Masani Meldi माता मेलडी मसानी प्रत्यक्ष दर्शन साधना और रहस्य ph. 85280 57364
guru mantra sadhna .com me आप का स्वागत है माता मेलडी के परिचय के बारे में परिचय देंगे दोस्तों माडी गुजराती का शब्द है ,माडी का हिंदी में अर्थ होता है माता माता को ही माडी कहते हैं। जो मसानी श्रेणी की शक्ति होती है , यह मिसाइल की तरह होती है यह शक्तिया साधक के सब काम करती है। कोई भी कार्य हो उचित अनउचित सब काम करती है और वो कार्य भी कम समय में करती है। मिसाइल का उद्धरण देने का कारन यह शक्ति कम समय में काम करती है , शक्ति यह नहीं देखती के सामने वाला कोण है कैसा बिलकुल मिसाइल की तरह काम करती है। अगर आप शक्ति से गलत काम भी करवाओ गए कर देंगी पर इस का फल आप को भोगना होगा कुछ समय के पश्चात् कर्मो से आज तक कोई नहीं बच पाया है। Masani Meldi माता मेलडी मसानी मैली शकितया की सवारी करती है इन्होंने भूत प्रेत मसान मंत्रिका तंत्रिका सब मैली शकितो को बकरा बना कर उस पर सवार हो गई थी Masani Meldi माता मेलडी मसानी सभी मैली शक्तिओ के स्वामी है । आगे की कथा में आप को इस बारे में विस्तार सहित जानकारी मिलेगी।
मेलडी माता का भोग
माता मेलडी मसानी साधना
मेलडी माता का मंत्र
मेलडी माता का इतिहास
माता मेलडी मसानी साधना विधि
Masani Meldi माता मेलडी मसानी सिद्धि के लाभ
मेलडी माता का मंदिर
Masani Meldi मेलडी माता का इतिहास – माता मेलडी मसानी उत्पति की कथा
मेलडी माता का इतिहास – सत्ययुग की समाप्ति के समय बहुत प्रतापी मायावी और मर्दानी था असुर था जिसका नाम अमरूवा था उसके अत्याचारों से कुहराम मच गया था और देवताओं का महासंग्राम हुआ था। और उसमें देवता पराजित हो गए थे। उन्होंने महाशक्ति की स्तुति की और वहां आदि शक्ति जगदंबा सिंह वाहिनी दुर्गा प्रकट हुए और उन्होंने नौ रूप धारण किए उनके साथ दसमहाविद्या और अन्य सभी शक्तियां प्रकट हुई। महा भयंकर युद्ध चला और 5000 वर्षों तक लगातार युद्ध हुआ। अपने प्राणों को संकट में देखकर भागा वह रहा में देखता है कि किसी मृत गां के देह का पिंजरा पड़ा है।
उसे लगा कि इस पिंजरे में शरण लू तो के देव देवी नजदीक नहीं आएंगे और असुर पिंजरे में समा गया देवी शक्तियां पीछा करते हुए वहां पर आए तो शत्रु के पिंजरे में जा घुसा है। सभी देव या वहीं पर ठिठक कर खड़ी हो गई मृत गां का पिंजरा अशुभ माना जाता है तब देविया सोच में पड़ गई कि इस आशुद्ध पिंजरे से दैत्य को निकालना वह भी पिंजरे में घुसकर यह तो असंभव है, और पिंजरे से बाहर निकाले बिना वध भी नहीं किया जा सकता है। ऐसी अजीब स्थिति में देवी शक्तियां मजबूरी में अपने हाथ मलने लगी हथेली पर हथेली की रगड़ से उर्जा उत्पन्न हुई। और मैल के रूप में बाहर आई श्री उमा देवी ने युक्ति लगाई और सारे मेल को एकत्र करें
मूर्ती का रूप दिया सभी देवी और देव मिलकर आदिशक्ति की स्तुति करने लगे तत्काल उस मूर्ति से आदिशक्ति वह हाथ में खंजर ले 5 वर्ष की कन्या के रूप में प्रकट हो गए। और पूछा है माताओं मुझे बताओ क्यों मेरा आव्हान किया देवियों ने सारी व्यथा कह सुनाई और सारा माजरा समझ गई।
देवियों के कहे अनुसार गाउ के पिंजरे में प्रवेश कर गई। जब उस असुर ने यह सब देखकर आश्चर्यचकित हो गया , और वहां से बाहर भागा और स्याल सरोवर में जाकर कीड़े के रूप में छिप गया कन्या स्याल सरोवर में प्रवेश करके असुर का वध किया और सब देवताओ ने जयजयकार किया और अपने धाम को लोट गए। अगर कन्या खुद उत्पन होती तो कार्य पूरा करने के पश्चात् खुद चली जाती। यहाँ पर तो उस कन्या की रचना कर आवाहन किया गया था ।
उस कन्या ने उमिया माता को पकड़ा और अपना नाम धाम और काम पूछा उमिया माता ने उन्हें चामुंडा के पास भेज दिया। सत्य हमेशा कसौटी पर कसा जाता है। और सत्य की परीक्षा होती है चामुंडा नाम कन्या को कामरूप कामाख्या विजय हेतु भेजा चामुंडा जानती थी ,कि कामाख्या तंत्र मंत्र जादू टोना और आसुरी शक्तियों की सिद्धि स्थली है। यदि यह वहां से विजय होकर लौटती है , तो अभी इनकी वास्तविक शक्ति का अंदाजा होगा फिर उसी के अनुसार नाम और काम सौंपा जा सकेगा।
कन्या काम रूप में लगे पहरे को ध्वस्त कर दिया, मुख्य पहरेदार नोरिया मसान को पराजित कर दिया। कामाख्या नगरी में प्रवेश के साथ उन्होंने देखा कि तंत्र मंत्र जादू टोना काली विद्या माया के ढेर इन सब को समझने में ही अमूल्य समय जाया हो जाएगा। उन्होंने सब को घोल बनाकर बोतल में भर लिया भूत प्रेत मंत्रीका का तंत्रिका सभी दोस्तों को बकरा बनाकर उस पर बैठकर बोतल लेकर बाहर आ गई और माँ चामुंडा पास पहुंची।
देवता दानव सब उनका जयघोष किया, चामुंडा ने कहा जिस विद्या का प्रयोग दूसरों को दुख देने के लिए होता है उसे मैली विद्या कहते हैं ,तुमने उसी मैली विद्या पर विजय पाई है। एवं समस्त शक्तियों के हस्त रगड़ से तुम्हारी उत्पति हुई है। इसलिए तुम्हारा नाम मेलडी माता होगा तुम्हारा स्वरूप कलयुग की महाशक्ति रूप के लिए हुआ है तुम कलयुग के विकार अर्थात में काम क्रोध मद लोभ मोह का नाश करने वाली शक्ति हो।
सारा संसार तुम्हें श्री मेलडी के रूप में पूजा अर्चना करेगा तुमने समस्त दुष्टो को बकरा बना दिया है अब यही तुम्हारा वाहन होगा संस्कृत में बकरे को अज कहां जाता है अज का अर्थ ब्रह्मांड होता है। बकरे के ऊपर या ब्रह्मांड के भी ऊपर विराज ने वाली आदिशक्ति हो रूप में गुजरात की भूमि तुम्हारा वा स्थान होगा। परंतु तात्विक रुप से देह धारियों की जीवनी शक्ति के रूप सारी सृष्टि में तुम्हारा बात स्थान होगा कलयुग में तुम बकरे वाली मेलडी मां घर-घर पूजी जाओगी।
Sifli ilm सिफली इलम रहस्य हिंदी में विस्तार सहित सिफली इलम का नाम आप ने ज़िंदगी में जरूर सुना होगा। पर आप को इस बारे में जानकारी नहीं होगी के यह सिफली इलम क्या होता है। आज हम इस विषय पर ही बात करेंगे हमने पहले भी तंत्र के ऊपर बहुत सारी जानकारीया इस ब्लॉग में बताई है आप वो पोस्ट भी जरूर देखो। तंत्र के बारे में आपको बहुत जानकारी हो जाएगी हमारा यही उदेश्य है के तंत्र क़ी छोटी से छोटे जानकारी को आप को प्रदान करना।
सिफली इल्मSifli ilm क्या है ?
सिफली इल्म Sifli ilm क्या है ? सिफली इल्म
Sifli ilmएक तंत्र की प्रकार है तंत्र कई तरह का होता हैसिफली इल्म भी एक तंत्र का परकार है। yeh साधरण तंत्र से जायदा खतरनाक होता है। इस तंत्र के द्वारा शैतानी शक्तिओ को जागृत किया जाता है। जो शक्तिया शमशान और कबरस्तान में निवास करती है जिसे में काळा जिन में काली जिन्नात और भूत प्रेत ख़मीस शामिल है।इन काली शक्तिओ का इस्तमाल गलत कामो के लेया किया जाता है।
सिफली इल्म Sifli ilm की काट और सिफली इल्म का इलाज
सिफली इल्म Sifli ilm का तोड़ अगर किसी पर सिफली इलम किया गया है। और वो वियक्ति इस इलम से परेशान है तो उसे आयतुल कुर्सी का पथ करना चाहिए उसे इसे आराम मिलेगा। अगर आयतुल कुर्सी पढ़ने नहीं आता है तो किसी और से जप करवा कर जल को आयतुल कुर्सी के पाठ से अभिमंत्रित करवाकर उस जल को ग्रहण करे। अगर इलम घर में किया गया है तो आप अभिमंत्रित जल का छिड़काओ घर में भी कर सकते है।
सिफली इल्म
Sifli ilm
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सिफली इल्म की किताब pdf – सिफली इल्म की जानकारी के लिए बहुत कम पुस्तके उपलब्द है अगर इस विषय के बारे में जायदा जायदा जानकारी चाहिए तो आप तिलस्मी दुनिया के नाम से एक मैगजीन छपता है उस में आप इस विषय के बारे में जानकारी हासिल कर सकते है। सिफली इल्म करने का तरीके बताये और बहुत सारे सिफली इल्म का वजीफे बताए गए है। सिफली इल्म करने का तरीका पीडीऍफ़ के रूप में भी यह पुस्तक इंटरनैट पर मिल जाए गी ph.85280 57364
शिव तंत्र रहस्य – Shiv Tantra Rahasyamaya Ph. 85280 57364
शिव तंत्र रहस्य – Shiv Tantra Rahasyamaya Ph. 85280 57364
शिव तंत्र रहस्य – Shiv Tantra Rahasyamaya Ph. 85280 57364 तंत्र क्रियामक पद्धति साधना जगत में एक की अपेक्षा किसी हैं। इस बहुता व्यवस्था की ही दूसरी संज्ञा है बात की पुष्टि होती है कि प्रत्येक सम्प्रदाय का अपना विशिष्ट के इस तथ्य से, है। तंत्र रहा है, चाहे वह वैष्णव सम्प्रदाय चाह हो
अथवा अन्यान्य कोई भी सम्पदा निय ज्यो और प्रत्येक तंत्र का आधार रही है शिवोपासना ! तं शब्द से आज का समाज सन्तुष्ट नहीं है। तंत्र के प्रति समवेत् विरोध का स्वर सुनाई देता है दूसरी ओर समाज का महत्वाकाक्षी वर्ग तांत्रिक साहित्य की ओर आकर्षित हो रहा है।
प्रायः जादुई क्रियाकलाप की सीमा में ही मि अनैतिक या और सृजित विद्या में शिव रूप में मान्यता प्राप्त है समय के परिवर्त्तमान चक्र से तंत्र शब्द की सामाजिक क्रिया-पक्ष को समाज के साथ अविरत सुनियोजित नहीं किया जा सकता है।
आत्मा के परिज्ञान के परिवेश को जब जगत से उठाकर बाह्य मंडल में आरोपित करने की स्थिति की अवस्थिति को इसमें प्रत्यभिज्ञान कहा गया है. | लेकिन गर्हित कार्य की सर्वदा निन्दा की गई है। साधना के क्षेत्र में भौतिक सुखों की उपेक्षा ही नहीं इनकी अप्रस्तुति भी की गई है।
तंत्र में कुल कुण्डलिनी को जगाकर मणिपुर निवासी आनन्दमयी शक्ति के साथ जीव के विलीनीकरण का आयकरण किया गया है। इस | ब्रह्ममयी शक्ति के सम्पर्क से जीव शिव स्वरूप को प्राप्त करता है तंत्र निश्चित से वह दिया है, जिसमें जीव | की माया का साक्षात्कार योगमाया से होता है।
योग समत्व की अमिधा शक्ति है। समय की इसी शक्ति की पाविद्या है। माया अहेतुक और हेतुक ज्ञान से सम्बन्धित है। तांत्रिकगण माया को ज्ञान का भी प्रतीक मानते हैं। आत्मचेतना के उन्नयन की विद्या के रूप में तंत्र का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। तंत्र प्रकाशमार्ग का सोपान है।
मानव अपने जीवन के अंधकार को निर्वासित करने के लिए मंत्र की प्रत्यभिज्ञा की ज्योति को प्राप्त करना चाहता है। तंत्र का मूल उद्देश्य भौतिक अंधकार से निवृत्ति प्राप्त करना है।
वस्तुतः तंत्र सनातन सात्विक ज्योतिर्मयी शक्ति की उपासना है तमोगुण और रजोगुण के भयावह चक्र से दूर रहकर सहस्र सूर्य के आलोक में प्राप्त और प्राप्ति के नियम के विनियमन की व्यवस्था ही तंत्र है।
तंत्र कभी भी निकृष्ट कर्म का परिचायक नहीं है। आत्मशक्ति की चेतना से मानव पूर्णत्व की ओर अग्रसर होता है और इसके विपरीत की अवस्था में मानव निर्बल होकर सत्यज्ञान से दंचित हो जाता है। तंत्र साधना का सम्बन्ध आत्म प्रत्यक्षीकरण से है स्वयं के प्रति बोध को उद्बोधित करना ही तंत्र का कार्य है। तंत्र इससे समता की भावना उत्पन्न होती है।
समता से सत् असत्, त्याज्य और अत्याज्य का भेद समाप्त होता है। आत्मज्ञान की ज्योति इससे प्रज्ज्वलित होती है इसलिए यह कहा जा सकता है, कि आत्मज्ञान की प्रत्यभिज्ञावेजा में शंकर शिष्यों की अपने अनुभूति-जन्य सादृश्यता की वाचितानुवृत्ति में नहीं उलझते हैं. अपितु सहज दर्शन की अनुभूति होती है। तंत्र चेतना की की अवस्था को वहां तक पहुंचा देता है जहां चित की चिन्ता चिन्मयी में सिमट जाती है।
समदर्शीत्य के ना मौलिक आयाम को तंत्र की भित्ती पर ही चित्रित किया की जा सकता है। को व हरु प्त गम्भीर, गूड़, चिन्तनयुक्त, विद्वतपूर्ण लेखनी से युक्त ‘डॉ० मोहनावन्द मिश्र का लेख प्रामाणिक ज्ञान का ही परिचायक है।
नीव नत्व की तात्रिक साधना के साथ में अनेक सम्प्रदायों का रूप स्थिर हुआ चाहे शैव, शाकत, वैष्णव और बौद्ध हो सबने तंत्र की वीणा के तारों पर अपने विचारों को राग और तान दिया तंत्र के विचारों की प्रक्रिया को विशेषता यह है कि जीवन और शक्ति के उभय सिद्धान्त पर यह अवलम्बित है।
शक्ति के अभाव में शिव तो शव ही हो जाते है अतः प्रधानता शक्ति की है। वैष्णवगण इसे राधाकृष्ण तथा सीताराम की संज्ञा के नाम से सम्बोधित करते हैं बौद्ध उपासक इसे शून्यता तथा प्रशोन्याय के रूप में परिभाषित करते हैं। अनादिकाल से ही तंत्र साधना की परम्परा इस देश में वर्तनान है। योगी इस रहस्यमयी साधना में शिव | और शक्ति की उपासना करते आ रहे है। इस रहस्यमय |
साधना को तंत्र साधना के नाम से जाना जाता है। इस | साधना का प्रभाव सभी सम्प्रदायों पर पड़ा है। यह एक उदात साधना है, लेकिन नौतिकवादी साधकों ने इसे गति रूप में जीवित रखने का प्रयास किया।
वैद्यनाथ धाम एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यहां तंत्र साधना की परम्पर प्राचीनकाल से ही वर्तमान है। वैद्यनाथ धान एक प्रसिद्ध तीर्थ भी है। यहां द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से नवम् वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मंदिर है।
उत्तर गुप्त युग में आदित्यसेन गुप्त इस भूभाग का शासक था। पाल काल में बंगाल के शासकों ने इस पीठ को शिव की प्रशस्ति में अंकित किया 9 वीं सदी के बटेश्वर लेख से भी वैद्यनाथधाम के शिवमंदिर की महत्ता का प्रतिपादन होता है।
सेन वंशीय राजाओं ने भी वैद्यनाथ की प्रशस्ति का गायन किया है। मुस्लिम शासकों के युग में भी इस तीर्थ की लोकप्रियता थी। प्राचीनकाल में वैद्यनाथधाम में कामालिक और नाथसिद्धों की अधिकता थी पूर्व मध्यकाल में यहां शिव की उपासना पद्धति में तात्रिक विधि का ही वर्चस्व था।
मुस्लिम शासन के कुछ पूर्व ही यहां की तांत्रिक उपासना की परम्परा में कुछ ढीलापन आया। डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर में लिखा है कि आदिशंकर यहां आये थे। उनके दिग्विजय की गाथा में भी कापालिकों के साथ उनके विवाद की चर्चा है। उत्त समय यहाँ नाथ मत प्रचलित था। नाथ मत भी शैव परम्परा से सम्बन्धित है, जो शव-पाशुपत कापालिक और योगिनी कौल मतों की परम्परा से विकसित है। मत्स्यन्द्रनाथ योगिनी कॉलमत के प्रवर्तक थे गोरखनाथ का संबंध पाशुपत-व से था।
इन्होंने अपनी साधना की दुरुहता और विभिन्नता के कारण इस मार्ग को कष्टकर और भयावह बना दिया वैद्यनाथ स्थित नाथबाडी नाथों और रिद्धों की परम्परा का साक्षी है। यहां आज भी नाथों की अनेक समाधियां है। स्थानीय तीर्थपुरोहितों के बीच इनकी अनेक गधा प्रचलित है नाथों का यह सम्मम स्थल महाराजा गिद्धौर के अधिकार में है। वैद्यनाथयम एक शैवपी के रूप में ही नहीं शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। सती का हृदय यहां अवस्थित है शिव और शक्ति का प्रबल समर्थन इससे होता है। धर्म के सदृश्यात्मक धरतल पर मातृशक्ति की पूजा की परम्परा यहां प्राचीनकाल से ही प्रचलित है।
नौवी सदी से ही तांत्रिक उपासना की मध्यकालीन यहां प्रचलित है। मध्यकालीन भारत में शून्यता की उनला की प्रबलता बढ़ी और व्यापक रूप में पूर्वाचल में इसकी साधना को साधकों और आराधकों ने अपनाया 12 वी सदी के बाद मिथिला के उपासकों को सामाजिक परम्परा यहां स्थापित होने लगी।
मिथिला में “भैरवो यत्र लिगम के उपासकों की संख्या अधिक है। यहां भी मैथिल तीर्थों का हुआ और तांत्रिक विधि की साधना का प्रचलन हुआ पौराणिक साहित्य में भी इस शक्तिपीठ का वर्णन है। तंत्र में भी प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में इस क्षेत्र का उल्लेख है। इस पीठ की अधिष्ठात्री देवी के रूप में गला महाविद्या का महत्व है। किसी-किसी पुराण में जयदुर्गा का यह की पीठाविष्ठात्री देवी के रूप में उल्लेख है। यहां चौबीत नेतृकाओं की भी पूजा होती है।
पशुबलि की प्रथा भी यह प्रचलित है. यहां शक्ति की उपासना के अनेक विग्रह है जैसे सध्या काली, मनसा बंगला, अन्नपूर्णा जयदुर्गा त्रिपुरसुन्दरी जगज्जननी संकष्टा सीता राधा तारा और महागौरी भीतर खण्ड के प्राचीन कुण्ड में महाप्रसाद से हवन की प्रथा आज भी प्रचलित है की भी नित्य पूजा होती है।
श्रीविद्या आदि विद्या है इसकी उपासना से पराशकिका अगहन किया जाता है। यहां गायत्री की उपासना भी व्यापक स्तर पर होती है। शक्ति की उपासना का आदिरूप ही है। गायत्री शक्ति भी श्री विद्या की उपासना से सम्बन्धित है। आज भी शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों में श्रीविद्या की उपासना की परम्परा विद्यमान है। वैद्यनाधाम में हमशान साधना होती है।
बंगाल के अनेक साधक यहां आकर राधना करते थे. वैद्यनाध्यान के रक्षक वैद्यनाथ ही भैरव के रूप में विराज है। समस्त वैद्यनाथधाम के भौगोलिक स्वरूप को शिवपुराण में चिताभूमि के नाम से जाना जाता है। यह आज भी शक्ति साधना की भूमि है।
सम्पूर्ण सरस्वती साधना saraswati sadhna ph. 85280 57364
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सरस्वती साधना saraswati sadhna : भारतीय विद्या देवी की शक्ति परिचय – भारतीय संस्कृति में विद्या की देवी सरस्वती Saraswat saraswati को एक महान देवी माना जाता है। उनकी साधना करने से विद्या, बुद्धि, शक्ति और ज्ञान की प्राप्ति होती है। यहाँ हम जानेंगे कि सरस्वती Saraswat साधना क्या है, क्यों जरुरी है और कैसे इसे किया जाता है।
सरस्वती Saraswat saraswati देवी कौन है
सरस्वती Saraswat भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण देवी है। वह ज्ञान, कला, संगीत, वाणी, शिक्षा, बुद्धि और विद्या की देवी है। सरस्वती Saraswat को ध्यान करने से ज्ञान की प्राप्ति होती है और सभी कलाओं में उन्नति होती है।
सरस्वती Saraswat को एक सफेद हंस द्वारा वाहित दिखाया जाता है जो समुद्र में उतरता है। वह त्रिशूल और वीणा धारण करती हैं। उनकी पूजा भारत के विभिन्न हिस्सों में बहुत ही की जाती है।
या माया मधु-कैटभ प्रमथनी, या महिषोन्माथिनी, या धूम्रचण्ड-मुण्डदलनी, या रक्तबीजाशनी । शक्तिः शुम्भनिशुम्भ-दैत्य मथनी, या सिद्धलक्ष्मी परा; या देवी नवकोटि मूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी ।।
अर्थात्- “मधु और कैटभ नामक राक्षसों को मथने वाली, महिषासुर को मारने वाली, धूम्र, चण्ड, मुण्ड, रक्तबीज, शुम्भ तथा निशुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली, लक्ष्मी स्वरूपा नवकोटि देवताओं की शक्ति से समन्वित भगवती महासरस्वती Saraswat मेरी रक्षा करें ।” महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती Saraswat – इन तीनों स्वरूपों द्वारा सम्पूर्ण चराचर जगत की कारणभूत आद्याशक्ति परमेश्वरी की अभिव्यक्ति होती है।
इन त्रिशक्तियों की मूल प्रकृति महालक्ष्मी ही हैं, जो विशुद्ध सत्व गुण के अंश से महासरस्वती Saraswat के रूप में प्रकट होती हैं, जिनका वर्ण चन्द्रमा के समान गौर है, उन्होंने अपने हाथों में अक्षमाला, अंकुश, वीणा तथा पुस्तक धारण कर रखा है। महासरस्वती Saraswat के अन्य प्रसिद्ध नाम हैं महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती Saraswat, आर्या, ब्राह्मी, कामधेनु, वेदगर्भा, धीश्वरी (बुद्धि की स्वामिनी), तारा.ऋग्वेद में वाग्देवी का नाम सरस्वती Saraswat है।
ये वाणी और विद्या को प्रदान करने वाली देवी हैं। ये स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष तीनों स्थानों पर निवास करने के कारण भारती, इला और सरस्वती Saraswat नाम से सम्बोधित की जाती हैं। तंत्र शास्त्र में वर्णित है, कि दस महाविद्याओं में दूसरी महाविद्या तारा देवी का एक स्वरूप ‘सरस्वती Saraswat’ भी है । सरस्वती Saraswat संगीत विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं, ताल, स्वर, लय, राग-रागिनी आदि का प्रादुर्भाव इनके द्वारा ही हुआ है।
इनकी आराधना सात स्वरों- “सा, रे, ग, म, प, ध, नी” द्वारा होने के कारण ये ‘स्वरात्मिका’ कहलाती हैं, और सप्तविध स्त्रों का ज्ञान प्रदान करने के कारण भी इन्हें ‘सरस्वती Saraswat’ कहते हैं। देवी सरस्वती Saraswat की साधना से समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं, ये अपने साधक के हृदय में व्याप्त समस्त संशयों का उच्छेद कर उसे बोध प्रदान करती हैं।
महासरस्वती Saraswat saraswati उत्पत्ति
महासरस्वती Saraswat saraswati उत्पत्ति सरस्वती Saraswat की उत्पत्ति ‘देवी भागवत्’ में वर्णन आता है, कि सरस्वती Saraswat देवी का प्राकट्य भगवान श्रीकृष्ण की जिह्वा के अग्रभाग से हुआ है। सरस्वती Saraswat के प्रकट होने पर श्रीकृष्ण ने उन्हें नारायण को समर्पित कर दिया। विश्व में सरस्वती Saraswat पूजा का प्रचलन श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया ।
देवी भागवत् के अनुसार ही भगवान नारायण की तीन पत्नियां – लक्ष्मी, गंगा और सरस्वती Saraswat थीं। ये तीनों अत्यन्त प्रेम से रहती हुई पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान का पूजन करती थीं। किसी कार्यवश इन तीनों से उनको दूर जाना पड़ा। कार्य सम्पादित करके जब वे अंतःपुर में पधारे, उस समय तीनों देवियां एक ही स्थान पर बैठी हुई परस्पर अत्यन्त प्रेम से वार्तालाप कर रही थीं।
भगवान को अंतःपुर में आया देख तीनों देवियां उनके सम्मान में खड़ी हो गयीं। गंगा ने अत्यन्त प्रेमपूर्ण दृष्टि से भगवान की ओर देखा, उन्होंने भी गंगा की दृष्टि का अत्यधिक स्नेह युक्त मुस्करा कर उत्तर दिया, तत्पश्चात् वे आवश्यकता वश कक्ष से बाहर चले गये । उसी क्षण सरस्वती Saraswat ने गंगा के व्यवहार को अनुचित बता कर आक्षेप किया, गंगा ने भी कठोर शब्दों में प्रतिवाद किया… और दोनों में विवाद बढ़ता गया ।
लक्ष्मी ने दोनों को शान्त करना चाहा, किन्तु सरस्वती Saraswat ने अत्यधिक क्रोधित हो जाने, के कारण गंगा को नदी बन जाने का श्राप दे दिया, इस बात को सुन गंगा ने भी क्रोधावेश में सरस्वती Saraswat को नदी रूप में परिणित हो जाने का श्राप दे दिया, इपने में ही भगवान पुनः अंतःपुर में लौट आये, तब तक देवियां प्रकृतिस्थ हो चुकी थीं, तदुपरान्त उन्हें अपनी भूल का आभास हुआ और भगवान के चरणों से होने के भय से रोने लगीं।
दूर पूरा वृत्तांत सुनकर भगवान को अत्यधिक कष्ट हुआ, किन्तु गंगा व सरस्वती Saraswat की आकुलता को देखकर उन्होंने करुणार्द्र हो उन्हें आश्वासन दिया- – “गंगा! तुम एक अंश से नदी हो जाओगी, किन्तु अन्य अंशों से मेरे पास ही रहोगी।
सरस्वती Saraswat ! तुम को एक अंश से नदी बनकर रहना होगा, दूसरे अंश से ब्रह्मा जी की सेवा करनी होगी तथा शेष अंश से मेरे पास ही रहोगी। कलियुग के पांच हजार वर्ष बीतने के बाद तुम दोनों का शापोद्धार हो जायेगा ।”
तदनन्तर सरस्वती Saraswat अपने अंश रूप में भारत भूमि पर अवतीर्ण हो कर ‘भारती’ कहलायीं और अपने अंश रूप से ही ब्रह्मा जी की प्रिय पत्नी बनकर ‘ब्राह्मी’ नाम से भी प्रसिद्ध हुईं। किसी-किसी कल्प में सरस्वती Saraswat ब्रह्मा की कन्या के रूप में भी अवतीर्ण होती हैं और आजीवन कौमार्य व्रत का पालन करती हुई ब्रह्मा की सेवा करती हैं ।
ब्रह्मा ॐ ब्रह्मा के मन में एक बार विचार आया कि भूलोक पर सभी देवताओं के तीर्थ हैं, केवल मात्र मेरा ही कोई तीर्थ नहीं है। ऐसा सोचकर उन्होंने अपने नाम से एक तीर्थ स्थापित करने का निश्चय किया और एक रत्नखचित शिला को पृथ्वी पर गिराया | यह शिला अजमेर जिला में चमत्कारपुर स्थान के निकट गिरी, जी ने उसे ही अपना तीर्थ स्थल बनाया, जो ‘पुष्कर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
तीर्थ स्थापन के पश्चात् ब्रह्मा ने वहां पवित्र जल से युक्त एक सरोवर बनाने से का निश्चय किया, अतः उन्होंने सरस्वती Saraswat को आवाहित किया। इसके पूर्व सरस्वती Saraswat नदी के रूप में परिणित हो कर, पापात्माओं के स्पर्श से बचने के लिए छिप कर पाताल में बहती थीं।
ब्रह्मा द्वारा आवाहन करने पर भूतल और पूर्वोक्त शिलाओं को भेदकर वे प्रकट हुईं। – उन्हें उपस्थित देख ब्रह्मा ने कहा- “मैं इस पुष्कर तीर्थ में निवास करूंगा, अतः तुम यहीं मेरे समीप रहो, जिससे मैं तुम्हारे जल में तर्पण कर सकूं।” ब्रह्मा के आदेश को सुनकर सरस्वती Saraswat ने अत्यन्त विनयवत् उत्तर दिया- “भगवन्!
मैं लोगों के स्पर्श-भय से ही पाताल में निवास करती हूं, किन्तु आपकी में आज्ञा का उल्लंघन भी नहीं कर सकती, अतः आप जो उचित समझें वैसी व्यवस्था करें।”सरस्वती Saraswat के विनम्र वचनों को सुनकर ब्रह्मा जी ने उनके निवास के लिए एक विशाल सरोवर निर्मित करवाया, तब सरस्वती Saraswat ने उसी सरोवर में आश्रय लिया ।
तत्पश्चात् ब्रह्मा ने बड़े-बड़े भयंकर सर्पों को बुलाकर, उन्हें सरस्वती Saraswat की रक्षा करने की आज्ञा दी । एक बार भगवान विष्णु ने देवी सरस्वती Saraswat को आज्ञा दी, कि वे “बड़वानल” को अपने प्रवाह में बहाकर समुद्र में छोड़ दें। सरस्वती Saraswat ने इसके लिए ब्रह्मा से भी आज्ञा प्राप्त कर, इस कार्य को सम्पादित करने के विचार किया।
लोकहित के कारण ब्रह्मा ने भी इस कार्य के लिए अनुमति प्रदान कर दी। सरस्वती Saraswat ने कहा – “भगवन्! यदि मैं पृथ्वी पर नदी रूप में प्रकट होकर इस अग्नि को ले जाऊंगी तो मुझे भय है, कि पापी जनों के सम्पर्क से मेरा स्वयं का शरीर दग्ध हो जायेगा, अतः पाताल मार्ग से ही इसे समुद्र तक ले जाऊंगी ।”
से ब्रह्मा ने कहा- “तुम्हें इस कार्य को करने में जिस तरह से सुगमता हो, उसी प्रकार इसे सम्पन्न करो। पाताल मार्ग से जाने पर यदि कहीं बड़वानल के ताप तुम अत्यधिक पीड़ित हो जाओ, तो वहां पृथ्वी पर नदी रूप में प्रकट हो जाना। इस प्रकार प्रकट होने पर तुम्हारे शरीर पर किसी प्रकार का दोष व्याप्त नहीं होगा।” ब्रह्मा जी से यह उत्तर पाकर देवी सरस्वती Saraswat, गायत्री, सावित्री और यमुना आदि अपनी प्रिय सखियों के साथ हिमालय पर्वत पर चली गईं और वहां से नदी रूप धारण कर भूतल पर प्रवाहमान हुईं। बड़वानल को लेकर वे सागर की ओर प्रस्थित हुईं।
इस प्रकार पाताल लोक से गमन करते तथा भूतल पर प्रकट होते हुए वे प्रभास क्षेत्र में पहुंची। वहां चार तपस्वी कठोर साधना में रत थे, उन्होंने सरस्वती Saraswat को पृथक-पृथक अपने आश्रम के पास बुलाया और तभी समुद्र ने भी वहां प्रकट ने होकर सरस्वती Saraswat को आवाहित किया।
सरस्वती Saraswat को समुद्र तक जाना था और मुनियों की आज्ञा का भी उल्लंघन करने से श्राप मिलने का भय था, अतः उन्होंने पांच धाराओं का रूप धारण कर लिया। इस प्रकार का रूप धारण करने के कारण ‘पंचश्रोता सरस्वती Saraswat’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।
अपनी एक धारा से वे मार्ग के अन्य विघ्नों को दूर करते हुए समुद्र से जा मिलीं तथा चार धाराओं से चारों ऋषियों को स्नान की सुविधा प्रदान कर गईं। पुराण में कथन है, एक बार ब्रह्मा जी ने सरस्वती Saraswat से कहा- “तुम किसी के मुख में कवित्व शक्ति के रूप में निवास करो।”
योग्य पुरुष ब्रह्मा जी की आज्ञा को पूरा करने हेतु सरस्वती Saraswat योग्य पात्र की खोज में विचरण करने लगीं। विभिन्न सत्यादि लोकों में भ्रमण करके तथा सातों पातालों में घूम कर ऐसे अलौकिक पुरुष की खोज करने लगीं;
किन्तु उन्हें सुयोग्य पात्र नहीं मिल सका । इस खोज में पूरा सतयुग बीत गया, तदुपरान्त त्रेतायुग के आरम्भ में अपने अनुसन्धान को पूर्णता देने के लिए भ्रमण करती हुई, वे भारत भूमि पर पहुंची और तमसा नदी के किनारे विचरण करने लगीं। तमसा नदी के तट पर महर्षि वाल्मिकी अपने शिष्यों के साथ रहते थे ।
प्रातःकाल वे स्नान के लिए नदी की ओर जा रहे थे, तभी उनकी दृष्टि एक व्याध के बाण से घायल क्रोंच पक्षी पर पड़ी, उसका सारा शरीर लहूलुहान था और वह मृत्यु से जूझ रहा था ।
मादा क्रोंची उसके पास ही गिर कर तड़पती हुई करुण स्वर में चीख रही थी । पक्षी के उस जोड़े की व्यथा महर्षि से देखी नहीं गई और वे उसकी व्यथा से द्रविभूत हो उठे । अकस्मात् ही उनके मुख से चार चरणों का श्लोक निकल पड़ा – मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शास्वतीः समाः । यत् क्रौंच मिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ।।
saraswati sadhna महर्षि वाल्मिकी के मुख से उच्चरित यह श्लोक सरस्वती Saraswat की कृपा का फल था, क्योंकि महर्षि को देखते ही उन्होंने उनके अन्दर छिपी असाधारण प्रतिभा को पहिचान लिया था, अस्तु; उन्होंने सर्वप्रथम वाल्मिकी के मुख में ही प्रवेश किया। सरस्वती Saraswat के कृपापात्र होकर ही महर्षि वाल्मिकी ‘आदि कवि, के नाम से विश्व प्रसिद्ध हुए।
मार्कण्डेय विरचित दुर्गा सप्तशती में भी सरस्वती Saraswat के प्रकट होने की कथा. है; जिसमें उन्होंने बताया है, कि गौरी के शरीर से ये प्रकट हुईं हैं, और शरीर कोश से प्रकट होने के कारण ये ‘कौशिकी’ नाम से प्रसिद्ध हुईं।
अपने कौशिकी स्वरूप से देवी सरस्वती Saraswat ने शुम्भ-निशुम्भ जैसे महान दैत्यों का वध कर पृथ्वी पर सुख-शांति की स्थापना की और देवताओं तथा ऋषियों को निर्भयता प्रदान की। तंत्र और पुराणों में इनकी महिमा का विस्तृत वर्णन पढ़ने को मिलता है । बिजी देवी महासरस्वती Saraswat अनेक प्रकार से विश्व के लोगों का कल्याण करती हैं; बुद्धि, ज्ञान एवं विद्या के रूप में सारा जगत इनकी कृपा को प्राप्त कर अविभूत हो उठता है।
महासरस्वती Saraswat साधना saraswati sadhna विधि
महासरस्वती Saraswat साधना saraswati sadhna विधि – भगवती सरस्वती Saraswat की सौम्य और उग्र दोनों रूपों में साधना मिलती है, सौम्य साधना से प्रायः सभी परिचित हैं, जो वाग्देवी भी कही जाती हैं। उनके उग्ररूप नील सरस्वती Saraswat, विद्याराज्ञी के नाम से प्रसिद्ध हैं। शुंभ और निशुंभ का वध करते समय उन्होंने अपना उग्र स्वरूप प्रकट किया था, जिसकी साधना से साधक को अभ्युदय और निःश्रेयता की प्राप्ति होती ही है। साधक को रात्रि के अन्तिम भाग जिसे ब्रह्म मुहूर्त कहा जाता है, जाग जाना चाहिए
ब्रह्म मुहूर्त में जगने के बाद शय्या पर बैठकर धर्म एवं अर्थ का चिन्तन करना चाहिए तथा दैनिक जीवन निर्वाह करने में शरीर तथा इन्द्रियों को प्राप्त होने वाले क्लेश आदि के शमन का भी चिन्तन करें। इस प्रकार वेद प्रतिपादित परम तत्त्वार्थ का चिन्तन करते हुए शय्या त्याग करें। स्नान आदि नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर साधना कक्ष में (जिसमें साधनानुकूल सभी सामग्री सुसज्जित हों) पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हो सुखद श्वेत तथा पवित्र आसन पर बैठें। पहले पवित्रीकरण एवं आचमन करें, आचमन के बाद प्राणायाम करें। अपने सामने चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती महासरस्वती Saraswat का चित्र तथा यंत्र (जो प्राण प्रतिष्ठित हो) स्थापित कर लें। पहले गणपति स्मरण एवं विधिपूर्वक गुरु पूजन करने के बाद ही मूल पूजन आरम्भ करें-
ध्यान महासरस्वती Saraswat साधना saraswati sadhna
:दोनों हाथ जोड़कर ध्यान करें शुक्लां ब्रह्म विचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं । वीणा पुस्तक धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् ।। हस्ते स्फाटिक मालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां । वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ।। श्री सरस्वत्यै नमः ध्यानं समर्पयामि ।
विशेष – “शुक्लवर्णा, ब्रह्मस्वरूपा, आद्याशक्तिरूपा, समस्त संसार में शक्तिरूप से व्याप्त, अपने दोनों हाथों में वीणा और पुस्तक धारण की हुई, जड़ता एवं अज्ञान को नाश करने वाली स्फटिक माला धारण करके पद्मासन में विराजमान, बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी भगवती सरस्वती Saraswat को मैं शुद्ध भाव से नमन करता हूं।”
saraswati आवाहन
: भव पुष्प स्वतन लेकर आवाहन करें- चतुर्भुजां चन्द्रवर्णां चतुरानन वल्लभाम् । आवाहयामि वाग्देवीं वीणा पुस्तक धारिणीम् ।। fre श्री सरस्वत्यै नमः आवाहनं समर्पयामि ।
saraswati गन्ध
चन्दन या कुंकुम लगावें- एक कर्पूरायैश्च कुंकुमागरू कस्तूरी गन्धं गृहाण शारदे विधिपत्नि! संयुक्तम् । नमोऽस्तुते ।। श्री सरस्वत्यै नमः गन्धं समर्पयामि। विदियो सुगन्धित धूप लगा लें फिलफरक ऊँच गुग्गुल्वगरू संयुक्तं भक्त्या दत्तं विधिप्रिये । धूप : १५ कर
– घण्टाशूल हलानि शंखमुसले चक्रं धनुः सायक, हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशु तुल्यप्रभा । गौरीदेह समुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा पूर्वामत्र सरस्वती Saraswatमनुभजे शुम्भादि दैत्यार्दिनीम् ।। “घण्टा, त्रिशूल, हल, शंख, मूसल, चक्रं, धनुष एवं बाण आदि आयुधों को अपने दिव्य हाथों में धारण की हुई, अत्यधिक शोभायुक्त, चन्द्रमा के समान सुशीतल, पार्वती की देह से समुत्पन्न, तीनों लोकों की आधारभूता, शुम्भ-निशुम्भ आदि दानवों का संहार करने वाली भगवती सरस्वती Saraswat का मैं भावपूर्ण हृदय से ध्यान करता हूं।” नि ।
saraswati आवरण पूजा :
क 208 ध्यान के पश्चात् आवरण पूजन प्रारम्भ करें। आवरण पूजन में यंत्र के प्रत्येक घेरे का क्रमवार पूजन किया जाता है, जो अत्यधिक सूक्ष्म एवं दुरूह पद्धति है, जिसे प्रत्येक साधक के द्वारा सम्पन्न करना सम्भव नहीं है; अतः सभी साधकों तथा सामान्य पाठकों के लाभार्थ आवरण पूजा की सहज व लघु पद्धति प्रस्तुत की जा रही। इस पद्धति के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति पूजन सम्पन्न कर सकता है तथा इस पद्धति द्वारा पूजन करने से भी पूजन का पूर्ण लाभ प्राप्त होता है ।
saraswati प्रथमावरण पूजा
अपने बायें हाथ में कुंकुम से रंगे अक्षत (चावल) ले लें और निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए, अक्षत को यंत्र पर चढ़ाते रहें- – ॐ मेघायै नमः । ॐ प्रज्ञायै नमः । ॐ प्रभायै नमः । ॐ विद्यायै नमः ।गामी ॐ धियै नमः । ॐ धृत्यै नमः। ॐ बुद्ध्यै नमः । ॐ स्मृत्यै नमः । ॐ विश्वेश्वर्यै नमः ।
प्रथमावरण पूजन के बाद यंत्र को किसी ताम्र पात्र में रखकर दूध, दही, घी, शहद एवं शक्कर से स्नान करावें, फिर शुद्ध वस्त्र से पोंछ दें- हौं सरस्वती Saraswat योग पीठात्मने नमः इस मंत्र से पुष्पादि आसन देकर पुनः प्लेट में यंत्र को स्थापित करें तथा “ॐ श्रीं ह्रीं हसौः महा सरस्वत्यै नमः “
मंत्र से मूर्ति की कल्पना करके, विनयवत् आवरण पूजा के लिए आज्ञा मांगें के तर्प संविन्मये परे देवि परामृतरस प्रिये ।। सअनुज्ञां देहि मे मातः परिवारार्चनाय मे।। तदुपरान्त एक अन्य प्लेट में मौली सूत्र लपेट कर पांच सुपारी स्थापित करें, जो गणपति, क्षेत्रपाल, बटुक भैरव व गुरु की प्रतीक हैं तथा निम्न मंत्रोच्चारण के साथ इन पर पुष्प अर्पित करें-
ॐ विघ्नेशाय नमः विघ्नेश श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ क्षं क्षेत्रपालाय नमः क्षेत्रपाल श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऊं बं बटुकाय नमः बटुक भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ यं योगिन्यै नमः योगिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ श्री गुरवे नमः श्री गुरु पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ अणिमायै नमः अणिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ लघिमायै नमः लघिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ महिमायै नमः महिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐॐॐ असितायै नमः असिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वशितायै नमः वशिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ कामपूरिण्यै नमः साभार कामपूरिणी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ गरिमायै नमः गरिमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।
ॐ भीषण भैरवाय नमः भीषण भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ संहार भैरवाय नमः संहार भैरव श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । किल ॐ ब्राह्मयै भैरवाय नमःकर ब्राह्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ माहेश्वर्ये भैरवाय नमः ॐ कौमार्यै भैरवाय नमः मि के काही माहेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ गर कौमारी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ।
ॐ वैष्णव्यै भैरवाय नमः वैष्णवी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वाराह्यै भैरवाय नमः वाराही श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ इन्द्राण्यै भैरवाय नमः ह है इन्द्राणी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ चामुण्डायै भैरवाय नमः चामुण्डा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ महालक्ष्म्यै भैरवाय नमः अतिर ॐ महालक्ष्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । इसके बाद पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें तथा पुष्पाञ्जलि समर्पित कर दें- – अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । समर्पये तुभ्यं कारल भक्त्या प्रथमावरणार्चनम् ।।
saraswati द्वितीयावरण पूजा
करागीर द्वितीयावरण पूजन के लिए बायें हाथ में हल्दी से रंगे अक्षत ले लें तथा दाहिने हाथ से यंत्र पर चढ़ाते हुए चौसठ शक्तियों का पूजन व करें- ॐ कुलेश्वर्यै नमः कुलेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । श ॐ कुलनन्दायै नमः कुलनन्दा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वागीश्वर्यै नमः चागीश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ भैरव्यै नमः ॐ उमायै नमः ॐ श्रियै नमः ॐ शान्त्यै नमः ॐ चण्डायै नमः ॐ धूम्रायै नमः ॐ काल्यै नमः ॐ करालिन्यै नमः ॐ महालक्ष्म्यै नमः ॐ कंकाल्यै नमः ॐ रुद्रकाल्यै नमः ॐ सरस्वत्यै नमः २३ भैरवी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । कर लि उमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । श्री श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । शान्ति श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चण्डा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । धूम्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । काली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । करालिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नजर ॐ महालक्ष्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ਕਿਸ कंकाली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । मित्र रुद्रकाली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सरस्वती Saraswat श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सके ॐ वाग्वादिन्यै नमः ॐ नकुल्यै नमः ॐ भद्रकाल्यै नमः ॐ शशिप्रभायै नमः ॐ प्रत्यंगिरायै नमः ॐ सिद्धलक्ष्म्यै नमः ॐ अमृतेश्वर्यै नमः ॐ चण्डिकायै नमः ॐ खेचर्यै नमः ॐ भूचर्यै नमः ॐ सिद्धायै नमः ॐ कामाक्ष्यै नमः वाग्वादिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नकुली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । भद्रकाली श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । शशिप्रभा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । प्रत्यंगिरा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सिद्ध लक्ष्मी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अमृता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चण्डिका श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । खेचरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । भूचरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सिद्धा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । कामाक्षा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ बलायै नमः ॐ जयायै नमः ॐ विजयायै नमः ॐ अजितायै नमः ॐ नित्यायै नमः ॐ अपराजितायै नमः ॐ विलासिन्यै नमः ॐ अघोरायै नमः ॐ चित्रायै नमः ॐ मुग्धायै नमः ॐ धनेश्वर्यै नमः ॐ सोमेश्वर्यै नमः बला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । जया श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विजया श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अजिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नित्या श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अपराजिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विलासिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । अघोरा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चित्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । मुग्धा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । धनेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सोमेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ महाचण्ड्यै नमः ॐ विद्यायै नमः ॐ हंस्यै नमः ॐ विनायकायै नमः ॐ वेदगर्भायै नमः ॐ भीमायै नमः ॐ उग्रायै नमः ॐ वेद्यायै नमः ॐ सद्गत्यै नमः ॐ उग्रेश्वर्यै नमः ॐ चन्द्रगर्भायै नमः ॐ ज्योत्स्नायै नमः महाचण्डी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विद्या श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हंसी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विनायका श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वेदगर्भा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । भीमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । उग्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वेद्या श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । सद्गति श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । उग्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । चन्द्रगर्भा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ज्योत्स्ना श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ मोहिन्यै नमः ॐ वंशवर्द्धिन्यै नमः ॐ ललितायै नमः ॐ दूत्यै नमः ॐ मनोजायै नमः ॐ पद्मिन्यै नमः ॐ धरायै नमः ॐ वर्वर्यै नमः ॐ क्षत्रहस्तायै नमः ॐ रक्तायै नमः ॐ नेत्रायै नमः ॐ विचर्चिकायै नमः मोहिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वंशवर्द्धिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ललिता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । दूती श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । मनोजा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पद्मिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । धरा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । वर्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । क्षत्रहस्ता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । रक्ता श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । नेत्रा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । विचर्चिका श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ श्यामलायै नमः श्यामला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ बलायै नमः बला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ पिशाच्यै नमः पिशाची श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ विदार्यै नमः विदारी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ शीतलायै नमः शीतला श्री पादुकां पूंजयामि तर्पयामि नमः । ॐ वज्रयोगिन्यै नमः वज्रयोगिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ सर्वेश्वर्यै नमः सर्वेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुन: पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प यंत्र पर अर्पित कर दें- अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ||
saraswati पंचमावरण पूजा : करें- –
बायें हाथ में आठ कमल बीज ले लें। मंत्रोच्चारण करते हुए, दाहिने हाथ से एक-एक कमल बीज यंत्र पर अर्पित करते हुए आठ सरस्वतियों का पूजन ॐ नमः पद्मासने शब्दरूपे ऐं ह्रीं क्लीं वद वद वाग्वादिनी स्वाहा । वाग्वादिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हू स् क् ल् हीं वद वद चित्रेश्वरी ऐं स्वाहा । चित्रेश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं कुलजे ऐं सरस्वती Saraswat स्वाहा । कलुजा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं ह्रीं श्रीं वद वद कीर्तीश्वरी स्वाहा । कीर्तीश्वरी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं ह्रीं अन्तरिक्ष सरस्वती Saraswat स्वाहा । अन्तरिक्ष सरस्वती Saraswat श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हू स् ष्फ्रे हू सौः ष्फ्रीं ऐं ह्रीं श्रीं द्रां ह्रीं क्लीं ब्लूं सः हनीं घट सरस्वती Saraswat घटे वद वद तर तर रुद्राज्ञया ममाभिलाषं कुरु कुरु स्वाहा । घट सरस्वती Saraswat श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । · ब्लू वें वद वद त्रीं हूं फट् । नीला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं हैं ह्रीं किणि किणि विच्चे । किणि श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुनः पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प को यंत्र पर अर्पित कर दें। अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । भक्त्या समर्पये तुभ्यं पंचमावरणार्चनम् ।।
saraswati षष्ठावरण पूजन :
बायें हाथ में काली सरसों ले लें और दाहिने हाथ से यंत्र पर अर्पित करते हुए छः योगिनियों की पूजा करें— ॐ डाकिन्यै नमः । डाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ शाकिन्यै नमः । शाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ लाकिन्यै नमः । लाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ काकिन्यै नमः । काकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ राकिन्यै नमः । राकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ॐ हाकिन्यै नमः । हाकिनी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प यंत्र पर अर्पित करें- अभीष्ट सिद्धिं मे देहि भक्त्या समर्पये तुभ्यं शरणागत वत्सले । षष्ठावरणार्चनम् ।।
saraswati सप्तमावरण पूजा :
बायें हाथ में तीन पुष्प ले लें और यंत्र पर दाहिने हाथ से अर्पित करते – हुए तीन भैरवियों का पूजन करें- हीं परायै नमः । परा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ऐं क्लीं सौः बलायै नमः । बला श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । हू स्मैं हू क्लीं हू सौः भैरव्यै नमः । भैरवी श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । पुनः पुष्पाञ्जलि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प यंत्र पर ३५ -अर्पित कर दें– अभीष्ट सिद्धिं मे देहि शरणागत वत्सले । भक्त्या समर्पये तुभ्यं सप्तमावरणार्चनम् ।।
मंत्र जप 41 आवरण पूजन करने के पश्चात् “सफेद हकीक माला” अथवा “स्फटिक माला” से निम्न मंत्र का एक माला मंत्र जप करें- मंत्र “ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौं क्लीं ह्रीं ऐं ब्लू स्त्रीं नीलतारे सरस्वती Saraswat द्रां द्रीं क्लीं ब्लू सः ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौः सौः हीं स्वाहा” इस मंत्र का जप करने से भगवती सरस्वती Saraswat प्रसन्न होकर अभीष्ट वर प्रदान करती हैं। मंत्र जप समाप्ति के बाद आरर्ती करें, बाद में
saraswati भगवती सरस्वती Saraswat का निम्न स्तुति पाठ करें
स्तुति पाठ मातनील सरस्वति प्रणमतां सौभाग्य सम्पत्प्रदे । प्रत्यालीढपदस्थिते शव हृदि स्मेराननाम्भोरुहे ।। फुल्लेन्दीवर लोचनत्रय युते कर्तृकपालोत्पले । खड्गञ्चादधतीं त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये । बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देहि मे। कुबुद्धिं हर मे देवि! त्राहि मां शरणागतम् ।। सभायां शास्त्रवादे तु रिपुसंघसमाकुले । मुष्टियन्त्रित हस्ता मां पातु नील सरस्वती Saraswat ।। नीला सरस्वती Saraswat पातु हृदय मे समन्ततः । मूलाधारं सदा पातु फट् शक्तिर्नीिल सरस्वती Saraswat ।। विद्यादानरता देवी वक्त्रे नील सरस्वती Saraswat । शास्त्रे वादे च संग्रामे जले च विषमे गिरौ । नित्या नित्यमयी नन्दा भद्रा नील सरस्वती Saraswat । गायत्री सुचरित्रा च कौलव्रत परायणा ।। निषूदिनी । महाव्याधि हरा देवी शुम्भासुर महापुण्य प्रदा भीमा मधु कैटभ नाशिनी ।। पूर्ण श्रद्धा भावना से युक्त हो सरस्वती Saraswat देवी को प्रणाम करें तथा पूरे परिवार में प्रसाद वितरित करें। सम्पूर्ण विधि-विधान द्वारा सम्पन्न पूजन से निश्चित रूप से विद्या, धन, सुख, पुष्टि, आयु, कीर्ति, बल, स्त्री, सौन्दर्य तथा साधक की जो भी मनोकामना होती है, वह पूर्ण होती ही है। ।। इति सिद्धिम् ।।
वैसे तो सभी सरस्वती वंदना मुझे मधुर लगती हैं।लेकिन ये वंदना मुझे सबसे मधुर लगती है। हे शारदे माँ, हे शारदे माँ , अज्ञानता से हमें तार दे माँ तू स्वर की देवी ये संगीत तुझ से, हर शब्द तेरा है हर गीत तुझ से, हम है अकेले, हम है अधूरे तेरी शरण हम हमें प्यार दे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ… मुनियों ने समझी, गुनियों ने जानी, वेदों की भाषा, पुराणों की बानी, हम भी तो समझे, हम भी तो जाने, विद्या का हमको अधिकार दे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ… तू श्वेत वर्णी कमल पे विराजे, हाथों में वीणा, मुकुट सर पे साझे, मन से हमारे मिटाके अंधेरे, हमको उजालों का संसार दे माँ हे शारदे माँ, हे शारदे माँ… चित्र स्त्रोत- गूगल।
सरस्वती केवल स्त्री वाचक नहीं है ज्ञान वाचक भी है ज्ञान की देवी से शादी की ब्रह्मा जी ने अर्थात समस्त ज्ञान को स्वीकार किया क्योंकि उन्होंने ही उत्पन्न किया सरस्वती रूपी ज्ञान को भागवत पुराण में वर्णन है मरीचि के 6 पुत्र ब्रह्मा जी की इस स्थिति पर हंसे थे जिसके कारण उन्हें राक्षस बनना पड़ा क्योंकि वह ठीक से समझे नहीं थे
वसंत पंचमी के आगमन पर, सही समय पर उठें, अपने घर, पूजा क्षेत्र को साफ करें, और सरस्वती पूजा के रीति-रिवाजों को निभाने के लिए स्क्रब करें। चूंकि पीला सरस्वती देवी की सबसे प्रिय छाया है, इसलिए स्क्रब करने से पहले अपने शरीर पर हर जगह नीम और हल्दी का गोंद लगाएं। स्नान के बाद पीले रंग के वस्त्र धारण करें। निम्नलिखित चरण में पूजा चरण / क्षेत्र में सरस्वती प्रतीक स्थापित करना है। एक बेदाग सफेद/पीली सामग्री लें और इसे टेबल/स्टूल जैसी उठी हुई अवस्था पर रखें। इसके बाद से बीच में मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित करें। देवी सरस्वती के साथ, आपको भगवान गणेश का प्रतीक भी पास में रखना होगा। आप इसी तरह अपनी किताबें/स्क्रैच पैड/संगीत वाद्ययंत्र/या कुछ अन्य कल्पनाशील शिल्प कौशल घटक को आइकन के करीब रख सकते हैं। उस समय, एक थाली लें और उसमें हल्दी, कुमकुम, चावल, फूल के साथ सुधार करें और सरस्वती और गणेश को उनके दान की तलाश के लिए अर्पित करें। चिह्नों के सामने थोड़ी सी रोशनी/अगरबत्ती जलाएं, अपनी आंखें बंद करें, अपने हाथ की हथेलियों को मिलाएं और सरस्वती पूजा मंत्र और आरती पर चर्चा करें। पूजा के रीति-रिवाज समाप्त होने के बाद, प्रसाद को प्रियजनों के बीच साझा करें।
हमारे सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मदेव माता सरस्वती के पिता थे। सरस्वती पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मदेव ने सृष्टि का निर्माण करने के बाद अपने वीर्य से सरस्वती जी को जन्म दिया था। इनकी कोई माता नहीं है इसलिए यह ब्रह्मा जी की पुत्री के रूप में जानी जाती थी। वहीं मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा के पांच सिर थे। जब उन्होंने सृष्टि की रचना की तो वह इस समस्त ब्रह्मांड में बिलकुल अकेले थे। ऐसे में उन्होंने अपने मुख से सरस्वती, सान्ध्य, ब्राह्मी को उत्पन्न किया
वैदिक मंत्र महाकाली साधना Vedic Mahakali Sadhana तांत्रिक मान्यता में महाकाली को आदि शक्ति का साकार प होने के कारण आद्या काली भी कहा गया है। आदि शक्ति होने के फलस्वरूप वे अपने साधक को शक्ति प्रदान करती हो रहती हैं।
रुद्र यामल में स्पष्ट किया गया है, कि बेता गुग में सुर असुर संग्राम के दौरान, जब रक्त बाज नामक दानव सुरों पर भारा पड़ने लगा, तो आदि शनि ने अपने तेज से एक आल्यंत नेजस्वी एवं भयंकर स्वरूपा देवी-महाकाली को प्रकट किया। रकबीन और अन्य दानवों को तो उसने क्षणभर में ही नष्ट कर दिया, परन्तु |
फिर भी उसका क्रोध शांत नहुआ.. उस समय क्रोध से बह इतनी प्रचण्ड हो गई थीं, कि असुरों के साथ-साथ सुरों की सेना का भी भक्षण करने लगी। 2 स्थिति अत्यधिक संकटजनक थी, क्योंकि जिस गति से महाकाली सब का भक्षण कर रही थी, उस तरह तो समस्त ब्रह्माण्ड में ही मलय की स्थिति बनना निश्चित था . . . पर इस स्थिति का उपाय करे कोनः ऐसे समय में महाकाली को समझाए कौन?
उनके समझा जाने को मिल करे कौन? काफी मंत्राणा के बाद ब्रह्मा, विधा. इन्द्र आदि ने महादेव की शरण में जाना निश्चित किया। महादेवनो हमेशा की तरह ही समाधि में लीन थे, देवताओं ने काफी स्तुति, अर्चना आदि कर किसी तरह उनका ध्यान अपनी और आकृष्ट किया, तो शिव ने उन सबसे कैलाश आने का कारण पूछा।
तब श्रीहरि ने सारा वृत्तांत सुनाकर अंत में कहा-हेरूद्र अब आपका ही हमें आसरा है, क्योंकि शक्ति के इस क्रोध के बेग को आपके सिवा कोई झेल नहीं सकता। हे शिब’ जिस प्रकार से भयंकर हलाहल को आपके सिवा कोई नहीं धारण कर सकता था, उसी प्रकार आज आपके सिवा शक्ति का कोई सामना नहीं कर सकता…कृपा करे, प्रभु!
हमें इस दुविधा से उचारिए, नहीं तो असमय ही प्रलय हो जाएगी… भगवान शिव को देवताओं पर अत्यधिक करुणा आई और वे ताम्माण वहां पहुंच गए जहां भयंकर दाड़ी वाली महाकाली, भयंकर मट्टाहास कर सब कुछ मक्षाण कर रही थीं… शिय ने जब यह देखा तो वे बिना समय नष्ट किए उस मार्ग पर लेट गए
जहां से महाकाली आ रही थीं बेची तो अपनी ही धुन में थी, और इस तरह उसका पांच शिव के वक्ष पार पड़ गया। गगवान शिव के वक्ष पर पांव पड़ने ही देवी एक क्षण के लिए बहुत सकुचाई और दूसरे को क्षण उनका सारा क्रोध समाप्त 4 हो गया और इस प्रकार से सृष्टि का विनाश होने से बचा। शिवजिन्हें माद भी कहते है, उनके ऊपर स्थित शक्ति के इस स्वरूप को ही महाकाली की संज्ञा से विभूषित किया गया है। महाकाली का स्वरूप बड़ा ही उग्र है।
वह विशालकाय और अत्यधिक सुन्दर है, उनकी जिल्ला रक्त से जित हमेशा बाहर निकली रहती है। उनके गले में ताजे कटे मुण्टो कीमाला है, जिनमें से रक्त टपकता रहता है। पायल और पाजेब की जगह छोटे-छोटे सो एवं हरियों को धारण कर रखा है। उनके चार हाथ हैं जिनमें क्रमशः खड्ग, यमपाश, माण्ड एवं कपाल पात्र है, उनके तीन नेत्र हैं।
महाकाली को दस महाविद्याओं में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है, आखिर इसका कारण क्या है? पहला तो यह कि इस स्वरूप की साधना की सृष्टि स्वयं शिव ने की थी और यह साधना अत्यंत तेजस्वी होने के साथ-साथ अत्यधिक सरल और सहज है, कोई भी पुरुष-स्त्री, बालक-वृद्ध इसको सम्पन्न कर सकता है।
इसमें किसी भी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं। दूसरा इस साधना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है, कि इसी एक साधना से जहां महाकाली सिद्ध होती हैं वहीं रुद्र भी वतः ही सिन्न हो जाते हैं, यानि एक ही साधना से दो दिव्य शातियों की कृपा प्राप्त की जा सकती है।
अब मैं नीचे कुछ बिन्दु स्पाट कर रहाई, जो इस साधना को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने पर व्यक्ति के जीवन में स्वतःही उतर आते हैं देवी अष्ट मुण्डी की माला पहनती है, जिसका नाविक अर्थ अष्ट पाशों से है। साधक पूर्ण रूप से अष्ट पाशों समुक्त हो जाता है और तंत्र के क्षेत्र में अत्यंत ऊंचाइयों को मास कर पाता है।
महादेवी के हाथ में यमपाश है, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति यमपाश मृत्यु से मुक्त हो जाता है। वह सारा जीवन स्वस्थ, निरोश और पूर्ण आयुष्य भोगता है। देवी के हाथ में नर मुण्ड भी है जिसका अर्थ है कि से साधक का अज्ञान रूपी अंधकार मिट जाता है और उसमें एक नई चेतना एवं ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है।
4.इस साधना के उपरांत या तो व्यक्ति के शय रहते ही नहीं और अगर होते हैं, तो वे हमेशा उसके आगे विनीत भाव से रहते हैं, उसकी हर बात स्वीकार करते ही हैं। ऐसे व्यक्ति के घर में अटूट सम्पदा, धन, धान्य की रिस्थति बन जाती है, समाज में मान, प्रतिष्ठा, पद सब कुछ सहज ही प्राप्त हो जाता है।
उसका पारिवारिक जीवन बड़ा सुखद होता है। उसे पुत्र एवं पौत्रों की प्राप्ति होती है। निश्चय हीमहाकाली साधना एक अद्गुन होरक खण्ड है. जो आपके हाथों में आने के लिए लालाधित है, लेकिन यह भी | एक सत्य है कि हीरक खण्ड मिलता सिर्फ बिरले को ली है।
साधना विधान इस साधना को साधक या किसी भी अमावस्या की रात्रि में सम्पन्न करें। साधक काले वस्त्र धारण करके काले आसन पर बैठे। अपने समक्ष स्टील की थाली में काले तिल बिछाकर, उस पर ‘महाकाली यंत्र स्थापित करें। यंत्र का पूजन कर निम्न ध्यान मंत्र द्वारा भगवती
काली का ध्यान करें-
– कराल बवना घोर मुक्तकेशी चतुभुजा नमामि रक्त काली ता मुण्डमाला विभूबिताम् घोररावा महासदी श्मशानालय बासिनीम् । वालार्क मण्डलाकारं लो बजत्रितमान्विताम ध्यान के पश्चात भगवती काली का पूजन करें-ककुम तथा अक्षत यंत्र पर निम्न मंत्रोच्चारण करते हुए बढ़ाएं आमच्छ बरवे देवि। त्यपनि दिनि । पूजा गृहाण सुमुखि नमस्ते शंकर प्रिये ।।
निम्न मंत्र का महाकाली माला से जप म्याराह ! माला करें
mantra ke lea samprak kare
यह 14 दिन की साधना है. पूर्णिमा को समस्त सामग्री किसी नदी में विसर्जित कर दें। येप्रयोग किसी भी अमावस्या को प्रारम्भ निरजा सकते हैं। उपरोक्त विधि से महाकानी का पूजन तथा देवी ध्यान करें। ये सभा प्रयोग रात्रि काल में ही किर जा सकते हैं। इसमें माला का प्रयोग नहीं होता। प्रयोगसमाप्ति पर समस्त सामाग्री को जल में विसर्जिन करें। –
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना Maa Bhuvaneshwari Sadhana
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना Maa Bhuvaneshwari Sadhana
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना Maa Bhuvaneshwari Sadhana भुवनेश्वरी महाविद्या दस महाविद्या में से एक है ! इस महा विद्या को करने से आप भूमि सुख राज्य सुख और भी जो इस धरती पर जो सुख है सब प्राप्त होंगे ! सब शत्रु से विजय प्राप्त होगी ! रात हनुमान ने आंखों में बिता दी थी। – हनुमान ने विनम्रता पूर्वक कहा। उन्हें पल भर नहीं आई थी… अभी हाल ही में गुप्तचर संदेश लेकर आया था कि रावण ने युद्ध में विजय हेतु महाचण्डी यश का प्रारम्भ कर दिया है। उसने देश भर के उत्कृष्ट विद्वानों को आमंत्रण था, और वे सभी इकट्ठे हो गए थे।
बस दो दिन बाद से ही इस महायज्ञ का प्रारम्भ हो जाएगा. और अगर वह यज्ञ किसी प्रकार से सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जाए, तो रावण की विजय सुनिश्चित है… यही सब सोचकर अंजनी सुत सारी रात गंभीर चिंतन में इधर-उधर टहलते रहे.. पर ऋषि भी कब मानने वाले थे…. उनके बार-बार आग्रह करने पर कमिश्रेष्ठ ने एक अति विस्मित करने वाला वर मांगा, जो कि आगे जाकर राम की विजय का एक मुख्य कारण बना. महाचण्डी यज्ञ में जिस मंत्र के संपुटीकरण से हवन किया जाना था, वह था जय त्वं देविचामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते । युद्ध 斗 रावण की स्थिति दयनीय हो गई थी।Bhuvaneshwari Sadhana
उसके समस्त उच्चकोटि के योद्धा मारे गए थे. सभी काल कवलित हो गए थे और वह निःसहाय, निरुपाय मां चण्डी के आशीर्वाद के लिए लालायित था.. इसमें भूतार्तिहारिणी का अर्थ है सभी प्राणियों की पीड़ा करने वाली हनुमान ने ऋषियों से यह वर मांगा कि वे भूतार्तिहारिणी में ‘ह’ की जगह ‘क’ का उच्चारण कर दें। बेचारे ऋषि तो वचन बद्ध थे ही, उन्होंने तथास्तु कह दिया। इस प्रकार वह शब्द बन गया ‘भूतार्तिकारिणी’ जिसका अर्थ है सभी प्राणियों को कष्ट देने वाली। पर हनुमान को चैन कहां, वे तो निरन्तर इसी चिंतन में थे. कि किस प्रकार से राम के सामने आने वाली विपदा को पहले से ही ध्वस्त कर दिया जाए, किस प्रकार से उनके कंटकाकीर्ण मार्ग को पुष्पों से आच्छादित कर दिया जाए, ताकि उन्हें किसी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े इस प्रकार एक अक्षर के बदलने मात्र से यज्ञ रावण के लिए ही अनिष्टकारी बन गया। परन्तु इसके बाद भी हनुमान चैन से नहीं बैठे। Bhuvaneshwari Sadhana
वे तत्काल भगवान राम के पास पहुंचे और विनम्रता पूर्वक कहा और इसके लिए अगले ही दिन हनुमान एक विन का रूप धर कर पहुंच गए यज्ञ स्थली पर और वहां पहुंच कर सभी ऋषि-मुनियों की पूर्ण श्रद्धा भाव से सेवा करने लगे। उनकी निःस्वार्थ सेवा भावना से सभी ऋषि-मनि इतने प्रभावित कि उन्होंने विप्र के रूप में आए हनुमान को वर मांगने को कहा। “”प्रभु ! हमारे युद्ध कौशल के आगे रावण की समस्त सेना का विध्वंसहो चुका है, हमारी रणनीति और आपके आशीर्वाद द्वारा उनका अत्यधिक अहित हो चुका है, परन्तु.. 21 2 परन्तु क्या कपिश्रेष्ठ ?” – राम बोले। “नहीं नहीं महात्मन् मैंने किसी प्रयोजन से आपकी सेवा नहीं की थी मैं तो मात्र आपका साहचर्य लाभ प्राप्त परन्तु रावण अभी भी जीवित है और वही हमारा मुख्य एवं प्रबलतम शत्रु है। Bhuvaneshwari Sadhana
उसकी नाभि में अमृत कुण्ड स्थापितहै, जिससे वह सदैव चिर-यौवन वान बना रहता है और जिसके फलस्वरूप उसकी मृत्यु संभव नहीं इसके अलावा भी वह अपने कई आत्मजों के शवों को ढो चुका है. यहां तक कि उसकी विजय का आखिरी प्रयास महाचण्डी यज्ञ भी आपकी कृपा से विफल हो चुका है। अतः यह एक घायल सिंह की भांति हो गया है और आप तो जानते ही हैं, कि सौ सिंहों से एक चायल सिंह अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकता है। और उसी क्षण राम ने अपने प्रिय शिष्य हनुमान के निवेदन पर भुवनेश्वरी साधना एवं अनुष्ठान का प्रारम्भ किया एवं उसे सफलता पूर्वक सम्पन्न किया और इतिहास भी इस बात का गवाह है, किजो | रावण नाभि में अमृत कुण्ड स्थापित होने की वजह से अजेय था, अंततः कालकेविकराल पंजों से बच नहीं पाया… वैसे भी यह बड़ा मायावी और प्रपंची है। Bhuvaneshwari Sadhana
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना के लाभ Maa Bhuvaneshwari Sadhana ki labh भुवनेश्वरी साधना बेनिफिट्स
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना के लाभ Maa Bhuvaneshwari Sadhana ki labhभुवनेश्वरी साधना बेनिफिट्स1 उच्चकोटि की सिद्धियां उसके पास हैं और समस्त प्रकृति को वह अपने नियंत्रण में ले चुका है सारी प्रकृति उसके इशारों पर नृत्य करती है। साथ ही साथ उसके पास अद्वितीय दिव्यास्त्रों की भरमार है और उनमें कुछ तो ऐसे हैं जो समस्त ब्रह्माण्ड को विनष्ट करने में सक्षम है। जाता है, जिससे उसके आसपास के लोग स्वतः उसकी और आकर्षित होते हैं और उसकी हर आज्ञा का ना-नुच किए बिना पालन करते हैं।
2. यह साधना सिद्ध होते ही व्यक्ति की दरिद्रता, रोग, शत्रुभय, ऋण आदि की स्थिति स्वतः ही नष्ट हो जाती है और वह मान-सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करने लगता है। तो तुम्हारा क्या विचार है हनुमान राम ने पूछा। “प्रभु के आशीर्वाद से मुझे स्मरण आ रहा है, कि बाल्यावस्था में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान मुझे एक अद्वितीय महातेजस्वी साधना पद्धति मेरे गुरु सूर्यदेव ने प्रदान की थी, जो भुवनेश्वरी से सम्बन्धित है। उनके अनुसार समस्त देवियों की शक्ति को भुवनेश्वरी के रूप में सिद्ध कर लेने से वह साधक अजेय हो जाता है और फिर उसके सामने समस्त त्रैलोक्य के देवता, दानव, मनुष्य, गन्धर्व आदि भी युद्ध में टिक नहीं सकते। जिस क्षण यह साधना सम्पन्न होती है, उसी क्षण से शत्रु काल के सुपूर्द हो जाता है और उसका विनाश उतना ही निश्चित हो जाता है, जितना कि सूर्य और चन्द का अस्तित्व में होना।”
3. व्यक्ति के घर में निरन्तर धन का आगमन होता ही रहता है। उसका व्यापार तरक्की करता है और अगर वह नौकरी पेशा हो, तो उसकी पदोन्नति शीघ्र होती है।
4. इस साधना के प्रभाव से घर में अगर कोई तांत्रिक प्रयोग हो, तो वह नष्ट होता है।
5. कुण्डली में निर्मित दुर्योग फलहीन हो जाते हैं.. अगर दुर्घटना एवं अकाल मृत्यु का योग हो. तो वह भी अल्प हो जाता है, एक प्रकार से नष्ट हो हो जाता है। -और प्रभु राम मुस्करा दिए, प्रभु अपने भक्त की प्रसन्नता के लिए स्वयं विष्णुवतार होते हुए भी शिष्य/ भक्त हनुमान के निवेदन पर उसी क्षण भुवनेश्वरी साधना एवं अनुष्ठान का प्रारम्भ किया एवं उसे सफलता पूर्वक सम्पन्न किया.
6. साधक जिस कार्य में हाथ डालता है. उसमें विजय ही प्राप्त करता है, हर क्षेत्र में सफल होता है। इंटरव्यू परीक्षा आदि में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है। – और इतिहास भी इस बात का गवाह है कि जो रावण नाभि में अमृत कुण्ड स्थापित होने की वजह से अजेय था, अंततः काल के विकराल पंजों से बच नहीं पाया
7. ऐसा व्यक्ति समाज में सम्माननीय एवं पूजनीय होता है। उच्चकोटि के मंत्रीगण एवं अधिकारी भी उसकी बात को मस्तक पर धारण करते हैं। वह सभी का प्रिय होता है और जीवन में उसे किसी चीज का अभाव नहीं रहता।
8. इसके साथ ही साथ उसका पारिवारिक जीवन अत्यधिक सुखी होता है, यदि कोई क्लेश व्याप्त हो, तो भी वह समाप्त हो जाता है। वास्तव में ही यह साधना अपने आप में महातेजस्वी अद्वितीय एवं अनिवर्चनीय है। ऐसा आज तक हुआ ही नहीं, कि | व्यक्ति यह साधना सम्पन्न करे और उसका परिणाम उसे न मिले। ऊपर दिए गए संदर्भ में इस साधना का एक ही तथ्य स्पष्ट किया गया है। वैसे इसके सफलतापूर्वक सम्पन्न होने पर निम्न स्थितियां साधक के जीवन में अंकुरित हो जाती है-
9. उसकी समस्त इच्छाएं और कामनाएं पूर्ण होती है और वह स्वयं भी आश्चर्य चकित रह जाता है, कि किस प्रकार से उसकी सारी अभिलाषाएं स्वतः ही पूर्ण हो रही हैं।
10. भगवती भुवनेश्वरी वास्तव में सम्पूर्ण 64 कलाओं 1. साधक का व्यक्तित्व अत्यधिक आकर्षक एवं भव्य हो जाता है।
उसके इर्द-गिर्द एक तेजयुक्त आभा मण्डल निर्मित हो से परिपूर्ण है, अतः इस साधना को सम्पन्न करने से व्यक्ति को नहा भोग, धन, वैभव, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, वहीं वह अन्त में मोक्ष की स्थिति प्राप्त कर बालीन हो जाता है… और आवागमन के चक्र से छूट जाता है। ऊपर बताई गई स्थितियां तो मात्र सूर्य को रोशनी दिखाने के समान हैं। वास्तव में तो वह अपने आप में ही अद्वितीय तेजस्वी युगपुरुष बन जाता है। उसके अन्दर शक्ति का वह तीव्र प्रवाह समाहित हो जाता है, जिससे काल भी उसके सामने आने से मयभीत होता है। साथ ही साथ वह समस्त ज्ञान-विज्ञान में पारंगत हो वर्तमान पीढ़ी का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो पाता है और आने वाली पीढ़ियां उसे दिव्य पुरुष को संज्ञा से विभूषित कर आदर भाव से देखती हैं। साधना विधान यह भुवनेश्वरी साधना विधान वास्तव में शक्ति साधना का ही स्वरूप है और एक तरह से मात्र इस साधना को करने से आद्य शक्ति के समस्त स्वरूपों की साधना स्वतः ही हो जाती है।
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना की विधि Maa Bhuvaneshwari Sadhana vidhi
भुवनेश्वरी महाविद्या साधना की विधि Maa Bhuvaneshwari Sadhana vidhi यह 9 दिन की साधना है और 1. 1. 99 से अथवा किसी भी मास के प्रथम दिन से इसे प्रारम्भ करना चाहिए। नवरात्रि के अवसर पर इस साधना को सम्पन्न किया जा सकता है। इस साधना में निम्न उपकरणों की आवश्यकता होती है। 1. भुवनेश्वरी यंत्र, 2. मूंगे का दाना, 3. मुक्नेश्वरी माना। निर्धारित दिवस की रात्रि में दस बजे के उपरान्त साधक स्नान आदि से निवृत्त होकर श्वेत स्वच्छ धोती धारण कर श्वेन आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठें। गुरु चित्र का स्थापन करें तथा ‘दैनिक साधना विधि’ पुस्तक में दी गई विधि से गुरु पूजन करें। अपने सामने लाल वस्त्र से ढके बाजोट पर भुवनेश्वरी यंत्र स्थापित कर उसका (कुंकुंम, अक्षत, धूप, दीप, पुष्प) पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें। फिर साधक वाहिने हाथ में जल लेकर
निम्न प्रकार से विनियोग करें विनियोग ॐ अस्य श्री भुवनेश्वरी हृदय स्तोत्रस्य श्री शक्ति ऋषिः । गायत्री मन्च, भुवनेश्वरी देवता, ही बीजं, ई शक्तिः // रं कीलकं सकल-मनोवांछित-सिद्धचर्य पाठे विनियोगः ॥ जल भूमि पर छोड़ दें तथा शरीर के विभिन्न अंगों को दाहिने हाथ से स्पर्श करते हुए
निम्न न्यास सम्पन्न करें- ऋष्यादि न्यास श्री शक्ति ऋषये नमः शिरसि || गायत्री छन्दसे नमः मुखे ॥ श्री भुवनेश्वरी देवतायै नमः हृदि । ह्रीं बीजाय नमः गुझे ॥ ई शक्तये नमः नाभौ ॥ रं कीलकाय नमः पाक्योः ॥ सकल मनोवांछित सिन्द्रवयें पाठे विनियोगाय नमः सर्वांगि।
फिर मूंगे का दाना अगर मन में कोई इच्छा विशेष हो, तो उसे सोचकर निम्न मंत्रों से यंत्र पर अर्पित करे भुवनेश्वरी ध्यान उपदविनश्रुति मिन्दु किरीटान्तुङ्ग कुचाश्यनत्र युक्ताम् स्मेरमुखी व्वरवाङ्कुश पाशांभीति कराम्प्रभुजे मुवनेशीम् फिर ‘भुवनेश्वरी माला’ पर सिंदूर से तिलक करें तथा उसी माला से निम्न मंत्र की 101 माला मंत्र जप करें- मंत्र ।। ॐ ह्रीं ॐ ।। Qs Hreem Om तिलक कर पूजन करने के बाद ही भुवनेश्वरी माला से 101 मालाएं फिर नित्य साधना करने से पूर्व यंत्र एवं मुंगे के दाने का मंत्र जप करें। ऐसा नौ दिन तक करें, उसके उपरांत समस्त साधना सामग्री को किसी जलाशय में अर्पित कर दें। ऐसा करने से साधना निश्चय ही सिद्ध होती है। इसमें कोई संशय नहीं। निश्चित ही यह साधना एवं मंत्र परम गोपनीय और सामान्यतः अप्राप्य है, पर जिस किसी को भी यह साधना सिद्ध हो जाती है उसके
Bhuvaneshwari Sadhana
भाग्य से तो स्वयं देवी-देवता भी ईष्या करने लगते हैं और वह दिनों दिन ऊंचाई की ओर अग्रसर होता ही रहता है।
प्रचंड काल भैरव Kaal Bhairav साधना – kaal bhairav sadhna – धन धान्य, ऐश्वर्य, सुख सौरभ प्रदायक काल भैरव Kaal Bhairav साधना | जीवन में अभाव भी शत्रुवत् ही होते हैं, जो स्तम्भित कर देते हैं व्यक्ति के जीवन की सहज गति और प्रायः उसकी मति भी.. . आश्चर्य है। ऐसे ‘शत्रुओं को समाप्त करने के लिए साधक क्यों नहीं सहायता लेते भगवान श्री भैरव की, जो अपने स्वरूप में प्रबल शत्रुहंता ही स्वीकृत किए गए हैं।
प्रस्तुत है काल भैरव Kaal Bhairav अष्टमी के पर्व पर भगवान भैरव की साधना से सम्बन्धित एक नवीन आयाम- त्येक साधना एवं साधना पद्धति की अपनी एक पृथक विशिष्टता होती है और उस विशिष्टता के साथ साधना स्वयं में सम्पूर्ण भी होती है, यह साधना जगत का एक महत्वपूर्ण तथ्य है। आज इस बात को उल्लिखित करना इस कारण प्र इस बात पर केंद्रित रहता है. कि कैसे उसके जीवन की किसी समस्या विशेष का समाधान शीघ्रातिशीघ्र हो सके।
आवश्यक हो गया है. क्योंकि न केवल साधना के मार्ग में प्रविष्ठ हुए साधकों के मन में वरन् इस मार्ग पर कई कई वर्ष तक चल चुके साधकों के मन में यह धारणा घर बन गई है, कि विशिष्ट साधनाएं केवल विशिष्ट लक्ष्यों की पूर्ति तक ही सीमित होती है। यद्यपि ऐसा करने में कोई दोष नहीं है।
प्रत्येक साधक से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वह पहले किसी साधना अथवा देवी-देवता के स्वरूप का तात्विक विवेचन कर ले तब साधना में प्रवृत्त हो किन्तु एक सम्पूर्ण दृष्टि की अपेक्षा तो की ही जा सकती है और इसका सर्वाधिक लाभ भी अन्ततोगत्वा किसी साधक को ही तो मिलता है।
इस विचार-विमर्श के क्रम में यदि भगवती बगलामुखी संहार की देवी (या साधना) है, लक्ष्मी केवल धन सम्पत्ति देने की एक हेतु हैं, दुर्गा दुष्टों का संहार करने का एक उपाय भर हैं इसी प्रकार से अन्य देवी-देवताओं अथवा साधनाओं के भी निश्चित अर्थ सुस्थापित हो चुके हैं।
साधना एक व्यवसायिक विषय वस्तु नहीं होती है कि मुंह मांगा दाम देकर अपनी मनोवांछित वस्तु को प्राप्त कर लिया जाए। किसी भी साधना को पहले अपने रोम-रोम में समाहित करना होता है तभी उस साधना से सम्बन्धित मंत्र जप को सम्पन्न करने का कोई अर्थ होता है और यह क्रिया किसी अन्य युक्ति से नहीं वरन् सम्भव होती है तो केवल ज्ञान के माध्यम से, तात्विक विवेचन के माध्यम से।
यह सत्य है, कि विशिष्ट साधनाएं विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक होती हैं किन्तु है अन्ततोगत्वा एक अर्चसत्य ही | और अर्धसत्य सदैव किसी झूठ से भी अधिक भ्रमित करने वाला होता है। पत्रिका में कोई साधना विधि प्रस्तुत करने से पूर्व उसकी संक्षिप्त व्याख्या करने के पीछे यही मंतव्य होता है।
साधनाओं अथवा देवी-देवताओं को उनके विशिष्ट स्वरूप से कुछ अलग हटकर एक सम्पूर्ण दृष्टि से देखने की शैली या तो विकसित नहीं हुई अथवा साधकों के पास जीवन की व्यस्तता में इतना अवकाश नहीं रहा, कि वे इस विषय पर चिंतन कर सके क्योंकि इस तीव्र युग में साधक का ध्यान साधना से भी अधिक जैसा कि प्रारम्भ में कहा कि प्रत्येक साधना यद्यपि स्वयं में किसी एक विषय तक ही केंद्रित प्रतीत होती है
किन्तु वही साधना स्वयं में एक सम्पूर्ण साधना भी होती है, इसका भी अर्थ केवल इतना ही है कि साधना कोई भी क्यों न हो, यदि साधक की अन्तर्भावना उसमें रच पच जाती है तो न केवल उसके तात्कालिक उद्देश्यों की पूर्ति सम्भव होती है वरन वह उसी साधना के माध्यम से विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभूतियों एवं चैतन्यता को प्राप्त करने में भी समम होने लग जाता है।
यह कदापि महत्वपूर्ण नहीं है कि किस साधक के इष्ट कौन है, क्योंकि कोई भी देवी या देव न तो छोटे होते हैं न बड़े न कोई देवी या देवता) न्यून होते हैं और न कोई उच्च, यदि साधक के पास एक सम्पूर्ण दृष्टि हो। अंतर तो केवल साधक के लक्ष्यों से पड़ता है, जिस प्रकार से आज भैरव को केवल एक भीषण देव मानने से उनको छविजनमानस में प्रायः एक विकृत देव के रूप में स्थिर हो गई है,
किन्तु भगवान भैरव का परिचय इस रूप में प्रस्तुत होना एक प्रकार की अपूर्णता ही है। यह सत्य है, कि जीवन की भीषणताओं को समाप्त करने में भगवान भैरव की साधना के समकक्ष कोई साधना नहीं प्रतीत होती. शत्रुहंता स्वरूप में उनकी सिद्धि प्राप्त करना वास्तव में जीवन का सौभाग्य ही होता है. श्मशान साधनाओं एवं उग्र साधनाओं में पूर्णता उनकी प्रसन्नता के बिना मिलना कठिन ही नहीं असम्भव भी होता है किन्तु इसके पश्चात् भी मानों भगवान भैरव का चित्र पूर्ण नहीं होता है।
भैरव साधना का एक गोपनीय पक्ष यह भी है, कि जहां वे एक उग्र देव हैं वहीं अन्तर्मन से पूर्ण शांत व चैतन्य देव भी हैं जिनकी यथेष्ट रूप में उचित साधना विधि से उपासना करने पर यह सम्भव ही नहीं है कि उनके साधक के जीवन में किसी प्रकार का भौतिक अभाव रह जाए।
इसी तथ्य का और अधिक गूढ़ विवेचन यह है कि जहां जीवन में सुख समृद्धि का आगमन किसी तेजस्वी साधना के माध्यम से सम्भव होता है वहां, वह अन्य साधनाओं की अपेक्षा कहीं अधिक स्थायी, आभायुक्त एवं जीवन में निश्चित रूप से सुखद परिवर्तनकारी होती है।
इतिभैरवः’ (अर्थात् जो शत्रुओं को भयभीत करने वाले हैं वे भैरव है) ही नहीं वरन् बिभर्ति जगदिति भैरवः’ (अर्थात् जो समस्त जगत का भरण पोषण करने वाले हैं. वे भैरव है) भी है। यह बात और है कि उनको १ जनसमान्य में छवि एक गोषण देव के रूप में ही सुस्थापित हुई। जब समाज किसी तेजस्विता को सहन नहीं कर पाता है तो यही क्रिया होती है।
जब विवेचन का क्रम स्तम्भित हो जाता है तो एक प्रकार का भोंडापन उपन आता ही है और इन सभी बातों के मूल में जो त्रुटि होती है, वह अपना ध्यान केवल लक्ष्य की पूर्ति तक केंद्रित रखने के कारण ही होती है। इसके उपरांत भी इस सत्य से तो कोई इन्कार नहीं।
कर सकता, कि जीवन में भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति करना, भौतिक बाधाओं को दूर करना जीवन का प्रथम एवं अत्यावश्यक सोपान होता है जिसके अभाव में चित्त स्थिर हो ही नहीं सकता। साधक का चित्त नहां विभिन्न भौतिक बाधाओं की समाप्ति से सुस्थिर हो सके वहीं उसके जीवन में एक तेजस्विता का भी समावेश हो सके और वही बात पूर्णतया सत्य है भगवान भैरव के किसी भी स्वरूप से सम्बन्धित साधना में भी।
भगवान श्री भैरव की व्याख्या केवल ‘बिभेति शत्रून साधक अथवा गृहस्थ साधक द्वारा अवश्यमेव प्रयोग में लाने योग्य है। इस विधि की विशिष्टता है, कि जहां एक ओर से यह दुर्बलता, हीनता आदि की स्थितियों को समाप्त करने की साधना है वहीं दूसरी ओर से पूर्ण मौतिक समृद्धिदायक साधना भी है।
प्रचंड काल भैरव Kaal Bhairav साधना विधि – kaal bhairav sadhna
प्रचंड काल भैरव Kaal Bhairav साधना – kaal bhairav sadhna
इसे सम्पन्न करने के इच्छुक साधक को चाहिए कि वह समय रहते ‘भैरव यंत्र’ व ‘भैरव माला’ को प्राप्त कर ( या किसी भी रविवार की रात्रि में दस बजे के आसपास काले वस्त्र पहन साधना में प्रवृत्त हो। दक्षिण दिशा की ओर मुख कर बैठना आवश्यक है। यंत्र व माला का सामान्य पूजन कर एक तेल का बड़ा सा दीपक जलाएं और उसकी निम्न मंत्र से अभ्यर्थना करें
इसके पश्चात् अक्षत, कुंकुम, पुष्प व जल हाथ में लेकर दीपक का समक्ष छोड़ निम्न मंत्र उच्चरित करें – गृहाण दीपं देवेश, बटुकेश महाप्रभो, ममाभीष्टं कुरु विप्रमापदभ्यो समुदर फिर निम्न मंत्रोच्चारण के साथ दीपक को प्रणाम करें- भो बटुक / मम् सम्मुखोभव, मम कार्य करु करु इच्छितं देहि देहि मम सर्व विध्नान् नाशय नाशय स्वाहा । अपने मन की इच्छाओं व उनमें आ रही बाधाओं का उच्चारण कर (अथवा मन ही मन उनका स्मरण कर साथ ही भगवान भैरव से उनकी पूर्ति की प्रार्थना कर भैरव माला से निम्न मंत्र की २१ माला मंत्र जप को सम्पन्न करें। यदि सम्भव हो तो यह मंत्र जप दीपक की लौ पर ध्यान केंद्रित करते हुए ही करें मंत्र ॥
काल भैरव Kaal Bhairav सिद्धि मंत्र
ॐ ह्री काल भैरव Kaal Bhairavाय ही नमः ॥ Om Hreem Kaul Bheiravany Freem Namah
मंत्र जप के पश्चात् पुनः दीपक के सम्मुख निम्न मंत्र का उच्चारण करें श्री भैरव नमस्तुभ्यं सत्वरं कार्य साधक उत्सर्जयामि ते दीप जायस्व मबसाजरात मंत्राणाक्षर होनेन पुष्पेण विकले नवर पूजितोऽसि मवावेद / तत्क्षमस्व मम प्रमो ध्यान रखें कि दीपक को बुझाना नहीं है अपितु वह जब तक जले उसे जलने देता है।
दूसरे दिन सभी साधना सामग्रियों को नदी में विसर्जित कर दें। जीविकोपार्जन के क्षेत्र में आ रही बाधाओं को समाप्त करने के लिए यह एक अनुभव सिद्ध साधना है।
आवश्यकता होती है, तो केवल एक सम्पूर्ण दृष्टि की और यही बात कही जा सकती है भगवान भैरव के प्रति प्रचलित मान्यताओं के प्रति भी… भगवान शिव की ही भांति मगवान भैरव का स्वरूप भी शता से प्रसन्न होने वाला माना गया है। आवश्यकता है इस बात की कि साधक को भैरव साधना में आने वाले चरणों का विशेष रूप से ज्ञान हो ।
प्रत्येक साधना का एक गुन सूत्र होता है या यूं कह सकते हैं कि key point होता है जिसके अभाव में भले ही कितने खमंत्र जप क्यों न सम्पन्न कर लिए जाएं, सफलता पूर्णरूपेण मिल पाती है।
यह key point प्रत्येक साधना की अन्तर्भावना परिवर्तित होने वाला तत्व होता है अर्थात यह आवश्यक कि जो बात एक साधना के विषय में सत्य हो वहीं प्रत्येक के लिए अंतिम रूप से सत्य हो तथा इसका निर्धारण तर्क के आधीन न होकर भाव के हो आधीन होता है।
काल भैरव Kaal Bhairav का स्वरूप भी किसी तर्क का आधीन होकर के आधीन आने वाला विषय होता है। साधक सामान्यतः काल भैरव Kaal Bhairav संज्ञा से किसी भीषण आकृति की कल्पना कर लेते और यदि तत्सम्बन्धित साधना में प्रवृत्त होते भी हैं, तो एक मिश्रित जुगुप्सा के साथ उनका ऐसा भाव रखना ही साधक के लिए सर्वाधिक न्यून हो जाता है।
वस्तुतः काल भैरव Kaal Bhairav का अर्थ है, जो काल चक्र में पड़े हुए (साधक) को अपनी चेतन्यता से मुक्त कर श्रेयस्कर मार्ग की ओर प्रवर्तित कर दें और निश्चय ही ऐसे देव का पूजन, साधना अत्यन्त आह्नाव के साथ सम्पन्न की जानी चाहिए।
यूं इन पंक्तियों में भले ही कितना कुछ क्यों न वर्णित कर दिया जाए, कि काल भैरव Kaal Bhairav की साधना से जीवन में क्या क्या होते हैं, वह तब तक फलप्रद हो ही नहीं सकेगा जब तक मक काल भैरव Kaal Bhairav के प्रति एक सश्रद्धाभाव को अपने मन में स्थान नहीं देगा. उनसे सम्बन्धित साधना विधि को प्रयोग में पूर्ण एकाग्रता से नहीं लाएगा |
तुलसी यक्षिणी साधना tulsi yakshini sadhana गुरु मंत्र साधना में आप सब का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन करता हूं ! मेरे प्रिय भाई बहनों आज मैं आपके लिए लाया हूं ! तुलसी यक्षिणी साधना यूट्यूब पर पहली बार राज्य प्राप्ति तुलसी यक्षिणी साधना tulsi yakshini sadhana किसी ने नहीं दी है ! और किसी भी चैनल पर देख लेना यूट्यूब पर किसी भी प्रकार से राजदा यक्षिणी साधना अभी तक नहीं दी है ! आप लोगों ने नाम भी नहीं सुना होगा तुलसी यक्षिणी साधना का यक्षिणी हैं! जिनको माता भी में सिद्ध किया जाता है! यह यक्षिणी आपको राजा महाराजा तक बना सकती हैं! राज्य प्राप्ति करा सकती हैं वोटो में जीतना चाहते हैं ,किसी भी प्रकार का प्रधान , नगर महापालिका, विधायक, सांसद, बन सकते है और कोई चुनाव किसी भी प्रकार का कोई कंपटीशन हो मैं आपको सफलता दिलाती हैं! तुलसी यक्षिणी साधना अगर आप तुलसी यक्षिणी साधना को सिद्ध कर लेते हैं तो आप राजा महाराजा यानी राष्ट्रपति प्रधानमंत्री तक बन सकते हैं !राजदा यक्षिणी साधना से आप सर्वोच्च शिखर पर पहुंच सकते हैं !आप विश्व में अपना नाम लिखा सकते हैं, विश्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा सकते हैं! मेरे प्रिय भाई बहनों राजदा यक्षिणी साधना में आपको बताऊंगा विधिवत तुलसी यक्षिणी साधना कर लेते हो तो आपके भाग्य में ना होते हुए भी आपको राज और महाराज तक प्राप्त हो सकता है !
तुलसी यक्षिणी साधना विधि
इस साधना को किसी भी दिनवार से कर सकते है घर में पूरब और उत्तर के कोने में ईशान दिशा में तुलसी होनी चाहिए तुलसी आपके सामने हो पास बैठ के यह साधना करेंगे दीपक जलाएं और खोया का मिठाई का कोई खीर की मिठाई का प्रसाद रखें गंगा जल रखें और सोलह सिंगार चढ़ाएं पहले दिन और रुद्राक्ष की माला से तुलसी की माला से लाल चंदन या सफेद चंदन की माला से कर सकते है ! जप का १० % हवन करे और तरपन मार्जन भी करें ! इस लेकिन पत्नी और प्रेमिका बनाने की भूल मत करना यह यक्षिणी माता और बहन इन्हीं रूपों में सिद्ध हो सकती हैं सबसे उत्तम माता रूप में इनको सिद्ध करना उत्तम है माता रूप में सिद्ध करना और साधना के दौरान भूमि सेन और ब्रह्मचर्य व्रत भी रखें काला और नीला वस्त्र भी ना पहने वस्त्र पहने या सफेद वस्त्र पहने ऐसे 3 में से कोई भी वस्त्र एक पहने आपका उत्तर में हो और दिशा में होना चाहिए स्थान में सुविधा ना हो तो घर में पूरा में तुलसी के सामने के साधना की जाती है तुलसी की जड़ में !तुलसी यक्षिणी पूजन किया जाता है
कनक यक्षिणी साधना प्रत्यक्षीकरण kanak yakshini sadhna ph. 85280 57364 नमस्कार दोस्तों guru mantra sadhna पर आपका एक बार फिर से स्वागत है ! आज मैं एक फिर से नई यक्षिणी साधना लेकर आया हूं !कनक यक्षिणी के नाम से जानते हैं कनक यक्षिणी की साधना करने से पहले आप लोग को यह जानना जरूरी है ,कि
कोई भी यक्षिणी की अगर आप साधना करते हैं को सबसे पहले 1 महीने तक कुबेर जी का और भगवान शिव का मंत्रों द्वारा विधिवत जो है पूजन करना चाहिए ! और उसके बाद फिर दशांश हवन करना चाहिए कुबेर जी का और भगवान शिव का मंत्रों का कर सकते हैं !
आप एक साथ कर सकते हैं और किस यशराज का जो मंत्र होता है ! वह यह है यशराज मंत्र आपको ही जाप करना है आपको हवन करना पड़ता है ! ताकि अगर कभी धन की बात है तो धन यक्षिणी प्रदान कर सके क्योंकि धन तभी प्रदान करेगी जब यक्ष राज्य उसको अनुमति प्राप्त हो जाएगी तो यह बात 1 महीने पहले कर लेना ! उसके बाद ही आप सब ने कुबेर से आज्ञा से यक्षिणी साधना को शुरू करें !
और यह नियम हर यक्षिणी पर लागू है चाहे कोई भी यक्षिणी क्यों ना हो मंत्र अगर यह नहीं करते हैं ! तो यह जो है वह वित्तेश्वराय नमः मंत्र भी कर सकते हैं और भगवान शिव के लिए ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप किया जा सकता है
कनक यक्षिणी साधना विधि kanak sadhna
कनक यक्षिणी साधना विधि kanak yakshini sadhna तो अगर आप कनक यक्षिणी की साधना करते हैं तो उसके लिए आपको जो है यह साधना आपको किसी भी अमावस्या से आपको शुरू करनी है और रात्रि के 1:00 बजे आपको एकांत और निर्जन वन में इसकी साधना करनी पड़ेगी तरीके से होती है मंत्र को आपको जो है इस मंत्र को आपको जाप करना है और मंत्र आपका 150000 जपने सिद्ध हो जाएगा डेढ़ लाख आपको इस मंत्र का जाप करना होगा 21 दिनों के भीतर किस भी दिनांक तक आपको लगातार जो इसकी साधना करनी है और 21 दिनों के बाद यह मंत्र आपका सिद्ध हो जाएगा यक्षिणी आपको दर्शन देगी!
अब मैं बताता हूं इस साधना को करने के बाद आपको किस प्रकार से यक्षिणी के दर्शन होंगे यह खतरानाक कितनी मानी जाती है और इस का रूप भयानक होता है यह ६० साल की औरत के रूप में आती है है जब यक्षिणी आती है आपकी साधना को आज किसके आते ही मल मूत्र की वर्षा शुरू हो जाती है कि आपको ऐसा नजर आएगा कि लेट्रिन और मल और पेशाब यह सब चारों तरफ आपके गिर रही है आपके ऊपर गिर रही है यह जो है हार्ड अर्मास की माला धारण किया
कनक यक्षिणी साधना सवरूप kanak yakshini sadhna
वह आपकी तरफ आती है कंधे की हड्डी और मांस की बनी हुई जो है !वह योग गुरु के निर्देशन में ही करनी चाहिए और साधना इसकी सफल जरूर होती है ! इसलिए योग गुरु के निर्देशन में ही करेंगे तो भी तो ही आपको जो है सफलता मिलेगी और उसकी शक्ति को आप सह पाएंगे नहीं तो यह भयानक जो है आती है रूप है यह 60 वर्ष की
बुढ़िया के समान नजर आती है और सिर पर जिसके मतलब सारे बाल जो हैं आपको इसके सफेद सफेद से दिखाई पड़ते हैं बालों में आते ही नजर आती है ! और हाथ पैरों में केवल हड्डियों का ढांचा आपको नजर आएगा बुढ़िया स्त्री के रूप में दिखाई पड़ेगी !और मुंह में एक दांत भी नहीं दिखता है !
जब भी आती है तो ऐसे नजर आता कि इसके मुंह में एक भी दांत नहीं है !और सारे बदन और क बालों पर झुर्रियां पड़ी हुई दिखती है ` और बदल की लंबाई अधिक दिखाई पड़ती अत्यधिक इसकी जो है लंबाई अत्यधिक है तो यह बहुत ही खतरनाक रूप दिखाई पड़ता है
कनक यक्षिणी साधना के लाभ kanak yakshini sadhna
कनक यक्षिणी साधना के लाभ kanak yakshini sadhna इसकी साधना करने के बाद या इसको विदा करने के बाद तुरंत आप किसी बड़ी देवी देवता की साधना कर ले नहीं तो यह आपकी हालत बहुत खराब कर देगी ! इसकी सिद्धि जो है ज्योतिषियों के लिए भूत भविष्य वर्तमान जानने के लिए !और हर प्रकार के उत्तर प्रश्नों का जवाब जानने के लिए की जाती है !
आपको हर प्रकार की बातें गोपनीय विद्या और अजीब अजीब दुनिया के रहस्य भूत प्रेतों से मुलाकात और ऐसे ही अन्य लोगों से आपकी बहुत ज्यादा संपर्क करवा देती है! यह आपके जो है सभी सवालों का जवाब दे देती हैं आप इसे जो भी पूछते हो यह बताती रहती है उसे और जिसे कर्ण पिशाचिनी साधना है यह उसी तरह की भी साधना इस शैक्षणिक की मानी जाती है और हमेशा जो है यह आपके उसी तरह कान में बताती है जैसे कर्ण पिशाचिनी बताती हैं
आपको ठीक उसी तरह यह भी आपके कान में आपके प्रश्नों का जवाब बता देती है !नहीं तो आपके मन में एक बार डाल देती है !जिससे आपको जो है आपको बात पता चल जाती है दोनों तरह से ही आपको यह आपके प्रश्नों का हर व्यक्ति के प्रश्नों का जवाब देती है ! घटना के बाद आदमी जो है पैसे उसके पास बहुत सारे आने लगते हैं ! और वह धन का बहुत बड़ा मालिक बन जाता है !
यह आपको कामुक बना देती है स्त्रियों से संसर्ग आपका करवाती है ! आप धीरे-धीरे गलत चीजों में फंसते चले जाते हो इसलिए इस शक्ति को अपने कंट्रोल में रखना बहुत जरूरी है ! अगर कोई उसकी साधना करता है तो उसे अपने इस को कंट्रोल में रखना बहुत जरूरी है ,नहीं तो यहां यह आप उसको जो नुकसान पहुंचा देगी ! और शक्तियां तो बहुत देती है लेकिन यह जो नुकसान पहुंचाए इसलिए अगर बड़े देवी देवता की साधना अगर आप साथ में नहीं करते हो तो आपके लिए मुश्किल हो सकती है! इसकी सिद्धि के बाद आप बड़े देवी देवताओं की साधना जरूर करें ताकि इसका प्रभाव न पड़े
पीपल यक्षिणी वशीकरण साधना pipal yakshini sadhana ph. 85280 57364 गुरु मंत्र साधना डॉट कॉम तथा शास्त्रों में कहीं गई ज्ञानवर्धक जानकारी के माध्यम से अपना जीवन सफल बनाने के इच्छुक हैं !या आप इन चीजों में रूचि रखते हैं तो आप हमारे वेबसाइट को allow करो !
तथा इसके बाद बेल या घंटे की आइकन को दबाना ना भूले हमारे वेबसाइट में अपलोड की गई !कोई भी नई साधना की जानकारी आप तक आसानी से सूचना या नोटिफिकेशन के माध्यम से आपके मोबाइल या कंप्यूटर पर पहुंच जाएगी ! हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना बिल्कुल फ्री है तो हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें!
और अपने जीवन को सुखमय बनाए है जैसा कि आप सब जानते ही होंगे यह मान्यता है, कि पीपल पेड़ पर 33 कोटि देवी-देवताओं का निवास होता है! श्री डाकिनी शाकिनी भूत प्रेत इत्यादि आंखों में पीपल पेड़ के साथ जोड़ा जाता है! इसलिए पीपल पेड़ से संबंधित जितने सारे तंत्र मंत्र टोने टोटके आपको मिलेंगे अन्य पेदो२ पर नही मिलेगे ! दोस्तों आज हम जानेंगे वशीकरण प्रयोग इस प्रयोग में वशीकरण हेतु शक्ति को आवाहन किया जाता है !
पीपल यक्षिणी वशीकरण साधना विधि pipal yakshini sadhana ध्यान रहे कोई भी वशीकरण प्रयोग वाममार्गी या अघोरी वशीकरण प्रयोग को पूरी सावधानी से करनी चाहिए !सिर्फ आजमाने के लिए प्रयोग ना करें !साधना में कौन-कौन सी सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी ! तो इसमें आपको चाहिए थोड़ा मांस का टुकड़ा चोमुखा दीपक चमेली का तेल दो सुपारी तथा चार लोंग यह सामग्री को लेकर किसी पुराने पीपल वृक्ष के पास चले जाएं आपको किसी अमावस्या को रात्रि 10:00 से 2:00 के मध्य ही करनी हैं करने के लिए ऐसे समय का चयन करें जब उस पेड़ के आसपास हमको यह प्रयोग करते हुए देखे न
पीपल समक्ष पहुंचकर उस चौमुखी दीपक में चमेली का तेल डालकर रोईया सूती कपड़े के 32 से उसे जलाएं इस दीपक को चार दिशाओं की ओर करके पेड़ के नीचे जमीन पर रख दे !उस दिए को इस प्रकार रखें कि उसका एक मुख दक्षिण दिशा की ओर हो दूसरा मुक्त पश्चिम दिशा की ओर हो दो सुपारी तथा चार लोंग को दीपक के तेल में छोड़ दे इसके दक्षिण की ओर मुख करके खड़े हो जाए के बाद दिखाए गए मंत्र को ११०८ बार जप करें इसमें मंत्र का सटीक उच्चारण करना अत्यंत आवश्यक है इसलिए ध्यान पूर्वक सुनिए मंत्र है
पीपल यक्षिणी वशीकरण साधना मंत्र pipal yakshini sadhana mantra
ध्यान रहे कि जब तक मंत्र जब चलता रहे दिया जलता रहे यानी जब भी उसमें तेल खत्म होने को आए तब फिर से चमेली का तेल उसमें डाल दे जप खत्म होने के पश्चात उस दिए में से एक लॉन्ग अपने साथ वापस ले आए वापस आते समय पीछे मुड़कर ना देखें चाहे! किसी भी प्रकार का आवाज ही क्यों ना सुनाई दे यह अत्यंत आवश्यक चेतावनी है ! जो लोंग आप लेकर आये वो किसी भी स्त्री या पुरुष को खिलाया जाएगा सदा के लिए आपका हो जाएगा ! यदि किसी व्यक्ति स्त्री या पुरुष फेंक कर भी मारा जाए तो वह बस में हो जाएगा लेकिन इस पर ध्यान रखने वाली बात यह है कि फेंकते समय अपने बाएं हाथ का ही इस्तेमाल करें! इस मंत्र में अमुक का पर्योग नहीं किया गया है इसका मतलब है कि इस प्रयोग को करते समय किसी विशिष्ट व्यक्ति का नाम लेने की आवश्यकता नहीं है! आप जिसे चाहे उसे वश में कर सकते हैं!