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प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना दुर्भाग्य की गूढ़ रेखाओं को मिटाकर सौभाग्य में बदलने की दिव्य क्रिया – फ़ोन 85280 57364

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प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana Ph. 8528057364

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प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana Ph. 8528057364

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना Dhumavati mahavidya sadhana  जो साधक के शत्रुओं का नाश करती है साधक के ऊपर किसी भी प्रकार का तंत्र दोष समाप्त करती है महाविद्याओं में धूमावती महाविद्या साधना अपने आप में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस साधना के बारे में दो बातें विशेष रूप से हैं, प्रथम तो यह दुर्गा की विशेष कलह निवारणी शक्ति है, दूसरी यह कि यह पार्वती का विशाल एवं रक्ष स्वरूप है। जो क्षुधा (भूख) के विकलित कृष्ण वर्णीय रूप हैं, जो अपने भक्तों को अभय देने वाली तथा उनके शत्रुओं के लिए साक्षात् काल स्वरूप हैं । इस साधना के सिद्ध होने पर भूत-प्रेत, पिशाच व अन्य तंत्र बाधा का साध उसके परिवार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ।

जब कोई साधक भगवती धूमावती की साधना सम्पन्न करता है, तो वे प्रसन्न होकर साधक के शत्रुओं का भक्षण कर लेती हैं और साधक को अभय प्रदान करती हैं ।धूमावती’ दस महाविद्याओं में से एक हैं। जिस प्रकार ‘तारा’ बुद्धि और समृद्धि की, ‘त्रिपुर सुन्दरी’ पराक्रम एवं सौभाग्य की सूचक मानी जाती हैं, इसी प्रकार ‘धूमावती’ शत्रुओं पर प्रचण्ड वज्र की तरह प्रहार करने वाली मानी जाती हैं। यह अपने आराधक को अप्रतिम बल प्रदान करने वाली देवी हैं जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूपों में सहायक सिद्ध होती ही हैं, यदि पूर्ण निष्ठा व विश्वास के साथ ‘धूमावती साधना’ को सम्पन्न कर लिया जाय तो ।

दस महाविद्याओं के क्रम में ‘धूमावती’ सप्तम् महाविद्या हैं। ये शुत्र का भक्षण करने वाली महाशक्ति और दुःखों की निवृत्ति करने वाली हैं। बुरी शक्तियों से पराजित न होना और विपरीत स्थितियों को अपने अनुकूल बना देने की शक्ति साधक को इनकी साधना से प्राप्त होती है।कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है, और उसके आगे सबको हार माननी पड़ती है, किन्तु जो समय पर हावी हो जाता है, वह उससे भी ज्यादा बलशाली कहलाता है।

शक्ति सम्बलित होना और शक्तिशाली होना तो केवल शक्ति-साधना के माध्यम से ही संभव है, जिसके माध्यम से दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित किया जा सकता है। जो भयग्रस्त, दीन-हीन और अभावग्रस्त जीवन जीते हैं, वे कायर और बुजदिल कहलाते हैं, किन्तु जो बहादुर होते हैं, वे सब कुछ अर्जित कर, जो कुछ उनके भाग्य में नहीं है, उसे भी साधना के बल पर प्राप्त करने की सामर्थ्य रखते हैं… और यदि साधना हो किसी महाविद्या की, तो उसके भाग्य के क्या कहने, क्योंकि दस महाविद्याओं में से किसी एक महाविद्या को सिद्ध कर लेना भी जीवन का अप्रतिम सौभाग्य कहलाता हैं।

आज समाज में जरूरत से ज्यादा द्वेष, ईर्ष्या, छल, कपट, हिंसा और शत्रुता का वातावरण बन गया है, फलस्वरूप यदि। व्यक्ति शांतिपूर्वक रहना चाहे, तो भी वह नहीं रह सकता। अतः जीवन की असुरक्षा समाप्त करने की दृष्टि से यह साधना विशेष महत्वपूर्ण एवं अद्वितीय है। धूमावती ‘दारुण विद्या’ हैं। सृष्टि में जितने भी दुःख हैं, व्याधियां हैं, बाधायें हैं. इनके शमन हेतु उनकी साधना श्रेष्ठतम मानी जाती है। जो व्यक्ति या साधक इस महाशक्ति की आराधना-उपासना करता है, ये उस साधक पर अति प्रसन्न हो, उसके शत्रुओं का भक्षण तो करती ही हैं, साथ ही उसके जीवन में धन-धान्य, समृद्धि की कमी नहीं होने देतीं, क्योंकि यह लक्ष्मी प्राप्ति में आने वाली बाधाओं का पूर्ण भक्षण कर देती हैं।

अतः लक्ष्मी प्राप्ति के लिए भी साधक को इस शक्ति की आराधना करते रहना चाहिए। महाविद्याओं में धूमावती की साधना बहुत ही क्लिष्ट मानी जाती है। इसके लिए साधक को बहुत ही पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। इस साधना से पूर्व तत्सम्बन्धित दीक्षा लेने का प्रयास करना चाहिए, इससे साधना काल में किसी प्रकार के भय आदि होने की संभावना नहीं रहती।

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना  विधि  Dhumavati mahavidya sadhana 

प्राचीन धूमावती महाविद्या साधना विधि Dhumavati mahavidya sadhana साधना विधान इस प्रयोग में निम्न सामग्री अपेक्षित है- ‘प्राणश्चेतना युक्त धूमावती यंत्र’, ‘दीर्घा माला’ तथा ‘अघोरा गुटिका’ । इसे किसी भी माह की अष्टमी, अमावस्या अथवा रविवार के दिन सम्पन्न करें। यह रात्रिकालीन साधना है, इसे रात्रि 9 बजे से 12 बजे के मध्य सम्पन्न करें। I साधक को स्नान आदि से पवित्र होकर, साधना-कक्ष में पश्चिम दिशा की ओर मुख कर ऊनी आसन पर बैठकर साधना करनी चाहिए। लाल वस्त्र, लाल धोती और गुरु चादर का प्रयोग करें। यह साधना सुनसान स्थान में, श्मशान में, जंगल में, गुफा में या किसी भी एकांत स्थल पर, जहां कोई विघ्न उपस्थित न हो, करना श्रेयस्कर रहता है। अपने सामने चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर धूमावती का चित्र स्थापित करें, फिर किसी प्लेट में ‘यंत्र’ को स्थापित करें।यंत्र को जल से धोकर उस पर कुकुम से तीन बिन्दु लाइन से लगा लें, जो सत्व, रज एवं तम गुणों के प्रतीक स्वरूप हैं। धूप व दीप जला दें तथा पूजन प्रारम्भ करें 

विनियोगः

दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लें, निम्न संदर्भ को पढ़े- अस्य धूमावती मंत्रस्य पिप्पलाद ऋषि, र्निवृच्छन्दः, ज्येष्ठा देवता, ‘धूं’ बीजं, स्वाहा शक्ति:, धूमावती कीलकं ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः । हाथ में लिए हुए जल को भूमि पर या किसी पात्र में छोड़ दें।

ऋष्यादि न्यासः ॐ पिप्पलाद ऋषये नमः शिरसि (सिर को स्पर्श करें) ॐ निवृच्छन्द से नमः मुखे (मुख को स्पर्श करें) ॐ ज्येष्ठा देवतायै नमः हृद्धि

(हृदय को स्पर्श करें) ॐ धूं बीजाय नमः गुझे (गुह्य स्थान को स्पर्श करें) ॐ स्वाहा शक्तये नमः पादयो (पैरों को स्पर्श करें) ॐ धूमावती कीलकाय नमः नाभौ (नाभि को स्पर्श करें) ॐ विनियोगाय नमः सर्वांगे

(सभी अंगों को स्पर्श करें)कर न्यासः ॐ धूं धूं अंगुष्ठाभ्यां नमः (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अंगूठों को स्पर्श करें।) ॐ हूं तर्जनीभ्यां नमः (दोनों अंगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ मां मध्यमाभ्यां नमः

(दोनों अंगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ वं अनामिकाभ्यां नमः (दोनों अंगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ तीं कनिष्ठिाभ्यां नमः

(दोनों अंगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः (परस्पर दोनों धूम हाथों को स्पर्श करें)

. यंत्र गुटिका और माला को दोनों हाथ की अंजलि में ले 14 लें, एकाग्रचित होकर दीपक की लौ पर मंत्र ॐ धूं धूं धूमावती) का 51 बार जप करते हुए ‘त्राटक’ करें। 11. इसके बाद सामग्री को दोनों नेत्रों से स्पर्श कराये, सामग्रियों को यथासंभव चौकी पर रख दें, ‘गुटिका’ को यंत्र के सामने रखें।

   संकल्प

– दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प करें, कि अमुक मासे महीने का नाम बोलें) अमुक दिने (दिन का नाम बोलें) अमुक गोत्रोत्पन्नो अपने गोत्र का नाम बोलें) अमुक (अपना नाम बोलें) समस्त शत्रु भय व्याधि निवारणार्याच दुःख दारिद्र्य  | विनाशाय श्री धूमावती साधना करिष्ये। हाथ में लिए जल को भूमि पर छोड़ दें। 

 ध्यान

 ध्यान दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवती सु धूमावती का ध्यान करें- अत्युच्चा मलिनाम्बरालिन गाया दुर्मना रुक्षामित्रितया विशालदशना सूर्योदरी पंचला । प्रस्वेदाम्बुचिता बुवाकु सतः कृष्णातिरुक्षाप्रभाः देवा मुक्तकत्वा सदाशिव कलिर्भूमावती मन्त्रिणा ।

अर्थात् ‘मलिन वस्त्र पहने हुए सबको भयभीत करने वाली, मन में विकार को उत्पन्न करने वाली, रूखे बाल वाली, मूख और प्यास से व्याकुल, बड़े-बड़े दांतों वाली, बड़े पेट वाली, | पसीने से भरी हुई, बड़ी-बड़ी आंखों वाली कांतिहीन खुले बालों वाली, सदा अप्रिय व्यवहार को चाहने वाली भगवती स प्रकार भगवती धूमावती के स्वरूप का चिन्तन करते हुए बायें हाथ में गुटिका को लेकर मुट्ठी बांध लें तथा ‘दीर्घा माला’ से निम्न मंत्र का 5 माला नित्य तीन दिन तक जप करें-

विश्वास, विश्वास, अपने आप में विश्वास, ईश्वर में विश्वास यही महानता का रहस्य है। यदि तुम पुराण के तैंतीस करोड़ देवताओं और विदेशियों द्वारा बतलाए हुए सब देवताओं में विश्वास करते हो, पर यदि अपने आप में विश्वास नहीं करते, तो तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती। अपने आप में विश्वास करो, उस पर स्थिर रहो और शक्तिशाली बनी । धूमावती का में ध्यान करता हूं कि वे मेरे जीवन की समस्त विघ्न बाधाओं का नाश करें।’ .

मंत्र ।। ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा।।

जप समाप्ति के बाद सभी सामग्रियों को चौकी पर बिछे कपड़े में ही लपेट कर चौथे दिन शाम को किसी जन शून्य स्थान में जाकर गड्ढा खोदकर दबा दें और पीछे मुड़कर न देखें। . घर आकर हाथ-पैर धो लें। यह साधना दुर्भाग्य की गूढ़ रेखाओं को मिटाकर सौभाग्य में बदलने की दिव्य क्रिया है। इस साधना के बाद निश्चय ही जीवन में सौभाग्य का सूर्योदय होगा और सम्पन्नतायुक्त एवं श्री सुखी जीवन का प्रादुर्भाव सम्पन्न होगा।

 

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Yogini Sadhana प्राचीन योगिनी साधना रहस्य -विधि विधान

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 Yogini Sadhana प्राचीन योगिनी साधना रहस्य -विधि विधान आज हम योगिनी साधना पर चर्चा करेंगे। यद्यपि स्त्री का हर रूप मधुर होता है, फिर भी जीवन में हर रूप का एक निश्चित अर्थ और महत्वपूर्ण स्थान होता है। चाहे मां का रूप हो, बहन हो या बेटी का, चाहे वह पत्नी हो या प्रेमिका या दोस्त। स्वरूप भिन्न हो सकते हैं. लेकिन गहरे दृष्टिकोण से हर रूप भोग के प्रयास में डूबे मातृत्व के एक अंतरशाला का प्रवाह लेकर ही चलता है, क्योंकि ऐसा करना हर स्त्री का मूल धर्म है, लेकिन इन सभी रूपों से कुछ अलग है, जो न केवल विशिष्ट है बल्कि विशिष्ट भी है, उसी एक रूप योगिनी का नाम है!

योगिनी एक नारी  देह में आबद्ध होते हुए, नारी मन की समस्त कोमल भावनाओं को एकत्र कर उपस्थित होते हुए भी अन्ततोगत्वा शक्ति का एक पुंज ही होती है, जो नारी देह का आश्रय लेकट सम्मुख आती है, क्योंकि शक्ति का आश्रय स्थल सदैव से ही नारी को स्वीकार किया गया है। केवल साधक ही नहीं, प्रत्येक सामान्य मनुष्य के जीवन में भावनाएं होती है, जो उसे सहज प्रवाह दे सकती हैं। जीवन से यदि भावनाओं को ही निकाल दिया जाए, तो मनुष्य व यंत्र में अंतर ही क्या रह जाएगा? किन्तु मनुष्य यंत्र नहीं हो सकता।  एक पहले ही इस युग की सभ्यता’ ने मनुष्य यंत्र बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है जिसके परिणाम की अधिक व्याख्या या वर्णन की आवश्यकता नहीं है। जो सम्मुख है, वह है एक यंत्रवत् जीवन जिसमें न किसी के प्रति कोई ममत्व है, न अपनत्व, न उछाह न वेग, न प्रेम और न ही फिर इन भावनाओं के अभाव में जीवन के प्रति कोई लक्ष्य ही।

किसी भी व्यक्ति से पूछ कर देखिए, कि उसके जीवन में जो आपाधापी चल रही है या जिस आपाधापी का न केवल उसने सृजन कर लिया है वदन् जिसका वह निरन्तर पोषण भी करता जा रहा है, उसका अर्थ क्या है? क्यों वह सदैव इतना उद्विग्न बना रहता है? इसके मूल्य पर उसे क्या प्राप्त हो जाएगा? किसी के पास भी इसका निश्चित उत्तर नहीं होगा, क्योंकि इन बातों का कोई निश्चित उत्तर हो भी नहीं सकता। भावनाएं जो जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि हो सकती हैं, जब उसी का अभाव हो गया, उसी का हनन् करके कुछ निर्मित करने की चेष्टा की, तो भूल तो वहीं से प्रारम्भ ही हो गयी।

और इसी बिन्दु पर आकर योगिनी साधना का महत्व स्वयमेव स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि योगिनी साधना का अर्थ ही है- भावनाओं की साधना, अपनत्व व ममत्व की साधना, जीवन में जो कुछ विस्मृत हो चला हो, जो कुछ टूट गया हो या जो कुछ रिक्त रह गय हो, उन सभी को अर्जित कर लेने या पुनः प्राप्त कर लेने की साधना यह तो भावनाओं का ही बल होता है कि जीवन में कोई भी व्यक्ति वह सब कुछ कर जाता है, जो अन्यथा उसके सहज बल से सम्भव नहीं था और यहां यह ध्यान रखने की बात है, कि बल का तात्पर्य शरीरिक बल से नहीं होता है।

यह तो मानसिक बल होता है, जो एक नर को पुरुष बनने की ओर तथा पुरुष को पुरुषोत्तम बनने की ओर उत्प्रेरित करता है और इसके मूल में होती हैं वे भावनाएं, जिनके मूल में होता है प्रेम! (यह कहना शायद पुनरोक्ति हो। जाएगा कि प्रेम का आधार होती है स्त्री) जो अपनत्व का भाव पत्नी के रूप में अधिक स्पष्टता से सामने आता है, प्रेमिका के रूप में वही भाव इस रूप में किंचित परिवर्तित हो जाता है, कि वह अपने प्रिय को सभी रूपों में केवल श्रेष्ठ ही नहीं श्रेष्ठतम देखना चाहती है. क्योंकि सामाजिक शिष्टाचार के अन्तर्गत एक प्रेमिका से अधिक पत्नी को अपनी मनोभावनाएं प्रकट करने की छूट होती है।

अंतर केवल सामाजिक बंधनों का है, विवेक का नहीं, और यह जीवन में सबसे अधिक संतोष और संतुष्टि से अधिक एक अद्वितीय सौ संतुष्टि का कारण बन जाता है। कोई मेरे लिए भी चिंतित रहता है, कोई | वह अनकहे रूप में मुझ पर अपना प्यार बरसाते रहते हैं, कोई मेरे बारे में भी सोचता रहता है और सबसे बड़ी बात यह है कि कोई मेरे पूरे अस्तित्व पर अपना अधिकार मानता है। क्योंकि इसका मतलब है कि ऐसा आश्वासन मिलना। भावनाओं पर आधारित केवल एक प्रकार की सुरक्षा भावना और आश्वासन ही वास्तविक सुरक्षा भावना दे सकता है, अन्यथा व्यक्ति को यह नहीं पता होता कि वह इसे प्राप्त करने के प्रयास में कहां भटकता है।

जीवन एक निरपेक्ष घटना नहीं होती है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी पद प्रतिष्ठा अथवा आर्थिक स्थिति का क्यों न हो. अपने जीवन का ताना-बाना किसी व्यक्ति या और अधिक विशद रूप में कहें तो किसी भावना से जोड़ कर ही बुनना चाहता है। सामान्यतयः व्यक्ति अपने जीवन को या अपनी अस्मिता को अपने परिवार से जोड़ कर जीवित रखना चाहता है। इसमें कोई अनुचित बात भी नहीं है।

परिवार जैसी सामाजिक संस्था के निर्माण के पीछे उद्देश्य ही यही रहा है, किन्तु निरन्तर बढ़ते हुए आर्थिक एवं अन्यान्य दबावों के बाद क्या आज यह सम्भव रह गया है. कि व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से कुछ अलग हट कर अपने जीवन को आहलाद व मधुरता देने वाले क्षणों के विषय में चिंतन तक कर सके ?

जीवन में ऐसी स्थिति आ जाने पर जिस प्रवाह की आवश्यकता होती है, वह किसी गणित की अपेक्षा केवल साधनाओं से ही उपलब्ध हो सकती है, क्योंकि प्रत्येक साधना स्वयं में शक्ति का एक-एक अजरा प्रवाह ही तो होती है। और यही तथ्य योगिनी साधना के विषय में भी पूर्णतयः सत्य है। आज समाज में योगिनी शब्द को लेकर क्या धारणा है, इसको कदाचित विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं अनेक व्यक्तियों की दृष्टि में भैरवी व योगिनी के मध्य भी कोई भेद नहीं होता।

यूं भैरवी की प्रस्तुति ही कहा प्रासंगिक रूप में सम्भव हो पायी है? किन्तु योगिनी इतना हल्का शब्द नहीं होता। योगिनी स्वयं में शक्ति तत्व की एक विशिष्ट प्रस्तुति व स्वरूप होती है, जिसकी साधना सम्पन्न करना प्राण तत्व को संचेतन कटने का एक उपाय होता है। यह सत्य है कि योगिनी की प्रस्तुति एक प्रेमिका रूप में होती है। किन्तु यह आवश्यक नहीं कि प्रेमिका शब्द से सदैव वासनात्मक अर्थ ही अभिप्रेत हो क्या प्रेमिका शब्द से एक महिला मित्र का अर्थ अभिप्रेत नहीं हो सकता है? वस्तुत योगिनी का वर्णन प्रेमिका रूप में होने के जो है वह है कि भारतीय समाज इतना की मान्यताओं में महिला मित्र की कभी कोई ही नहीं रही. लेकिन जो भावगत है वह सदैव से यही रहा है।

साथ ही प्रेमिका का तात्पर्य होता है, ऐसी स्त्री, जो अपने प्रिय पर अपना सावरकर देने में ही अपना सुख मन हो और न केवल विलक्षण सौन्दर्य के मेंट इस रूप में भी योगिनी की कोई भी उभी करने में असमर्थ ही होगी। जीवन को भावनाओं के आधार पर पुनः निर्मित करने व योगिनी के रूप में एक वास्तविक प्रेमिका प्राप्त करने के इच्छुक साधकों के हेतु 

जिसे सकर वे अपने भावनाशून्य हो रहे जीवन में हास्य, विनोद व मधुरता जैसे कुछ नये पृष्ठ जोड़ पाने में समर्थ हो सकते हैं।

योगिनी साधना Yogini Sadhana  विधि 

इस साधना में प्रवृत्त होने वाले साधकों के लिए आवश्यक है कि वे ताम्रपत्र पर अंकित ‘योगिनी यंत्र’ व सफेद हकीक की माता को साधनात्मक उपकरण के रूप में प्राप्त कर लें। यह साधना उपरोक्त दिवस (योगिनी एकादशी) के अतिरिक्त किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न की जा सकती है। साधना में वस्त्र आदि का रंग श्वेत होना चाहिए तथा दिशा उत्तर मुख होनी चाहिए। इस साधना में किसी विशेष विधि-विधान को सम्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है। यंत्र व माला का सामान्य पूजन करने पश्चात् दत्तचित्त भाव से निम्न मंत्र की ग्यारह माला मंत्र जप सम्पन्न करें- खिलता हुआ गोरा रंग भरा भरा सा पुष्ट मांसल बदन, अंडाकार चेहरा, खंजन पक्षी की भांति नयन और उन नयनों की एक-एक चपलता में झिलमिलाते प्रेम के कई कई सदिश योगिनी तो स्वयं में एक उपमा है, उसकी उपमा दें भी तो किससे दें  प्रेमिका . अवसर पर ही है, 

मंत्र  योगिनी साधना Yogini Sadhana

॥ ॐ ह्रीं योगिनि आगच्छ आगच्छ स्वाहा ॥ OM HREEM YOGINI AAGACHH AAGACHH SWAHA

यह एक दिवसीय साधना है तथा साधना सम्पन्न करने के दूसरे दिन यंत्र ६ माला को किसी स्वच्छ जलाशय में या निर्जन स्थान पर विसर्जित कर देना चाहिए। जैसा कि प्रारम्भ में कहा, योगिनी शक्ति तत्व का ही एक विशिष्ट प्रस्तुतिकरण होती है, अतः यह स्वाभाविक ही है, कि इसे मनोयोग पूर्वक सम्पन्न करने वाले साधक को जीवन के प्रत्येक पक्ष में अनुकूलता मिलने की क्रिया स्वयमेव | प्रारम्भ हो जाए, चाहे वह धन सम्बन्धी पक्ष हो, स्वास्थ्य की समस्या हो सौन्दर्य प्राप्ति की कामना हो या गृहस्थ जीवन के किसी भी पक्ष को स्पर्श करता कोई भी पक्ष क्यों न हो। प्रस्तुत साधना की एक अन्य गुहा विशेषता यह साधना भी है। अनुभवों को भी है कि यह प्रबल पौरुष प्राप्ति की साधना सम्पन्न करने के उपरान्त अपने गोपनीय ही रखें।

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dhumavati SADHNA प्राचीन धूमावती साधना अनुभव और लाभ PH.8528057364

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dhumavati SADHNA प्राचीन धूमावती साधना अनुभव और लाभ PH.8528057364

dhumavati SADHNA प्राचीन धूमावती साधना अनुभव और लाभ PH.8528057364

 

आज  हम Dhumavati धूमावती साधना की चर्चा करेंगे अपना जीवन यापन कठिन परिस्थितियों में रहकर कर रहा है, चाहे वह किसी संस्था में कार्यरत हो या व्यवसाय कर रहा अथवा स्वतंत्र क्षेत्र में कार्य कर रहा हो. हर क्षेत्र में कठिनाई, बाधाएं शत्रु बाधा एवं प्रतिस्पर्धा आदि चुनौतियां हर पल व्यक्ति को नीचा दिखाने के लिए तत्पर रहती है। इन सब कारणों की वजह से व्यक्ति हर पल अपने सम्मान की रक्षा के लिए चिन्तित रहता ही है।

dhumavati SADHNA प्राचीन धूमावती साधना अनुभव और लाभ PH.8528057364
dhumavati SADHNA प्राचीन धूमावती साधना अनुभव और लाभ PH.8528057364

 

इसके समाधान एवं निष्कंटक अपने क्षेत्र में प्रगति के लिए प्रबल दैवीय संरक्षण प्राप्त होना, आज नितांत आवश्यक हो गया है। दैवीय संरक्षण कैसे प्राप्त हो, इसके लिए साधक को थोड़ा सा प्रयास करने की एवं उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इन दोनों की समविन्त क्रिया से साधक दैवीय कृपा प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है।

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वैसे भी प्रत्येक देवी देवता मनुष्य को हर पल, हर क्षण, रक्षा-सुरक्षा प्रदान करने के लिए तत्पर रहते हैं, आवश्यकता केवल इस बात की है, कि हम इनकी कृपा के अधिकारी बनें आवश्यकता इस बात की है. कि हम उनसे सहयोग एवं आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रबल भावना एवं पात्रता रखें। जीवन में चाहे भौतिक पक्ष में उन्नति की बात हो अथवा आध्यात्मिक उन्नति एवं पूर्णता प्राप्त करने की त हो, उसमें महाविद्या साधना का महत्व सर्वोपरि है।

अलग-अलग कार्यों हेतु शिव के घटदान स्वल्प उनकी शक्ति स्वरूप से इन दस महाविद्या की उत्पत्ति मानी गयी है, जिनकी साधना साधक अपनी समस्या के निवारण के लिए उचित मुहूर्त पर सम्पन्न क सफल व्यक्ति बन सकता है। दस महाविद्याओं में भगवतीDhumavati धूमावती साधना स्थायी | सम्पति की प्राप्ति, प्रचण्ड शत्रुनाश, विपत्ति निवारण संतान की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण साधना है। वास्तव में इस साधना को सम्पन्न करना जीवन की अद्वितीयता है।