Author: Rodhar nath

मैं रुद्र नाथ हूँ — एक साधक, एक नाथ योगी। मैंने अपने जीवन को तंत्र साधना और योग को समर्पित किया है। मेरा ज्ञान न तो किताबी है, न ही केवल शाब्दिक यह वह ज्ञान है जिसे मैंने संतों, तांत्रिकों और अनुभवी साधकों के सान्निध्य में रहकर स्वयं सीखा है और अनुभव किया है।मैंने तंत्र विद्या पर गहन शोध किया है, पर यह शोध किसी पुस्तकालय में बैठकर नहीं, बल्कि साधना की अग्नि में तपकर, जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे जीकर प्राप्त किया है। जो भी सीखा, वह आत्मा की गहराइयों में उतरकर, आंतरिक अनुभूतियों से प्राप्त किया।मेरा उद्देश्य केवल आत्मकल्याण नहीं, अपितु उस दिव्य ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना है, जिससे मनुष्य अपने जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझ सके और आत्मशक्ति को जागृत कर सके।यह मंच उसी यात्रा का एक पड़ाव है — जहाँ आप और हम साथ चलें, अनुभव करें, और उस अनंत चेतना से जुड़ें, जो हमारे भीतर है ।Rodhar nath https://gurumantrasadhna.com/rudra-nath/

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Yogini Sadhana प्राचीन योगिनी साधना रहस्य -विधि विधान

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 Yogini Sadhana प्राचीन योगिनी साधना रहस्य -विधि विधान आज हम योगिनी साधना पर चर्चा करेंगे। यद्यपि स्त्री का हर रूप मधुर होता है, फिर भी जीवन में हर रूप का एक निश्चित अर्थ और महत्वपूर्ण स्थान होता है। चाहे मां का रूप हो, बहन हो या बेटी का, चाहे वह पत्नी हो या प्रेमिका या दोस्त। स्वरूप भिन्न हो सकते हैं. लेकिन गहरे दृष्टिकोण से हर रूप भोग के प्रयास में डूबे मातृत्व के एक अंतरशाला का प्रवाह लेकर ही चलता है, क्योंकि ऐसा करना हर स्त्री का मूल धर्म है, लेकिन इन सभी रूपों से कुछ अलग है, जो न केवल विशिष्ट है बल्कि विशिष्ट भी है, उसी एक रूप योगिनी का नाम है!

योगिनी एक नारी  देह में आबद्ध होते हुए, नारी मन की समस्त कोमल भावनाओं को एकत्र कर उपस्थित होते हुए भी अन्ततोगत्वा शक्ति का एक पुंज ही होती है, जो नारी देह का आश्रय लेकट सम्मुख आती है, क्योंकि शक्ति का आश्रय स्थल सदैव से ही नारी को स्वीकार किया गया है। केवल साधक ही नहीं, प्रत्येक सामान्य मनुष्य के जीवन में भावनाएं होती है, जो उसे सहज प्रवाह दे सकती हैं। जीवन से यदि भावनाओं को ही निकाल दिया जाए, तो मनुष्य व यंत्र में अंतर ही क्या रह जाएगा? किन्तु मनुष्य यंत्र नहीं हो सकता।  एक पहले ही इस युग की सभ्यता’ ने मनुष्य यंत्र बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है जिसके परिणाम की अधिक व्याख्या या वर्णन की आवश्यकता नहीं है। जो सम्मुख है, वह है एक यंत्रवत् जीवन जिसमें न किसी के प्रति कोई ममत्व है, न अपनत्व, न उछाह न वेग, न प्रेम और न ही फिर इन भावनाओं के अभाव में जीवन के प्रति कोई लक्ष्य ही।

किसी भी व्यक्ति से पूछ कर देखिए, कि उसके जीवन में जो आपाधापी चल रही है या जिस आपाधापी का न केवल उसने सृजन कर लिया है वदन् जिसका वह निरन्तर पोषण भी करता जा रहा है, उसका अर्थ क्या है? क्यों वह सदैव इतना उद्विग्न बना रहता है? इसके मूल्य पर उसे क्या प्राप्त हो जाएगा? किसी के पास भी इसका निश्चित उत्तर नहीं होगा, क्योंकि इन बातों का कोई निश्चित उत्तर हो भी नहीं सकता। भावनाएं जो जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि हो सकती हैं, जब उसी का अभाव हो गया, उसी का हनन् करके कुछ निर्मित करने की चेष्टा की, तो भूल तो वहीं से प्रारम्भ ही हो गयी।

और इसी बिन्दु पर आकर योगिनी साधना का महत्व स्वयमेव स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि योगिनी साधना का अर्थ ही है- भावनाओं की साधना, अपनत्व व ममत्व की साधना, जीवन में जो कुछ विस्मृत हो चला हो, जो कुछ टूट गया हो या जो कुछ रिक्त रह गय हो, उन सभी को अर्जित कर लेने या पुनः प्राप्त कर लेने की साधना यह तो भावनाओं का ही बल होता है कि जीवन में कोई भी व्यक्ति वह सब कुछ कर जाता है, जो अन्यथा उसके सहज बल से सम्भव नहीं था और यहां यह ध्यान रखने की बात है, कि बल का तात्पर्य शरीरिक बल से नहीं होता है।

यह तो मानसिक बल होता है, जो एक नर को पुरुष बनने की ओर तथा पुरुष को पुरुषोत्तम बनने की ओर उत्प्रेरित करता है और इसके मूल में होती हैं वे भावनाएं, जिनके मूल में होता है प्रेम! (यह कहना शायद पुनरोक्ति हो। जाएगा कि प्रेम का आधार होती है स्त्री) जो अपनत्व का भाव पत्नी के रूप में अधिक स्पष्टता से सामने आता है, प्रेमिका के रूप में वही भाव इस रूप में किंचित परिवर्तित हो जाता है, कि वह अपने प्रिय को सभी रूपों में केवल श्रेष्ठ ही नहीं श्रेष्ठतम देखना चाहती है. क्योंकि सामाजिक शिष्टाचार के अन्तर्गत एक प्रेमिका से अधिक पत्नी को अपनी मनोभावनाएं प्रकट करने की छूट होती है।

अंतर केवल सामाजिक बंधनों का है, विवेक का नहीं, और यह जीवन में सबसे अधिक संतोष और संतुष्टि से अधिक एक अद्वितीय सौ संतुष्टि का कारण बन जाता है। कोई मेरे लिए भी चिंतित रहता है, कोई | वह अनकहे रूप में मुझ पर अपना प्यार बरसाते रहते हैं, कोई मेरे बारे में भी सोचता रहता है और सबसे बड़ी बात यह है कि कोई मेरे पूरे अस्तित्व पर अपना अधिकार मानता है। क्योंकि इसका मतलब है कि ऐसा आश्वासन मिलना। भावनाओं पर आधारित केवल एक प्रकार की सुरक्षा भावना और आश्वासन ही वास्तविक सुरक्षा भावना दे सकता है, अन्यथा व्यक्ति को यह नहीं पता होता कि वह इसे प्राप्त करने के प्रयास में कहां भटकता है।

जीवन एक निरपेक्ष घटना नहीं होती है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी पद प्रतिष्ठा अथवा आर्थिक स्थिति का क्यों न हो. अपने जीवन का ताना-बाना किसी व्यक्ति या और अधिक विशद रूप में कहें तो किसी भावना से जोड़ कर ही बुनना चाहता है। सामान्यतयः व्यक्ति अपने जीवन को या अपनी अस्मिता को अपने परिवार से जोड़ कर जीवित रखना चाहता है। इसमें कोई अनुचित बात भी नहीं है।

परिवार जैसी सामाजिक संस्था के निर्माण के पीछे उद्देश्य ही यही रहा है, किन्तु निरन्तर बढ़ते हुए आर्थिक एवं अन्यान्य दबावों के बाद क्या आज यह सम्भव रह गया है. कि व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से कुछ अलग हट कर अपने जीवन को आहलाद व मधुरता देने वाले क्षणों के विषय में चिंतन तक कर सके ?

जीवन में ऐसी स्थिति आ जाने पर जिस प्रवाह की आवश्यकता होती है, वह किसी गणित की अपेक्षा केवल साधनाओं से ही उपलब्ध हो सकती है, क्योंकि प्रत्येक साधना स्वयं में शक्ति का एक-एक अजरा प्रवाह ही तो होती है। और यही तथ्य योगिनी साधना के विषय में भी पूर्णतयः सत्य है। आज समाज में योगिनी शब्द को लेकर क्या धारणा है, इसको कदाचित विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं अनेक व्यक्तियों की दृष्टि में भैरवी व योगिनी के मध्य भी कोई भेद नहीं होता।

यूं भैरवी की प्रस्तुति ही कहा प्रासंगिक रूप में सम्भव हो पायी है? किन्तु योगिनी इतना हल्का शब्द नहीं होता। योगिनी स्वयं में शक्ति तत्व की एक विशिष्ट प्रस्तुति व स्वरूप होती है, जिसकी साधना सम्पन्न करना प्राण तत्व को संचेतन कटने का एक उपाय होता है। यह सत्य है कि योगिनी की प्रस्तुति एक प्रेमिका रूप में होती है। किन्तु यह आवश्यक नहीं कि प्रेमिका शब्द से सदैव वासनात्मक अर्थ ही अभिप्रेत हो क्या प्रेमिका शब्द से एक महिला मित्र का अर्थ अभिप्रेत नहीं हो सकता है? वस्तुत योगिनी का वर्णन प्रेमिका रूप में होने के जो है वह है कि भारतीय समाज इतना की मान्यताओं में महिला मित्र की कभी कोई ही नहीं रही. लेकिन जो भावगत है वह सदैव से यही रहा है।

साथ ही प्रेमिका का तात्पर्य होता है, ऐसी स्त्री, जो अपने प्रिय पर अपना सावरकर देने में ही अपना सुख मन हो और न केवल विलक्षण सौन्दर्य के मेंट इस रूप में भी योगिनी की कोई भी उभी करने में असमर्थ ही होगी। जीवन को भावनाओं के आधार पर पुनः निर्मित करने व योगिनी के रूप में एक वास्तविक प्रेमिका प्राप्त करने के इच्छुक साधकों के हेतु 

जिसे सकर वे अपने भावनाशून्य हो रहे जीवन में हास्य, विनोद व मधुरता जैसे कुछ नये पृष्ठ जोड़ पाने में समर्थ हो सकते हैं।

योगिनी साधना Yogini Sadhana  विधि 

इस साधना में प्रवृत्त होने वाले साधकों के लिए आवश्यक है कि वे ताम्रपत्र पर अंकित ‘योगिनी यंत्र’ व सफेद हकीक की माता को साधनात्मक उपकरण के रूप में प्राप्त कर लें। यह साधना उपरोक्त दिवस (योगिनी एकादशी) के अतिरिक्त किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न की जा सकती है। साधना में वस्त्र आदि का रंग श्वेत होना चाहिए तथा दिशा उत्तर मुख होनी चाहिए। इस साधना में किसी विशेष विधि-विधान को सम्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है। यंत्र व माला का सामान्य पूजन करने पश्चात् दत्तचित्त भाव से निम्न मंत्र की ग्यारह माला मंत्र जप सम्पन्न करें- खिलता हुआ गोरा रंग भरा भरा सा पुष्ट मांसल बदन, अंडाकार चेहरा, खंजन पक्षी की भांति नयन और उन नयनों की एक-एक चपलता में झिलमिलाते प्रेम के कई कई सदिश योगिनी तो स्वयं में एक उपमा है, उसकी उपमा दें भी तो किससे दें  प्रेमिका . अवसर पर ही है, 

मंत्र  योगिनी साधना Yogini Sadhana

॥ ॐ ह्रीं योगिनि आगच्छ आगच्छ स्वाहा ॥ OM HREEM YOGINI AAGACHH AAGACHH SWAHA

यह एक दिवसीय साधना है तथा साधना सम्पन्न करने के दूसरे दिन यंत्र ६ माला को किसी स्वच्छ जलाशय में या निर्जन स्थान पर विसर्जित कर देना चाहिए। जैसा कि प्रारम्भ में कहा, योगिनी शक्ति तत्व का ही एक विशिष्ट प्रस्तुतिकरण होती है, अतः यह स्वाभाविक ही है, कि इसे मनोयोग पूर्वक सम्पन्न करने वाले साधक को जीवन के प्रत्येक पक्ष में अनुकूलता मिलने की क्रिया स्वयमेव | प्रारम्भ हो जाए, चाहे वह धन सम्बन्धी पक्ष हो, स्वास्थ्य की समस्या हो सौन्दर्य प्राप्ति की कामना हो या गृहस्थ जीवन के किसी भी पक्ष को स्पर्श करता कोई भी पक्ष क्यों न हो। प्रस्तुत साधना की एक अन्य गुहा विशेषता यह साधना भी है। अनुभवों को भी है कि यह प्रबल पौरुष प्राप्ति की साधना सम्पन्न करने के उपरान्त अपने गोपनीय ही रखें।

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आज  हम Dhumavati धूमावती साधना की चर्चा करेंगे अपना जीवन यापन कठिन परिस्थितियों में रहकर कर रहा है, चाहे वह किसी संस्था में कार्यरत हो या व्यवसाय कर रहा अथवा स्वतंत्र क्षेत्र में कार्य कर रहा हो. हर क्षेत्र में कठिनाई, बाधाएं शत्रु बाधा एवं प्रतिस्पर्धा आदि चुनौतियां हर पल व्यक्ति को नीचा दिखाने के लिए तत्पर रहती है। इन सब कारणों की वजह से व्यक्ति हर पल अपने सम्मान की रक्षा के लिए चिन्तित रहता ही है।

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इसके समाधान एवं निष्कंटक अपने क्षेत्र में प्रगति के लिए प्रबल दैवीय संरक्षण प्राप्त होना, आज नितांत आवश्यक हो गया है। दैवीय संरक्षण कैसे प्राप्त हो, इसके लिए साधक को थोड़ा सा प्रयास करने की एवं उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इन दोनों की समविन्त क्रिया से साधक दैवीय कृपा प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है।

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वैसे भी प्रत्येक देवी देवता मनुष्य को हर पल, हर क्षण, रक्षा-सुरक्षा प्रदान करने के लिए तत्पर रहते हैं, आवश्यकता केवल इस बात की है, कि हम इनकी कृपा के अधिकारी बनें आवश्यकता इस बात की है. कि हम उनसे सहयोग एवं आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रबल भावना एवं पात्रता रखें। जीवन में चाहे भौतिक पक्ष में उन्नति की बात हो अथवा आध्यात्मिक उन्नति एवं पूर्णता प्राप्त करने की त हो, उसमें महाविद्या साधना का महत्व सर्वोपरि है।

अलग-अलग कार्यों हेतु शिव के घटदान स्वल्प उनकी शक्ति स्वरूप से इन दस महाविद्या की उत्पत्ति मानी गयी है, जिनकी साधना साधक अपनी समस्या के निवारण के लिए उचित मुहूर्त पर सम्पन्न क सफल व्यक्ति बन सकता है। दस महाविद्याओं में भगवतीDhumavati धूमावती साधना स्थायी | सम्पति की प्राप्ति, प्रचण्ड शत्रुनाश, विपत्ति निवारण संतान की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण साधना है। वास्तव में इस साधना को सम्पन्न करना जीवन की अद्वितीयता है।

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rakta chamunda रक्तचामुण्डा यक्षिणी सब से तीव्र वशीकरण साधना रक्तचामुण्डा साधना आपार  वशीकरण हासिल करने की साधना जिसे से स्त्री पति पत्नी ,प्रेमिका को वश में किया 

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ॐ सिद्धि रक्त चामुण्डे घुरंघुरं अमुकीवशमानय स्वाहा । “

rakta chamunda रक्तचामुण्डा यक्षिणी  साधना  साधन विधि – इस रक्तचामुण्डा यक्षिणी मन्त्र से अभिमंत्रित गुड़हल के सहस्र फूलों से हवन करने पर राजा वशीभूत होता है । ( ४४ ) कनेर के सहस्र फूलों से हवन करने पर सब लोग वशीभूत होते हैं । कपूर के साथ सेवती के सहस्र फूलों का हवन करने से द्रव्य-प्राप्ति होती है। जुही के सहस्र फूलों का हवन करने से पुत्र प्राप्ति होती है स्त्री का नाम लेकर हवन करने से स्त्री की प्राप्ति होती है। सेमल के सहस्र फूलों का हवन करने से शत्रु की मृत्यु तथा उच्चाटन होता है ।

निवारी के सहस्र फूलों का हवन करने से शत्रु का नाश होता है । सहस्र कमलों से हवन करने पर अकाल में बादल होकर वर्षा होती है । ‘अमुक रोगी के रोग का नाश हो’ इस प्रकार कहते हुए सहस्र कचनार के फूलों से हवन करने पर रोगी का रोग नष्ट होता है । अलसी के सहस्र फूलों से हवन करने पर सबकी वृद्धि होती है तथा गरा के सहस्र फूलों से हवन करने पर सुभिक्ष होता है और वर्षा होती है । यह ‘ रक्तचामुण्डा यक्षिणी मन्त्र’ अनेक प्रकार की अभि-! लाषाओं को पूर्ण करने वाला है । मन्त्र में जिस स्थान पर ‘अमुक’ शब्द आया है, वहाँ साध्य व्यक्ति के नाम का उच्चारण करना चाहिए ।

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साधना में जल्दी सिद्धि कैसे प्रपात करे How to get siddhi fast in sadhna

 

साधना में जल्दी सिद्धि कैसे प्रपात करे How to get siddhi fast in sadhna  ph.85280 57364

साधना में जल्दी सिद्धि कैसे प्रपात करे How to get siddhi fast in sadhna सिद्धि मिले तो कैसे ? आज जन साधारण में यह चर्चा सुनने में आती है कि सिद्धियां प्राप्त नहीं होती और यह बहुत हद तक सही भी है. इसका मुख्य कारण हम लोगों के संस्कार, शिक्षा, आचार-व्यवहार, ब्रह्मचर्य, रहन सहन इत्यादि है।

सबसे पहले प्रथम संस्कारों को ही लीजिये कि माता-पिता जन्मजात कुमारों के जिनके कि हर प्रकार से सभी संस्कार होने की आवश्यकता है. वर्तमान समय की नई हवा से प्रभावित होने के कारण तथा अधार्मिक शिक्षा के प्रभाव में बड़े होने के कारण किसी भी प्रकार के संस्कार करने में उन्हें कोई सांधे नहीं है। इससे वे जन्मजात ब्राह्मण कुमार भी असंस्कारी शूद्रवत् रह जाते हैं। जैसा स्तुतियों में स्पष्ट लिखा है- जन्मना जायते शूदी. संस्कारात् द्विज् उच्यते ।”

जब वे असंस्कृत रह गये तो फिर मंत्र दीक्षा के वे अधिकारी तो हो ही नहीं सकते. परन्तु फिर भी आचार्य लोग स्वदक्षिणा के लोभ में या धन से प्रभावित होकर ब्राह्मणतत्व का दोष परिहार किये बिना ही कालातिक्रमण हो जाने पर भी जैसे-तैसे उन्हें उपवीती बना ही देते हैं. और बात ही बात में दीक्षित भी कर देते हैं. फलतः ब्राह्मण कुमार उपवीत को गले में इसलिए रख लेते हैं, कि वह ब्राह्मण का प्रतीक चिह्न है. परन्तु मैला हो जाने पर उसे गले से निकालकर साबुन से धोकर सुखा देते हैं। इतना ही नहीं सर्दी के दिनों में तो कई लोग ब्रह्मगांठ को सुखाने में खूंटी पर लटका लेते हैं। भूले भटके जब याद आ जाए तो गले में डाल लेते हैं। स्पष्ट है कि इस प्रकार उस ब्रह्मसूत्र का क्या महत्त्व रह जायेगा?

केवल दिखाऊ यज्ञोपवीत उन द्विज पुत्रों के गले में यदाकदा पड़ा रहता है। इसके बाद ही विवाह संस्कार भी जैसे-तैसे सम्पन्न हो ही जाते हैं। इसके अतिरिक्त जितने भी संस्कार है उनसे पलायन और कहीं-कहीं मौजूद है भी. इसे नकारा नहीं जा सकता। तो विधि-विधान में और बिना विधि में क्या फर्क रहा ? यह तो हुई संस्कारों की वस्तुस्थिति।

आज के युग में स्कूलों व कॉलेजों का अधिकांश भाग दुर्गुणों से पीड़ित है। उनमें अधिकांश जूते पहने खाना, पेन्ट इत्यादि पहिने खड़े-खड़े लघुशंका आदि करना आरम्भ में ही बालक सीख लेते हैं। जहां तक गुरु के सम्मान का प्रश्न है उसकी कल्पना भी व्यर्थ है। गुरु वर्ग को मारना पीटना एक फैशन-सा हो गया है इससे बढ़कर शिक्षा का और क्या हास हो सकता है?

फिर गुरुमुख उच्चारित हो भी तो कहां से? अब आचार-व्यवहार का भी भाव यह है कि जहां भारत वर्ष में “अचारो प्रथमो धर्मः!” माना जाता था वहां स्नान आचमनादि का यह हाल है कि समय पर भूलकर भी कोई शय्या त्याग करता. उठते ही आजकल के लोगों को चाय और नाश्ता चाहिए जिसके धूमावती एवं बगलामुखी तांत्रिक साधनाएं बिना यह कहते सुना गया है. कि चाय बिना स्फूर्ति उपलब्ध नहीं होती यानी कि स्फूर्ति का टॉनिक चाय है।

अब उनके कथनानुसार दूध के गुण तो मारे ही जाते हैं। चाय पीते ही यह सिद्ध होता है, कि चाय इत्यादि पीकर ही शौचादि से निवृत्त होने के लिए कदम उठ है. तथा निवृत होकर समाचार-पत्र पढ़ने के लिए बैठ जाते हैं। स्मृति, वेद, पुराणों का पठन-पाठन इसके आगे समाप्तप्राय हो गया है। समय मिलते ही गर्मी में तो स्नान इत्यादि करेंगे, परन्तु सर्दी हुई तो मुंह हाथ तथा सिर पर जो लम्बी जटा रूपी बाल है, धो लेंगे। मेरा एक मित्र इसी को ड्राइक्लीनिंग होना कहता है उसके बाद भीजन इस प्रकार नित्य कृत्य में अन्याय कर्म रह जाते हैं। संध्यावन्दन तो कल्पना की बात हो गई है।

इसी प्रकार अन्य कुकृत्यों के कारण आचार समाप्त हो गये हैं। झूठ सत्य का नाम-निशान नहीं रहा। हम हर पल में छोटी-छोटी बातों में भी: बोलने से नहीं कतराते । असत्य भाषण, कटु भाषण, निन्दित भाषण, परनिन्दा, छिद्रान्वेषण आदि कर्म करने में नहीं चूकते हैं। फिर धर्म शास्त्रानुसार सिद्धि हो तो कैसे ? ब्रह्मचर्य की तो पराकाष्ठा विपरीत रूप में दिखाई देती है । आज का बालक कल का युवा सभी सिगरेट पीना, पान खाना. तड़कीले भड़कीले वस्त्र पहनना आदि दुर्गुणों से व्याप्त हैं। कुसंगति में पड़कर भावी जीवन पर कत्तई ध्यान न देकर अपरिपक्व अवस्था में नाना प्रकार की बीमारियों के शिकार होकर असमय ही काल के ग्रास हो जाते हैं। रहन-सहन भी आजकल अपरिग्रही के बजाय परिग्रही बनता जा रहा है ।

जिधर देखिये छात्र के आस-पास बनावटीपन दिखेगा। पतलून पाजामा, कमीज, कोट, कुर्ता, बुशर्ट आदि दिखेगा। सत्य तो यह है कि लड़के और लड़की में भेद करना असंभव है। दूसरी और असहनशीलता छात्रों में घर कर गई है। इसका असर कुटुम्ब और परिवार पर भी दिखाई देता है ।

पाठक ही बताये ऐसी विपन्न अवस्था में सिद्धि हो तो कैसे हो ? इसके लिए हमें अपने धर्मशास्त्रों के अनुसार जन्मजात बच्चों के संस्कार तो तत् साक्षीय गृह सुविधानुसार करने चाहिए और प्राचीन परिपाटी के अनुसार गुरुकुलों का संचालन हो जिनमें सांस्कारिक शिक्षा की हो ताकि धर्म क्या है? इसका भली प्रकार भान हो सके और नित्य नियमपूर्वक संस्कारिक शिक्षा-दीक्षा दी जाय ताकि वे गुरुकुल से निवृत्त होकर घर जाने पर नियमों का उल्लंघन न कर सकें । जब वे धर्माचरण में निवृत्त होकर संध्या इत्यादि कर्म करते रहेंगे तो उन्हें सिद्धियां अवश्यमेव प्राप्त होंगी, और उन्हें गुरु-दीक्षा से मंत्र रहस्य इत्यादि भी ज्ञात हो सकेंगे।

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तांत्रिकों की इष्ट देवी माँ तारा का रहस्य Tara Rahasya, Ph. 85280 57364

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Maa Tara Rahasya माँ तारा साधना रहस्य और ऐतिहासिक तथ्य ph. 8528057364

तांत्रिकों की इष्ट देवी माँ तारा का रहस्य , Ph. 85280 57364

gold and red hindu deity statue

 

तांत्रिकों की इष्ट देवी माँ तारा का रहस्य Tara Rahasya, Ph. 85280 57364  तंत्र साधकों, विशेषकर शाक्त सम्प्रदाय से सबंध रखने वाले तांत्रिकों के लिये दस महाविद्याओं की साधनाएं सम्पन्न करना अति आवश्यक है। इन दस महाविद्याओं को पूर्ण रूप से सिद्ध करने के बाद ही वह आगे पथ पर अग्रसर हो पाते हैं और सम्पूर्णता के साथ दिव्य आनन्द की अनुभूति प्राप्त कर पाते हैं। तंत्र साधना की इन दस महाविद्याओं में ‘तारा महाविद्या’ का अपना विशिष्ट स्थान रहा है। इसलिये तांत्रिकों के लिये तारा महाविद्या की साधना सबसे श्रेष्ठ और अद्भुत एवं प्रभावपूर्ण मानी गयी है।

इस महाविद्या को पूर्णतः से सिद्ध करते ही तांत्रिक महातांत्रिकों की कतार में सम्मिलित हो जाता है। फिर उस साधक के लिये कुछ भी अगम्य और अबोध नहीं रह जाता। प्रकृति उसकी कल्पना और इच्छा मात्र से संचालित होने लग जाती है। यद्यपि तारा महाविद्या को पूर्ण रूप से स्वयं में आत्मसात कर पाना अपवाद स्वरूप ही किसी तांत्रिक के वश की ही बात होती है। इसीलिये बहुत कम साधक ही तंत्र क्रिया के माध्यम से तारा महाविद्या को पूर्ण रूप से साथ साधने में सक्षम हो पाये हैं । भगवान राम के कुल पुरोहित वशिष्ठ जी को इस महाविद्या का प्रथम तंत्र साधक माना जाता है ।

लंकाधिपति रावण ने भी तारा महाविद्या की साधना की थी। वर्तमान युग में बंगाल के प्रख्यात तंत्र साधक वामाक्षेपा, कामाख्या के महातांत्रिक रमणीकान्त देवशर्मन, नेपाल के सुप्रसिद्ध तांत्रिक परमहंस देव आदि ही कुछ ऐसे तांत्रिक हुये हैं, जो तारा महाविद्या की दिव्य अनुभूतियां प्राप्त कर पाने में सफल हो पाये हैं। बंगाल के तांत्रिक वामाक्षेपा के संबंध में तो ऐसी किंवदंतियां प्रचलित रही हैं कि वह माँ की उपासना में इतने अधिक तल्लीन रहते थे कि उन्हें हफ्तों और कभी-कभी तो महीनों तक स्वयं की कोई सुध-बुध नहीं रहती थी।

https://www.youtube.com/watch?v=wIGWIBmZAFg&pp=ygUSbWFtYSDgpKTgpL7gpLDgpL4g

इस शमशानवासी तांत्रिक की दयनीय हालत जब माँ से सहन नहीं होती थी, वह स्वयं आकर अपने प्रिय भक्त को अपना स्तनपान कराया करती थी । तांत्रिक देवशर्मन के संबंध में भी अनेक अद्भुत बातें प्रचलित रही हैं । शाक्त तांत्रिकों की इन दस महाविद्याओं की साधनाओं में जो साधक गहरी रुचि रखते हैं और जो इन महाविद्याओं को स्वयं में आत्मसात करना चाहते हैं, इन महाविद्याओं को सिद्ध करना चाहते हैं, उन सभी को एक बात ठीक से समझ लेनी चाहिये कि आज के जो तथाकथित तंत्र गुरु इन महाविद्याओं की साधना के संबंध में जो दिवास्वप्न दिखाते हैं, वह सब वास्तविकता से बहुत दूर की चीजे हैं।

वास्तव में तो वह स्वयं भी किसी वास्तविक अनुभूति की प्रक्रिया से नहीं गुजरे होते हैं। उनकी सम्पूर्ण बातें पुस्तकीय पाठन, मानसिक सृजन और काल्पनिक बीज से अंकुरित होती हैं। तंत्र साधकों द्वारा जो मुण्डमाला तंत्र, चामुण्डा तंत्र, शाक्त प्रमोद तारा तंत्र जैसे अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं, उनमें दस महाविद्याओं के रूप में माँ तारा का द्वितीय स्थान रखा गया है । इन्हें विश्वव्यापिनी आद्यशक्ति का द्वितीय रूपान्तरण माना गया है, जो स्वयं को अनंत- अनंत रूपों में विभाजित करके सृष्टि की रचना और पोषण का कार्य देखती है ।

इसलिये यह महाविद्या सृजन शक्ति से सदैव सम्पन्न रहती है। तंत्र साहित्य में माँ तारा की साधना, पूजा-उपासना और तांत्रिक अनुष्ठानों पर बहुत विस्तार से प्रकाश डाला गया है। माँ तारा के ऐसे अनुष्ठानों को सम्पन्न करके अनेक प्रकार की पीड़ाओं तथा कष्टों से सहज ही मुक्ति मिल जाती है और माँ के साधक सहज ही विभिन्न प्रकार के भौतिक सुख, साधनों की प्राप्ति कर लेते हैं। इतना ही नहीं, इस महाविद्या की साधना के माध्यम से परमात्मा का सहज साक्षात्कार पाकर मुक्ति लाभ भी सहज एवं सम्भव हो जाता है।

माँ तारा का स्वरूप आद्य जननी महाकाली से बहुत साम्य रखता है । यद्यपि यह कज्जल सी काली न होकर गहरे नीले वर्ण वाली है । इसलिये इन्हें ‘नील सरस्वती’ भी कहा जाता है। माँ का यह नीला रंग अनन्त, असीम सीमाओं और क्षमताओं का प्रतीक है। माँ की इन असीम, अनंत क्षमताओं की वास्तविक अनुभूति इनकी साधना के माध्यम से ही प्राप्त हो पाती है । अतः द्वितीय महाविद्या के रूप में माँ तारा अनंत, असीम संभावनाओं की प्रतीक है। तारा की तंत्र साधना और उनके तांत्रिक अनुष्ठानों के विषय में गहराई से जानने से पहले अगर ‘तंत्र’ और ‘तंत्र की सीमाओं’ के विषय में थोड़ा जान लिया जाये तो अधिक उपयुक्त रहेगा, क्योंकि इससे तंत्र के वास्तविक रूप विशेषकर तांत्रिकों की महाविद्याओं और उनकी अनुकंपा के प्रसाद स्वरूप प्राप्त होने वाले फलों को समझने में सहजता रहेगी।

 

 

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जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism ph.85280 57364

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जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism ph.85280 57364

जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism

 

जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism
जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism

जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism : तारा महाविद्या की साधना तंत्र साधकों के अतिरिक्त बौद्ध भिक्षुओं और जैन साधकों भी खूब प्रचलित रही है । अगर बात जैन धर्म की की जाये तो प्राचीन समय से ही जैन मतावलम्बियों में माँ तारा की उपासना होती आ रही है। दरअसल जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकरों की मान्यता है और उन्हीं के अनुसार चौबीस तीर्थंकरों की चौबीस शासन देवियां मानी गयी हैं। इन देवियों को जिन शासन में शीर्ष स्थान प्रदान किया गया है। जैन धर्म में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को स्वीकार किया गया है और उसी प्रकार भगवान ऋषभदेव के शासन की प्रभाविका देवी चक्रेश्वरी मानी गयी है। जैन धर्म में आठवें तीर्थंकर के रूप में चन्द्रप्रभु की मान्यता है और उनकी शासन देवी ज्वाला मालिनी देवी मानी गयी ।

इसी प्रकार बाइसवें तीर्थंकर की मान्यता भगवान नेमिनाथ को दी गई है और उनकी शासन देवी का स्थान अम्बिका को दिया गया है । तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ माने गये हैं और उनकी शासन प्रभाविका देवी के रूप में ही माँ तारा की प्रतिष्ठा माता पद्मावती के रूप में की गयी है। जैन धर्मावलम्बियों में देवी पद्मावती के रूप में माँ तारा की पूजा, अर्चना, आराधना से इहलोक के साथ-साथ परलोक संबंधी समस्त सुख, वैभवों की प्राप्ति की मान्यता रही है। माता पद्मावती के प्रति भक्ति और उनके आशीर्वाद की गौरव गाथा जैन ग्रंथों में यत्र- तत्र विपुल मात्रा में उपलब्ध है। यहां एक ओर लोकेषणा (सांसारिक इच्छाओं की प्राप्ति) के लिये माँ की पूजा-अर्चना की जाती है, वहीं दूसरी ओर बड़े-बड़े जैन मुनियों ने अलौकिक एवं दिव्य आनन्द की प्राप्ति के लिये कल्याणमयी माँ पद्मावती को अपनी आराधना का अंग बनाया । 

 

ऐसे उल्लेख मिलते हैं कि प्रसिद्ध जैन मुनि हरिभद्र शूरि ने अम्बिका देवी को प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया, तो वहीं दूसरी ओर आचार्य भट्ट अकलंक ने माता पद्मावती को प्रसन्न करके उनसे वरदान ग्रहण किया । आचार्य भद्रबाहू स्वामी ने एक व्यंतर (देव) के घोर उपसर्ग से आत्मरक्षा के निमित्त माँ पद्मावती की अभ्यर्थना की थी । एक अन्य जैन श्रुति के अनुसार श्रृणुमान, गुरुदत्त तथा महताब जैसे जैन श्रावकों पर भी मा पद्मावती की सदैव विशेष अनुकंपा बनी रही 1 माता पद्मावती को विभिन्न नामों से स्मरण किया जाता है, जिनमें सरस्वती, दुर्गा, तारा, शक्ति, अदिति, काली, त्रिपुर सुन्दरी आदि प्रमुख हैं। माता पद्मावती की स्तुति, भक्ि के लिये जैन ग्रंथों में विपुल स्तोत्र साहित्य उपलब्ध है ।

इनकी स्तुति एवं भक्ति समस्त दुःखों का शमन करने वाली, प्रभु का सान्निध्य, सामीप्य के साथ-साथ दिव्य आनन्द प्रदान करने वाली संजीवनी मानी गयी है । विभिन्न स्तोत्रों के रूप में माता पद्मावती की पूजा- अर्चना भक्त हृदयों का कंठहार बन गयी है । पार्श्वदेव गणि कृत भैरव पद्मावती कल्प स्तोत्र में कहा गया है कि माता पद्मावती की आराधना से राज दरबार में, शमशान में, भूत-प्रेत के उच्चाटन में, महादु:ख में, शत्रु समागम के अवसर पर भी किसी तरह का भय व्याप्त नहीं रहता । सांसारिक इच्छाओं से अभिभूत होकर बहुत से लोग माँ की पूजा-अर्चना में निमग्न होते हैं, लेकिन जब वह लौकिक भक्ति के साथ विशेष अनुष्ठान (तांत्रिक पद्धति) से करते हैं, तो उनका अनुष्ठान अलौकिक रूप धारण कर लेता है ऐसी अवस्था में साधक की भक्ति मंगललोक में प्रवेश कर जाती है, जैसे सौभाग्य रूप दलित कलिमलं मंगल मंगला नाम अर्थात् माता सौभाग्य रूप है तथा कलियुग के दोष हरण कर उत्कृष्ट मंगल को प्रदान करने वाली है।

तंत्र की भांति ही जैन धर्म भी माता पद्मावती का चतुर्भुजधारी रूप स्वीकार किया गया है। माता पद्मावती की प्रत्येक भुजा में क्रमशः आशीर्वाद, अंकुश, दिव्य फल और चतुर्थ भुजा में पाश (फंदा) माना गया है। माँ की इन भुजाओं का विशेष प्रतीकात्मक अर्थ है। जैसे माँ का प्रथम वरदहस्त समस्त प्राणी जगत को आशीर्वाद का संकेत प्रदान करता है। दूसरी बाजू में अंकुश है जो इस बात का प्रतीक है कि साधक को प्रत्येक स्थिति में अपने ऊपर अंकुश (संयम) बनाये रखना चाहिये। तीसरी बाजू में दिव्य फल भक्ति के फल को प्रदान करने वाला है, जबकि चतुर्थ बाजू में पाश प्रत्येक प्राणी को कर्मजाल से स्वयं को सदैव के लिये बचाये रखने के लिये प्रेरित करता है 

जैनधर्म में माता पद्मावती का वाहन कर्कुट नाग माना गया है। यह भी तांत्रिकों की भांति माँ के रौद्ररूप का परिचायक है । कर्कुट नाग का अर्थ विषैले नाग से है। यह पापाचारियों के लिये दण्ड का चिह्न है। माता पद्मावती पार्श्वनाथ की लघु प्रतिमा को अपने शीश पर धारण किये रहती हैं । गुजरात में मेहसाणा के पास मेरी एक जैन मुनि से भेंट हुई थी, जो पिछले लगभग चालीस सालों से माँ पद्मावती की साधना करते आ रहे हैं। उन्होंने तांत्रिक पद्धति से माँ का साक्षात्कार प्राप्त करने में सफल्ता प्राप्त की है । इन जैन मुनि के आशीर्वाद मात्र से चमत्कार घटित होते हुये देखे गये हैं ।

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Panchanguli sadhana – चमत्कारी प्राचीन त्रिकाल ज्ञान पंचांगुली साधना रहस्य ph.85280 57364

Panchanguli sadhana – चमत्कारी प्राचीन त्रिकाल ज्ञान पंचांगुली साधना रहस्य ph.85280 57364 गुरुमंत्र साधना। कॉम  में स्वागत है ! आज हम फिर तिरकाल ज्ञान साधना के ऊपर वीडियो लेकर आया हु ! जो तिरकाल ज्ञान की सब से मशहूर साधनो में से एक है जिस का नाम पंचागुली विद्या ! तिरकाल ज्ञान की जानकारी के लिए हमारे  ऋषि मोनीओ ने बहुत सारे  ग्रंथो और साधनाओ की रचना की है ! 

इस काम में हमारे  ऋषि मोनीओ ने बहुत योगदान पाया है महर्षि भृगु और ऋषि पराशर  जी ने  जी ने    ज्योतिष  विद्या का   निर्माण किया ! भूत भविष्य वर्तमान जानने के बहुत सारे  माध्यम  है कोई  ज्योतिष  विद्या  से  जनता है  कोई  आज्ञा चक्र के माध्यम  से जनता है सब के काल ज्ञान की साधना के अलग अलग माध्यम  हसत रेखा देखता है इन सब से श्रेष्ठ माध्यम  साधना का है !

  • पंचांगुली विद्या
  • पंचांगुली शाबर मंत्र 
  • पंचांगुली मंत्र 
  • पंचगुली साधना विद्या को सिद्ध कैसे करे
  • पंचांगुली साधना रहस्य
  • पंचांगुली साधना  काल ज्ञान जानने का फायदा

 

 

ज्योतिष  विद्या  डेट ऑफ़ बर्थ पर और  आप के  जनम समय  पर काम करती है  जिस के पास अपना सही डेट ऑफ़ बर्थ नहीं है तो उस के लिए  समस्या है ! जायदातर लोगो के पास सही डेट ऑफ़ बर्थ नहीं होता ! वहां ज्योतिष  विद्या काम नहीं करेगी ! ज्योतिष  में  यह  नहीं बताया जाता है फलानी तरीक को इतने समय में तुम्हारा काम होगा ! ज्योतिष समय और तरीक  नहीं बताया जाता ! इस लिए  ज्योतिष  का ज्ञान कुछ हद तक ही है !

मैं किसी विद्या को श्रेष्ठ साबित करना नहीं  है सब विद्या अपनी जग़ह सही है ! सब विद्याऐं भगवन के द्वारा बनी गई  है ! सब विद्या श्रेष्ठ  है सही है पर हर विद्या की एक लिमिट होते  है ! उस के आगे   वो विद्या काम नहीं कर सकती ! तंत्र विद्या की कुछ साधनाओ के द्वारा आप  जान सकते है  और बहुत बारीकी से इन साधनो के बरेव में मैंने बहुत सरे वीडियो और जानकारी   अपने   यूट्यूब चॅनेल गुरु मंत्र साधना और अपनी  वेबसाइटgurumantrasadhna.com में दी है  आप मेरे चैनल  और मेरी वेबसाइट में देख जिन में मैंने करन पिशाचिनी साधना , मां दुर्गा तिरकाल ज्ञान साधना , वाराही तिरकाल ज्ञान साधना , इन साधनो पर मैंने वीडियो बनाए है ! तो अगर आप ने वो वीडियो नहीं देखा तो आप वो सब वीडियो जरूर देखे ,

आज भूत भविष्य वर्तमान जानने की और विद्या के बारे में जानकारी प्रदान करेंगे जिस का नाम पंचगुली है विद्या है पंचागुली का अर्थ है पंच उंगली  हाथ की पांच उंगलिओ से है  ! हमारे इन हाथो में बहुत कुछ छिपा है हमारा अच्छा बुरा इन में बहुत सारी रेखाएँ  है जिन में हमारे ज़िंदगी का सब हाल है पर इस सब को हर इंसान नहीं पढ़ सकता है इसे  केवल पंचागुली देव्वी की किरपा से जान सकते है !

आप की ज़िंदगी में कब क्या  होने वाला है सबा जाना जा सकता है किस वयक्ति को किया रोग है या भविष्य में क्या रोग होगा सब जान सकते है किसी वयक्ति को क्या रोग है या आने वाले टाइम में क्या रोग होगा  सब जान सकते है एक संन्यासी  फ़्रांस  आकर वो भारत में सिद्ध ऋषि मुनिऔ का सान्ध्य  में रहे  और उन ऋषि मुनीओ  से पंचगुली महाविद्या ज्ञान लिया और विश्व  में विखायती  को प्रपात करा उनका नाम है कीरो  और वो किसी का भी भूत भविष्य बता देते थे उन की चर्चा चारो और फेल चुकी थी !

  पर्दे में छिपे व्यक्ति के हाथ बाहर निकलवा करके भी कह देते थे अली जावेद का हाथ है यह महारानी विक्टोरिया का हाथ है  उसको यह रोग है या यह ररोग होने वाला है और यह दुर्घटना घटित  होने वाली है ! उन की लाखों  पुस्तकें  मार्किट में मिल जाऐगी !  पंचांगुली विद्या की और उसके संपर्क में आने से ही वह विश्वविख्यात हो गए !

पंचांगुली साधना  काल ज्ञान जानने का फायदा

पंचांगुली साधना  काल ज्ञान जानने का फायदा – काल ज्ञान अगर आप को पता है तो अगर भविष्य  होना लिखा है तो आप पहले से सावधान हो जाओगे और उस कर्मी को जायदा सेजयदा पूजा पाठ कर के  टाल  सकते हो ! इस का यह सबसे पहला फायदा है ! पूजा path से बड़े से बड़ा कर्म काटा  जा सकता है !

गुरु जी के चार से पांच  शिष्य  थे   तो हमारे इलावा सुरेश भी था  उस की पत्नी भी गुरु जी से दीक्षित थी ! जब भी गुरु जी हमारी शहर में आते तो वो गुरु जी से मिलने के लिए  अक्सर आती  आते समय कुछ ले कर आती  गुरु जी जब चार पांच दिन के लेया ही हमारे शहर में रुकते थे ! उन के  शिष्य और उनके सज्जन मित्र  मिलने के लेया आते तो उनके चाये  पानी का इंतजाम  सुरेश   की पत्नी करती ! एक दिन सुरेश की पत्नी ने गुरु जी को हाथ देखने के लिए  कहा   गुरु जी को पंचागुली  महाविद्या  सिद्ध  थी   गुरु जे  हाथ देख कर बताया के तुम्हारे ऊपर १४ दिन के भीतर एक ऐसा संकट आने वाला है !  

जो तुम्हारी ज़िंदगी में पहले भी चूका है वही दुबारा  फिर से होगा !  सुनकर घबराई और गुरुदेव से इस का समाधान पूछने लगी तो गुरु जी ने उन को एक लाची दाना दिया जब भी तुम्हे  परेशानी हो तो तुम इस से खा लेना ! तो उस का ४ , ५, दिन बाद उस को दिमाग का बुखार हो गया जो सब से खतरनाक था तो गुरु जी की दिया  गया लाची  दाना खाया वो  एक दम  ठीक हो गई ! पंचागुली विद्या के माध्यम से आप शरीर के होने वाले रोग और उसका कारन सब जान सकते है ! पंचांगुली साधना का इस्तमाल हमारे ऋषि मुनी आयुर्वेद में भी करते थे  पंचागुली विद्या  एक बहुत बड़ा  सिद्धि है!

पंचगुली साधना विद्या को सिद्ध कैसे करे

पंचगुली साधना विद्या को सिद्ध कैसे करे इस साधना को सिद्ध करने के लेया आपके पास पंचागुली यन्त्र और पंचागुली दीक्षा लेना जरूरी है  साथ में अच्छे गुरु का मार्गदर्शन जरूरी है ! और उस बाद आप  की मेहनत  जरूरी है तब जाकर आप सफल हो सकते है ! साधना करना इतना आसान काम नहीं है ! अगर आप यह साधना करना चाहते है तो आप हम से  संपर्क  कर सकते है जय महाकाल

 

इस साधना की जानकारी के लिए  या दीक्षा प्रपात करने के लिए  फ़ोन करे  85280 57364

पंचांगुली शाबर मंत्र 

ॐ नमो पंचांगुली पंचांगुली परशरी परशरी माता मयंगल
वशीकरणी लोहमय दंडमणिनी चौसठ काम विहंडनी
रणमध्ये राउलमध्ये शत्रुमध्ये दीवानमध्ये भूतमध्ये
प्रेतमध्ये पिशाचमध्ये झोंटिंगमध्ये डाकिनीमध्ये
शंखिनीमध्ये यक्षिणीमध्ये दोषिणीमध्ये शेकनीमध्ये
गुणीमध्ये गरुडीमध्ये विनारीमध्ये दोषमध्ये
दोषाशरणमध्ये दुष्टमध्ये घोर कष्ट मुझ ऊपर बुरो जो
कोई करे करावे जड़े जडावे तत चिन्ते चिन्तावे तस
माथे श्री माता श्री पंचांगुली देवी तणो वज्र निर्धार पड़े
ॐ ठं ठं ठं स्वाहा

 

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Panchanguli – काल ज्ञान देवी पंचांगुली रहस्य विस्तार सहित Ph. 85280 57364

 Panchanguli – काल ज्ञान देवी पंचांगुली रहस्य विस्तार सहित Ph. 85280 57364 प्रणाम संपूर्ण ब्रह्मांड अज्ञात शक्ति के द्वारा चलता है जिसे हम ब्रह्मा कहते हैं । ब्रह्म आधार ईश्वर सर्वत्र समान व्याप्त होते हुए भी इस समस्त ब्रह्मांड से दूर है । उसी ब्रह्म के विस्तार को हमने माया के रूप में जाना है और माया की निरंतरता कछु प्रतीक है ।

 माया का जो प्रथम शस्त्र है उसे काल कहा जाता है । अर्थात समय निरंतर बहता है 3 वर्ष कोई नदी निरंतर बहती रहती हो । निर्वाचन किस समय कभी निश्चित है ब्रम्हांड बना समय की उत्पत्ति हुई पिछले कल भी था अभी भी है और आने वाले कल में भी होगा वही काल कहलाता है । इस कॉल को समझना साधक के लिए परम अनिवार्य तत्व कहा गया है अगम निगम दोनों ही ग्रंथों में काल स्वयंसेवक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं

 

महाकाल कौन है प्रथम देव है । स्वयं को इस काल के उस पार जाने का ज्ञान देते हैं । जिनके भीतर एक ऐसी दिव्य शक्ति निहित है । कि वह साधक को त्रिकाल का ज्ञान देने में सर्व समर्थ होते हैं । वर्तमान काल को हमें कैसे जीना चाहिए । पुराना भूतकाल होने लगे तो वह एक उत्तम कार हो जाए आज ऐसा कौन सा कृत्य कर के आने वाले समय में सुबह ही उत्तम भविष्य हो जाए ।

ऐसे ही काल ज्ञान कहा जाता है । और ज्ञान विशेष विधि द्वारा प्राप्त होने वाला क्या है भारतीय ऋषि-मुनियों ने आदिकाल से लेकर वर्तमान युग तक सरकार की पद्धति से साधना की है । काल को जान सके ब्रह्मांड को जान सके  । इसके लिए ज्ञान नाम की विद्या प्रदान की गई है । और काल क्या समय जानना है ।अपितु काल ज्ञान का तात्पर्य है होने तक का संपूर्ण चक्र यदि समझना है ।

 

 तो हमें kaal  ज्ञान साधना करनी होगी प्रकाश ज्ञान साधना विशेषताओं में से एक साधना है । लेकिन प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक साधक का ज्ञान के विराट स्वरूप और विराट प्रपंच को सरलता से नहीं समझ पाता इतनी इतनी विराट नहीं क्यों संपूर्ण ब्रह्मांड के बारे में सोचें अपने ही बारे में सोचना चाहता है ।

 

इसीलिए दृश्यों ने इसे बहुत सूक्ष्म निकाय से शुरू किया सामुद्रिक शास्त्र उससे भी छोटे नीचे के स्तर पर उसे कहा गया हस्तरेखा मस्तिष्क विज्ञान अंक विज्ञान प्रदर्शन भविष्य दर्शन और त्रिकाल ज्ञान भूत और भविष्य का और साथ ही साथ वर्तमान का विज्ञान प्राप्त कर सकें ।इसके लिए  एक शक्ति की पूजा की गई स्वरूप की वंदना की गई है जिसे त्रिकाल का ज्ञान देने वाली कहा गया और उसे पंचांगुली कह कर संबोधित किया गया शक्ति क्या है

उसी प्रकार ब्रह्मांड में 5 अंगुलियां हैं जिन्हें हम पंचतत्व कहते हैं चित्रों को संचालित करने वाली है और जिसकी अपनी उंगलियों में पंचांगुली नाम की शक्ति है साधक को त्रिकालदर्शी बनाती है । और भविष्य का ज्ञान प्रदान करते हैं । इसीलिए काले होने की महा साधना है तंत्र में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो कम से कम काल ज्ञान और पंचांगुली साधना को संपन्ना करना चाहिए

अत्यंत जटिल और विराट विद्या इस विद्या को प्राप्त करना चाहिए। पंचांगुली देवी की साधना कैसे हो का मंत्र क्या है साधना विधान क्या है । ज्योति प्रकाश समझना चाहिए ब्रह्मांड की बात छोड़ कर यदि हम अपने शरीर को देखें तो यह भी कुछ छुपा है । हर दृष्टि हम कहीं तो हाथों की रेखाएं तो केवल किस लिए बनी है कि मैं हाथों को तोड़ मरोड़ सकूं ।

लेकिन इसके पीछे के हाथों को तोड़ मरोड़ करता है अंगुलियों की बनावट हड्डियों की बनावट त्वचा नाखून और एक रेखा आपके बारे में कुछ बताती है । बहुत बढ़िया तो उन्होंने उन्होंने शरीर पर तिल विज्ञान को ढूंढा शरीर के अंग अंग पर तिल होने पर क्या होगा ।आकृति नाथ की आकृति सर की आकृति शरीर की आकृति हाथों की रेखाओं के साथ-साथ पैरों की रेखाएं के बनावट प्रत्येक तत्वों को देखा पूर्वाभास के क्षमताओं को विचारा ।

अंत में एक महाशक्ति से जुड़ा हुआ पाया जिससे पंचांगुली कहा जाता है ।अर्थात ब्रह्मांड को अपने पांच उंगलियों पर करने वाली ब्रह्मांड को पांच उंगलियों के द्वारा संचालित करने वाले शक्ति ही पंचांगुली नाम की महाशक्ति है। पंचांगुली साधना क्यों आने वाले हैं । साधना से आपको मुद्दा गंभीरता प्रतिवेदन मिलती है कि आप पृथ्वी पर कैसे जीवन जीना हैं इसकी आपको प्राप्त होते हैं । शत्रु तो कहीं मित्र  है तो  कहीं निरंतर हो रहा है

कभी शब्द के पीछे इतने अधिक पड़ जाते हैं कि व्यक्ति विचलित होकर आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगता है । अध्यात्म के शिखर को पाना चाहता है ।तो कभी राज्य सत्ता के शिखर को प्राप्त करना चाहता है ।पर जाना चाहता है जाना चाहता है तो उनके निमित्त पंचांगुली साधना मौलिक साधना की गई करने वाला भूत वर्तमान और भविष्य की पारीक रखता है । जुड़कर भविष्य लगता है इसलिए गुरुओ का कथन है पंचांगुली साधना से व्यक्ति अपने भूत और वर्तमान को भी देख सकता है अद्भुत भारतीय साधना को कैसे सफल किया जाए ब्रह्मांड को आप जानना चाहते हैं फिर आप जीवन और मरण के बंधन को समझने के योग्य हो जाते हैं ।
आपके समस्त कष्टों का हरण करने वाली है । क्योंकि यदि आपको आज ही पता हो कि कल आपके साथ पूरा होने वाला है ।तो आप तपोबल और साधना से भविष्य को सुधारने में समर्थ हो सकते हैं । अपने जीवन में मनचाहा परिवर्तन ला सकते हैं । कुंडली में ग्रहों के दर्शाए उत्तर नहीं है तो आप से परिवर्तित कर सकते हैं यदि आपके में कोई भावना हो सकते हैं

 और आप इसी कारण पंचांगुली साधना बेहद बेहद और अत्यंत विराट साधना है देने के लिए अति संक्षेप में आपको की पंचांगुली देवी उसका साधना विधान समझाने के लिए प्रेरणादायक बताने के लिए कुछ शब्द आपको कहे  । लेकिन शब्दों में इस महाविद्या को नहीं  जान सकते। सर्वप्रथम पंचांगुली काल ज्ञान मंत्र लेना चाहिए और इत्यादि सहित अन्य मंत्रों का भी हवन करना चाहिए जिससे पंचांगुली साधना प्राप्त कर सकते हैं

कि शास्त्र सम्मत इसी प्रकार शास्त्र ने प्राचीन समय से ऋषि होने पर गुरुओं ने क्या है तो पंचांगुली साधना आप अपने जीवन में कर सकें आप अपने हाथों की रेखाओं में क्या छुपा है यह जान सके चेहरे की आकृति और बनावट में क्या छुपा है यह जान सकें और भविष्य के आने वाले समय में आपके लिए क्या छुपा सके और आने वाले वक्त को बदल सकें आशीर्वाद आपको देता हूं

 मंत्र के माध्यम से आपको देवी माता की स्तुति करनी चाहिए ।और देवी की सिद्धि के लिए प्रथम पात्रता अर्जित करने का की प्रमुख मंत्र है । इसी मंत्र से आपको पात्रता प्राप्त होगी और आप अपने गुरु के पास जाकर इस देवता को प्राप्त कर सकेंगे भूमिका में प्रणाम ओम नमः शिवाय ।

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 माया का जो प्रथम शस्त्र है उसे काल कहा जाता है । अर्थात समय निरंतर बहता है 3 वर्ष कोई नदी निरंतर बहती रहती हो । निर्वाचन किस समय कभी निश्चित है ब्रम्हांड बना समय की उत्पत्ति हुई पिछले कल भी था अभी भी है और आने वाले कल में भी होगा वही काल कहलाता है । इस कॉल को समझना साधक के लिए परम अनिवार्य तत्व कहा गया है अगम निगम दोनों ही ग्रंथों में काल स्वयंसेवक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं

महाकाल कौन है प्रथम देव है । स्वयं को इस काल के उस पार जाने का ज्ञान देते हैं । जिनके भीतर एक ऐसी दिव्य शक्ति निहित है । कि वह साधक को त्रिकाल का ज्ञान देने में सर्व समर्थ होते हैं । वर्तमान काल को हमें कैसे जीना चाहिए । पुराना भूतकाल होने लगे तो वह एक उत्तम कार हो जाए आज ऐसा कौन सा कृत्य कर के आने वाले समय में सुबह ही उत्तम भविष्य हो जाए ।

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ऐसे ही काल ज्ञान कहा जाता है । और ज्ञान विशेष विधि द्वारा प्राप्त होने वाला क्या है भारतीय ऋषि-मुनियों ने आदिकाल से लेकर वर्तमान युग तक सरकार की पद्धति से साधना की है । काल को जान सके ब्रह्मांड को जान सके  । इसके लिए ज्ञान नाम की विद्या प्रदान की गई है । और काल क्या समय जानना है ।अपितु काल ज्ञान का तात्पर्य है होने तक का संपूर्ण चक्र यदि समझना है ।

 

 तो हमें kaal  ज्ञान साधना करनी होगी प्रकाश ज्ञान साधना विशेषताओं में से एक साधना है । लेकिन प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक साधक का ज्ञान के विराट स्वरूप और विराट प्रपंच को सरलता से नहीं समझ पाता इतनी इतनी विराट नहीं क्यों संपूर्ण ब्रह्मांड के बारे में सोचें अपने ही बारे में सोचना चाहता है ।

 

इसीलिए दृश्यों ने इसे बहुत सूक्ष्म निकाय से शुरू किया सामुद्रिक शास्त्र उससे भी छोटे नीचे के स्तर पर उसे कहा गया हस्तरेखा मस्तिष्क विज्ञान अंक विज्ञान प्रदर्शन भविष्य दर्शन और त्रिकाल ज्ञान भूत और भविष्य का और साथ ही साथ वर्तमान का विज्ञान प्राप्त कर सकें ।इसके लिए  एक शक्ति की पूजा की गई स्वरूप की वंदना की गई है जिसे त्रिकाल का ज्ञान देने वाली कहा गया और उसे पंचांगुली कह कर संबोधित किया गया शक्ति क्या है

उसी प्रकार ब्रह्मांड में 5 अंगुलियां हैं जिन्हें हम पंचतत्व कहते हैं चित्रों को संचालित करने वाली है और जिसकी अपनी उंगलियों में पंचांगुली नाम की शक्ति है साधक को त्रिकालदर्शी बनाती है । और भविष्य का ज्ञान प्रदान करते हैं । इसीलिए काले होने की महा साधना है तंत्र में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो कम से कम काल ज्ञान और पंचांगुली साधना को संपन्ना करना चाहिए

अत्यंत जटिल और विराट विद्या इस विद्या को प्राप्त करना चाहिए। पंचांगुली देवी की साधना कैसे हो का मंत्र क्या है साधना विधान क्या है । ज्योति प्रकाश समझना चाहिए ब्रह्मांड की बात छोड़ कर यदि हम अपने शरीर को देखें तो यह भी कुछ छुपा है । हर दृष्टि हम कहीं तो हाथों की रेखाएं तो केवल किस लिए बनी है कि मैं हाथों को तोड़ मरोड़ सकूं ।

लेकिन इसके पीछे के हाथों को तोड़ मरोड़ करता है अंगुलियों की बनावट हड्डियों की बनावट त्वचा नाखून और एक रेखा आपके बारे में कुछ बताती है । बहुत बढ़िया तो उन्होंने उन्होंने शरीर पर तिल विज्ञान को ढूंढा शरीर के अंग अंग पर तिल होने पर क्या होगा ।आकृति नाथ की आकृति सर की आकृति शरीर की आकृति हाथों की रेखाओं के साथ-साथ पैरों की रेखाएं के बनावट प्रत्येक तत्वों को देखा पूर्वाभास के क्षमताओं को विचारा ।

अंत में एक महाशक्ति से जुड़ा हुआ पाया जिससे पंचांगुली कहा जाता है ।अर्थात ब्रह्मांड को अपने पांच उंगलियों पर करने वाली ब्रह्मांड को पांच उंगलियों के द्वारा संचालित करने वाले शक्ति ही पंचांगुली नाम की महाशक्ति है। पंचांगुली साधना क्यों आने वाले हैं ।

साधना से आपको मुद्दा गंभीरता प्रतिवेदन मिलती है कि आप पृथ्वी पर कैसे जीवन जीना हैं इसकी आपको प्राप्त होते हैं । शत्रु तो कहीं मित्र  है तो  कहीं निरंतर हो रहा है

कभी शब्द के पीछे इतने अधिक पड़ जाते हैं कि व्यक्ति विचलित होकर आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगता है । अध्यात्म के शिखर को पाना चाहता है ।तो कभी राज्य सत्ता के शिखर को प्राप्त करना चाहता है ।

पर जाना चाहता है जाना चाहता है तो उनके निमित्त पंचांगुली साधना मौलिक साधना की गई करने वाला भूत वर्तमान और भविष्य की पारीक रखता है । जुड़कर भविष्य लगता है इसलिए गुरुओ का कथन है पंचांगुली साधना से व्यक्ति अपने भूत और वर्तमान को भी देख सकता है अद्भुत भारतीय साधना को कैसे सफल किया जाए ब्रह्मांड को आप जानना चाहते हैं फिर आप जीवन और मरण के बंधन को समझने के योग्य हो जाते हैं ।

आपके समस्त कष्टों का हरण करने वाली है । क्योंकि यदि आपको आज ही पता हो कि कल आपके साथ पूरा होने वाला है ।तो आप तपोबल और साधना से भविष्य को सुधारने में समर्थ हो सकते हैं । अपने जीवन में मनचाहा परिवर्तन ला सकते हैं । कुंडली में ग्रहों के दर्शाए उत्तर नहीं है तो आप से परिवर्तित कर सकते हैं यदि आपके में कोई भावना हो सकते हैं

grail, cup, holy grail

 और आप इसी कारण  साधना बेहद बेहद और अत्यंत विराट साधना है देने के लिए अति संक्षेप में आपको की पंचांगुली देवी उसका साधना विधान समझाने के लिए प्रेरणादायक बताने के लिए कुछ शब्द आपको कहे  । लेकिन शब्दों में इस महाविद्या को नहीं  जान सकते। सर्वप्रथम पंचांगुली काल ज्ञान मंत्र लेना चाहिए और इत्यादि सहित अन्य मंत्रों का भी हवन करना चाहिए जिससे पंचांगुली साधना प्राप्त कर सकते हैं

कि शास्त्र सम्मत इसी प्रकार शास्त्र ने प्राचीन समय से ऋषि होने पर गुरुओं ने क्या है तो पंचांगुली साधना आप अपने जीवन में कर सकें आप अपने हाथों की रेखाओं में क्या छुपा है यह जान सके चेहरे की आकृति और बनावट में क्या छुपा है यह जान सकें और भविष्य के आने वाले समय में आपके लिए क्या छुपा सके और आने वाले वक्त को बदल सकें आशीर्वाद आपको देता हूं

 मंत्र के माध्यम से आपको देवी माता की स्तुति करनी चाहिए ।और देवी की सिद्धि के लिए प्रथम पात्रता अर्जित करने का की प्रमुख मंत्र है । इसी मंत्र से आपको पात्रता प्राप्त होगी और आप अपने गुरु के पास जाकर इस देवता को प्राप्त कर सकेंगे भूमिका में प्रणाम ओम नमः शिवाय ।

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प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364

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प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान

प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364

माँ बगलामुखी की ब्रह्मास्त्र साधना लड़ाई-झगड़ा, शत्रुओं से परेशानी, मुकदमेबाजी और न्यायालय आदि में पूर्ण विजय पाने के लिये बगलामुखी महाविद्या की पूजा-अर्चना करने, उनके अनुष्ठान सम्पन्न कराने का प्रचलन अनंतकाल से चला आ रहा है। प्राचीनकाल से ही नहीं, आधुनिक समय में भी असंख्य लोगों ने माँ बगलामुखी की कृपा से शत्रु बाधाओं एवं न्यायालय में विचाराधीन मुकदमों आदि समस्याओं पर विजय पायी है तथा अन्य नाना प्रकार की आपदाओं से मुक्ति प्राप्त की है। माँ बगलामुखी की कृपा से उनके भक्त साधारण स्थिति से उठकर असाधारण रूप से उच्च पद तक पाने में सफल हुये हैं ।

  • बगलामुखी साधना
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  • बगलामुखी  साधना विधि
  • बगलामुखी  साधना  विशेष
  • बगलामुखी साधना की सावधानियां 
  •     बगलामुखी बीज मंत्र 

 

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माँ बगलामुखी की उपासना, अनुष्ठान आदि शत्रु बाधाओं के दौरान ही नहीं, अपितु अन्य अनेक कार्यों के निमित्त भी की जाती है। इनका सम्बन्ध एकाएक आर्थिक हानि से बचने, किसी अज्ञात भय से बचने, किसी के धोखे में फंस जाने, अकारण किसी के साथ लड़ाई-झगड़े में पड़ जाने, किसी अज्ञात शत्रु द्वारा परेशान किये जाने की भी समस्यायें हो सकती हैं। ऐसी समस्त प्रतिकूल स्थितियों से भी महामाई अपने साधकों को सहज ही निकाल लेती है। महामाई बगलामुखी की अनुकंपा से शीघ्र ही बिगड़े हुये काम बनने लगते हैं।

माँ बगलामुखी का दस महाविद्याओं में आठवां स्थान है। दरअसल आद्य शक्ति के दस रूप दसों दिशाओं में विद्यमान रहते हैं। उनमें दक्षिण दिशा की स्वामिनी महाविद्या बगलामुखी को माना गया है, इसलिये इनकी साधना का दक्षिण मार्ग ही अधिक प्रचलित है। शिवपुराण और देवी भागवत पुराण में शिव के दस रूपों की दस महाशक्तियां भी बताई गई हैं। यह दस महशक्तियां ही संसार में दस महाविद्याओं के रूप में पहचानी एवं पूजी जाती हैं। तंत्रशास्त्र में जगह-जगह इस बात का उल्लेख आया है कि शक्तिविहीन शिव भी शव के समान हो जाते हैं। शिव की जो भी क्षमताएं एवं शक्तियां हैं, उनके मूल में एक मात्र आद्यशक्ति ही कार्य करती है ।

शिव की दस आद्यशक्तियां हैं, जो इस प्रकार जानी जाती हैं- महाकाल शिव की शक्ति काली नामक महाविद्या है, शिव के काल भैरव रूप की शक्ति भैरवी नामक महाविद्या है, कबंध नामक शिव की शक्ति छिन्नमस्तका है, त्र्यंबकम् नामक शिव रूप की शक्ति हैं भुवनेश्वरी नामक महाविद्या, ठीक उसी प्रकार एकवक्त्र नामक महारुद्र शिव की महाशक्ति बगलामुखी नामक महाविद्या है। शिव के इस रूप को वल्गामुख शिव के नाम से भी जाना जाता है।