मैं रुद्र नाथ हूँ — एक साधक, एक नाथ योगी। मैंने अपने जीवन को तंत्र साधना और योग को समर्पित किया है। मेरा ज्ञान न तो किताबी है, न ही केवल शाब्दिक यह वह ज्ञान है जिसे मैंने संतों, तांत्रिकों और अनुभवी साधकों के सान्निध्य में रहकर स्वयं सीखा है और अनुभव किया है।मैंने तंत्र विद्या पर गहन शोध किया है, पर यह शोध किसी पुस्तकालय में बैठकर नहीं, बल्कि साधना की अग्नि में तपकर, जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे जीकर प्राप्त किया है। जो भी सीखा, वह आत्मा की गहराइयों में उतरकर, आंतरिक अनुभूतियों से प्राप्त किया।मेरा उद्देश्य केवल आत्मकल्याण नहीं, अपितु उस दिव्य ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना है, जिससे मनुष्य अपने जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझ सके और आत्मशक्ति को जागृत कर सके।यह मंच उसी यात्रा का एक पड़ाव है — जहाँ आप और हम साथ चलें, अनुभव करें, और उस अनंत चेतना से जुड़ें, जो हमारे भीतर है ।Rodhar nath
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हनुमान जी की तंत्र साधना Hanuman Tantra Sadhana हनुमान जी की तंत्र साधना रामभक्त हनुमान Hanuman के पराक्रम से भला कौन परिचित नहीं है । अंजनी नंदन भगवान हनुमान जी सर्वमान्य देव हैं । उन्हें अतुलित बल के धाम, बल – बुद्धि निधान, ज्ञानियों में अग्रमान्य, ध्यानियों में ध्यानी, योगियों में योगी और अनन्त नामों से विभूषित किया गया है ।
पवन पुत्र हनुमान Hanuman को शिव का अवतार माना गया है । तंत्र में उन्हें एकादश रुद्र माना गया है । पवन पुत्र इतने बलशाली हैं कि बाल्यकाल में ही उन्होंने सूर्य को अपने मुंह में रख लिया था । हनुमान Hanuman जी के विषय में सब जगह कई अन्य बातें प्रचलित हैं।
एक बात यह है कि कलियुग में जहां भी रामकथा का गुणगान किया जाता है, वहां पूरे समय कथास्थल पर भगवान श्री हनुमान Hanuman जी उपस्थित रहते हैं । यह विश्वास एक अन्य तथ्य से भी सिद्ध होता है । संसार में सात चिरंजीवी माने गये हैं । इन सात चिरंजीवियों में अश्वत्थामा, परशुराम और हनुमान तो सर्वविख्यात हैं । चिरंजीवी का अर्थ है जो मृत्यु के रूप में शरीर का परित्याग नहीं करते, बल्कि स्वेच्छा से दृश्य-अदृश्य होने की शक्ति का उपयोग करते हैं।
Veer Bulaki Sadhna – प्राचीन रहस्यमय वीर बुलाकी साधना PH.85280 57364 गुरु मंत्र साधना में आप का स्वागत है दोस्तों बाबा वीर बुलाकी कोण है कैसे इनका जन्म हुआ कैसी या कितनी बड़ी शक्ति है इन सब के बारे में बहुत सारी कथाएं बहुत सारे लोगों को जो आपने सुना होगा यूट्यूब पर भी बहुत सारे देखा और सुना होगा
गोगा जाहरवीर के पुत्र के जाते हैं यमुना में बहा दिए गए थे उनके बरून और कई लोग धोने से यह जन्मे है कई कहानियां कहानियां है। मैं एन के बारे में बताने जा रहा हु और शायद आपने यह जानकारी कहीं थोड़ी बहुत सुनी होगी और पूरी जानकारी कहीं नहीं सुनी होगी।
तो आज जो मैं आपको बताने जा रहा हूं बाबा वीर बुलाकी के बारे में जो कि आगरा की सच्ची सरकार कहीं जाते हैं। इन का जो स्थान है वह आगरा में है उससे पहले मैं आपको बता दूं कि अगर आपने हमारे वेबसाइट को सब्सक्राइब नहीं किया। तो सीधे हाथ पर जो बटन उसे दबा दो ताकि हमारी आने वाली जो और जानकारियां है वह भी आपको मिल जाए गा।
बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki का स्वरूप तो मैं आपको बता दूं जो बाबा वीर बुलाकी हैं इनके जन्म की तो जो कथाएं हैं वह एक अलग नहीं आए जिसे प्राचीन हम लोग कह सकते हैं। जो अभी तक किसी के सामने नहीं आई है वही सुनी सुनाई बात है वह चल रही है। बाबा वीर बुलाकी वह बहुत शक्तिशाली देवता है,बालक का जो स्वरूप है बाबा वीर बुलाकी का पूजा जाता है, उनके एक हाथ में सोटा और एक हाथ में मदिरा है।
बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki जी का स्थान बाबा वीर बुलाकी जी सबसे ज्यादा जमुना माता को मानते हैं जमुना को अपनी माता मानते हैं। जमुना जी आगरा तक जाती है और इनके मंदिर और मठ जमुना किनारे बनाए जाते है ! इनका सबसे बड़ा स्थान आगरा में ही है !
यह जमुना माता को इतना मानते अगर इनको जमुना माता की आन दी जाए तो यह वही रुक जाते है। और कमाल खा सयद इन के मिन्दर के पास कमाल खा सयद की मजार है. यह उनको अपना गुरु मानते थे ! कमाल खा मसानी माता काली और श्मशान आग वाणी शक्ति इनके साथ चलती है।
बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki किस रूप में आते है
बाबा वीर बुलाकीVeer Bulaki किस रूप में आते है- वह बाबा वीर बुलाकी के साथ बाबा वीर बुलाकी बहुत उग्र देवता है जब इनकी सवारी आती है। तो यह जोर जोर से हाथ हलाते है। भगत के दिल की धड़कन बहुत बढ़ जाती है जैसे कितने किलोमीटर से दौड़ लगा कर आया हो बाबा वीर बुलाकी जो है वह उग्र देवता है जब आते है।
तो हाथ जो है यह हाथ जोर जोर से हलती हुए आते है। जब इनकी की सवारी आती है तो अलग ही रूप इनका देखने को मिलता है जो इनकी जो साधना है इनकी जो सेवा है वह 99 परसेंट फलदाई होती है। अगर आप इसे करते हैं जमुना घाट पर घर के मुकाबले में जायदा प्रभावशाली है।
आप अगर इसे जमुना घाट की सेवा करते इनका भोग देते हैं तो अति शीघ्र फलदाई होती है। जमुना घाट पर किया जाता है जमुना जी किनारे इनकी जब पूजा भोग दिया जाता है।
बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki जी इस भोग पर चलते है
बाबा वीर बुलाकी Veer Bulaki जी इस भोग पर चलते है बाबा वीर बुलाकी जो है वाल्मीकि समाज में के कुल देवता माने जाते हैं देव तो है वह पर वाल्मीकि समाज में यह बहुत सारे लोगों की जो है वह कुल देवता है यह जो है यह सूर का बच्चा बकरा मुर्गा और दारू इस पर चलते हैं . शक्तियां जो हैं वह कोई बुरी नहीं होती पर जो लोग हैं जो भगत हैं वो उन्हें बुरा बना देते हैं वंदन करके करके उनको कुछ शक्तियां है जो कार्य करने के लिए तत्पर हो जाती हैं पूजा लेकर काम करते है
तो पहले तो मैं आपको एक बात बता दूं बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो बाबा वीर बुलाकी को गालियां उल्टी-सीधी बोलते हैं और भी देवी देवता एक चीज नहीं है दिमाग में रख लेना हम हैं इंसान हम जो हैं वह कर्म बंद है पर शक्तियां कर्म बंद नहीं होती कोई भी कार्य करेंगे तो पाप पूण्य नहीं लगता !किसी की बात ओ में आकर इनके बारे में कुछ उल्टा मत बोल देना अगर यह बिगड़ जाते है तो घर को श्मशान बना देते है
गुरमुख होकर जब किसी गुरु के द्वारा पूरे परंपरागत चलते हैं पूरे कुल में चलते रहते तो पीड़ी दर पीड़ी चलते है अगर कुल में कोई भोग नहीं देता तो यह कोई संकेत नहीं देते है भवाल मचाना शुरू कर देते है अगर आपने इनकी पूजा भोग दिया है जाता है तो यह आपकी पीढ़ी को भी पूजे जाते है
वाल्मीकि समाज में सबको पता होता है इसलिए वह सब पूजा करते है अगर कुल कोई और समाज का व्यक्ति बाबा वीर बुलाकी को लेना चाहता है तो बहुत सोच समझ कर ले क्योंकि बहुत उग्र शक्ति है बहुत शक्तिशाली शक्ति है उनकी पूजा सेवा टाइम पर नियम जो इनके वह बहुत कड़े होते हैं वह कर करते है तो बाबा वीर बुलाकी जो है वह अति शीघ्र प्रसन्न होने वाले है
वीर बुलाकी Veer Bulaki साधना विधि जैसे मैंने आपको बता दिया उनका स्वरूप जो है वह काला है शनिवार के दिन माना जाता है। शनिवार के दिन की पूजा की जाए बहुत ज्यादा बहुत जल्दी प्रसन्न होते मैंने आपको बता दिया कि बाबा बुलाकी कमाल का सैयद और जमुना माता इन तीनों का भोग ज्यादा जमीन की पूजा की जाती है।
इनकी जो साधना है वह वैसे 41 दिन की साधना इनकी जब की जाती है। अगर आप घर पर साधना कर रहे हैं जमुना किनारे भोग देकर आना होता है शनिवार की घर पर आपको जो भी आप ध्यान लगाना है। फिर मंत्र जाप करना होता है इनकी पूजा में जो चीजें इस्तेमाल होती हैं वह बूंदी का लड्डू बर्फी है दूध है।
अगरबत्ती लोग कपूर सिगरेट शराब की बोतल और छुआरा सामग्री जो है इन के भोग के लिए प्रयुक्त की जाती है यह प्रयोग किया जाती और एक इनका जो है वह दीपक जलाया जाता है।
इनकी जो सेवा है कि जो पूजा है जो इनकी सेवा पूजा करते हैं वह जल्दी कह सकते हैं। अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं जो है और जिन कामो को करने के लिए उनकी शक्ति बिल्कुल चुटकी भर से काम करती है। इनकी साधना में जो है वह लाल और काले कपड़े का प्रयोग किया जाता है और साथ-साथ माला होनी है। वह हकीक की माला जो है वह प्रयोग की जाती है।
वीर बुलाकी Veer Bulaki की सिद्धि के लाभ
वीर बुलाकी Veer Bulaki की सिद्धि के लाभ इनका जो भगत है अगर इनका भगत जो है वह किसी के घर में पैर रख देता तो सारी चीजों का अनुभव हो जाता है। और बहुत सारी सारी चीजें जो है वह अपने आप ही घर छोड़कर भाग जाती हैं किसी के घर घर की देवताओं को मानते हैं उस घर की जो देवता है वह पहले खुद ही साइड हो जाते हैं , हर जगह पर ही चले जाते हैं किसी चीज का परहेज नहीं है। गंदी अच्छी हर जगह पर चले जाते हैं कार्य करते है आप के बड़े से बड़े कम इन की साधना चुटकी में हो जाते है यह बहुत ही तीव्र गति से काम करते है।
कभी भी अगर कोई करने के लिए सोच मेरा वैसे तो वाल्मीकि समाज में बहुत आसानी से इनकी सेवा पूजा मिल जाती है जैसे यह हुक्का लगाया जाता और जब इनकी सवारी आ जाती है का प्रसाद दिया जाता है यह साधना बिल्कुल किसी को नहीं करनी चाहिए क्योंकि बिना गुरु के बहुत हानिकारक हो सकती है साथ यह साधना साधना ऐसी होती जो बिना गुरु ले कर सकते बस कुछ साधना ऐसी होती है जो बिना गुरु की करनी ही नहीं चाहिए साधना है
बिना गुरु के इस साधना को भी मत करना बहुत अचूक साधना है बहुत कहते हैं कि उग्र साधना है। अगर आप वाल्मीकि समाज से तो आपके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। साधना को करना साधना आपको पीढ़ी दर पीढ़ी मिलती है अपने गुरु से मिलती और बात करें।
अगर मंत्र की बात करें तो देखो मंत्र जो मैं आपको बताने जा रहा हूं। इनका बहुत ही शक्तिशाली शाबर मंत्र है और देखो बात होती कि कोई भी देवता है ना उसके मंत्र तो सही होते हैं गुरु से के द्वारा जो मिले होते हैं। सिद्ध मंत्र होते वह जो किसी ने नेट पर बात होती है परंतु जो मंत्र होते हैं. वह सही में नहीं चलते हैं और मंत्र जब जागृत होते हैं। जब आपकी सेवा आपके भक्ति मंत्रों को जागृत करते है.
बोलना चाहूंगा कि बहुत उग्र साधना है बहुत सोच समझकर साधना को करिएगा अगर करना चाहते हैं ,तो और मैं तो आपसे पर यह बोलूंगा कि देखो जानकारी के लिए यह सारी चीजें आपको उपलब्ध होती हैं।
आप जानकारी बहुत से लोगों को होती है। जानकारी के किस तरीके कौन देवता क्या है कैसा है। कहां क्या कैसे काम करता है कैसे साधना करना जानकारी लेने में फर्क होता है मैंने बाबा वीर बुलाकी के बारे में थोड़ा सा आपको बता दिया बाकी मेरी कोशिश है कि आपको ज्यादा ज्यादा जानकारी बता सकूं बाकी जैसे मैंने आपको बताया है कि
1 बाबा वीर बुलाकी का सात्विक भोग क्या है ?
बूंदी का लड्डू बर्फी है दूध है अगरबत्ती लोग कपूर सिगरेट शराब की बोतल और छुआरा बतासे
२ बाबा वीर बुलाकी साधना किस रूप में आते है ?
वह बाबा वीर बुलाकी के साथ बाबा वीर बुलाकी बहुत उग्र देवता है जब इनकी सवारी आती है तो यह जोर जोर से हाथ हलाते है भगत के दिल की धड़कन बहुत बढ़ जाती है जैसे कितने किलोमीटर से दौड़ लगा कर आया हो बाबा वीर बुलाकी जो है वह उग्र देवता है जब आते है तो हाथ जो है यह हाथ जोर जोर से हलती हुए आते है जब इनकी की सवारी आती है तो अलग ही रूप इनका देखने को मिलता है
३ बाबा वीर बुलाकी के साधना में शीघ्र सिद्धि प्राप्त करने के लिए क्या करना होगा ?
बाबा वीर बुलाकी जी की साधना अगर जमुना दे किनारे पर की जाए तो जल्दी सिद्धि प्राप्त हो सकती है
4 बाबा वीर बुलाकी की पूजा किस दिन होती है ?
बाबा वीर बुलाकी की पूजा शनिवार से होती है इस का भोग शुभ महूरत में होता है जैसे के दीवाली होली पर
5 वीर बुलाकी Veer Bulaki तामसिक भोग
बाबा वीर बुलाकी जो है वाल्मीकि समाज में के कुल देवता माने जाते हैं देव तो है वह पर वाल्मीकि समाज में यह बहुत सारे लोगों की जो है वह कुल देवता है यह जो है यह सूर का बच्चा बकरा मुर्गा और दारू इस पर चलते हैं . शक्तियां जो हैं वह कोई बुरी नहीं होती पर जो लोग हैं जो भगत हैं वो उन्हें बुरा बना देते हैं
चमत्कारी प्राचीन लोना चमारी lona chamari साधना शाबर मंत्र lona chamari ph.85280 57364
लोना चमारी साधना lona chamari sadhna
लोना चमारी lona chamari का भोग
लोना चमारी lona chamari साधना विधि
लोना चमारी lona chamari मंत्र
लोना चमारी lona chamari साधना के लाभ
चमत्कारी प्राचीन लोना चमारी lona chamari साधना शाबर मंत्र lona chamari – पलभर में सिद्ध करे सभी काम, कामरु देश लूना चमारी साधना गुरु मंत्र साधना .कॉम में आपका हार्दिक स्वागत है । दोस्तों तंत्र मंत्र में जहां 52वीर 56 कलवा चौसठ योगिनी का बहुत बड़ा स्थान है साथ में लोक देवताओं का स्थान है । जिसमें गोगा जाहरवीर मीरा पहलवान और भी हमारे बहुत सारे लोक देवता का स्थान है ! lona chamari
और भी हमारे देवता हो बाबा नागार सेन हो चाहे ग्राम खेड़े हो चौक चौराहे वाली माता हो उसी प्रकार एक ऐसी तंत्र की देवी हैं जिनको लूना चमारी के नाम से जाना जाता है । लूना जोगन के नाम से जाना जाता है जो कामरु देश कामाख्या की हैं अपने आप में असीम शक्तियों को समाहित करने वाली यह देवी एक बहुत बड़ी जादूगरनी के नाम पर बहुत बड़ी जादूगरनी के रूप में पूजी जाती हैं । जिसमें बहुत सारे लोगों के घर की कुलदेवी के रूप में पूजते हैं ,तो कुछ लोगों की देवी कहीं जाती है ।
लूना जोगन को लूणा जोगन इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इनके जो गुरु थे । इस्माइल जोगी थे तो जिस तरीके से नाथ परंपरा चली गुरु गोरखनाथ के बाद उनके शिष्य थे । वह नाथ कहलाए चौरंगीनाथ भरतरी नाथ उसी प्रकार से इस्माइल जोगी की जो शिष्या थी । वह लूना चमारी और लूना जोगन के नाम से प्रसिद्ध हुई । जिनका नाम आज तंत्र की दुनिया में बड़े सम्मान से लिया जाता है ,और साथ-साथ जितने भी शाबर मंत्र हैं उन शाबर मंत्रों में लूना चमारी का एक विशेष स्थान है ।
अगर लूना चमारी की आन किसी मंत्र में दे दी जाए शाबर मंत्र में तो निश्चित रूप से उस देवता को वह कार्य करना पड़ता है । या फिर उस देवता को अपनी शक्ति का अंश प्रदान करना पड़ता है, यह बहुत बढ़िया जादूगरनी थी इनाम तांत्रिक कह सकते हैं । जिन्होंने बहुत सारी साधना की थी और साथ साथ में गुरु गोरखनाथ जी को खुश किया था । गुरु गोरखनाथ जी से 56 कलवो का वरदान प्राप्त किया था । मां भगवती मां दुर्गा की साधना करके इन्होंने असीम शक्तियां हासिल की थी और गुरु इस्माइल जोगी उनसे इन्होंने बहुत सारी कलाएं बहुत सारी तंत्र मंत्र की दीक्षा जो है वह ग्रहण की थी ।
जब इन के पास ५६ कालवे आ गए थे तो बहुत काम करने के लाइक हो गई थी । बहुत सारे कार्य को करने में सक्षम हो गई मैं आपको बता दूं जब 56 कलवे जैसे हम बोलते हैं गोगा जाहरवीर के पास में गोगा जाहरवीर जी महाराज से पांच बावरियों को 56 कलवे मिले उन पांच बावरियों का 56 कलवे प्रदान किए गए, तो अगर आपने उनकी कहानी पढ़ी हो तो जब उनके सर कट गए थे ।
तब भी वह युद्ध में लड़ते रहे थे और सा साथ में वह जैसे पीर अस्तबली उनके स्थान पर जाकर अमर हो गए और पांच बावरियों की कई स्थान है । जहां पर उनकी पूजा होती है चाहे सफीदों धाम मुरथल खेड़ा हो इसी प्रकार जब 56 कल्वो की जो शक्ति होती है ।
वह असीम होती है जिस जिस ने 56 कल्वो को प्राप्त किया है । उसका नाम इस जग में अमर हो गया है और यहां तक कि वह पूजनीय हो गया है अगर 56 कलवे कर लेते है । यह बहुत अद्भुत कार्य करते हैं जैसे कि किसी की खबर मंगवानी हो उनकी शक्ति के द्वारा किसी को पीड़ा देनी हो शमशान की शक्ति का काट करना हो वह बांधनी कोख खोलनी हो ।
हाजिरी मंगवानी हो मारण करना हो आकर्षण करना हो वशीकरण करना हो उच्चाटन करना हो । इस सभी क्रियाएं 56 कलुआ के द्वारा की जा सकती है और साथ ही किसी की भी पूछा देना किसी भगत के द्वारा वह भी 56 कलवे करते हैं उस कार्य को भी 56 कलवे सिद्ध करते हैं । 56 कलवे के द्वारा किसी भी व्यक्ति की सालों पुरानी बातें वह भगत खोल के रख सकता है
sham Kaur Mohini माता श्याम कौर मोहिनी की साधना और इतिहास
sham Kaur Mohini माता श्याम कौर मोहिनी की साधना और इतिहास बहुत सारे sadhak जनो के अनुरोध पर आज हम आप लोगों को देवी श्याम कौर मोहिनी के विषय में पूर्व और प्रमाणिक जानकारी देंगे ,और इनके साधना का भी ध्यान भी आपको देंगे की देवी श्याम कौर मोहिनी के विषय में जितनी भी जानकारी गूगल पर है। 99% जानकारी गलत है। इनके विषय में जितनी भी जानकारी आप लोगों को गुरु देते हैं वह भी 99 प्रसिद्ध झूठी है। कोई इसे जोड़े में चलता है बताते हैं कोई इसे धर्म की बहन बताते हैंकोई इसे पांच बावरियों की बहन बताते हैं।
माता श्याम कौर sham Kaur Mohini मोहिनी परिचय
माता श्याम मोहिनी sham Kaur Mohini का इतिहास
माता श्याम कौर sham Kaur Mohini मोहिनी मंत्र रहस्य
माता श्याम कौर sham Kaur Mohini मोहिनी साधना के लाभ
Masani Meldi माता मेलडी मसानी प्रत्यक्ष दर्शन साधना और रहस्य ph. 85280 57364
guru mantra sadhna .com me आप का स्वागत है माता मेलडी के परिचय के बारे में परिचय देंगे दोस्तों माडी गुजराती का शब्द है ,माडी का हिंदी में अर्थ होता है माता माता को ही माडी कहते हैं। जो मसानी श्रेणी की शक्ति होती है , यह मिसाइल की तरह होती है यह शक्तिया साधक के सब काम करती है। कोई भी कार्य हो उचित अनउचित सब काम करती है और वो कार्य भी कम समय में करती है। मिसाइल का उद्धरण देने का कारन यह शक्ति कम समय में काम करती है , शक्ति यह नहीं देखती के सामने वाला कोण है कैसा बिलकुल मिसाइल की तरह काम करती है। अगर आप शक्ति से गलत काम भी करवाओ गए कर देंगी पर इस का फल आप को भोगना होगा कुछ समय के पश्चात् कर्मो से आज तक कोई नहीं बच पाया है। Masani Meldi माता मेलडी मसानी मैली शकितया की सवारी करती है इन्होंने भूत प्रेत मसान मंत्रिका तंत्रिका सब मैली शकितो को बकरा बना कर उस पर सवार हो गई थी Masani Meldi माता मेलडी मसानी सभी मैली शक्तिओ के स्वामी है । आगे की कथा में आप को इस बारे में विस्तार सहित जानकारी मिलेगी।
मेलडी माता का भोग
माता मेलडी मसानी साधना
मेलडी माता का मंत्र
मेलडी माता का इतिहास
माता मेलडी मसानी साधना विधि
Masani Meldi माता मेलडी मसानी सिद्धि के लाभ
मेलडी माता का मंदिर
Masani Meldi मेलडी माता का इतिहास – माता मेलडी मसानी उत्पति की कथा
मेलडी माता का इतिहास – सत्ययुग की समाप्ति के समय बहुत प्रतापी मायावी और मर्दानी था असुर था जिसका नाम अमरूवा था उसके अत्याचारों से कुहराम मच गया था और देवताओं का महासंग्राम हुआ था। और उसमें देवता पराजित हो गए थे। उन्होंने महाशक्ति की स्तुति की और वहां आदि शक्ति जगदंबा सिंह वाहिनी दुर्गा प्रकट हुए और उन्होंने नौ रूप धारण किए उनके साथ दसमहाविद्या और अन्य सभी शक्तियां प्रकट हुई। महा भयंकर युद्ध चला और 5000 वर्षों तक लगातार युद्ध हुआ। अपने प्राणों को संकट में देखकर भागा वह रहा में देखता है कि किसी मृत गां के देह का पिंजरा पड़ा है।
उसे लगा कि इस पिंजरे में शरण लू तो के देव देवी नजदीक नहीं आएंगे और असुर पिंजरे में समा गया देवी शक्तियां पीछा करते हुए वहां पर आए तो शत्रु के पिंजरे में जा घुसा है। सभी देव या वहीं पर ठिठक कर खड़ी हो गई मृत गां का पिंजरा अशुभ माना जाता है तब देविया सोच में पड़ गई कि इस आशुद्ध पिंजरे से दैत्य को निकालना वह भी पिंजरे में घुसकर यह तो असंभव है, और पिंजरे से बाहर निकाले बिना वध भी नहीं किया जा सकता है। ऐसी अजीब स्थिति में देवी शक्तियां मजबूरी में अपने हाथ मलने लगी हथेली पर हथेली की रगड़ से उर्जा उत्पन्न हुई। और मैल के रूप में बाहर आई श्री उमा देवी ने युक्ति लगाई और सारे मेल को एकत्र करें
मूर्ती का रूप दिया सभी देवी और देव मिलकर आदिशक्ति की स्तुति करने लगे तत्काल उस मूर्ति से आदिशक्ति वह हाथ में खंजर ले 5 वर्ष की कन्या के रूप में प्रकट हो गए। और पूछा है माताओं मुझे बताओ क्यों मेरा आव्हान किया देवियों ने सारी व्यथा कह सुनाई और सारा माजरा समझ गई।
देवियों के कहे अनुसार गाउ के पिंजरे में प्रवेश कर गई। जब उस असुर ने यह सब देखकर आश्चर्यचकित हो गया , और वहां से बाहर भागा और स्याल सरोवर में जाकर कीड़े के रूप में छिप गया कन्या स्याल सरोवर में प्रवेश करके असुर का वध किया और सब देवताओ ने जयजयकार किया और अपने धाम को लोट गए। अगर कन्या खुद उत्पन होती तो कार्य पूरा करने के पश्चात् खुद चली जाती। यहाँ पर तो उस कन्या की रचना कर आवाहन किया गया था ।
उस कन्या ने उमिया माता को पकड़ा और अपना नाम धाम और काम पूछा उमिया माता ने उन्हें चामुंडा के पास भेज दिया। सत्य हमेशा कसौटी पर कसा जाता है। और सत्य की परीक्षा होती है चामुंडा नाम कन्या को कामरूप कामाख्या विजय हेतु भेजा चामुंडा जानती थी ,कि कामाख्या तंत्र मंत्र जादू टोना और आसुरी शक्तियों की सिद्धि स्थली है। यदि यह वहां से विजय होकर लौटती है , तो अभी इनकी वास्तविक शक्ति का अंदाजा होगा फिर उसी के अनुसार नाम और काम सौंपा जा सकेगा।
कन्या काम रूप में लगे पहरे को ध्वस्त कर दिया, मुख्य पहरेदार नोरिया मसान को पराजित कर दिया। कामाख्या नगरी में प्रवेश के साथ उन्होंने देखा कि तंत्र मंत्र जादू टोना काली विद्या माया के ढेर इन सब को समझने में ही अमूल्य समय जाया हो जाएगा। उन्होंने सब को घोल बनाकर बोतल में भर लिया भूत प्रेत मंत्रीका का तंत्रिका सभी दोस्तों को बकरा बनाकर उस पर बैठकर बोतल लेकर बाहर आ गई और माँ चामुंडा पास पहुंची।
देवता दानव सब उनका जयघोष किया, चामुंडा ने कहा जिस विद्या का प्रयोग दूसरों को दुख देने के लिए होता है उसे मैली विद्या कहते हैं ,तुमने उसी मैली विद्या पर विजय पाई है। एवं समस्त शक्तियों के हस्त रगड़ से तुम्हारी उत्पति हुई है। इसलिए तुम्हारा नाम मेलडी माता होगा तुम्हारा स्वरूप कलयुग की महाशक्ति रूप के लिए हुआ है तुम कलयुग के विकार अर्थात में काम क्रोध मद लोभ मोह का नाश करने वाली शक्ति हो।
सारा संसार तुम्हें श्री मेलडी के रूप में पूजा अर्चना करेगा तुमने समस्त दुष्टो को बकरा बना दिया है अब यही तुम्हारा वाहन होगा संस्कृत में बकरे को अज कहां जाता है अज का अर्थ ब्रह्मांड होता है। बकरे के ऊपर या ब्रह्मांड के भी ऊपर विराज ने वाली आदिशक्ति हो रूप में गुजरात की भूमि तुम्हारा वा स्थान होगा। परंतु तात्विक रुप से देह धारियों की जीवनी शक्ति के रूप सारी सृष्टि में तुम्हारा बात स्थान होगा कलयुग में तुम बकरे वाली मेलडी मां घर-घर पूजी जाओगी।
Sifli ilm सिफली इलम रहस्य हिंदी में विस्तार सहित सिफली इलम का नाम आप ने ज़िंदगी में जरूर सुना होगा। पर आप को इस बारे में जानकारी नहीं होगी के यह सिफली इलम क्या होता है। आज हम इस विषय पर ही बात करेंगे हमने पहले भी तंत्र के ऊपर बहुत सारी जानकारीया इस ब्लॉग में बताई है आप वो पोस्ट भी जरूर देखो। तंत्र के बारे में आपको बहुत जानकारी हो जाएगी हमारा यही उदेश्य है के तंत्र क़ी छोटी से छोटे जानकारी को आप को प्रदान करना।
सिफली इल्मSifli ilm क्या है ?
सिफली इल्म Sifli ilm क्या है ? सिफली इल्म
Sifli ilmएक तंत्र की प्रकार है तंत्र कई तरह का होता हैसिफली इल्म भी एक तंत्र का परकार है। yeh साधरण तंत्र से जायदा खतरनाक होता है। इस तंत्र के द्वारा शैतानी शक्तिओ को जागृत किया जाता है। जो शक्तिया शमशान और कबरस्तान में निवास करती है जिसे में काळा जिन में काली जिन्नात और भूत प्रेत ख़मीस शामिल है।इन काली शक्तिओ का इस्तमाल गलत कामो के लेया किया जाता है।
सिफली इल्म Sifli ilm की काट और सिफली इल्म का इलाज
सिफली इल्म Sifli ilm का तोड़ अगर किसी पर सिफली इलम किया गया है। और वो वियक्ति इस इलम से परेशान है तो उसे आयतुल कुर्सी का पथ करना चाहिए उसे इसे आराम मिलेगा। अगर आयतुल कुर्सी पढ़ने नहीं आता है तो किसी और से जप करवा कर जल को आयतुल कुर्सी के पाठ से अभिमंत्रित करवाकर उस जल को ग्रहण करे। अगर इलम घर में किया गया है तो आप अभिमंत्रित जल का छिड़काओ घर में भी कर सकते है।
सिफली इल्म
Sifli ilm
की किताब pdf
सिफली इल्म की किताब pdf – सिफली इल्म की जानकारी के लिए बहुत कम पुस्तके उपलब्द है अगर इस विषय के बारे में जायदा जायदा जानकारी चाहिए तो आप तिलस्मी दुनिया के नाम से एक मैगजीन छपता है उस में आप इस विषय के बारे में जानकारी हासिल कर सकते है। सिफली इल्म करने का तरीके बताये और बहुत सारे सिफली इल्म का वजीफे बताए गए है। सिफली इल्म करने का तरीका पीडीऍफ़ के रूप में भी यह पुस्तक इंटरनैट पर मिल जाए गी ph.85280 57364
शिव तंत्र रहस्य – Shiv Tantra Rahasyamaya Ph. 85280 57364
शिव तंत्र रहस्य – Shiv Tantra Rahasyamaya Ph. 85280 57364
शिव तंत्र रहस्य – Shiv Tantra Rahasyamaya Ph. 85280 57364 तंत्र क्रियामक पद्धति साधना जगत में एक की अपेक्षा किसी हैं। इस बहुता व्यवस्था की ही दूसरी संज्ञा है बात की पुष्टि होती है कि प्रत्येक सम्प्रदाय का अपना विशिष्ट के इस तथ्य से, है। तंत्र रहा है, चाहे वह वैष्णव सम्प्रदाय चाह हो
अथवा अन्यान्य कोई भी सम्पदा निय ज्यो और प्रत्येक तंत्र का आधार रही है शिवोपासना ! तं शब्द से आज का समाज सन्तुष्ट नहीं है। तंत्र के प्रति समवेत् विरोध का स्वर सुनाई देता है दूसरी ओर समाज का महत्वाकाक्षी वर्ग तांत्रिक साहित्य की ओर आकर्षित हो रहा है।
प्रायः जादुई क्रियाकलाप की सीमा में ही मि अनैतिक या और सृजित विद्या में शिव रूप में मान्यता प्राप्त है समय के परिवर्त्तमान चक्र से तंत्र शब्द की सामाजिक क्रिया-पक्ष को समाज के साथ अविरत सुनियोजित नहीं किया जा सकता है।
आत्मा के परिज्ञान के परिवेश को जब जगत से उठाकर बाह्य मंडल में आरोपित करने की स्थिति की अवस्थिति को इसमें प्रत्यभिज्ञान कहा गया है. | लेकिन गर्हित कार्य की सर्वदा निन्दा की गई है। साधना के क्षेत्र में भौतिक सुखों की उपेक्षा ही नहीं इनकी अप्रस्तुति भी की गई है।
तंत्र में कुल कुण्डलिनी को जगाकर मणिपुर निवासी आनन्दमयी शक्ति के साथ जीव के विलीनीकरण का आयकरण किया गया है। इस | ब्रह्ममयी शक्ति के सम्पर्क से जीव शिव स्वरूप को प्राप्त करता है तंत्र निश्चित से वह दिया है, जिसमें जीव | की माया का साक्षात्कार योगमाया से होता है।
योग समत्व की अमिधा शक्ति है। समय की इसी शक्ति की पाविद्या है। माया अहेतुक और हेतुक ज्ञान से सम्बन्धित है। तांत्रिकगण माया को ज्ञान का भी प्रतीक मानते हैं। आत्मचेतना के उन्नयन की विद्या के रूप में तंत्र का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। तंत्र प्रकाशमार्ग का सोपान है।
मानव अपने जीवन के अंधकार को निर्वासित करने के लिए मंत्र की प्रत्यभिज्ञा की ज्योति को प्राप्त करना चाहता है। तंत्र का मूल उद्देश्य भौतिक अंधकार से निवृत्ति प्राप्त करना है।
वस्तुतः तंत्र सनातन सात्विक ज्योतिर्मयी शक्ति की उपासना है तमोगुण और रजोगुण के भयावह चक्र से दूर रहकर सहस्र सूर्य के आलोक में प्राप्त और प्राप्ति के नियम के विनियमन की व्यवस्था ही तंत्र है।
तंत्र कभी भी निकृष्ट कर्म का परिचायक नहीं है। आत्मशक्ति की चेतना से मानव पूर्णत्व की ओर अग्रसर होता है और इसके विपरीत की अवस्था में मानव निर्बल होकर सत्यज्ञान से दंचित हो जाता है। तंत्र साधना का सम्बन्ध आत्म प्रत्यक्षीकरण से है स्वयं के प्रति बोध को उद्बोधित करना ही तंत्र का कार्य है। तंत्र इससे समता की भावना उत्पन्न होती है।
समता से सत् असत्, त्याज्य और अत्याज्य का भेद समाप्त होता है। आत्मज्ञान की ज्योति इससे प्रज्ज्वलित होती है इसलिए यह कहा जा सकता है, कि आत्मज्ञान की प्रत्यभिज्ञावेजा में शंकर शिष्यों की अपने अनुभूति-जन्य सादृश्यता की वाचितानुवृत्ति में नहीं उलझते हैं. अपितु सहज दर्शन की अनुभूति होती है। तंत्र चेतना की की अवस्था को वहां तक पहुंचा देता है जहां चित की चिन्ता चिन्मयी में सिमट जाती है।
समदर्शीत्य के ना मौलिक आयाम को तंत्र की भित्ती पर ही चित्रित किया की जा सकता है। को व हरु प्त गम्भीर, गूड़, चिन्तनयुक्त, विद्वतपूर्ण लेखनी से युक्त ‘डॉ० मोहनावन्द मिश्र का लेख प्रामाणिक ज्ञान का ही परिचायक है।
नीव नत्व की तात्रिक साधना के साथ में अनेक सम्प्रदायों का रूप स्थिर हुआ चाहे शैव, शाकत, वैष्णव और बौद्ध हो सबने तंत्र की वीणा के तारों पर अपने विचारों को राग और तान दिया तंत्र के विचारों की प्रक्रिया को विशेषता यह है कि जीवन और शक्ति के उभय सिद्धान्त पर यह अवलम्बित है।
शक्ति के अभाव में शिव तो शव ही हो जाते है अतः प्रधानता शक्ति की है। वैष्णवगण इसे राधाकृष्ण तथा सीताराम की संज्ञा के नाम से सम्बोधित करते हैं बौद्ध उपासक इसे शून्यता तथा प्रशोन्याय के रूप में परिभाषित करते हैं। अनादिकाल से ही तंत्र साधना की परम्परा इस देश में वर्तनान है। योगी इस रहस्यमयी साधना में शिव | और शक्ति की उपासना करते आ रहे है। इस रहस्यमय |
साधना को तंत्र साधना के नाम से जाना जाता है। इस | साधना का प्रभाव सभी सम्प्रदायों पर पड़ा है। यह एक उदात साधना है, लेकिन नौतिकवादी साधकों ने इसे गति रूप में जीवित रखने का प्रयास किया।
वैद्यनाथ धाम एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यहां तंत्र साधना की परम्पर प्राचीनकाल से ही वर्तमान है। वैद्यनाथ धान एक प्रसिद्ध तीर्थ भी है। यहां द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से नवम् वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मंदिर है।
उत्तर गुप्त युग में आदित्यसेन गुप्त इस भूभाग का शासक था। पाल काल में बंगाल के शासकों ने इस पीठ को शिव की प्रशस्ति में अंकित किया 9 वीं सदी के बटेश्वर लेख से भी वैद्यनाथधाम के शिवमंदिर की महत्ता का प्रतिपादन होता है।
सेन वंशीय राजाओं ने भी वैद्यनाथ की प्रशस्ति का गायन किया है। मुस्लिम शासकों के युग में भी इस तीर्थ की लोकप्रियता थी। प्राचीनकाल में वैद्यनाथधाम में कामालिक और नाथसिद्धों की अधिकता थी पूर्व मध्यकाल में यहां शिव की उपासना पद्धति में तात्रिक विधि का ही वर्चस्व था।
मुस्लिम शासन के कुछ पूर्व ही यहां की तांत्रिक उपासना की परम्परा में कुछ ढीलापन आया। डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर में लिखा है कि आदिशंकर यहां आये थे। उनके दिग्विजय की गाथा में भी कापालिकों के साथ उनके विवाद की चर्चा है। उत्त समय यहाँ नाथ मत प्रचलित था। नाथ मत भी शैव परम्परा से सम्बन्धित है, जो शव-पाशुपत कापालिक और योगिनी कौल मतों की परम्परा से विकसित है। मत्स्यन्द्रनाथ योगिनी कॉलमत के प्रवर्तक थे गोरखनाथ का संबंध पाशुपत-व से था।
इन्होंने अपनी साधना की दुरुहता और विभिन्नता के कारण इस मार्ग को कष्टकर और भयावह बना दिया वैद्यनाथ स्थित नाथबाडी नाथों और रिद्धों की परम्परा का साक्षी है। यहां आज भी नाथों की अनेक समाधियां है। स्थानीय तीर्थपुरोहितों के बीच इनकी अनेक गधा प्रचलित है नाथों का यह सम्मम स्थल महाराजा गिद्धौर के अधिकार में है। वैद्यनाथयम एक शैवपी के रूप में ही नहीं शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। सती का हृदय यहां अवस्थित है शिव और शक्ति का प्रबल समर्थन इससे होता है। धर्म के सदृश्यात्मक धरतल पर मातृशक्ति की पूजा की परम्परा यहां प्राचीनकाल से ही प्रचलित है।
नौवी सदी से ही तांत्रिक उपासना की मध्यकालीन यहां प्रचलित है। मध्यकालीन भारत में शून्यता की उनला की प्रबलता बढ़ी और व्यापक रूप में पूर्वाचल में इसकी साधना को साधकों और आराधकों ने अपनाया 12 वी सदी के बाद मिथिला के उपासकों को सामाजिक परम्परा यहां स्थापित होने लगी।
मिथिला में “भैरवो यत्र लिगम के उपासकों की संख्या अधिक है। यहां भी मैथिल तीर्थों का हुआ और तांत्रिक विधि की साधना का प्रचलन हुआ पौराणिक साहित्य में भी इस शक्तिपीठ का वर्णन है। तंत्र में भी प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में इस क्षेत्र का उल्लेख है। इस पीठ की अधिष्ठात्री देवी के रूप में गला महाविद्या का महत्व है। किसी-किसी पुराण में जयदुर्गा का यह की पीठाविष्ठात्री देवी के रूप में उल्लेख है। यहां चौबीत नेतृकाओं की भी पूजा होती है।
पशुबलि की प्रथा भी यह प्रचलित है. यहां शक्ति की उपासना के अनेक विग्रह है जैसे सध्या काली, मनसा बंगला, अन्नपूर्णा जयदुर्गा त्रिपुरसुन्दरी जगज्जननी संकष्टा सीता राधा तारा और महागौरी भीतर खण्ड के प्राचीन कुण्ड में महाप्रसाद से हवन की प्रथा आज भी प्रचलित है की भी नित्य पूजा होती है।
श्रीविद्या आदि विद्या है इसकी उपासना से पराशकिका अगहन किया जाता है। यहां गायत्री की उपासना भी व्यापक स्तर पर होती है। शक्ति की उपासना का आदिरूप ही है। गायत्री शक्ति भी श्री विद्या की उपासना से सम्बन्धित है। आज भी शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों में श्रीविद्या की उपासना की परम्परा विद्यमान है। वैद्यनाधाम में हमशान साधना होती है।
बंगाल के अनेक साधक यहां आकर राधना करते थे. वैद्यनाध्यान के रक्षक वैद्यनाथ ही भैरव के रूप में विराज है। समस्त वैद्यनाथधाम के भौगोलिक स्वरूप को शिवपुराण में चिताभूमि के नाम से जाना जाता है। यह आज भी शक्ति साधना की भूमि है।
सम्पूर्ण सरस्वती साधना saraswati sadhna ph. 85280 57364
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सरस्वती साधना saraswati sadhna : भारतीय विद्या देवी की शक्ति परिचय – भारतीय संस्कृति में विद्या की देवी सरस्वती Saraswat saraswati को एक महान देवी माना जाता है। उनकी साधना करने से विद्या, बुद्धि, शक्ति और ज्ञान की प्राप्ति होती है। यहाँ हम जानेंगे कि सरस्वती Saraswat साधना क्या है, क्यों जरुरी है और कैसे इसे किया जाता है।
सरस्वती Saraswat saraswati देवी कौन है
सरस्वती Saraswat भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण देवी है। वह ज्ञान, कला, संगीत, वाणी, शिक्षा, बुद्धि और विद्या की देवी है। सरस्वती Saraswat को ध्यान करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है और सभी कलाओं में उन्नति होती है।
सरस्वती Saraswat को एक सफेद हंस द्वारा वाहित दिखाया जाता है जो समुद्र में उतरता है। वह त्रिशूल और वीणा धारण करती हैं। उनकी पूजा भारत के विभिन्न हिस्सों में बहुत ही की जाती है।
या माया मधु-कैटभ प्रमथनी, या महिषोन्माथिनी, या धूम्रचण्ड-मुण्डदलनी, या रक्तबीजाशनी । शक्तिः शुम्भनिशुम्भ-दैत्य मथनी, या सिद्धलक्ष्मी परा; या देवी नवकोटि मूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी ।।
अर्थात्- “मधु और कैटभ नामक राक्षसों को मथने वाली, महिषासुर को मारने वाली, धूम्र, चण्ड, मुण्ड, रक्तबीज, शुम्भ तथा निशुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली, लक्ष्मी स्वरूपा नवकोटि देवताओं की शक्ति से समन्वित भगवती महासरस्वती Saraswat मेरी रक्षा करें ।” महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती Saraswat – इन तीनों स्वरूपों द्वारा सम्पूर्ण चराचर जगत की कारणभूत आद्याशक्ति परमेश्वरी की अभिव्यक्ति होती है।
इन त्रिशक्तियों की मूल प्रकृति महालक्ष्मी ही हैं, जो विशुद्ध सत्व गुण के अंश से महासरस्वती Saraswat के रूप में प्रकट होती हैं, जिनका वर्ण चन्द्रमा के समान गौर है, उन्होंने अपने हाथों में अक्षमाला, अंकुश, वीणा तथा पुस्तक धारण कर रखा है। महासरस्वती Saraswat के अन्य प्रसिद्ध नाम हैं महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती Saraswat, आर्या, ब्राह्मी, कामधेनु, वेदगर्भा, धीश्वरी (बुद्धि की स्वामिनी), तारा.ऋग्वेद में वाग्देवी का नाम सरस्वती Saraswat है।
ये वाणी और विद्या को प्रदान करने वाली देवी हैं। ये स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष तीनों स्थानों पर निवास करने के कारण भारती, इला और सरस्वती Saraswat नाम से सम्बोधित की जाती हैं। तंत्र शास्त्र में वर्णित है, कि दस महाविद्याओं में दूसरी महाविद्या तारा देवी का एक स्वरूप ‘सरस्वती Saraswat’ भी है । सरस्वती Saraswat संगीत विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं, ताल, स्वर, लय, राग-रागिनी आदि का प्रादुर्भाव इनके द्वारा ही हुआ है।
इनकी आराधना सात स्वरों- “सा, रे, ग, म, प, ध, नी” द्वारा होने के कारण ये ‘स्वरात्मिका’ कहलाती हैं, और सप्तविध स्त्रों का ज्ञान प्रदान करने के कारण भी इन्हें ‘सरस्वती Saraswat’ कहते हैं। देवी सरस्वती Saraswat की साधना से समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं, ये अपने साधक के हृदय में व्याप्त समस्त संशयों का उच्छेद कर उसे बोध प्रदान करती हैं।
महासरस्वती Saraswat saraswati उत्पत्ति
महासरस्वती Saraswat saraswati उत्पत्ति सरस्वती Saraswat की उत्पत्ति ‘देवी भागवत्’ में वर्णन आता है, कि सरस्वती Saraswat देवी का प्राकट्य भगवान श्रीकृष्ण की जिह्वा के अग्रभाग से हुआ है। सरस्वती Saraswat के प्रकट होने पर श्रीकृष्ण ने उन्हें नारायण को समर्पित कर दिया। विश्व में सरस्वती Saraswat पूजा का प्रचलन श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया ।
देवी भागवत् के अनुसार ही भगवान नारायण की तीन पत्नियां – लक्ष्मी, गंगा और सरस्वती Saraswat थीं। ये तीनों अत्यन्त प्रेम से रहती हुई पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान का पूजन करती थीं। किसी कार्यवश इन तीनों से उनको दूर जाना पड़ा। कार्य सम्पादित करके जब वे अंतःपुर में पधारे, उस समय तीनों देवियां एक ही स्थान पर बैठी हुई परस्पर अत्यन्त प्रेम से वार्तालाप कर रही थीं।
भगवान को अंतःपुर में आया देख तीनों देवियां उनके सम्मान में खड़ी हो गयीं। गंगा ने अत्यन्त प्रेमपूर्ण दृष्टि से भगवान की ओर देखा, उन्होंने भी गंगा की दृष्टि का अत्यधिक स्नेह युक्त मुस्करा कर उत्तर दिया, तत्पश्चात् वे आवश्यकता वश कक्ष से बाहर चले गये । उसी क्षण सरस्वती Saraswat ने गंगा के व्यवहार को अनुचित बता कर आक्षेप किया, गंगा ने भी कठोर शब्दों में प्रतिवाद किया… और दोनों में विवाद बढ़ता गया ।
लक्ष्मी ने दोनों को शान्त करना चाहा, किन्तु सरस्वती Saraswat ने अत्यधिक क्रोधित हो जाने, के कारण गंगा को नदी बन जाने का श्राप दे दिया, इस बात को सुन गंगा ने भी क्रोधावेश में सरस्वती Saraswat को नदी रूप में परिणित हो जाने का श्राप दे दिया, इपने में ही भगवान पुनः अंतःपुर में लौट आये, तब तक देवियां प्रकृतिस्थ हो चुकी थीं, तदुपरान्त उन्हें अपनी भूल का आभास हुआ और भगवान के चरणों से होने के भय से रोने लगीं।
दूर पूरा वृत्तांत सुनकर भगवान को अत्यधिक कष्ट हुआ, किन्तु गंगा व सरस्वती Saraswat की आकुलता को देखकर उन्होंने करुणार्द्र हो उन्हें आश्वासन दिया- – “गंगा! तुम एक अंश से नदी हो जाओगी, किन्तु अन्य अंशों से मेरे पास ही रहोगी।
सरस्वती Saraswat ! तुम को एक अंश से नदी बनकर रहना होगा, दूसरे अंश से ब्रह्मा जी की सेवा करनी होगी तथा शेष अंश से मेरे पास ही रहोगी। कलियुग के पांच हजार वर्ष बीतने के बाद तुम दोनों का शापोद्धार हो जायेगा ।”
तदनन्तर सरस्वती Saraswat अपने अंश रूप में भारत भूमि पर अवतीर्ण हो कर ‘भारती’ कहलायीं और अपने अंश रूप से ही ब्रह्मा जी की प्रिय पत्नी बनकर ‘ब्राह्मी’ नाम से भी प्रसिद्ध हुईं। किसी-किसी कल्प में सरस्वती Saraswat ब्रह्मा की कन्या के रूप में भी अवतीर्ण होती हैं और आजीवन कौमार्य व्रत का पालन करती हुई ब्रह्मा की सेवा करती हैं ।
ब्रह्मा ॐ ब्रह्मा के मन में एक बार विचार आया कि भूलोक पर सभी देवताओं के तीर्थ हैं, केवल मात्र मेरा ही कोई तीर्थ नहीं है। ऐसा सोचकर उन्होंने अपने नाम से एक तीर्थ स्थापित करने का निश्चय किया और एक रत्नखचित शिला को पृथ्वी पर गिराया | यह शिला अजमेर जिला में चमत्कारपुर स्थान के निकट गिरी, जी ने उसे ही अपना तीर्थ स्थल बनाया, जो ‘पुष्कर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
तीर्थ स्थापन के पश्चात् ब्रह्मा ने वहां पवित्र जल से युक्त एक सरोवर बनाने से का निश्चय किया, अतः उन्होंने सरस्वती Saraswat को आवाहित किया। इसके पूर्व सरस्वती Saraswat नदी के रूप में परिणित हो कर, पापात्माओं के स्पर्श से बचने के लिए छिप कर पाताल में बहती थीं।
ब्रह्मा द्वारा आवाहन करने पर भूतल और पूर्वोक्त शिलाओं को भेदकर वे प्रकट हुईं। – उन्हें उपस्थित देख ब्रह्मा ने कहा- “मैं इस पुष्कर तीर्थ में निवास करूंगा, अतः तुम यहीं मेरे समीप रहो, जिससे मैं तुम्हारे जल में तर्पण कर सकूं।” ब्रह्मा के आदेश को सुनकर सरस्वती Saraswat ने अत्यन्त विनयवत् उत्तर दिया- “भगवन्!
मैं लोगों के स्पर्श-भय से ही पाताल में निवास करती हूं, किन्तु आपकी में आज्ञा का उल्लंघन भी नहीं कर सकती, अतः आप जो उचित समझें वैसी व्यवस्था करें।”सरस्वती Saraswat के विनम्र वचनों को सुनकर ब्रह्मा जी ने उनके निवास के लिए एक विशाल सरोवर निर्मित करवाया, तब सरस्वती Saraswat ने उसी सरोवर में आश्रय लिया ।
तत्पश्चात् ब्रह्मा ने बड़े-बड़े भयंकर सर्पों को बुलाकर, उन्हें सरस्वती Saraswat की रक्षा करने की आज्ञा दी । एक बार भगवान विष्णु ने देवी सरस्वती Saraswat को आज्ञा दी, कि वे “बड़वानल” को अपने प्रवाह में बहाकर समुद्र में छोड़ दें। सरस्वती Saraswat ने इसके लिए ब्रह्मा से भी आज्ञा प्राप्त कर, इस कार्य को सम्पादित करने के विचार किया।
लोकहित के कारण ब्रह्मा ने भी इस कार्य के लिए अनुमति प्रदान कर दी। सरस्वती Saraswat ने कहा – “भगवन्! यदि मैं पृथ्वी पर नदी रूप में प्रकट होकर इस अग्नि को ले जाऊंगी तो मुझे भय है, कि पापी जनों के सम्पर्क से मेरा स्वयं का शरीर दग्ध हो जायेगा, अतः पाताल मार्ग से ही इसे समुद्र तक ले जाऊंगी ।”
से ब्रह्मा ने कहा- “तुम्हें इस कार्य को करने में जिस तरह से सुगमता हो, उसी प्रकार इसे सम्पन्न करो। पाताल मार्ग से जाने पर यदि कहीं बड़वानल के ताप तुम अत्यधिक पीड़ित हो जाओ, तो वहां पृथ्वी पर नदी रूप में प्रकट हो जाना। इस प्रकार प्रकट होने पर तुम्हारे शरीर पर किसी प्रकार का दोष व्याप्त नहीं होगा।” ब्रह्मा जी से यह उत्तर पाकर देवी सरस्वती Saraswat, गायत्री, सावित्री और यमुना आदि अपनी प्रिय सखियों के साथ हिमालय पर्वत पर चली गईं और वहां से नदी रूप धारण कर भूतल पर प्रवाहमान हुईं। बड़वानल को लेकर वे सागर की ओर प्रस्थित हुईं।
इस प्रकार पाताल लोक से गमन करते तथा भूतल पर प्रकट होते हुए वे प्रभास क्षेत्र में पहुंची। वहां चार तपस्वी कठोर साधना में रत थे, उन्होंने सरस्वती Saraswat को पृथक-पृथक अपने आश्रम के पास बुलाया और तभी समुद्र ने भी वहां प्रकट ने होकर सरस्वती Saraswat को आवाहित किया।
सरस्वती Saraswat को समुद्र तक जाना था और मुनियों की आज्ञा का भी उल्लंघन करने से श्राप मिलने का भय था, अतः उन्होंने पांच धाराओं का रूप धारण कर लिया। इस प्रकार का रूप धारण करने के कारण ‘पंचश्रोता सरस्वती Saraswat’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।
अपनी एक धारा से वे मार्ग के अन्य विघ्नों को दूर करते हुए समुद्र से जा मिलीं तथा चार धाराओं से चारों ऋषियों को स्नान की सुविधा प्रदान कर गईं। पुराण में कथन है, एक बार ब्रह्मा जी ने सरस्वती Saraswat से कहा- “तुम किसी के मुख में कवित्व शक्ति के रूप में निवास करो।”
योग्य पुरुष ब्रह्मा जी की आज्ञा को पूरा करने हेतु सरस्वती Saraswat योग्य पात्र की खोज में विचरण करने लगीं। विभिन्न सत्यादि लोकों में भ्रमण करके तथा सातों पातालों में घूम कर ऐसे अलौकिक पुरुष की खोज करने लगीं;
किन्तु उन्हें सुयोग्य पात्र नहीं मिल सका । इस खोज में पूरा सतयुग बीत गया, तदुपरान्त त्रेतायुग के आरम्भ में अपने अनुसन्धान को पूर्णता देने के लिए भ्रमण करती हुई, वे भारत भूमि पर पहुंची और तमसा नदी के किनारे विचरण करने लगीं। तमसा नदी के तट पर महर्षि वाल्मिकी अपने शिष्यों के साथ रहते थे ।
प्रातःकाल वे स्नान के लिए नदी की ओर जा रहे थे, तभी उनकी दृष्टि एक व्याध के बाण से घायल क्रोंच पक्षी पर पड़ी, उसका सारा शरीर लहूलुहान था और वह मृत्यु से जूझ रहा था ।
मादा क्रोंची उसके पास ही गिर कर तड़पती हुई करुण स्वर में चीख रही थी । पक्षी के उस जोड़े की व्यथा महर्षि से देखी नहीं गई और वे उसकी व्यथा से द्रविभूत हो उठे । अकस्मात् ही उनके मुख से चार चरणों का श्लोक निकल पड़ा – मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शास्वतीः समाः । यत् क्रौंच मिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ।।
saraswati sadhna महर्षि वाल्मिकी के मुख से उच्चरित यह श्लोक सरस्वती Saraswat की कृपा का फल था, क्योंकि महर्षि को देखते ही उन्होंने उनके अन्दर छिपी असाधारण प्रतिभा को पहिचान लिया था, अस्तु; उन्होंने सर्वप्रथम वाल्मिकी के मुख में ही प्रवेश किया। सरस्वती Saraswat के कृपापात्र होकर ही महर्षि वाल्मिकी ‘आदि कवि, के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुए।
मार्कण्डेय विरचित दुर्गा सप्तशती में भी सरस्वती Saraswat के प्रकट होने की कथा. है; जिसमें उन्होंने बताया है, कि गौरी के शरीर से ये प्रकट हुईं हैं, और शरीर कोश से प्रकट होने के कारण ये ‘कौशिकी’ नाम से प्रसिद्ध हुईं।
अपने कौशिकी स्वरूप से देवी सरस्वती Saraswat ने शुम्भ-निशुम्भ जैसे महान दैत्यों का वध कर पृथ्वी पर सुख-शांति की स्थापना की और देवताओं तथा ऋषियों को निर्भयता प्रदान की। तंत्र और पुराणों में इनकी महिमा का विस्तृत वर्णन पढ़ने को मिलता है । बिजी देवी महासरस्वती Saraswat अनेक प्रकार से विश्व के लोगों का कल्याण करती हैं; बुद्धि, ज्ञान एवं विद्या के रूप में सारा जगत इनकी कृपा को प्राप्त कर अविभूत हो उठता है।
महासरस्वती Saraswat साधना saraswati sadhna विधि
महासरस्वती Saraswat साधना saraswati sadhna विधि – भगवती सरस्वती Saraswat की सौम्य और उग्र दोनों रूपों में साधना मिलती है, सौम्य साधना से प्रायः सभी परिचित हैं, जो वाग्देवी भी कही जाती हैं। उनके उग्ररूप नील सरस्वती Saraswat, विद्याराज्ञी के नाम से प्रसिद्ध हैं। शुंभ और निशुंभ का वध करते समय उन्होंने अपना उग्र स्वरूप प्रकट किया था, जिसकी साधना से साधक को अभ्युदय और निःश्रेयता की प्राप्ति होती ही है। साधक को रात्रि के अन्तिम भाग जिसे ब्रह्म मुहूर्त कहा जाता है, जाग जाना चाहिए
ब्रह्म मुहूर्त में जगने के बाद शय्या पर बैठकर धर्म एवं अर्थ का चिन्तन करना चाहिए तथा दैनिक जीवन निर्वाह करने में शरीर तथा इन्द्रियों को प्राप्त होने वाले क्लेश आदि के शमन का भी चिन्तन करें। इस प्रकार वेद प्रतिपादित परम तत्त्वार्थ का चिन्तन करते हुए शय्या त्याग करें। स्नान आदि नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर साधना कक्ष में (जिसमें साधनानुकूल सभी सामग्री सुसज्जित हों) पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हो सुखद श्वेत तथा पवित्र आसन पर बैठें। पहले पवित्रीकरण एवं आचमन करें, आचमन के बाद प्राणायाम करें। अपने सामने चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती महासरस्वती Saraswat का चित्र तथा यंत्र (जो प्राण प्रतिष्ठित हो) स्थापित कर लें। पहले गणपति स्मरण एवं विधिपूर्वक गुरु पूजन करने के बाद ही मूल पूजन आरम्भ करें-
ध्यान महासरस्वती Saraswat साधना saraswati sadhna
:दोनों हाथ जोड़कर ध्यान करें शुक्लां ब्रह्म विचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं । वीणा पुस्तक धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् ।। हस्ते स्फाटिक मालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां । वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ।। श्री सरस्वत्यै नमः ध्यानं समर्पयामि ।
विशेष – “शुक्लवर्णा, ब्रह्मस्वरूपा, आद्याशक्तिरूपा, समस्त संसार में शक्तिरूप से व्याप्त, अपने दोनों हाथों में वीणा और पुस्तक धारण की हुई, जड़ता एवं अज्ञान को नाश करने वाली स्फटिक माला धारण करके पद्मासन में विराजमान, बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी भगवती सरस्वती Saraswat को मैं शुद्ध भाव से नमन करता हूं।”
saraswati आवाहन
: भव पुष्प स्वतन लेकर आवाहन करें- चतुर्भुजां चन्द्रवर्णां चतुरानन वल्लभाम् । आवाहयामि वाग्देवीं वीणा पुस्तक धारिणीम् ।। fre श्री सरस्वत्यै नमः आवाहनं समर्पयामि ।
saraswati गन्ध
चन्दन या कुंकुम लगावें- एक कर्पूरायैश्च कुंकुमागरू कस्तूरी गन्धं गृहाण शारदे विधिपत्नि! संयुक्तम् । नमोऽस्तुते ।। श्री सरस्वत्यै नमः गन्धं समर्पयामि। विदियो सुगन्धित धूप लगा लें फिलफरक ऊँच गुग्गुल्वगरू संयुक्तं भक्त्या दत्तं विधिप्रिये । धूप : १५ कर
– घण्टाशूल हलानि शंखमुसले चक्रं धनुः सायक, हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशु तुल्यप्रभा । गौरीदेह समुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा पूर्वामत्र सरस्वती Saraswatमनुभजे शुम्भादि दैत्यार्दिनीम् ।। “घण्टा, त्रिशूल, हल, शंख, मूसल, चक्रं, धनुष एवं बाण आदि आयुधों को अपने दिव्य हाथों में धारण की हुई, अत्यधिक शोभायुक्त, चन्द्रमा के समान सुशीतल, पार्वती की देह से समुत्पन्न, तीनों लोकों की आधारभूता, शुम्भ-निशुम्भ आदि दानवों का संहार करने वाली भगवती सरस्वती Saraswat का मैं भावपूर्ण हृदय से ध्यान करता हूं।” नि ।
saraswati आवरण पूजा :
क 208 ध्यान के पश्चात् आवरण पूजन प्रारम्भ करें। आवरण पूजन में यंत्र के प्रत्येक घेरे का क्रमवार पूजन किया जाता है, जो अत्यधिक सूक्ष्म एवं दुरूह पद्धति है, जिसे प्रत्येक साधक के द्वारा सम्पन्न करना सम्भव नहीं है; अतः सभी साधकों तथा सामान्य पाठकों के लाभार्थ आवरण पूजा की सहज व लघु पद्धति प्रस्तुत की जा रही। इस पद्धति के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति पूजन सम्पन्न कर सकता है तथा इस पद्धति द्वारा पूजन करने से भी पूजन का पूर्ण लाभ प्राप्त होता है ।
saraswati प्रथमावरण पूजा
अपने बायें हाथ में कुंकुम से रंगे अक्षत (चावल) ले लें और निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए, अक्षत को यंत्र पर चढ़ाते रहें- – ॐ मेघायै नमः । ॐ प्रज्ञायै नमः । ॐ प्रभायै नमः । ॐ विद्यायै नमः ।गामी ॐ धियै नमः । ॐ धृत्यै नमः। ॐ बुद्ध्यै नमः । ॐ स्मृत्यै नमः । ॐ विश्वेश्वर्यै नमः ।
प्रथमावरण पूजन के बाद यंत्र को किसी ताम्र पात्र में रखकर दूध, दही, घी, शहद एवं शक्कर से स्नान करावें, फिर शुद्ध वस्त्र से पोंछ दें- हौं सरस्वती Saraswat योग पीठात्मने नमः इस मंत्र से पुष्पादि आसन देकर पुनः प्लेट में यंत्र को स्थापित करें तथा “ॐ श्रीं ह्रीं हसौः महा सरस्वत्यै नमः “
मंत्र से मूर्ति की कल्पना करके, विनयवत् आवरण पूजा के लिए आज्ञा मांगें के तर्प संविन्मये परे देवि परामृतरस प्रिये ।। सअनुज्ञां देहि मे मातः परिवारार्चनाय मे।। तदुपरान्त एक अन्य प्लेट में मौली सूत्र लपेट कर पांच सुपारी स्थापित करें, जो गणपति, क्षेत्रपाल, बटुक भैरव व गुरु की प्रतीक हैं तथा निम्न मंत्रोच्चारण के साथ इन पर पुष्प अर्पित करें-
ॐ विघ्नेशाय नमः विघ्नेश श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः क्षेत्रपाल श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऊं बं बटुकाय नमः बटुक भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ यं योगिन्यै नमः योगिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ श्री गुरवे नमः श्री गुरु पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ अणिमायै नमः अणिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ लघिमायै नमः लघिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ महिमायै नमः महिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐॐॐ असितायै नमः असिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वशितायै नमः वशिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ कामपूरिण्यै नमः साभार कामपूरिणी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ गरिमायै नमः गरिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।
ॐ भीषण भैरवाय नमः भीषण भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ संहार भैरवाय नमः संहार भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । किल ॐ ब्राह्मयै भैरवाय नमःकर ब्राह्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ माहेश्वर्ये भैरवाय नमः ॐ कौमार्यै भैरवाय नमः मि के काही माहेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ गर कौमारी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।
ॐ वैष्णव्यै भैरवाय नमः वैष्णवी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वाराह्यै भैरवाय नमः वाराही श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ इन्द्राण्यै भैरवाय नमः ह है इन्द्राणी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ चामुण्डायै भैरवाय नमः चामुण्डा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ महालक्ष्म्यै भैरवाय नमः अतिर ॐ महालक्ष्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । इसके बाद पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें तथा पुष्पाञ्जलि समर्पित कर दें- – अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । समर्पये तुभ्यं कारल भक्त्या प्रथमावरणार्चनम् ।।
saraswati द्वितीयावरण पूजा
करागीर द्वितीयावरण पूजन के लिए बायें हाथ में हल्दी से रंगे अक्षत ले लें तथा दाहिने हाथ से यंत्र पर चढ़ाते हुए चौसठ शक्तियों का पूजन व करें- ॐ कुलेश्वर्यै नमः कुलेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । श ॐ कुलनन्दायै नमः कुलनन्दा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वागीश्वर्यै नमः चागीश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ भैरव्यै नमः ॐ उमायै नमः ॐ श्रियै नमः ॐ शान्त्यै नमः ॐ चण्डायै नमः ॐ धूम्रायै नमः ॐ काल्यै नमः ॐ करालिन्यै नमः ॐ महालक्ष्म्यै नमः ॐ कंकाल्यै नमः ॐ रुद्रकाल्यै नमः ॐ सरस्वत्यै नमः २३ भैरवी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । कर लि उमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । श्री श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । शान्ति श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चण्डा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । धूम्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । काली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । करालिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नजर ॐ महालक्ष्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ਕਿਸ कंकाली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । मित्र रुद्रकाली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सरस्वती Saraswat श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सके ॐ वाग्वादिन्यै नमः ॐ नकुल्यै नमः ॐ भद्रकाल्यै नमः ॐ शशिप्रभायै नमः ॐ प्रत्यंगिरायै नमः ॐ सिद्धलक्ष्म्यै नमः ॐ अमृतेश्वर्यै नमः ॐ चण्डिकायै नमः ॐ खेचर्यै नमः ॐ भूचर्यै नमः ॐ सिद्धायै नमः ॐ कामाक्ष्यै नमः वाग्वादिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नकुली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । भद्रकाली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । शशिप्रभा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । प्रत्यंगिरा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सिद्ध लक्ष्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अमृता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चण्डिका श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । खेचरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । भूचरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सिद्धा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । कामाक्षा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ बलायै नमः ॐ जयायै नमः ॐ विजयायै नमः ॐ अजितायै नमः ॐ नित्यायै नमः ॐ अपराजितायै नमः ॐ विलासिन्यै नमः ॐ अघोरायै नमः ॐ चित्रायै नमः ॐ मुग्धायै नमः ॐ धनेश्वर्यै नमः ॐ सोमेश्वर्यै नमः बला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । जया श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विजया श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अजिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नित्या श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अपराजिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विलासिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अघोरा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चित्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । मुग्धा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । धनेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सोमेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ महाचण्ड्यै नमः ॐ विद्यायै नमः ॐ हंस्यै नमः ॐ विनायकायै नमः ॐ वेदगर्भायै नमः ॐ भीमायै नमः ॐ उग्रायै नमः ॐ वेद्यायै नमः ॐ सद्गत्यै नमः ॐ उग्रेश्वर्यै नमः ॐ चन्द्रगर्भायै नमः ॐ ज्योत्स्नायै नमः महाचण्डी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विद्या श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हंसी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विनायका श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वेदगर्भा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । भीमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । उग्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वेद्या श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सद्गति श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । उग्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चन्द्रगर्भा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ज्योत्स्ना श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ मोहिन्यै नमः ॐ वंशवर्द्धिन्यै नमः ॐ ललितायै नमः ॐ दूत्यै नमः ॐ मनोजायै नमः ॐ पद्मिन्यै नमः ॐ धरायै नमः ॐ वर्वर्यै नमः ॐ क्षत्रहस्तायै नमः ॐ रक्तायै नमः ॐ नेत्रायै नमः ॐ विचर्चिकायै नमः मोहिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वंशवर्द्धिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ललिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । दूती श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । मनोजा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पद्मिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । धरा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वर्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । क्षत्रहस्ता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । रक्ता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नेत्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विचर्चिका श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ श्यामलायै नमः श्यामला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ बलायै नमः बला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ पिशाच्यै नमः पिशाची श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ विदार्यै नमः विदारी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ शीतलायै नमः शीतला श्री पादुकां पूंजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वज्रयोगिन्यै नमः वज्रयोगिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ सर्वेश्वर्यै नमः सर्वेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुन: पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प यंत्र पर अर्पित कर दें- अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ||
saraswati पंचमावरण पूजा : करें- –
बायें हाथ में आठ कमल बीज ले लें। मंत्रोच्चारण करते हुए, दाहिने हाथ से एक-एक कमल बीज यंत्र पर अर्पित करते हुए आठ सरस्वतियों का पूजन ॐ नमः पद्मासने शब्दरूपे ऐं ह्रीं क्लीं वद वद वाग्वादिनी स्वाहा । वाग्वादिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हू स् क् ल् हीं वद वद चित्रेश्वरी ऐं स्वाहा । चित्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं कुलजे ऐं सरस्वती Saraswat स्वाहा । कलुजा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं ह्रीं श्रीं वद वद कीर्तीश्वरी स्वाहा । कीर्तीश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं ह्रीं अन्तरिक्ष सरस्वती Saraswat स्वाहा । अन्तरिक्ष सरस्वती Saraswat श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हू स् ष्फ्रे हू सौः ष्फ्रीं ऐं ह्रीं श्रीं द्रां ह्रीं क्लीं ब्लूं सः हनीं घट सरस्वती Saraswat घटे वद वद तर तर रुद्राज्ञया ममाभिलाषं कुरु कुरु स्वाहा । घट सरस्वती Saraswat श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । · ब्लू वें वद वद त्रीं हूं फट् । नीला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं हैं ह्रीं किणि किणि विच्चे । किणि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुनः पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प को यंत्र पर अर्पित कर दें। अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । भक्त्या समर्पये तुभ्यं पंचमावरणार्चनम् ।।
saraswati षष्ठावरण पूजन :
बायें हाथ में काली सरसों ले लें और दाहिने हाथ से यंत्र पर अर्पित करते हुए छः योगिनियों की पूजा करें— ॐ डाकिन्यै नमः । डाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ शाकिन्यै नमः । शाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ लाकिन्यै नमः । लाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ काकिन्यै नमः । काकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ राकिन्यै नमः । राकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ हाकिन्यै नमः । हाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प यंत्र पर अर्पित करें- अभीष्ट सिद्धिं मे देहि भक्त्या समर्पये तुभ्यं शरणागत वत्सले । षष्ठावरणार्चनम् ।।
saraswati सप्तमावरण पूजा :
बायें हाथ में तीन पुष्प ले लें और यंत्र पर दाहिने हाथ से अर्पित करते – हुए तीन भैरवियों का पूजन करें- हीं परायै नमः । परा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं क्लीं सौः बलायै नमः । बला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हू स्मैं हू क्लीं हू सौः भैरव्यै नमः । भैरवी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुनः पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प यंत्र पर ३५ -अर्पित कर दें– अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । भक्त्या समर्पये तुभ्यं सप्तमावरणार्चनम् ।।
मंत्र जप 41 आवरण पूजन करने के पश्चात् “सफेद हकीक माला” अथवा “स्फटिक माला” से निम्न मंत्र का एक माला मंत्र जप करें- मंत्र “ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौं क्लीं ह्रीं ऐं ब्लू स्त्रीं नीलतारे सरस्वती Saraswat द्रां द्रीं क्लीं ब्लू सः ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः सौः हीं स्वाहा” इस मंत्र का जप करने से भगवती सरस्वती Saraswat प्रसन्न होकर अभीष्ट वर प्रदान करती हैं। मंत्र जप समाप्ति के बाद आरर्ती करें, बाद में
saraswati भगवती सरस्वती Saraswat का निम्न स्तुति पाठ करें
स्तुति पाठ मातनील सरस्वति प्रणमतां सौभाग्य सम्पत्प्रदे । प्रत्यालीढपदस्थिते शव हृदि स्मेराननाम्भोरुहे ।। फुल्लेन्दीवर लोचनत्रय युते कर्तृकपालोत्पले । खड्गञ्चादधतीं त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये । बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देहि मे। कुबुद्धिं हर मे देवि! त्राहि मां शरणागतम् ।। सभायां शास्त्रवादे तु रिपुसंघसमाकुले । मुष्टियन्त्रित हस्ता मां पातु नील सरस्वती Saraswat ।। नीला सरस्वती Saraswat पातु हृदय मे समन्ततः । मूलाधारं सदा पातु फट् शक्तिर्नीिल सरस्वती Saraswat ।। विद्यादानरता देवी वक्त्रे नील सरस्वती Saraswat । शास्त्रे वादे च संग्रामे जले च विषमे गिरौ । नित्या नित्यमयी नन्दा भद्रा नील सरस्वती Saraswat । गायत्री सुचरित्रा च कौलव्रत परायणा ।। निषूदिनी । महाव्याधि हरा देवी शुम्भासुर महापुण्य प्रदा भीमा मधु कैटभ नाशिनी ।। पूर्ण श्रद्धा भावना से युक्त हो सरस्वती Saraswat देवी को प्रणाम करें तथा पूरे परिवार में प्रसाद वितरित करें। सम्पूर्ण विधि-विधान द्वारा सम्पन्न पूजन से निश्चित रूप से विद्या, धन, सुख, पुष्टि, आयु, कीर्ति, बल, स्त्री, सौन्दर्य तथा साधक की जो भी मनोकामना होती है, वह पूर्ण होती ही है। ।। इति सिद्धिम् ।।
वैसे तो सभी सरस्वती वंदना मुझे मधुर लगती हैं।लेकिन ये वंदना मुझे सबसे मधुर लगती है। हे शारदे माँ, हे शारदे माँ , अज्ञानता से हमें तार दे माँ तू स्वर की देवी ये संगीत तुझ से, हर शब्द तेरा है हर गीत तुझ से, हम है अकेले, हम है अधूरे तेरी शरण हम हमें प्यार दे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ… मुनियों ने समझी, गुनियों ने जानी, वेदों की भाषा, पुराणों की बानी, हम भी तो समझे, हम भी तो जाने, विद्या का हमको अधिकार दे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ… तू श्वेत वर्णी कमल पे विराजे, हाथों में वीणा, मुकुट सर पे साझे, मन से हमारे मिटाके अंधेरे, हमको उजालों का संसार दे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ… चित्र स्त्रोत- गूगल।
सरस्वती केवल स्त्री वाचक नहीं है ज्ञान वाचक भी है ज्ञान की देवी से शादी की ब्रह्मा जी ने अर्थात समस्त ज्ञान को स्वीकार किया क्योंकि उन्होंने ही उत्पन्न किया सरस्वती रूपी ज्ञान को भागवत पुराण में वर्णन है मरीचि के 6 पुत्र ब्रह्मा जी की इस स्थिति पर हंसे थे जिसके कारण उन्हें राक्षस बनना पड़ा क्योंकि वह ठीक से समझे नहीं थे
वसंत पंचमी के आगमन पर, सही समय पर उठें, अपने घर, पूजा क्षेत्र को साफ करें, और सरस्वती पूजा के रीति-रिवाजों को निभाने के लिए स्क्रब करें। चूंकि पीला सरस्वती देवी की सबसे प्रिय छाया है, इसलिए स्क्रब करने से पहले अपने शरीर पर हर जगह नीम और हल्दी का गोंद लगाएं। स्नान के बाद पीले रंग के वस्त्र धारण करें। निम्नलिखित चरण में पूजा चरण / क्षेत्र में सरस्वती प्रतीक स्थापित करना है। एक बेदाग सफेद/पीली सामग्री लें और इसे टेबल/स्टूल जैसी उठी हुई अवस्था पर रखें। इसके बाद से बीच में मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करें। देवी सरस्वती के साथ, आपको भगवान गणेश का प्रतीक भी पास में रखना होगा। आप इसी तरह अपनी किताबें/स्क्रैच पैड/संगीत वाद्ययंत्र/या कुछ अन्य कल्पनाशील शिल्प कौशल घटक को आइकन के करीब रख सकते हैं। उस समय, एक थाली लें और उसमें हल्दी, कुमकुम, चावल, फूल के साथ सुधार करें और सरस्वती और गणेश को उनके दान की तलाश के लिए अर्पित करें। चिह्नों के सामने थोड़ी सी रोशनी/अगरबत्ती जलाएं, अपनी आंखें बंद करें, अपने हाथ की हथेलियों को मिलाएं और सरस्वती पूजा मंत्र और आरती पर चर्चा करें। पूजा के रीति-रिवाज समाप्त होने के बाद, प्रसाद को प्रियजनों के बीच साझा करें।
हमारे सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मदेव माता सरस्वती के पिता थे। सरस्वती पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मदेव ने सृष्टि का निर्माण करने के बाद अपने वीर्य से सरस्वती जी को जन्म दिया था। इनकी कोई माता नहीं है इसलिए यह ब्रह्मा जी की पुत्री के रूप में जानी जाती थी। वहीं मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा के पांच सिर थे। जब उन्होंने सृष्टि की रचना की तो वह इस समस्त ब्रह्मांड में बिलकुल अकेले थे। ऐसे में उन्होंने अपने मुख से सरस्वती, सान्ध्य, ब्राह्मी को उत्पन्न किया
वैदिक मंत्र महाकाली साधना Vedic Mahakali Sadhana तांत्रिक मान्यता में महाकाली को आदि शक्ति का साकार प होने के कारण आद्या काली भी कहा गया है। आदि शक्ति होने के फलस्वरूप वे अपने साधक को शक्ति प्रदान करती हो रहती हैं।
रुद्र यामल में स्पष्ट किया गया है, कि बेता गुग में सुर असुर संग्राम के दौरान, जब रक्त बाज नामक दानव सुरों पर भारा पड़ने लगा, तो आदि शनि ने अपने तेज से एक आल्यंत नेजस्वी एवं भयंकर स्वरूपा देवी-महाकाली को प्रकट किया। रकबीन और अन्य दानवों को तो उसने क्षणभर में ही नष्ट कर दिया, परन्तु |
फिर भी उसका क्रोध शांत नहुआ.. उस समय क्रोध से बह इतनी प्रचण्ड हो गई थीं, कि असुरों के साथ-साथ सुरों की सेना का भी भक्षण करने लगी। 2 स्थिति अत्यधिक संकटजनक थी, क्योंकि जिस गति से महाकाली सब का भक्षण कर रही थी, उस तरह तो समस्त ब्रह्माण्ड में ही मलय की स्थिति बनना निश्चित था . . . पर इस स्थिति का उपाय करे कोनः ऐसे समय में महाकाली को समझाए कौन?
उनके समझा जाने को मिल करे कौन? काफी मंत्राणा के बाद ब्रह्मा, विधा. इन्द्र आदि ने महादेव की शरण में जाना निश्चित किया। महादेवनो हमेशा की तरह ही समाधि में लीन थे, देवताओं ने काफी स्तुति, अर्चना आदि कर किसी तरह उनका ध्यान अपनी और आकृष्ट किया, तो शिव ने उन सबसे कैलाश आने का कारण पूछा।
तब श्रीहरि ने सारा वृत्तांत सुनाकर अंत में कहा-हेरूद्र अब आपका ही हमें आसरा है, क्योंकि शक्ति के इस क्रोध के बेग को आपके सिवा कोई झेल नहीं सकता। हे शिब’ जिस प्रकार से भयंकर हलाहल को आपके सिवा कोई नहीं धारण कर सकता था, उसी प्रकार आज आपके सिवा शक्ति का कोई सामना नहीं कर सकता…कृपा करे, प्रभु!
हमें इस दुविधा से उचारिए, नहीं तो असमय ही प्रलय हो जाएगी… भगवान शिव को देवताओं पर अत्यधिक करुणा आई और वे ताम्माण वहां पहुंच गए जहां भयंकर दाड़ी वाली महाकाली, भयंकर मट्टाहास कर सब कुछ मक्षाण कर रही थीं… शिय ने जब यह देखा तो वे बिना समय नष्ट किए उस मार्ग पर लेट गए
जहां से महाकाली आ रही थीं बेची तो अपनी ही धुन में थी, और इस तरह उसका पांच शिव के वक्ष पार पड़ गया। गगवान शिव के वक्ष पर पांव पड़ने ही देवी एक क्षण के लिए बहुत सकुचाई और दूसरे को क्षण उनका सारा क्रोध समाप्त 4 हो गया और इस प्रकार से सृष्टि का विनाश होने से बचा। शिवजिन्हें माद भी कहते है, उनके ऊपर स्थित शक्ति के इस स्वरूप को ही महाकाली की संज्ञा से विभूषित किया गया है। महाकाली का स्वरूप बड़ा ही उग्र है।
वह विशालकाय और अत्यधिक सुन्दर है, उनकी जिल्ला रक्त से जित हमेशा बाहर निकली रहती है। उनके गले में ताजे कटे मुण्टो कीमाला है, जिनमें से रक्त टपकता रहता है। पायल और पाजेब की जगह छोटे-छोटे सो एवं हरियों को धारण कर रखा है। उनके चार हाथ हैं जिनमें क्रमशः खड्ग, यमपाश, माण्ड एवं कपाल पात्र है, उनके तीन नेत्र हैं।
महाकाली को दस महाविद्याओं में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है, आखिर इसका कारण क्या है? पहला तो यह कि इस स्वरूप की साधना की सृष्टि स्वयं शिव ने की थी और यह साधना अत्यंत तेजस्वी होने के साथ-साथ अत्यधिक सरल और सहज है, कोई भी पुरुष-स्त्री, बालक-वृद्ध इसको सम्पन्न कर सकता है।
इसमें किसी भी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं। दूसरा इस साधना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है, कि इसी एक साधना से जहां महाकाली सिद्ध होती हैं वहीं रुद्र भी वतः ही सिन्न हो जाते हैं, यानि एक ही साधना से दो दिव्य शातियों की कृपा प्राप्त की जा सकती है।
अब मैं नीचे कुछ बिन्दु स्पाट कर रहाई, जो इस साधना को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने पर व्यक्ति के जीवन में स्वतःही उतर आते हैं देवी अष्ट मुण्डी की माला पहनती है, जिसका नाविक अर्थ अष्ट पाशों से है। साधक पूर्ण रूप से अष्ट पाशों समुक्त हो जाता है और तंत्र के क्षेत्र में अत्यंत ऊंचाइयों को मास कर पाता है।
महादेवी के हाथ में यमपाश है, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति यमपाश मृत्यु से मुक्त हो जाता है। वह सारा जीवन स्वस्थ, निरोश और पूर्ण आयुष्य भोगता है। देवी के हाथ में नर मुण्ड भी है जिसका अर्थ है कि से साधक का अज्ञान रूपी अंधकार मिट जाता है और उसमें एक नई चेतना एवं ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है।
4.इस साधना के उपरांत या तो व्यक्ति के शय रहते ही नहीं और अगर होते हैं, तो वे हमेशा उसके आगे विनीत भाव से रहते हैं, उसकी हर बात स्वीकार करते ही हैं। ऐसे व्यक्ति के घर में अटूट सम्पदा, धन, धान्य की रिस्थति बन जाती है, समाज में मान, प्रतिष्ठा, पद सब कुछ सहज ही प्राप्त हो जाता है।
उसका पारिवारिक जीवन बड़ा सुखद होता है। उसे पुत्र एवं पौत्रों की प्राप्ति होती है। निश्चय हीमहाकाली साधना एक अद्गुन होरक खण्ड है. जो आपके हाथों में आने के लिए लालाधित है, लेकिन यह भी | एक सत्य है कि हीरक खण्ड मिलता सिर्फ बिरले को ली है।
साधना विधान इस साधना को साधक या किसी भी अमावस्या की रात्रि में सम्पन्न करें। साधक काले वस्त्र धारण करके काले आसन पर बैठे। अपने समक्ष स्टील की थाली में काले तिल बिछाकर, उस पर ‘महाकाली यंत्र स्थापित करें। यंत्र का पूजन कर निम्न ध्यान मंत्र द्वारा भगवती
काली का ध्यान करें-
– कराल बवना घोर मुक्तकेशी चतुभुजा नमामि रक्त काली ता मुण्डमाला विभूबिताम् घोररावा महासदी श्मशानालय बासिनीम् । वालार्क मण्डलाकारं लो बजत्रितमान्विताम ध्यान के पश्चात भगवती काली का पूजन करें-ककुम तथा अक्षत यंत्र पर निम्न मंत्रोच्चारण करते हुए बढ़ाएं आमच्छ बरवे देवि। त्यपनि दिनि । पूजा गृहाण सुमुखि नमस्ते शंकर प्रिये ।।
निम्न मंत्र का महाकाली माला से जप म्याराह ! माला करें
mantra ke lea samprak kare
यह 14 दिन की साधना है. पूर्णिमा को समस्त सामग्री किसी नदी में विसर्जित कर दें। येप्रयोग किसी भी अमावस्या को प्रारम्भ निरजा सकते हैं। उपरोक्त विधि से महाकानी का पूजन तथा देवी ध्यान करें। ये सभा प्रयोग रात्रि काल में ही किर जा सकते हैं। इसमें माला का प्रयोग नहीं होता। प्रयोगसमाप्ति पर समस्त सामाग्री को जल में विसर्जिन करें। –
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना Maa Bhuvaneshwari Sadhana
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना Maa Bhuvaneshwari Sadhana
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना Maa Bhuvaneshwari Sadhana भुवनेश्वरी महाविद्या दस महाविद्या में से एक है ! इस महा विद्या को करने से आप भूमि सुख राज्य सुख और भी जो इस धरती पर जो सुख है सब प्राप्त होंगे ! सब शत्रु से विजय प्राप्त होगी ! रात हनुमान ने आंखों में बिता दी थी। – हनुमान ने विनम्रता पूर्वक कहा। उन्हें पल भर नहीं आई थी… अभी हाल ही में गुप्तचर संदेश लेकर आया था कि रावण ने युद्ध में विजय हेतु महाचण्डी यश का प्रारम्भ कर दिया है। उसने देश भर के उत्कृष्ट विद्वानों को आमंत्रण था, और वे सभी इकट्ठे हो गए थे।
बस दो दिन बाद से ही इस महायज्ञ का प्रारम्भ हो जाएगा. और अगर वह यज्ञ किसी प्रकार से सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाए, तो रावण की विजय सुनिश्चित है… यही सब सोचकर अंजनी सुत सारी रात गंभीर चिंतन में इधर-उधर टहलते रहे.. पर ऋषि भी कब मानने वाले थे…. उनके बार-बार आग्रह करने पर कमिश्रेष्ठ ने एक अति विस्मित करने वाला वर मांगा, जो कि आगे जाकर राम की विजय का एक मुख्य कारण बना. महाचण्डी यज्ञ में जिस मंत्र के संपुटीकरण से हवन किया जाना था, वह था जय त्वं देविचामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते । युद्ध 斗 रावण की स्थिति दयनीय हो गई थी।Bhuvaneshwari Sadhana
उसके समस्त उच्चकोटि के योद्धा मारे गए थे. सभी काल कवलित हो गए थे और वह निःसहाय, निरुपाय मां चण्डी के आशीर्वाद के लिए लालायित था.. इसमें भूतार्तिहारिणी का अर्थ है सभी प्राणियों की पीड़ा करने वाली हनुमान ने ऋषियों से यह वर मांगा कि वे भूतार्तिहारिणी में ‘ह’ की जगह ‘क’ का उच्चारण कर दें। बेचारे ऋषि तो वचन बद्ध थे ही, उन्होंने तथास्तु कह दिया। इस प्रकार वह शब्द बन गया ‘भूतार्तिकारिणी’ जिसका अर्थ है सभी प्राणियों को कष्ट देने वाली। पर हनुमान को चैन कहां, वे तो निरन्तर इसी चिंतन में थे. कि किस प्रकार से राम के सामने आने वाली विपदा को पहले से ही ध्वस्त कर दिया जाए, किस प्रकार से उनके कंटकाकीर्ण मार्ग को पुष्पों से आच्छादित कर दिया जाए, ताकि उन्हें किसी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े इस प्रकार एक अक्षर के बदलने मात्र से यज्ञ रावण के लिए ही अनिष्टकारी बन गया। परन्तु इसके बाद भी हनुमान चैन से नहीं बैठे। Bhuvaneshwari Sadhana
वे तत्काल भगवान राम के पास पहुंचे और विनम्रता पूर्वक कहा और इसके लिए अगले ही दिन हनुमान एक विन का रूप धर कर पहुंच गए यज्ञ स्थली पर और वहां पहुंच कर सभी ऋषि-मुनियों की पूर्ण श्रद्धा भाव से सेवा करने लगे। उनकी निःस्वार्थ सेवा भावना से सभी ऋषि-मनि इतने प्रभावित कि उन्होंने विप्र के रूप में आए हनुमान को वर मांगने को कहा। “”प्रभु ! हमारे युद्ध कौशल के आगे रावण की समस्त सेना का विध्वंसहो चुका है, हमारी रणनीति और आपके आशीर्वाद द्वारा उनका अत्यधिक अहित हो चुका है, परन्तु.. 21 2 परन्तु क्या कपिश्रेष्ठ ?” – राम बोले। “नहीं नहीं महात्मन् मैंने किसी प्रयोजन से आपकी सेवा नहीं की थी मैं तो मात्र आपका साहचर्य लाभ प्राप्त परन्तु रावण अभी भी जीवित है और वही हमारा मुख्य एवं प्रबलतम शत्रु है। Bhuvaneshwari Sadhana
उसकी नाभि में अमृत कुण्ड स्थापितहै, जिससे वह सदैव चिर-यौवन वान बना रहता है और जिसके फलस्वरूप उसकी मृत्यु संभव नहीं इसके अलावा भी वह अपने कई आत्मजों के शवों को ढो चुका है. यहां तक कि उसकी विजय का आखिरी प्रयास महाचण्डी यज्ञ भी आपकी कृपा से विफल हो चुका है। अतः यह एक घायल सिंह की भांति हो गया है और आप तो जानते ही हैं, कि सौ सिंहों से एक चायल सिंह अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकता है। और उसी क्षण राम ने अपने प्रिय शिष्य हनुमान के निवेदन पर भुवनेश्वरी साधना एवं अनुष्ठान का प्रारम्भ किया एवं उसे सफलता पूर्वक सम्पन्न किया और इतिहास भी इस बात का गवाह है, किजो | रावण नाभि में अमृत कुण्ड स्थापित होने की वजह से अजेय था, अंततः कालकेविकराल पंजों से बच नहीं पाया… वैसे भी यह बड़ा मायावी और प्रपंची है। Bhuvaneshwari Sadhana
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना के लाभ Maa Bhuvaneshwari Sadhana ki labh भुवनेश्वरी साधना बेनिफिट्स
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना के लाभ Maa Bhuvaneshwari Sadhana ki labhभुवनेश्वरी साधना बेनिफिट्स1 उच्चकोटि की सिद्धियां उसके पास हैं और समस्त प्रकृति को वह अपने नियंत्रण में ले चुका है सारी प्रकृति उसके इशारों पर नृत्य करती है। साथ ही साथ उसके पास अद्वितीय दिव्यास्त्रों की भरमार है और उनमें कुछ तो ऐसे हैं जो समस्त ब्रह्माण्ड को विनष्ट करने में सक्षम है। जाता है, जिससे उसके आसपास के लोग स्वतः उसकी और आकर्षित होते हैं और उसकी हर आज्ञा का ना-नुच किए बिना पालन करते हैं।
2. यह साधना सिद्ध होते ही व्यक्ति की दरिद्रता, रोग, शत्रुभय, ऋण आदि की स्थिति स्वतः ही नष्ट हो जाती है और वह मान-सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करने लगता है। तो तुम्हारा क्या विचार है हनुमान राम ने पूछा। “प्रभु के आशीर्वाद से मुझे स्मरण आ रहा है, कि बाल्यावस्था में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान मुझे एक अद्वितीय महातेजस्वी साधना पद्धति मेरे गुरु सूर्यदेव ने प्रदान की थी, जो भुवनेश्वरी से सम्बन्धित है। उनके अनुसार समस्त देवियों की शक्ति को भुवनेश्वरी के रूप में सिद्ध कर लेने से वह साधक अजेय हो जाता है और फिर उसके सामने समस्त त्रैलोक्य के देवता, दानव, मनुष्य, गन्धर्व आदि भी युद्ध में टिक नहीं सकते। जिस क्षण यह साधना सम्पन्न होती है, उसी क्षण से शत्रु काल के सुपूर्द हो जाता है और उसका विनाश उतना ही निश्चित हो जाता है, जितना कि सूर्य और चन्द का अस्तित्व में होना।”
3. व्यक्ति के घर में निरन्तर धन का आगमन होता ही रहता है। उसका व्यापार तरक्की करता है और अगर वह नौकरी पेशा हो, तो उसकी पदोन्नति शीघ्र होती है।
4. इस साधना के प्रभाव से घर में अगर कोई तांत्रिक प्रयोग हो, तो वह नष्ट होता है।
5. कुण्डली में निर्मित दुर्योग फलहीन हो जाते हैं.. अगर दुर्घटना एवं अकाल मृत्यु का योग हो. तो वह भी अल्प हो जाता है, एक प्रकार से नष्ट हो हो जाता है। -और प्रभु राम मुस्करा दिए, प्रभु अपने भक्त की प्रसन्नता के लिए स्वयं विष्णुवतार होते हुए भी शिष्य/ भक्त हनुमान के निवेदन पर उसी क्षण भुवनेश्वरी साधना एवं अनुष्ठान का प्रारम्भ किया एवं उसे सफलता पूर्वक सम्पन्न किया.
6. साधक जिस कार्य में हाथ डालता है. उसमें विजय ही प्राप्त करता है, हर क्षेत्र में सफल होता है। इंटरव्यू परीक्षा आदि में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है। – और इतिहास भी इस बात का गवाह है कि जो रावण नाभि में अमृत कुण्ड स्थापित होने की वजह से अजेय था, अंततः काल के विकराल पंजों से बच नहीं पाया
7. ऐसा व्यक्ति समाज में सम्माननीय एवं पूजनीय होता है। उच्चकोटि के मंत्रीगण एवं अधिकारी भी उसकी बात को मस्तक पर धारण करते हैं। वह सभी का प्रिय होता है और जीवन में उसे किसी चीज का अभाव नहीं रहता।
8. इसके साथ ही साथ उसका पारिवारिक जीवन अत्यधिक सुखी होता है, यदि कोई क्लेश व्याप्त हो, तो भी वह समाप्त हो जाता है। वास्तव में ही यह साधना अपने आप में महातेजस्वी अद्वितीय एवं अनिवर्चनीय है। ऐसा आज तक हुआ ही नहीं, कि | व्यक्ति यह साधना सम्पन्न करे और उसका परिणाम उसे न मिले। ऊपर दिए गए संदर्भ में इस साधना का एक ही तथ्य स्पष्ट किया गया है। वैसे इसके सफलतापूर्वक सम्पन्न होने पर निम्न स्थितियां साधक के जीवन में अंकुरित हो जाती है-
9. उसकी समस्त इच्छाएं और कामनाएं पूर्ण होती है और वह स्वयं भी आश्चर्य चकित रह जाता है, कि किस प्रकार से उसकी सारी अभिलाषाएं स्वतः ही पूर्ण हो रही हैं।
10. भगवती भुवनेश्वरी वास्तव में सम्पूर्ण 64 कलाओं 1. साधक का व्यक्तित्व अत्यधिक आकर्षक एवं भव्य हो जाता है।
उसके इर्द-गिर्द एक तेजयुक्त आभा मण्डल निर्मित हो से परिपूर्ण है, अतः इस साधना को सम्पन्न करने से व्यक्ति को नहा भोग, धन, वैभव, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, वहीं वह अन्त में मोक्ष की स्थिति प्राप्त कर बालीन हो जाता है… और आवागमन के चक्र से छूट जाता है। ऊपर बताई गई स्थितियां तो मात्र सूर्य को रोशनी दिखाने के समान हैं। वास्तव में तो वह अपने आप में ही अद्वितीय तेजस्वी युगपुरुष बन जाता है। उसके अन्दर शक्ति का वह तीव्र प्रवाह समाहित हो जाता है, जिससे काल भी उसके सामने आने से मयभीत होता है। साथ ही साथ वह समस्त ज्ञान-विज्ञान में पारंगत हो वर्तमान पीढ़ी का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो पाता है और आने वाली पीढ़ियां उसे दिव्य पुरुष को संज्ञा से विभूषित कर आदर भाव से देखती हैं। साधना विधान यह भुवनेश्वरी साधना विधान वास्तव में शक्ति साधना का ही स्वरूप है और एक तरह से मात्र इस साधना को करने से आद्य शक्ति के समस्त स्वरूपों की साधना स्वतः ही हो जाती है।
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना की विधि Maa Bhuvaneshwari Sadhana vidhi
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना की विधि Maa Bhuvaneshwari Sadhana vidhi यह 9 दिन की साधना है और 1. 1. 99 से अथवा किसी भी मास के प्रथम दिन से इसे प्रारम्भ करना चाहिए। नवरात्रि के अवसर पर इस साधना को सम्पन्न किया जा सकता है। इस साधना में निम्न उपकरणों की आवश्यकता होती है। 1. भुवनेश्वरी यंत्र, 2. मूंगे का दाना, 3. मुक्नेश्वरी माना। निर्धारित दिवस की रात्रि में दस बजे के उपरान्त साधक स्नान आदि से निवृत्त होकर श्वेत स्वच्छ धोती धारण कर श्वेन आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठें। गुरु चित्र का स्थापन करें तथा ‘दैनिक साधना विधि’ पुस्तक में दी गई विधि से गुरु पूजन करें। अपने सामने लाल वस्त्र से ढके बाजोट पर भुवनेश्वरी यंत्र स्थापित कर उसका (कुंकुंम, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प) पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें। फिर साधक वाहिने हाथ में जल लेकर
निम्न प्रकार से विनियोग करें विनियोग ॐ अस्य श्री भुवनेश्वरी हृदय स्तोत्रस्य श्री शक्ति ऋषिः । गायत्री मन्च, भुवनेश्वरी देवता, ही बीजं, ई शक्तिः // रं कीलकं सकल-मनोवांछित-सिद्धचर्य पाठे विनियोगः ॥ जल भूमि पर छोड़ दें तथा शरीर के विभिन्न अंगों को दाहिने हाथ से स्पर्श करते हुए
निम्न न्यास सम्पन्न करें- ऋष्यादि न्यास श्री शक्ति ऋषये नमः शिरसि || गायत्री छन्दसे नमः मुखे ॥ श्री भुवनेश्वरी देवतायै नमः हृदि । ह्रीं बीजाय नमः गुझे ॥ ई शक्तये नमः नाभौ ॥ रं कीलकाय नमः पाक्योः ॥ सकल मनोवांछित सिन्द्रवयें पाठे विनियोगाय नमः सर्वांगि।
फिर मूंगे का दाना अगर मन में कोई इच्छा विशेष हो, तो उसे सोचकर निम्न मंत्रों से यंत्र पर अर्पित करे भुवनेश्वरी ध्यान उपदविनश्रुति मिन्दु किरीटान्तुङ्ग कुचाश्यनत्र युक्ताम् स्मेरमुखी व्वरवाङ्कुश पाशांभीति कराम्प्रभुजे मुवनेशीम् फिर ‘भुवनेश्वरी माला’ पर सिंदूर से तिलक करें तथा उसी माला से निम्न मंत्र की 101 माला मंत्र जप करें- मंत्र ।। ॐ ह्रीं ॐ ।। Qs Hreem Om तिलक कर पूजन करने के बाद ही भुवनेश्वरी माला से 101 मालाएं फिर नित्य साधना करने से पूर्व यंत्र एवं मुंगे के दाने का मंत्र जप करें। ऐसा नौ दिन तक करें, उसके उपरांत समस्त साधना सामग्री को किसी जलाशय में अर्पित कर दें। ऐसा करने से साधना निश्चय ही सिद्ध होती है। इसमें कोई संशय नहीं। निश्चित ही यह साधना एवं मंत्र परम गोपनीय और सामान्यतः अप्राप्य है, पर जिस किसी को भी यह साधना सिद्ध हो जाती है उसके
Bhuvaneshwari Sadhana
भाग्य से तो स्वयं देवी-देवता भी ईष्या करने लगते हैं और वह दिनों दिन ऊंचाई की ओर अग्रसर होता ही रहता है।