Category: दैविक साधना

दैविक साधना davik-sadhna हम इस श्रेणी में देवी देवताओं की रहस्मय साधना पर चर्चा करेंगे ! जिस साधना को आप अपने घर पर सिद्ध करके लाभ प्रपात कर सकते है ! gurumantrasadhna.com

गणेश चतुर्थी: गणपति बप्पा मोरया (Ganesh Chaturthi: Ganpati Bappa Morya)

गणेश चतुर्थी का त्यौहार (The Festival of Ganesh Chaturthi)

गणेश चतुर्थी का त्यौहार (The Festival of Ganesh Chaturthi)

गणेश चतुर्थी का त्यौहार (The Festival of Ganesh Chaturthi)
गणेश चतुर्थी का त्यौहार (The Festival of Ganesh Chaturthi)

 

अरे यार, सुनो! आज हम बात करेंगे गणेश चतुर्थी के बारे में। भाई, यह एक ऐसा फेस्टिवल है जिसे पूरे भारत में, खासकर महाराष्ट्र में, बड़े ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। देखो, यह त्यौहार भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, जिन्हें हम विघ्नहर्ता भी कहते हैं, मतलब हमारे सारे दुखों और बाधाओं को दूर करने वाले। जी, इसीलिए किसी भी नए काम की शुरुआत से पहले हम सब गणपति बप्पा को ही याद करते हैं, है ना?

 गणेश चतुर्थी का इतिहास (History of Ganesh Chaturthi)

अच्छा तो, अब जरा गणेश चतुर्थी के इतिहास के बारे में भी जान लेते हैं। वैसे तो, यह त्यौहार बहुत पुराना है, लेकिन सच बताऊँ, इसे एक बड़े सार्वजनिक उत्सव का रूप देने का श्रेय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को जाता है।

जनाब, 1893 में उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के लिए इस त्यौहार को एक सामाजिक और सांस्कृतिक मंच के रूप में इस्तेमाल किया था। क्या कहते हो? उस समय, भाईसाहब, अंग्रेज सरकार ने लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी लगा रखी थी, तो तिलक जी ने धर्म का सहारा लेकर लोगों को एक साथ लाने का यह तरीका निकाला। मानो तो, यह एक मास्टरस्ट्रोक था!

 गणेश चतुर्थी का महत्व (Significance of Ganesh Chaturthi)

अब बात करते हैं कि गणेश चतुर्थी का इतना महत्व क्यों है। अरे भाई, यह त्यौहार सिर्फ पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन के एक बड़े फिलॉसफी को भी सिखाता है। यूँ कहें तो, भगवान गणेश बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता हैं। उनकी पूजा करने से हमें जीवन में सही निर्णय लेने की शक्ति मिलती है और हमारे रास्ते में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। तुम देखो, जब हम गणपति बप्पा की मूर्ति घर लाते हैं, तो एक पॉजिटिव एनर्जी का संचार होता है। एक अलग ही सुकून फील होता है, मानते हो न?

गणेश चतुर्थी की पूजा विधि (Puja Vidhi of Ganesh Chaturthi)

चलो, अब मैं तुम्हें गणेश चतुर्थी की पूजा विधि के बारे में बताता हूँ। देखो, सबसे पहले तो भक्त भगवान गणेश की एक सुंदर सी मूर्ति घर लाते हैं। फिर उस मूर्ति की स्थापना एक सजे-धजे पंडाल या मंदिर में की जाती है। भाई, इस प्रक्रिया को ‘प्राणप्रतिष्ठा’ कहते हैं, जिसमें मंत्रों के उच्चारण से मूर्ति में प्राण फूंके जाते हैं। इसके बाद, 10 दिनों तक रोज सुबह-शाम बप्पा की आरती होती है, उन्हें मोदक का भोग लगाया जाता है, जो कि उनका पसंदीदा मीठा है। जरा सोचो, कितना भक्तिमय माहौल होता होगा! अधिक जानकारी के लिए आप विकिपीडिया पर भी पढ़ सकते हैं।

गणेश चतुर्थी का उत्सव (Celebration of Ganesh Chaturthi)

ओहो! गणेश चतुर्थी का उत्सव तो देखने लायक होता है। अरे वाह भई! 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में हर तरफ रौनक ही रौनक होती है। लोग नए कपड़े पहनते हैं, अपने घरों को सजाते हैं, और एक-दूसरे के घर जाकर बधाई देते हैं। भाई देख, पंडालों में तो अलग ही धूम होती है, जहाँ भजन-कीर्तन, डांस और तरह-तरह के कल्चरल प्रोग्राम होते हैं। सच कहूँ, तो यह त्यौहार हमें आपस में जोड़ता है और हमारे रिश्तों में मिठास घोलता है।

 गणेश चतुर्थी और गणपति विसर्जन (Ganesh Chaturthi and Ganpati Visarjan)

और फिर आता है अनंत चतुर्दशी का दिन, जब गणपति बप्पा की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। अरे देखो, यह थोड़ा इमोशनल मोमेंट होता है, लेकिन इसे भी बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। लोग ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ के नारों के साथ बप्पा को विदाई देते हैं।

भाई, विसर्जन का यह जुलूस देखने लायक होता है, जिसमें लोग नाचते-गाते हुए नदी या समुद्र के किनारे तक जाते हैं। इसका गहरा मतलब यह है कि यह शरीर मिट्टी का है और एक दिन मिट्टी में ही मिल जाना है। क्या समझे?

तो भाई, यह थी गणेश चतुर्थी की पूरी कहानी। उम्मीद है तुम्हें यह लेख पसंद आया होगा। क्या कहते हो? बोलो तो, अगली बार किस त्यौहार के बारे में जानना चाहोगे? बताओ ज़रा।

karna matangi sadhna anubhav कर्ण मातंगी साधना अनुभव: एक साधक का भयानक अनुभव PH.85280 57364

कर्ण मातंगी साधना अनुभव: एक साधक का भयानक अनुभव PH.85280 57364

 

कर्ण मातंगी साधना अनुभव: एक साधक का भयानक अनुभव PH.85280 57364

कर्ण मातंगी साधना अनुभव: एक साधक का भयानक अनुभव PH.85280 57364
कर्ण मातंगी साधना अनुभव: एक साधक का भयानक अनुभव PH.85280 57364

karna matangi sadhna anubhav कर्ण मातंगी साधना अनुभव: एक साधक का भयानक अनुभव आप सभी लोगों को मेरा नमस्कार, जय माँ चंडी जय शंकर। मैं आप सब लोगों का और एक नए लेख में स्वागत करता हूँ। आज के इस लेख में मैं आप सब लोगों को मेरे गुरु जी का एक कर्ण मातंगी साधना का अनुभव बताने जा रहा हूँ। 

 जिसको सुनने के बाद आप सब लोगों को पता चल जाएगा तंत्र साधना कितना भयानक रहता है तथा यह साधना को अगर सही तरीके से संपन्न कर लिया जाए तो यह एक मनुष्य का जीवन भी बदल सकता है और बहुत फायदा उसको दे सकता है। तो चलिए शुरू करते हैं आज के इस लेख को और जानते हैं उस साधना के अनुभव के ऊपर।

गुरु से मार्गदर्शन और तीन गुप्त साधनाएँ

एक दिन मेरे गुरु जी अपने गुरु के पास बैठे थे और वह अपने गुरु से बातचीत कर रहे थे। गुरु जी के मन में एक प्रश्न आया कि ऐसा कोई साधना हो जिस साधना के माध्यम से हम अपने सारे प्रश्नों का उत्तर ले सकें और वो साधना हमको एक तरह से गुरु की तरह गाइड भी करे।

 तो इस प्रश्न को मेरे गुरु जी ने अपने गुरु से पूछा तो उनके गुरु ने आंसर दिया कि ऐसे तो तीन ही साधनाएँ हैं, एक उन्होंने बताया वार्ता साधना, दूसरा है कर्ण पिशाचिनी साधना और तीसरा है कर्ण मातंगी साधना। इन तीन साधना के बारे में बताया। 

उनके जो गुरु थे वो कौलाचार मार्ग से थे। जिन लोगों को नहीं पता कि मेरे गुरु जी कौन थे, उनका साधना क्या था, किस तरह से थे, तो हमारी वेबसाइट गुरु मंत्र साधना डॉटकॉम पर आपको मेरे गुरु जी से जुड़े सारे अनुभव और साधनाओं की श्रेणी मिल जाएगी, जहाँ जाकर आप जरूर ही उन्हें पढ़ सकते हैं। 

उनके सारे अनुभव को भी आप सुन सकते हैं। पहले के लेख जिन लोगों ने पढ़े हैं उन लोगों को पता है कि मेरे गुरु जी को कर्ण मातंगी माता सिद्ध थीं। तो उस हिसाब से मैं आज उस सिद्धि का अनुभव लोगों को बता रहा हूँ।

तो उनके गुरु ने बताया तीन साधना। तो तीन साधना में उनके गुरु ने बताया कि कर्ण पिशाचिनी वर्तमान और भूतकाल का ज्ञान देती है। वार्ताली साधना तीन समयों का ज्ञान देती है, भूत, वर्तमान और भविष्यत्काल का ज्ञान देती है।

 लेकिन वार्ताली साधना एक उग्र तरीके का साधना है और यह नक्षत्र वाइज़ किया जाता है। अगर नक्षत्र अगर आपके पास सही नहीं है या फिर आपका जन्म नक्षत्र सही नहीं है तो वार्ता साधना में आपको बहुत सारी दिक्कतों को झेलनी पड़ सकता है।

 तो उनके गुरु ने बताया सर्वोत्तम रहता है कर्ण मातंगी साधना। कर्ण मातंगी बहुत जल्दी सिद्ध होती है। साधना जो विधि रहता है वो तीन से चार दिनों का रहता है। तीन से चार दिन की साधना में यह माता आपको दे देती है बोलके उनके गुरु ने बताया।

 

कर्ण मातंगी साधना अनुभव – साधना की पात्रता: उच्छिष्ट चांडालिनी की महा साधना

तो गुरु जी ने आग्रह पूर्वक उनसे बोला कि कृपया यह मेरे इस विद्या को मेरे को प्रकाशित कीजिए बोलके उन्होंने अपने गुरु से प्रार्थना किया। 

तो उनके गुरु ने बोला कि कर्ण मातंगी साधना करने से पहले तुमको महामातंगी माता का यानी कि उच्छिष्ट चांडालिनी का एक महा साधना संपन्न करना पड़ेगा तभी तुम्हारे पास एक एलिजिबिलिटी आएगी या फिर एक पात्रता आएगी तभी जाकर तुम कर्ण मातंगी माता को सिद्ध कर पाओगे या फिर उनसे कृपा प्राप्ति करके उनकी सिद्धि प्राप्त कर पाओगे। 

 बोलके बहुत सारी चीजें उन्होंने कर्ण मातंगी माता के ऊपर बताईं कि माता सात्विक हैं तथा जो साधक को भोग, ऐश्वर्य और सारे संसार की शक्तियों को प्रदान करने वाली रहती हैं और बहुत सारे ऐसे-ऐसे रहस्य कर्ण मातंगी माता के जो साधकों को बहुत कम पता रहते हैं। उसके बाद उन्होंने बताया कि किस तरह से साधना करना है।

तो उनके गुरु ने बोला कि आने वाले अमावस्या को मेरे पास आ जाना रात को, मैं तुमको महामातंगी मंत्र का दीक्षा प्रदान करूँगा। दीक्षा के बाद तुम महामातंगी का एक महा साधना संपन्न करना। संपन्न करने के बाद तुम फिर कर्ण मातंगी माता की साधना में लग जाना और तुम सिद्धि प्राप्त कर सकते हो इस हिसाब से। 

तो लगभग 20-30 दिन के बाद जो उनका अमावस्या आ गया था, अमावस्या आने के बाद गुरु जी मेरे, मेरे जो गुरु जी थे वो रात को अपने गुरु के पास गए, उन्होंने उधर दीक्षा प्राप्त की महामातंगी माता की और आके उन्होंने लगातार 51 दिनों तक महामातंगी साधना विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य आदि के नियम से, बहुत कठोर नियम थे उनके, उस साधना को संपन्न किए। 

किसी और लेख में उस महामातंगी साधना का जिक्र करूँगा, उसका अनुभव बताऊँगा लेकिन अभी के लिए इतना जान लीजिए कि वो बहुत कठोर था और कठोर महामातंगी साधना था। माता से आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद, महामातंगी का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद, वह उन्होंने शुरू किया कर्ण मातंगी साधना

कर्ण मातंगी साधना के प्रयास और विफलता

मेरे गुरु जी ने शुक्ल पक्ष से यह कर्ण मातंगी साधना शुरू किया। यह साधना जो था चार दिन का साधना था या फिर लगातार बोल सकते तीन दिन का प्रॉपर साधना था लेकिन इसके कुछ विधियों के अनुसार यह चार दिन का भी रहता है। 

तो इस विधि से उन्होंने साधना शुरू किया। पहले टाइम जब उन्होंने साधना शुरू किया, मेरे गुरु जी ने, पहला टाइम का जो उनका साधना का अनुभव था, वो फेल हो गया। पहला टाइम का साधना उन्होंने फेल हो गया, ना कोई अनुभव हुए, ना किसी भी प्रकार की सिद्धि प्राप्त हुई।

 लेकिन पहला टाइम का साधना फेल हो गया। दूसरा टाइम जब उन्होंने ट्राई किया कर्ण मातंगी साधना को सिद्ध करने के लिए, आखिरी दिन जब वो जाप कर रहे थे, बस उनको ऐसा लगा कि उनकी जोर-जोर से हवा चलने लगी थी। 

 जिसके वजह से उनके कान में वो हवा लगी और इतना जोर से हवा लग रही थी कि उनका सिर दर्द शुरू हो गया था जाप के बस टाइम। तो यही था दूसरे बार का साधना का अनुभव। दूसरे बार का साधना इतना में ही खत्म हो गया था।

 

कर्ण मातंगी साधना अनुभव  -सिद्धि का अनुभव: तीसरा और अंतिम प्रयास

लेकिन जब गुरु जी ने तीसरे बार का साधना किया तो तीसरे बार में उनको सिद्धि मिली और तीसरे बार का साधना का अनुभव कुछ इस प्रकार था कि जब उन्होंने तीसरे बार साधना शुरू किया, वो भी शुक्ल पक्ष के अंदर ही शुरू किया था उन्होंने।

 

कर्ण मातंगी साधना अनुभव – पहला दिन – सूक्ष्म ध्वनियों का तीव्र होना

तो साधना के पहले ही दिन जब उन्होंने संकल्प लेके पूजा करते हुए महामातंगी यंत्र के सामने जाप करना शुरू कर दिया, तो उनको ऐसा लगा कि बहुत सूक्ष्म तरीके की आवाज उनके कान में आ रही है। अभी सूक्ष्म बोलूँगा तो आप सब लोगों को समझ नहीं आएगा।

 तो अगर सीधा बोला जाए तो उनको पेड़ों से पत्ते हिलने की आवाज, जो खुद की जो सांस लेते हैं ना, वह सांसों का आवाज भी उनको सुनाई दे रहा था और बहुत दूर-दूर के अगर कोई लोग बात कर रहे हैं तो उनका बातों भी गुरु जी को सुनाई दे रही थी साधना के समय। 

साधना का समय था रात का, तो रात के समय यह गुरु जी साधना कर रहे थे। फल स्वरूप क्या हुआ कि गुरु जी को इतने मतलब सूक्ष्म आवाज भी जब सुनाई देने लगी और तीव्र स्वर में सुनाई देने लगी तो उनको ऐसा लगने लग गया था। 

 यह छोटी-छोटी आवाज भी बहुत बड़ी-बड़ी आवाज कर रहे हैं और उसके वजह से इनका बहुत सिर दर्द शुरू हो गया था और जिसके वजह से वह उस सिर दर्द के वजह से साधना के बाद ना ही ध्यान कर पाए थे और वह रात को सो भी नहीं पाए।

 

कर्ण मातंगी साधना अनुभव  दूसरा दिन: बहरेपन की भयानक परीक्षा

इस दूसरे दिन के जब सुबह हुआ तो दूसरे दिन वो बहुत चिड़चिड़ा, फ्रेश नहीं था। जैसे-तैसे करके उन्होंने दूसरे दिन की सुबह काट दी। अभी आ गया था रात यानी कि शाम ढल गया था और रात होने को आई थी। 

रात होने के जब आ गई तो उन्होंने वह साधना में बैठ गए। जब साधना में वह बैठ गए तो जब वह जाप करना शुरू कर दिए थे तो उनको ऐसा लगा कि उनके कानों में एक पतली सी छोटी सी आवाज आ रही है।

 तो वो जब उसको इग्नोर करते हुए फिर से जाप कंटिन्यू करने लगे धीरे-धीरे तो उनको ऐसा लगने लगा कि धीरे-धीरे वो आवाज बढ़ रही है और एक्चुअली में वो आवाज बढ़ भी रही थी। 

तो जब इतना हो गया कि वो आवाज इतना जोर से आने लगा कि वो एकदम कोई भी चीज सुन नहीं पाए और उनके चारों तरफ अपने उनके ही कानों में बस वही आवाज गूंजने लग गई थी जिसके वजह से कुछ समय के बाद वो जाप भी नहीं कर पाए और उनके कानों से खून आने लगा और अचानक से उनका कान सुन्न पड़ गया और उनको कुछ सुनाई देना बंद हो गया।

जब यह बंद हो गया यानी कि वह खुद के आवाज को भी उस समय सुन नहीं पा रहे थे यानी कि जो खुद वह मंत्र जाप कर रहे थे, वो मंत्र जाप की आवाज को भी वह सुन नहीं पा रहे थे। इतना हो गया।

 जब इतना हो गया तो उन्होंने जैसे-तैसे करके साधना संपन्न किया और साधना के उठ जाने के बाद जब उन्होंने आदमी आगे वाला बात कर भी रहा था तो वह बात इनको बिल्कुल भी सुनाई नहीं दे रही थी यानी कि एक तरीके से वो दूसरे दिन के साधना के प्रभाव के वजह से एकदम बहरे हो गए थे। 

जब उन्होंने ऐसा हो गया तो वह एकदम बहुत वरीड हो गए और वरीड होकर एक जगह पर बैठ गए और अपने इष्ट को स्मरण करने लगे। तो थोड़े देर के बाद उनको आईडिया आया कि थोड़ा ध्यान में देखा जाए कि ये क्या हो रहा है।

 तो उन्होंने अपने गुरु मंत्र आदि का प्रयोग करते हुए जब उन्होंने ध्यान में देखा तो उनको पता चला कि यह साधना का एक प्रभाव है जिसके वजह से वह बहरे हो गए हैं। 

अगर साधना अगर इधर ही आप वो छोड़ देंगे या फिर डर के छोड़ देते हैं कि मैं बहरा हो गया हूँ बोलके तो इनको सिद्धि भी नहीं मिलेगी और उल्टा ये जीवन भर बहरे ही रह जाएँगे यानी कि इनको कुछ सुनाई नहीं देगा, ये बहरे होकर रह जाएँगे बोलके इनको पता चला।

 तो देखिए मैं जब जैसे पहले ही बोला था कि तांत्रिक साधना इतनी भयानक रहती है, अगर सही तरीके से कर लिया जाए तो बहुत अच्छा प्रभाव देती है और अगर गलत तरीके से किया जाए तो यह नकारात्मक प्रभाव भी देती है। 

साधना को बीच में छोड़ना यह सबसे बड़ी गलती रहती है साधक की, तो ऐसा कभी ना कीजिएगा। तो अभी हम आगे बढ़ते हैं अनुभव के ऊपर।

 

कर्ण मातंगी साधना अनुभव तीसरा दिन: माता का प्राकट्य और सिद्धि

अब जैसे-तैसे करके उन्होंने ध्यान में देख लिया उसके बाद सो गए और उन्होंने रात काटा। सुबह हो गई, तीसरे दिन आ गया। तीसरे दिन जब आ गया तो तीसरे दिन के बाद क्या हुआ, सुबह-सुबह जब वो नहा-धोकर आ रहे थे तो उनके कानों से फिर से खून आने लगा और उनके कान और सिर में बहुत जोर से पेन होने लग गई थी।

 तो ये पूरा वो जो पेन था वो उनका पूरा दिन भर रहा जिसके वजह से उनके उनको ऐसा लगने लगा कि आज का साधना बहुत कठिन जाएगा। फिर भी उन्होंने माता के स्मरण करते हुए अपने इष्ट और गुरु को स्मरण करते हुए तीसरे दिन का साधना शाम को शुरू किया।

 साधना शुरू करते ही जहाँ पर वह बैठते थे, वह उनसे इधर से सीधा देख पा रहे थे कि जोर-जोर से हवा चलने लग गए थे और पेड़ बहुत जोरों से न से पेड़ हिलने लग गए थे जिसके वजह से एक भयावह वातावरण उनके साधना स्थल में शुरू हो गया था या फिर देखने को मिल रहा था।

जब साधना थोड़ा और आगे बढ़ा, जब-जब वो जाप को और आगे बढ़ाते गए, जब-जब खत्म होने लग गया था, तो उनका पूरा शरीर में एकदम गर्मी सी आ गई थी, एकदम पूरा गर्मी आ गई थी और वो एकदम पसीने से लथपथ हो गए थे। 

वजह कि उनके साइड में बहुत सारे हवा चल रहे थे फिर भी वो पसीने से लथपथ थे। जब उन्होंने पहले चरण का जाप कंप्लीट किया और उसमें क्या होता है साधना का, यह पड़ाव अगर नहीं बताऊँगा तो आप लोगों को पता नहीं चलेगा। 

तो जान लीजिए उस साधना में क्या होता है कि उसमें दीपक को बुझा देते हैं, कुछ जाप करने के बाद दीपक को बुझा दिया जाता है और दीपक के जो तेल है अपने शरीर पर लगा लिया जाता है। 

उसी तरह से गुरु जी ने दीपक को बुझा दिया और उस सारे तेल को अपने शरीर पर लगाकर स्नान करने के लिए चले गए। स्नान करने जाने के बाद वो स्नान करके आ गए, आसन पर बैठ गए, फिर से मंत्र जाप शुरू कर दिया। 

जब उन्होंने इस बार मंत्र जाप शुरू किया तो थोड़ी देर के बाद उन्होंने देखा कि एक छोटी सी लाइट है वो उनके पास धीरे-धीरे आ रही है। वो जब-जब उनका थोड़ा और आगे बढ़ता गया तो वो लाइट अब उनके पास धीरे-धीरे आती रही, आती रही और एकदम बड़ा आकार हो गया।  

 एक तरह से ऐसा हुआ कि वो आँखें बंद करते हुए भी उनको वो लाइट इतना प्रभावशाली था कि उनको उन्होंने जबरदस्ती आँखें खोली थीं। जब उन्होंने आँखें खोल दीं तो तभी भी, तभी भी उनको वो लाइट आँखों के सामने दिखाई दी और एकदम उनके आँखों के सामने घना अंधेरा छा गया थोड़े समय के लिए और जब उनका अंधेरा टूटा तो उनके सामने माता कर्ण मातंगी खड़ी थीं यानी कि कर्ण मातंगी माता उनके सामने प्रकट हो गई थीं।

 तो गुरु जी उसको वर्णन करते हुए बोलते हैं कि माता एक रक्त कमल के ऊपर आरूढ़ थीं, उनके एक हाथ में कपाल था और एक हाथ में जो तोता था, एक हाथ में खड्ग था और एक हाथ में वो वरदमुद्रा धारण किए रहती थीं। 

इस तरह से उनका चार हाथ था और वो इस तरह से रहती थीं। उनका जो वर्ण था शरीर का वो श्याम वर्ण था यानी कि पूरा काला नहीं, श्याम वर्ण था और उन्होंने आशीर्वाद प्रदान किया बोलके गुरु जी वर्णन करते हैं। 

जब उनका दर्शन हुए तो अचानक से उनके कानों में फिर से सारी चीजें उनको सुनाई देने लग गई थीं। माता ने आशीर्वाद दिया और माता उधर से गायब हो गईं बाद में। तो इस हिसाब से उनका अनुभव था।

 

कर्ण मातंगी साधना अनुभव सिद्धि का प्रमाण: खोई हुई गाय का मिलना

चौथे दिन, तीसरे दिन का साधना संपन्न करने के बाद गुरु जी ने चौथे दिन विधिपूर्वक गुप्त हवन सामग्रियों के माध्यम से गुप्त मंत्रों के माध्यम से महामातंगी का हवन संपन्न किया। महामातंगी हवन जब उन्होंने संपन्न करने के बाद, अभी बारी थी उनके गुरु से बताने का। 

तो वो अपने गुरु के पास गए और यह सारा वृत्तांत उनको बताया। तो उनके गुरु ने उनको बताया कि कर्ण मातंगी का किस तरह से प्रयोग किया जाता है। जो प्रयोग विधि है, उन्होंने प्राप्त की और आके उन्होंने प्रयोग भी किया। 

तो वह प्रयोग कुछ इस प्रकार था, वह उसका एक प्रयोग मैं आपको बता दूँ। एक दिन क्या हुआ कि गुरु जी अपने दोस्तों के साथ, वह खेती-बाड़ी का टाइम था तो खेती-बाड़ी करते थे सब लोग, तो एक बैठ के बातचीत कर रहे थे। 

तभी उनका एक दोस्त आया और उनका दोस्त का नाम था घनश्याम। तो घनश्याम जो थे उन्होंने आए और दुखी मन से गुरु जी के पास बैठ गए। तो तभी गुरु जी ने पूछा कि घनश्याम क्या हुआ। 

तो वो जो घनश्याम थे उन्होंने बताया कि मेरा एक गाय था, वह लगातार दो दिनों से लापता है जंगल में। उनका बहुत खोजा, बहुत लोगों के साथ उसको खोजने की कोशिश की लेकिन वह नहीं मिले, कहाँ गई हमको नहीं पता।

 तभी गुरु जी ने समझा कि यही उचित समय है माता कर्ण मातंगी के सिद्धि को प्रयोग करने का। उन्होंने मन ही मन मंत्र जाप किया, प्रार्थना किया और माता से बोला कि माता रास्ता दिखाइए। तभी उनके कानों में एक आवाज आई।

 उनके कानों में एक आवाज आई कि वो जो गाय है, वो पुराने जो पीपल का पेड़ है, पुराने पीपल के पेड़ के एक साइड में कुआँ है, उस कुएँ के अंदर गिर गया है। अभी भी वो जिंदा है, जाके उसको निकाल लो। 

तो उन्होंने वो पीपल के पेड़ के पास गए तो सच में उधर उस पीपल के पेड़ के पास एक कुआँ था और उस कुएँ में वो गाय गिर गई थी और चिल्ला रही थी और एक तरह से वो उधर नहीं निकल पा रही थी। तो सभी लोगों ने मिलके उस तरह से निकाला था। तो इस तरह का उन्होंने प्रयोग किया था।

कर्ण मातंगी साधना अनुभव – तंत्र साधना से मिली सीख

तो सभी को पता ही चल गया होगा कि ये जो मेरे गुरु जी ने कर्ण मातंगी साधना किया था, कितना भयानक था। तो अगर वह डर के वह साधना छोड़ देते कि अभी मैं बहरा हो गया हूँ, अभी कुछ मेरे घर का मर जाएगा, यह हो जाएगा, वो हो जाएगा बोलके छोड़ देते तो गुरु जी हमेशा बहरे ही रह जाते या फिर उनको कभी उनका इलाज ही नहीं हो पाता। 

 तो उन्होंने धैर्य पूर्वक साधना संपन्न किया, माता का आशीर्वाद लिया और उन्होंने अपने जीवन में आगे बढ़े। तो साधना में, तंत्र साधना में, इससे हमको यह सीखने को मिलता है कि तंत्र साधना में धैर्य की बहुत आवश्यकता है। 

बिना धैर्य के हम अगर तंत्र साधना करते हैं या फिर किसी भी प्रकार की उग्र शक्तियों की साधना करते हैं तो उसमें हमको बहुत क्षति प्राप्त हो सकता है। तो साधक को चाहिए धैर्य पूर्वक गुरु कृपा, अपने इष्ट की कृपा से वो तांत्रिक साधनाएँ संपन्न करे।

और एक बात, इस लेख में मैंने ये विधियाँ क्यों नहीं दीं और क्यों इन विधियों का ज्ञान नहीं दिया, आप सब लोगों को मैं बता दूँ इसीलिए क्योंकि अगर ये विधियों का ज्ञान अगर मैं आप सब लोगों को दे दूँगा, अगर अयोग्य साधक हुआ और ये विधियों का उसने प्रयोग कर दिया तो तो वो खुद को भी डुबा देगा और उसके साथ उसके घर वालों को भी ही डुबा देगा। 

क्योंकि यह एक तरह से पूर्ण तरीके से तांत्रिक साधना है। सात्विक साधना होने के बावजूद यह तांत्रिक साधना है और इसका नकारात्मक प्रभाव भी सभी को देखने को मिल सकता है। 

ध्यान रखिए, माता जितना सौम्य हैं, उतना उग्र प्रभाव की भी हैं। तो इसीलिए साधक को चाहिए धैर्य पूर्वक वो साधना और भक्ति भाव से साधना करे ताकि वो सिद्धि पा सके।

तो यही था कुछ आज का यह लेख। अगर सभी को यह लेख अच्छा लगता है तो इसे लाइक कर दें और शेयर कर दें। हमारी वेबसाइट गुरु मंत्र साधना डॉटकॉम को फॉलो करें ताकि मैं जो भी नया पोस्ट प्रकाशित करूँ, उसकी सूचना आप सब लोगों तक पहले पहुँच जाए।

 तो आज के लिए यह लेख इतना ही था। सभी को मेरा नमस्कार, जय माँ चंडी जय शंकर। मिलता हूँ आप सब लोगों से और एक किसी नए लेख में।

krodh bhairav sadhna anubhav क्रोध भैरव की साधना रहस्य 24 घंटे में चमत्कार देखो

images https://gurumantrasadhna.com/davik-sadhna/page/2/

krodh bhairav sadhna anubhav क्रोध भैरव की साधना रहस्य 24 घंटे में चमत्कार देखो

 

krodh bhairav sadhna क्रोध भैरव की साधना करो और 24 घंटे में चमत्कार देखो एक ऐसा मंत्र जिसके प्रभाव से यक्षिणी, गंधर्व, सर्प, पिशाचिनी आदि देवी-देवताओं को अपने पास बुला सकते हैं। पहली बार यह प्रयोग, यह अनुष्ठान, इस मंत्र का अनुष्ठान आप लोग सुनेंगे। आशा करता हूं आज की इस पोस्ट  से आप लोगों को सीखने के लिए, कुछ जानने के लिए मिलेगा।

जो तंत्र शिक्षार्थी, जो तंत्र सीखना चाहते हैं, मंत्र सिद्धि करना चाहते हैं, मंत्र का अनुष्ठान करना चाहते हैं, उन लोगों के लिए आज का यह कंटेंट है। आप लोग देखिए, आशा करता हूं जरूर आज का अनुष्ठान आप लोगों को पसंद आएगा। किसी भी देवी को अपने पास बुला सकते हैं।


 

क्रोध भैरव की साधना अनुष्ठान की तैयारी और मंत्र का परिचय

 1 शुभ तिथि का चयन

इस मंत्र का अनुष्ठान करने के लिए आप लोगों को एक विशेष शुभ तिथि निर्वाचन करना है। विशेष शुभ तिथि कैसा है? अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी, चतुर्दशी, संक्रांति या साल में और कई भी शुभ तिथियां चलती हैं, आती हैं, जाती हैं। उस तिथि का निर्वाचन करके अनुष्ठान करने के लिए बैठें।

 

 2  क्रोध भैरव मंत्र की शक्ति

 

अनुष्ठान का मूल विषय है, पहले मंत्र के बारे में आप लोगों को मैं थोड़ा बताना चाहता हूं। यह मंत्र जो है, क्रोध भैरव, अष्ट भैरव का नाम आप लोग जानते होंगे, तो यह है क्रोध भैरव का मंत्र। भैरव का मंत्र है, इसमें तंत्र में उन्मत्त भैरव का मंत्र और देवता को कंट्रोल करके रखते हैं।

उन्मत्त भैरव महादेव का ही एक रूप है। यह क्रोध, नाम से ही पता लग रहा है, क्रोध यानी कि गुस्सा। क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, तो नाम से ही आप लोगों को मंत्र का पावर या मंत्र की शक्ति के बारे में थोड़ा बहुत आइडिया लग गया होगा।


 

क्रोध भैरव की साधना में सफलता के रहस्य

 

इस मंत्र का अनुष्ठान या मंत्र का अप्लाई कब किया जाता है? जब यक्षिणी की साधना आप लोग करेंगे या पिशाचिनी की साधना करेंगे, यक्ष की साधना करेंगे, तो उस साधना में मुद्रा का विशेष प्रचलन है। इत्यादि कई प्रकार की मुद्राएं आप लोगों को दिखानी पड़ेंगी।

तो मुद्रा के साथ-साथ विशेष मंत्र का भी अनुष्ठान है। यक्षिणी को आकर्षण करने के लिए मंत्र के साथ-साथ मुद्रा का भी प्रचलन है, दिखाना पड़ेगा, नहीं तो सक्सेसफुल नहीं होगा। सीधा अगर कोई व्यक्ति मंत्र अनुष्ठान करता है, कई लोग आकर बोलते हैं, गुरुजी, मैं तो बहुत दिन से पिशाचिनी की साधना कर रहा हूं, यक्षिणी की साधना कर रहा हूं, मेरे गुरु ने मुझे मंत्र दिया है या कोई जगह से मुझे मंत्र मिला है या कोई अनुष्ठान से मुझे मंत्र मिला।

कोई सभा चलता है, सभा से मुझे मंत्र मिला है, यक्षिणी का यंत्र मिला, ताबीज का चीज मिलता है लोगों को, सिर्फ ताबीज मिलता है और यक्षिणी का फोटो देते हैं। ऐसे सभा होकर डिस्ट्रीब्यूशन होता है, फ्री ऑफ कॉस्ट होता है।

यक्षिणी का यंत्र तो ठीक है, यक्षिणी का ताबीज होता है, यक्षिणी का फोटो, इत्यादि माला और यक्षिणी का स्क्रिप्ट, ये सब कुछ सेल होता है। ठीक है। चलिए, तो ये सब मुझे मिला लेकिन अनुष्ठान करने के बाद कुछ सफलता नहीं मिली।


 

क्रोध भैरव की साधना – टोटका और साधना में अंतर

 

तो सब चीज के आगे और पीछे कुछ बात है। इसीलिए तंत्र शिक्षार्थी को मैं बोलता हूं, तंत्र, टोटका, उपाय और तांत्रिक प्रयोग, दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। टोटका-उपाय सामूहिक एक छोटा सा मनोकामना पूर्ण हेतु आप लोग कर रहे हैं। आपका परीक्षा है, परीक्षा में अच्छा रिजल्ट हो, इस सबसे प्रार्थना करके एक टोटका अप्लाई किया।

यह एक छोटा सा अनुष्ठान है। इसका मतलब यह नहीं कि वो टोटका को रोज अप्लाई करते हैं। आप लोग विशेष मनोकामना पूर्ति हेतु टोटका करते हैं। लेकिन साधना एक अलग विषय है। जब तक मनोकामना पूर्ण न हो, मंत्र को जोड़ते नहीं, उस मंत्र को खींचते हुए चाहते हैं आजीवन, यानी कि जब तक साधक जीवित स्थिति में है, तब तक उस मंत्र को साधक खींचते हुए जाएंगे। इसको साधना बोलते हैं। यह कलिकाल है।

सतयुग में अगर 1000 मंत्र जाप से सिद्धि होती, कलिकाल में वह 4000 मंत्र जाप से सिद्ध होगा। कलिकाल में मंत्र सिद्धि, मंत्र सिद्धि इतना आसान है? मैं पहले भी आप लोगों को बोला, मंत्र सिद्धि करने के लिए रामायण, महाभारत, इत्यादि जो पुराण हैं, ये सब को देखिए। देखने के बाद पता लग जाएगा, उस समय के लोग कितना मेहनत करते थे मंत्र सिद्ध करने के लिए।

रावण को देखिए, कितना मेहनत किया मंत्र सिद्धि करने के लिए। कलिकाल में हैं, रावण अगर 1000 जाप किया, तो आप लोगों को 4000। राम ने अगर एक लाख जाप किया, तो अभी वर्तमान समय में चार लाख जाप करना पड़ेगा। इतना आसान थोड़ी है।


क्रोध भैरव की साधना तांत्रिक प्रयोग की मुख्य प्रक्रिया

 

तो ये जो आज का ये प्रयोग है, आज का प्रयोग तांत्रिक प्रयोग है। बहुत सीधा, बहुत सटीक प्रयोग है, लेकिन यह प्रयोग मुश्किल है। मंत्र बहुत जटिल है, मुश्किल है मंत्र अनुष्ठान करना। मंत्र का दो-एक शब्द मैं आप लोगों को बता दूंगा, पूरा मंत्र उच्चारण करके नहीं बता पाऊंगा। मंत्र में जो तीन शब्द हैं, वो मैं बता दूंगा।

इस मंत्र का अनुष्ठान करने हेतु आप लोगों को मात्र दस हजार बार मंत्र जाप करना है। जहां पर अमुक शब्द लिखा है, उस अमुक शब्द में आप लोगों को जिस भी देवी-देवता को बुलाना चाहते हैं अपने पास, उसका नाम बिठाना है। मान लीजिए, आप सुरसुंदरी यक्षिणी को बुलाना चाहते हैं, बिठा दीजिए अमुक की जगह पर सुरसुंदरी नाम होगा।

यही तंत्र है, यही मंत्र है, यही नियम है। शास्त्र में जो बोला, मैं वही चीज आप लोगों के सामने प्रेजेंट कर रहा हूं, ना कुछ बढ़ा-चढ़ा कर, जो है सीधा, स्ट्रेट आप लोगों के सामने लेके आया हूं। तंत्र में यही बोला है। और क्रोधराज के इर्द-गिर्द, मैं पहली बार लोगों को पढ़ा था, दसों दिशा से सिद्धि क्रोधराज के निकट रहता है। बाकी किसके दसों दिशाओं में सिद्धि रहता है, मुझे पता नहीं।

लेकिन क्रोधराज या क्रोध भैरव के पास सभी सिद्धियां मौजूद रहती हैं। तो हम लोग अगर क्रोधराज का ही मंत्र का अनुष्ठान करते हैं, उसमें अगर सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, तो सारी सिद्धियां, गंधर्व, राक्षस, पिशाच, देव, दानव, यक्ष, किन्नर, इत्यादि सभी अपने मुट्ठी के अंदर या करगत हो जाएंगे। इसीलिए क्रोधराज का यह मंत्र का प्रयोग आज आप लोगों के लिए मैं प्रस्तुत कर रहा हूं।

 

क्रोध भैरव की साधना – वेश-भूषा, दिशा, और समय

 

तो ये सब उस टाइम शुरू में बता दिया कैसे करना है। आप लोग जो भी वस्त्र पहनना चाहते हैं, लाल पहनें, काला पहनें, हरा पहनें, नीला पहनें, जो भी, वस्त्र का कोई बंधन नहीं है।

तो वस्त्र पहनकर आप लोगों को पूर्व या ईशान की ओर मुंह करके आप लोगों को इस अनुष्ठान में बैठना है। अनुष्ठान को बैठने के लिए कोई टाइम नहीं है।

तांत्रिक अनुष्ठान हर समय रात में ही किया जाता है, तो रात में अनुष्ठान करने के लिए बैठें। जब भी आप लोगों को समय मिले, लेकिन सही समय में अनुष्ठान करने के लिए बैठें।

 

 जाप की संख्या और अवधि

 

इस मंत्र का आप लोगों को पहले ही बताया, दस हजार बार मंत्र का जाप आप लोगों को करना है। मानसिक संकल्प लें। भोलेनाथ के मंदिर में, भैरव जी के मंदिर में पूजा-अर्चना देकर आएं, उसके बाद अनुष्ठान शुरू कर दीजिए।

पहले पूजा देकर आ सकते हैं या उसी दिन पूजा देकर आ सकते हैं। कुल मिलाकर दस हजार जाप आप लोगों को करना है।

एक दिन में कर सकते हैं, तीन दिन में दस हजार कर सकते हैं, दस दिन में दस हजार कर सकते हैं, इससे ऊपर मत जाइए। एक, तीन, दस, ये हिसाब से आप लोगों को अनुष्ठान करना है। अनुष्ठान के समय पहले बताया, अमुक की जगह पर नाम बिठाना है।


 

क्रोध भैरव की साधना अनुष्ठान का विशेष नियम: स्केच का प्रयोग

 

अनुष्ठान कर लिए, अभी अनुष्ठान का एक विशेष जो नियम है, उस नियम को मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं। नियम क्या है? जब आप लोग किसी देवी-देवता को बुलाना चाहते हैं, जब बुलाएंगे, तब स्केच बनाना पड़ेगा आप लोगों को। सफेद कागज में बनाइए, भोजपत्र में स्केच बनाइए। किसी पुरुष देवता को बुलाना चाहते हैं, तो आप लोग जानते हैं पुरुष देवता का स्केच कैसा होगा।

पुरुष की आकृति में उस देवता को अंकन कीजिए। महिला देवता को बुलाना चाहते हैं, यक्षिणी को बुलाना चाहते हैं, कि सुरसुंदरी यक्षिणी को बुलाना चाहते हैं, मेनका को बुलाना चाहते हैं, रंभा को बुलाना चाहते हैं, ठीक है? तो उस जैसा आप लोगों को आकृति का स्केच बनाना है। ठीक है? अपने बाएं पैर के नीचे स्केच को दबाकर मंत्र को जाप करना है।

माला लें, रुद्राक्ष, स्फटिक, ये दो माला बेस्ट हैं। नहीं है, तो उंगली से मंत्र जाप करने की कोशिश कीजिए। प्रतिदिन जाप संख्या आप अपने हिसाब से निर्धारण करके जाप कीजिए। यह है संपूर्ण प्रक्रिया। अनुष्ठान संपन्न हो जाने के बाद कोई हवन का इसमें उल्लेख तो है नहीं, इसलिए हवन करने का जरूरत नहीं है।


 

क्रोध भैरव की साधना – अनुष्ठान के बाद की अनिवार्यताएं और दान-दक्षिणा का महत्व

 

अनुष्ठान संपन्न हो जाने के बाद अपने हिसाब से कम से कम तीन ब्राह्मण को या तीन पंडित को या तीन साधु-संत को भोजन करवा के दान-दक्षिणा जरूर दें। कोई भी टोटका, टोना-टोटका कुछ भी करें, करने के बाद ब्राह्मण को या पंडित को जरूर खिलाएं। जब तक खिलाएंगे नहीं, दान नहीं करेंगे, प्रोग्राम या अनुष्ठान असफल माना जाएगा या इनकंप्लीट माना जाएगा।

आशा करता हूं समझ में आया जो बोल रहा हूं। सनातन हिंदू धर्म में है, कोई मेरे शब्द के ऊपर उंगली भी नहीं उठा पाएगा। जो बोल रहा हूं, देख लीजिए, थोड़ा रिसर्च कर लीजिए, देख लीजिए। कोई बताया नहीं, टोटका तो हजारों मिलेंगे, टोटका के बाद यह नहीं बताया, टोटका के बाद कर्म करने के बाद कुछ दान करो, कुछ दक्षिणा दो, किसी को खिलाओ।

पक्षी को खिलाने के लिए बोलेगा, लेकिन इंसान को खिलाओ। पक्षी को तो कोई भी एक मुट्ठी चावल लेकर पक्षी को खिला दो, कोई बात नहीं। किसी इंसान को खिलाओ, पंडित को खिलाओ और उनको दान-दक्षिणा दो और बोलो जी, इस मनोकामना हेतु आज आपको मैं यह खिलाया। पक्षी तो बात समझेगा नहीं, समझेगा नहीं, समझेगा। इसीलिए संपूर्ण अनुष्ठान पद्धति मैं बता दिया।


 

अंतिम विचार और मंत्र का सारांश

 

क्रोधराज के इर्द-गिर्द, मैंने पहले बताया, अगर क्रोधराज के इस मंत्र के ऊपर आप लोगों का कंट्रोल आ जाता है, मंत्र को एक बार अगर जागृत करके सिद्ध कर लिए, तो सारे सिद्धियां आपके करगत हो जाएंगी। इधर-उधर सिद्धि के लिए यह मंत्र, वो मंत्र, यह मंत्र करने का जरूरत नहीं है। अच्छी तरह से सुस्पष्ट मंत्र का अनुष्ठान कीजिए।

मंत्र, यंत्र सब कुछ  वेबसाइट के अंदर रहेगा। शुरू से अंत तक योग व्यक्ति पोस्ट को एक बार पढ़ना , आशा करता हूं उस व्यक्ति को मंत्र जरूर मिलेगा। ना कमेंट करना पड़ेगा, ना मैसेज करना पड़ेगा। आज का पोस्ट आप लोगों को कैसा लगा, एक लाइक और कमेंट के माध्यम से मुझे जरूर बताइए। पसंद आए तो  पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए।

क्रोध भैरव की साधना मंत्र का उच्चारण और स्थान

 

मंत्र उच्चारण करके मैं आप लोगों के लिए बता रहा हूं, देखिए, मंत्र में सबसे पहले  आशा करता हूं इसके आगे आप लोगों को कुछ भी पूछने का जरूरत नहीं पड़ेगा। तो यह जो शब्द मैं बोला, उसके बाद अमुक शब्द का उल्लेख होगा और मंत्र का पाठ होगा। जाप करने की विधि-विधान, संपूर्ण अनुष्ठान मैं बता दिया।

मेरे हिसाब से कोई पॉइंट मैं छोड़ा नहीं। बाकी अगर कोई पॉइंट मुझसे छूटता है, तो जरूर कमेंट करके बताइए। महादेव के सामने मंदिर में भी बैठकर यह अनुष्ठान आप कर सकते हैं। घर के शिवलिंग के सामने आप लोग बैठकर अनुष्ठान कर सकते हैं।

किसी भी देवी-देवता के मंदिर में जाकर भी बैठकर अनुष्ठान कर सकते हैं, कोई समस्या नहीं है। जो घर में करना है या बाहर में नहीं कर सकते, हां आप लोगों को ठीक लगे। लेकिन एक बात ध्यान में रखें, मंदिर में करते हैं, तो अनुष्ठान टोटल मंदिर में ही होगा। घर में करते हैं, तो घर में ही होगा। कभी मंदिर में, कभी घर में, यह नहीं चलेगा। जहां पे अनुष्ठान शुरू होगा, वहीं पे अनुष्ठान समाप्त होगा।


 

क्रोध भैरव की साधना आगामी  की घोषणा

 

आज का कंटेंट यहीं पर विराम देता हूं, लंबा पोस्ट  हो रहा है। बुधवार को मैं एक प्रयोग विधि लेके आ रहा हूं, महालक्ष्मी का प्रयोग। अचानक धन प्राप्ति के लिए। रात को सोने से पहले बस यह नाम तीन बार अगर आप लोग लेते हैं, तो आपका रुका हुआ पैसा, फंसा हुआ पैसा, अचानक धन प्राप्ति के लिए अद्भुत, अचूक प्रयोग मैं लेकर आ रहा हूं।

ucchishta ganapati sadhana rahsya उच्छिष्ट गणपति: तंत्र का एक रहस्यमयी स्वरूप

ucchishta ganapati sadhana rahsya उच्छिष्ट गणपति तंत्र का एक रहस्यमयी स्वरूप

 

ucchishta ganapati sadhana rahsya उच्छिष्ट

गणपति तंत्र का एक रहस्यमयी स्वरूप

ucchishta ganapati sadhana rahsya उच्छिष्टगणपति तंत्र का एक रहस्यमयी स्वरूप
ucchishta ganapati sadhana rahsya उच्छिष्ट गणपति तंत्र का एक रहस्यमयी स्वरूप

ucchishta ganapati sadhana rahsya उच्छिष्ट गणपति: तंत्र का एक रहस्यमयी स्वरूप अमोघ शक्ति देखने वाले सभी पाठकों को पंडित अखिलेश जी का प्रणाम, नमन। मित्रों, उच्छिष्ट गणपति के बारे में बात करने जा रहा हूँ। बहुत ही अद्भुत लेख होने वाला है। उच्छिष्ट गणपति कवच के बारे में। मूल विषय हमारा उच्छिष्ट गणपति कवच रहेगा, लेकिन उससे पहले थोड़ा-सा समझेंगे उच्छिष्ट गणपति भगवान के बारे में।

उच्छिष्ट गणपति वाम मार्ग और दक्षिण मार्ग का अर्थ

ucchishta ganapati sadhana rahsya उच्छिष्टगणपति तंत्र का एक रहस्यमयी स्वरूप
ucchishta ganapati sadhana rahsya उच्छिष्ट गणपति तंत्र का एक रहस्यमयी स्वरूप

वाम मार्ग और दक्षिण मार्ग, दो पद्धतियां हैं हमारे तंत्र-शास्त्र के अंदर पूजन करने की या मंत्र सिद्ध करने की। वामाचार बाईं तरफ़ वाला, दक्षिणाचार दाईं तरफ़ वाला। इसके भी कई सारे भेद हैं। लोग समझते हैं कि वामाचार का मतलब पंच-मकार हो गया।

मांस, मदिरा, मैथुन, मुद्रा, यह सब जो है, यह चलता है। यह सब वामाचार उस अर्थ में लिया जाता है। एक्चुअल अर्थ क्या है? वाम मतलब बायां।

जो काम आप राइट हैंड से, जो नॉर्मली अपने जीवन में जो हाथ आपका काम करता है, वह आप जो आप कर रहे हो, लेकिन उल्टे हाथ से जितने भी आप काम करते हैं, उल्टे स्टाइल से जो काम करते हैं, विपरीत स्टाइल से जो काम किए जाते हैं, विपरीत तरीके से, वह वामाचार हो गया।

बहुत छोटा सा तरीका बताता हूँ। किसी देवता को किसी कठिन परिस्थिति में सिद्ध करना हो, उनको मनाना हो, उनकी कृपा प्राप्त करनी हो, उनका कोई उपाय सिद्ध करना हो, आप बहुत परेशानी में हों। जैसे मैंने लोम-विलोम पाठ बताया था।

एक, एक लेख लिखा था लोम-विलोम पाठ पर। अद्भुत उपाय है। अगर नहीं पढ़ा हो तो ज़रूर देखिएगा। पहली बार आए हैं तो आपको इस वेबसाइट से बहुत कुछ मिलने वाला है।

देखिए, टिके रहिए। जो काम सीधे तरीके से नहीं होते, वह काम उल्टे तरीके से करने पड़ते हैं। भगवान को भी कई बार जब एक पिता के सामने जब बच्चा कोई चीज़ माँगता है और पिता मना कर देते हैं तो कई बार वह उल्टे तरीके अपनाता है।

जैसे जिद करी, ज़मीन पर लोटने लग गया, चिल्लाने-चीखने लग गया, रोने लग गया या इस तरीके की चीज़ें जो एक बेटे को अपने पिता के साथ नहीं करनी चाहिए।

लेकिन छोटा बालक होता है। पिता को उसकी इस जिद को देखते हुए उसकी इच्छा पूरी करनी पड़ती है और वह उस वक्त हल हो सकता है, थोड़ा-सा गुस्सा हो जाए लेकिन फिर भी है अल्टीमेटली पिता, तो उसको समझेगा कि चलो ठीक है, बच्चे को चाहिए, दे दो।

इसमें एक फ़ैक्टर और काम करता है माँ का। माँ कई बार इंसिस्ट करती है कि दिला दो, क्यों रुलाना बच्चे को। तो चलो ठीक है, दे दो।

पूरा कॉन्सेप्ट समझना मैं क्या बोलने जा रहा हूँ। उच्छिष्ट गणपति भगवान को वामाचार पूजा से जो है, संतुष्ट किया जाता है हमारे तंत्र मार्ग में। तंत्र मार्ग में गणपति का जो सर्वश्रेष्ठ तांत्रिक का स्वरूप है, वह उच्छिष्ट गणपति है। वामाचार, देवी, जिद, यह सब चीज़ें अभी आएंगी तो मैं रिलेट कर दूँगा।

‘उच्छिष्ट’ का वास्तविक रहस्य

ucchishta ganapati sadhana rahsya उच्छिष्टगणपति तंत्र का एक रहस्यमयी स्वरूप
ucchishta ganapati sadhana rahsya उच्छिष्ट गणपति तंत्र का एक रहस्यमयी स्वरूप

 उच्छिष्ट का अर्थ होता है छोड़ा हुआ या खाकर जो अंत में कुछ छूट जाता है, जूठा। यानी अब जो बिल्कुल अंत में बचा है, उसको उच्छिष्ट कहा जाता है। जिसको अब कोई हाथ नहीं लगा रहा। थाली में से जो जूठन छूट जाता है अंत में, थोड़े-बहुत जो दाने बच जाते हैं या जो कुछ भी, उसे उच्छिष्ट कहा जाता है। याद रखना।

उच्छिष्ट गणपति कैसे नाम पड़ा ?

असलियत में इनका नाम उत्कृष्ट गणपति है। कालांतर में धीरे-धीरे अपभ्रंश होते हुए, तंत्र मार्ग में वामाचार का उपयोग करते हुए इनका नाम उच्छिष्ट गणपति पड़ा।  वामाचार की जितनी पूजाएं हैं, जितने अभ्यास हैं हमारे तंत्र मार्ग के अंदर, वह सब हमारी आत्मा को परमात्मा से मिलाने के लिए, यानी एक सर्वोच्च लक्ष्य के लिए तंत्र का प्रतिपादन किया था।

भगवान शिव ने, पैसा, धन, माया, इन सब चीज़ों के लिए नहीं किया था, अपने आत्म-कल्याण के लिए, ईश्वर से मिल जाने के लिए तंत्र का जो है, उत्सर्ग हुआ था।

 अब इन सब चीज़ों को आपको लग रहा होगा, ये क्या बात कर रहे हैं? मैं इन सब चीज़ों को मिला दूँगा थोड़ी देर, पाँच मिनट और रुकिए। छूटा हुआ, उच्छिष्ट, जिन्हें हम कहते हैं, वास्तव में अंत में क्या छूटता है? जब हमारे प्राण निकल जाते हैं, अंत में क्या छूटता है?

आत्मा। आत्मा से उत्कृष्ट कुछ नहीं है। यह सबको पता है। यानी जो उत्कृष्ट है, वही अंत में छूट जाता है। लेफ़्ट ओवर। जो सबसे श्रेष्ठ है, वही सबसे अकेला अपने आप को खड़ा पाता है।

वही सबसे अलग अपने आप को खड़ा पाता है। सबसे अलग होना भी उच्छिष्ट है। बिल्कुल जो श्रेष्ठ, श्रेष्ठता जो सबसे अंत में बच जाती है, वह भी उच्छिष्ट है। दूध का उच्छिष्ट जो है, वह क्या है पता है आपको? घी। वह सबसे श्रेष्ठ उसकी योनि है।

दूध की सबसे श्रेष्ठ योनि क्या है? घी। तो उच्छिष्ट हम इसको इस अर्थ में, तंत्र में इसको वामाचार में इस अर्थ में लिया जाता है जैसे जूठा छूट गया हो। अब आप इसका सारा अर्थ समझ लीजिए। मैंने आपको समझा दिया कि इसका, इसके पीछे रहस्य क्या है? उच्छिष्ट के, उत्कृष्ट जो सबसे अंत में बच जाता है।

दूध का उच्छिष्ट या उत्कृष्ट क्या है? घी। हमारे शरीर का उच्छिष्ट, उत्कृष्ट क्या है? आत्मा। ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः’। जिसको आग जला नहीं सकती, पानी गला नहीं सकता।

जो श्रेष्ठतम स्वरूप है, आत्मा, सो ही परमात्मा, जो परमात्मा का ही स्वरूप होता है, अंत में वह बचता है। तो सर्वश्रेष्ठ परमात्मा के रूप में भगवान गणपति की साधना की जाती है तंत्र मार्ग के अंदर उच्छिष्ट गणपति के रूप में। हम बोलचाल में उसको उच्छिष्ट गणपति ही बोलेंगे पूरे इस लेख में।

उच्छिष्ट गणपति  विंध्यावान राक्षस की कथा

इनकी सामान्य छोटी-सी कथा इनकी मैं सुना देता हूँ। इनकी उत्पत्ति कैसे हुई? प्राचीन काल में विंध्यावान नाम का एक राक्षस हुआ। भयंकर दैत्य हुआ। उसने ब्रह्मा जी की तपस्या की, जो होता है। अब सारी कथाओं में इसी प्रकार से चलता है। 

विंध्यावान ने तपस्या की। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए। वह आ गए। भैया, क्या चाहिए? बोलो। विंध्यावान ने कहा कि अमरत्व चाहिए, अमरता दे दो। ब्रह्मा जी ने कहा, अमरता नहीं दे सकता, और कुछ माँग ले। कुछ ऐसा माँग ले जिससे तेरा काम भी पूरा हो जाए। विंध्यावान ने कहा कि ठीक है, वह कुछ स्पेशल उसने माँग लिया।

 उसने कहा कि मुझे ऐसा कोई मारे जो अपनी पत्नी से रति-क्रिया में रत हो। उसी अवस्था में कोई मारे तो मैं मरूँ। अब बताओ, उसके माँगने के पीछे और इस उच्छिष्ट गणपति के रहस्य के पीछे कितनी चीज़ें छुपी हैं? कितना बड़ा तंत्र है? कितनी चीज़ें इससे सॉल्व हो सकती हैं? ‘कलौ चण्डी विनायकौ’, जो तंत्र में कहा जाता है न, आगम में, हमारे आगम शास्त्र में कहा जाता है

कि कलि में चंडी और विनायक की उपासनाएँ श्रेष्ठ कही जाती हैं। विनायक के कई स्वरूप हैं, 52 स्वरूप हैं भगवान गणपति के। उनमें से एक है उच्छिष्ट गणपति, जो तांत्रिक स्वरूप है।

अब उसने माँग लिया कि जो कोई भी अपनी सहचारिणी से रति-क्रिया में रत हो, उस अवस्था में अगर मुझे मारे तो ही मेरा वध हो, वरना न हो। अब ऐसी अवस्था में कौन मारे?

सारे देवता दुखी, स्वर्ग, आकाश, पाताल, नरक, सप्तलोक, तीनों भुवन दुखी कर दिए उसने। सब लोग गए ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पास, तीनों त्रिदेवों के पास कि महाराज, कुछ करो इसका। उन्होंने भी हाथ जोड़ लिए कि भैया, इसका, इसको कैसे मारें?

इसने तो शर्त ही ऐसी रख दी। अब अपनी पत्नी के साथ समागम करते हुए युद्ध करना, आप समझना, थोड़ा-सा इसके स्पिरिचुअल रहस्यों पर भी आएँगे। तब जाकर भगवान गणपति आगे आए। भगवान श्री महागणपति आगे आए। उन्होंने कहा कि मैं यह करूँगा।


 

उच्छिष्ट गणपति का प्रतीकात्मक स्वरूप

 

इसके पीछे एक रहस्य और समझो कि भगवान महागणपति इतने उदार देवता हैं, इतना उनका ऐसा स्वभाव है कि थोड़े समय में वह प्रसन्न हो जाते हैं। उसके बाद अपने भक्तों के लिए जब कोई आर्त पुकार उनके सामने करता है, त्राहि-त्राहि कर-करके उनके पास जाता है या अपने आप को सर्वस्व समर्पित कर देता है।

जब पूरी दुनिया आपसे मुख मोड़ ले, तब भगवान गणपति आपका साथ देने के लिए आ जाते हैं, अगर उन्हें पूजा जाए, उनसे, उनको पूरे दिल से पुकारा जाए। भगवान गणपति आ गए। मैं जाऊँगा।

अपना जो सबसे श्रेष्ठ छूट जाता है, उस उच्छिष्ट स्वरूप में भगवान गणपति ने अपनी सहचारिणी विघ्नेश्वरी को अपनी बाईं जंघा पर बिठाकर रति-क्रीड़ा में रत रहते हुए उस विंध्यावान राक्षस का उन्होंने वध किया। अब इनका आइकनइज़्म देखो। आप इनका सिम्बॉलिज़्म देखो।

प्रतीकात्मकता देखो। इस सब पर बात करेंगे। ऐसा मत समझना कि लिटरली यही हुआ। समझना, मैं समझा दूँगा सारी चीज़ें। क्योंकि उस राक्षस ने माँगा ही ऐसा वर था कि कोई रति-क्रीड़ा में रत रहते हुए कोई व्यक्ति मुझे मारे, कोई मुझे मारे।

तो भगवान गणेश ने अपनी बाईं जंघा पर अपनी प्रिया विघ्नेश्वरी, जिनका नाम हस्तिपिशाची भी कहा गया है, उनको अपनी जंघा पर बिठाया।

प्रतीक में इस प्रकार से आता है, प्रतीकात्मक चित्रण में इस प्रकार से आता है कि भगवान की सूंड देवी की योनि के अंदर है और देवी का राइट हैंड में कमल का पुष्प है और लेफ़्ट हैंड में भगवान गणपति का प्राइवेट पार्ट है।

इतना सघन चित्रण, इतना सघन प्रतीकात्मकता आपने और किसी कथा में, किसी देवता में नहीं देखी होगी। उस अवस्था में उन्होंने उस राक्षस का वध किया।

 

 उच्छिष्ट गणपति संभोग से समाधि का अर्थ

 

अब इसका मूल समझाता हूँ। ओशो ने एक, एक लाइन कही थी, बड़ी क्रांति आ गई थी—संभोग से समाधि की ओर। अर्थ क्या है इसका?

इसका अर्थ भगवान उच्छिष्ट गणपति समझाते हैं कि जिस अवस्था में आप अपने चरम पर होते हैं, चरम सुख पर होते हैं, उस अवस्था में आप अपनी ऊर्जा को इतना ऊपर बढ़ा लें कि आपके अंदर के राक्षसों को आप समाप्त कर दें और आपका फ़ोकस बने, ईश्वर से आप मिल जाएँ।

आप अपनी प्रकृति से इस प्रकार से जुड़ जाएँ, उसमें इस प्रकार से एकाग्र हो जाएँ कि उन, उस सुखों से ऊपर बढ़कर आप एकात्म कर लें ईश्वर के साथ, अपने अंदर के राक्षसों को समाप्त करते हुए, अंदर की मलिन, मलिनताओं को नष्ट करते हुए, यह इसका अर्थ है।

 

 उच्छिष्ट गणपति शिव के अट्टहास से उत्पत्ति

 

एक और कथा के अनुसार, भगवान उच्छिष्ट गणपति का जो जन्म है, वह भगवान महाशिव की हँसी से हुआ था। भगवान शिव के अट्टहास से हुआ था। जब उन्होंने काली के नृत्य को देखा, जब काली ब्रह्मांडीय नृत्य करती हैं, महाकाली, तब उनको देखकर भगवान शिव जो हँसते हैं, जो मुस्कुराते हैं, उनकी हँसी से भगवान उच्छिष्ट गणपति का जन्म होता है।

उच्छिष्ट, यानी जूठा, जूठन। तो भगवान के मुख से, जो भगवान की उस, उस हँसी से जो, जो जन्म हुआ भगवान से, उनको उच्छिष्ट गणपति कहा गया। ये एक अघोर, महान तांत्रिक स्वरूप है भगवान गणपति का।


 

 उच्छिष्ट गणपति साधना का महत्व

 

इनकी पूजा के बारे में ऐसा कहा जाता है कि कलियुग में देखो, तंत्र तो कोई भी शुरू करे, तंत्र-शास्त्र में जितने भी लोग हैं, कोई शायद आपसे खुलकर बोले चाहे न बोले, हक़ीक़त यह है कि जितने बड़े-बड़े मंत्रज्ञ हैं, जितने बड़े-बड़े मंत्रवेत्ता हैं, जितने बड़े-बड़े साधक हैं इस दुनिया के अंदर, इस ब्रह्मांड के अंदर, वह सबसे पहले अपना स्टार्टिंग भगवान गणपति से ही करते हैं।

वह महागणपति से करो, चाहे वामाचारी है तो उच्छिष्ट गणपति से करो। गणपति की साधना किए बिना कोई साधना आपकी सफल नहीं हो सकती। यह तय बात है। मैं हो सकता है किसी और लेख में दोबारा न बताऊँ। यह बात सच है।

अगर आप भगवान गणपति को इंक्लूड नहीं कर रहे हैं या अपनी मूल साधना, जो पुरश्चरण आप करते हैं, करना चाहते हैं, उससे पहले आप अगर गणपति का कोई छोटा-मोटा आपने पुरश्चरण, छोटा-मोटा तो एक शब्द है, गणपति की कोई-न-कोई सामान्य साधना अगर आपने नहीं करी, पाँच दिन, 25 दिन, महीना-भर, साल-भर, जो भी, वो, वो देखने पर पता लगता है कितना किसको चाहिए।

अगर आपने ऐसा नहीं कर रखा है तो आपको फल मिलना मुश्किल है, लगभग नामुमकिन है। आप करते रहो, घिसते रहो, पाप कटेंगे, कुछ-न-कुछ तो उस साधना का मिलेगा ज़रूर, लेकिन जितना आप चाहते हैं न कि मुझे इस मंत्र का फल मिल जाए, इसमें यह मंत्र मुझे सिद्ध हो जाए, मंत्र-सिद्धि भगवान गणपति की पूर्व-साधना के बिना हो ही नहीं सकती।

और उसमें से जो वामाचार में जो है, जो वाम मार्ग में जो अपनी पूजाएँ, तंत्र-साधनाएँ करते हैं, उसमें उच्छिष्ट गणपति का बहुत बड़ा स्थान है।

उच्छिष्ट गणपति का सही वास्तविक अर्थ है

उत्कृष्ट गणपति, जो हमारे शरीर का, जो हमारा उत्कृष्ट एम है, जो संपूर्ण लक्ष्य है, जो परम लक्ष्य है, उससे मिला देना उच्छिष्ट गणपति का कार्य है।

उच्छिष्ट गणपति को शत्रुहंता के रूप में, विजयप्रदा साधना के रूप में माना जाता है और मूल रूप से यह कुंडलिनी जागरण की विद्या है, मोक्ष की साधना है।

 

 उच्छिष्ट गणपति में देवी की भूमिका

 

फिर इसमें एक प्रतीक आया देवी का। उन्होंने अपनी बाईं जंघा पर देवी को स्थापित कर रखा है और उनसे रति में निमग्न हैं और उस अवस्था में उन्होंने उसे मारा। बिना देवी की कृपा के, बिना उस पर्टिकुलर देवता की शक्ति की कृपा के, उस पर्टिकुलर देवता का आशीर्वाद आपको नहीं मिल सकता। यह भी एक तथ्य है। यह भी एक सच है।

शिव की कृपा पाना चाहते हैं तो देवी दुर्गा की कृपा, पार्वती की कृपा, भुवनेश्वरी की कृपा आप पर होनी ही चाहिए। उनके आशीर्वाद से, उनकी अनुमति से आप, शिव आप पर प्रसन्न होंगे। ऋद्धि, सिद्धि, विघ्नेश्वरी, हस्तिपिशाची, इनकी कृपा के बिना आप भगवान गणपति की कृपा प्राप्त नहीं कर सकते।

माता जानकी की कृपा के बिना राम जी की कृपा कैसे मिलेगी ? माता लक्ष्मी की कृपा के बिना विष्णु की कृपा कैसे प्राप्त होगी ? यानी यह तो मैंने नाम लिए। असल बात यह है कि उस देवता की शक्ति जब आपसे प्रसन्न होगी, तब देवता आप पर प्रसन्न होंगे।

यानी उनको इंक्लूड करके आपको रखना ही पड़ेगा। भगवान महादेव की उपासना करते हैं तो आपको साथ-ही-साथ महादेव की, अब इसका समझ लो, सीधी भाषा में सर समझ लो, जिस देवी या देवता की आप उपासना करते हैं, उसके साथ में आपको उस पर्टिकुलर की शक्ति या शिव की उपासना आपको करनी ही चाहिए।

जिस प्रकृति की आप उपासना करते हैं तो उसके साथ पुरुष की उपासना करनी पड़ेगी, पुरुष की करते हैं तो प्रकृति की करनी पड़ेगी। शिव के मंत्र-सिद्धि में आप लगे हैं, मुझे शिव के मंत्र को सिद्ध करने का है, तो उसके साथ में आपको देवी का कोई भी पाठ, कोई भी मंत्र, मंत्र आपको साथ में रखना पड़ेगा।

विष्णु की उपासना करते हैं, विष्णु भगवान नारायण की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं तो लक्ष्मी का कोई भी पाठ, कनकधारा स्तोत्र, श्री सूक्त या कोई लक्ष्मी जी का मंत्र या कोई लक्ष्मी कवच या लक्ष्मी स्तोत्र, इस प्रकार से आपको करना पड़ेगा। यह जल्दी, शीघ्र, जल्दी सिद्धि के साधन बता रहा हूँ।


 

उच्छिष्ट गणपति से जुड़ी भ्रांतियों का खंडन

 

जो तंत्र-सिद्धि जो होती है, जो एक्यूरेट, अरे आपको क्या पता कि मंत्र क्या-क्या दे सकता है? हमें लगता है कि मैंने तो आज तक कभी देवी की उपासना नहीं की, सब हमेशा शिव की करी, लेकिन फिर भी मेरे पे तो बहुत कृपा है। मेरे तो पास तो बहुत पैसा है। बहुत ज़मीन-जायदाद हो गई।

बहुत ज्ञान आ गया। सब कुछ हो गया। यह तुच्छ है। यह सबसे अधम सिद्धियों में माना जाता है तंत्र के अंदर। यह तो कण मात्र भी नहीं है। मंत्र से तो तुम इतना ले सकते हो।

तो मैं तो वह तरीके बता रहा हूँ जिससे आप सब कुछ प्राप्त कर सको। बात उच्छिष्ट गणपति की चल रही है। अगले लेख में मैं आपको बताऊँगा कि उच्छिष्ट गणपति कवच, यह कितना महान है।

उसकी हम बात करेंगे अगले लेख में। इस साधना को जब आप करते हैं तो आपको अनंत तक देखने की दृष्टि प्राप्त हो जाती है। अपने चारों तरफ़ देखने का एक, एक भाव उत्पन्न अंदर होने लग जाता है। देखने का मतलब ऐसा लिटरली ऐसा देखने का नहीं। त्रिकालदर्शी जिसे बोला जाता है, त्रिकालज्ञ व्यक्ति हो सकता है अगर भगवान उच्छिष्ट गणपति की उपासना अगर ठीक-ठीक तरीके से कर ले।

बुद्धि और ज्ञान के देवता तो हम मानते हैं न सामान्य भाषा में। हम तंत्र की बातें कर रहे हैं। उसके आधार पर अगर उस, उस पर्सपेक्टिव में जाया जाए तो त्रिकाल, त्रिकालज्ञ, त्रिकालज्ञ से ऊपर, कुछ बियॉन्ड स्पेस एंड टाइम, वह व्यक्ति देखने लगता है।

उसकी इतनी एबिलिटी उसकी बढ़ जाती है, जिसको हम कहते हैं कुंडलिनी जागृत हो गई। इसकी कुंडलिनी में मूलाधार के देवता कौन हैं? गणपति। स्टार्टिंग वहाँ से होती है।

यही कारण है कि उच्छिष्ट गणपति की साधना करने वाले के विज़न फैल जाते हैं। उनकी दृष्टि उसकी विस्तृत हो जाती है।

हम जो अभी जीवन जी रहे हैं, आप समझना, यह मेरा भाई, यह मेरी बहन, यह मेरे पापा जी, यह मेरी मम्मी जी, यह मेरी पत्नी, यह मेरा पैसा, यह मेरी गाड़ी, यह मेरा, यह मेरा, वह मेरा, ये या और भी कुछ चीज़ें, ईर्ष्या, जलन, गुस्सा, लोभ, मोह, क्रोध, इस प्रकार का, ये सब जो हम इस चारों, इस प्रपंच में जो हम फँसे पड़े हैं, इसको तोड़ने का काम करते हैं भगवान उच्छिष्ट गणपति।

आपकी सोच से इस एक्चुअल सोच को मिलाने का काम कर देते हैं कि वास्तव में चल क्या रहा है। उस दर्शन को, चिदाकाश में भ्रमण करने की प्रवृत्ति आपके अंदर आ, पैदा हो सकती है, अगर उच्छिष्ट गणपति सिद्ध हो जाएँ। शत्रुओं का नाश और विजय और भयों से रक्षा और ये तो बहुत छोटी-छोटी बातें हैं।

ये तो करेंगे ही, बाद में कर ही लेंगे। यह तो सब लिखा पड़ा है। यह तो लिखा होता है। मैं वह बोल रहा हूँ जो लिखा नहीं गया। जो लिखा है, उसके पीछे की बातें हम समझने की कोशिश कर रहे हैं। तो यह तो वह विद्या है जो आपका सर्वश्रेष्ठ निचोड़कर, जो सर्वश्रेष्ठ आपके अंदर का है, वह लाके बाहर छोड़ देगी, जो उच्छिष्ट है।

प्रसाद और गृहस्थ साधना पर विचार

 

इस प्रकार से कहा गया कि उच्छिष्ट गणपति का प्रसाद खुद को नहीं, स्वयं नहीं खाना चाहिए। इनकी साधना जो है, गृहस्थों को नहीं करनी चाहिए। अगर, श्मशान जैसा हो जाता है या आपका, देखो यार, ऐसा है बाबा, कोई भी साधना हो, वाम मार्ग, दक्षिण मार्ग से घबराने की आवश्यकता नहीं है।

हाँ, यह बात अवश्य है कि आपकी कुंडली में, आपके प्रारब्ध से आप इस प्रकार के ग्रह-योग लेकर आए हैं तो आप साधना यह कर सकते हैं। कोई भी व्यक्ति कर सकता है और थोड़े-से प्रयास में तो कर ही सकता है। वह कुंडली देखकर ज़्यादा अच्छे से पता लगाया जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि बिल्कुल कर ही नहीं सकते।

सामान्य स्तोत्र-पाठ तो कर ही सकते हैं। कवच-पाठ आप कर ही सकते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है, कोई नुकसान भी नहीं है। फिर यह कहा जाता है कि इनका जूठा नहीं, ऐसा नहीं है, जूठा इनका, इनका भोग नहीं ले सकते। अरे भैया, जब इनका भोग चढ़ाओगे, प्रसाद चढ़ाओगे, भगवान की साधना करोगे तो उस प्रसाद को किसको खिलाओगे ? भगवान का जूठा किसको खिलाओगे ? कुत्ते को डाल दोगे ? क्या करो ? उस प्रसाद का क्या करोगे?

ईश्वर का प्रसाद नहीं खाओगे?

मतलब प्रसाद के बारे में तो ऐसा कहा गया है कि प्रसाद का नियम है, जब भी आप मंदिर में जाते हो और कोई हाथ में प्रसाद थमाता है तो प्रसाद को हाथों-हाथ उसी समय आपको खा लेना चाहिए, पा लेना चाहिए, उस प्रसाद को ग्रहण कर लेना चाहिए। और प्रसाद को कभी भी अपने हाथ से उठाकर नहीं, खुद खाना चाहिए।

प्रसाद हमेशा दूसरों से लेना चाहिए। याचक की भांति, भिखारी की भांति हाथ फैलाकर प्रसाद को माँगा जाता है। प्रभु का आशीर्वाद होता है वह प्रसाद। खा सकते हैं।

 

 उच्छिष्ट गणपति  स्वरूप और पूजा का भय

 

फिर एक, एक और बात जो मुझे प्रॉब्लेमैटिक लगी कि श्मशान हो जाता है। आपका शरीर क्या है? आपका जीवन है क्या ? यह बताओ। आपके शरीर में, आपके मन में, आपके आस-पास झूठ, निंदा, चोरी, कपट, ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, काम, अब्रह्मचर्य, अभक्ष्य-भक्षण, व्यभिचार, इतना कुछ यह जो कचरा फैला हुआ है न, यह जो कचरा-पट्टी फैल रखी है। 

यह क्या श्मशान से कम है? उच्छिष्ट गणपति तो आपको श्मशान से बाहर निकालने की, मुक्त कर देने की विद्या है। समझने की बातें हैं। उनके स्वरूप को देखकर कई लोग जो है, इस प्रकार से ऑब्जेक्शन करते हैं कि यह इस प्रकार का कैसा स्वरूप है भगवान का।

क्योंकि भगवान गणेश जी को तो गणपति बप्पा मोरया और एक हंसते हुए, प्यारे से, गोलू-मोलू जो हम बताते रहते हैं न, वैसा, वैसा लोग मान के चलते हैं। तंत्र के जो हैं न, सुप्रीम होते हैं भगवान गणपति।

तंत्र के अंदर ऐसे-ऐसे प्रयोग हैं कि मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, विद्वेषण, यह सारे जो षट्कर्म हैं, भगवान गणपति के ऐसे-ऐसे प्रयोग हैं कि आपकी हवा टाइट हो जाएगी।

भगवान का स्वरूप अपनी शक्ति के साथ एकात्म होकर अपनी बुराइयों को नाश करने में है। यानी जब आप अपने सबसे अति आनंद की अवस्था में हों, जब आप सबसे ज़्यादा आनंदित हों, सुखी हों, तब भी कोई बुरा कर्म आपके ऊपर प्रभाव न डाल सके, उसको भी आप नष्ट कर दें। यह इसका प्रतीकात्मक चित्रण इस प्रकार से है बाबा।


 

 उच्छिष्ट गणपति का सच्चा उद्देश्य और निष्कर्ष

 

 99% तो यही नाटक है हमारे हिंदुओं में कि जब हमें ज़रूरत होती है, जब हम पर कोई संकट आता है, तब हमें भगवान याद आते हैं।

अगर आपके जीवन से सारे संकट मिट जाएँ, आनंद हो जाए, अंबानी जितना पैसा आ जाए और आपके बच्चे बढ़िया हो जाएँ सब और आपकी आयु 100 वर्ष और 100 वर्ष तक निरोगी रहें। 

घूमते-फिरते रहें जीवन में, ऐसा हो जाए आपके जीवन में दुख ही न हो, मैं बताता हूँ 99% हिंदू पूजा-पाठ करना छोड़ देंगे, भगवान को छोड़ देंगे, मंदिर जाना बंद कर देंगे।

भगवान का कॉन्सेप्ट है हमारे लिए कोई देने वाला और हमारा अपने मन में कॉन्सेप्ट है, हम हैं भिखारी। भगवान के सामने मंगतों की तरह, भिखारियों की तरह माँगने जाते हैं बस। और ईश्वर का कुछ लेना-देना है नहीं।

तो तंत्र, जो कि ईश्वर से मिला देने की विद्या है, वह कहाँ समझोगे? उसके पैटर्न कहाँ समझोगे? उसके प्रतीक कहाँ समझोगे? उसके, उसके सिम्बल्स कहाँ समझोगे? भगवान के फ़ोटो हमारे पैरों में आ रहे हैं। भगवान के कैसे-कैसे रूप बना के, कैसे-कैसे खिलौने बनके, चल रहा तमाशा तो हमने बना रखा है इसका।

 अभी तो मुख्य, मूल बात उच्छिष्ट गणपति का जो कॉन्सेप्ट है, वह अपनी, अपने, अपने आनंद पर विजय प्राप्त करते हुए, अपने चरम सुख के समय भी आप अपने कुकर्मों को मार सकें, अपनी बुराइयों को नष्ट कर सकें, तो उच्छिष्ट गणपति का आनंद है। यह उनकी कृपा है। यह उनका कॉन्सेप्ट है।

फिर इसकी साधना कैसे की जाती है? सामान्य चीज़ें ही बताऊँगा। ऐसा नहीं कि कोई घनघोर कोई मंत्र बताकर और ऐसा कोई, ऐसा विद्या, देखो, वह तो इंटरनेट पे यहाँ पर पोस्ट में तो नहीं बताई जा सकती कि कोई मैं मंत्र बताऊँ और उसके विनियोग, न्यास और पूरा आवरण-पूजा, ये तो इंपॉसिबल है यहाँ बताना।

तो अगले लेख में मैं उसका कवच लेकर अवश्य आऊँगा। उच्छिष्ट गणपति कवच, ज़रूर पढ़िए। ठीक अगला लेख, बने रहिए। इसी को कंटिन्यू कीजिए।

जीवन बदल देने वाली विद्या है उच्छिष्ट गणपति कवच। चलिए, इसी के साथ, लेख अच्छा लगा हो, बात अच्छी लगी हो, सच्ची लगी हो, पसंद आई हो तो पोस्ट को लाइक करें, वेबसाइट को फॉलो करें।

हम बार-बार यही विनती करते हैं कि 4-5 साल हो चुके हैं मुझे इस वेबसाइट के ऊपर अपना कंटेंट, अपनी पूरी ईमानदारी से अच्छी, सच्ची बात करने का प्रयास करता हूँ।

लेकिन उस, हो सकता है कोई कमी रही हो क्योंकि बहुत ज़्यादा शोर-शराबा, ताम-झाम नहीं होता मेरे लेखों में। बहुत ज़्यादा धूम-धाम, ये सब नहीं होता। सिंपल सी बात करते हैं।

समझाने का प्रयास करता हूँ। लेकिन ठीक है। चलो, आगे बढ़ाओ बाबा, साथ रहो। तो इस वेबसाइट से आपको निराशा हाथ नहीं लगेगी। कभी भी गलत सूचना नहीं लगेगी। कोई हवाबाज़ी नहीं होगी।

इस वेबसाइट से आपको वैल्यू ही ऐड होगा आपकी लाइफ़ में। यह मेरा वादा। मैं तो इतना वादा कर सकता हूँ। इतना वचन दे सकता हूँ। चलिए, ज्योतिष-संबंधी, कुंडली-संबंधी एनालिसिस हो, कोई प्रश्न हो तो, इस संबंधी कोई प्रॉब्लम हो तो आप हमारे इस नंबर पे यहाँ पे संपर्क कर सकते हैं।

इस पर मैसेज कर दीजिए WhatsApp के ऊपर। चलिए, इसी के साथ आप सबके मंगल की कामना करता हुआ मैं पंडित अखिलेश आपसे विदा लेता हूँ। धन्यवाद। सर्वे भवन्तु सुखिनः।

श्री हरिद्रा गणेश साधना पूजा के लाभ और क्यों करना चाहिए ?

श्री हरिद्रा गणेश साधना पूजा के लाभ और क्यों करना चाहिए ?

श्री हरिद्रा गणेश साधना पूजा के लाभ और क्यों करना चाहिए ?

श्री हरिद्रा गणेश साधना पूजा के लाभ और क्यों करना चाहिए ?
श्री हरिद्रा गणेश साधना पूजा के लाभ और क्यों करना चाहिए ?

ॐ गं गणपतये नमः। हरिद्रा गणेशाय नमः।

Haridra Ganesh Sadhana आज का जो विषय है, वह है श्री हरिद्रा गणेश पूजा-साधना के लाभ और क्यों करनी चाहिए हरिद्रा गणेश की साधना।  श्री हरिद्रा गणेश की साधना के लाभ और क्यों करना चाहिए हरिद्रा गणेश की साधना ? देखो, सबसे पहली चीज क्या है, हरिद्रा गणेश की साधना। भई, भगवान श्री गणेश के अलग-अलग रूप हैं, ठीक है ना? भगवान श्री गणेश के अलग-अलग रूप हैं, लेकिन अगर आप हरिद्रा गणेश जी की साधना करते हैं तो सर्वप्रथम यह गणपति, हरिद्रा गणपति, मां बगलामुखी के पुत्र स्वरूप गणपति माने जाते हैं

 

माँ बगलामुखी का आशीर्वाद और तेज बुद्धि

 

हरिद्रा गणेश, हरिद्रा मतलब हल्दी और मां का एक नाम पीतांबरा। मां को पीला रंग और हल्दी बहुत प्रिय है, तो भगवान श्री गणेश की अगर हरिद्रा रूप में हम पूजन करते हैं तो सर्वप्रथम मां बगलामुखी का आपको आशीर्वाद प्राप्त होता है।

भगवान श्री गणेश से बुद्धि आपकी बहुत प्रखर हो जाती है, बहुत तेज हो जाती है। यानी कि जैसे सामने वाला व्यक्ति आपसे कुछ बात कर रहा है या आप कहीं कोई व्यापार कर रहे हो, नौकरी कर रहे हो, काम कर रहे हो, तो आपकी बुद्धि के अंदर वो चीज आएगी जो आप अपनी वाणी से बोलेंगे, जो आपको सफल बनाएगी।

 

धन, मान-सम्मान और आध्यात्मिक उन्नति

 

 जब बुद्धि अच्छी होती है और जब वाणी अच्छी होती है तो धन के रास्ते बेहतर हो जाते हैं क्योंकि जो ज्योतिष के अंदर जो गले का स्थान होता है, यह द्वितीय स्थान माना जाता है, उसको कुटुंब का स्थान माना जाता है, इसको परिवार का स्थान माना जाता है, मुख्यतः आपके धन का स्थान माना जाता है।

तो हरिद्रा गणेश जी की साधना करने से जब आपकी बुद्धि अच्छी होगी, प्रखर होगी और उसके संग-संग जब आप जो है, अच्छा बोलेंगे, आपका कंठ का स्थान यानी कि कुंडली के अंदर दूसरा घर आपका जब एक्टिवेट होगा, तो आपके परिवार के लोग, आपके आसपास के लोग आपका सहयोग करेंगे, आपका काम बढ़ेगा और आपका धन बढ़ेगा।

जब बुद्धि अच्छी होगी, वाणी अच्छी होगी, धन की मात्रा आगे बढ़ेगी तो आपका मान-सम्मान, प्रतिष्ठा स्वयं बढ़ जाएगी। और जब व्यक्ति का मन शांत होता है, बुद्धि स्थिर होती है, प्रबल होती है, धन का आगमन आपकी जरूरत के अनुसार  होता रहता है,  आपका जो विश्वास है, आध्यात्मिक  हो जाता है।

 जब आप आध्यात्मिक हो जाते हैं तो ईश्वर भी आपकी जरूरतों को, जैसे भौतिक उन्नति को बढ़ाता है। और जब भौतिक उन्नति बढ़ती है तो आपके जीवन में सुख बढ़ता है, पारिवारिक सुख बढ़ता है और सकारात्मक विकास होता है

साधना का सार

तो इसलिए हमें हरिद्रा गणेश की आराधना करना चाहिए। अगर आप चाहते हो जीवन के अंदर कि मां बगलामुखी का आशीर्वाद आप पर बरसता रहे, उत्तम वाणी हो, उत्तम बुद्धि हो, मान-सम्मान-प्रतिष्ठा बढ़े, आध्यात्मिक ज्ञान बढ़े, भौतिकता की जो जरूरत की चीजें हैं।  वो आपको प्राप्त होती रहें, सुखी दांपत्य जीवन, सुखी पारिवारिक जीवन, सुखी सकारात्मक सोच का विकास हो, तो उसके लिए हरिद्रा गणेश की आराधना करना अति आवश्यक है।

 

ज्योतिषीय दृष्टिकोण: ग्रहों पर प्रभाव

 

आप बुद्धि के देवता भगवान श्री गणेश को बोला जाता है और मैं आपको यहां पर ज्योतिष का, अध्यात्म के संग में थोड़ा एस्ट्रोलॉजी की बात यहां पर आपको मैं बताना चाहूंगा कि भगवान श्री गणेश की पूजा कर रहे थे, सबसे पहली चीज क्या है कि कुंडली के अंदर जो आपके केतु ग्रह होते हैं, जो राहु ग्रह होते हैं, वो पॉजिटिव होने लगते हैं, साथ ही साथ बुध ग्रह पॉजिटिव हो जाते हैं।

गुरु ग्रह की विशेष कृपा

 

लेकिन यहां पर हरिद्रा गणेश की पूजा हो रही है यानी हल्दी स्वरूप गणेश की पूजा हो रही है तो आपके गुरु ग्रह भी अच्छे हो जाएंगे। तो अब आप यह देखिएगा कि भगवान श्री गणेश की आराधना करने से सबसे पहले क्या है कि  केतु यानी कि भ्रमजाल यानी आपके मन में जो भ्रम पैदा होता है, जो अचानक आपके जीवन में परिवर्तन होता है, तो उस पर आपका कंट्रोल होने लगता है, आप कंट्रोल करने लगते हो।

उसके बाद राहु जो आपको भ्रमित भी करता है और अचानक समस्या लाकर खड़ा कर देता है, तो वो भी पॉजिटिव होकर आपका सहयोग करने लगता है।

आपकी कुंडली के दो ग्रह हो गए। तीसरे नंबर पर वाणी का, क्रिएटिविटी का, नॉलेज का जो ग्रह है बुध, वो आपको सहयोग करने लगता है भगवान हरिद्रा गणेश की साधना से।

 उसके बाद में भगवान श्री गणेश का पीतांबरा स्वरूप होना यानी क्या होता है कि देव गुरु बृहस्पति जो आपकी कुंडली के अंदर हैं, वह पॉजिटिव हो जाते हैं

 जैसे वह पॉजिटिव होते हैं, सकारात्मक होते हैं, तो देव गुरु बृहस्पति संतान के, अध्यात्म के, सुख के, ऊंचाइयों के, स्वर्ण के, देवत्व के, पितरों के, गुरु के स्वरूप माने जाते हैं, तो वो आपकी कुंडली में इन सब चीजों का सकारात्मक प्रभाव देने लगते हैं, आपको प्राप्त होने लगती हैं।

निष्कर्ष

नेक्स्ट  भगवान श्री गणेश की, हरिद्रा गणेश की किस प्रकार से मंत्र जाप किया जाएगा, बहुत आसानी से कर सकते हैं, उस विषय में चर्चा करेंगे। आज की चर्चा यहीं समाप्त करते हैं।

आशा करता हूं post  आपको पसंद आई होगी। कुंडली विश्लेषण, कुंडली मिलान, किसी मुहूर्त की जानकारी के बारे में और ऑरा स्कैनिंग के लिए आप संपर्क कर सकते हैं। जय माता दी।

Ucchishta Ganapati Sadhana उच्छिष्ट गणपति साधना विधि विधान

Ucchishta Ganapati Sadhana उच्छिष्ट गणपति साधना विधि विधान

Ucchishta Ganapati Sadhana उच्छिष्ट गणपति साधना विधि विधान

 

 

Ucchishta Ganapati Sadhana उच्छिष्ट गणपति साधना विधि विधान गणेश ऐसे देवता हैं जिनकी वैदिक, तांत्रिक और पौराणिक, सभी प्रकार की साधनाएं और पूजा होती हैं। जी हां, यहां हम इनकी तंत्र साधना के बारे में बात करते हैं। तंत्र साधना के अंतर्गत गणपति की वक्रतुंड गणपति साधना, लक्ष्मी विनायक गणपति साधना, हरिद्रा गणपति साधना, उच्छिष्ट गणपति की साधना जैसी अनेक प्रकार की साधनाएं होती हैं, जिनको तंत्र में बहुत अधिक महत्त्व दिया जाता है। इन सब में उच्छिष्ट गणपति की साधना सबसे अधिक तीव्र और प्रभावी मानी जाती है।

 तो आज हम आपको उच्छिष्ट गणपति साधना के बारे में विस्तार से बताते हैं, क्या विधान उपयोग होते हैं, कौन-कौन से मंत्र होते हैं, इन मंत्रों के क्या-क्या प्रयोग हैं, कैसे इनको आप कर सकते हैं और कैसे इनका लाभ उठा सकते हैं। 

हालांकि आप बिना गुरु के उच्छिष्ट गणपति या गणपति की तंत्र साधना नहीं कर सकते, किंतु गुरु की सुरक्षा प्राप्त होने पर, इनकी आप जानकारी प्राप्त कर साधना कर सकते हैं और लाभ उठा सकते हैं। यह बहुत अधिक तीव्र प्रभाव और त्वरित परिणाम देने वाले होते हैं।


 

उच्छिष्ट गणपति नवार्ण मंत्र

three Lord Ganesha statuettes

उच्छिष्ट गणपति का नवार्ण मंत्र भी होता है। मंत्र महोदधि के अनुसार, इनका नवार्ण मंत्र होता है: “हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा”। ‘हस्ति पिशाचि लिखे’ के कारण इनको यह नाम दिया गया है और इस मंत्र का प्रभाव बहुत तीव्र होता है।

  • विनियोग: ॐ अस्य श्रीउच्छिष्टगणेश-नवाण-मन्त्रस्य कङ्कोल ऋषिः, विराट् छन्दः, उच्छिष्टगणपतिर्देवता, मम अभीष्टसिद्धये जपे विनियोगः।
    •  ऋष्यादिन्यास:
    • ॐ कङ्कोलर्षये नमः शिरसि:
    • ॐ विराट् छन्दसे नमः मुखे:
      ॐ उच्छिष्टगणपतिदेवतायै नमः हृदि:
    • ॐ विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे:
    •  
  • करन्यास: ॐ हस्ति अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ पिशाचि तर्जनीभ्यां नमः। ॐ लिखे मध्यमाभ्यां नमः। ॐ स्वाहा अनामिकाभ्यां नमः। ॐ हस्ति पिशाचि लिखे कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
  • हृदयादि षडङ्गन्यास: ॐ हस्ति हृदयाय नमः। ॐ पिशाचि शिरसे स्वाहा। ॐ लिखे शिखायै वषट्। ॐ स्वाहा कवचाय हुम्। ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा अस्त्राय फट्।

जिनको न्यास करना नहीं आता है, गुरु सिखा नहीं पा रहे हैं या गुरु पास में उपलब्ध नहीं हैं, वह सीधे अपने सर्वांगो में गणपति की भावना करते हुए भी मंत्र जप कर सकते हैं।

  • ध्यान: चतुर्भुजं रक्ततनुं त्रिनेत्रं पाशांकुशौ मोदकपात्रदन्तौ। करैर्दधानं सरसीरुहस्थमुच्छिष्ट गणपतिं भजेत्।।

इस प्रकार ध्यान करके इनका मन से आप जप कर सकते हैं। इसके बाद इनका यंत्र बनाया जाता है, जिसकी पूजा की जाती है, जो कि गुरु विस्तार से बताता है। पर गुरु नहीं है तो आप इनकी मूर्ति या चित्र स्थापित करके सीधे पूजा करते हुए भी साधना कर सकते हैं, किंतु गुरु की अनुमति जरूरी है और उनका सुरक्षा कवच भी जरूरी है।


 

मंत्र प्रयोग और विधान

white and gold hindu deity figurine

इस मंत्र के प्रयोग हम आपको बताते हैं। पूजा पद्धति तो गुरु ही समझा पाएंगे, पूजा पद्धति यहां बताने से आपके समझ में नहीं आएगी और बिना गुरु के आप कर भी नहीं सकते। हम बस मंत्र का प्रयोग बता रहे हैं।

  • राज्य प्राप्ति: अपने स्वयं के अंगूठे के आकार जितनी गणेश की प्रतिमा की रम्य कल्पना करते हुए लाल चंदन या श्वेतार्क (सफेद मदार) से मूर्ति निर्मित करें। फिर विधिवत् प्राण-प्रतिष्ठा करके मधु से स्नान कराएं। चतुर्दशी से शुक्ल चतुर्दशी तक प्रत्येक दिन गुड़ युक्त खीर का नैवेद्य तैयार करें और एकांत स्थान में बैठकर उच्छिष्ट मुख (बिना कुल्ला किए), वस्त्रहीन होते हुए “मैं स्वयं गणेश हूँ” की भावना से घी व तिल की 1000 आहुति दें। इस विधि का प्रभाव ऐसा है कि साधक राजकुल में उत्पन्न होता है अथवा 15 दिन में ही राजा जैसा सुख प्राप्त करता है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
  • अन्य प्रयोग:
    • कुम्हार की मिट्टी से प्रतिमा का निर्माण करके गणेश पूजन करने से राज्य की उपलब्धि होती है।
    • वाल्मीक की बांबी (जो चींटियां मिट्टी को अपने बिल से बाहर निकालती हैं) की मिट्टी से निर्मित प्रतिमा के पूजन से इच्छित मनोकामना सिद्ध होती है।
    • गोमय (गाय के गोबर) की प्रतिमा का पूजन सौभाग्यवर्धक है।
    • लावण (नमक) की प्रतिमा के पूजन से शत्रु रोगभीत होते हैं।
    • नील की प्रतिमा के पूजन से शत्रु नष्ट होते हैं।

हम आपको बताना चाहेंगे कि उच्छिष्ट गणपति की प्रतिमा सफेद मदार की जड़ से (यानी कि श्वेतार्क की जड़ से), नीम की जड़ से, मधुमक्खी के छत्ते के मोम से, मिट्टी की बांबी (यानी कि चींटी द्वारा निकाली हुई मिट्टी से) बनाई हुई मूर्ति से इनकी पूजा की जाती है और यह सब बहुत अधिक प्रभावी और तीव्र परिणाम देने वाले होते हैं।


 

विभिन्न तांत्रिक प्रयोग

Lord Ganesha

  • वशीकरण: घृत (घी) और तिल का मिश्रण करके होम किया जाए तो अखिल जगत वश में होता है। उच्छिष्ट मुख से तैयार पान पर फूंक कर जप किया जाए तो शत्रुओं को वश में किया जा सकता है।
  • शत्रु भेद: सरसों के तेल व राजिक (राई) पुष्पों को मिश्रित करके होम किया जाए तो शत्रुओं में विभेद होता है।
  • विजय प्राप्ति: द्यूत (जुआ), विवाद, वादियोंग (बहस) में इस मंत्र के जप से विजयश्री प्राप्त होती है। इसी मंत्र के जप से कुबेर अक्षक्रीड़ा के स्वामी बने और सुग्रीव-विभीषण को सहजता से राज्य प्राप्ति हुई।
  • अन्य विधान: रुद्रयामल के अनुसार, माघ कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी से शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तक प्रतिदिन नियमपूर्वक 1000 जप करें। मूलतः यहां पर श्वेतार्क की प्रतिमा का ही प्रयोग होता है। नैवेद्य के रूप में खीर, फल आदि दें। भोजनोपरांत उच्छिष्ट मुख से जप करना गणेश को सहज प्रिय है।
  • मंत्र सिद्धि: अंगूठे के आकार की गणेश की प्रतिमा श्वेतार्क अथवा लाल चंदन से बनाएं और उसे अग्नि और गुरु के सम्मुख स्थापित करें, फिर 16 हजार जप करें। यह एक मत है। दूसरा मत है कि बुद्धिमान यक्षराज कुबेर ने भी उच्छिष्ट मुख से गणेश का जप करने का समर्थन किया है। उपहारों से युक्त और उच्छिष्टमुख से आराधित गणेश सभी फलदायक हैं। इस विधान से जप करने से जपकर्ता वाञ्छित धनैश्वर्य को उपलब्ध करता है, यह सत्य है।

 

अत्यंत तीव्र प्रयोग

gold and blue crown on green leaves

चेतावनी: ये प्रयोग अत्यंत तीव्र हैं और केवल गुरु के मार्गदर्शन में ही किए जाने चाहिए। इनका दुरुपयोग साधक के लिए हानिकारक हो सकता है।

  • उच्चाटन: 108 बार अभिमंत्रित अपामार्ग की समिधाओं से होम किया जाए तो सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस मंत्र से अभिमंत्रित बन्दर व घोड़े की हड्डी की कील जिस किसी के घर में गाड़ दी जाए, उसका परम उच्चाटन होता है। मनुष्य की हड्डी की कील मंत्र से अभिमंत्रित कर जिस किसी के घर में गाड़ दी जाए, उसका मरण निश्चित है। यदि अस्थि की कील निकाल दी जाए तो प्रभावित व्यक्ति स्वास्थ्य लाभ कर सकता है, इसमें संदेह नहीं।
  • वशीकरण: साधक जिसका नाम लेकर जप करता है, वह वशीभूत होता है। यदि साधक पाँच हजार मरुपुष्पों का होम करे तो वह उत्तम स्त्री का वरण करता है। दस हजार मंत्र से होम किया जाए तो राजा तत्काल वशीभूत होता है।
  • सिद्धि प्राप्ति: एक लाख मंत्र जपने से राजा तथा दो लाख मंत्र जपने से अनगिनत राजा वशीभूत होते हैं। दस लाख मंत्र जपने से साधक इष्ट को सर्वथा वश में करता है। एक करोड़ मंत्र जपने से अणिमा, पूर्ण शक्ति और सर्वज्ञता आदि महासिद्धियां प्राप्त होती हैं।

इस मंत्र को लिखकर शीश अथवा कंठ में धारण किया जाए तो सौभाग्य व रक्षा मिलना सुनिश्चित है। यह मंत्र अजितेन्द्रिय को हानि करता है। समस्त पापों में गोपनीय माने गए इस मंत्र को अजितेन्द्रिय के लिए प्रकाशित नहीं किया गया है। इसमें तिथि, उपवास अथवा नक्षत्र आदि का विधान नहीं है। मंत्र का यथेष्ट चिंतन ही सर्व कामनाओं को प्रदान करता है, सर्व फल प्रदान करता है।


 

अन्य उच्छिष्ट गणपति मंत्र

 

ऐसे ही गणेश के अन्य मंत्र भी हैं, जिनके विनियोग, ऋष्यादिन्यास, करन्यास, हृदयादिन्यास आदि अलग हो जाते हैं।

  • द्वादशाक्षर मंत्र: ॐ ह्रीं गं हस्तिपिशाचि लिखे स्वाहा।
  • ऊनविंशत्यक्षर मंत्र: ॐ नमो उच्छिष्ट गणेशाय हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा।
  • चतुस्त्रिंशदक्षर मंत्र (चौंतीस अक्षर): ॐ नमो भगवते एकदंष्ट्राय हस्तिमुखाय लम्बोदराय उच्छिष्टमहात्मने आं क्रों ह्रीं गं घे घे स्वाहा।

इस तरह से अनेक मंत्र भी मिलते हैं उच्छिष्ट गणपति के। इन मंत्रों से अभीष्ट की सिद्धि हेतु जैसा कि पीठ बनाया जाता है, जैसी की पूजा की जाती है, यंत्र आदि की और कुछ भेदों से पूजन करने से, एक लाख जप करके घी की आहुतियां देने से, या कृष्णाष्टमी से चतुर्दशी तक प्रत्येक दिन पाँच हजार जप करें, तदनंतर इसके दशांश का क्रमशः होम और तर्पण करें, इससे मंत्र सिद्धि को प्राप्त होता है और धन-धान्य, पुत्र-परिवार, सौभाग्य, अतुल यश मिलता है।

Dattatreya lakshmi sadhana दत्तात्रेय लक्ष्मी साधना जो गरीबी को ख़तम करेगी PH.8528057364

Dattatreya lakshmi sadhana दत्तात्रेय लक्ष्मी साधना जो गरीबी को ख़तम करेगी PH.85280 57364

Dattatreya lakshmi sadhana दत्तात्रेय लक्ष्मी साधना जो गरीबी को ख़तम करेगी PH.85280 57364

Dattatreya lakshmi sadhana दत्तात्रेय लक्ष्मी साधना जो गरीबी को ख़तम करेगी PH.85280 57364
Dattatreya lakshmi sadhana दत्तात्रेय लक्ष्मी साधना जो गरीबी को ख़तम करेगी PH.85280 57364

Dattatreya lakshmi sadhana दत्तात्रेय लक्ष्मी साधना जो गरीबी को ख़तम करेगी PH.8528057364 दोस्तों, आज मैं आपको एक ऐसा मंत्र बताऊँगा कि यदि लक्ष्मी प्राप्ति की सारी साधनाएँ आपकी फेल हो गई हैं या किसी भी साधना से या किसी भी मंत्र से आपको कोई फल नहीं मिल रहा है, तो मैं एक ऐसी महत्वपूर्ण साधना बताऊँगा जो कभी आज तक असफल नहीं हुई।

और जिसने भी इस साधना को किया है, यह शाबर साधना इतनी गजब की साधना है कि जो कोई भी इस साधना को करता है, अपना मनोरथ इस साधना के माध्यम से वह अवश्य पूरा कर सकता है। इसके लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने अनेक साधना प्रयोग दिए हैं।

दोस्तों, इन साधनाओं में साधना सामग्री की इतनी आवश्यकता तो नहीं होती, फिर भी अगर आप शाबर सिद्धि यंत्र या श्री दत्तात्रेय यंत्र या श्री यंत्र अपने पास रख लेते हैं तो ज्यादा उचित रहता है। यहाँ मैं लक्ष्मी जी की एक अद्भुत साधना दे रहा हूँ।

इसे आप कभी भी सिद्ध कर सकते हैं, फिर भी नवरात्रि से दीपावली तक का समय बहुत उचित होता है या फिर जिस दिन रोहिणी नक्षत्र हो, उस दिन इस साधना को शुरू करने से सफलता का संशय नहीं रहता।

दोस्तों, पूर्णिमा के दिन, पूर्णिमा का दिन क्या होता है, इस साधना का, जो भी साधना आप कर लेते हैं, इसका हवन करना पड़ता है। और हवन में क्या करना पड़ता है, घी और शक्कर मिलाकर के आपको आहुतियाँ देनी पड़ती हैं।

दोस्तों, ध्यान रखें, तो सबसे बढ़िया रहता है। पंडित जी को कुछ दक्षिणा वगैरह दे दिया तो वह आपके लिए पूरी व्यवस्था कर देंगे।

तो ऐसी व्यवस्था करने के बाद में आप मंदिर में यदि उसका हवन कर लेते हो तो सबसे बढ़िया रहता है। इस साधना में क्या होता है, लक्ष्मी जी को सौगंध दी जाती है कि आप हमेशा उनके घर परिवार, हमारे घर परिवार पर अपनी कृपा बरसाती रहेंगी और धन के कारण से हमारे जो भी कार्य रुके जा रहे हैं, वो कार्य आपकी कृपा से पूरे होंगे और प्रत्यक्ष होकर आप हमारे कार्यों में सहयोग दें। इस प्रकार की सौगंध माता लक्ष्मी को दी जाती है।

तो सौगंध देने से माता लक्ष्मी का यह जो मंत्र है ना, वो ज्यादा सफल हो जाता है। कारण यह है दोस्तों कि इसमें मैं छोटी सी बात बताता हूँ, आप इस रहस्य से भी परिचित होंगे कि लक्ष्मी सागर मंथन से प्रकट हुईं, जिसे नारायण ने अपनी पत्नी बनाया था, धर्म पत्नी बनाया था।

और लक्ष्मी जी के साथ में चंद्रमा और अप्सराएँ सागर मंथन से प्रकट हुई थीं। चंद्रमा को भगवान शंकर जी ने धारण कर लिया और अप्सराएँ देवराज इंद्र के सामने कथक करने के लिए चली गईं। चंद्रमा जो है ना, वह लक्ष्मी जी का भाई है।

इंसान को जब भी जरूरत पड़ती है, वह किसी न किसी प्रयत्न से उस स्थिति को पाना चाहता है जिसमें उसे श्रेष्ठता मिले, दूसरों का मोहताज नहीं बनना पड़ेगा।

ऐसी साधना वीडियो का निर्माण किया जो उसे एक श्रेष्ठ तत्व प्रदान कर लघु से महान बनाती है। विज्ञान के युग में समय के साथ वह क्रियाएँ लुप्त होती गईं और इंसान इसी आध्यात्मिकता की कमी से आर्थिक और भौतिक पक्ष में कमजोर होता चला गया।

दोस्तों, असुरों ने मंत्रों की बहुत गजब की साधनाएँ कर-करके देवताओं से उनके अधिकार छीन लिए, तो शंकर जी को क्या करना पड़ा, जितने भी वैदिक मंत्र थे, उन सारे मंत्रों को कीलित करना पड़ा।

और इसी से कभी प्रयत्न के बाद जब सिद्धि नहीं हुई तो ऋषियों ने उत्कीलन की प्राप्ति के लिए तप किया और नाथ पंथ के योगियों, जिनमें गोरखनाथ जी का नाम आप सबसे पहले सुनते हैं, गोरखनाथ जी का नाम, गोरखनाथ जी जो हैं वह सिद्ध पुरुषों में नंबर वन गिने जाते हैं।

उन्हीं के माध्यम से शाबर साधनाएँ आपके पास आईं। अलग-अलग संप्रदायों में अलग-अलग विधान हैं। या ये साधना प्रयोग दे रहा हूँ, इससे हम यह तो नहीं कह सकते कि लक्ष्मी आपके सामने प्रकट हो जाएँगी, मगर धन के नए-नए आयाम, रास्ते आपके जीवन में खुल जाएँगे और सुख-सुविधा से आपका घर ज़रूर भर जाएगा क्योंकि सभी सुख लक्ष्मी का रूप होते हैं।

मित्रों, इसलिए इस साधना का करना बहुत बेहतर रहता है। ये सारे प्रयत्न फेल हो जाने के बाद भी यह प्रयत्न, यह साधना कभी फेल नहीं होती।

Dattatreya lakshmi sadhana  VIDHI  दत्तात्रेय लक्ष्मी साधना  की विधि

Dattatreya lakshmi sadhana दत्तात्रेय लक्ष्मी साधना जो गरीबी को ख़तम करेगी PH.85280 57364
Dattatreya lakshmi sadhana दत्तात्रेय लक्ष्मी साधना जो गरीबी को ख़तम करेगी PH.85280 57364

दोस्तों, इस साधना की विधि कुछ इस प्रकार है कि आप इसे रोहिणी नक्षत्र से शुरू करें। यह 21 दिन की साधना है। कमलगट्टे की माला से 21 माला मंत्र का जाप करना पड़ता है। वस्त्र वही पहनें जो आपको अच्छे लगते हों, बस काला रंग आपको नहीं पहनना है, इस बात का ख्याल रखें। साधना समय शाम को 7 बजे से लेकर के 10 बजे तक कभी भी आप शुरू कर सकते हैं।

अपने सामने एक बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर श्री यंत्र स्थापित कर लें और उसी का पूजन करें। गुरु पूजन और गणेश पूजन के बाद नवनाथों को नमस्कार करें और उनके, नवनाथों में क्या होता है, नमस्कार करने के बाद में “आदेश-आदेश” ऐसा बोला जाता है, “आदेश-आदेश”।

तो फिर आप नवनाथ का पूजन करके उसके बाद में यह ध्वनि निकालें, “आदेश-आदेश”। और अगर मिल जाए तो दत्तात्रेय भगवान का जो यंत्र होता है, वो दत्तात्रेय भगवान का यंत्र आपको अपने उसमें, पूजा में शामिल करना चाहिए।

क्या होता है कि दत्तात्रेय भगवान एक और तत्व हैं और वो सारी जगह विद्यमान रहते हैं। तो कोई भी प्रकार से पूजा का आपका दोष नहीं लगता है।

आपने कुछ भी गलती कर दी हो, कुछ भी कर दिया छोटा-मोटा, देखो ज्यादा गलती कर दी हो तो अलग बात है, जानबूझ के की जाने वाली गलती तो कभी माफ नहीं होती, लेकिन भूल-चूक से आपसे कोई गलती हो गई तो उसका दोष नहीं लगता है।

क्योंकि अगर तत्व सब जगह विद्यमान है और भगवान दत्तात्रेय के नाम से एक चुटकी रेत भी अगर उड़ा दी जाए तो आपकी साधना सफल हो जाती है, आपको पूजा का पूरा फल मिल जाता है। दोस्तों, इस यंत्र की मान्यता बहुत है। आपके पास कभी भी धन की कमी नहीं आने देता।

आप किसी भी तरह प्रयत्न कर इसे गुरु के हाथ से ले लें तो सबसे बढ़िया रहता है। अगर गुरु हाथ आपके पास नहीं हो या गुरु जी से नहीं मिले, तो गुरु जी का चित्र सामने रख करके उनका पूजन करके फिर आप दत्तात्रेय भगवान के यंत्र को अपनी पूजा उसमें स्थापित कर सकते हैं।

कमलगट्टे की माला से 21 माला मंत्र जाप कर लें। उसी माला से पहले और बाद में एक-एक माला गुरु मंत्र का जाप करें। मंत्र छोटा सा है, ज्यादा टाइम आपको लगेगा नहीं। घी का दीपक जलता रहना चाहिए और ज्योत जलती रहनी चाहिए। अगरबत्ती आदि लगा दें।

मंत्र इस प्रकार है दोस्तों:
ॐ सागर-सुता नारायण की प्यारी, चंद्र-भ्राता की सौगंध, हाजिर हो।
ॐ सागर-सुता नारायण की प्यारी, चंद्र-भ्राता की सौगंध, हाजिर हो।
ॐ सागर-सुता नारायण की प्यारी, चंद्र-भ्राता की सौगंध, हाजिर हो।

what is betal बेताल क्या होता है कहाँ पाया जाता है और ऐतिहासिक तथ्य ph.85280 57364

what is betal बेताल क्या होता है कहाँ पाया जाता है और ऐतिहासिक तथ्य ph.85280 57364

what is betal बेताल क्या होता है कहाँ पाया जाता है और ऐतिहासिक तथ्य ph.85280 57364

what is betal बेताल क्या होता है कहाँ पाया जाता है और ऐतिहासिक तथ्य ph.85280 57364
what is betal बेताल क्या होता है कहाँ पाया जाता है और ऐतिहासिक तथ्य ph.85280 57364

 what is betal बेताल क्या होता है कहाँ पाया जाता है और ऐतिहासिक तथ्य ph.85280 57364 भारतीय पौराणिक कथाओं और लोककथाओं का संसार अनगिनत रहस्यमयी और आकर्षक पात्रों से भरा पड़ा है। इन्हीं पात्रों में से एक है ‘बेताल’, जिसे ‘वेताल’ भी कहा जाता है। बेताल का नाम सुनते ही हमारे मन में राजा विक्रमादित्य और उनके कंधे पर बैठे बेताल की छवि उभर आती है, जो हर बार एक नई कहानी और एक कठिन प्रश्न के साथ राजा की बुद्धि और न्याय की परीक्षा लेता है। लेकिन बेताल केवल एक कहानी सुनाने वाला भूत नहीं है, बल्कि वह ज्ञान, रहस्य और नैतिकता का प्रतीक है।

कौन है बेताल ? what is betal ?

शाब्दिक रूप से, ‘वेताल’ संस्कृत का शब्द है, जिसका संबंध उन आत्माओं या प्राणियों से है जो शवों (मृत शरीरों) में प्रवेश कर उन्हें अस्थायी रूप से जीवित कर देते हैं। ये साधारण भूत-प्रेत से अलग होते हैं। बेताल को अक्सर श्मशान घाट में पेड़ों, विशेषकर पीपल या बरगद के पेड़ पर उल्टा लटका हुआ चित्रित किया जाता है।

इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये केवल एक डरावने प्राणी नहीं हैं, बल्कि इनके पास अपार ज्ञान, तर्क शक्ति और भविष्य देखने की क्षमता होती है। वे मानव स्वभाव और धर्म-अधर्म की गहरी समझ रखते हैं।

बेताल की प्रमुख विशेषताएँ

  1. शवों पर नियंत्रण: बेताल की सबसे प्रमुख शक्ति किसी मृत शरीर में प्रवेश करके उसे अपनी इच्छानुसार चलाना है। शरीर भले ही मृत हो, लेकिन बेताल उसे बोलने, चलने और यहाँ तक कि लड़ने में भी सक्षम बना देता है।
  2. अपार ज्ञान: बेताल त्रिकालदर्शी होते हैं, यानी वे भूत, वर्तमान और भविष्य की घटनाओं को जानते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ ज्ञान और रहस्यों से भरी होती हैं।
  3. उल्टा लटकना: लोककथाओं में बेताल को हमेशा पेड़ से उल्टा लटका हुआ दिखाया जाता है, जो उनकी अलौकिक और प्रकृति के नियमों से परे होने की स्थिति को दर्शाता है।
  4. नैतिक प्रश्न: बेताल की कहानियों का अंत हमेशा एक पहेलीनुमा नैतिक प्रश्न से होता है, जो श्रोता को धर्म, न्याय और कर्तव्य की दुविधा में डाल देता है।

विक्रम और बेताल की अमर कथा

बेताल का सबसे प्रसिद्ध वर्णन ‘बेताल पच्चीसी’ (वेतालपंचविंशति) नामक कथा संग्रह में मिलता है। यह कथा राजा विक्रमादित्य के शौर्य, धैर्य और न्यायप्रियता की परीक्षा है।

कहानी के अनुसार, एक तांत्रिक राजा विक्रमादित्य से एक अनुष्ठान के लिए मदद मांगता है। वह राजा को श्मशान में एक पेड़ पर लटके बेताल को लाने का कार्य सौंपता है। तांत्रिक की शर्त होती है कि राजा को बेताल को लाते समय पूरी तरह मौन रहना होगा। यदि राजा एक भी शब्द बोला, तो बेताल वापस उड़कर पेड़ पर जा लटकेगा।

राजा विक्रम अपनी तलवार से बेताल को उतारकर अपने कंधे पर लादकर चल पड़ते हैं। रास्ता लंबा और सुनसान होता है, इसलिए बेताल राजा का मौन तुड़वाने के लिए उन्हें एक कहानी सुनाना शुरू करता है। हर कहानी के अंत में, बेताल राजा के सामने एक ऐसा जटिल प्रश्न रखता है, जिसका उत्तर दिए बिना राजा रह नहीं पाते, क्योंकि एक न्यायप्रिय राजा होने के नाते वे अन्याय होते नहीं देख सकते। जैसे ही राजा सही उत्तर देने के लिए अपना मुँह खोलते हैं, शर्त टूट जाती है और बेताल वापस पेड़ पर जा पहुँचता है।

यह सिलसिला चौबीस बार चलता है। हर बार राजा अपनी दृढ़ता से बेताल को फिर पकड़कर लाते हैं और हर बार बेताल की पहेली का उत्तर देकर उसे खो देते हैं। पच्चीसवीं और अंतिम कहानी में, बेताल राजा के ज्ञान और धैर्य से इतना प्रभावित होता है कि वह तांत्रिक के बुरे इरादों का खुलासा कर देता है और राजा को उसे हराने का उपाय बताता है।

सांस्कृतिक महत्व और प्रतीक

विक्रम-बेताल की कहानियाँ केवल मनोरंजन के लिए नहीं हैं, बल्कि ये नीतिशास्त्र, राजनीति और धर्म के गहरे पाठ पढ़ाती हैं।

  • ज्ञान का प्रतीक: बेताल उस गुरु का प्रतीक है जो कठिन प्रश्न पूछकर अपने शिष्य के ज्ञान और विवेक को परखता है।
  • न्याय की आवाज: बेताल के प्रश्न समाज की उन जटिल परिस्थितियों को दर्शाते हैं जहाँ सही और गलत का निर्णय करना अत्यंत कठिन होता है।
  • आधुनिक संस्कृति में: बेताल की कहानियों ने पीढ़ियों को प्रेरित किया है। रामानंद सागर द्वारा निर्मित प्रसिद्ध टीवी धारावाहिक ‘विक्रम और बेताल’ ने इस कथा को घर-घर पहुँचाया। इसके अलावा, कॉमिक्स, फिल्मों और किताबों में भी बेताल को कई रूपों में चित्रित किया गया है।
निष्कर्ष

संक्षेप में, बेताल भारतीय लोककथाओं का एक बहुआयामी पात्र है। वह एक पिशाच या भूत से कहीं बढ़कर है। वह एक ज्ञानी, एक परीक्षक और एक मार्गदर्शक है, जो अपनी रहस्यमयी कहानियों और चुनौतीपूर्ण प्रश्नों के माध्यम से हमें आज भी नैतिकता और विवेक के पथ पर सोचने के लिए मजबूर करता है। बेताल का चरित्र यह सिखाता है कि सच्चा ज्ञान केवल शास्त्रों में नहीं, बल्कि जीवन की जटिल पहेलियों को सुलझाने में निहित है।

Brahm Betal Sadhana ब्रह्म बेताल साधना सबसे शक्तिशाली बेताल ph.85280 57364

Brahm Betal Sadhana ब्रह्म बेताल साधना सबसे शक्तिशाली बेताल ph.85280 57364

Brahm Betal Sadhana ब्रह्म बेताल साधना सबसे

शक्तिशाली बेताल ph.85280 57364

 

 

Brahm Betal Sadhana ब्रह्म बेताल साधना सबसेशक्तिशाली बेताल ph.85280 57364
Brahm Betal Sadhana ब्रह्म बेताल साधना सबसे शक्तिशाली बेताल ph.85280 57364

Brahm Betal Sadhana ब्रह्म बेताल साधना सबसे शक्तिशाली बेताल जय श्री महाकाल! आज मैं आप लोगों के लिए एक बहुत ही बेहतरीन साधना लेकर आया हूँ। यह साधना अपने आप में गुप्त साधना है और गुरुमुखी साधना है। यह बहुत प्रचंड साधना, यानी कि महाप्रचंड बोल सकते हो। शायद मेरा मानना है कि  इंटरनेट  पर पहली बार,  पहली बार आपको देखने को मिलेगी।यह जो साधना है, खेतेश्वर बेताल, वीर बेताल, अगिया बेताल, जो अपने आप में एक बहुत ही प्रचंड साधना है, आप अनुमान भी नहीं लगा सकते कि यह कितनी पावरफुल है।

एक बार यदि कोई साधक हमारी इस साधना को कर लेता है, तो श्मशान का ऐसा कोई कार्य नहीं है जो वह इस साधना के माध्यम से नहीं कर सकता हो, तंत्र बाधा काटनी हो, वशीकरण, मारण, उच्चाटन। यह गुरुमुखी साधना है।

यह जो मैं साधना यूट्यूब पर दे रहा हूँ, यह ऐसी साधना देने की नहीं होती है। क्योंकि इन साधनाओं को अगर कोई गलत तरीके से, मतलब पूरे विधि-तरीके से अगर इंसान न करे, तो इसका घातक परिणाम भुगतना पड़ जाता है। क्योंकि यह जो मंत्र होते हैं, यह गुरुमुखी मंत्र हैं।

इसमें बहुत ही ऊर्जा और यह तीक्ष्ण कार्य करते हैं। मंत्र जो गुरु-मुख से लिए होते हैं, वे जितनी जल्दी इफ़ेक्ट दिखाते हैं, उतनी ही जल्दी उनका साइड-इफेक्ट भी होता है।

यह विक्रम बेताल जो है, बहुत उच्च कोटि की साधना है। यह जो विक्रम बेताल है, यह वचनबद्ध होता है और एक बात बता दूँ, इसकी खासियत यह है कि यह रूप बदलने में माहिर है।

अगर आप इससे कहो, आपको एक बार सिद्ध हो गई, किसी को मतलब दिखाना है कि भई मेरे पास माँ काली हैं, तो यह माँ काली का रूप धारण कर लेता है, भैरव का रूप धारण कर लेता है, यहाँ तक कि परम शिव का भी रूप धारण कर लेता है।

यह बहुत प्रचंड साधना है, विक्रम बेताल यानी मायावी बेताल, यह पलक झपकते ही कार्य-सिद्धि कर देता है।

लेकिन साधना का विधान बता देता हूँ, कोई भी साधक इस साधना को अगर एक बार शुरू कर ले, तो पूरी करके ही छोड़ेगा, मतलब समाप्ति करेगा। बीच में अगर छोड़ देता है, तो उसके साथ कुछ भी हो सकता है।

कुछ भी का मतलब है कि मृत्यु हो सकती है या कुछ भी ए टू जेड अनहोनी हो सकती है उसके साथ। ऐसी साधना को बीच में नहीं छोड़ा जाता है और गुरु महाराज के निर्देशन में और गुरु की देख-रेख में ही ऐसी साधना को करना चाहिए, वरना 100% नुकसान देगा।

लेकिन यह अपने साधक से जितनी जल्दी प्रसन्न होता है, उससे ज्यादा जल्दी रूठता भी है। यह हर कार्य करता है, जिसका आप अनुमान भी नहीं लगा सकते कि कितनी कार्यक्षमता है।

तो काफी समय से सोच रहा था आप लोगों को साधना दूँ। आज वैसे भी टाइम नहीं मिल पाता, सिविल की तैयारी में लगा था मैं, तो सोचा आपके लिए लेख  बना दी जाए, कोई-न-कोई नया टॉपिक दे दिया जाए। तो इस साधना को आप नवरात्रि में भी कर सकते हैं।

Brahm Betal Sadhana ब्रह्म बेताल साधना विधि 

नवरात्रि से शुरू कीजिए, 21 दिन साधना कीजिए। आम दिनों में यह साधना आपको 21 या 41 दिन करनी पड़ेगी। अगर आप इस साधना को आम दिनों में करते हैं तो, अब इसका विधान बता देता हूँ। मैंने फायदे और नुकसान दोनों बता दिए हैं। इस साधना को आपको रात्रि 10 बजे से शुरू करनी है। वस्त्र सफ़ेद या काले, यह आप निर्वस्त्र होकर भी कर सकते हैं।

माला रुद्राक्ष की, दिशा दक्षिण और आपका जो दीपक रहेगा, सरसों के तेल का रहेगा। यह साधना श्मशान में कर सकते हैं या फिर आप अपने घर पर ही करना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको एक एकांत कमरा चाहिए।

जब तक आप साधना करेंगे, यानी साधना काल 21 दिन या 40 दिन, उस कमरे में अन्य व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है। आप ही जाएँगे।

साधना का एक विधान और है, साधना करेंगे तो हमेशा आपको नीचे सोना पड़ेगा धरती पर, न कि पलंग पर या तखत पर। नॉनवेज का इस्तेमाल नहीं करना है, न ही कोई नशा करना है।

और जो दीपक सरसों के तेल का रहेगा, वह खड़ी बाती का रहेगा, बाती सीधी होनी चाहिए। इसमें भोग में आपको शराब, बकरे की कलेजी, कुछ गुलाब के फूल, कोई-सा भी काला फूल, इतना रख लें।

प्रतिदिन एक नींबू काटकर, सिंदूर लगाकर, प्रतिदिन एक नींबू की बलि देनी है। बस इतना-सा विधान है इसका, कोई ताम-झाम की ज्यादा जरूरत नहीं है। और लास्ट वाले दिन 108 आहुति आपको बकरे के मांस की करनी है।

यह साधना इतनी डरावनी है जिसका अनुमान भी नहीं लगा सकते और जब बेताल की साधना होती है, तो अनुभव में मांस की खुशबू आनी आती है, मांस-मदिरा की खुशबू आएगी। जैसे श्मशान में कोई अंतिम संस्कार करके आते हैं, मुर्दा जलते हैं, मांस जलने की खुशबू आती है, इसी प्रकार खुशबू आती है। साधक को साधना में कोई भी नया साधक तो कर ही नहीं सकता। दूसरी बात, यह साधना, बस इसमें नियम बहुत कठोर हैं।

एक तो साधना कक्ष में कोई जाए नहीं अगर घर पर करें तो, बाहर का खाना नहीं खाना, धरती पर सोना है इसमें। और साधना में चल जाता है, लेकिन इस पर धरती पर ही शयन करना है। तो विधान आपका हो गया।

Brahm Betal mantra  ब्रह्म बेताल मंत्र 

जिसको भी साधना करनी है, वह कर सकता है, संपर्क करे। मंत्र यहाँ नहीं दूँगा, सारी चीजें क्लियर करने की नहीं होती हैं। अगर सही से इसका इस्तेमाल किया जाए तो यह बहुत उपयोगी है और गलत तरीके से अगर इसे गलत हाथों में दे दिया जाए, तो पता नहीं किस-किस का बुरा करेगा और अपना तो बुरा करेगा ही पहले।

काफी मैंने मंत्र दिए हैं, जिसको मंत्र चाहिए, हमारी संस्था के नंबर पर कांटेक्ट करे, जानकारी प्राप्त करे। साधना करने के लिए अपने जो भी गुरु हैं, उनके निर्देशन में साधना करे। तो मंत्र नहीं दे रहा हूँ, जिसको चाहिए वह हमारी संस्था के नंबर पर कांटेक्ट कर सकता है, मंत्र प्राप्त कर सकता है।

Hanuman Betal Sadhna हनुमान बेताल साधना 11 दिन में सिद्ध होगा ph.85280 57364

Hanuman Betal Sadhna हनुमान बेताल साधना 11 दिन में सिद्ध होगा ph.85280 57364

Hanuman Betal Sadhna हनुमान बेताल साधना 11 दिन में सिद्ध होगा ph.85280 57364

Hanuman Betal Sadhna  हनुमान बेताल साधना 11 दिन में सिद्ध होगा ph.85280 57364
Hanuman Betal Sadhna हनुमान बेताल साधना 11 दिन में सिद्ध होगा ph.85280 57364

Hanuman Betal Sadhna हनुमान बेताल साधना 11 दिन में सिद्ध होगा ph.85280 57364 जय माँ कामाख्या, जय माँ जगदंबा। दोस्तों, सभी साधक-साधिकाओं का स्वागत है  gurumantrasadhna.com में। दोस्तों, आज मैं आप लोगों के लिए एक बहुत बड़ी शक्ति की साधना लेकर आज उपस्थित हुआ हूँ, और यह जो शक्ति की साधना बताने जा रहा हूँ, यह बहुत लोगों के रिक्वेस्ट पर डालने जा रहा हूँ। वो लोग जो बेताल साधना को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं, कई लोगों का सवाल है कि, “गुरुजी,

 

गुरुजी,सबसे ताकतवर बेतालों में से कौन है?” हनुमान बेताल साधना  Hanuman Betal Sadhna

और “कोई भी ताकतवर बेताल की साधना बताइए जो बलशाली हो, ठीक है, और हर आज्ञा का पालन करे, जो एक झटके में उसका काम पूरा करके दिखाए, और ताकतवर होने के साथ हमें नॉलेज भी दे सके।” और कुछ साधकों का ऐसा सवाल आया कि, “

तो उसी के लिए ही, इन दोनों के जो फासले हैं, उसको दूर करने के लिए आज हनुमान बेताल की साधना बताने आप लोगों को जा रहा हूँ, क्योंकि कई लोग इससे अनभिज्ञ हैं कि हनुमान बेताल, बेतालों में से कौन से नंबर में आते हैं, तो सबसे पहला होता है, बेतालों में सबसे ताकतवर बेताल है ग्यारह बेतालों में से श्मशान बेताल, और दूसरा होता है, जो दो नंबर में आएगा, वो होता है हनुमान बेताल,

कई लोग बोलते हैं कि, “गुरुजी, हनुमान बेताल Hanuman Betal Sadhna का प्रत्यक्ष होता है या नहीं? या फिर उनको हम क्या अदृश्य रूप में पूज सकते हैं?” देखो, यह एक ऐसी चीज़ है, इसका ऐसा विधान होता है जो आपको वह दिखाई नहीं देता, लेकिन आपके साथ चौबीसों घंटे अदृश्य रूप में रहता है। लेकिन उसको प्रत्यक्ष भी किया जा सकता है।

और कई लोगों का ऐसा सवाल है कि, “गुरुजी, कई लोग बताते हैं कि हनुमान बेताल देखने में इतने भयानक होते हैं, जिसको देखकर आप मर भी सकते हो। क्या ऐसा संभव है? क्या उसका कोई सौम्य रूप नहीं आ सकता?”

Hanuman Betal Sadhna हनुमान बेताल साधना सौम्य रूप में करना संभव है 

लेकिन इसका जवाब मैं आपको इस प्रकार दूँगा कि जो बेताल होते हैं, वो शिव के अंश हैं, शिव का एक रूप हैं, यह समझ सकते हैं। तो उसके हिसाब से क्या होता है, सत्यम शिवम् सुंदरम। तो उसमें भी एक सौम्य रूप होता है। जैसे एक भयानक रूप है, उसी प्रकार एक सौम्य रूप भी होता है, जो इतना खूबसूरत होता है कि राजकुमार से कम नहीं, एक राजा से कम नहीं, एक तेजस्वी योद्धा से कम नहीं।


तो बताते हैं इसकी विधि को, जानते हैं हम लोग अभी कि विधि इस प्रकार क्या होती है, कैसे किया जाएगा, कैसे इसको पूरा किया जा सकता है, कितने मंत्र होते हैं, हर चीज़ मैं आप लोगों को बता रहा हूँ, आप यहाँ पर सुनो। सबसे पहला होता है कि बेताल साधना को संपन्न करने के लिए आप लोगों के लिए विशेष मुहूर्त क्या-क्या होते हैं?

Hanuman Betal Sadhna हनुमान बेताल साधना  को संपन्न करने के लिए आप लोगों के लिए विशेष मुहूर्त क्या-क्या होते हैं?

किसी भी चंद्रग्रहण का दिन सबसे अच्छा माना गया है, दूसरा होता है किसी भी अमावस्या, या फिर जिस दिन मंगलवार या शनिवार पड़े, उस दिन भी आप कर सकते हैं। या फिर शिवरात्रि, या फिर होली के दिन, या फिर आप दीपावली के दिन भी कर सकते हो। यह विशेष मुहूर्त होते हैं कुछ, जिसमें आप बेताल की साधना Hanuman Betal Sadhna  कर सकते हो। शिवरात्रि हो तो और बढ़िया होता है, दीपावली हो तो और बढ़िया होता है, ग्रहण के दिन हो तो और बढ़िया है। यह तीनों दिन सबसे अच्छे होते हैं, या फिर श्रावण महीने में भी कर सकते हो,


Hanuman Betal Sadhna  – हनुमान बेताल साधना में क्या-क्या सामग्री आपको लेनी है

 

तो अभी बढ़ते हैं कि विधि में क्या-क्या सामग्री आपको लेनी है। सबसे पहला होता है कि यह कौन सी जगह में करना पड़ेगा आप लोगों को, यूँ तो होता है कि हनुमान बेताल की अगर साधना करनी है, तो आप लोगों को उजाड़ जगह में करना होगा, जंगल में करना होगा, वटवृक्ष के नीचे करना होगा, या फिर पीपल के वृक्ष के नीचे,

पीपल में करोगे तो जल्दी से आपको सफलता हासिल होगी, अगर मान लो आप बाहर नहीं कर सकते, तो एक ऐसा कमरा लेना होगा जो मिट्टी का हो, नीचे का जो भू-तल हो, वो मिट्टी का हो। ऐसे कमरे में आप कर सकते हैं, लेकिन कमरा घर के साथ जुड़ा हुआ नहीं होना चाहिए। कई लोग बताते हैं घर के साथ जुड़ा हो, ऐसा नहीं है, घर से अलग होना पड़ेगा वो कमरा, तीसरा हो गया कि अगर मान लो आप लोगों को इसमें और प्रभावी बनाना है, तो उसके लिए आप लोग श्मशान का भी चुनाव कर सकते हो, यह तीन जगह हो जाती हैं,

अभी इसका जो समय होता है करने का, वो होता है अर्धरात्रि, अर्थात मैंने बताया ही है कि 12:00 से लेकर 12:30 बजे के अंदर, उसके बीच में कर सकते हो। अभी वस्त्र आपको क्या लेने होंगे? देखो, अगर इसके वस्त्र आप लोग लेने के लिए जाओगे, तो सिर्फ काला लो, बिना सिले वाला, और काला ऊनी आसन लेना होगा। लेकिन याद रखना, इसमें कोई भी वस्तु चमड़े की पहन के नहीं जा सकते।

चप्पल, जूता, कुछ भी पहन रहे हो, तो अगर वह चमड़े का होगा, वो आप लोगों को नहीं लेना है, वो चमड़े की कोई भी वस्तु आप लोग पास मत रखो। और जितने भी दिन साधना करोगे, उतने ही दिन कोई भी चमड़े की वस्तु का कोई भी उपयोग मत करना,


यह हो गया एक चीज़। दूसरा होता है कि इस साधना में माला आपको क्या लेनी होगी, इसमें आप लोग रुद्राक्ष की माला लोगे, ठीक है, अगर घर में कर रहे हो तो, और घर में लेने की सामग्री भी अलग होती है। लेकिन अभी मैं आप लोगों को बता क्या रहा हूँ?

विधान, जो बाहर और श्मशान में करने का नियम है। तो उसके लिए आपको दो माला होंगी। एक तो होगा कमलगट्टे की माला, जो सात्विक विधि से या फिर तामसिक विधि से संस्कारित की जा चुकी हो।

अन्यथा आप लोग जो ओरिजिनल काले हकीक की माला होती है, वो काले हकीक की माला से जप कर सकते हो, या फिर मुंड माला से भी जप कर सकते हो, या फिर अस्थि माला से भी जप कर सकते हो, तो यह तीन-चार प्रकार की मालाएं हैं, इससे आप कर सकते हो: अस्थि माला, कमलगट्टे की माला, काला हकीक और मुंड माला।

यह चार मालाओं को आप लोग इस्तेमाल कर सकते हो, कोई दिक्कत नहीं है इसमें, और इसमें जो यह विधान है, यह तामसिक है।

इसमें आप उसको भोग दोगे क्योंकि बेताल होता है राजसिक शक्ति, रजोगुण इसके अंदर होते हैं, जो सात्विक, रजोगुणी भी है। सात्विक भोजन लोगे तो भी कर सकता है, अगर तामसिक वृत्ति का है, वो भी करेगा, बेताल सिर्फ तामसिक में ही नहीं आता। इसकी एक ही विधि होती है जो घर में करोगे, उसमें सात्विक भोग दिया जाता है, जैसे मिठाई हो गया, फल हो गया, इत्यादि चीजें है 


Hanuman Betal Sadhna  हनुमान बेताल – साधना में कौंन सी
सामग्री  जरूरत होगी 

 

तो अभी आप लोगों को इसमें क्या-क्या ले जाना है, श्मशान में करोगे या फिर बाहर में करोगे? सबसे पहला होता है, जो आसन लोगे वो कुशा का लो। उसमें, जिस प्रकार आप लोगों को मैंने एक में बताया था, यह कंकालेश्वर में, तो उसमें आप लोग कुशा का आसन लो, उस पर काला ऊनी आसन, उस पर बिछा लो, उस पर बैठो। ठंड का मौसम है, अगर कोई इसी समय करता है, तो इस प्रकार करेगा, और दूसरा होता है जो भोग में आप लोगों को साथ ले जाना होगा, वो क्या-क्या लेना होगा?

एक तो होगा आप लोगों को हर दिन एक बोतल शराब ले जाना होगा, दूसरा होता है आप लोगों को एक मुर्गा ले जाना होगा जो लाल हो या फिर काला हो। ऐसा काला मुर्गा, लाल मुर्गा, यह कुछ भी ले जाओ, तो मुर्गा एक ले जाओ और एक जो दारू है, वो ले जाओ। एक मीठा पान लेकर जाना है, उसके बाद आप लोगों को क्या करना होगा कि बकरे का सिर भी ले जाना है, बकरे का इसमें छाग भी ले जाना होगा। और दीया दो ले जाना है।

एक में होगा सरसों का तेल और एक जलेगा आप लोगों को क्या होता है, उसे, च़र्बी से, अभी आप लोगों को करना क्या है कि ये जो आप लोग चीजों को ले जाकर, उसी के साथ ही साथ आप लोग क्या ले जाना है कि भस्म ले जाना होगा, अभी देखिए, अगर किसी साधक ऐसा पूछे कि, “गुरुजी, हम सिटी में रहते हुए कहाँ मिलेगा?”

फिर, “गांव में रहते हैं, कभी-कभार यहाँ पर शहरों के श्मशान में ज्यादा लोग जलाते हैं, तो वहाँ पर राख मिल जाता है। लेकिन यहाँ पर कभी-कभी देहाती लोग मरते हैं, तो हमें भस्म कैसे प्राप्त होगा?” अगर मान लो भस्म नहीं मिलता है, तो आप लोग एक चीज़ ले सकते हो, वो होता है जल। लेकिन जल में जो होगा, वो गंगा का पानी थोड़ा-सा मिश्रण करके ले जाना है,


Hanuman Betal Sadhna हनुमान बेताल साधना विधि 

इसमें सुरक्षा घेरा तगड़ा लगेगा। एक तो होता है सुरक्षा मंत्र को सिद्ध करने के बाद, फूँक मारकर उसको संस्कारित करके, उसी से घेरा खींचा जाता है। दूसरा होता है, वो पानी से, आपको सुरक्षा का पानी के ऊपर दम करके मंत्र को, और यह जो वस्तु ले जाकर, उसमें छुरा या चाकू भी लेकर जाना है। 

तो आप लोगों को सबसे पहले क्या होता है, शिव के मंत्र को एक माला जप करना है, सबसे पहले, एक माला जप करने के बाद… देखो, एक माला के लिए इसमें आप लोग एक रुद्राक्ष की माला ले जाओ, ठीक है, जो सात्विक विधि से संस्कारित हो।

तो उस माला से ही शिव के मंत्र का जप करो, लेकिन उनसे भी पहले गणेश जी की स्तुति कर लेना, उनको सबसे पहले पूज लेना है उनका, उन्हें याद कर लेना है। उसके बाद साधना की सफलता हेतु उनको प्रार्थना करो।

उसके बाद शिव को आप लोग, उनका स्मरण करके दीया जलाओ, उसमें कौन-सा दीया जलाने के लिए मंत्र पढ़ा जाता है, ज्योत जलाने का वो मंत्र आप लोगों को बता दूँगा।

उसके बाद ज्योत जलाकर उनका एक माला जप करो। उसके बाद होता है हनुमान बेताल का आवाहन करके बेताल का जो दीया होता है, वो आप लोगों को जलाना पड़ता है।

यह साधना दो दिशा की ओर मुँह करके आप लोग कर सकते हो: एक होता है उत्तर, दूसरा होता है दक्षिण। यह दोनों दिशा की ओर मुँह करके आप कर सकते हो, इसमें कोई बंधन नहीं है।

कई लोग बताते हैं कि दक्षिण दिशा की ओर ही मुँह करके बैठना है, लेकिन ऐसी चीज़ नहीं है। दक्षिण करो या उत्तर करो, दोनों में से एक का चुनाव कर लो, बस उस तरफ आप लोगों को करना होगा, जो आप लोग दीयों को जलाओगे, एक दीया को आप घेरे के बाहर रखो, लेकिन जो आप लोग हनुमान बेताल Hanuman Betal Sadhna  का दीया सुरक्षा घेरे के अंदर जलाओ।

अगर मान लो ऐसा होता है कि तेल खत्म हो गया तो उसमें च़र्बी खत्म हुई तो दे सकते हो, तो च़र्बी थोड़ी-सी इतनी ले जाओ कि कम हो तो भी आप लोगों को कोई दिक्कत न हो, तो उसमें डाल सको। च़र्बी को पिघलाकर ले जाएं तो और बढ़िया है, तेल की तरह काम करेगी,


तो जैसे ही दीया जला दो, उसमें आप लोगों को क्या करना होगा कि यह जो लोबान होता है, लोबान का धूप लेकर जाना है, या फिर लोबान ही ले जाओ।

थोड़ा-सा कोयला जलाकर उस पर जला देना है, और सामने आप लोगों को एक केले का पत्ता ले जाना है, जो कोमल पत्ता हो जाता है, तो उस केले के पत्ते के ऊपर जो देसी दारू है, वो आप लोगों को रखना होगा, जो बोतल है दारू की, और वो बोतल को खोल के रखना होगा, उसके बाद जैसे उनका आवाहन कर लिया, उनका एक आकर्षण मंत्र होता है बेताल का।

उस बेताल का आकर्षण मंत्र को आप लोगों को इसमें आपको सात माला जप करना होगा, और हाँ, एक चीज़ भूल गया मैं आप लोगों को बताना कि शिव के मंत्र को जप करने के बाद गुरू मंत्र का आपको एक माला जप करना होगा, और जैसे यह करोगे, तब माँ काली का आवाहन करो, आवाहन के बाद आप लोगों को बेताल का जो आकर्षण मंत्र है। 

उसको आपको सात माला जप करना होगा, इस सीरियल से आप लोगों को आना होगा, लाइन के हिसाब से। तो उसका जप सात माला जैसे ही हो गया, उसके बाद आप लोग जो मुर्गा ले गए थे न, उसको बलि देना है, उसका सिर काटकर उसमें बस रख देना है। 

सिर को भी रख देना है, बस वो कर देना है। अगरबत्ती जलाने की जरूरत नहीं है, बस जो लोबान जलाया है, वही सही है, तो उसके बाद आप लोगों को करना है कि मूल मंत्र का जप करना होगा। अभी मूल मंत्र कितना जप करना है आप लोगों को?

हर रोज़ इक्कीस माला जप करना होगा इसमें भी, एक होता है विधान, जो सात्विक विधि से, उसमें आप लोगों को 51 माला जप करना पड़ता है, लेकिन इसमें आप लोग सिर्फ इक्कीस माला जप करोगे, तो यह समझ लो, कुल मिलाकर 28 माला, उसके आकर्षण मंत्र के साथ, बाकी गुरू मंत्र और शिव का मंत्र अलग हो गया, तो आप लोगों को हर रोज़ 36 माला जप करना होगा, पूरा कुल मिलाकर।

लेकिन जब यह सामग्री को लेकर वो चीजों को स्थापित कर दोगे उस स्थान में, तो आप लोगों को क्या करना होगा, सुरक्षा घेरा भी खींचना है। बिना सुरक्षा घेरे के इस साधना को कभी भूल से भी मत करना।

सुरक्षा के साथ शरीर का भी कीलन कर लेना है, उसके बाद आप लोगों को भूमि बंधन करना होगा, क्योंकि उस जगह में कोई भी दिगपाल जैसी चीजें या फिर कोई भी शक्ति का वास हो सकता है, तो उसके लिए आपके साधना में कोई विघ्न उत्पन्न न करें, जैसे क्षेत्रपाल हो गया, कभी-कभार क्षेत्रपाल भी इसमें डिस्टर्ब करता है लोगों को। तो उसके लिए क्या होता है, आप लोगों को जो भूमि बंधन होता है। 

वो भूमि को कीलन कर लो, भूमि बंधन कर दो, तो उसके बाद वह आप लोगों के बैठने के लायक बन जाता है, उसके बाद जैसे ही यह विधि कर दी, तो शरीर जारण… अगर मेरे से कोई साधना सीखेगा तो या फिर जो कर रहे हैं, मैं अपने साधकों को पहले शरीर जारण कराता हूँ। तो शरीर को जारित कर लेना अपनी मुद्राओं से, तो शरीर जारण के पश्चात साधना शुरू कर दो, जैसे उसका आकर्षण मंत्र हो, मूल मंत्र हो,


तो जैसे ही इन मंत्रों का आप लोग जब जप करोगे, तो उसमें अनुभव क्या-क्या होने लगता है, वो मैं आपको बताता हूँ। सबसे पहला क्या होता है कि हनुमान बेताल का जैसे ही आगमन घटता है, तो उसमें मैंने आप लोगों को बेताल की जानकारी में एक चीज़ बताया था कि बेताल पंचभूतों के अधिपति होते हैं, और जितनी भी शक्तियाँ होती हैं, बेताल सबसे अलग होते हैं।

तो यह याद रखना, जैसे ही हनुमान बेताल के मंत्रों को कम-से-कम, ज्यादा-से-ज्यादा आप लोग 11 माला के ऊपर कर दो, ग्यारह माला हो गया, उसके ऊपर जैसे पहुँच गया, 12, 13, 14 माला से, तो उसी में ही शक्तियों का अनुभव आप लोगों तक हो जाएगा।

आप जिस किसी मंत्र का जप करते हो, और यह एक ऐसा शाबर मंत्र होता है, जिसको जप करने के बाद उसके चारों ओर रहने वाले भूत, प्रेत, पिशाच जैसी अतृप्त आत्माएं आपको दिखना शुरू हो जाती हैं, और नग्न आंखों से देख पाओगे। लेकिन अगर मान लो ऐसा होता है कि साधक उसमें भयभीत होता है, तो साधक को तब क्या करना चाहिए?

शिव को याद करके, ठीक है, बेताल के मंत्र के जाप में आप लोगों को ज्यादा एकाग्रचित्त होकर, आपको बहुत ज्यादा ध्यान देना होगा, बस आँखों को बंद करके रखो।

Hanuman Betal Sadhna हनुमान बेताल साधना  के अनुभव 

 

जितने भी डरावने आवाज आएं, ऐसा लगेगा कोई पीठ पर आप लोगों को कोई नाखून से खरोंच रहा है, आपको नाखून धंसा रहा है, ऐसा लगेगा कि कोई शक्तियां आपके कान में आकर बहुत जोर से चिल्ला रही हैं, ऐसा लगे कि कान से खून निकल रहा है, लेकिन ऐसा नहीं होता है, उसके बाद ऐसा लगेगा कि कोई आग जला रहे हैं, इतनी बदबू आए, नाले-जैसी, सड़ी-गली चीज़ों की, भांति-भांति की बदबू आ सकती है।

अगर बाहर करोगे, तो इसमें आप लोगों को घबराना नहीं होता है। इसमें बस संयम की जरूरत है। ध्यान लगाना कि आप लोग मंत्रों में फोकस करो, मंत्र जप में फोकस करो। तो आप लोगों को बाहर ध्यान नहीं देना है। जो कोई जो कर रहा है करने दो, जो हो रहा है होने दो, जो सामने आ रहा है आने दो। बस आप लोगों को यह करना है कि जप को पूरा करना है।

और कई लोगों का असफल होने का कारण यह होता है कि जो लोग जप की संख्या को भूल जाते हैं, मंत्र गलत पढ़ लेते हैं। ऐसे जब उन लोगों को अजीब-अजीब अनुभव आते हैं, तो डर के मारे वो गलत मंत्र को पढ़ लेते हैं।

तो ऐसा न हो, मंत्र चाहे थोड़ा-सा एक-दो ज्यादा हो जाए, लेकिन एक-दो कम नहीं होना चाहिए। यह हमेशा याद रखना मेरी बात को, तो ध्यान उसमें लगाओ।

तो बाकी चाहे शक्तियां चारों तरफ से आएं या फिर जितने भी तरफ से, कोई दिक्कत नहीं, क्योंकि आप ऐसे एक बाघ और शेर को बुला रहे हो, जो उसमें अगर प्रवेश कर ले, तो उस शक्ति को अगर सामने मिल गया, तो भाग जाएगा। तो वो भी उससे डरते हैं।

चुड़ैल भी आ सकती है, अगर श्मशान में यह सब करोगे, तो उसका प्रभाव ज्यादा होता है। और अगर बाहर में करोगे, तो श्मशान से थोड़ा कम होता है, तो बाहर में रहने वाले कम-से-कम 200-400-500 मीटर में रहने वाले, इसमें भी शक्तियां होती हैं, वो सब आपके आसपास आना शुरू कर देंगी।

शायद पेड़ से कोई बोले, “कि भाग जा यहाँ से, नहीं तो मारे जाओगे।” तो कुछ भी बोल सकता है यहाँ पर, ऐसा कोई बहुत जोर से मंदिर में जो घंटा है, उसको बजा रहा है, तो ऐसा भी अनुभव होता है, क्योंकि यह अनुभव मैं अपने अनुभव से बता रहा हूँ कि ऐसा मेरे साथ भी हुआ था कि कोई मेरे कानों के पास आकर कोई घंटा बजा रहा है, बहुत जोरों से,


तो जैसे ही यह सब होता है, तो उसके बाद आप लोगों को यह साधना कितने दिन करनी होगी, बेताल की साधना, यह जो आप लोगों को बता रहा हूँ, यह आप लोगों के लिए ग्यारह दिन की साधना बता रहा हूँ, ग्यारह दिन का। ग्यारह दिन आप लोगों को करना होगा।

जैसे ही आप लोग इस अनुभव के साथ करोगे, तो आखिरी माला के बाद जितनी भी हलचल मची हुई थी, हर चीज़ शांत हो जाएगा, एकदम से सन्नाटा हो जाएगा। उसमें बस आपको करना क्या है कि जैसे पेड़ में कर रहे हो, अगर श्मशान में करो, जहाँ पर लोगों को जलाता है, चिता के ऊपर, वहाँ पर आप लोग अपने भोग को रखकर चले आओ, बिना पीछे देखे।

जैसे ही एक बार रखा जाएगा, बिना पीछे देखे चले आना है। लेकिन सिर को काटने से पहले यह जरूरी होता है खुद के शरीर का फिर से सुरक्षा करना, चाहे पेड़ के नीचे करो या फिर वहाँ पर। अगर पेड़ के नीचे कर रहे हो, तो सामग्रियों को उसी पेड़ के नीचे रखकर बस आप उनको प्रार्थना करो कि, “आपके लिए मैंने भोग रखा है, बेताल महाराज, आप इसको ग्रहण करो,” तो बस वो चीज़ें करके घर के लिए निकलना है।

और आने के बाद नहा कर ही आप लोगों को आपके कक्ष में या फिर घर में प्रवेश करना होगा। तो जैसे ही यह साधना कार्य हो गया, ऐसे आप लोग कम-से-कम नौ दिन करो, नौवें दिन तक पहुँचोगे, नौ दिन करो बस, नौवें दिन जैसे होगा, उसी में ही तब बेताल का आगमन होता है। , बेताल दूसरे दिन से आपको देखता ही रहता है कि साधक मेरे लिए जो प्रार्थना कर रहा है, कैसे कर रहा है, क्या कर रहा है। तुम्हारी हर गतिविधि उनके पास होती है, लेकिन तुम्हारे पास नहीं होती।

जैसे ही नौवें दिन होगा, या फिर आप लोग सातवें दिन के बाद, जितने भी दिन होगा, आठवें, नौवें, दसवें-ग्यारहवें दिन होगा, उन्हीं दिनों में बेताल आपके पास आएगा।

और जैसे ही बेताल पास… कितनी माला में वो प्रत्यक्ष होते हैं, मैं आपको बताता हूँ। ज्यादा-से-ज्यादा आप लोगों का 15-16 माला जैसे ही पार हो जाएगा, उसी में ही बेताल का आगमन होगा, और अभी बेताल के आगमन में कौन-सा एक जरूरी बात होता है, जो मैं बता रहा हूँ, ध्यान से सुनना सभी लोग।

जो शक्तियाँ आप लोगों को विचलित कर रही हैं आपको डिगने के लिए, ठीक है, बैठने के बाद मंत्र जप में विचलित कर रही हैं, डराने की कोशिश कर रही हैं, वो सभी चीखती-चिल्लाती हुई एकदम से शांत हो जाएंगी।

उस समय एक पत्ता तक नहीं हिलेगा, कीड़े-मकोड़े तक नहीं होंगे, यह समझ सकते हो। और उस समय में ऐसा होगा कि आंधी-तूफ़ान भी आ सकता है, ज्यादा हवा तेज भी हो सकती है। लेकिन याद रखना, इसमें बहुत लक्ष्य करने वाली बात है। देखना, अगर बहुत ज्यादा तूफान भी आ रहा है, हवा भी चल रही है, ठीक है, लेकिन आप लोगों के सामने जो दीया होगा न, वो दीया नहीं बुझेगा। इतना भी आप लोग लिखकर बता रहा हूँ।

जैसे आप लोग इसको लक्ष्य करोगे, तब आप लोगों को पता चलेगा, ऐसा लगेगा कि हर तरफ सन्नाटा छा जाता है, कोई आहट तक नहीं होती, और उसी में ही हवाओं से आवाज आएगी, “क्यों बुला रहा है मुझे?” लेकिन उस आवाज़ का कोई जवाब नहीं देना है।

आपके चारों ओर वो देखना शुरू कर देगा। चारों ओर आप लोगों को आभास कराएगा। आपका नाम पुकार कर भी आ सकता है कि, “चले जाओ यहाँ से,” “तुझे कुछ नहीं मिलने वाला यह सब करके,” तो आप लोगों को उसमें ध्यान नहीं देना, बस अपने काम को करते रहना है।

और जैसे ही आखिरी माला हो जाएगी, वो जगह शांत हो जाएगी, उसमें कुछ भी नहीं रहेगा। और जैसे ही बेताल का आगमन होता है, उसके बाद शक्तियाँ नहीं आएंगी आपके पास, बिल्कुल भी नहीं आएंगी, तो उसी प्रकार हर दिन की तरह भोग रखकर चले आना है।


और जैसे ही आप लोगों का ग्यारहवां दिन होगा, ग्यारहवें दिन आप लोग बस मूलमंत्र को जब जप करना शुरू ही करोगे, उसी में ही बेताल आप लोगों के सामने आकर खड़ा हो जाएगा। अभी सबसे पहले बेताल क्या होता है, एक भयंकर शक्ल लेकर आप लोगों के सामने खड़ा होता है, तो इसमें जो होता है कि पहले जो आप लोगों की मंत्र संख्या पूरी न हुई, तो भयंकर शक्ल लेकर आपके सामने प्रकट होगा।

तो उसके लिए एक तरकीब बता रहा हूँ, एक ट्रिक बता रहा हूँ, वो आप लोग इस्तेमाल करना तब। कि बेताल जैसे भयंकर शक्ल को अगर आप लोग देखोगे, तो थोड़ा-सा, मतलब, अगर कोई दिल का मरीज होगा, वो थोड़ा-सा उसमें भयभीत हो सकता है,

मतलब ज्यादा दिल का दौरा भी पड़ सकता है, ज्यादा डर भी सकते हैं बहुत ज्यादा, क्योंकि भयंकर अवश्य होता है, यह सही है। अगर किसी ने बताया है, तो बहुत भयंकर होता है, बिल्कुल भयंकर से भयंकर होता है, तो उसके लिए आखिरी दिन आप लोग बस विशेषकर ही इस माला का जप करते जाओ। अगर जैसे आपको लग रहा है कि किसी चीज़ का पैर देखने को मिलेगा, ठीक ह

अगर थोड़ा-सा पैर को भी देख लिया, किसी चीज़ को देख लिया, उस क्षण, तो थोड़ा-सा एकदम काला होगा वो, ऐसे, और काला-काला धुएं के जैसा होगा, और आकार में बड़ा एक इंसान, जिसका हाइट कम-से-कम 10-11 फिट होगा, 22 भी हो सकता है। तो कोई समय विकराल रूप लेकर आप लोगों के सामने आ सकता है, कोई भी विशाल रूप लेगा, तो उसमें डरना नहीं है, बस आप लोग दृष्टा बने रहना, कंट्रोल करते रहना है।

तो जैसे ही आप लोगों की आखिरी माला होगी, उसी में ही बेताल आप लोगों के सामने सौम्य शक्ल लेकर आप लोगों के सामने हाजिर होगा। और सौम्य रूप में क्या होता है? सफेद वस्त्र पहना हुआ एक इंसान होता है जो वृद्ध रूप में होते हैं, वृद्ध जैसे इंसान होते हैं, इसकी दाढ़ी-मूंछ बहुत ज्यादा होती है।

ऐसा लगता है, बहुत बड़े ज्ञानी होते हैं, बाबा होते हैं, एक अघोरी टाइप का होगा, लेकिन हाथ में एक तलवार भी हो सकती है या फिर कोई भी लाठी भी हो सकती है या फिर नहीं भी हो सकती है, लेकिन सफेद वस्त्र का वो इंसान होगा, और ऐसा उसमें सौंदर्य भरा होगा, ऐसा आकर्षक होगा कि आप लोग देखते ही दंग रह जाओगे कि यह सामने है क्या चीज़, बेताल जैसी चीज़ ही नहीं हो सकती आपके सामने।

और तब आप लोग बताओगे मुझे कि, “गुरुजी, बेताल कितना खूबसूरत होता है।” अगर उसका सौम्य रूप आप लोगों ने देखा होगा, तो उसी में ही मोहित हो जाओगे। ऐसा आकर्षक रूप होता है। और उसके जो आंखें होती हैं, अगर किसी को भी देख लिया, तो किसी भी इंसान को वो वश में करने के लिए एक क्षण ही काफी होगा।


तो उसी में ही आप लोगों से प्रसन्न होकर बेताल आपसे वरदान मांगने के लिए बोलता है, वर मांगने के लिए बोलता है हनुमान बेताल कि, “क्या इच्छा है? अपना बताइए, क्या चाहते हो आप? इतने दिन जो मेरी आपने आराधना की, मेरी साधना की, क्या चाहते हो आप मुझसे?” तो तब बोलना है कि,

“हे महाराज, मैं यही चाहता हूँ कि आप हमेशा मेरे साथ रहो, हमेशा मेरे परिवार की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, और मेरा जो भी कार्य आपको पूरा करना है, मेरी मदद कीजिए, जब भी मैं आपका आवाहन करूँ, उसी क्षण, उसी पलक झपकते ही आप मेरे सामने प्रकट होना है आपको, और समय के अनुसार अच्छा-बुरा जैसा भी कार्य मैं आपको दूँ, वह कार्य आप को करना होगा,” तो बेताल उसमें वचन देता है, और बेताल से कितने वचन लेना है?

कुल मिलाकर बेताल, हनुमान बेताल से आप लोग पाँच वचन लेना ही काफी है, और जो पाँच वचन होते हैं, क्या-क्या हैं प्रमुख वचन, वो मैं आपको बता दूँगा, वचन लेने के बाद बेताल पूछा जाता है कि, “आपको बुलाने का तरीका बताइए,” और या फिर एक ऐसा भी काम कर सकते हो कि उसमें आप एक शर्त बना सकते हो कि आपके जो माला है,

वो मैंने बता दी, या फिर आप मूलमंत्र ही बता दिए कि, “आपके मूलमंत्र को अगर मैं 11 बार जप कर आपका आवाहन करूँगा, तो उसी समय आपको आ जाना है मेरे पास।” तो उसी में ही बेताल उसमें हामी भर देगा, तो यह होता है। या फिर आप उससे बोल भी सकते हो कि, “आपको बुलाने का तरीका बताइए।”

तब बेताल आपको बता देगा कि, “इस प्रकार मेरे को आप बुला सकते हो, इतने बार जप करने पर मैं आ जाऊँगा,” जहाँ पर भी करो। और आप लोगों को पहले ही बोला है कि मुँह से नहीं, मन से भी बोलोगे तो भी आ जाएगी शक्ति।

तो उसमें कोई बड़ी बात नहीं है, तो जैसे ये सब हो जाता है, तो बेताल को आप लोग अपना जो भोग है, वो उन्हें अर्पित करो और उनको बताओ कि, “आपके लिए मैंने भोग रखा है, इस भोग को आप ग्रहण करो और हमारे ऊपर हमेशा आशीष बनाए रखो।”

तो बेताल उसको ग्रहण करके आपसे इजाजत मांगेगा, आदेश मिलने पर वो अपने स्वधाम लौट जाएगा। तो उसके बाद आप लोगों की साधना जैसे ही कंप्लीट हो गई, तो बताए गए तरीके से, उनको बुलाए गए तरीके से उनको बुलाओगे, आवाहन करोगे, वो तत्क्षण सिद्ध हो जाएगा आपके कार्यों को संपन्न करने के लिए,


अभी बताता हूँ आखिरी बात कि यह काम क्या-क्या कर सकता है, इससे लाभ क्या होता है। हनुमान बेताल की साधना से साधक को यह लाभ होता है कि साधक में बाहुबल बहुत ज्यादा होता है। कोई और उसको हरा नहीं सकता, और जो हनुमान बेताल होता है, ऐसा अंगरक्षक शक्ति होता है, जो कोई भी तंत्र से आप लोगों की रक्षा कर सकता है।

कैसा भी शत्रु हो, एक ही बार में पछाड़ सकता है, कोई भी स्थान में आप लोग आसानी से जा सकते हो, कई जादूगर अगर इसकी साधना करते हैं, तो इससे जादू के खेल भी दिखाते हैं। अब वस्तुओं को हवा में उठाना तथा अदृश्य कर देना, धन भी लाकर देता है। 

वो हनुमान बेताल अगर साधक आदेश करे तो, इसके जरिए कोई भी वज़नदार से वज़नदार, साधक चाहे सौ कुंतल का हो, ऐसे वजनदार वस्तु को भी आप उठा सकते हो, साधक निरोगी बनता है और उसे पूरे परिवार को निरोगी बना देता है।

कोई भी, किसी भी इंसान के बारे में भूत, भविष्य, वर्तमान, इन तीनों कालों के ज्ञान को आप लोग पता कर सकते हो। और एक छोटे से संकेत के बराबर बात को ही बता देगा, जो इंसान छुपा नहीं सकता। अगर पेट के अंदर की बात है, तो भी आपको पता चल जाएगा, लेकिन सामने होना आवश्यक है, तो यह जो बहुत जरूरी बातें हैं और

Hanuman Betal Sadhna  हनुमान बेताल साधना नियम क्या है 

 

इसमें जो नियम-विधि होता है, तो इसमें आप लोगों को सात्विक नियमों का अनुरूप चलना होगा, मांस, मछली, अंडा, शराब, इन चीजों के सेवन से दूर रहना है, संभोग इत्यादि, लड़कियों से, औरतों से दूर रहना है, खुद के बनाए हुआ हाथों का भोजन करो या फिर अपनी माता का, उसके बाद किसी का भी नहीं चलेगा। 

बस माता का या फिर स्वयं खुद के हाथों का बनाया हुआ भोजन करो, और हर सोमवार को, जितने दिन साधना चले, उसमें अगर बीच में सोमवार आया, तो शिव आराधना के लिए निराहार रहना होगा शाम 6:00 बजे तक, मतलब संध्या तक, यह समझ सकते हो, जब तक ज्योत न जलाओ, तो निराहार रहकर आप लोगों को व्रत रखना होगा और बाकी के दिन रखने की आवश्यकता नहीं है,


तो इस प्रकार आप लोगों के जो बेताल होते हैं, कार्य करता है। और ऐसा होता है कोई एक शत्रु आपको परेशान कर रहा है, तो वो शत्रु को आप लोगों के सामने उठाकर लाकर गिरा सकता है, कोई भी जगह में आप अकेले हो, तो वो उसके हाथों में बैठकर, कंधे पर बैठकर, कहीं पर भी पहुँच सकते हो, ट्रैवलिंग कर सकते हो, यह समझ सकते हो, और ऐसा होता है कि खाने की कोई वस्तु को आप उसके जरिए मंगा सकते हो, तत्क्षण आपको ला देगा।

और बेताल का ही बोलते हैं कि बेताल इतना काम नहीं कर सकता। बेताल के जैसी गति में करने वाला शक्ति मतलब सौ में से दो-तीन शक्ति ही होगी, जैसे हमजाद हो गया, ठीक है, लाल परी हो गई, देव शक्तियां हो गईं।

ऐसे गिने-चुने शक्ति ही होंगी जो बेताल के जैसा काम करेंगी, क्योंकि उसके काम में गति होती है। एक बेताल इतना समर्थ होता है कि मान लो एक लोहे का पुल है, पक्की पुल है। पुल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचा सकता है या फिर उसको तोड़ सकता है। 

 

इतना सामर्थ्य होता है। और इसका किस्सा मैं कभी आप लोगों को बताऊँगा, इस पुल का, तो एक जगह ऐसा घटित हुआ था। और उस बेताल की जानकारी बहुत जल्दी आप लोगों को दूँगा। तो दोस्तों, कैसा लगा आप लोगों को यह साधना की जानकारी?

यही आप लोगों से निवेदन करता हूँ मैं। और अगर किसी साधक या साधिका को यह साधना करना है या फिर बेताल का ट्रांसफर लेना है, तो हमसे संपर्क कर सकता है। तो अभी मैं सभी लोगों से इजाजत लेता हूँ। जय माँ कामाख्या, जय माँ जगदंबा।

और  पढो 

अगिया बेताल साधना विधि विधान और मंत्र Agiya betal sadhana ph.85280 57364

अगिया बेताल रहस्य agiya betal sadhna rahasya PH.85280 57364