Author: Rodhar nath

मैं रुद्र नाथ हूँ — एक साधक, एक नाथ योगी। मैंने अपने जीवन को तंत्र साधना और योग को समर्पित किया है। मेरा ज्ञान न तो किताबी है, न ही केवल शाब्दिक यह वह ज्ञान है जिसे मैंने संतों, तांत्रिकों और अनुभवी साधकों के सान्निध्य में रहकर स्वयं सीखा है और अनुभव किया है।मैंने तंत्र विद्या पर गहन शोध किया है, पर यह शोध किसी पुस्तकालय में बैठकर नहीं, बल्कि साधना की अग्नि में तपकर, जीवन के प्रत्येक क्षण में उसे जीकर प्राप्त किया है। जो भी सीखा, वह आत्मा की गहराइयों में उतरकर, आंतरिक अनुभूतियों से प्राप्त किया।मेरा उद्देश्य केवल आत्मकल्याण नहीं, अपितु उस दिव्य ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना है, जिससे मनुष्य अपने जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझ सके और आत्मशक्ति को जागृत कर सके।यह मंच उसी यात्रा का एक पड़ाव है — जहाँ आप और हम साथ चलें, अनुभव करें, और उस अनंत चेतना से जुड़ें, जो हमारे भीतर है ।Rodhar nath https://gurumantrasadhna.com/rudra-nath/

Neel Saraswati sadhna नील सरस्वती साधना रहस्य ph.85280 57364

Neel Saraswati sadhna नील सरस्वती साधना रहस्य ph.85280 57364

Neel Saraswati sadhna नील सरस्वती साधना रहस्य ph.85280 57364

Neel Saraswati sadhna नील सरस्वती साधना रहस्य ph.85280 57364
Neel Saraswati sadhna नील सरस्वती साधना रहस्य ph.85280 57364

Neel Saraswati sadhna नील सरस्वती साधना रहस्य ph.85280 57364 आदौ सरस्वती पूजा श्री कृष्णेन विनिर्मितायत्प्रसादान्मुनिश्रेष्ठ मूर्खोभवति पण्डितःदेवी भागवत में नारद मुनि भगवान नारायण से देवी|

सरस्वती का चरित्र जानने की इच्छा प्रकट करते हैं। उनकी जिज्ञासा का शमन करते हुए भगवान नारायण कहते हैं -| सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने सरस्वती की पूजा की जिसकी कृपा से श्रीकृष्ण महान् विद्वान, जगद्गुरु बनें।शुक्ल यजुर्वेद की रचना महर्षि याज्ञवल्क्य ने की।

ऐसी मान्यता है कि याज्ञवल्क्य ने मां सरस्वती की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया एवं उनकी कृपा से शुक्ल यर्जुवेद की रचनाकरने में समर्थ हुए थे। प्रसंग है कि महर्षि याज्ञवल्क्य अपना सारा ज्ञान भूल चुकेथे और उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि वे किस प्रकारनवीन वेद की रचना कर पाएंगे? फिर याज्ञवल्क्य को स्मरण आया कि जब भी देवताओं को ज्ञान प्राप्ति में बाधा आई है।

उन्होंने देवी सरस्वती की कृपा से उस संकट को पार किया है। श्री मद्भागवत् में इस प्रसंग का उल्लेख आया है। अतःयाज्ञवल्क्य सरस्वती की स्तुति करते हुए कहते हैं-हे देवी! एक बार सनत्कुमार ने ब्रह्माजी से ब्रह्मज्ञान के विषय में पूछा।

उस समय ब्रह्म सिद्धान्त की व्याख्या करने में ब्रह्मा मूक की भांति अक्षम हो गए थे। उसी समय स्वयं श्रीकृष्ण वहां आ गए एवं उन्होंने कहा, हे प्रजापते! आप भगवतीसरस्वती को अपना इष्ट देवी बनाकर उनकी स्तुति कीजिये ।

परमात्मा श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर ब्रह्माजी ने भगवती सरस्वती की स्तुति की। फिर, सरस्वती की कृपा से वे ब्रह्म ज्ञान के विषय में उत्तम सिद्धान्त का विवेचन करने में सफल हो गए। इसी प्रकार जब पृथ्वी ने शेषनाग से ज्ञान का एक रहस्य पूछा तब वे मौन हो गए।

तदुपरान्त व्यथित हृदय शेषनाग ने कश्यप ऋषि के आज्ञानुसार देवी सरस्वती का पूजन किया ।तदन्तर वे भ्रम का नाश करने वाले पवित्र सिद्धान्त का विवेचन कर सके।

इसी प्रकार जब व्यास जी ने वाल्मीकि से पुराण सूत्र पूछातब वे मौन हो गए। जगदम्बा सरस्वती का स्मरण करने के बाद ही मुनि वाल्मीकि पुराण सिद्धान्त का प्रतिपादन करने में सफल हो पाए।

भगवान श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न व्यासनी उस पुराण सूत्र को सुनकर पुष्कर क्षेत्र में देवी सरस्वती की आराधनाकिए। फिर सरस्वती वर पाही और पुराणों की रचना करने में समर्थ हुए। हालांकि बाद में यहमाना गया कि व्यास मुनि नील सरस्वती की कृष्ण से पुराणों की रचना कर गए।

इन्द्र ने भी जब भगवान शंकर से तत्वज्ञान के सम्बन्ध में पूछा तब सरस्वती का ध्यान करके ही शिवजी ने इन्द्र को ज्ञानोपदेश दिया। इन्द्र ने जब देवगुरु बृहस्पति से शब्द शास्त्र के सम्बन्धमें पूछा तब ने स्वयं दिव्य पुष्कर क्षेत्र में एक हजार बरसों तक तप किया और सरस्वती कृपा से वे शब्द शास्त्र के ज्ञान में सिद्ध हुए एवं फिर एक हजार बरसों तक उन्होंने इन्द्र को शब्द शस्त्रानयाज्ञवल्क्य आगे कहते हैं कि जब पंचानन शिव, चतुराननब्रह्मा एवं सहखमुख वाले शेष नाग आपकी स्तुति नहीं करपा रहे हैं, फिर मैं आपकी स्तुति किस प्रकार कर पाऊंगा?

याज्ञवल्क्य की इस प्रकार स्तुति करने पर देवी सरस्वती ने उसे साक्षात् दर्शन दिया, जिसके प्रभाव व याज्ञवल्क्यशुक्ल यजुर्वेद की रचना कर पाए।याज्ञवल्क्य रचित सरस्वती स्तोत्र का जो व्यक्ति नियमित| रूप से पाठ करता है, वह बृहस्पति के समान मान बक्ता होजाना है।क्या नील सरस्वती, सरस्वती से भिन्न है?

सरस्वती की कल्पना तुषार द्वार (बर्फ के हार की तरह या श्वेत रूप में की गई है। परन्तु नाम तंत्र में उच्छिष्ट गणपति की संगिनी नील सरस्वती हैं, सरस्वती का नील रूपा दस महाविद्या में दूसरे स्थान पर अवस्थित देवी तारा जो संसार बंधनों से भक्तों को तार देती हैं का एक रूप नील सरस्वती है इस रूप में भगवती तारा अपने साधकों को हर प्रकार की शत्रु बाधा से मुक्त कर देती है। यह भी माना गया है कि नीलसरस्वती के रूप में महाविद्या तारा में काली का रूप समाहित| हो गया है।

इसलिए नील सरस्वती की आराधना करते हुए साधक नग कहते हैं।

घोर रूपे महरावे सर्व शत्रु भयंकर यो वरदे देवि आहि माम् शरणागत  के नियमित साधकों को यह ज्ञातहोगा कि महाविद्या तारा की साधना तंत्र मार्ग केअनुयायियों के लिए अत्यावश्यक है। देवी तारा भोग औरमोक्ष दोनों प्रदान करती है। पूर्ण मोक्ष की स्थिति नहीं मिलती है, थोड़ा उधेड़बुन में व्यक्ति अटका रह जाता है कि छोड़ दिया जाए कि ना छोड़ दिया जाए?

परंतु नील सरस्वती देवी तारा का एक रूप है उनकी कृपा से साधक अपने शत्रुओं का आमूल चूल विनाश कर देता है।भौतिक सुविधाओं के मार्ग में जिसे प्रेय का मार्ग भी कहा गया है, उस मार्ग पर शत्रु बाधा का शमन जीवन से कष्टों का अंत है।

नील सरस्वती देवी साधना  विधि 

धवल रूप में सरस्वती शुद्ध बुद्धि की परिचायक है औरनील रूप में शुद्ध बुद्धि के साथ जुड़े हुए पराक्रम की नील सरस्वती उच्छिष्ट गणपति की संगिनी है जो शत्रु संहार केलिए बेजोड़ हैं।आमतौर पर मनुष्य अपने आंतरिक शत्रुओं से जूझ रहा होता है। एक शब्द में इसे डिप्रेशन या नकारात्मकता कहाजाएगा।

नील सरस्वती ज्ञात और अज्ञात आंतरिक और बाह्यदोनों शत्रुओं का सर्वनाश कर देती है जिसके बाद परिमार्जितबुद्धि शुभ के पथ पर अग्रसर हो जाता है। यह साधना आश्विन नवरात्रि अथवा किसी भी पुष्य नक्षत्रपर प्रातः प्रारंभ की जा सकती है।

साधक श्वेत धोती पहनकर पूर्व दिशा की ओर मुंह कर बैठें। यदि अपने बालकों कोभी साधना कराना चाहते हैं तो उन्हें भी श्वेत धोती पहना कर अपने साथ बैठाएं, चन्दन का तिलक करें, सामने एक बाजोटपर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु चित्र / गुरु विग्रह / गुरुयंत्र / गुरु पादुका, सरस्वती चित्र लगाएं। शुद्ध घी का दीपक तथा अगरबत्ती जलाएं।

तांबे के पात्र में पीले पुष्प के आसनपर पीले अक्षत रखें और उस पर नील सरस्वती मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठित ‘सरस्वती यंत्र’ स्थापित करें।भाग्योदय हेतु इस विशेष साधना में सरस्वती पूजन से पूर्व गुरु पूजन कर गुरुदेव से साधना में सफलता की कामना अवश्य करनी चाहिए।

इसी क्रम में सर्वप्रथम गुरु पूजन सम्पन्न करें। गुरुदेव से साधना में सफलता की प्रार्थना हेतु ध्यान करें

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।।

निखिल ध्यान के पश्चात् गुरु चित्र / विग्रह / यंत्र /

पादुका को जल से स्नान करावें

ॐ निखिलम् स्नानम् समर्पयामि ।।

इसके पश्चात् स्वच्छ वस्त्र से पौंछ लें निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए कुंकुम, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, धूप-दीप सेपंचोपचार पूजन करें

.-ॐ निखिलम् कुंकुमं समर्पयामि ।

ॐ निखिलम् अक्षतान् समर्पयामि ।

ॐ निखिलम् पुष्पम् समर्पयामि ।

ॐ निखिलम् नैवेद्यम् निवेदयामि ।

ॐ निखिलम् धूपम् आम्रापयामि, दीपम्दर्शयामि ।

(धूप, दीप दिखाएं)अब तीन आचमनी जल गुरु चित्र / विग्रह / यंत्र /

पादुका परघुमाकर छोड़ दें। इसके पश्चात् गुरु माला से गुरु मंत्र की एक माला मंत्र जप करें-॥

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः ।।

गुरु मंत्र का जप करने के पश्चात् दोनों हाथों में पीले पुष्पलेकर

निम्न मंत्र से सरस्वती का ध्यान करें-

शवासनां सर्पभूषां कीं चापि कपालकंचषकं त्रिशूलं च दधतीं च चतुष्करैः ।मुण्डमाला धरांत्र्यक्षां भजे वार्ताः सरस्वतीम् ।।

शव आसन पर विराजमान सर्पों के आभूषण धारण की हुई, शत्रुओं का नाश करने वाली, चारों हाथों में कपाल, त्रिशूलएवं मुण्ड माला धारण की हुईं, तीन नेत्रों वाली भगवती नीलसरस्वती का मैं नित्य ध्यान करता हूं।ध्यान के पश्चात् पुष्पों को सरस्वती यंत्र पर अर्पित करदें।

इसके पश्चात् साधक ‘मणिमाला’ से निम्न मंत्र की 1माला मंत्र जप करें।मन्त्र।।

ॐ ह्रीं श्रीं ऐं वाग्वादिनि भगवतिअर्हन्मुख निवासिनि सरस्वति आस्येप्रकाशं कुरु कुरु स्वाहा ऐ नमः ।।

मंत्र जप के बाद माला को यंत्र के ऊपर रख दें और ध्यानअवस्था में बैठकर भगवती सरस्वती से शुद्ध वाणी एवंभाग्योदय हेतु प्रार्थना करें। इसके पश्चात् सरस्वती का मूलमंत्र ‘ॐ ऐं ॐ‘ का कम से कम एक घड़ी अर्थात् 24 मिनट तक जप करते रहें। इस प्रकार यह साधना सम्पन्न होती है।साधना की पूर्णता के पश्चात् अगले दिन यंत्र एवं माला को सफेद वस्त्र में बांधकर जल में विसर्जित कर दें।

काल भैरव प्रत्यक्षिकरण साधना | भैरव को बुलाने का मंत्र सहित ph.85280 57364

 

महालक्ष्मी यक्षिणी साधना सरल यक्षिणी साधना ph.85280 57364

lakshmi yakshini महालक्ष्मी यक्षिणी साधना-सरल यक्षिणी साधना

lakshmi yakshini महालक्ष्मी यक्षिणी साधना-सरल यक्षिणी साधना

lakshmi yakshini महालक्ष्मी यक्षिणी साधना-सरल यक्षिणी साधना
lakshmi yakshini महालक्ष्मी यक्षिणी साधना-सरल यक्षिणी साधना

नमस्कार दोस्तों, गुरु मंत्र साधना में से एक में आपका फिर से स्वागत है, आज मैं आप लोगों के लिए लक्ष्मी यक्षिणी साधना लेकर आया हूं, हालांकि तांत्रिक लेखन में इनका वर्णन शायद ही कभी किया जाता है, लेकिन मैंने उन्हें आपके लिए ढूंढ लिया है, यह एक ऐसी देवी है जिसके बहुत अच्छे परिणाम हैं, अगर कोई उन्हें साबित कर दे तो यह उसे अमीर बनाता है और अगर उसकी साधना में एक गलती है। अगर आप जाएंगे तो वे आपको गरीब बना देंगे, इसलिए आपको उनकी साधना का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

यदि आपको उनकी साधना करनी है, तो आपको ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 4:00 बजे उठना होगा और इसे सुबह 4:00 बजे करना होगा यानी प्रकाश नहीं निकलता है और अंधेरा रहता है। यदि आप इसे घर पर कर रहे हैं तो आपके पास एक पवित्र स्थान होना चाहिए या आपको उस स्थान को पवित्र और शुद्ध करना चाहिए। जब तक आपकी साधना चल रही है तब तक कोई भी अशुद्ध व्यक्ति या स्त्री आपके घर को स्पर्श न करे और न ही जब तक आपकी साधना चलती रहे तब तक आपको अपने घर आने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। आपको अपने कमरे में धूप का चश्मा, दीपक, चंदन, फूल आदि देने हैं और इसे आपको खुद साफ करना है।

अपने कमरे में फूलों की माला लटकाएं, खुशबू के साथ खुशबू छिड़कें और कमरे को पूरी तरह से सजाएं ताकि जब देवी आएं तो वह बहुत खुश हों। आपको देवी लक्ष्मी की तरह उसकी पूजा करनी चाहिए क्योंकि वह देवी लक्ष्मी की सेवक है और आपको सब कुछ दे सकती है। उनकी साधना के लिए, आपको उत्तर भदपद में उनकी एक मूर्ति बनानी होगी। आप अष्टधातु की एक छोटी मूर्ति बना सकते हैं और आपको सुबह उन्हें गंगा जल से स्नान कराना है। आपको केसरिया और कस्तूरी का तिलक लगाना है, आपको कुशा के आसन पर बैठना है और आपको चमकीले पीले कपड़े पहनने हैं। मूर्ति के नीचे एक पीला कपड़ा भी बिछाया जाना चाहिए।

आपको भक्ति के साथ इसकी पूजा करनी है, आपको भक्ति के साथ पानी पीना है और अपने दिल में एक मूर्ति पहननी है, कल्पना करें कि यह आपके दिल में रह रहा है। जाप तुलसी के गुलाब पर आपको 51 गुलाब के फूल का जाप करना है और भांग के लड्डू बनाकर उनके सामने रखना है, इस साधना को आपको 51 दिनों तक करना है। अंतिम दिन यक्षिणी देवी आपको दर्शन देंगी, मैं आपको पाठ में जो विवरण मिलता है उसे बताता हूं, जब वह आ रही होती हैं तो ऐसा लगता है जैसे राजा महाराज आ रहे हैं! इससे पहले, देवता पहले से उनका स्वागत करने की तैयारी करते हैं।

चारों ओर शांति है डर का कोई ठिकाना नहीं है, देवी को ज्यादातर सपने में देखा जाता है और बड़ी सुंदरता के साथ पेश किया जाता है, ऐसा कहा जाता है कि वह बहुत सुंदर है और 16 से 17 साल की लड़की की तरह दिखती है, यह चांदी के रंग की होती है, उसे मुर्गिनी भी कहा जाता है, यानी हिरण और चंपा शाखा जैसी आंखों के साथ। यहां एक पेड़ है जिसे चंपा कहा जाता है, यह बहुत सुंदर है। वह अपनी नाक में सोने की नाक पहनकर और दोनों हाथों में कमल का फूल पकड़े हुए आती हैं, आपको समझना चाहिए कि देवी लक्ष्मी एक ही हैं। कहा जाता है कि यदि उसकी कृपा प्राप्त हो जाए तो वह धन के धनी हो जाती है और क्रोधित हो जाए तो साधक को भिखारी बना देती है।

अर्थात अपनी साधना में आलस्य नहीं करना चाहिए, पूर्ण स्वच्छ रहना चाहिए, पूर्ण ब्रह्मचर्य धारण करना चाहिए और गंदी चीजों, गंदे विचारों, गंदे विचारों से दूर रहना चाहिए। यदि आप उसे देवी लक्ष्मी की साधना के रूप में सोचते हैं और ऐसा करते हैं, तो वह जल्द ही खुश हो जाएगी और आपको सब कुछ देगी। यह आपको धन, सम्मान, महिमा, प्रसिद्धि, शोहरत सब कुछ देगा और कहा जाता है जिसके पास धन और धन होता है उसे किसी चीज की कमी नहीं होती। यदि आप उनका सही ढंग से पालन करते हैं, तो वे आपको यहां विकल्प भी देंगे और यदि आप उच्च गुणवत्ता की तलाश में हैं, तो यह आपके साथ तीन प्रारूपों में से एक को भी स्थापित करेगा। चलिए आपको उनकी साधना का मंत्र बताते हैं, उनका मंत्र इस प्रकार है।

मँत्रः ॐ ऐं ह्री श्रीं कमल धारिणी लक्ष्मी यक्षिणी श्रीं स्वाहा ।। 

 

56 कलवे कौन है -56 कलवों क्या इतिहास है साधना रहस्य ph.8528057364

56 कलवे कौन है - 56 कलवों क्या इतिहास है सम्पूर्ण रहस्य

56 कलवे कौन है -56 कलवों क्या इतिहास है साधना रहस्य ph.8528057364

 

56 कलवे कौन है - 56 कलवों क्या इतिहास है सम्पूर्ण रहस्य
56 कलवे कौन है – 56 कलवों क्या इतिहास है सम्पूर्ण रहस्य

56 कलवे कौन है -56 कलवों क्या इतिहास है साधना रहस्य ph.8528057364 जय मां भगवती नमस्कार दोस्तों आप सभी का समस्या तंत्र चैनल में बहुत-बहुत स्वागत है दोस्तों आप सभी के लिए एक नई साधना एक नया रहस्य दोस्तों आप लोगों ने सुना ही होगा 56 कलवे के बारे में दोस्तों यह जो 56 कलवे होते हैं या अपने आप में यह समझ ले एक मां शक्ति है जिन  लोगो के पास यह कल्वे गए वो वो खुद एक शक्ति बन गए गुरु मछिंद्रा नाथ से गुरु गोरखनाथ को मिले इस्माल योगी को मिले इस्माल योगी और गुरु गोरखनाथ से  लोना चमारन  को मिले पांच बावरी Panch Bawri को गोगा जाहिर वीर की मदद  करने पर  56 कल्वो शक्ति प्रपात करना जिस को भी ५६ कल्वे प्राप्त हुए वो सिद्ध बन गया

56 कलवे कौन है -56 कलवों क्या इतिहास है साधना रहस्य
56 कलवे कौन है -56 कलवों क्या इतिहास है साधना रहस्य

लोग उसके पूजा करने लगे जिसकी भी ज़िंदगी में यह होते है वो सिद्ध हो जाता है लोग उनकी साधना करते हैवह असीम शक्तिओ का मालिक बन जाता है। इतहास साक्षी है पांच बावरी Panch Bawri सिर  धड़ से अलग होने पर भी लड़ते रहे।और शासक नवरंग शाह बादशाह को सबक सिख्या। 

किसी की खबर मंगवानी हो ५६ कल्वे शक्ति के द्वारा किसी को पीड़ा  देनी हो शमशान की शक्ति का काट करना हो वह बांधनी  कोख  खोलनी हो ५६ कल्वे से सब संभव है  । 

हाजिरी मंगवानी हो मारण करना हो आकर्षण करना हो वशीकरण करना हो उच्चाटन करना हो सभी षट्कर्म कर देते  है  ।   इस सभी क्रियाएं 56 कलुआ के द्वारा की जा सकती है और साथ ही किसी की भी पूछा देना किसी भगत के द्वारा वह भी 56 कलवे करते हैं उस कार्य को भी 56 कलवे सिद्ध करते हैं । 

56 कलवे के द्वारा किसी भी व्यक्ति की सालों पुरानी बातें वह भगत खोल के रख सकता है। इनकी शक्ति से भूत भविष्य जान सकते है और बदल सकते है।जिन लोगों को भी जिन लोगों को नहीं मतलब जिन भी शक्तियों को 56 कलवे करने प्राप्त हुए हैं जैसे पांच बावरी को गोगा राणा को उन सभी को शराब चढ़ाई जाती है भोग लगाई जाती है

 

वह जो शराब है वह 56 कलवे  का  भोग  होता है जिनके द्वारा यह कार्य लेती हैं और हर बड़ी शक्ति के साथ बहुत सारी शक्तियां चलती है जो कुछ उनके नीचे कार्य करते हैं तो कुछ उनके साथ कार्य करती हैं 

 

जो शिवजी से उत्पन्न हुए थे दोस्तों किसी का काम करना है यह बहुत तेजी से काम करता है लेकिन इसको संभालने के लिए आपके पास कोई बड़ी शक्ति होनी चाहिए ज्यादा करके 56 कलवा मां काली के पास रहते हैं

क्योंकि यह मां काली को अपना मानते हैं और इनको काबू करने के लिए मां काली का आपके ऊपर आशीर्वाद कृपा होना चाहिए क्योंकि यह जल्द किसी का सुनते नहीं है क्योंकि इनके पास एक तेज दिव्य शक्ति रहती है जो मां काली शिवजी से प्राप्त होते रहता है और यह छोटे बालक होने की वजह से या कहीं भी आते जाते रहते हैं

जैसे किसी भी मंदिर में श्मशान में पीर के स्थान पर और कई कई जगहों पर आते जाते रहते हैं और कोई भी देवी देवता इन्हें रोकने नहीं है क्योंकि यह एक शाक्तिशाली   के स्वरूप का रहता है और इसे कोई जल्द झगड़ा नहीं लेता है और देवी देवता इन्हें छोटा बालक समझ कर छोड़ देते हैं और दोस्तों इसका प्रयोग ज्यादा करके मारण उच्चाटन में किया जाता है यह एक मिथ  है। यह हर तरह का काम कर सकता है साधक सिद्ध बनने के लिए करते है। 

और यह खटकर्म  मिंटो में कर सकता  इसे मारण उच्चाटन के लिए भेजा जा सकता  है और जब इसे मार उच्चाटन के लिए भेजा जाता है तो इसके साथ कोई और शक्ति साथ में भेजी जाती है जो इसको संभाल सके और इसका साधना दोस्त जल्द कोई लोग नहीं करते हैं कि आपकी या जल्द सिद्ध नहीं होता है और आप कोई शक्ति के माध्यम से इसे भूल भी लेते हैं

तो वह आपका कार्य तो करेगा लेकिन उसके साथ बड़ी शक्ति कोई रखनी पड़ेगी जैसे आपने किसी को उच्चाटन के लिए इसे भेजा और वह गया उसे यह नहीं पता चलेगा कि उच्चाटन में कितना उच्चारण करना है यह मर भी सकता है क्योंकि वह एक बालक है उसे पता नहीं चलेगा इसलिए साथ में कोई बड़ी शक्ति होनी चाहिए और बड़ी शक्ति जल्द उच्चाटन मारण नहीं करती है

दोस्तों इसकी भारतीय को आप समझे और दोस्तों जब यह नाराज होता है तो यह किसी का सुनता नहीं है इसलिए दोस्तों इसकी साधना बहुत सोच समझकर करें क्योंकि यह 56 कलुआ ज्यादा करके मीनाक्षी करता है और इसकी साधना मां काली शिवजी की आहुति देकर साधना किया जाता है

जिससे आपको किसी भी प्रकार का नुकसान ना हो और उसे लेवल पर मां काली शिवजी का कृपा होनी चाहिए आप पर और दोस्तों यह साधना ज्यादा करके रात्रि को शमशान में किया जाता है और आपके पास सुरक्षा रेखा मजबूत होना चाहिए और साधना करते समय आपके गुरु होने चाहिए जो आपको साधना करते समय आपको संभाल सके और यह आपको साधना करना है 

लीलावती अप्सरा साधना lilavati Apara sadhna ph.85280 57364

मधुमती विद्या – साधना सबसे बड़ी आकर्षण वशीकरण की साधना ph.8528057364

लीलावती अप्सरा साधना lilavati Apara sadhna ph.85280 57364

sddefault 1 https://gurumantrasadhna.com/author/gurumantrasadhna-comgmail-com/page/17/

लीलावती अप्सरा साधना lilavati Apara sadhna ph.85280 57364

लीलावती अप्सरा साधना lilavati Apara sadhna ph.85280 57364
लीलावती अप्सरा साधना lilavati Apara sadhna ph.85280 57364

लीलावती अप्सरा साधना lilavati Apara sadhna ph.85280 57364 आज साधना को मैं देने जारहा हूं मैं पूर्ण भौतिक सुख साधनों केलिए जान जाति है और शीघ्र ही फलिबुत होने वाली है साधना बहुत ही शक्तिशाली और संपन्न कहीं जाति है

इस साधना को संपन्न करने से जीवन में हर प्रकार का ऐश्वर्या और सुख साधन प्राप्त होता है जो की सहजता से मिलने लगता है साथ ही इस साधना को करने से व्यक्ति में आकर्षण शक्ति उत्पन्न होने लगती है किसी भी कार्य के लिए जय तो उसे निरसा नहीं होना पड़ता अर्थात उसके प्रत्येक कार्य में सिद्धि प्राप्त होने लगती है

प्रत्येक कार्य बने लगता हैं प्रत्येक गृहस्ती व्यक्ति को तो एक बार जीवन में इस साधना को अवश्य ही संपन्न करना चाहिए जिससे की ग्रस्त सुख का पूर्ण आनंद लेते हुए जीवन व्यतीत कर सके यदि आप देखने में सुंदर नहीं तो आपको भी ये साधना निश्चित करनी चाहिए क्योंकि साधना को करने से आपके अंदर आकर्षण शक्ति का विकास होगा और आपके प्रत्येक कार्य बने लगेंगे यदि कोई व्यक्ति हैं भावना से ग्रस्त है कोई उसको पूछता नहीं है

समाज में या परिवार में उसकी कोई वैल्यू नहीं है जिसके करण वह हैं भावना ग्रस्त हो गया है तब ऐसे में इस साधना को संपन्न कर स्वयं में आकर्षण शक्ति को जगाया जाता है और लोगों के बीच में अपने आप को लोकप्रिय बनाने का साधन प्राप्त होता है और जिससे व्यक्ति की सभी के बीच में पूछ होने लगती है वह सभी का chheta बन जाता है और साथ ही इस साधना के प्रभाव से धीरे-धीरे आपकी रंग रूप में भी निखार आने लगता है

https://www.youtube.com/watch?v=4B-HwhpVKiM&pp=ygUOdXJ2YXNoaSBhcHNhcmE%3D

लीलावती अप्सरा साधना मंत्र:– lilavati Apara sadhna ph.85280 57364

।। ॐ हूं हूं लीलावती कामेश्वरी अप्सरा प्रत्यक्षं सिद्धि हूं हूं फट् ।।

lilavati Apara sadhna अप्सरा साधना साधना विधि 

बात करते हैं तो पीले या लाल पूजा के समय देवी को अर्पण करना है चित्र रखे उसको या फिर यंत्र रखें उसको पुष्प हार आपको रखना है गुलाब के पुष्प का एक हार  आपको रखना है दो हर प्रतिदिन रखिएगा एक हर पूजा के समय देवी को अर्पण करना है

चित्र रखे उसको या फिर यंत्र रखें उसको दूसरा हर यदि इस साधना कल के दौरान जब भी देवी प्रकट होगी उसी दिन आपको अर्पण कर देना है साधना का विधान मूलतः है चंद्र ग्रहण के समय में अत्यधिक श्रेष्ठ बताया गया है 21 या 41 दिन की साधना भी है तो आज हम बात करें 21 दिवसीय साधना किस प्रकार संपन्न कर रहे हैं के साथ साथ दूध से बना हुआ नैवेद्य आपको रखना है

या फिर पंचमेवा आप रख सकते हैं जल का एक पत्र आपको रखना है और इसके अतिरिक्त घी का दीपक आपको लगाना है दीपक आप प्रयोग कर सकते हैं होगा यदि घी के दीपक का प्रयोग करते हैं और वस्त्र कि यदि बात करते हैं तो पीले या लाल रंग के दोनों ही प्रकार के आसान वस्त्र आप प्रयोग कर सकते हैं आसान उनका हो कंबल का हो आपका भी और चौकी पत्ते पर बिछड़ेंगे

वह भी लाल या पीले रंग के ही होने चाहिए यह थी सामग्री जो इस साधना काल में आपको प्रयोग करनी है चलिए बात करते हैं किस प्रकार से साधना को संपन्न करना है किसी भी शुभ योग सिद्ध मुहूर्त में जिस दिन शुक्रवार पड़ता हो उसे दिन आपको यह साधना आरंभ करनी है रात्रि 10:00 के बाद में उत्तर मुख होकर के इस साधना को संपन्न किया जाना है

पहले आसन के ऊपर पेट के ऊपर चौकी पर कोई भी चीज जो आपके पास है उसके ऊपर लाल या पीला जो वस्त्र अपने लिए है उसे बढ़ा दीजिए उसके ऊपर देवी का प्राण प्रतिष्ठित यंत्र स्थापित कीजिए चित्र है तो चित्र विस्थापित कीजिए और साथ ही एक संकल्प हेतु और साथ में इस जल का क्या करना है उसका प्रयोग भी इस साधना काल में बताया जाएगा संकल्प लेना है

उसके बाद संकल्प लीजिए दाहिने हाथ में जल लेकर के अपने ऊपर जल चढ़ाना है यंत्र आदि के ऊपर जल छिड़कने जो पूजन सामग्री उसे पर जल चढ़ाना है यही शुद्ध आज मैंने क्योंकि अनेकों बार बता चुका हूं फिर भी प्रश्न आता है की शुद्धि आंचल होता क्या है के बाद में संकल्प लेना है संकल्प में अपना नाम अपना गोत्र उसे दिन करती थी वाले नक्षत्र बोलना है से आप साधना सर्व प्रकार की सिद्धि या कामना हेतु बोलना जो की श्रेष्ठ रहेगा साथ ही इस साधना को प्रेसी के रूप में प्रेमिका के रूप में संपन्न करना है

लेकिन प्रेमिका के रूप में संपन्न करना श्रेष्ठ माना गया है तो जवाब साधना में संकल्प ले तो उसे समय कम ना करें कि मैं लीलावती अप्सरा को अपनी प्रेमिका के रूप में प्रीति के रूप में संपन्न करना का चाहता हूं सिद्ध करना चाहता हूं और अपने सभी मनोरथ की पूर्ति हेतु यह साधना कर रहा हूं इस प्रकार से अपने संकल्प लेना है

मधुमती विद्या – साधना सबसे बड़ी आकर्षण वशीकरण की साधना ph.8528057364

‘सुरसुन्दरी’ यक्षिणी साधना sursundari yakshini ph.8528057364

Divyangana apsara Sadhna दिव्यांगना अप्सरा साधना ph. 8528057364

 

मधुमती विद्या – साधना सबसे बड़ी आकर्षण वशीकरण की साधना ph.8528057364

No Comments
मधुमती विद्या - साधना सबसे बड़ी आकर्षण वशीकरण की साधना ph.8528057364

मधुमती विद्या – साधना सबसे बड़ी आकर्षण वशीकरण की साधना ph.8528057364

मधुमती विद्या - साधना सबसे बड़ी आकर्षण वशीकरण की साधना ph.8528057364
मधुमती विद्या – साधना सबसे बड़ी आकर्षण वशीकरण की साधना ph.8528057364

Madhumati vidya मधुमती विद्या – साधना सबसे बड़ी आकर्षण वशीकरण की साधना ph.8528057364 आप सभी को तो आप लोगों ने देख लिया होगा अभी जो आज जो योगिनी साधना मैं दे रहा हूं इनका नाम है मधुमती योगिनी बहुत ही अच्छी योगिनी है और इनका जो साधन है वह भी बहुत अच्छी है कोई इंसान अगर चाहे तो अगर नया साधक भी कर सकता  है यह साधना में आपको जो है जो नॉर्मली साधना का नियम है वह सारा मानना होता है

पहले बता दो यह योगिनी सिद्ध होने के बाद क्या क्या काम करती है सिद्ध हो जाता है माता रूप में सिद्ध होगी तो आपको जो आपको जो है छठ कर्म  से लेकर तंत्र में जितने भी चीज हैं मतलब यह शक्ति कोई भी चीज मतलब ऐसा नहीं है कि नहीं कर सकती है लिमट  होता है कि यह नहीं कर सकता है कर सकती ऐसा कुछ है के द्वारा तंत्र का जितना भी चीज किया जा सकता है

सही करवा सकते हो इतना पावरफुल है और मधुमती योगिनी है सुंदर है बहुत ही और इनको आपको माता रूप में सिद्ध करना है और यह आपको आपको आपको करना है पूर्णिमा के दिन से पूर्णिमा के दिन से रात को 10 या 11 बजे आपको अच्छा सा एक जगह देख लेना है

जहां पर आप जो है इसको करोगे और यह देखिए तीन चार दिन पहले से प्रेक्टिस करेगा विधि विधान का क्या करते डायरेक्टली साधना में बैठ जाते हैं उसके बाद साधना सफल नहीं होता है क्योंकि उनको लंबे समय तक बैठने की आदत ही नहीं है चैटिंग तो मैं कभी बोल रहा हूं बहुत सारे लोग को डायरेक्टली

मधुमती साधना मंत्र 

 श्री मधुमति दिश: स्थावर जंगमाः सागर पुरत्नानि सर्वेषां कर्षिणी ठं ठं स्वाहा ।

साधन विधि – जो मनुष्य इस मन्त्र का एक वर्ष तक प्रतिदिन १०८ की संख्या में जप करता है, उसे यह विद्या सिद्ध होती है । यह विद्या समस्त ज्ञानों की प्रकाशक है । यह सुमेरू, दिशा, सागर, नदी, रत्न, पुरी, स्त्री, वनस्पति तथा पाताल स्थित सभी अलम्य द्रव्यों का आकर्षण करती है । इसके द्वारा राजा का पुर, स्थान तथा वृतान्त सभी जाना जा सकता है । साधक मनुष्य रात्रिकाल में शैया पर १०८ बार इस मन्त्र का जप करके सिद्धि को प्राप्त होता है ।

चामुण्डा यक्षिणी साधना chamunda yakshini sadhna ph. 8528057364

No Comments
maxresdefault 7 https://gurumantrasadhna.com/author/gurumantrasadhna-comgmail-com/page/17/

चामुण्डा यक्षिणी साधना chamunda yakshini sadhna ph. 8528057364

चामुण्डा यक्षिणी साधना chamunda yakshini sadhna ph. 8528057364
चामुण्डा यक्षिणी साधना chamunda yakshini sadhna ph. 8528057364

चामुण्डा यक्षिणी साधना chamunda yakshini sadhna ph. 8528057364 आज एक बार फिर आप सभी का स्वागत करता हूं चामुण्डा यक्षिणी के बारे में तो बताइए उनकी साधनाएं तो बताइए इस साधना को कर लेने से साधक  के समस्त प्रकार की जो कुंडलिया है जागृत होने लगते हैं  अपने बहुत ही साधको  को भी कराया है चामुण्डा यक्षिणी साधन प्रयोग इसी  को संपन्न करके साधक  के जितने भी शत्रु हैं अंदर बाहर है स्वयं ही नष्ट होने लगते हैं

   21 दिनों तक इसको करे  चामुण्डा यक्षिणी  है वह प्रकट साधक  को वचन भी देती है और वचन के माध्यम से बढ़कर साधक  के जीवन में जितने भी परेशानियां है समस्याएं हैं दूर करती है। और कोई घटना घटने वाली होती है तो उसे सड़क के कानों में बता देती है 

इसको करने से  माता से साधक की जो भूत भविष्य वर्तमान मन मस्तिष्क में प्रकट होने लगती है के कान में जब विचारों के माध्यम से बताने लगते हैं सामने वाला कौन है कहां से आया है  आने का उद्देश्य क्या है उसका तो मैं कहूंगा की दिव्य दृष्टि साधना के लिए यह साधना है

चामुण्डा यक्षिणी मंत्र 

ॐ नमो चामुण्डे प्रचण्डे इन्द्राय ॐ नमो विप्र चाण्डालिनी शोभिनी प्रकर्षिणी कर्षय आकर्षय द्रव्यमानय प्रबलमानय हुँ फट् स्वाहा ।

साधन विधि – प्रथम दिन उपवास कर शीतलता से रहे, क्रोध न करे । पृथ्वी पैर शयन करे । मीठा भोजन करे तथा भोजन करते-करते छोड़ दे । फिर अपवित्र स्थान में मन्त्र का जप करे । प्रतिदिन १००० मन्त्र का जप करे । २१ दिन तक जप करते रहने से सिद्धि प्राप्त होती है । आरम्भ में सात दिन तक पृथ्वी पर शयन करे । उस अवधि में आश्चर्य दिखाई देंगे। तीसरे दिन स्वप्न में यक्षिणी का रौद्र रूप दिखाई देता है । यदि स्वप्न में दिखाई न दे तो २१ दिन तक फिर जप करे । उस स्थिति में ‘चामुण्डा यक्षिणी’ का स्त्री रूप प्रत्यक्ष दिखाई देता है । उसे देखकर भयभीत न हो। उस रूप द्वारा छल करने पर भी डरे नहीं। वह अभक्ष वस्तु लाकर दे, अनाचार करे फिर भी मन को शंकित न करे तो मंत्र सिद्ध हो जाता है और लक्ष्मी प्रत्यक्ष होकर, साधक के घर में निवास करती है

मंत्र तंत्र साधना रहस्य mantra tantra yantra rahsya ph.8528057364

No Comments
मंत्र तंत्र साधना रहस्य mantra tantra yantra rahsya ph.8528057364

मंत्र तंत्र साधना रहस्य mantra tantra yantra rahsya ph.8528057364

मंत्र तंत्र साधना रहस्य mantra tantra yantra rahsya ph.8528057364
मंत्र तंत्र साधना रहस्य mantra tantra yantra rahsya ph.8528057364

मंत्र तंत्र साधना रहस्य mantra tantra yantra rahsya ph.8528057364 साधना की उपयोगिता अब हमारे मस्तिष्क में ये प्रश्न उठता है कि साधना की क्या उपयोगिताएं है? इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए साधना की अवधारणा पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। वर्तमान समय में सर्व अशान्ति विध्यमान है। यह जगत् माया का क्रीडास्थल है।

जहाँ मनुष्य आँख मिचौली खेल रहा है। उसकी आंखों पर अन्धकार अर्थात् अज्ञानता की पट्टी बंधी हुई है। वह सारे संसार में विचरण करता है शान्ति व सुख की तलाश में दर-बदर की ठोकरें खाता है, मगर उसे कहीं शान्ति नहीं मिलती वह जितना सोचता है। उसके अनुसार कार्य करता है।

दुखों की जंजीरों में बंधता चला जाता है। उसे स्वतन्त्रता, संतोष कहीं नहीं मिलता। वस्तुतः वह अपनी इच्छाओं का गुलाम बना हुआ है। वह एक मृग की तरह इस मायावी संसार में अपनी प्यास बुझाने के लिए घूमता रहता है और जब वह थक हारकर बैठ जाता है तो उसे अपने भीतर की आवाज सुनाई देती है। हृदय गूंजने लगता है।

शास्त्र बताते हैं कि भगवान ही एकमात्र विशुद्ध आनन्द हैं। वास्तविक ज्ञान है,परम सत्य है, और सर्व प्रेम का स्रोत हैं, और जब वह इस बारे में सोचता है तो उसके आँखों पर बंधी अज्ञानता की पट्टी खुल जाती है. उसके जीवन में सत्य उतर जाता है। हृदय के अन्तर तल में भगवान के आनन्द की तरंगें उठने लगती हैं।

भगवान के चरणों का स्मरण साधना की पहली सीढ़ी है। दुनिया के पाखण्ड धोखे देने वाले हैं, परन्तु भगवान की प्राप्ति सच्ची महान प्राप्ति है। आज की दुनिया वैज्ञानिक युग में निवास करती हैं। प्रत्येक मनुष्य स्वार्थी होने के साथ इस जगमगाहट के पीछे डूबता जा रहा है।

जो लोग इस अड़चन में नहीं पड़ते वहीं साधक बने हुए हैं और भगवान की प्राप्ति में लगे हैं. लेकिन जो लोग संसार की इस विपत्ति से परेशान रहते हैं वह ईश्वरीय खोज में लग जाते हैं भगवान को प्राप्त करना उनका परम लक्ष्य बन जाता है और सुख, शान्ति, संतोष प्राप्ति की पहली क्रिया साधना है।

इस कारण इसकी उपयोगिता और अधिक बढ़ गई हैं। वास्तविक सुख क्या है? इसका एकमात्र उत्तर हैं-परमात्मा, संसार की समस्त इच्छाओं के शान्त हो जाने पर एक अनंत सुख की अनुभूति होती है उसे परमात्मा कहते हैं अतः परमात्मा को प्राप्त करना ही मनुष्य का एकमात्र उद्देश्य रहता है और इसी परमात्मा की प्राप्ति के लिए वह साधना करता है।

वर्तमान युग के विद्वान अपने आपको ज्ञाता कहते हैं और दैविक ज्ञान को मन्दबुद्धि का परिचायक बताते हैं, लेकिन वास्तव में वे अज्ञानी हैं।

क्योंकि सबसे बड़ी पराक्रम शक्ति वही ईश्वर है, क्योंकि ईश्वर के ही करुणा के कारण उन्हें 64 हजार योनियों में सबसे श्रेष्ठ मनुष्य योनि में जन्म मिला। ज्ञान साधना का विरोध ती नहीं है।

वह तो उसमें रहने वाले अज्ञान – मात्र का विरोधी है। अज्ञानता का नाश करके साधनाओं के स्वरूप की रक्षा करने में ज्ञान का महत्व है। यह कोई अनुभवी महापुरुष ही जान सकता है।

ज्ञान सम्पन्न पुरुष कभी साधना का विरोध नहीं करते, जैसे दूसरे साधकों द्वारा प्रयत्नपूर्वक साधनाएं होती है ठीक उसी प्रकार ज्ञानी के शरीर के भीतर साधना होती रहती है। साधना में प्रवृत्ति ही दुख की आत्यान्तिक निवृत्ति और परमानन्द प्राप्ति के लक्ष्य को बताती हैं। लक्ष्य की सिद्धि की उपयोगिता ही साधना की अन्तिम कड़ी है। अतः साधना मनुष्य जीवन का एक है।

श्रद्धा, विश्वास  धारणा

किसी भी साधन को प्रारम्भ करने से पूर्व साधक को उसके प्रति पूर्ण श्रद्धावान्, विश्वासी अर्थात् प्रास्थावान् एवं धैर्यवान् होना आवश्यक है । जो साधक साधन के प्रति श्रद्धा अथवा अनास्था रखते हैं, उन्हें सिद्धि प्राप्त नहीं होती । अतः साधक को चाहिए कि यदि किसी साधन के विषय में उसके मन में तनिक भी सन्देह हो तो उसे करना कदापि प्रारम्भ न करे ।

इसी प्रकार साधना काल में साधक का धैर्यवान् होना परम आवश्यक है । जो साधक साधन में आने वाली कठिनाइयों के कारण अपना धैर्यं तथा साहस छोड़ बैठते हैं, उन्हें भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती ।

अनेक बार ऐसा भी सुना और देखा गया है कि साधना काल मेंने वाली कठिनाइयों से विचलित हो जाने के कारण साधक को शारीरिक अथवा अन्य प्रकार की हानियाँ उठानी पड़ी हैं ।

अतः जब साधक में कठिनाइयों से लोहा लेने का साहस न हो, तब तक उसे किसी भी साधन में प्रवृत्त नहीं होना चाहिए ( तान्त्रिक साधनों का मार्ग खतरों से भरा हुआ बताया गया है। इसमें तनिक सी भी असावधानी, प्रमाद, भूल अथवा साहसहीनता साधक के लिए प्राणघातक सिद्ध हो सकती है।

yogini sadhana – प्राचीन योगिनी साधना विधि विधान सहित ph.8528057364

No Comments
hq720 2 https://gurumantrasadhna.com/author/gurumantrasadhna-comgmail-com/page/17/

yogini sadhana – प्राचीन योगिनी साधना विधि विधान सहित ph.8528057364

yogini sadhana - प्राचीन योगिनी साधना विधि विधान सहित ph.8528057364
yogini sadhana – प्राचीन योगिनी साधना विधि विधान सहित ph.8528057364

yogini sadhana – प्राचीन योगिनी साधना विधि विधान सहित ph.8528057364 नारी का प्रत्येक स्वरूप मधुर होता है, प्रत्येक स्वरूप की जीवन में एक निश्चित अर्थवत्ता व महत्वपूर्ण स्थान होता है। चाहे वह मां का स्वरूप हो, बहन का हो या वह पुत्री के रूप में हो चाहे वह पत्नी हो अथवा प्रेमिका या मित्र के रूप में ही क्यों न हो।

स्वरूपों में भिन्नता हो सकती है. किन्तु गहन दृष्टि से देखें, तो प्रत्येक स्वरूप ममत्व की किसी अन्तःसलिला का प्रवाह लेकर ही गतिशील होता है, आप्लावित कर देने की चेष्टा में ही निमग्न होता है, क्योंकि ऐसा करना प्रत्येक स्त्री का मूल धर्म होता है, लेकिन इन सभी स्वरूपों से कुछ पृथक, जो स्वरूप विशिष्ट ही नहीं विशिष्टतम होता है, उसी एक स्वरूप का नाम है योगिनी !

योगिनी एक नाटी देह में आबद्ध होते हुए, नारी मन की समस्त कोमल भावनाओं को एकत्र कर उपस्थित होते हुए भी अन्ततोगत्वा शक्ति का एक पुंज ही होती है, जो नाटी देह का आश्रय लेकट सम्मुख आती है, क्योंकि शक्ति का आश्रय स्थल सदैव से ही नाटी को स्वीकार किया गया है। केवल साधक ही नहीं, प्रत्येक सामान्य मनुष्य के जीवन में भावनाएं होती है, जो उसे सहज प्रवाह दे सकती हैं। जीवन से यदि भावनाओं को ही निकाल दिया जाए, तो मनुष्य व यंत्र में अंतर ही क्या रह जाएगा? किन्तु मनुष्य यंत्र नहीं हो सकता।

1 को एक पहले ही इस युग की सभ्यता’ ने मनुष्य यंत्र बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है जिसके परिणाम की अधिक व्याख्या या वर्णन की आवश्यकता नहीं है। जो सम्मुख है, वह है एक यंत्रवत् जीवन जिसमें न किसी के प्रति कोई ममत्व है, न अपनत्व, न उछाह न वेग, न प्रेम और न ही फिर इन भावनाओं के अभाव में जीवन के प्रति कोई लक्ष्य ही।

किसी भी व्यक्ति से पूछ कर देखिए, कि उसके जीवन में जो आपाधापी चल रही है या जिस आपाधापी का न केवल उसने सृजन कर लिया है वदन् जिसका वह निरन्तर पोषण भी करता जा रहा है, उसका अर्थ क्या है? क्यों वह सदैव इतना उद्विग्न बना रहता है?

इसके मूल्य पर उसे क्या प्राप्त हो जाएगा? किसी के पास भी इसका निश्चित उत्तर नहीं होगा, क्योंकि इन बातों का कोई निश्चित उत्तर हो भी नहीं सकता। भावनाएं जो जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि हो सकती हैं, जब उसी का अभाव हो गया, उसी का हनन् करके कुछ निर्मित करने की चेष्टा की, तो भूल तो वहीं से प्रारम्भ ही हो गयी।

और इसी बिन्दु पर आकर योगिनी साधना का महत्व स्वयमेव स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि योगिनी साधना का अर्थ ही है- भावनाओं की साधना, अपनत्व व ममत्व की साधना, जीवन में जो कुछ विस्मृत हो चला हो, जो कुछ टूट गया हो या जो कुछ रिक्त रह गय हो, उन सभी को अर्जित कर लेने या पुनः प्राप्त कर लेने की साधना यह तो भावनाओं का ही बल होता है कि जीवन में कोई भी व्यक्ति वह सब कुछ कर जाता है, जो अन्यथा उसके सहज बल से सम्भव नहीं था और यहां यह ध्यान रखने की बात है, कि बल का तात्पर्य शरीरिक बल से नहीं होता है।

यह तो मानसिक बल होता है, जो एक नर को पुरुष बनने की ओर तथा पुरुष को पुरुषोत्तम बनने की ओर उत्प्रेरित करता है और इसके मूल में होती हैं वे भावनाएं, जिनके मूल में होता है प्रेम! (यह कहना शायद पुनरोक्ति हो। जाएगा कि प्रेम का आधार होती है स्त्री) जो अपनत्व का भाव पत्नी के रूप में अधिक स्पष्टता से सामने आता है, प्रेमिका के रूप में वही भाव इस रूप में किंचित परिवर्तित हो जाता है, कि वह अपने प्रिय को सभी रूपों में केवल श्रेष्ठ ही नहीं श्रेष्ठतम देखना चाहती है. क्योंकि सामाजिक शिष्टाचार के अन्तर्गत एक प्रेमिका से अधिक पत्नी को अपनी मनोभावनाएं प्रकट करने की छूट होती है।

अंतर केवल सामाजिक बंधनों का ही होता है, अन्तर्मन का नहीं और यही जीवन में सर्वाधिक संतोष और संतोष से भी कहीं अधिक एक अनोखी सौ तृप्ति का कारण बन जाता है। कोई मेरे लिए भी चिंतायुक्त बना रहता है, कोई |

कहे-अनकहे रूप में मुझ पर अपना प्रेम बरसाता ही रहता है, कोई मेरे बारे में भी सोचता रहता है और सबसे बड़ी बात तो यह कि कोई मेरे सारे अस्तित्व पर अपना अधिकार मानता है होती हैं

ये तो जीवन की बड़ी अनोखी सी आश्वस्तिया जिनके ताने-बाने में बुना जीवन ही सही रूप में गतिशील होता हुआ पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकता है। क्योंकि ऐसी आश्वस्ति मिल जाने का अर्थ होता है. एक प्रकार का सुरक्षा बोध मिल जाना और भावनाओं के आधार पर मिली आश्वस्ति ही वास्तविक सुरक्षा बोध दे सकती है अन्यथा व्यक्ति इसी को प्राप्त करने की चेष्टा में पता नहीं कहां-कहां भटक आता है।

जीवन एक निरपेक्ष घटना नहीं होती है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी पद प्रतिष्ठा अथवा आर्थिक स्थिति का क्यों न हो. अपने जीवन का ताना-बाना किसी व्यक्ति या और अधिक विशद रूप में कहें तो किसी भावना से जोड़ कर ही बुनना चाहता है। सामान्यतयः व्यक्ति अपने जीवन को या अपनी अस्मिता को अपने परिवार से जोड़ कर जीवित रखना चाहता है। इसमें कोई अनुचित बात भी नहीं है।

परिवार जैसी सामाजिक संस्था के निर्माण के पीछे उद्देश्य ही यही रहा है, किन्तु निरन्तर बढ़ते हुए आर्थिक एवं अन्यान्य दबावों के बाद क्या आज यह सम्भव रह गया है. कि व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से कुछ अलग हट कर अपने जीवन को आहलाद व मधुरता देने वाले क्षणों के विषय में चिंतन तक कर सके ?

जीवन में ऐसी स्थिति आ जाने पर जिस प्रवाह की आवश्यकता होती है, वह किसी गणित की अपेक्षा केवल साधनाओं से ही उपलब्ध हो सकती है, क्योंकि प्रत्येक साधना स्वयं में शक्ति का एक-एक अजरा प्रवाह ही तो होती है। और यही तथ्य योगिनी साधना के विषय में भी पूर्णतयः सत्य है।

आज समाज में योगिनी शब्द को लेकर क्या धारणा है, इसको कदाचित विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं अनेक व्यक्तियों की दृष्टि में भैरवी व योगिनी के मध्य भी कोई भेद नहीं होता। यूं भैरवी की प्रस्तुति ही कहा प्रासंगिक रूप में सम्भव हो पायी है?

किन्तु योगिनी इतना हल्का शब्द नहीं होता। योगिनी स्वयं में शक्ति तत्व की एक विशिष्ट प्रस्तुति व स्वरूप होती है, जिसकी साधना सम्पन्न करना प्राण तत्व को संचेतन कटने का एक उपाय होता है। यह सत्य है कि योगिनी की प्रस्तुति एक प्रेमिका रूप में होती है।

किन्तु यह आवश्यक नहीं कि प्रेमिका शब्द से सदैव वासनात्मक अर्थ ही अभिप्रेत हो क्या प्रेमिका शब्द से एक महिला मित्र का अर्थ अभिप्रेत नहीं हो सकता है?

वस्तुत योगिनी का वर्णन प्रेमिका रूप में होने के जो है वह है कि भारतीय समाज इतना की मान्यताओं में महिला मित्र की कभी कोई ही नहीं रही. लेकिन जो भावगत है वह सदैव से यही रहा है। साथ ही प्रेमिका का तात्पर्य होता है, ऐसी स्त्री, जो अपने प्रिय पर अपना सावरकर देने में ही अपना सुख मन हो और न केवल विलक्षण सौन्दर्य के मेंट इस रूप में भी योगिनी की कोई भी उभी करने में असमर्थ ही होगी।

जीवन को भावनाओं के आधार पर पुनः निर्मित करने व योगिनी के रूप में एक वास्तविक प्रेमिका प्राप्त करने के को घटित होने वाली ‘योगिनी एकादशी के अवसर पर एक विशिष्ट साधना पद्धति प्रस्तुत की जा रही है, जिसे सकर वे अपने भावनाशून्य हो रहे जीवन में हास्य, विनोद व मधुरता जैसे कुछ नये पृष्ठ जोड़ पाने में समर्थ हो सकते हैं।

योगिनी साधना विधि 

इस साधना में प्रवृत्त होने वाले साधकों के लिए आवश्यक है कि वे ताम्रपत्र पर अंकित ‘योगिनी यंत्र’ व सफेद हकीक की माता को साधनात्मक उपकरण के रूप में प्राप्त कर लें। यह साधना उपरोक्त दिवस (योगिनी एकादशी) के अतिरिक्त किसी भी शुक्रवार को सम्पन्न की जा सकती है।

साधना में वस्त्र आदि का रंग श्वेत होना चाहिए तथा दिशा उत्तर मुख होनी चाहिए। इस साधना में किसी विशेष विधि-विधान को सम्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है। यंत्र व माला का सामान्य पूजन करने पश्चात् दत्तचित्त भाव से निम्न मंत्र की ग्यारह माला मंत्र जप सम्पन्न करें- खिलता हुआ गोरा रंग भरा भरा सा पुष्ट मांसल बदन, अंडाकार चेहरा, खंजन पक्षी की भांति नयन और उन नयनों की एक-एक चपलता में झिलमिलाते प्रेम के कई कई सदिश योगिनी तो स्वयं में एक उपमा है, उसकी उपमा दें भी तो किससे दें विक प्रेमिका  अवसर पर ही है,

योगिनी मंत्र

ॐ ह्रीं योगिनि आगच्छ आगच्छ स्वाहा ॥ OM HREEM YOGINI AAGACHH AAGACHH SWAHA

यह एक दिवसीय साधना है तथा साधना सम्पन्न करने के दूसरे दिन यंत्र ६ माला को किसी स्वच्छ जलाशय में या निर्जन स्थान पर विसर्जित कर देना चाहिए। जैसा कि प्रारम्भ में कहा, योगिनी शक्ति तत्व का ही एक विशिष्ट प्रस्तुतिकरण होती है, अतः यह स्वाभाविक ही है, कि इसे मनोयोग पूर्वक सम्पन्न करने वाले साधक को जीवन के प्रत्येक पक्ष में अनुकूलता मिलने की क्रिया स्वयमेव |

प्रारम्भ हो जाए, चाहे वह धन सम्बन्धी पक्ष हो, स्वास्थ्य की समस्या हो सौन्दर्य प्राप्ति की कामना हो या गृहस्थ जीवन के किसी भी पक्ष को स्पर्श करता कोई भी पक्ष क्यों न हो। प्रस्तुत साधना की एक अन्य गुहा विशेषता यह साधना भी है। अनुभवों को भी है कि यह प्रबल पौरुष प्राप्ति की साधना सम्पन्न करने के उपरान्त अपने गोपनीय ही रखें।

काल भैरव प्रत्यक्षिकरण साधना | भैरव को बुलाने का मंत्र सहित ph.85280 57364

No Comments
काल भैरव प्रत्यक्षिकरण साधना | भैरव को बुलाने का मंत्र सहित ph.85280 57364

काल भैरव प्रत्यक्षिकरण साधना | भैरव को बुलाने का मंत्र सहित ph.85280 57364

काल भैरव प्रत्यक्षिकरण साधना | भैरव को बुलाने का मंत्र सहित ph.85280 57364
काल भैरव प्रत्यक्षिकरण साधना | भैरव को बुलाने का मंत्र सहित ph.85280 57364

काल भैरव प्रत्यक्षिकरण साधना | भैरव को बुलाने का मंत्र सहित ph.85280 57364 भैरव को भगवान् शिव का प्रधान सेवक तथा उन्हीं का प्रतिरूप कहा गया है । वे भगवान शिव के अन्य अनुचर भूत-प्रेतादि गणों के अधिपति हैं। उनकी उत्पत्ति भगवती महामाया की कृपा से हुई है । अतः वे भगवान् भूतनाथ महादेव एवं भगवती महादेवी के अनुरूप ही शक्ति तथा सामर्थ्यवान् हैं । भैरव के अनेक स्वरूपों का वर्णन पुराणों में किया गया है। यथा – बटुक भैरव, काल भैरव आदि ।

गुरु गोरखनाथ द्वारा प्रवर्तित नाथ सम्प्रदाय में भैरव – पूजा का विशेष महत्त्व माना गया है और इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय का आदिकरण भी भगवान् भैरव तथा भगवती भैरवी को बताया गया है ।

भगवान् भैरव प्रसन्न होकर अपने साधक भक्तों को अभिलषित वर एवं वस्तुएँ प्रदान करने में समर्थ हैं, इसीलिए हमारे देश में भैरव पूजन की प्रथा भी सहस्रों वर्षों से प्रचलित है । आज भी भारतवर्ष के विभिन्न स्थानों में भैरव के मन्दिर पाये जाते हैं, जहाँ उनकी नियमित रूप से पूजा तथा उपासना की जाती है ।

प्राचान तन्त्रशास्त्रों में भैरव साधन की विविध विधियों का उल्लेख पाया जाता है तथा अर्वाचीन ग्रंथों में लोकभाषा के माध्यम से भी भैरव -सिद्धि के अनेक उपाय कहे गये हैं ।

भैरव को बुलाने का मंत्र | काल भैरव का मंत्र | काल भैरव सिद्धि मंत्र

ॐ काली कंकाली महाकाली के पुत्र कंकाल भैरव हुकुम हाजिर रहै मेरा भेजा काल करै भेजा रक्षा करै आन बांधू वान बांधू चलते फूल में भेजू ं फूल मैं जाप कोठे जी पडे थर थर कांपै हल हल हले गिरि गिरि पर उठ उठ भगै बक बक बकै मेरा भेजा सवा घड़ी पहर सवा दिन सवा मास सवा बरस को बावला न करे तो माता काली की शैया पै पग धेरै वाचा चूकै तौ ऊमा सूखै वाचा छोड़ कुवाचा करै धोबी की नाद चमार के कूडे में पड़े, मेरा भेजा बावला न करें तौ रुद्र के नेत्र के आग की ज्वाला कढै सिर की लटा टूट भूमि में गिरै माता पार्वती के चीर पै चोट पडै बिना हुकुम नहीं मारना हो काली के पुत्र कंकाल भैरव फुरो मन्त्र ईश्वरोवाच सत्यनाम आदेश गुरु को ।

साधन विधि – इस मन्त्र को कालरात्रि अथवा सूर्य ग्रहण की रात्रि में सिद्ध करे। त्रिखूंटा चौका देकर दक्षिण की ओर मुँह करके बैठ जाय तथा एक सहस्र मन्त्र का जप करे । तदुपरान्त लाल कनेर के फूल, लहू, सिन्दूर, लौंग का जोड़ा तथा चौमुखा दीपक जलाकर श्रागे रक्खे एवं दशांश हवन करे । जिस समय भैरव ययंकर रूप धारण कर सामने आवे, उस समय उससे भयभीत न हो, अपितु पुष्पों की माला को उनके कण्ठ में तुरन्त डालकर, सामने लड्डू रख दे। इस विधि से भैरव साधक पर प्रसन्न हो जाते हैं तथा वर माँगने के लिये कहते हैं । उस समय साधक को चाहिये कि वह उनसे त्रिवाचा भरवाकर सदैव वशीभूद रहने का वचन ले ले । तदुपरान्त मन की जो भी अभिलाषा हो, उसे भौरव से कहे । भैरव साधक की उस अभिलाषा को तुरन्त पूरा कर देते हैं तथा भविष्य में भी साधक के वशीभूत बने रहकर, साधक जब भी जिस कार्यं के लिये कहता है, उसे पूर्ण करते रहते हैं ।

‘सुरसुन्दरी’ यक्षिणी साधना sursundari yakshini ph.8528057364

No Comments
ai generated, woman, goddess

‘सुरसुन्दरी’ यक्षिणी साधना sursundari yakshini ph.8528057364

ai generated, woman, goddess

‘सुरसुन्दरी’ यक्षिणी साधना sursundari yakshini ph.8528057364 हिन्दू धर्मशास्त्रों में मनुष्येतर जिन प्राणि-जातियों का उल्लेख हुआ है, उनमें देव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, नाग, राक्षस, पिशाच आदि प्रमुख हैं । इन जातियों के स्थान जिन्हें ‘लोक’ कहा जाता है-भी मनुष्यजाति के प्राणियों से भिन्न पृथ्वी से कहीं प्रत्यत्र प्रवस्थित हैं।

इनमें से कुछ जातियों का निवास आकाश में और कुछ का पाताल में माना जाता है । इन जातियों का मुख्य गुण इनको सार्वभौमिक सम्पन्नता है, अर्थात् इनके लिए किसी वस्तु को प्राप्त कर लेना अथवा प्रदान कर देना सामान्य बात है ।

ये जातियाँ स्वयं विविध सम्पत्तियों की स्वा- मिनी हैं। मनुष्य जाति का जो प्राणी इनमें से किसी भी जाति के किसी प्राणी की साधना करता है अर्थात् उसे जप, होम, पूजन आदि द्वारा अपने ऊपर अनुरक्त कर लेता है, उसे ये मनुष्येतर जाति के प्राणी उसकी अभिलाषित वस्तु प्रदान करने में समर्थ होते हैं।

इन्हें अपने ऊपर प्रसन्न करने एवं उस प्रसन्नता द्वारा अभिलषित वस्तु प्राप्त करने की दृष्टि से ही इनका विविध मन्त्रोपचार आदि के द्वारा साधन किया जाता है जिसे प्रचलित भाषा में ‘सिद्धि’ कह कर पुकारा जाता है । यक्षिणियाँ भी मनुष्येतर जाति की प्रारणी हैं।

ये यक्ष जाति के पुरुषों की पत्नियाँ हैं और इनमें विविध प्रकार की शक्तियाँ सन्निहित मानी जाती हैं । विभिन्न नामवारिणी यक्षिणियाँ विभिन्न शक्तियों से सम्पन्न हैं- ऐसी तांत्रिकों की मान्यता है ।

अतः विभिन्न कार्यों की सिद्धि एवं विभिन्न अभिलाषात्रों की पूर्ति के लिए तंत्रशास्त्रियों द्वारा विभिन्न यक्षिणियों के साधन की क्रियाओं का श्राविष्कार किया गया है। यक्ष जाति चूँकि चिरंजीवी होती है, अतः पक्षिणियाँ भी प्रारम्भिक काल से अब तक विद्यमान हैं और वे जिस साधक पर प्रसन्न हो जाती हैं, उसे अभिलषित वर अथवा वस्तु प्रदान करती हैं।

अब से कुछ सौ वर्ष भारतवर्ष में यक्ष-पूजा का अत्यधिक प्रचलन था । अब भी उत्तर भारत के कुछ भागों में ‘जखैया’ के नाम से यक्ष- पूजा प्रचलित है। पुरातत्व विभाग द्वारा प्राचीन काल में निर्मित यक्षों अनेक प्रस्तर मूर्तियों की खोज की जा चुकी है।

देश के विभिन्न पुरातत्त्व संग्रहालयों में यक्ष तथा यक्षिणियों की विभिन्न प्राचीन मूर्तियाँ भी देखने को मिल सकती हैं। कुछ लोग यक्ष तथा यक्षिणियों को देवता तथा देवियों की ही एक उपजाति के रूप में मानते हैं और उसी प्रकार उनका पूजन तथा आराधनादि भी करते हैं। इनकी संख्या सहस्रों में हैं ।

‘सुरसुन्दरी’ यक्षिणी साधन मन्त्रः-

ॐ ह्रीं श्रागच्छ आगच्छ सुन्दरि स्वाहा ।”

साधन विधि – दिन में तीन बार एकलिंग महादेव का पूजन करे तथा उक्त मंत्र को तीनों काल में तीन-तीन हजार जपे । एक मास तक इस प्रकार साधन करने से ‘सुरसुन्दरी यक्षिणी’ प्रसन्न होकर साधक के समीप आती है। जब यक्षिणी प्रकट हो, उस समय साधक को चाहिये कि वह उसे अर्ध्य देकर प्रणाम करे। जब यक्षिणी यह प्रश्न करे – ” तूने मुझे कैसे स्मरण किया ?” उस समय साधक यह कहे – “हे कल्याणी ! मैं दरिद्रता से दग्ध हूँ । आप मेरे दोष को दूर करें ।” यह सुनकर यक्षिणी प्रसन्न होकर साधक को दीर्घायु एवं घन प्रदान करती है ।