Tuesday, July 14, 2026
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महाविद्या त्रिपुर भैरवी साधन रहस्य Tripura Bhairavi Sadhana ph.85280 57364

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महाविद्या त्रिपुर भैरवी साधन रहस्य Tripura Bhairavi Sadhana
महाविद्या त्रिपुर भैरवी साधन रहस्य Tripura Bhairavi Sadhana

 


 

महाविद्या त्रिपुर भैरवी साधन रहस्य Tripura Bhairavi Sadhana

महाविद्या त्रिपुर भैरवी साधन रहस्य Tripura Bhairavi Sadhana
महाविद्या त्रिपुर भैरवी साधन रहस्य Tripura Bhairavi Sadhana

महाविद्या त्रिपुर भैरवी साधन रहस्य Tripura Bhairavi Sadhana यह सवाल का जवाब जितने लोग दे पाएंगे, कोई भी दो लोगों को और मैं अपनी तरफ से एक छोटा सा वाउचर दूंगा, जितनी भी मेरी क्षमता है उसके हिसाब से मैं आप लोगों को दूंगा। गले में मुंडमाला धारण की। अब सवाल उठता है कि वह मुंडमाला है क्या? जितनी भी गुप्त योगिनियां हैं, उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं।

 वो जो अंश अंदर गया, वो सूक्ष्म वाक् के रूप में स्थापित हुआ। तो हर पल त्रिपुर भैरवी की स्थापना, कितनी भैरवियां होंगी और वह कैसे स्थापित होंगी? जिस आमन में जो देवी स्थापित हैं, उनके अंडर में एक तंत्र है या ऐसा कह लीजिए उनके अंडर में कुछ तंत्र हैं और जितने भी तंत्र हैं, उनके उपतंत्र हैं। 

इनके मंत्र का जो हृदय है और जो अगली महाविद्या उनके मंत्र का जो हृदय है, वह सेम है और वह क्यों है, यह आपके कुल देवता के माध्यम से करते हैं।

 डीएनए से सुना होगा आपने, भाई एक ही डीएनए चला आ रहा है। अग्नि तत्व, हिरण्यगर्भा, सुंदरता, भुवन, लय और फिर वापस से। फिर आप बोलेंगे तो साइकिल कंप्लीट हो गई, पर बाकी महाविद्या कहां से? वहां पर अब शुरू होता है असली शो।

राम-राम, नमस्ते। मैं आज रात को यह लेख लिख रहा हूं क्योंकि दिन में क्या है कि यहां पर बहुत सारा शोर आता है, तो मैं लिख नहीं पा रहा था और कुछ व्यस्तता के कारण अब शायद मैं कुछ दिनों तक लिख नहीं पाऊंगा। 

इसलिए मैं एक साथ दोनों लेख यहीं पर बना रहा हूं। नवरात्र का समय है, चैत्र नवरात्र शुरू हैं, तो हमारी जो श्रृंखला थी 10 महाविद्या की, उसी को आगे बढ़ाते हैं और आज हम बात करेंगे पांचवी महाविद्या की, जो कि त्रिपुर भैरवी हैं।


 

पिछली महाविद्याओं का संक्षिप्त पुनरावलोकन

 

हमने क्या देखा ? जब कुछ नहीं था, सब कुछ काला था, काली। फिर हिरण्यगर्भा, पहला हिरण्य गर्भ, अग्नि तत्व, उसकी उत्पत्ति, मातारा। फिर हमने देखा कि कैसे इन तीन पुरों में सुंदरता को व्यक्त किया गया। उसके बाद हमने देखा कि कैसे भुवन तैयार हुआ, उस भुवन की अधिष्ठात्री देवी भुवनेश्वरी, जो सभी भुवनों को धारण करती हैं और सभी भुवनों का निर्माण करती हैं। अब भुवन तो निर्माण हो गए, अब आगे क्या?


 

त्रिपुर भैरवी : नित्य लय की अधिष्ठात्री देवी

 

तो जब कोई भी चीज का निर्माण होता है, तो उसका लय भी होता है। विनाश उचित शब्द नहीं है यहां पे, लय होता है। तो लय बहुत किस्म से होते हैं। एक होता है जो पूर्ण रूप से सर्वत्र हो और एक होता है नित्य हो। तो जो नित्य लय होता है, उसकी देवी हैं त्रिपुर भैरवी।

 जैसे त्रिपुर सुंदरी तीन पुरों की सुंदरता को धारण करती हैं, वैसे ही त्रिपुर भैरवी तीन पुरों के भय को। रव है, नित्य जितने भी लय हैं, इनके आदेश के बगैर या यह कह लीजिए कि इनके बगैर नहीं होते। यही उस नित्य लय की अधिष्ठात्री देवी हैं।

 

त्रिपुर भैरवी साधन के विभिन्न रूप

 

भैरवी के बहुत रूप हैं। अन्नपूर्णा भैरवी हैं, भुवनेश्वरी भैरवी हैं, सकल सिद्धिदा भैरवी, कालेश भैरवी, रुद्र भैरवी हैं, कामेश्वरी भैरवी हैं, नित्या भैरवी हैं। बहुत सारी भैरवी हैं। कैसे? जितने भैरव हैं, उतनी भैरवी हैं। 64 भैरव हैं, 64 भैरवी हैं। 

32 भैरव हैं, 32 भैरवी हैं। अष्ट भैरव हैं, अष्ट भैरवी हैं। आप जिस परंपरा में, जिस व्याख्या के अनुसार भैरव को रखेंगे, उसी व्याख्या के अनुसार भैरवी भी स्थापित हो जाएंगी क्योंकि वह भैरवी ही भैरव की शक्ति है।

जैसे हमारे शरीर में रक्त की कोशिकाएं बनती हैं और बिगड़ती हैं, तो जहां-जहां जैसे जब तक आपके शरीर में रक्त है, काली स्थापित हैं, उस रक्त का पान निरंतर करती रहती हैं। 

 जब तक इस दुनिया में रक्त है, तब तक काली हैं। जैसे ही आपकी कोशिकाएं खत्म हुईं, तो उस कोशिका को खत्म करने की जो अधिष्ठात्री देवी हैं, वह त्रिपुर भैरवी हैं। नित्य लय, हर एक क्षण में, हर एक वस्तु में, हर एक अवस्था में।


 

त्रिपुर भैरवी का स्वरूप और विवाद

 

एक बहुत इंपॉर्टेंट चीज है कि त्रिपुर भैरवी का जो रूप है, वह अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से बताया गया है, तो वहां पर काफी डिस्प्यूट है। अब कहीं बताया गया कि भई वह अरुण वस्त्र में हैं, लाल वस्त्रों में हैं और आभा उनकी बहुत ही चमकदार है, रक्त चंदन का स्तनों पर लेप करती हैं, गले में मुंडमाला है। मुंडमाला उनकी जितने भी रूप हैं। 

 सभी रूपों में दिया गया है। कहीं पर वस्त्र के साथ हैं, कहीं पर वस्त्र के बिना। त्रिपुर भैरवी का जो एक्चुअल रूप है, मतलब मैं किसी धारणा की और किसी किताब की बात नहीं कर रहा हूं, पर जो त्रिपुर भैरवी का एक्चुअल रूप है, वो अगर आप उस पद्धति से या उस विधि से देखें, तो वह काली की तरह ही होना चाहिए। 

विवस्त्र, में पुस्तक रखी गई है, अक्षमाला रखी गई है, अभय मुद्रा और वर मुद्रा तो होती ही है। बट मुझे ऐसा लगता है कि जितनी भी भैरवियां हैं, सबके अलग-अलग रूप हैं क्योंकि अलग-अलग मंत्र। तो जब मंत्र बदलते हैं, तो अधिष्ठात्री देवता का स्वरूप भी बदलता है। 

अन्नपूर्णा भैरवी रुद्र भैरवी की तरह नहीं दिखती होंगी। रुद्र भैरवी कभी भी नित्या भैरवी की तरह नहीं दिखती होंगी। नित्या भैरवी कभी भी कामेश्वरी भैरवी की तरह नहीं दिखती होंगी। इनका सबका रूप अलग-अलग है और ये सब लय कर रहे हैं किस-किस स्थिति में, यह बहुत डिटेल विषय है।


 

त्रिपुर भैरवी मुंडमाला का रहस्य: 50 वर्ण और शब्द ब्रह्म

 

तो भैरवी जो हैं, वह गले में मुंडमाला धारण की हुई हैं और यह मुंडमाला वाली बात सभी प्रकार के रूपों में बोला गया है, व्याख्या हुई है। अब सवाल उठता है कि वो मुंडमाला है क्या? मैंने आपको बताया था, त्रिपुर सुंदरी जो हैं, शशि जब वह सुंदरता को व्यक्त करती हैं, तो वह शब्दों के रूप में करती हैं।

 इसे हम शब्द ब्रह्म कहते हैं और वह शब्द ब्रह्म इन 50 मातृकाओं से निर्मित होते हैं, जो 50 मातृकाएं अ से लेकर क्ष तक हैं, जिनसे अक्षर बनते हैं। अ क्ष अक्ष से लेकर क्र में अग्नि तत्व, प्रज्वलित जो तत्व है, जिसके कारण उस सुंदरता का व्याप्त होना, प्रकट होना पॉसिबल हुआ है। तो जो अक्षरों से वह इस सुंदरता को व्यक्त करती हैं। 

 भुवन, भुवनेश्वरी इस भुवन को बनाती हैं, उन अक्षरों को धारण करते हुए, उन्हीं अक्षरों का लय करते हुए त्रिपुर भैरवी स्थापित रहती हैं। तो क्योंकि जिन अक्षरों का वह लय कर रही हैं, वह भी 50 हैं, तो जो मुंडमाला है, वह भी 50 वर्णों की ही होगी।

अब इस वर्णमाला में एक भेद है, बहुत, बहुत ही इंटरेस्टिंग सा भेद है। अ से लेकर अः तक जो हमारे 16 स्वर हैं, वे 16 भैरव हैं। उनकी अभिव्यक्ति भैरव के रूप में की गई, जो कि 16 कला मैंने आपको पहले बताया था। और क से लेकर क्ष तक जो वर्ण हैं, वह भैरवी हैं। वह पुरुष है, यह प्रकृति है। क से लेकर क्ष तक व्यंजनों को योनि कहा गया है।

 

सूक्ष्म वाक् और भैरवी की स्थापना

 

यह जो 50 मातृकाओं का उन्होंने ह्रास करने के बाद, उस 50 मातृकाओं की मुंडमाला को धारण करती हैं। यह सूक्ष्म वाक् के रूप में धारण करती हैं। जैसे मैंने बताया था, चार वाणियां हैं: परा है, पश्यंति है, मध्यमा है, वैखरी है। वैखरी लोकल भाषा में बोली जाती है। 

तो जो वैखरी वाणी है, उस वैखरी वाणी में वह स्वर अभिव्यक्त हुए, पर उस वैखरी वाणी जब वह बाहर गई, तो उसका एक अंश अंदर भी गया और वह जो अंश अंदर गया, वह जो अंश अंदर गया, वह सूक्ष्म वाक् के रूप में स्थापित हुआ। तो हर पल त्रिपुर भैरवी की स्थापना होती रहती है, ताकि वह नित्य लय कर सकें आपके शरीर में, इस प्रकृति में, हर एक तत्व में।


 

मां ललिता की रथ वाहिनी और गुप्त योगिनियों की अधिष्ठात्री

 

एक और बहुत इंटरेस्टिंग बात है इनकी, जो त्रिपुर भैरवी हैं, वह मां ललिता की रथ वाहिनी, मां ललिता की रथ वाहिनी हैं, रथ को वो चलाती हैं। और जितनी गुप्त योगिनियां हैं, जितनी भी गुप्त योगिनियां हैं, उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं। कुछ-कुछ ग्रंथों में, कहीं-कहीं पर इनके जो भैरव हैं, वह काल भैरव कहे गए हैं दक्षिणामूर्ति रूप में।

 अब काल भैरव क्यों कहे गए? इनको कालरात्रि का स्थान दिया गया है। जैसा मैंने आपको बताया था, जो हमारी 10 महाविद्या हैं, वह चार त्रियों में विभाजित की हुई हैं: महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहा च भवती, महादेवी, महासुरी, प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी। कालरात्रि, महारात्रि, मोहारात्रि च दारुणा। चार रात्रियां। इनको कालरात्रि कहा गया है।

 

पाठकों के लिए एक सवाल: चार रात्रियां

 

कालरात्रि में तीन देवियां हैं: कालरात्रि, महारात्रि, मोहारात्रि। इन तीनों में, इन तीनों कैटेगरी में कौन-कौन सी देवियां हैं, यह सवाल का जवाब जितने लोग दे पाएंगे, अगर ज्यादा लोग देंगे, तो जस्ट रैंडम लॉटरी से पिक करूंगा, कोई भी दो लोगों को और मैं अपनी तरफ से एक छोटा सा वाउचर दूंगा, जितनी भी मेरी क्षमता है उसके हिसाब से मैं आप लोगों को दूंगा। 

और ऐसे अब मैं और भी सवालों की सीरीज चलाऊंगा, मतलब पांच सवाल होंगे और पांचों सवाल के जो पांचों सही जवाब देगा, उस इंसान को, वह कोई पुरुष भी हो सकता है, कोई महिला भी हो सकती है, उस इंसान को मैं अपनी तरफ से एक वॉच… ऐसे दो लोगों को चूज करूंगा, उनको एक वाउचर दूंगा, जो भी होगा छोटा-मोटा, जो भी मेरी क्षमता में होगा। 

तो यह सवाल रहा कि कालरात्रि, महारात्रि, मोहारात्रि में कौन-कौन सी देवियां हैं? क्योंकि दारुणा रात्रि तो वैसे भी सबको पता ही है कि उसमें एक ही देवी है। 

तो जो बची हुई देवियां हैं, उनकी कैटेगरी आप बताइए। तो जो और सटीक, एक बार में सटीक जवाब देना होगा, ट्रायल-एरर नहीं चलेगा कि आज बोल दिया, फिर कल बोल दिया, ना। जिस लेख में कहा, एक ही बार में जवाब आना चाहिए और उस समय काल के अंतराल के अंदर आना चाहिए। ऐसा ना हो कि वो क्रॉस कर जाए, फिर आप जवाब दे रहे हैं।


 

काली, त्रिपुर सुंदरी और त्रिपुर भैरवी का कार्यक्षेत्र

 

अच्छा, अभी देखिए क्या होता है। जहां-जहां पर, जहां-जहां पर रक्त है, वहां-वहां पर काली हैं। जहां-जहां पर सुंदरता है, वहां-वहां पर त्रिपुर सुंदरी शोडशी हैं। जहां-जहां पर नित्य लय होता है, वहां-वहां पर त्रिपुर भैरवी हैं। यह मुख्य देवी हैं। 

अब ये देवी, लय तो सब, सब जगह हो रहा है, सर्वत्र हो रहा है, हर एक वस्तु में हो रहा है, उस प्रकृति में, तो कितनी भैरवियां होंगी और वो कैसे स्थापित होंगी? देखिए, जितने भी आमन हैं, सभी आमन में एक देवियां स्थापित की गई हैं। 

जिस आमन में जो देवी, इस पर मैं एक लेख दूंगा बहुत डिटेल में। जिस आमन में जो देवी स्थापित हैं, उनके अंडर में एक तंत्र है या ऐसा कह लीजिए उनके अंडर में कुछ तंत्र हैं और जितने भी तंत्र हैं, उनके उपतंत्र हैं। त्रिपुर भैरवी इन सब की अधिष्ठात्री हैं।

 

कुल देवता और डीएनए: लय की प्रक्रिया

 

बहुत ही रहस्यमय देवी हैं, जैसा मैंने बताया कि इनका रूप मल्टीपल जगहों पर, मल्टीपल तरीके से दिया गया है। अस्त्र भी लोगों ने बदल दिए हैं। पर यह मेरी धारणा, मेरे अनुसार, वे विवस्त्रा हैं, मुंडमाला गले में है और बहुत ही रौद्र रूप है इनका, कालरात्रि हैं। 

अब सवाल उठता है कि यह जो नित्य लय करते हैं, यह देवियां डायरेक्टली करती हैं क्या? नहीं, यह आपके कुल देवता के माध्यम से करते हैं। डीएनए से सुना होगा आपने, भाई एक ही डीएनए चला आ रहा है, है ना ? वह जो सिंगल सेल है, आरएनए स्ट्रक्चर है, वह कैसे काम करता है? कुल, आपके पित्रों के थ्रू। 

तो जो कुल की देवी हैं, उन देवी के माध्यम से। अच्छा, इसमें भी बहुत सारे अलग-अलग चेन हैं, बहुत डिटेल टॉपिक है, इस पर भी मैं आगे एक लेख दूंगा। नित्य जितने भी तने भी लय की जा रही है, यह इसी तरीके से की जा रही है।


 

त्रिपुर भैरवी के मंत्र और उनका रहस्य

 

एक बहुत इंटरेस्टिंग सी बात इनके, इनके मंत्र। एक तो इनके मंत्र 17-अक्षरी होते हैं क्योंकि अगर कम अक्षरों का मंत्र दिया जाए, तो उसकी क्षमता, उसकी एनर्जी बहुत ज्यादा होगी। तो आमतौर पर इनके जो मंत्र हैं, वह 17 अक्षरों का होता है या 19 अक्षरों का होता है।

 इनके मंत्र का जो हृदय है और जो अगली महाविद्या हैं, उनके मंत्र का जो हृदय है, वह सेम है। और वह क्यों है, यह मैं आपको तब बताऊंगा जब मैं अगली महाविद्या पर बात करूंगा, तो मंत्र का हृदय होता है, यह इस पर भी अगर आप चाहें तो मैं आगे एक लेख दूंगा। बट जो हृदय है, इन दोनों का सेम है और इन दोनों को एक पर्टिकुलर नाम से बुलाया जाता है, 

एक और, अच्छा यह वीर रात्रि में आती हैं, यह कालरात्रि भी हैं और वीर रात्रि भी हैं, एक और बात थी जो कई जगहों पर शास्त्रों में मेंशन है, जिसको मैं थोड़ा सा खंडन करता हूं कि इनको एक ही तरीके से एक ही जगह पर स्थापित किया गया है। 

जैसे कि मैंने बताया कि काल भैरव इनके भैरव हैं, पर यह बहुत रहस्यमय देवी हैं, एक जगह पर स्थापित नहीं होती हैं। इनकी स्थापना अलग-अलग रूपों में होती है और इनके भैरव भी बदलते हैं। जैसे मैंने बताया, बहुत सारी भैरवी। लेकिन कब बदलते हैं, इसका कहीं भी विवरण नहीं है। यह साधना का विषय है।

 

राहु और केतु: त्रिपुर भैरवी के मुख्य साधक

 

इनके जो मुख्य साधक हुए, वे राहु और केतु हैं। अब आप खुद ही समझ लीजिए, कितनी मायावी हैं ये। इनके मुख्य जो साधक रहे हैं, वह केतु और राहु रहे हैं। राहु-केतु के बारे में तो आपको पता ही होगा। अब वो कथा तो कहकर कोई फायदा नहीं क्योंकि कथा का लाभ तो आप कहीं से भी ले सकते हैं, वो तो बहुत इजीली अवेलेबल है।


 

सृष्टि-स्थिति-लय का चक्र और अगली महाविद्या

 

तो मैंने आपको बहुत पहले एक बात बताई थी कि जो भी, जो भी लय होता है, वह एक, जैसे सृष्टि है, फिर स्थिति है, फिर लय है और यह साइकिल है, चलता रहता है, है ना? तो जो नित्य, तो नित्य सृष्टि भी होगी। तो मतलब जैसे ही लय हुआ, वैसे ही वापस से वही सेम प्रोसेस शुरू हो गई। 

वही अग्नि तत्व, हिरण्यगर्भ, सुंदरता, भुवन, लय और फिर वापस सेम। फिर आप बोलेंगे तो साइकिल कंप्लीट हो गई, फिर बाकी महाविद्या कहां से हैं? वहां पर अब शुरू होता है असली शो। यहां तक तो ठीक है, अब शुरू होगा इसके बाद असली शो।

 

त्रिपुर भैरवी श्रोताओं के लिए संदेश और कुछ
महत्वपूर्ण बातें

 

तो आपके बहुत सारे सवाल थे, अब मैं इस लेख में सवाल तो नहीं ले रहा हूं। इसको मैं यहीं पर विराम देता हूं और आपसे अब कुछ एक-दो विषयों पर बात करूंगा, यहीं बैठे-बैठे लिख रहा हूं इसके, इस लेख के बाद। और लेखों को आप पूरा पढ़ें। 

जैसे मैंने आपको बताया, अगर आपने इस वेबसाइट को फॉलो नहीं किया तो करिए क्योंकि उससे आपको नोटिफिकेशन मिलेगी नए लेख कब आ रहे हैं। और आप लेख पूरा पढ़ेंगे तो आपको बहुत सारे सवालों के जवाब स्वतः मिलेंगे। कोशिश करिए कि एकांत में या शांत वातावरण में पढ़ें ताकि डिस्टरबेंसस ना हों। 

आपको कोई डिस्टरबेंस बीच में होगी तो आप शायद पॉइंट मिस कर जाएंगे। बहुत फोकस के साथ पढ़ें और समय जब हो, तब आराम से पढ़ें। ऐसा कोई नहीं है कि आपको अभी, आज लेख आया तो आज ही पढ़ना है। 

गर आपको बहुत ज्यादा इंटरेस्ट आ रहा है उसमें, तो आप उसका पूर्ण लाभ लें, इसलिए आप ध्यान से, बहुत फोकस के साथ पढ़ें जब भी आप स्थिति में बैठकर पढ़ पाएं,

 एक और बात है कि बहुत सारे लोग मेल लिखते हैं, मैं जवाब देने में थोड़ा लेट हो जाता है क्योंकि व्यस्त होने के कारण कई बार मैं देख नहीं पाता हूं मेल, तो थोड़ा क्षमा करिएगा उस चीज के लिए। 

और कई बार मैं जल्दी-जल्दी में कुछ ऐसा रिप्लाई भी लिख दूंगा जो शायद मुझे ही बाद में लगा कि मैंने पूर्ण रिप्लाई नहीं था क्योंकि मुझे नहीं लगता किसी को वेट कराना अच्छा नहीं लगता है। पर हो सकता है कि मैं आपको किश्तों में आंसर दूं, बाद में कभी। 

अगेन, मैंने कहा ना कि अगर मेरे को समय रहा तो मैं जरूर उस चीज को करूंगा। चलिए, एक और बात आपसे बस बोल देता हूं कि 10 महाविद्याओं की जो यह सीरीज है, यह कंप्लीट नहीं है। 

क्योंकि मैं बहुत शॉर्ट में आपको बता रहा हूं चीजों को लेकर, बहुत, बहुत ही बेसिक सा वो दे रहा हूं। बाद में मैं और डिटेल में आऊंगा वन बाय वन क्योंकि अभी डिटेल देने का प्रश्न इसलिए नहीं उठता क्योंकि इंट्रोडक्टरी है ये।

 मतलब आप बस जानिए उस चीज को। बहुत स्पेसिफिक मंत्र का एक्सप्लेनेशन और वह सब चीजें मैं अभी नहीं कर रहा हूं। वो मैं बहुत बाद में करूंगा। 

जो सवाल है, वह आप मुझे मेल करके लिखिए, कमेंट पे नहीं क्योंकि एक जन ने कमेंट लिखा, दूसरा उसको पढ़ के… तो मेल पर लिखना उचित है, बाकी आपकी इच्छा है। 

आप अगर मेरी बात ना सुनकर कमेंट पर लिख रहे हैं, तो उसका भी सम्मान करूंगा मैं। पर यह आपका ही नुकसान है क्योंकि फिर आपका अगर आंसर सही हो और आपको देख के किसी ने बोल दिया, तो फिर तो दो लोग, दो उम्मीदवार हो गए उस वाउचर के। चलिए फिर, आज्ञा लेता हूं आपसे और दोबारा आपसे मुलाकात होगी। नमस्ते, राम-राम।

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मैं रुद्र नाथ हूँ — एक साधक, एक नाथ योगी। मैंने अपने जीवन को तंत्र साधना और योग को समर्पित किया है। मेरा ज्ञान न तो किताबी है, न ही केवल शाब्दिक यह वह ज्ञान है जिसे मैंने संतों, तांत्रिकों और अनुभवी साधकों के सान्निध्य में रहकर स्वयं सीखा है और अनुभव किया है।मैंने तंत्र विद्या पर गहन शोध किया है, पर यह शोध किसी पुस्तकालय में बैठकर नहीं, बल्कि साधना की अग्नि में तपकर, जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे जीकर प्राप्त किया है। जो भी सीखा, वह आत्मा की गहराइयों में उतरकर, आंतरिक अनुभूतियों से प्राप्त किया।मेरा उद्देश्य केवल आत्मकल्याण नहीं, अपितु उस दिव्य ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना है, जिससे मनुष्य अपने जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझ सके और आत्मशक्ति को जागृत कर सके।यह मंच उसी यात्रा का एक पड़ाव है — जहाँ आप और हम साथ चलें, अनुभव करें, और उस अनंत चेतना से जुड़ें, जो हमारे भीतर है ।Rodhar nath https://gurumantrasadhna.com/rudra-nath/