुंम घोल दें, उसमें एक पुष्प रखकर उस पर ‘बागीश्वर’ स्थापित करें, उसके समक्ष खड़े। होकर निम्न मंत्र का ६५ बार मंत्र जप करें- ॥ ॐ हां हंसः हाँ हाँ ॐ स्वाहा ॥ Om Haam Hansah Hroum Hroum Om Swaahas यह प्रयोग तीन दिन तक करें। तीन दिन के पश्चात बागीश्वर को नदी में विसर्जित कर दें।
१०५. ‘जयाश्री’ को कुंकुंम से रंगे हुए चावल पर स्थापित करें जयाश्री का पूजन कुंकुंम, अक्षत तथा पुष्प चढ़ाकर करें। जयाश्री के समक्ष घी का दीपक लगाकर निम्न मंत्र का जप ५१ बार करें- ॥ ॐ ह्रीं क्रीं धनागमं साधव ॐ ॐ ॥ Om Hreem Kreem Dhanaagamam Sandhay Om Om धन प्राप्ति के नये अवसर मिलेंगे। यह प्रयोग तीन दिन का है। तीसरे दिन जयाश्री को नदी में प्रवाहित कर दें।
१०६. किसी पात्र में ‘इन्द्राक्षी माला’ स्थापित कर इन्द्राक्षी माला का पूजन अष्टगंध, पुष्प तथा अक्षत से कर, सुगंधित धूप लगायें। निम्न मंत्र का जप ३५ बार नित्य नौ दिन तक करें- ॥ ॐ ह्रीं देहि महेन्द्राय फट् ॥ Om Hreem Iddham Dehi Mahendraay Phat साधक का व्यक्तित्व इन्द्र के समान प्रभावशाली होता है।
१०७. ‘रतिप्रिया माला’ को किसी पात्र में स्थापित कर, यज्ञ कुण्ड में अग्नि प्रज्ज्वलित कर घी तथा जीरे से निम्न मंत्र का १०१ बार आहुति देने से जिस व्यक्ति का भी आकर्षण करें, तो वह साधक के अनुकूल होता है। ॥ ॐ सं संकर्षणाव रतिप्रियाब फट् ॥ Om Sam Sankarshannaay Ratipriyaay Phat अगले दिन रतिप्रिया माला को किसी मन्दिर में चढ़ा दें।
१०८. जो साधक समाज में निरन्तर अग्रणी बने रहना चाहते हैं, वे ‘सिद्धिमाला’ से निम्न मंत्र का जप एक माला २१ दिन तक करें ॥ ॐ फट् ॥ 20 Om Ayeim Frem Heim Hroom Phat २१ दिन के बाद सिद्धिमाला को नदी में प्रवाहित कर दें। –
दीपावली Diwali Diwali के सभी १०८ प्रयोगों में से साधक अपनी आवश्यकतानुसार जितने चाहे, उतने प्रयोग सम्पन्न कर सकता है। यदि साधक चाहें, तो एक दिन में एक से अधिक प्रयोग भी कर सकता है, किन्तु यह ध्यान रखें, कि दो प्रयोगों को करने के बीच में कम से कम एक घण्टे का गैप अवश्य दें।
Narsingh Sadhna – भगवान प्राचीन नृसिंह साधना PH.8528057364
Narsingh Sadhna – भगवान प्राचीन नृसिंह साधना PH.8528057364 यदि आप साधक हैं तो केवल नर नहीं नर केसरी बनिए इस नृसिंह साधना से प्रत्येक युग में भगवान युग की आवश्यकता के अनुरूप स्वरूप ग्रहण कर इस धरा पर अवतरित होते हैं अपने भक्तों के कष्ट निवारण करने के लिए यह एक सुस्थापित धारणा है हिन्दु धर्म की।
किंतु क्या उनके प्रत्येक आगमन में कोई मुक संदेश भी नहीं निहित होता? इसी की समुचित विवेचना कर रहा है यह लेख इस नृसिंह जयन्ती के अवसर पर जिस प्रकार से पुनर्जन्म का विश्वास हिन्दू धर्म का एक मूलभूत विश्वास है, उसी प्रकार से इस बात में दृढ आस्था है कि ईश्वर अपने भक्तों के कष्ट निवारणार्थ समय-समय पर अवतरण के माध्यम से आकर उन्हें पाप-ताप-ताप से मुक्त करने की क्रिया करते हैं।
यह भी हिन्दू धर्म का एक आधारभूत विश्वास है। दोनों ही विश्वासों के पीछे जो मुख्य बात है, वह यही है, कि भारतीय चिंतन में कभी भी ईश्वर से अलगाव की कल्पना तक नहीं की गई है। जिस प्रकार जीवन एक सहज घटना है उसी प्रकार ईश्वर का निश्चित कालावधि. पर अवतरण भी एक सतत् घटना है, जो मत्स्यावतार से लेकर इस कलियुग में होने वाले कल्कि अवतरण के रूप में पुराणादि शास्त्रों में विस्तार से वर्णित है। जैसा कि लोक श्रुतियों में मान्य है जब यह घरा ढाई हजार वर्ष तक तपस्या करती है, तब ईश्वर युग के अनुरूप स्वरूप ग्रहण कर इस घटा पर अवतरण के माध्यम से अपने भक्तों का |
कत्याण करते हैं तथा उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने के उपाय सृजित करते हैं। वस्तुतः प्रत्येक अवतरण का एक निश्चित अर्थ रहा है और सामान्य लोक विश्वास से पृथक (कि ईश्वर ऐसा प्राणी मात्र के उद्धार के लिए करते हैं अवतरण की घटना के विशिष्ट अर्थ भी होते हैं।
प्रत्येक अवतरण किसी एक या दो भक्त की विपत्ति में रक्षा करने अथवा उसके उद्धार तक ही सीमित न रह कर अनेक गूढ़ संदेश भी छिपाए हुए होता है, यद्यपि पौराणिक कथाओं से अभिव्यक्त ऐसा ही होता है, मानों ईश्वर ने किसी भक्त विशेष की पुकार पर इस धरा पर आना स्वीकार किया और यही बात भगवान श्री विष्णु के नृसिंहावतार के संदर्भ में भी पूर्ण प्रासंगिक है।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा के दो द्वारपालों ने एक बार भगवान ब्रह्मा की आज्ञा के पालन के क्रम में भगवान ब्रह्मा के चार प्रथम मानस पुत्रों में से एक को भीतर प्रवेश करने से वर्जित कर दिया, जिससे उन्होंने क्रोधयुक्त हो उन दोनों को राक्षस योनि में चले जाने का श्राप दे दिया।
बाद में क्रोध शांत होने व वास्तविकता का ज्ञान होने पर उन्होंने द्वारपालों की प्रार्थना पर उन्हें यह वरदान दिया कि यद्यपि उनका वचन मिथ्या नहीं हो सकता, अतः वे राक्षस योनि में तो जाएंगे ही, किंतु उनका वह स्वयं भगवान विष्णु के हाथों से होने के कारण ये मुक्त होकर परमपद की प्राप्ति कर सकेंगे।
कालांतर में ये दोनों द्वारपाल ही क्रमशः हिरण्यक्ष एवं हिरण्यकश्यप के रूप में आए, जिनके अत्याचारों से सारी धरा ही नहीं देवलोक आदि तक त्राहि-त्राहि कर पड़े, जिन्हें समाप्त करने के लिए भगवान विष्णु ने दो बार अवतार लिए।
हिरण्याक्ष को समाप्त करने के लिए शूकर अवतार तथा हिरण्यकश्यप को समाप्त करने के लिए नृसिंह अवतार इसी कारणवश संभव हुए। पौराणिक गाथाओं की कथात्मक शैली में क्या तथ्य छुपे होते हैं अथवा क्या वे केवल विशिष्ट घटनाओं का कथात्मक विस्तार भर होती हैं, यह तो पृथक विवेचना और चिंतन की बात है, किंतु जैसा कि प्रारम्भ में कहा, कि प्रत्येक अवतरण स्वयं में एक संदेश भी निहित रखता है, उसी क्रम में चिंतन करने पर स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है, कि भगवान श्री विष्णु के इस विशिष्ट अवतरण (नृसिंह अवतरण) का भी एक गूढ संदेश है और संदेश है, ‘नृ’ | अर्थात् मनुष्य को ‘सिंह’ अर्थात् पटाक्रमी बनने का संदेश |
यह जीवन का एक सुस्वीकृत तथ्य है, कि केवल इस युग में ही नहीं वरन् प्रत्येक युग में वही व्यक्ति जीवित रह सका है, जिसने जीवन में संघर्ष किया है। जीवन संघर्षो का एक अविराम क्रम होता है तथा इसमें जो क्षण भर चूका जीवन उसकी प्राण शक्ति का हनन कर देता है। |
और फिर ऐसा व्यक्ति जिसके प्राणों का ही हनन किया जा चुका हो, कोई आवश्यक नहीं कि जीवित रहते हुए भी वह जीवित व्यक्तियों की श्रेणी में आता हो, क्योंकि केवल श्वास-प्रश्वास के चलते रहने को ही तो जीवन नहीं कहा जा सकता ।
वास्तव में जीवन तो उसका कहा जा सकता है, जो अपने जीवन के लक्ष्यों को सिंह की भांति झपट कर प्राप्त करने की क्षमता से युक्त हो। वन्य प्राणियों में सर्वाधिक ओजस्वी पशु सिंह को ही माना गया है, जो अनायास कभी किसी पर हमला करता ही नहीं, किंतु | आवश्यकता पड़ने पर अथवा क्रुद्ध हो जाने पर जब वह हुंकार भर कर खड़ा हो जाता है, तो अन्य छोटे-छोटे जानवरों की कौन कहे मस्त गजराज भी कतरा कर निकल जाने में ही अपनी भलाई समझते हैं। ऋषियों ने भी पुरुष की इसी सिंहवत रूप में कल्पना की थी।
सिंहवत बनना केवल शौर्य प्रदर्शन की ही एक घटना नहीं होती वरन सिंहवत् बनना इस कारण से भी आवश्यक है, कि केवल इसी प्रकार का स्वरूप ग्रहण करके ही जीवन की गति को सुनिर्धारित किया जा सकता है, अन्यथा एक-एक |
आवश्यकता के लिए वर्षो वर्ष घिसट कर उसे प्राप्त करने जीवन का सारा सौन्दर्य, साटा रस समाप्त हो जाता है। भगवान विष्णु ने तो एक ही हिरण्यकश्यप को समाप्त करने के लिए नृसिंह स्वरूप में, पौराणिक गाथाओं के अनसार अवतरण लिया था,
किंतु मनुष्य के जीवन में त प्रतिदिन नूतन राक्षस आते रहते हैं, जो हिरण्यकश्यप की है भांति अस्पष्ट होते हैं, यह अस्पष्ट ही होता कि उनका समापन कैसे संभव हो, उनसे मुक्ति पाने का क्या उपाय हो सकत है? और यह भी सत्य है, कि यदि जीवन में अभाव, तनाव पीड़ा (शारीरिक, मानसिक अथवा दोनों), दारिद्र्य जैसे राक्षसों से एक-एक करके निपटने का चिंतन किया जाए. तो मनुष्य की आधी से अधिक क्षमता तो इसी विचार-विमर्श में निकल जाती हैं, शेष जो आधी बचती है, वह किसी भी प्रयास को सफल नहीं होने देती।
साथ ही जीवन के ऐसे राक्षसों से तो केवल सामान्य प्रयास से ही नहीं वरन् ऐसे क्षमता युक्त प्रयास से जूझना आवश्यक होता है, जो साक्षात् नरकेसरी की ही क्षमता हो। तभी जीवन में कुछ ऐसा घटित हो सकता है, जिस पर गर्वित हुआ जा सकता है। सामान्यतः साधना का क्षेत्र अत्यन्त दुष्कर प्रतीत होता है, क्योंकि साधना जीव को वास्तविकताओं का यथावत् प्रस्तुतिकरण व विवेचन कर देती है।
उसमें भक्ति जगत की भांति दिवास्वप्नों की मधुर लहर नहीं होती है. किंतु अन्ततोगत्या व्यक्ति का हित साधना से ही साधित होता है, क्योंकि साधना जीवन की कटु वास्तविकताओं का यथावत् वर्णन करने के साथ-साथ उससे मुक्त होने का उपाय भी वर्णित करती चलती है।
वस्तु स्थितियों कां विवेचन इस कारणवश आवश्यक होता है, जिससे साधक के मन में एक सुस्पष्ट धारणा बन सके, कि अन्ततोगत्वा उसकी समस्या क्या है, किस प्रकार से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है?
यहां नृसिंहावतार की संक्षिप्त व्याख्या से भी यही तात्पर्य था और साधकों की सुविधार्थ उस साधना विधि का प्रस्तुतिकरण भी किया जा रहा है, जो इस व्याख्या को पूर्णता देने की क्रिया है अर्थात् केवल वर्णन-विवेचन नहीं, यह उपाय भी प्रस्तुत करने का प्रयास है, जिसके माध्यम से कोई भी साधक अपने जीवन को संवारता हुआ, अपनी रंग-रग में सिंह की ही लपक और शौर्य को भरता हुआ जीवन की उन समस्याओं पर झपट्टा मार सकता है,
जो नित नये स्वरूप ने आती रहती है तथा यह भी जीवन का एक कटु सत्य है, कि जब तक जीवन रहेगा तब तक समस्याएं भी आएंगी ही लेकिन जो साधक दृढ निश्चयी होते हैं, जिनके मन में सर्वोच्च बनने का भाव हिलोरे ले रहा होता है, वे अवश्यमेव ऐसी साधना सम्पन्न कर अपने जीवन को एक नया ओज व क्षमता देते हैं, जैसा कि नीचे की पक्तियों में प्रस्तुत साधना विधि की भावना है। नृसिंह साधना को मूलरूप में सम्पन्न करने के इच्छुक साधक के पास ताम्रपत्र पर अंकित नृसिंह यंत्र व नृसिंह माला आवश्यक उपकरण के रूप में होनी चाहिए।
Narsingh Sadhna – भगवान प्राचीन नृसिंह साधना PH.8528057364
यह साधना नृसिंह NARSINGHअथवा किसी भी रविवार की रात्रि में सम्पन्न की जा सकती है। साधक इसमें वस्त्र आदि का रंग काला रखें तथा दिशा दक्षिण की ओर मुख करके हो यंत्र व माला का सामान्य पूजन कुंकुंम, अक्षत, पुष्प की पंखुडियों से कर तेल का एक बड़ा दीपक लगा दें य निम्न मंत्र की इक्यावन (51) मालाएं ‘नृसिंह माला से दत्तचित्त भाव से करें मंत्र ॥
साधक यह मंत्र जप दो बार में भी सम्पन्न कर सकते हैं, अर्थात् एक बार में इक्कीस (21) माला मंत्र जप कर पुनः विश्राम कर इकतीस (31) माला मंत्र जप सम्पन्न करके कर सकते हैं, किंतु सम्पूर्ण मंत्र जप एक ही दिन में सम्पन्न हो जाना आवश्यक होता है। मंत्र जप के अगले दिन सभी सामग्रियों को दक्षिण दिशा में जाकर कहीं सुनसान में गड्ढा खोदकर दबा दें तथा घर आकर स्नान कर लें। संभव है मंत्र जप के पश्चात् साधक को आगामी दस-पन्द्रह दिनों तक शरीर में विचित्र से खिंचाव आदि होते महसूस हो, किंतु ये सभी साधना में सफलता के विशेष लक्षण होते हैं।
Panchanguli sadhana – चमत्कारी प्राचीन त्रिकाल ज्ञान पंचांगुली साधना रहस्य ph.85280 57364
Panchanguli sadhana – चमत्कारी प्राचीन त्रिकाल ज्ञान पंचांगुली साधना रहस्य ph.85280 57364 गुरुमंत्र साधना। कॉम में स्वागत है ! आज हम फिर तिरकाल ज्ञान साधना के ऊपर वीडियो लेकर आया हु ! जो तिरकाल ज्ञान की सब से मशहूर साधनो में से एक है जिस का नाम पंचागुली विद्या ! तिरकाल ज्ञान की जानकारी के लिए हमारे ऋषि मोनीओ ने बहुत सारे ग्रंथो और साधनाओ की रचना की है !
इस काम में हमारे ऋषि मोनीओ ने बहुत योगदान पाया है महर्षि भृगु और ऋषि पराशर जी ने जी ने ज्योतिष विद्या का निर्माण किया ! भूत भविष्य वर्तमान जानने के बहुत सारे माध्यम है कोई ज्योतिष विद्या से जनता है कोई आज्ञा चक्र के माध्यम से जनता है सब के काल ज्ञान की साधना के अलग अलग माध्यम हसत रेखा देखता है इन सब से श्रेष्ठ माध्यम साधना का है !
पंचांगुली विद्या
पंचांगुली शाबर मंत्र
पंचांगुली मंत्र
पंचगुली साधना विद्या को सिद्ध कैसे करे
पंचांगुली साधना रहस्य
पंचांगुली साधना काल ज्ञान जानने का फायदा
ज्योतिष विद्या डेट ऑफ़ बर्थ पर और आप के जनम समय पर काम करती है जिस के पास अपना सही डेट ऑफ़ बर्थ नहीं है तो उस के लिए समस्या है ! जायदातर लोगो के पास सही डेट ऑफ़ बर्थ नहीं होता ! वहां ज्योतिष विद्या काम नहीं करेगी ! ज्योतिष में यह नहीं बताया जाता है फलानी तरीक को इतने समय में तुम्हारा काम होगा ! ज्योतिष समय और तरीक नहीं बताया जाता ! इस लिए ज्योतिष का ज्ञान कुछ हद तक ही है !
मैं किसी विद्या को श्रेष्ठ साबित करना नहीं है सब विद्या अपनी जग़ह सही है ! सब विद्याऐं भगवन के द्वारा बनी गई है ! सब विद्या श्रेष्ठ है सही है पर हर विद्या की एक लिमिट होते है ! उस के आगे वो विद्या काम नहीं कर सकती ! तंत्र विद्या की कुछ साधनाओ के द्वारा आप जान सकते है और बहुत बारीकी से इन साधनो के बरेव में मैंने बहुत सरे वीडियो और जानकारी अपने यूट्यूब चॅनेल गुरु मंत्र साधना और अपनी वेबसाइटgurumantrasadhna.com में दी है आप मेरे चैनल और मेरी वेबसाइट में देख जिन में मैंने करन पिशाचिनी साधना , मां दुर्गा तिरकाल ज्ञान साधना , वाराही तिरकाल ज्ञान साधना , इन साधनो पर मैंने वीडियो बनाए है ! तो अगर आप ने वो वीडियो नहीं देखा तो आप वो सब वीडियो जरूर देखे ,
आज भूत भविष्य वर्तमान जानने की और विद्या के बारे में जानकारी प्रदान करेंगे जिस का नाम पंचगुली है विद्या है पंचागुली का अर्थ है पंच उंगली हाथ की पांच उंगलिओ से है ! हमारे इन हाथो में बहुत कुछ छिपा है हमारा अच्छा बुरा इन में बहुत सारी रेखाएँ है जिन में हमारे ज़िंदगी का सब हाल है पर इस सब को हर इंसान नहीं पढ़ सकता है इसे केवल पंचागुली देव्वी की किरपा से जान सकते है !
आप की ज़िंदगी में कब क्या होने वाला है सबा जाना जा सकता है किस वयक्ति को किया रोग है या भविष्य में क्या रोग होगा सब जान सकते है किसी वयक्ति को क्या रोग है या आने वाले टाइम में क्या रोग होगा सब जान सकते है एक संन्यासी फ़्रांस आकर वो भारत में सिद्ध ऋषि मुनिऔ का सान्ध्य में रहे और उन ऋषि मुनीओ से पंचगुली महाविद्या ज्ञान लिया और विश्व में विखायती को प्रपात करा उनका नाम है कीरो और वो किसी का भी भूत भविष्य बता देते थे उन की चर्चा चारो और फेल चुकी थी !
पर्दे में छिपे व्यक्ति के हाथ बाहर निकलवा करके भी कह देते थे अली जावेद का हाथ है यह महारानी विक्टोरिया का हाथ है उसको यह रोग है या यह ररोग होने वाला है और यह दुर्घटना घटित होने वाली है ! उन की लाखों पुस्तकें मार्किट में मिल जाऐगी ! पंचांगुली विद्या की और उसके संपर्क में आने से ही वह विश्वविख्यात हो गए !
पंचांगुली साधना काल ज्ञान जानने का फायदा – काल ज्ञान अगर आप को पता है तो अगर भविष्य होना लिखा है तो आप पहले से सावधान हो जाओगे और उस कर्मी को जायदा सेजयदा पूजा पाठ कर के टाल सकते हो ! इस का यह सबसे पहला फायदा है ! पूजा path से बड़े से बड़ा कर्म काटा जा सकता है !
गुरु जी के चार से पांच शिष्य थे तो हमारे इलावा सुरेश भी था उस की पत्नी भी गुरु जी से दीक्षित थी ! जब भी गुरु जी हमारी शहर में आते तो वो गुरु जी से मिलने के लिए अक्सर आती आते समय कुछ ले कर आती गुरु जी जब चार पांच दिन के लेया ही हमारे शहर में रुकते थे ! उन के शिष्य और उनके सज्जन मित्र मिलने के लेया आते तो उनके चाये पानी का इंतजाम सुरेश की पत्नी करती ! एक दिन सुरेश की पत्नी ने गुरु जी को हाथ देखने के लिए कहा गुरु जी को पंचागुली महाविद्या सिद्ध थी गुरु जे हाथ देख कर बताया के तुम्हारे ऊपर १४ दिन के भीतर एक ऐसा संकट आने वाला है !
जो तुम्हारी ज़िंदगी में पहले भी चूका है वही दुबारा फिर से होगा ! सुनकर घबराई और गुरुदेव से इस का समाधान पूछने लगी तो गुरु जी ने उन को एक लाची दाना दिया जब भी तुम्हे परेशानी हो तो तुम इस से खा लेना ! तो उस का ४ , ५, दिन बाद उस को दिमाग का बुखार हो गया जो सब से खतरनाक था तो गुरु जी की दिया गया लाची दाना खाया वो एक दम ठीक हो गई ! पंचागुली विद्या के माध्यम से आप शरीर के होने वाले रोग और उसका कारन सब जान सकते है ! पंचांगुली साधना का इस्तमाल हमारे ऋषि मुनी आयुर्वेद में भी करते थे पंचागुली विद्या एक बहुत बड़ा सिद्धि है!
पंचगुली साधना विद्या को सिद्ध कैसे करे इस साधना को सिद्ध करने के लेया आपके पास पंचागुली यन्त्र और पंचागुली दीक्षा लेना जरूरी है साथ में अच्छे गुरु का मार्गदर्शन जरूरी है ! और उस बाद आप की मेहनत जरूरी है तब जाकर आप सफल हो सकते है ! साधना करना इतना आसान काम नहीं है ! अगर आप यह साधना करना चाहते है तो आप हम से संपर्क कर सकते है जय महाकाल
इस साधना की जानकारी के लिए या दीक्षा प्रपात करने के लिए फ़ोन करे 85280 57364
पंचांगुली शाबर मंत्र
ॐ नमो पंचांगुली पंचांगुली परशरी परशरी माता मयंगल वशीकरणी लोहमय दंडमणिनी चौसठ काम विहंडनी रणमध्ये राउलमध्ये शत्रुमध्ये दीवानमध्ये भूतमध्ये प्रेतमध्ये पिशाचमध्ये झोंटिंगमध्ये डाकिनीमध्ये शंखिनीमध्ये यक्षिणीमध्ये दोषिणीमध्ये शेकनीमध्ये गुणीमध्ये गरुडीमध्ये विनारीमध्ये दोषमध्ये दोषाशरणमध्ये दुष्टमध्ये घोर कष्ट मुझ ऊपर बुरो जो कोई करे करावे जड़े जडावे तत चिन्ते चिन्तावे तस माथे श्री माता श्री पंचांगुली देवी तणो वज्र निर्धार पड़े ॐ ठं ठं ठं स्वाहा
Panchanguli – काल ज्ञान देवी पंचांगुली रहस्य विस्तार सहित Ph. 85280 57364
Panchanguli – काल ज्ञान देवी पंचांगुली रहस्य विस्तार सहित Ph. 85280 57364 प्रणाम संपूर्ण ब्रह्मांड अज्ञात शक्ति के द्वारा चलता है जिसे हम ब्रह्मा कहते हैं । ब्रह्म आधार ईश्वर सर्वत्र समान व्याप्त होते हुए भी इस समस्त ब्रह्मांड से दूर है । उसी ब्रह्म के विस्तार को हमने माया के रूप में जाना है और माया की निरंतरता कछु प्रतीक है ।
माया का जो प्रथम शस्त्र है उसे काल कहा जाता है । अर्थात समय निरंतर बहता है 3 वर्ष कोई नदी निरंतर बहती रहती हो । निर्वाचन किस समय कभी निश्चित है ब्रम्हांड बना समय की उत्पत्ति हुई पिछले कल भी था अभी भी है और आने वाले कल में भी होगा वही काल कहलाता है । इस कॉल को समझना साधक के लिए परम अनिवार्य तत्व कहा गया है अगम निगम दोनों ही ग्रंथों में काल स्वयंसेवक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं
महाकाल कौन है प्रथम देव है । स्वयं को इस काल के उस पार जाने का ज्ञान देते हैं । जिनके भीतर एक ऐसी दिव्य शक्ति निहित है । कि वह साधक को त्रिकाल का ज्ञान देने में सर्व समर्थ होते हैं । वर्तमान काल को हमें कैसे जीना चाहिए । पुराना भूतकाल होने लगे तो वह एक उत्तम कार हो जाए आज ऐसा कौन सा कृत्य कर के आने वाले समय में सुबह ही उत्तम भविष्य हो जाए ।
ऐसे ही काल ज्ञान कहा जाता है । और ज्ञान विशेष विधि द्वारा प्राप्त होने वाला क्या है भारतीय ऋषि-मुनियों ने आदिकाल से लेकर वर्तमान युग तक सरकार की पद्धति से साधना की है । काल को जान सके ब्रह्मांड को जान सके । इसके लिए ज्ञान नाम की विद्या प्रदान की गई है । और काल क्या समय जानना है ।अपितु काल ज्ञान का तात्पर्य है होने तक का संपूर्ण चक्र यदि समझना है ।
तो हमें kaal ज्ञान साधना करनी होगी प्रकाश ज्ञान साधना विशेषताओं में से एक साधना है । लेकिन प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक साधक का ज्ञान के विराट स्वरूप और विराट प्रपंच को सरलता से नहीं समझ पाता इतनी इतनी विराट नहीं क्यों संपूर्ण ब्रह्मांड के बारे में सोचें अपने ही बारे में सोचना चाहता है ।
इसीलिए दृश्यों ने इसे बहुत सूक्ष्म निकाय से शुरू किया सामुद्रिक शास्त्र उससे भी छोटे नीचे के स्तर पर उसे कहा गया हस्तरेखा मस्तिष्क विज्ञान अंक विज्ञान प्रदर्शन भविष्य दर्शन और त्रिकाल ज्ञान भूत और भविष्य का और साथ ही साथ वर्तमान का विज्ञान प्राप्त कर सकें ।इसके लिए एक शक्ति की पूजा की गई स्वरूप की वंदना की गई है जिसे त्रिकाल का ज्ञान देने वाली कहा गया और उसे पंचांगुली कह कर संबोधित किया गया शक्ति क्या है
उसी प्रकार ब्रह्मांड में 5 अंगुलियां हैं जिन्हें हम पंचतत्व कहते हैं चित्रों को संचालित करने वाली है और जिसकी अपनी उंगलियों में पंचांगुली नाम की शक्ति है साधक को त्रिकालदर्शी बनाती है । और भविष्य का ज्ञान प्रदान करते हैं । इसीलिए काले होने की महा साधना है तंत्र में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो कम से कम काल ज्ञान और पंचांगुली साधना को संपन्ना करना चाहिए
अत्यंत जटिल और विराट विद्या इस विद्या को प्राप्त करना चाहिए। पंचांगुली देवी की साधना कैसे हो का मंत्र क्या है साधना विधान क्या है । ज्योति प्रकाश समझना चाहिए ब्रह्मांड की बात छोड़ कर यदि हम अपने शरीर को देखें तो यह भी कुछ छुपा है । हर दृष्टि हम कहीं तो हाथों की रेखाएं तो केवल किस लिए बनी है कि मैं हाथों को तोड़ मरोड़ सकूं ।
लेकिन इसके पीछे के हाथों को तोड़ मरोड़ करता है अंगुलियों की बनावट हड्डियों की बनावट त्वचा नाखून और एक रेखा आपके बारे में कुछ बताती है । बहुत बढ़िया तो उन्होंने उन्होंने शरीर पर तिल विज्ञान को ढूंढा शरीर के अंग अंग पर तिल होने पर क्या होगा ।आकृति नाथ की आकृति सर की आकृति शरीर की आकृति हाथों की रेखाओं के साथ-साथ पैरों की रेखाएं के बनावट प्रत्येक तत्वों को देखा पूर्वाभास के क्षमताओं को विचारा ।
अंत में एक महाशक्ति से जुड़ा हुआ पाया जिससे पंचांगुली कहा जाता है ।अर्थात ब्रह्मांड को अपने पांच उंगलियों पर करने वाली ब्रह्मांड को पांच उंगलियों के द्वारा संचालित करने वाले शक्ति ही पंचांगुली नाम की महाशक्ति है। पंचांगुली साधना क्यों आने वाले हैं । साधना से आपको मुद्दा गंभीरता प्रतिवेदन मिलती है कि आप पृथ्वी पर कैसे जीवन जीना हैं इसकी आपको प्राप्त होते हैं । शत्रु तो कहीं मित्र है तो कहीं निरंतर हो रहा है
कभी शब्द के पीछे इतने अधिक पड़ जाते हैं कि व्यक्ति विचलित होकर आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगता है । अध्यात्म के शिखर को पाना चाहता है ।तो कभी राज्य सत्ता के शिखर को प्राप्त करना चाहता है ।पर जाना चाहता है जाना चाहता है तो उनके निमित्त पंचांगुली साधना मौलिक साधना की गई करने वाला भूत वर्तमान और भविष्य की पारीक रखता है । जुड़कर भविष्य लगता है इसलिए गुरुओ का कथन है पंचांगुली साधना से व्यक्ति अपने भूत और वर्तमान को भी देख सकता है अद्भुत भारतीय साधना को कैसे सफल किया जाए ब्रह्मांड को आप जानना चाहते हैं फिर आप जीवन और मरण के बंधन को समझने के योग्य हो जाते हैं । आपके समस्त कष्टों का हरण करने वाली है । क्योंकि यदि आपको आज ही पता हो कि कल आपके साथ पूरा होने वाला है ।तो आप तपोबल और साधना से भविष्य को सुधारने में समर्थ हो सकते हैं । अपने जीवन में मनचाहा परिवर्तन ला सकते हैं । कुंडली में ग्रहों के दर्शाए उत्तर नहीं है तो आप से परिवर्तित कर सकते हैं यदि आपके में कोई भावना हो सकते हैं
और आप इसी कारण पंचांगुली साधना बेहद बेहद और अत्यंत विराट साधना है देने के लिए अति संक्षेप में आपको की पंचांगुली देवी उसका साधना विधान समझाने के लिए प्रेरणादायक बताने के लिए कुछ शब्द आपको कहे । लेकिन शब्दों में इस महाविद्या को नहीं जान सकते। सर्वप्रथम पंचांगुली काल ज्ञान मंत्र लेना चाहिए और इत्यादि सहित अन्य मंत्रों का भी हवन करना चाहिए जिससे पंचांगुली साधना प्राप्त कर सकते हैं
कि शास्त्र सम्मत इसी प्रकार शास्त्र ने प्राचीन समय से ऋषि होने पर गुरुओं ने क्या है तो पंचांगुली साधना आप अपने जीवन में कर सकें आप अपने हाथों की रेखाओं में क्या छुपा है यह जान सके चेहरे की आकृति और बनावट में क्या छुपा है यह जान सकें और भविष्य के आने वाले समय में आपके लिए क्या छुपा सके और आने वाले वक्त को बदल सकें आशीर्वाद आपको देता हूं
मंत्र के माध्यम से आपको देवी माता की स्तुति करनी चाहिए ।और देवी की सिद्धि के लिए प्रथम पात्रता अर्जित करने का की प्रमुख मंत्र है । इसी मंत्र से आपको पात्रता प्राप्त होगी और आप अपने गुरु के पास जाकर इस देवता को प्राप्त कर सकेंगे भूमिका में प्रणाम ओम नमः शिवाय ।