Year: 2022

तांत्रिकों की इष्ट देवी माँ तारा का रहस्य Tara Rahasya, Ph. 85280 57364

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Maa Tara Rahasya माँ तारा साधना रहस्य और ऐतिहासिक तथ्य ph. 8528057364

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gold and red hindu deity statue

 

तांत्रिकों की इष्ट देवी माँ तारा का रहस्य Tara Rahasya, Ph. 85280 57364  तंत्र साधकों, विशेषकर शाक्त सम्प्रदाय से सबंध रखने वाले तांत्रिकों के लिये दस महाविद्याओं की साधनाएं सम्पन्न करना अति आवश्यक है। इन दस महाविद्याओं को पूर्ण रूप से सिद्ध करने के बाद ही वह आगे पथ पर अग्रसर हो पाते हैं और सम्पूर्णता के साथ दिव्य आनन्द की अनुभूति प्राप्त कर पाते हैं। तंत्र साधना की इन दस महाविद्याओं में ‘तारा महाविद्या’ का अपना विशिष्ट स्थान रहा है। इसलिये तांत्रिकों के लिये तारा महाविद्या की साधना सबसे श्रेष्ठ और अद्भुत एवं प्रभावपूर्ण मानी गयी है।

इस महाविद्या को पूर्णतः से सिद्ध करते ही तांत्रिक महातांत्रिकों की कतार में सम्मिलित हो जाता है। फिर उस साधक के लिये कुछ भी अगम्य और अबोध नहीं रह जाता। प्रकृति उसकी कल्पना और इच्छा मात्र से संचालित होने लग जाती है। यद्यपि तारा महाविद्या को पूर्ण रूप से स्वयं में आत्मसात कर पाना अपवाद स्वरूप ही किसी तांत्रिक के वश की ही बात होती है। इसीलिये बहुत कम साधक ही तंत्र क्रिया के माध्यम से तारा महाविद्या को पूर्ण रूप से साथ साधने में सक्षम हो पाये हैं । भगवान राम के कुल पुरोहित वशिष्ठ जी को इस महाविद्या का प्रथम तंत्र साधक माना जाता है ।

लंकाधिपति रावण ने भी तारा महाविद्या की साधना की थी। वर्तमान युग में बंगाल के प्रख्यात तंत्र साधक वामाक्षेपा, कामाख्या के महातांत्रिक रमणीकान्त देवशर्मन, नेपाल के सुप्रसिद्ध तांत्रिक परमहंस देव आदि ही कुछ ऐसे तांत्रिक हुये हैं, जो तारा महाविद्या की दिव्य अनुभूतियां प्राप्त कर पाने में सफल हो पाये हैं। बंगाल के तांत्रिक वामाक्षेपा के संबंध में तो ऐसी किंवदंतियां प्रचलित रही हैं कि वह माँ की उपासना में इतने अधिक तल्लीन रहते थे कि उन्हें हफ्तों और कभी-कभी तो महीनों तक स्वयं की कोई सुध-बुध नहीं रहती थी।

https://www.youtube.com/watch?v=wIGWIBmZAFg&pp=ygUSbWFtYSDgpKTgpL7gpLDgpL4g

इस शमशानवासी तांत्रिक की दयनीय हालत जब माँ से सहन नहीं होती थी, वह स्वयं आकर अपने प्रिय भक्त को अपना स्तनपान कराया करती थी । तांत्रिक देवशर्मन के संबंध में भी अनेक अद्भुत बातें प्रचलित रही हैं । शाक्त तांत्रिकों की इन दस महाविद्याओं की साधनाओं में जो साधक गहरी रुचि रखते हैं और जो इन महाविद्याओं को स्वयं में आत्मसात करना चाहते हैं, इन महाविद्याओं को सिद्ध करना चाहते हैं, उन सभी को एक बात ठीक से समझ लेनी चाहिये कि आज के जो तथाकथित तंत्र गुरु इन महाविद्याओं की साधना के संबंध में जो दिवास्वप्न दिखाते हैं, वह सब वास्तविकता से बहुत दूर की चीजे हैं।

वास्तव में तो वह स्वयं भी किसी वास्तविक अनुभूति की प्रक्रिया से नहीं गुजरे होते हैं। उनकी सम्पूर्ण बातें पुस्तकीय पाठन, मानसिक सृजन और काल्पनिक बीज से अंकुरित होती हैं। तंत्र साधकों द्वारा जो मुण्डमाला तंत्र, चामुण्डा तंत्र, शाक्त प्रमोद तारा तंत्र जैसे अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं, उनमें दस महाविद्याओं के रूप में माँ तारा का द्वितीय स्थान रखा गया है । इन्हें विश्वव्यापिनी आद्यशक्ति का द्वितीय रूपान्तरण माना गया है, जो स्वयं को अनंत- अनंत रूपों में विभाजित करके सृष्टि की रचना और पोषण का कार्य देखती है ।

इसलिये यह महाविद्या सृजन शक्ति से सदैव सम्पन्न रहती है। तंत्र साहित्य में माँ तारा की साधना, पूजा-उपासना और तांत्रिक अनुष्ठानों पर बहुत विस्तार से प्रकाश डाला गया है। माँ तारा के ऐसे अनुष्ठानों को सम्पन्न करके अनेक प्रकार की पीड़ाओं तथा कष्टों से सहज ही मुक्ति मिल जाती है और माँ के साधक सहज ही विभिन्न प्रकार के भौतिक सुख, साधनों की प्राप्ति कर लेते हैं। इतना ही नहीं, इस महाविद्या की साधना के माध्यम से परमात्मा का सहज साक्षात्कार पाकर मुक्ति लाभ भी सहज एवं सम्भव हो जाता है।

माँ तारा का स्वरूप आद्य जननी महाकाली से बहुत साम्य रखता है । यद्यपि यह कज्जल सी काली न होकर गहरे नीले वर्ण वाली है । इसलिये इन्हें ‘नील सरस्वती’ भी कहा जाता है। माँ का यह नीला रंग अनन्त, असीम सीमाओं और क्षमताओं का प्रतीक है। माँ की इन असीम, अनंत क्षमताओं की वास्तविक अनुभूति इनकी साधना के माध्यम से ही प्राप्त हो पाती है । अतः द्वितीय महाविद्या के रूप में माँ तारा अनंत, असीम संभावनाओं की प्रतीक है। तारा की तंत्र साधना और उनके तांत्रिक अनुष्ठानों के विषय में गहराई से जानने से पहले अगर ‘तंत्र’ और ‘तंत्र की सीमाओं’ के विषय में थोड़ा जान लिया जाये तो अधिक उपयुक्त रहेगा, क्योंकि इससे तंत्र के वास्तविक रूप विशेषकर तांत्रिकों की महाविद्याओं और उनकी अनुकंपा के प्रसाद स्वरूप प्राप्त होने वाले फलों को समझने में सहजता रहेगी।

 

 

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जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism

 

जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism
जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism

जैन धर्म में तारा साधना रहस्य Tara Sadhana Mystery in Jainism : तारा महाविद्या की साधना तंत्र साधकों के अतिरिक्त बौद्ध भिक्षुओं और जैन साधकों भी खूब प्रचलित रही है । अगर बात जैन धर्म की की जाये तो प्राचीन समय से ही जैन मतावलम्बियों में माँ तारा की उपासना होती आ रही है। दरअसल जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकरों की मान्यता है और उन्हीं के अनुसार चौबीस तीर्थंकरों की चौबीस शासन देवियां मानी गयी हैं। इन देवियों को जिन शासन में शीर्ष स्थान प्रदान किया गया है। जैन धर्म में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को स्वीकार किया गया है और उसी प्रकार भगवान ऋषभदेव के शासन की प्रभाविका देवी चक्रेश्वरी मानी गयी है। जैन धर्म में आठवें तीर्थंकर के रूप में चन्द्रप्रभु की मान्यता है और उनकी शासन देवी ज्वाला मालिनी देवी मानी गयी ।

इसी प्रकार बाइसवें तीर्थंकर की मान्यता भगवान नेमिनाथ को दी गई है और उनकी शासन देवी का स्थान अम्बिका को दिया गया है । तेइसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ माने गये हैं और उनकी शासन प्रभाविका देवी के रूप में ही माँ तारा की प्रतिष्ठा माता पद्मावती के रूप में की गयी है। जैन धर्मावलम्बियों में देवी पद्मावती के रूप में माँ तारा की पूजा, अर्चना, आराधना से इहलोक के साथ-साथ परलोक संबंधी समस्त सुख, वैभवों की प्राप्ति की मान्यता रही है। माता पद्मावती के प्रति भक्ति और उनके आशीर्वाद की गौरव गाथा जैन ग्रंथों में यत्र- तत्र विपुल मात्रा में उपलब्ध है। यहां एक ओर लोकेषणा (सांसारिक इच्छाओं की प्राप्ति) के लिये माँ की पूजा-अर्चना की जाती है, वहीं दूसरी ओर बड़े-बड़े जैन मुनियों ने अलौकिक एवं दिव्य आनन्द की प्राप्ति के लिये कल्याणमयी माँ पद्मावती को अपनी आराधना का अंग बनाया । 

 

ऐसे उल्लेख मिलते हैं कि प्रसिद्ध जैन मुनि हरिभद्र शूरि ने अम्बिका देवी को प्रसन्न करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया, तो वहीं दूसरी ओर आचार्य भट्ट अकलंक ने माता पद्मावती को प्रसन्न करके उनसे वरदान ग्रहण किया । आचार्य भद्रबाहू स्वामी ने एक व्यंतर (देव) के घोर उपसर्ग से आत्मरक्षा के निमित्त माँ पद्मावती की अभ्यर्थना की थी । एक अन्य जैन श्रुति के अनुसार श्रृणुमान, गुरुदत्त तथा महताब जैसे जैन श्रावकों पर भी मा पद्मावती की सदैव विशेष अनुकंपा बनी रही 1 माता पद्मावती को विभिन्न नामों से स्मरण किया जाता है, जिनमें सरस्वती, दुर्गा, तारा, शक्ति, अदिति, काली, त्रिपुर सुन्दरी आदि प्रमुख हैं। माता पद्मावती की स्तुति, भक्ि के लिये जैन ग्रंथों में विपुल स्तोत्र साहित्य उपलब्ध है ।

इनकी स्तुति एवं भक्ति समस्त दुःखों का शमन करने वाली, प्रभु का सान्निध्य, सामीप्य के साथ-साथ दिव्य आनन्द प्रदान करने वाली संजीवनी मानी गयी है । विभिन्न स्तोत्रों के रूप में माता पद्मावती की पूजा- अर्चना भक्त हृदयों का कंठहार बन गयी है । पार्श्वदेव गणि कृत भैरव पद्मावती कल्प स्तोत्र में कहा गया है कि माता पद्मावती की आराधना से राज दरबार में, शमशान में, भूत-प्रेत के उच्चाटन में, महादु:ख में, शत्रु समागम के अवसर पर भी किसी तरह का भय व्याप्त नहीं रहता । सांसारिक इच्छाओं से अभिभूत होकर बहुत से लोग माँ की पूजा-अर्चना में निमग्न होते हैं, लेकिन जब वह लौकिक भक्ति के साथ विशेष अनुष्ठान (तांत्रिक पद्धति) से करते हैं, तो उनका अनुष्ठान अलौकिक रूप धारण कर लेता है ऐसी अवस्था में साधक की भक्ति मंगललोक में प्रवेश कर जाती है, जैसे सौभाग्य रूप दलित कलिमलं मंगल मंगला नाम अर्थात् माता सौभाग्य रूप है तथा कलियुग के दोष हरण कर उत्कृष्ट मंगल को प्रदान करने वाली है।

तंत्र की भांति ही जैन धर्म भी माता पद्मावती का चतुर्भुजधारी रूप स्वीकार किया गया है। माता पद्मावती की प्रत्येक भुजा में क्रमशः आशीर्वाद, अंकुश, दिव्य फल और चतुर्थ भुजा में पाश (फंदा) माना गया है। माँ की इन भुजाओं का विशेष प्रतीकात्मक अर्थ है। जैसे माँ का प्रथम वरदहस्त समस्त प्राणी जगत को आशीर्वाद का संकेत प्रदान करता है। दूसरी बाजू में अंकुश है जो इस बात का प्रतीक है कि साधक को प्रत्येक स्थिति में अपने ऊपर अंकुश (संयम) बनाये रखना चाहिये। तीसरी बाजू में दिव्य फल भक्ति के फल को प्रदान करने वाला है, जबकि चतुर्थ बाजू में पाश प्रत्येक प्राणी को कर्मजाल से स्वयं को सदैव के लिये बचाये रखने के लिये प्रेरित करता है 

जैनधर्म में माता पद्मावती का वाहन कर्कुट नाग माना गया है। यह भी तांत्रिकों की भांति माँ के रौद्ररूप का परिचायक है । कर्कुट नाग का अर्थ विषैले नाग से है। यह पापाचारियों के लिये दण्ड का चिह्न है। माता पद्मावती पार्श्वनाथ की लघु प्रतिमा को अपने शीश पर धारण किये रहती हैं । गुजरात में मेहसाणा के पास मेरी एक जैन मुनि से भेंट हुई थी, जो पिछले लगभग चालीस सालों से माँ पद्मावती की साधना करते आ रहे हैं। उन्होंने तांत्रिक पद्धति से माँ का साक्षात्कार प्राप्त करने में सफल्ता प्राप्त की है । इन जैन मुनि के आशीर्वाद मात्र से चमत्कार घटित होते हुये देखे गये हैं ।

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Panchanguli sadhana – चमत्कारी प्राचीन त्रिकाल ज्ञान पंचांगुली साधना रहस्य ph.85280 57364

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Panchanguli sadhana – चमत्कारी प्राचीन त्रिकाल ज्ञान पंचांगुली साधना रहस्य ph.85280 57364

Panchanguli sadhana – चमत्कारी प्राचीन त्रिकाल ज्ञान पंचांगुली साधना रहस्य ph.85280 57364 गुरुमंत्र साधना। कॉम  में स्वागत है ! आज हम फिर तिरकाल ज्ञान साधना के ऊपर वीडियो लेकर आया हु ! जो तिरकाल ज्ञान की सब से मशहूर साधनो में से एक है जिस का नाम पंचागुली विद्या ! तिरकाल ज्ञान की जानकारी के लिए हमारे  ऋषि मोनीओ ने बहुत सारे  ग्रंथो और साधनाओ की रचना की है ! 

इस काम में हमारे  ऋषि मोनीओ ने बहुत योगदान पाया है महर्षि भृगु और ऋषि पराशर  जी ने  जी ने    ज्योतिष  विद्या का   निर्माण किया ! भूत भविष्य वर्तमान जानने के बहुत सारे  माध्यम  है कोई  ज्योतिष  विद्या  से  जनता है  कोई  आज्ञा चक्र के माध्यम  से जनता है सब के काल ज्ञान की साधना के अलग अलग माध्यम  हसत रेखा देखता है इन सब से श्रेष्ठ माध्यम  साधना का है !

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  • पंचांगुली साधना रहस्य
  • पंचांगुली साधना  काल ज्ञान जानने का फायदा

 

 

ज्योतिष  विद्या  डेट ऑफ़ बर्थ पर और  आप के  जनम समय  पर काम करती है  जिस के पास अपना सही डेट ऑफ़ बर्थ नहीं है तो उस के लिए  समस्या है ! जायदातर लोगो के पास सही डेट ऑफ़ बर्थ नहीं होता ! वहां ज्योतिष  विद्या काम नहीं करेगी ! ज्योतिष  में  यह  नहीं बताया जाता है फलानी तरीक को इतने समय में तुम्हारा काम होगा ! ज्योतिष समय और तरीक  नहीं बताया जाता ! इस लिए  ज्योतिष  का ज्ञान कुछ हद तक ही है !

मैं किसी विद्या को श्रेष्ठ साबित करना नहीं  है सब विद्या अपनी जग़ह सही है ! सब विद्याऐं भगवन के द्वारा बनी गई  है ! सब विद्या श्रेष्ठ  है सही है पर हर विद्या की एक लिमिट होते  है ! उस के आगे   वो विद्या काम नहीं कर सकती ! तंत्र विद्या की कुछ साधनाओ के द्वारा आप  जान सकते है  और बहुत बारीकी से इन साधनो के बरेव में मैंने बहुत सरे वीडियो और जानकारी   अपने   यूट्यूब चॅनेल गुरु मंत्र साधना और अपनी  वेबसाइटgurumantrasadhna.com में दी है  आप मेरे चैनल  और मेरी वेबसाइट में देख जिन में मैंने करन पिशाचिनी साधना , मां दुर्गा तिरकाल ज्ञान साधना , वाराही तिरकाल ज्ञान साधना , इन साधनो पर मैंने वीडियो बनाए है ! तो अगर आप ने वो वीडियो नहीं देखा तो आप वो सब वीडियो जरूर देखे ,

आज भूत भविष्य वर्तमान जानने की और विद्या के बारे में जानकारी प्रदान करेंगे जिस का नाम पंचगुली है विद्या है पंचागुली का अर्थ है पंच उंगली  हाथ की पांच उंगलिओ से है  ! हमारे इन हाथो में बहुत कुछ छिपा है हमारा अच्छा बुरा इन में बहुत सारी रेखाएँ  है जिन में हमारे ज़िंदगी का सब हाल है पर इस सब को हर इंसान नहीं पढ़ सकता है इसे  केवल पंचागुली देव्वी की किरपा से जान सकते है !

आप की ज़िंदगी में कब क्या  होने वाला है सबा जाना जा सकता है किस वयक्ति को किया रोग है या भविष्य में क्या रोग होगा सब जान सकते है किसी वयक्ति को क्या रोग है या आने वाले टाइम में क्या रोग होगा  सब जान सकते है एक संन्यासी  फ़्रांस  आकर वो भारत में सिद्ध ऋषि मुनिऔ का सान्ध्य  में रहे  और उन ऋषि मुनीओ  से पंचगुली महाविद्या ज्ञान लिया और विश्व  में विखायती  को प्रपात करा उनका नाम है कीरो  और वो किसी का भी भूत भविष्य बता देते थे उन की चर्चा चारो और फेल चुकी थी !

  पर्दे में छिपे व्यक्ति के हाथ बाहर निकलवा करके भी कह देते थे अली जावेद का हाथ है यह महारानी विक्टोरिया का हाथ है  उसको यह रोग है या यह ररोग होने वाला है और यह दुर्घटना घटित  होने वाली है ! उन की लाखों  पुस्तकें  मार्किट में मिल जाऐगी !  पंचांगुली विद्या की और उसके संपर्क में आने से ही वह विश्वविख्यात हो गए !

पंचांगुली साधना  काल ज्ञान जानने का फायदा

पंचांगुली साधना  काल ज्ञान जानने का फायदा – काल ज्ञान अगर आप को पता है तो अगर भविष्य  होना लिखा है तो आप पहले से सावधान हो जाओगे और उस कर्मी को जायदा सेजयदा पूजा पाठ कर के  टाल  सकते हो ! इस का यह सबसे पहला फायदा है ! पूजा path से बड़े से बड़ा कर्म काटा  जा सकता है !

गुरु जी के चार से पांच  शिष्य  थे   तो हमारे इलावा सुरेश भी था  उस की पत्नी भी गुरु जी से दीक्षित थी ! जब भी गुरु जी हमारी शहर में आते तो वो गुरु जी से मिलने के लिए  अक्सर आती  आते समय कुछ ले कर आती  गुरु जी जब चार पांच दिन के लेया ही हमारे शहर में रुकते थे ! उन के  शिष्य और उनके सज्जन मित्र  मिलने के लेया आते तो उनके चाये  पानी का इंतजाम  सुरेश   की पत्नी करती ! एक दिन सुरेश की पत्नी ने गुरु जी को हाथ देखने के लिए  कहा   गुरु जी को पंचागुली  महाविद्या  सिद्ध  थी   गुरु जे  हाथ देख कर बताया के तुम्हारे ऊपर १४ दिन के भीतर एक ऐसा संकट आने वाला है !  

जो तुम्हारी ज़िंदगी में पहले भी चूका है वही दुबारा  फिर से होगा !  सुनकर घबराई और गुरुदेव से इस का समाधान पूछने लगी तो गुरु जी ने उन को एक लाची दाना दिया जब भी तुम्हे  परेशानी हो तो तुम इस से खा लेना ! तो उस का ४ , ५, दिन बाद उस को दिमाग का बुखार हो गया जो सब से खतरनाक था तो गुरु जी की दिया  गया लाची  दाना खाया वो  एक दम  ठीक हो गई ! पंचागुली विद्या के माध्यम से आप शरीर के होने वाले रोग और उसका कारन सब जान सकते है ! पंचांगुली साधना का इस्तमाल हमारे ऋषि मुनी आयुर्वेद में भी करते थे  पंचागुली विद्या  एक बहुत बड़ा  सिद्धि है!

पंचगुली साधना विद्या को सिद्ध कैसे करे

पंचगुली साधना विद्या को सिद्ध कैसे करे इस साधना को सिद्ध करने के लेया आपके पास पंचागुली यन्त्र और पंचागुली दीक्षा लेना जरूरी है  साथ में अच्छे गुरु का मार्गदर्शन जरूरी है ! और उस बाद आप  की मेहनत  जरूरी है तब जाकर आप सफल हो सकते है ! साधना करना इतना आसान काम नहीं है ! अगर आप यह साधना करना चाहते है तो आप हम से  संपर्क  कर सकते है जय महाकाल

 

इस साधना की जानकारी के लिए  या दीक्षा प्रपात करने के लिए  फ़ोन करे  85280 57364

पंचांगुली शाबर मंत्र 

ॐ नमो पंचांगुली पंचांगुली परशरी परशरी माता मयंगल
वशीकरणी लोहमय दंडमणिनी चौसठ काम विहंडनी
रणमध्ये राउलमध्ये शत्रुमध्ये दीवानमध्ये भूतमध्ये
प्रेतमध्ये पिशाचमध्ये झोंटिंगमध्ये डाकिनीमध्ये
शंखिनीमध्ये यक्षिणीमध्ये दोषिणीमध्ये शेकनीमध्ये
गुणीमध्ये गरुडीमध्ये विनारीमध्ये दोषमध्ये
दोषाशरणमध्ये दुष्टमध्ये घोर कष्ट मुझ ऊपर बुरो जो
कोई करे करावे जड़े जडावे तत चिन्ते चिन्तावे तस
माथे श्री माता श्री पंचांगुली देवी तणो वज्र निर्धार पड़े
ॐ ठं ठं ठं स्वाहा

 

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Panchanguli – काल ज्ञान देवी पंचांगुली रहस्य विस्तार सहित Ph. 85280 57364

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Panchanguli – काल ज्ञान देवी पंचांगुली रहस्य विस्तार सहित Ph. 85280 57364

 Panchanguli – काल ज्ञान देवी पंचांगुली रहस्य विस्तार सहित Ph. 85280 57364 प्रणाम संपूर्ण ब्रह्मांड अज्ञात शक्ति के द्वारा चलता है जिसे हम ब्रह्मा कहते हैं । ब्रह्म आधार ईश्वर सर्वत्र समान व्याप्त होते हुए भी इस समस्त ब्रह्मांड से दूर है । उसी ब्रह्म के विस्तार को हमने माया के रूप में जाना है और माया की निरंतरता कछु प्रतीक है ।

 माया का जो प्रथम शस्त्र है उसे काल कहा जाता है । अर्थात समय निरंतर बहता है 3 वर्ष कोई नदी निरंतर बहती रहती हो । निर्वाचन किस समय कभी निश्चित है ब्रम्हांड बना समय की उत्पत्ति हुई पिछले कल भी था अभी भी है और आने वाले कल में भी होगा वही काल कहलाता है । इस कॉल को समझना साधक के लिए परम अनिवार्य तत्व कहा गया है अगम निगम दोनों ही ग्रंथों में काल स्वयंसेवक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं

 

महाकाल कौन है प्रथम देव है । स्वयं को इस काल के उस पार जाने का ज्ञान देते हैं । जिनके भीतर एक ऐसी दिव्य शक्ति निहित है । कि वह साधक को त्रिकाल का ज्ञान देने में सर्व समर्थ होते हैं । वर्तमान काल को हमें कैसे जीना चाहिए । पुराना भूतकाल होने लगे तो वह एक उत्तम कार हो जाए आज ऐसा कौन सा कृत्य कर के आने वाले समय में सुबह ही उत्तम भविष्य हो जाए ।

ऐसे ही काल ज्ञान कहा जाता है । और ज्ञान विशेष विधि द्वारा प्राप्त होने वाला क्या है भारतीय ऋषि-मुनियों ने आदिकाल से लेकर वर्तमान युग तक सरकार की पद्धति से साधना की है । काल को जान सके ब्रह्मांड को जान सके  । इसके लिए ज्ञान नाम की विद्या प्रदान की गई है । और काल क्या समय जानना है ।अपितु काल ज्ञान का तात्पर्य है होने तक का संपूर्ण चक्र यदि समझना है ।

 

 तो हमें kaal  ज्ञान साधना करनी होगी प्रकाश ज्ञान साधना विशेषताओं में से एक साधना है । लेकिन प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक साधक का ज्ञान के विराट स्वरूप और विराट प्रपंच को सरलता से नहीं समझ पाता इतनी इतनी विराट नहीं क्यों संपूर्ण ब्रह्मांड के बारे में सोचें अपने ही बारे में सोचना चाहता है ।

 

इसीलिए दृश्यों ने इसे बहुत सूक्ष्म निकाय से शुरू किया सामुद्रिक शास्त्र उससे भी छोटे नीचे के स्तर पर उसे कहा गया हस्तरेखा मस्तिष्क विज्ञान अंक विज्ञान प्रदर्शन भविष्य दर्शन और त्रिकाल ज्ञान भूत और भविष्य का और साथ ही साथ वर्तमान का विज्ञान प्राप्त कर सकें ।इसके लिए  एक शक्ति की पूजा की गई स्वरूप की वंदना की गई है जिसे त्रिकाल का ज्ञान देने वाली कहा गया और उसे पंचांगुली कह कर संबोधित किया गया शक्ति क्या है

उसी प्रकार ब्रह्मांड में 5 अंगुलियां हैं जिन्हें हम पंचतत्व कहते हैं चित्रों को संचालित करने वाली है और जिसकी अपनी उंगलियों में पंचांगुली नाम की शक्ति है साधक को त्रिकालदर्शी बनाती है । और भविष्य का ज्ञान प्रदान करते हैं । इसीलिए काले होने की महा साधना है तंत्र में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो कम से कम काल ज्ञान और पंचांगुली साधना को संपन्ना करना चाहिए

अत्यंत जटिल और विराट विद्या इस विद्या को प्राप्त करना चाहिए। पंचांगुली देवी की साधना कैसे हो का मंत्र क्या है साधना विधान क्या है । ज्योति प्रकाश समझना चाहिए ब्रह्मांड की बात छोड़ कर यदि हम अपने शरीर को देखें तो यह भी कुछ छुपा है । हर दृष्टि हम कहीं तो हाथों की रेखाएं तो केवल किस लिए बनी है कि मैं हाथों को तोड़ मरोड़ सकूं ।

लेकिन इसके पीछे के हाथों को तोड़ मरोड़ करता है अंगुलियों की बनावट हड्डियों की बनावट त्वचा नाखून और एक रेखा आपके बारे में कुछ बताती है । बहुत बढ़िया तो उन्होंने उन्होंने शरीर पर तिल विज्ञान को ढूंढा शरीर के अंग अंग पर तिल होने पर क्या होगा ।आकृति नाथ की आकृति सर की आकृति शरीर की आकृति हाथों की रेखाओं के साथ-साथ पैरों की रेखाएं के बनावट प्रत्येक तत्वों को देखा पूर्वाभास के क्षमताओं को विचारा ।

अंत में एक महाशक्ति से जुड़ा हुआ पाया जिससे पंचांगुली कहा जाता है ।अर्थात ब्रह्मांड को अपने पांच उंगलियों पर करने वाली ब्रह्मांड को पांच उंगलियों के द्वारा संचालित करने वाले शक्ति ही पंचांगुली नाम की महाशक्ति है। पंचांगुली साधना क्यों आने वाले हैं । साधना से आपको मुद्दा गंभीरता प्रतिवेदन मिलती है कि आप पृथ्वी पर कैसे जीवन जीना हैं इसकी आपको प्राप्त होते हैं । शत्रु तो कहीं मित्र  है तो  कहीं निरंतर हो रहा है

कभी शब्द के पीछे इतने अधिक पड़ जाते हैं कि व्यक्ति विचलित होकर आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगता है । अध्यात्म के शिखर को पाना चाहता है ।तो कभी राज्य सत्ता के शिखर को प्राप्त करना चाहता है ।पर जाना चाहता है जाना चाहता है तो उनके निमित्त पंचांगुली साधना मौलिक साधना की गई करने वाला भूत वर्तमान और भविष्य की पारीक रखता है । जुड़कर भविष्य लगता है इसलिए गुरुओ का कथन है पंचांगुली साधना से व्यक्ति अपने भूत और वर्तमान को भी देख सकता है अद्भुत भारतीय साधना को कैसे सफल किया जाए ब्रह्मांड को आप जानना चाहते हैं फिर आप जीवन और मरण के बंधन को समझने के योग्य हो जाते हैं ।
आपके समस्त कष्टों का हरण करने वाली है । क्योंकि यदि आपको आज ही पता हो कि कल आपके साथ पूरा होने वाला है ।तो आप तपोबल और साधना से भविष्य को सुधारने में समर्थ हो सकते हैं । अपने जीवन में मनचाहा परिवर्तन ला सकते हैं । कुंडली में ग्रहों के दर्शाए उत्तर नहीं है तो आप से परिवर्तित कर सकते हैं यदि आपके में कोई भावना हो सकते हैं

 और आप इसी कारण पंचांगुली साधना बेहद बेहद और अत्यंत विराट साधना है देने के लिए अति संक्षेप में आपको की पंचांगुली देवी उसका साधना विधान समझाने के लिए प्रेरणादायक बताने के लिए कुछ शब्द आपको कहे  । लेकिन शब्दों में इस महाविद्या को नहीं  जान सकते। सर्वप्रथम पंचांगुली काल ज्ञान मंत्र लेना चाहिए और इत्यादि सहित अन्य मंत्रों का भी हवन करना चाहिए जिससे पंचांगुली साधना प्राप्त कर सकते हैं

कि शास्त्र सम्मत इसी प्रकार शास्त्र ने प्राचीन समय से ऋषि होने पर गुरुओं ने क्या है तो पंचांगुली साधना आप अपने जीवन में कर सकें आप अपने हाथों की रेखाओं में क्या छुपा है यह जान सके चेहरे की आकृति और बनावट में क्या छुपा है यह जान सकें और भविष्य के आने वाले समय में आपके लिए क्या छुपा सके और आने वाले वक्त को बदल सकें आशीर्वाद आपको देता हूं

 मंत्र के माध्यम से आपको देवी माता की स्तुति करनी चाहिए ।और देवी की सिद्धि के लिए प्रथम पात्रता अर्जित करने का की प्रमुख मंत्र है । इसी मंत्र से आपको पात्रता प्राप्त होगी और आप अपने गुरु के पास जाकर इस देवता को प्राप्त कर सकेंगे भूमिका में प्रणाम ओम नमः शिवाय ।

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pachaguli sadhna पंचांगुली साधना सम्पूर्ण रहस्य विस्तार सहित ph.8528057364

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pachaguli sadhna पंचांगुली साधना सम्पूर्ण रहस्य विस्तार सहित प्रणाम संपूर्ण ब्रह्मांड अज्ञात शक्ति के द्वारा चलता है जिसे हम ब्रह्मा कहते हैं । ब्रह्म आधार ईश्वर सर्वत्र समान व्याप्त होते हुए भी इस समस्त ब्रह्मांड से दूर है । उसी ब्रह्म के विस्तार को हमने माया के रूप में जाना है और माया की निरंतरता कछु प्रतीक है ।

 माया का जो प्रथम शस्त्र है उसे काल कहा जाता है । अर्थात समय निरंतर बहता है 3 वर्ष कोई नदी निरंतर बहती रहती हो । निर्वाचन किस समय कभी निश्चित है ब्रम्हांड बना समय की उत्पत्ति हुई पिछले कल भी था अभी भी है और आने वाले कल में भी होगा वही काल कहलाता है । इस कॉल को समझना साधक के लिए परम अनिवार्य तत्व कहा गया है अगम निगम दोनों ही ग्रंथों में काल स्वयंसेवक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं

महाकाल कौन है प्रथम देव है । स्वयं को इस काल के उस पार जाने का ज्ञान देते हैं । जिनके भीतर एक ऐसी दिव्य शक्ति निहित है । कि वह साधक को त्रिकाल का ज्ञान देने में सर्व समर्थ होते हैं । वर्तमान काल को हमें कैसे जीना चाहिए । पुराना भूतकाल होने लगे तो वह एक उत्तम कार हो जाए आज ऐसा कौन सा कृत्य कर के आने वाले समय में सुबह ही उत्तम भविष्य हो जाए ।

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ऐसे ही काल ज्ञान कहा जाता है । और ज्ञान विशेष विधि द्वारा प्राप्त होने वाला क्या है भारतीय ऋषि-मुनियों ने आदिकाल से लेकर वर्तमान युग तक सरकार की पद्धति से साधना की है । काल को जान सके ब्रह्मांड को जान सके  । इसके लिए ज्ञान नाम की विद्या प्रदान की गई है । और काल क्या समय जानना है ।अपितु काल ज्ञान का तात्पर्य है होने तक का संपूर्ण चक्र यदि समझना है ।

 

 तो हमें kaal  ज्ञान साधना करनी होगी प्रकाश ज्ञान साधना विशेषताओं में से एक साधना है । लेकिन प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक साधक का ज्ञान के विराट स्वरूप और विराट प्रपंच को सरलता से नहीं समझ पाता इतनी इतनी विराट नहीं क्यों संपूर्ण ब्रह्मांड के बारे में सोचें अपने ही बारे में सोचना चाहता है ।

 

इसीलिए दृश्यों ने इसे बहुत सूक्ष्म निकाय से शुरू किया सामुद्रिक शास्त्र उससे भी छोटे नीचे के स्तर पर उसे कहा गया हस्तरेखा मस्तिष्क विज्ञान अंक विज्ञान प्रदर्शन भविष्य दर्शन और त्रिकाल ज्ञान भूत और भविष्य का और साथ ही साथ वर्तमान का विज्ञान प्राप्त कर सकें ।इसके लिए  एक शक्ति की पूजा की गई स्वरूप की वंदना की गई है जिसे त्रिकाल का ज्ञान देने वाली कहा गया और उसे पंचांगुली कह कर संबोधित किया गया शक्ति क्या है

उसी प्रकार ब्रह्मांड में 5 अंगुलियां हैं जिन्हें हम पंचतत्व कहते हैं चित्रों को संचालित करने वाली है और जिसकी अपनी उंगलियों में पंचांगुली नाम की शक्ति है साधक को त्रिकालदर्शी बनाती है । और भविष्य का ज्ञान प्रदान करते हैं । इसीलिए काले होने की महा साधना है तंत्र में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो कम से कम काल ज्ञान और पंचांगुली साधना को संपन्ना करना चाहिए

अत्यंत जटिल और विराट विद्या इस विद्या को प्राप्त करना चाहिए। पंचांगुली देवी की साधना कैसे हो का मंत्र क्या है साधना विधान क्या है । ज्योति प्रकाश समझना चाहिए ब्रह्मांड की बात छोड़ कर यदि हम अपने शरीर को देखें तो यह भी कुछ छुपा है । हर दृष्टि हम कहीं तो हाथों की रेखाएं तो केवल किस लिए बनी है कि मैं हाथों को तोड़ मरोड़ सकूं ।

लेकिन इसके पीछे के हाथों को तोड़ मरोड़ करता है अंगुलियों की बनावट हड्डियों की बनावट त्वचा नाखून और एक रेखा आपके बारे में कुछ बताती है । बहुत बढ़िया तो उन्होंने उन्होंने शरीर पर तिल विज्ञान को ढूंढा शरीर के अंग अंग पर तिल होने पर क्या होगा ।आकृति नाथ की आकृति सर की आकृति शरीर की आकृति हाथों की रेखाओं के साथ-साथ पैरों की रेखाएं के बनावट प्रत्येक तत्वों को देखा पूर्वाभास के क्षमताओं को विचारा ।

अंत में एक महाशक्ति से जुड़ा हुआ पाया जिससे पंचांगुली कहा जाता है ।अर्थात ब्रह्मांड को अपने पांच उंगलियों पर करने वाली ब्रह्मांड को पांच उंगलियों के द्वारा संचालित करने वाले शक्ति ही पंचांगुली नाम की महाशक्ति है। पंचांगुली साधना क्यों आने वाले हैं ।

साधना से आपको मुद्दा गंभीरता प्रतिवेदन मिलती है कि आप पृथ्वी पर कैसे जीवन जीना हैं इसकी आपको प्राप्त होते हैं । शत्रु तो कहीं मित्र  है तो  कहीं निरंतर हो रहा है

कभी शब्द के पीछे इतने अधिक पड़ जाते हैं कि व्यक्ति विचलित होकर आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगता है । अध्यात्म के शिखर को पाना चाहता है ।तो कभी राज्य सत्ता के शिखर को प्राप्त करना चाहता है ।

पर जाना चाहता है जाना चाहता है तो उनके निमित्त पंचांगुली साधना मौलिक साधना की गई करने वाला भूत वर्तमान और भविष्य की पारीक रखता है । जुड़कर भविष्य लगता है इसलिए गुरुओ का कथन है पंचांगुली साधना से व्यक्ति अपने भूत और वर्तमान को भी देख सकता है अद्भुत भारतीय साधना को कैसे सफल किया जाए ब्रह्मांड को आप जानना चाहते हैं फिर आप जीवन और मरण के बंधन को समझने के योग्य हो जाते हैं ।

आपके समस्त कष्टों का हरण करने वाली है । क्योंकि यदि आपको आज ही पता हो कि कल आपके साथ पूरा होने वाला है ।तो आप तपोबल और साधना से भविष्य को सुधारने में समर्थ हो सकते हैं । अपने जीवन में मनचाहा परिवर्तन ला सकते हैं । कुंडली में ग्रहों के दर्शाए उत्तर नहीं है तो आप से परिवर्तित कर सकते हैं यदि आपके में कोई भावना हो सकते हैं

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 और आप इसी कारण  साधना बेहद बेहद और अत्यंत विराट साधना है देने के लिए अति संक्षेप में आपको की पंचांगुली देवी उसका साधना विधान समझाने के लिए प्रेरणादायक बताने के लिए कुछ शब्द आपको कहे  । लेकिन शब्दों में इस महाविद्या को नहीं  जान सकते। सर्वप्रथम पंचांगुली काल ज्ञान मंत्र लेना चाहिए और इत्यादि सहित अन्य मंत्रों का भी हवन करना चाहिए जिससे पंचांगुली साधना प्राप्त कर सकते हैं

कि शास्त्र सम्मत इसी प्रकार शास्त्र ने प्राचीन समय से ऋषि होने पर गुरुओं ने क्या है तो पंचांगुली साधना आप अपने जीवन में कर सकें आप अपने हाथों की रेखाओं में क्या छुपा है यह जान सके चेहरे की आकृति और बनावट में क्या छुपा है यह जान सकें और भविष्य के आने वाले समय में आपके लिए क्या छुपा सके और आने वाले वक्त को बदल सकें आशीर्वाद आपको देता हूं

 मंत्र के माध्यम से आपको देवी माता की स्तुति करनी चाहिए ।और देवी की सिद्धि के लिए प्रथम पात्रता अर्जित करने का की प्रमुख मंत्र है । इसी मंत्र से आपको पात्रता प्राप्त होगी और आप अपने गुरु के पास जाकर इस देवता को प्राप्त कर सकेंगे भूमिका में प्रणाम ओम नमः शिवाय ।

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प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364

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प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान

प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364

माँ बगलामुखी की ब्रह्मास्त्र साधना लड़ाई-झगड़ा, शत्रुओं से परेशानी, मुकदमेबाजी और न्यायालय आदि में पूर्ण विजय पाने के लिये बगलामुखी महाविद्या की पूजा-अर्चना करने, उनके अनुष्ठान सम्पन्न कराने का प्रचलन अनंतकाल से चला आ रहा है। प्राचीनकाल से ही नहीं, आधुनिक समय में भी असंख्य लोगों ने माँ बगलामुखी की कृपा से शत्रु बाधाओं एवं न्यायालय में विचाराधीन मुकदमों आदि समस्याओं पर विजय पायी है तथा अन्य नाना प्रकार की आपदाओं से मुक्ति प्राप्त की है। माँ बगलामुखी की कृपा से उनके भक्त साधारण स्थिति से उठकर असाधारण रूप से उच्च पद तक पाने में सफल हुये हैं ।

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माँ बगलामुखी की उपासना, अनुष्ठान आदि शत्रु बाधाओं के दौरान ही नहीं, अपितु अन्य अनेक कार्यों के निमित्त भी की जाती है। इनका सम्बन्ध एकाएक आर्थिक हानि से बचने, किसी अज्ञात भय से बचने, किसी के धोखे में फंस जाने, अकारण किसी के साथ लड़ाई-झगड़े में पड़ जाने, किसी अज्ञात शत्रु द्वारा परेशान किये जाने की भी समस्यायें हो सकती हैं। ऐसी समस्त प्रतिकूल स्थितियों से भी महामाई अपने साधकों को सहज ही निकाल लेती है। महामाई बगलामुखी की अनुकंपा से शीघ्र ही बिगड़े हुये काम बनने लगते हैं।

माँ बगलामुखी का दस महाविद्याओं में आठवां स्थान है। दरअसल आद्य शक्ति के दस रूप दसों दिशाओं में विद्यमान रहते हैं। उनमें दक्षिण दिशा की स्वामिनी महाविद्या बगलामुखी को माना गया है, इसलिये इनकी साधना का दक्षिण मार्ग ही अधिक प्रचलित है। शिवपुराण और देवी भागवत पुराण में शिव के दस रूपों की दस महाशक्तियां भी बताई गई हैं। यह दस महशक्तियां ही संसार में दस महाविद्याओं के रूप में पहचानी एवं पूजी जाती हैं। तंत्रशास्त्र में जगह-जगह इस बात का उल्लेख आया है कि शक्तिविहीन शिव भी शव के समान हो जाते हैं। शिव की जो भी क्षमताएं एवं शक्तियां हैं, उनके मूल में एक मात्र आद्यशक्ति ही कार्य करती है ।

शिव की दस आद्यशक्तियां हैं, जो इस प्रकार जानी जाती हैं- महाकाल शिव की शक्ति काली नामक महाविद्या है, शिव के काल भैरव रूप की शक्ति भैरवी नामक महाविद्या है, कबंध नामक शिव की शक्ति छिन्नमस्तका है, त्र्यंबकम् नामक शिव रूप की शक्ति हैं भुवनेश्वरी नामक महाविद्या, ठीक उसी प्रकार एकवक्त्र नामक महारुद्र शिव की महाशक्ति बगलामुखी नामक महाविद्या है। शिव के इस रूप को वल्गामुख शिव के नाम से भी जाना जाता है।

प्राचीन चमत्कारी उच्छिष्ट गणपति शाबर साधना Uchchhishta Ganapati  Sadhna  PH. 85280 57364

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चमत्कारी उच्छिष्ट गणपति शाबर साधना uchchhishta ganapati sadhna उच्छिष्ट गणपति शाबर साधना समय के साथ-साथ अनेक परिवर्तन अपने आप होते चले जाते हैं। यह परिवर्तन अक्सर लोगों की मानसिकता में आने वाले बदलाव के परिणामस्वरूप परिलक्षित होते हैं। आज ऐसा समय है जहां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में बहुत अधिक प्रतिस्पर्द्धा देखने में आ रही है।

इस स्थिति का जो ठीक से सामना कर पाते हैं, वे निरन्तर उन्नति करते चले जाते हैं। अनेक लोगों से बहुत आगे निकल जाते हैं। जो पीछे रह जाते हैं, वे आगे निकले लोगों के प्रति ईर्ष्या से भर जाते हैं। ऐसे में उनका एकमात्र प्रयास रहता है कि किसी भी प्रकार से उन्हें चोट पहुंचाना, उन्हें परेशान करना ।

 

इसके लिये अनेक हत्थकण्डे अपनाये जाते हैं। इन्हीं में एक हत्थकण्डा यह भी है कि किसी को झूठे केस में फंसा कर अदालतों के चक्कर काटने को विवश कर देना । अनेक लोग इन्हीं कारणों से अदालतों में फंसे नजर आते हैं। कभी-कभी तो व्यक्तिगत शत्रुता निकालने के लिये भी ऐसा गलत कार्य कर देते हैं। ऐसी स्थिति में अक्सर आम व्यक्ति ही फंसता है । कभी-कभी तो ऐसे लोग भी फंस जाते हैं जिन्होंने कभी किसी अदालत का मुंह तक नहीं देखा था । ऐसा लोगों के लिये उच्छिष्ट गणपति साधना  uchchhishta ganapat बहुत लाभदायक सिद्ध होती है ।

भगवान गणपति को समस्त प्रकार के सुख एवं वैभव देने वाले तथा कष्टों का हरण करने वाले देव के रूप में माना जाता है । इसलिये इस साधना के प्रभाव से अदालत में झूठे केसों में फंसे लोगों की समस्याओं का समाधान होने लगता है । इस साधना को अनेक साधकों द्वारा सम्पन्न किया गया है। उनमें से अधिकांश को अदालत ने सम्मान सहित बरी किया है। पाठकों के लिये इस साधना का उल्लेख कर रहा हूं ।


उच्छिष्ट गणपति  Uchchhishta Ganapati शाबर साधना विधि

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प्राचीन चमत्कारी उच्छिष्ट गणपति शाबर साधना Uchchhishta Ganapati  Sadhna 

च्छिष्ट गणपति  Uchchhishta Ganapati शाबर साधना विधि इस शाबर गणपति अनुष्ठान के लिये सबसे पहले एक वट मूल (बरगद की जड़) निर्मित गणेश प्रतिमा, पांच गोमती चक्र और एक श्वेत चन्दन माला की आवश्यकता होती है। अनुष्ठान के लिये बैठने के लिये लाल रंग का ऊनी आसन, सिन्दूर, घी, धूप, दीप, लोबान, लाल कनेर के पुष्प, लाल रेशमी वस्त्र, स्वयं के पहनने के लिये एक लाल या श्वेत रंग की धोती, केसर से रंगा जनेऊ आदि वस्तुओं की आवश्यकता रहती है ।

सबसे पहले किसी विशेष शुभ मुहूर्त जैसे कि होली, दीपावली, दशहरा अथवा ग्रहण आदि के समय किसी वट वृक्ष की जड़ खोदकर घर ले आयें और उसे गणपति प्रतिमा का रूप प्रदान करके अपने पास रख लें। उसी शुभ मुहूर्त में इस वट गणेश प्रतिमा की विधिवत् षोडशोपचार पूजा-अर्चना करके चेतना सम्पन्न कर लेना चाहिये । ऐसी चेतना सम्पन्न प्रतिमा ही अनुष्ठान को सम्पन्न करने के काम में लायी जाती है ।

यह शाबर अनुष्ठान लगातार ग्यारह बुधवार को किया जाता । इसे किसी शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि अथवा शुक्लपक्ष के किसी भी बुधवार से प्रारम्भ किया जा सकता है। अगर इस शाबर अनुष्ठान को किसी प्राचीन गणेश मंदिर में बैठकर रात्रि के समय सम्पन्न किया जाये तो तत्काल इसका प्रभाव दिखाई देने लग जाता है । यद्यपि इस अनुष्ठान को किसी तालाब के किनारे स्थित वट वृक्ष के नीचे बैठकर अथवा घर पर भी किसी एकान्त कक्ष में सम्पन्न किया जा सकता है। अनुष्ठान काल में अन्य सदस्यों का प्रवेश इस कक्ष में वर्जित रहे ।

इस शाबर अनुष्ठान के लिये रात्रि का समय उपयुक्त रहता है। इसे प्रातःकाल चार से सात बजे के मध्य भी किया जा सकता है। जिस दिन से इस अनुष्ठान को शुरू करना हो, उस दिन रात्रि के नौ बजे के आसपास स्नान करके शरीर शुद्धि कर लें। स्वच्छ श्वेत या लाल रंग की धोती शरीर पर धारण कर लें। शरीर का शेष भाग निवस्त्र ही रहे। इसके पश्चात् अपने पूजाकक्ष में जाकर लाल ऊनी आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जायें । अगर यह अनुष्ठान गणेश मंदिर में बैठकर सम्पन्न करना हो तो उस स्थिति में पूर्वाभिमुख होकर बैठना आवश्यक नहीं है । उस स्थिति में गणेश प्रतिमा के सामने मुंह करके बैठना ही पर्याप्त रहता है।

आसन पर बैठने के पश्चात् अपने सामने लकड़ी की एक चौकी रख कर उसके ऊपर लाल रंग का रेशमी वस्त्र बिछा लें। चौकी पर चांदी या तांबे की एक प्लेट रख कर उसमें केसर से एक स्वस्तिक की आकृति बनायें और उस पर चेतना सम्पन्न वट मूल निर्मित गणपति प्रतिमा को स्थापित कर दें । एक कांसे की कटोरी में घी और सिन्दूर को ठीक से मिला लें तथा अग्रांकित गणपति मंत्र का ग्यारह बार उच्चारण करते हुये पहले गणेश प्रतिमा को गंगाजल के छींटें दें और फिर उस पर सिन्दूर का लेप कर दें।

उच्छिष्ट गणपति मंत्र    Uchchhishta Ganapati MANTRA

गणपति मंत्र है- ॐ वट वरदाय विजय गणपतये नमः ।

सिन्दूर लेपन के पश्चात् उपरोक्त मंत्र का उच्चारण करते हुये गणेश प्रतिमा पर 21 लाल कनेर के पुष्प चढ़ावें । उन्हें अक्षत, पान, सुपारी और दूर्वा अर्पित करें। फिर गणेश जी पर इसी मंत्र का उच्चारण करते हुये एक-एक करके पांचों गोमती चक्र भी अर्पित कर दें।

गोमती चक्रों को अर्पित करने से पहले एक-एक लौंग, इलाइची और थोड़े से अक्षत अर्पित करें। इनके साथ ही गणपति के सामने घी का दीपक प्रज्ज्वलित करके रखें। गणपति को नैवेद्य के रूप में गुड़ और थोड़े से भुने हुये चने रखे जाते हैं। चौकी पर ही गणेश प्रतिमा के बायीं तरफ एक मिट्टी के बर्तन में गाय का जला हुआ कण्डा रखकर उसमें लोबान, सुगन्धबाला, सूखे हुये लाल गुलाब की पंखुड़ियां एवं की बार-बार धूनी दें।

तत्पश्चात् अपनी आंखें बंद करके तथा हाथों से ज्ञानमुद्रा (हथेलियों को खुला रख कर अंगुष्ठा मूल की ओर तर्जनी के प्रथम पोर का स्पर्श करना) बनाकर पूर्ण भक्तिभाव से अपनी प्रार्थना को बार-बार दोहराते रहें ।

वट मूल निर्मित यह गणपति प्रतिमा इतनी चेतना सम्पन्न बन जाती है कि जब साधक पूर्ण तन्यमयता के साथ अपनी प्रार्थना करता है, तो अनुष्ठान के प्रारम्भिक दिनों में ही वह एक विशेष प्रकार का कम्पन शरीर में अनुभव करने लग जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान अन्तिम ग्यारहवें बुधवार तक गणपति के सवा लाख मंत्रों का जाप करना होता है। अतः प्रत्येक रात्रि को कितने मंत्रों का जाप करना है, इसका निर्णय आप ही करें। इस अनुष्ठान में मंत्रजाप के लिये श्वेत चंदन माला का प्रयोग किया जाता है।

चंदन माला की जगह स्फटिक माला का प्रयोग भी किया जा सकता है। इस प्रकार के अनुष्ठानों में कभी भी पहले पूजा-पाठ के काम में लायी गई वस्तुओं का पुनः प्रयोग नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह बताया जाता है कि किसी भी तरह के अनुष्ठानों में त्रयुक्त की जाने वाली तांत्रोक्त वस्तुएं विशेष शक्ति सम्पन्न रहती हैं और उनकी यह शक्तियां पूजा-पाठ, अनुष्ठानों के दौरान प्रभावित होती रहती हैं ।

अतः प्रत्येक अनुष्ठान में सदैव नवीन चीजों को ही प्रयोग में लाना चाहिये । इनके अलावा भी कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिये। जैसे कि पूरे जपकाल के दौरान घी का दीपक निरन्तर जलते रहना चाहिये तथा मिट्टी के बर्तन में भी निरन्तर लोबान, घी आदि की समिधा अर्पित करते रहना चाहिये । जब प्रथम दिन का मंत्रजाप पूर्ण संख्या में सम्पन्न हो जाये तो एक बार पुनः अपनी प्रार्थना को गणपति के सामने दोहरा लेना चाहिये ।

तत्पश्चात् ही गणपति की आज्ञा लेकर आसन से उठना चाहिये । गणपति को जो गुड़ और भुने चने का नैवेद्य चढ़ाया जाता है। जप के पश्चात् उसमें से थोड़ा सा अंश निकाल कर मिट्टी के बर्तन की अग्नि को अर्पित करना चाहिये । उसका थोड़ा सा अंश कौये अथवा काले कुत्ते को खिला देना चाहिये तथा थोड़ा सा अंश स्वयं ग्रहण करके शेष को पानी में प्रवाहित कर देना चाहिये ।

इस शाबर गणपति अनुष्ठान का यह क्रम निरन्तर 31 दिन तक इसी प्रकार ही बनाये रखना चाहिये। यद्यपि इस अनुष्ठान के दौरान अपने सभी घरेलू अथवा व्यवसाय संबंधी कार्यों को पूर्ण रूप से जारी रखा जा सकता है, नौकरी आदि पर भी जाया जा सकता है, लेकिन पूरे अनुष्ठानकाल में पूर्ण सदाचार का पालन अवश्य करना चाहिये।

दिन में केवल एक समय सुपाच्य भोजन ग्रहण करें । ब्रह्मचर्य का पालन करें, अनुष्ठान के बीच-बीच में भी अपने अनुभवों पर गुरु के साथ विचार-विमर्श करते रहें । पूरे अनुष्ठान काल के दौरान मंत्रजाप के पश्चात् तेल का एक दीया जलाकर घर की मुण्डेर पर अथवा किसी वट / पीपल ( बेरी वृक्ष) के नीचे अवश्य रख दें। इस दीये का इस अनुष्ठान में विशेष महत्व होता है।

इस साधना क्रम को अगले ग्यारह बुधवार तक इस प्रकार से बनाये रखना चाहिये । प्रत्येक रात्रि को स्नान करके स्वच्छ श्वेत या लाल धोती पहन कर ही अनुष्ठान में बैठना चाहिये। चौकी पर एकत्रित हुई पूजा सामग्री को तथा मिट्टी के बर्तन की राख को किसी पात्र में भर कर एकत्रित करते रहना चाहिये ।

प्रत्येक दिन वटमूल निर्मित गणेश प्रतिमा को गंगाजल के छींटे मारकर घी मिश्रित सिन्दूर का लेपन करना चाहिये। मंत्रोच्चार के साथ नियमित रूप से 21 लाल कनेर के पुष्प, अक्षत, पान, सुपारी और पांचों गोमती चक्रों को पूर्ववत् अर्पित करते रहना चाहिये ।

इसके पश्चात् दीपदान करके गुड़ और भुने चने का नैवेद्य चढ़ाना चाहिये । तत्पश्चात् प्रथम दिन की भांति मिट्टी के बर्तन में आग जलाकर लोबान, लाल गुलाब की पंखड़ियां, सुगंधबाला और घी मिश्रित समिधा अर्प करनी चाहिये। इसके बाद अपनी आंखें बन्द करके और हाथों से ज्ञानमुद्रा बनाकर पूर्ण एकाग्रता के साथ अपनी प्रार्थना को बार-बार दोहराना चाहिये तथा गणपति से आज्ञा लेकर चंदन अथवा स्फटिक माला पर 4000 मंत्रजाप पूर्ण कर लेने चाहिये। जपोपरान्त की सम्पूर्ण प्रक्रिया को भी पूर्ववत् ही बनाये रखना चाहिये । आसन से उठने से पहले अपनी प्रार्थना को पुनः दोहरा लेना चाहिये तथा गणपति की आज्ञा लेकर ही आसन से उठना चाहिये ।

गणपति को अर्पित किये गये नैवेद्य का उपयोग भी पूर्ववत् करना चाहिये। साथ ही आसन से उठने के बाद तेल का एक दीप जलाकर घर की मुण्डेर अथवा वट या पीपल या बेरी वृक्ष के नीचे रख देना चाहिये। अनुष्ठान का यही क्रम है जो पूरे अनुष्ठान काल में बना रहता है ।

जिस दिन यह अनुष्ठान पूर्ण होने वाला होता है उस दिन नैवेद्य के रूप में गुड़ और भुने चनों के साथ मोतीचूर के लड्डू भी गणेश को अर्पित किये जाते हैं, साथ ही उस दिन मंत्रजाप पूर्ण हो जाने के पश्चात् 51 मंत्रों से घी की आहुतियां मिट्टी के बर्तन में दी जाती है। पांच कन्याओं को मिष्ठान आदि के साथ भोजन करवा कर एवं दान-दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

अनुष्ठान समाप्ति के पश्चात् गणपति प्रतिमा को छोड़कर शेष समस्त सामग्रियों को नये लाल रंग के वस्त्र में बांध करके बहते हुये पानी में प्रवाहित कर दिया जाता है, जबकि गणपति प्रतिमा को अपने पूजास्थल पर प्रतिष्ठित कर लिया जाता है । इस प्रकार इस शाबर गणपति अनुष्ठान को सम्पन्न करने से निश्चित ही मुकदमे के निर्णय को अपने अनुकूल बदला जा सकता है।

जब तक मुकदमे की कार्यवाही पूर्ण न हो जाये, तब तक मुकदमे की प्रत्येक तारीख पेशी से पहले पड़ने वाले बुधवार को उक्त गणेश प्रतिमा के सामने बैठकर अपना यथाशक्ति (पांच या तीन माला) मंत्रजाप के क्रम को बनाये रखना चाहिये । न्यायालय की कार्यवाही के दौरान मानसिक रूप से मंत्र का जाप करते रहना चाहिये ।


विशेष उच्छिष्ट गणपति  special Uchchhishta ganapati 

यह शाबर पद्धति पर आधारित एक अद्भुत एवं प्रभावशाली अनुष्ठान है, जिसका प्रभाव अवश्य ही सामने आता है । एक सबसे महत्त्वपूर्ण बात की तरफ आपका ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है। उच्छिष्ट गणपति की यह साधना केवल वही साधक करे जो बिना किसी विशेष कारण से अदालत में किसी मुकदमे में फंसा दिया गया हो।

ऐसे व्यक्ति की ही गणपति सहायता करते हैं और उसे अवश्य समस्याओं और दुःखों से उभार लेते हैं । जो व्यक्ति जानबूझ कर किसी अपराध में लिप्त हुआ हो अथवा कोई आदतन अपराधी प्रवृत्ति का है, वह इस साधना को न करे। अगर ऐसे व्यक्ति यह साधना करते हैं तो उन्हें लाभ प्राप्त नहीं होगा

॥ उच्छिष्ट गणपति स्तोत्र ॥

देव्युवाच ।

नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम् ।
गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभवासनं च ॥ १ ॥

केयूरिणं हारकिरीटजुष्टं चतुर्भुजं पाशवराभयानि ।
सृणिं च हस्तं गणपं त्रिनेत्रं सचामरस्त्रीयुगलेन युक्तम् ॥ २ ॥

षडक्षरात्मानमनल्पभूषं मुनीश्वरैर्भार्गवपूर्वकैश्च ।
संसेवितं देवमनाथकल्पं रूपं मनोज्ञं शरणं प्रपद्ये ॥ ३ ॥

वेदान्तवेद्यं जगतामधीशं देवादिवन्द्यं सुकृतैकगम्यम् ।
स्तम्बेरमास्यं ननु चन्द्रचूडं विनायकं तं शरणं प्रपद्ये ॥ ४ ॥

भवाख्यदावानलदह्यमानं भक्तं स्वकीयं परिषिञ्चते यः ।
गण्डस्रुताम्भोभिरनन्यतुल्यं वन्दे गणेशं च तमोऽरिनेत्रम् ॥ ५ ॥

शिवस्य मौलाववलोक्य चन्द्रं सुशुण्डया मुग्धतया स्वकीयम् ।
भग्नं विषाणं परिभाव्य चित्ते आकृष्टचन्द्रो गणपोऽवतान्नः ॥ ६ ॥

पितुर्जटाजूटतटे सदैव भागीरथी तत्र कुतूहलेन ।
विहर्तुकामः स महीध्रपुत्र्या निवारितः पातु सदा गजास्यः ॥ ७ ॥

लम्बोदरो देवकुमारसङ्घैः क्रीडन्कुमारं जितवान्निजेन ।
करेण चोत्तोल्य ननर्त रम्यं दन्तावलास्यो भयतः स पायात् ॥ ८ ॥

आगत्य योच्चैर्हरिनाभिपद्मं ददर्श तत्राशु करेण तच्च ।
उद्धर्तुमिच्छन्विधिवादवाक्यं मुमोच भूत्वा चतुरो गणेशः ॥ ९ ॥

निरन्तरं संस्कृतदानपट्‍टे लग्नां तु गुञ्जद्भ्रमरावलीं वै ।
तं श्रोत्रतालैरपसारयन्तं स्मरेद्गजास्यं निजहृत्सरोजे ॥ १० ॥

विश्वेशमौलिस्थितजह्नुकन्या जलं गृहीत्वा निजपुष्करेण ।
हरं सलीलं पितरं स्वकीयं प्रपूजयन्हस्तिमुखः स पायात् ॥ ११ ॥

स्तम्बेरमास्यं घुसृणाङ्गरागं सिन्दूरपूरारुणकान्तकुम्भम् ।
कुचन्दनाश्लिष्टकरं गणेशं ध्यायेत्स्वचित्ते सकलेष्टदं तम् ॥ १२ ॥

स भीष्ममातुर्निजपुष्करेण जलं समादाय कुचौ स्वमातुः ।
प्रक्षालयामास षडास्यपीतौ स्वार्थं मुदेऽसौ कलभाननोऽस्तु ॥ १३ ॥

सिञ्चाम नागं शिशुभावमाप्तं केनापि सत्कारणतो धरित्र्याम् ।
वक्तारमाद्यं नियमादिकानां लोकैकवन्द्यं प्रणमामि विघ्नम् ॥ १४ ॥

आलिङ्गितं चारुरुचा मृगाक्ष्या सम्भोगलोलं मदविह्वलाङ्गम् ।
विघ्नौघविध्वंसनसक्तमेकं नमामि कान्तं द्विरदाननं तम् ॥ १५ ॥

हेरम्ब उद्यद्रविकोटिकान्तः पञ्चाननेनापि विचुम्बितास्यः ।
मुनीन्सुरान्भक्तजनांश्च सर्वान्स पातु रथ्यासु सदा गजास्यः ॥ १६ ॥

द्वैपायनोक्तानि स निश्चयेन स्वदन्तकोट्या निखिलं लिखित्वा ।
दन्तं पुराणं शुभमिन्दुमौलिस्तपोभिरुग्रं मनसा स्मरामि ॥ १७ ॥

क्रीडातटान्ते जलधाविभास्ये वेलाजले लम्बपतिः प्रभीतः ।
विचिन्त्य कस्येति सुरास्तदा तं विश्वेश्वरं वाग्भिरभिष्टुवन्ति ॥ १८ ॥

वाचां निमित्तं स निमित्तमाद्यं पदं त्रिलोक्यामददत्स्तुतीनाम् ।
सर्वैश्च वन्द्यं न च तस्य वन्द्यः स्थाणोः परं रूपमसौ स पायात् ॥ १९ ॥

इमां स्तुतिं यः पठतीह भक्त्या समाहितप्रीतिरतीव शुद्धः ।
संसेव्यते चेन्दिरया नितान्तं दारिद्र्यसङ्घं स विदारयेन्नः ॥ २० ॥

इति श्रीरुद्रयामलतन्त्रे हरगौरीसंवादे उच्छिष्टगणेशस्तोत्रं समाप्तम् ।

 

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maa tara sadhna माँ तारा साधना और माँ तारा साधना के लाभ ph. 85280 57364

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maa tara sadhna माँ तारा साधना और माँ तारा साधना के लाभ ph. 85280 57364 तारा महाविद्या और उनकी साधना का रहस्य तंत्र शास्त्र में माँ तारा का उल्लेख दूसरी महाविद्या के रूप में किया गया है । शाक्त तांत्रिकों में प्रथम महाविद्या के रूप में महाकाली का स्थान रखा गया है। तंत्र में महाकाली को इस चराचर जगत की मूल आधार शक्ति माना गया है।

इन्हीं की प्रेरणा शक्ति से यह जगत और उसके समस्त प्राणी जीवन्त एवं गतिमान रहते हैं । समस्त जीवन के प्राण स्रोत माँ काली के साथ संलग्न रहते हैं । इसीलिये इस शक्ति से विहीन जगत तत्क्षण निर्जीव हो जाता है। तंत्र के अति प्राचीन प्रतीकों में महाकाली को शिव पर आरूढ़ दिखाया गया है। यह भी इसी तथ्य का प्रतीक है कि ‘शक्ति’ हीन ‘शिव’ भी निर्जीव ‘शव’ के रूप में रूपान्तरित हो जाते हैं।

महाकाली के रूप में इस आद्यशक्ति का रहस्य बहुत अद्भुत है, क्योंकि चेतना के समस्त सूत्र इसी महाशक्ति में समाहित रहते हैं । इसीलिये महाकाली का ‘श्याम’ रूप माना गया है। जिस प्रकार सभी तरह के रंग काले रंग में विलीन हो जाते हैं, ठीक वैसे ही समस्त जगत काली में समाहित हो जाता है 

जो साधक महाकाली को पूर्णत: समर्पित हो जाता है, उस साधक के समस्त कष्टों का माँ काली स्वतः ही हरण कर लेती है । इसीलिये महाकाली को समर्पित साधक समस्त प्रकार के दुःख, दर्द, पीड़ाओं, अभावों, कष्टों से मुक्त हो जाते हैं। बहुत से लोग अज्ञानवश महाकाली को भय, क्रोध और मृत्यु का प्रतीक भर मानते हैं । इस विश्वास से उनकी अज्ञानता ही उजागर होती है। वास्तव में महाकाली मृत्यु पर विजय और भयहीन होने की प्रतीक है।

महाकाली की भयानक एवं क्रोधयुक्त मुद्रा एवं उनका अति उग्र प्रदर्शन उनकी अनंत शक्ति का द्योतक है। तंत्र शास्त्र में प्रथम महाविद्या के रूप में महाकाली का अधिपत्य रात्रि के बारह बजे से प्रातः सूर्योदय तक रहता है। घोर अंधकार महाकाली का साधना काल है, जबकि सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ ही द्वितीय महाविद्या के रूप में तारा विद्या का साम्राज्य चारों ओर फैलने लग जाता है।

महाकाली चेतना का प्रतीक है तो तारा महाविद्या बुद्धि, प्रसन्नता, सन्तुष्टि, सुख, सम्पन्नता और विकास का प्रतीक है। इसीलिये तारा का साम्राज्य फैलते ही अर्थात् सूर्य की प्रथम रश्मि के भूमण्डल पर अवतरित होते ही सृष्टि का प्रत्येक कण चेतना शक्ति युक्त होता चला जाता है ।

रात्रि के अंधकार में जो जीव-जन्तु निद्रा के आवेश में आकर सुस्त और निष्क्रिय पड़ जाते हैं, फूलों की प्रफुल्लित हुई कलियां मुर्झा जाती हैं, प्राणियों में जो पशु भाव उतर जाता है, वह सब प्रातःकाल होते ही अपने मूल स्वरूप में लौट आता है ।

तारा महाविद्या का रहस्य बोध कराने वाली हिरण्यगर्भ विद्या मानी गई है। इस विद्या के अनुसार वेदों ने सम्पूर्ण विश्व (सृष्टि) का मुख्य आधार सूर्य को स्वीकार किया है। सूर्य अग्नि का एक रूप है। अग्नि का एक नाम हिरण्यरेता भी है। सौरमण्डल हिरण्यरेत (अग्नि) से आविष्ट है। इसीलिये इसे हिरण्यमय कहा जाता है।

आग्नेयमंडल के नाभि में सौर ब्रह्म तत्त्व प्रतिष्ठित है, इसलिये सौरब्रह्म को हिरण्यगर्भ कहा गया है । जिस प्रकार विश्वातीत कालपुरुष की महाशक्ति महाकाली है, उसी प्रकार सौरमण्डल में प्रतिष्ठित हिरण्यगर्भ पुरुष की महाशक्ति ‘तारा’ को माना गया है।

जिस प्रकार गहन अन्धकार में छोटा दीपक भी अत्यन्त प्रकाशमान प्रतीत होता है, उसी तरह महानतम के अर्थात् अंतरिक्ष में तारा शक्ति युक्त सूर्य सदैव प्रकाशमान बना रहता है, इसलिये श्रुतियों में सूर्य नक्षत्र’ नाम से भी जाने गये हैं।

kamakhya devi mantra for love कामाख्या देवी मंत्र फॉर लव – कामाख्या देवी वशीकरण

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kamakhya devi mantra for love कामाख्या देवी मंत्र फॉर लव – कामाख्या देवी वशीकरण

kamakhya devi mantra for love कामाख्या देवी मंत्र फॉर लव – कामाख्या देवी वशीकरण  वशीकरण प्रयोग के प्रति अनेक व्यक्ति लालायित रहते हैं। किसी को अपने प्रति आकर्षित करना और अपने स्वार्थ की सिद्धि करना इस वशीकरण प्रयोग का फल बताया गया है। वशीकरण मंत्र जाप बहुत पहले भी किये जाते रहे हैं किन्तु इन्हें कभी भी समाज में अच्छे रूप में नहीं देखा जाता ।

प्रायः इस प्रयोग को अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये ही किया जाता है। इस कारण से इस प्रयोग को उचित नहीं माना गया । यही कारण है कि अधिकांश लोग इस अनुष्ठान के अच्छे रूप को समझ नहीं पाते हैं। यहां पर जो वशीकरण प्रयोग दिया जा रहा है वह अत्यन्त प्रभावी है ।

इसकी एक अन्य विशेषता यह भी है कि इस प्रयोग को यदि स्वार्थ की भावना से अथवा किसी अन्य को दुःखी अथवा आहत करने के लिये किया जाता है तो इसका प्रयोग निष्फल हो जायेगा। प्रयोगकर्ता चाहे जितने मंत्रजाप कर ले, उपरोक्त अनुसार यदि यह प्रयोग होता है तो कोई लाभ नहीं मिलेगा।

कभी-कभी इसका विपरीत प्रभाव भी देखने में आता है। इसमें प्रयोग करने वाले को हानि का सामना करना पड़ता है । अग्रांकित वशीकरण सम्बन्धी जिस प्रयोग का उल्लेख किया जा रहा है, वह शाबर पद्धति पर आधारित है।

kamakhya devi mantra for love कामाख्या देवी मंत्र फॉर लव साधना  विधि 

अगर इस शाबर प्रयोग को पहले किसी ग्रहणकाल में अथवा दीपावली या होली की रात्रि में सिद्ध कर लिया जाये तो अति उत्तम रहता है। एक बार सिद्ध करने के पश्चात् इस प्रयोग को किसी भी रविवार या मंगलवार के दिन से शुरू किया जा सकता है। यह तांत्रिक अनुष्ठान कुल 21 दिन का है। इसमें सबसे पहले रात्रि को 10 बजे के बाद किसी एकान्त स्थान में काले कम्बल के आसन पर पश्चिम की ओर मुंह करके बैठें।

इसके बाद चार लौंग लेकर उन्हें अपने चारों दिशाओं में रखें। बीच में एक चौमुहा तिल के तेल का दीपक जला कर रखें। इसके बाद मिट्टी के पात्र में अग्नि जलाकर लोबान, पीली सरसों, भूतकेशी, बालछड़, सुगन्धबाला आदि सामग्रियों को मिलाकर उसकी आहुति देते हुए अग्रांकित मंत्र का जाप करें। साधना काल में गुड़-चने का नैवेद्य भी अपने सामने रख लें। तंत्र साधना में प्रयुक्त किया जाने वाला मंत्र इस प्रकार है-

kamakhya devi mantra for love कामाख्या देवी मंत्र फॉर लव 

ॐ नमो आदेश गुरु कामरू देश कामाख्या देवी, जहाँ बसे इस्माइल योगी, इस्माइल योगी ने दीन्हीं एक लोंग राती माती । दूजी लोंग दिखावे राती । तीजी लोंग रहे थहराय, चौथी लोंग मिलावे आप, नहिं आवे तो कुआं, बावड़ी, घाट फिरे रंडी कुआं, बावड़ी छिटक भरे । ॐ नमो आदेश गुरु को मेरी भक्ति गुरु की शक्ति, फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा ।

प्रतिदिन इस मंत्र का जाप पांच माला करें। मंत्रजाप के लिये हकीक माला प्रयोग में लायें । 21 दिन में यह अनुष्ठान्न सम्पन्न हो जाता है । तत्पश्चात् सारी पूजा सामग्री को जमीन के नीचे गाढ़ देवें और हकीक माला को अपने गले में धारण कर लें । दैनिक जाप के दौरान जो नैवेद्य रखा जाता है उसे बन्दर, लंगूर आदि को खिला दें । स्वयं 21 दिन तक भूमि पर शयन करते हुये ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। एक बार अनुष्ठान सम्पन्न हो जाने पर लौंग पर सात मंत्र पढ़ कर जिस किसी को खिला दी जाती है वह व्यक्ति साधक के वश में हो जाता है।

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तलाक की समस्या का निराकरण करने वाला एक तांत्रोक्त प्रयोग ph.85280 57364

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तलाक divorce की समस्या का निराकरण करने वाला एक तांत्रोक्त प्रयोग A tantrok experiment to solve the problem of divorce ph.85280 57364

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तांत्रोक्त प्रयोग A tantrok experiment to solve the problem of divorce ph.85280 57364
तांत्रोक्त प्रयोग A tantrok experiment to solve the problem of divorce ph.85280 57364

 

divorce तलाक के समस्या निराकरण लिए तांत्रोक्त प्रयोग : विज्ञान की उन्नति और औद्योगिक क्रांतियों ने समाज को अनेक उपहार प्रदान किये हैं । इन्होंने लोगों के जीवन को अधिक आरामदायक बनाया है ।

समाज की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है। सुख-सुविधा के साधनों के साथ-साथ भोग-विलास के प्रति लोगों की रुचि बढ़ी है। लोगों के जीवन स्तर में भारी बदलाव आया है ।

कठिन, दुष्कर एवं बोझल जैसी प्रतीत होने वाली जिन्दगी अब अधिक आरामदायक एवं आनन्द देने वाली लगने लगी है, लेकिन इन सभी के साथ ही लोगों के सामाजिक रिश्तों, विशेषकर पारिवारिक रिश्तों के साथ-साथ सोच-विचार और भावनाओं के दृष्टिकोण में जबरदस्त बदलाव आया है ।

  • तलाक divorce निवारण मंत्र
  • तलाक divorce के निवारण साधना स्तम्भंक साधना
  • तलाक divorce निवारण

आधुनिकता ने हमें सुख-सुविधाएं अवश्य प्रदान की हैं, लेकिन इनके साथ ही कई तरह की समस्याओं को भी जन्म दिया है। जैसे-जैसे समाज का बौद्धिक स्तर बढ़ता जा रहा है, शताब्दियों से प्रचलित रहे संस्कारों की डोर कमजोर पड़ती जा रही है। लोगों के मन में स्वैच्छिक उन्मुक्तता, स्वतंत्रता के साथ-साथ स्वार्थी प्रवृत्ति घर करती जा रही है।

इसलिये सामाजिक रिश्ते ही नहीं अपितु पारिवारिक सम्बन्धों पिता-पुत्र, भाई-भाई और पति-पत्नी के बीच कटुता उत्पन्न होने लगी है। प्राचीन समय में समाज को एकजुट रखने तथा परिवार के रूप में प्रेमपूर्वक रहने के लिये अनेक तरह के नियम निर्धारित किये थे ।

 

गृहस्थाश्रम को पूर्ण उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने के लिये हिन्दू जीवन पद्धति में जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक संस्कारों का विधान रखा था, जिनमें सोलह संस्कार बहुत ही प्रमुख थे ।

इन संस्कारों में पितृदोष से ऋणमुक्त होने, पुत्र-पुत्री का गृहस्थ बसाने (कन्या दान) और पति-पत्नी के रूप में सदैव एकत्व का भाव रखने वाले संस्कार सबसे मुख्य हैं । वैवाहिक बंधन में बंध जाने के पश्चात् पति- पत्नी को सदैव के लिये एक-दूसरे के लिये समर्पित रहने के लिये वचनबद्ध रहना पड़ता है।

पति-पत्नी के संबंधों को किसी समय दो शरीर और एक आत्मा, दो मन और एक सोच, सात जन्मों तक साथ निभाने वाले, जैसी उपमायें दी गई थी, लेकिन अब इस पवित्र रिश्ते में भी गिरावट आती जा रही है। आज अधिकांश लोगों में उन्मुक्तता, स्वच्छन्द सोच, अहं और स्वतंत्रता की भावना बलवती होती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ पारिवारिक रिश्तों में अविश्वास, सन्देह, संघर्ष एवं कलह की स्थिति देखने को मिल रही है । समर्पण की जगह संघर्ष ने ले ली है ।

प्रेम का स्थान अविश्वास और संदेह ने ले लिया है । इन सबका परिणाम है कि पारिवारिक कलह, हिंसा, तलाक, एक-दूसरे को धोखा देने की घटनायें बढ़ती जा रही हैं। तलाक divorce की दर भी तीव्रगति से बढ़ रही है। तलाक divorce का अर्थ है वैवाहिक जीवन में प्रेम, समर्पण, त्याग की जगह अविश्वास, घृणा एवं संघर्ष का इस सीमा तक बढ़ जाना कि पति – पत्नी दोनों को ही यह लगने लगे कि अब एक साथ रहना संभव नहीं है । ऐ

सी स्थितियों में उन दोनों का एक साथ शांतिपूर्वक रह पाना मुश्किल बन जाता है और वह शीघ्रताशीघ्र एक-दूसरे से अलग होकर स्वतंत्र हो जाना चाहते हैं। तलाक divorce के ऐसे मामलों के लिये सामाजिक परिस्थितियां तो उत्तरदायी रहती ही हैं, कई अन्य कारण भी जिम्मेदार रहते हैं ।

इस प्रकार के कारणों का उल्लेख तंत्रशास्त्र एवं अन्य दूसरे ग्रंथों में विस्तारपूर्वक दिया गया है। आमतौर पर ऐसा देखने में आता है कि जिन परिवारों में माता-पिता या अन्य बुजुर्ग सदस्यों को पूर्ण मान-सम्मान नहीं मिलता, उनकी संतानें भी सुखी नहीं रह पाती ।

इनकी संतानों के विवाह जैसे मांगलिक कार्यों में बहुत अधिक विलम्ब होता है, उनके गृहस्थ जीवन में भी निरन्तर उथल-पुथल मची रहती है । उनकी संतानों को गृह क्लेश का सामना करना पड़ता है, जिसकी परिणिति अनेक बार तलाक divorce के रूप में सामने आती है।

इन लोगों को संतान सुख भी प्राप्त नहीं हो पाता। इसी तरह जिन परिवारों में कुल देवता, देवी का अपमान, निरादर किया जाता है या परिवार के किसी कमजोर सदस्य को सताया, दबाया जाता है या बार – बार अपमानित किया जाता है, उनकी संतानें उन्मुक्त स्वभाव को अपनाने वाली होती हैं। इनके पुत्र- पुत्रियां, दोनों का ही गृहस्थ जीवन सुचारू रूप से नहीं चल पाता। ऐसे अधिकतर मामलों में शीघ्र तलाक divorce की स्थितियां निर्मित होने लगती ।

अनुभवों में ऐसा आया है कि अगर समय रहते समुचित प्रबन्ध कर लिये जायें तो तलाक divorceजैसी स्थिति को उत्पन्न होने से रोका जा सकता है तथा टूटते हुये गृहस्थ जीवन को बचाया जा सकता है । ऐसी विषम परिस्थितियों से बचने के लिये तांत्रिक सम्प्रदाय और वैदोक्त पद्धति में अनेक उपाय एवं प्रयोग दिये गये हैं, जिनको सविधि सम्पन्न करने से माता-पिता के पापकर्मों का तो प्रायश्चित हो ही जाता है, कई अन्य तरह के दोष भी समाप्त हो जाते हैं । तलाक

तलाक divorcedivorce के निवारण साधना स्तम्भंक साधना विधि शाबर प्रयोग

 

तलाक divorcedivorce  के निवारण साधना स्तम्भंक साधना विधि शाबर प्रयोग : यद्यपि पापकर्मों से मुक्ति पाने के लिये शास्त्रों एवं वैदोक्त प्रणाली में अनेक विधान और उपाय बताये गये हैं । इन सबका इस प्रसंग में वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है। आगे एक ऐसा शाबर मंत्र प्रयोग दिया जा रहा है जिसके द्वारा तलाक divorceकी स्थिति को रोका जा सकता है यह प्रयोग वशीकरण पर आधारित है ।

यह प्रयोग एक बार सिद्ध हो जाता है तो उस साधक या साधिका के सामने विशेष क्षणों में जो भी सामने आ जाता है, वही वशीभूत हो जाता है। यह शाबर प्रयोग अनेक बार अनुभूत किया हुआ है । ऐसा देखने में आया है कि अगर समय रहते पति-पत्नी में से कोई भी एक इस शाबर पद्धति पर आधारित वशीकरण प्रयोग को सफलतापूर्वक सम्पन्न कर लेता है

तो वह तलाक divorce की स्थिति को बदल सकता है तथा वह पति – पत्नी के रूप एक परिवार के रूप में बने रह सकते हैं। यह शाबर प्रयोग 41 दिन का है । अगर इस शाबर मंत्र को पहले दीपावली, दशहरा, होली आदि की रात्रि को किसी एकान्त स्थान में बैठकर दीपक आदि जलाकर अभीष्ट संख्या में मंत्रजाप कर लिया जाये तो यह मंत्र चेतना सम्पन्न हो जाता है ।

तब इस मंत्र का प्रभाव अनुष्ठान शुरू करने के दूसरे सप्ताह में ही दिखाई देने लग जाता है । यद्यपि इस शाबर अनुष्ठान को किसी भी कृष्णपक्ष के शनिवार के दिन से भी शुरू किया जा सकता है । यह शाबर अनुष्ठान शनिवार की रात्रि को दस बजे के बाद सम्पन्न किया जाता है, लेकिन इससे संबंधित थोड़ा सा विधान प्रातः काल भी सम्पन्न करना पड़ता है। प्रात:काल शुद्ध आटे से पांच रोटियां बनवायें

| उन्हें घी से चुपड़ें। एक थाली में रोटियों के साथ थोड़ा सा देशी घी, दही, शक्कर, दो लौंग और एक बताशा रखें। एक कण्डे में आग जलाकर उस पर घी की आहुतियां प्रदान करते हुये एवं बताशे के साथ दोनों लौंगों को घी में भिगोकर अग्नि को समर्पित कर दें। साथ ही अपने देवताओं को स्मरण करते हुये उनका आह्वान करते रहें

। बताशे के बाद प्रत्येक रोटी से थोड़ा-थोड़ा अंश तोड़कर क्रमशे : घी, दही, शक्कर में लगाकर अग्नि को अर्पित करें। इस प्रकार पांचों रोटियों का थोड़ा-थोड़ा अंश अग्नि को चढ़ा दें। तत्पश्चात् घी की एक आहुति प्रदान करके अंगुलियों में थोड़ा सा पानी लेकर अग्नि की प्रदक्षिणा करें। अपने कुल देव या देवियों से अपने और अपने माता-पिता के अपराधों को क्षमा करने की प्रार्थना करें। बाद में उन पांचों रोटियों को क्रमशः गाय, कुत्ता, कौआ, पीपल के वृक्ष के नीचे और जल में प्रवाहित कर दें ।

रात्रि को घर के मुख्यद्वार पर एक दीपक जलाकर रखें। ऐसा कुल सात शनिवार तक रखना है। रात्रि को अनुष्ठान के रूप में किसी सुनसान एकान्त स्थान, किसी प्राचीन खण्डहर अथवा किसी प्राचीन शिव मंदिर या अपने ही घर के किसी कक्ष में बैठकर इस अनुष्ठान को सम्पन्न करें।

सबसे पहले रात्रि को नेहा धोकर तैयार हो जायें । संभव हो तो लाल रंग के वस्त्र पहन कर अपने साधना स्थल पर जाकर लाल ऊनी आसन पर पश्चिम या दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठ जायें । अपने सामने लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर शुद्ध मिट्टी का ढेला रखें और उस पर तेल – सिन्दूर का लेप करके पांच लौंग, पांच कालीमिर्च, पांच पान के पत्ते, सिन्दूर से रंगी पांच सुपारी तथा ग्यारह की संख्या में पंच- चक्रा सीप भी सिन्दूर में रंग कर अर्पित करें।

इसके पश्चात् तेल का दीपक जलाकर एवं खीर का प्रसाद रखकर हकीक माला से अग्रांकित मंत्र की पांच माला जाप करें । जाप के पश्चात् खीर को स्वयं ही खा लें । अन्य किसी को न दें।

तलाक divorce  निवारण मंत्र

तलाक divorce निवारण मंत्र अनुष्ठान में प्रयुक्त मंत्र इस प्रकार है– हथेली पर हनुमन्त बसै भैरू बसे कपाल । नारसिंह की मोहनी मोहे सब संसार। मोहन रे मोहन ता बीर सब वीरन मैं तेरा सीर सबकी दृष्टि बांध दे मोहि सिन्दूर चढाऊँ तोहि। तेल सिंदूर कहां से आया ? कैलाश परवत् से आया। कौन लाया ? अंजनी का हनुमन्त गौरी का गणेश काला गोरा तोतला तीनों बसे कपाल बिंदा तेल सिंदूर का दुश्मन गया पाताल | दुहाई का मियासि दूर की हमें देख सीतल हो जाए हमारी भक्ति गुरु की शक्ति फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा सत्य नाम आदेश गुरु का ।

 

मंत्रजाप के लिये हकीक माला या पंचमुखी लघु रुद्राक्ष माला का प्रयोग करें । जाप करने से पहले स्वयं अपने मस्तष्क पर भी सिन्दूर का टीका लगा लें । अनुष्ठान अवधि में ब्रह्मचर्य पालन करने के साथ-साथ भूमि पर शयन करें। संभव हो तो साधना स्थल पर ही सोयें। इस शाबर अनुष्ठान में प्रतिदिन पूजा का क्रम यही रहता है। अनुष्ठान के अन्तिम दिन मंत्रजाप के उपरान्त पूजा की समस्त सामग्री को किसी नये वस्त्र में बांधकर अथवा किसी कोरे मिट्टी के बर्तन में भरकर जल में प्रवाहित कर दें।

पूजा में प्रयोग की गई हकीक माला या रुद्राक्ष माला को स्वयं अपने गले में पहन लें अथवा घर के पूजास्थल पर स्थापित कर दें । अनुष्ठान समाप्त होने के पश्चात् जब आप सिन्दूर पर सात बार उपरोक्त मंत्र को पढ़ कर अपने माथे पर टीका लगाकर अपनी पत्नी या पति के सामने जाते हैं, तो उसका गुस्सा तत्काल शांत हो जाता है तथा संदेह अथवा अविश्वास की जगह आकर्षण उमड़ने लग जाता है। इसी प्रकार नाराज अधिकारी के सामने सिन्दूर लगाकर जाने से उसका भी वशीकरण होता है। वह भी आपसे शत्रुता भुलाकर सम्मान देने वाला व्यवहार करने लग जाते हैं।

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