Homeदस महाविद्याप्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364

प्राचीन चमत्कारी ब्रह्मास्त्र माता बगलामुखी साधना अनुष्ठान Ph. 85280 57364

संकल्प  बगलामुखी  साधना Resolution, Baglamukhi, Sadhana

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संकल्प इस प्रकार है- ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः । ॐ तत्सदद्यैतस्थ ब्रह्मोऽह्नि द्वितीयप्रहराद्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखंडे आर्यावर्तैक देशान्तरगतदेशे अमुक क्षेत्रे विक्रम शके बौद्धावतारे अमुक……… सम्वत्सरे अमुक……. अयने अमुकऋतौ महामांगल्यप्रद मासोत्तमे मासे अमुक………. मासे अमुक पक्षे अमुक तिथौ अमुक वासरे अमुक नक्षत्रे अमुक योगे करणे वा अमुक राशि स्थिते सूर्ये अमुक राशि स्थिते चन्द्रे अमुक राशि स्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथा यथा राशि स्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुण गण विशेषण- विशिष्टे काले अमुक गोत्रः शर्माऽहं सपत्नीकः अथवा सपत्यहम् श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त पुण्य-फल- प्राप्त्यर्थ मम सकुटुम्बस्य ऐश्वर्यादि-अभिवृद्धयर्थं अप्राप्त-लक्ष्मी प्राप्त्यर्थं प्राप्त-लक्ष्मी-चिरकाल – संरक्षणार्थं सकलमन्-ईप्सित-कामना-संसिद्धयर्थं लोके वा राजसभायां तद्द्वारे वा सर्वत्र – यथोविजयलाभदि – प्राप्त्यर्थं पुत्र पौत्राद्यभिवृद्धयर्थं च इह जन्मनि जन्मान्तरे वा सकल दुरितोपशमनार्थ तथा मम सभार्यस्य सपुत्रस्य सवान्धवस्य अखिल-कुटुम्बसहितस्य समस्त भय-व्याधि- जरा – पीड़ामृत्यु परिहार- द्वारा आयुरारोग्यता प्राप्त्यर्थं ऐश्वर्यामि अभिव्यदर्थं चतुर्थाष्टम- द्वादश स्थान-स्थित- क्रूरग्रहास्तैः संसूचितं संसूचियिषमाणं यत्सर्वारिष्टं तद्विनाशद्वारा एकादश स्थानस्थितवच्छुभप्राप्तयर्थं आदित्यादि – नवग्रहाः अनुकूलता सिद्धयर्थं तथा इन्द्रादि- दश दिक्पालदेव प्रसन्नता – सिद्धयर्थम् आदिदैविक आदिभौतिक आध्यात्मिक त्रिविध- तापोपशमनार्थ धर्मार्थकाममोक्ष चतुर्विथ- पुरुषार्थ सिद्धयर्थ मम जन्मांके तथा मम पतिजन्मांके सकल (ग्रह का नाम ) दोषारिष्ट निर्मूलार्थे अखण्ड – दाम्पत्य सुखप्राप्ति कामनया (अमुक) देवताप्रीतयर्थे जपं (अमुक) संख्याकम् अहम् करिष्ये।

 

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मैं रुद्र नाथ हूँ — एक साधक, एक नाथ योगी। मैंने अपने जीवन को तंत्र साधना और योग को समर्पित किया है। मेरा ज्ञान न तो किताबी है, न ही केवल शाब्दिक यह वह ज्ञान है जिसे मैंने संतों, तांत्रिकों और अनुभवी साधकों के सान्निध्य में रहकर स्वयं सीखा है और अनुभव किया है।मैंने तंत्र विद्या पर गहन शोध किया है, पर यह शोध किसी पुस्तकालय में बैठकर नहीं, बल्कि साधना की अग्नि में तपकर, जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे जीकर प्राप्त किया है। जो भी सीखा, वह आत्मा की गहराइयों में उतरकर, आंतरिक अनुभूतियों से प्राप्त किया।मेरा उद्देश्य केवल आत्मकल्याण नहीं, अपितु उस दिव्य ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना है, जिससे मनुष्य अपने जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझ सके और आत्मशक्ति को जागृत कर सके।यह मंच उसी यात्रा का एक पड़ाव है — जहाँ आप और हम साथ चलें, अनुभव करें, और उस अनंत चेतना से जुड़ें, जो हमारे भीतर है ।Rodhar nath https://gurumantrasadhna.com/rudra-nath/
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